सोमवार, 4 अप्रैल 2016

Samgin3 - 01

क्लीम सम्गीन का जीवन
भाग – 3

घर में अन्फ़ीमेव्ना अपने थके हारे जिस्म को एक कमरे से दूसरे कमरे में घसीट रही थी.

 “दफ़ना दिया? चलो,” शयन कक्ष में ग़ायब होते हुए वह कुछ अस्पष्ट सा बुदबुदाई, और वहाँ से सम्गीन  ने बुढ़िया की बदरंग आवाज़ सुनी: “समझ में नहीं आता कि इस ईगोर का क्या करूँ: पीता रहता है, पीता रहता है. अपने शाही कुलनाम की भी शरम नहीं है, मैंने तो लगाम छोड़ दी.”

सम्गीन  ने चाय लाने को कहा और अपनी कैबिनेट का दरवाज़ा बंद करके ध्यान से सुनने लगा, - खिड़की के बाहर लोगों के भारी-भारी कदम घिसट रहे थे. ये निरंतर शोर किसी मशीन के काम करने का एहसास दे रहा था, जो मानो सड़क को चौड़ा करते हुए घर की दीवारों पर खटखट कर रही हो, फुटपाथ को समतल बना रही हो. घर के सामने वाला स्ट्रीट-लैम्प टूट गया था, जल नहीं रहा था – ऐसा लग रहा था कि घर अपनी पहले वाली जगह से सरक गया है.

 “ख़तम हो गया,” आँख़ें बंद करके सम्गीन  ने सोचा, और इस शब्द को अपने भावी लेख के शीर्षक के रूप में लिखा हुआ देखा; वो विस्मयवाचक चिह्न से समाप्त हो रहा था, मगर टेढ़ा खड़ा था और प्रश्नवाचक चिह्न की तरह प्रतीत हो रहा था. “इस मामले में दफ़न विधी से तात्पर्य है - सामान्य जीवन का पुनरुत्थान”.       

सब कुछ अलसाया हुआ और निराशाजनक प्रतीत हो रहा था, मित्रोफ़ानोव, ल्यूतोव परेशान कर रहे थे, निकोनोवा की याद परेशान कर रही थी. “कहीं उसीने तो मित्रोफ़ानोव की शिकायत नहीं कर दी?”

इसके बाद उसे याद आया कि पलंग पर उसकी बगल में सोना कितना असुविधाजनक था – वह काफ़ी जगह घेर लेती थी, और पलंग संकरा था. फिर सावधानी से चोली पहनने की उसकी आदत...

रास्तों पर कुछ घण्टे चलने का असर हो रहा था – जब अन्फ़ीमेव्ना चाय का प्याला लाई तो सम्गीन  सो चुका था. उसे वरवारा ने जगाया, वह उसका हाथ पकड़ कर इतनी ज़ोर से खींच रही थी, जैसे 
फ़र्श पर गिराना चाहती हो.

“उठो भी! तुम सुन रहे हो? युनिवर्सिटी के पास फ़ायरिंग हुई है...”

   उसने फ़र का कोट पहना था, उससे ठण्ड और पर्फ़्यूम की गंध आ रही थी, पिघली हुई बर्फ़ की बूंदें फ़र-कोट पर चमक रही थीं; गले पर हाथ रखते हुए वह चिल्लाई:

 “भयानक! काफ़ी तादाद में लोग मारे गए! बच्चे को...”
 “बच्चे को?” सम्गीन  ने दुहराया. “हो सकता है...”
“क्या – हो सकता है? आह, शैतान!”

आख़िरकार उसने कोई हुक खोल ही लिया, और, ठण्डा कोट सम्गीन  के घुटनों पर फेंककर, सिर से हैट खींचकर, वो पागल की तरह चीख़ती हुई कमरे में भागने लगी:

 “असल में – गोलियाँ चलाने का फ़ैसला कर लिया गया था. ओह, ये जनाज़े! वैसे भी – तुम ख़ुद ही सोचो – आख़िर हम फ्रांस में तो नहीं रहते! क्या ऐसे जुलूस निकालना संभव है!”
डाइनिंग रूम से कूमोव की आवाज़ आई:
“कैसा...पागलपन!”
 “किसने गोली चलाई?” सम्गीन  ने अविश्वास से पूछा.
“मैदान से. फ़ौजें. स्त्रतोनोव – सही है: इन जनाज़ों के लिए यहूदियों को महँगी कीमत चुकानी पड़ेगी! मगर – मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है!” उसने हैट हिलाते हुए कहा: “पहले तो इजाज़त दे दी, फिर – गोलियाँ चलाते हैं! इसका क्या मतलब है? तुम चुप क्यों हो?”
और क्लीम को बोलने के लिए मजबूर न करते हुए वह भाग गई.
 “शायद बढ़ा-चढ़ाकर कह रही है”, बैठे-बैठे पत्नी की रुक-रुक कर आती चीख़ों को सुनते हुए उसने कल्पना की.
“हाँ-हाँ...भयानक!”
रास्ते पर लोगों के कदम जैसे तेज़ हो गए. उदासी से सम्गीन  बाहर डाइनिंग रूम में आया – और इसी पल से उसकी ज़िंदगी लम्बे समय के लिए एक दुःस्वप्न में बदल गई. वह कूमिन से टकराया, जो पलकें झपकाते हुए लाल-लाल हथेलियों से अपने बाल ठीक कर रहा था, उसने सिर को झटका दिया, और बाल फिर से बिखर कर उसके गालों आ गए.
“पा-गलपन,” उसने दाँतों को भींचते हुए कहा, टेलिफ़ोन की तरफ़ जाकर रिसीवर उठाया और उसे गाल पे रखा, कान के नीचे.
 “टेलिफ़ोन तो काम नहीं कर रहा है!” वरवारा चीख़ी.
 “मुझे यकीन नहीं होता, बिल्कुल यकीन नहीं होता कि पीटरबुर्ग पर फ़िर से जर्मनी राज कर रहा है, जैसा कि अलेक्सांद्र तृतीय के ज़माने में पहली मार्च के बाद हुआ था,” रिसीवर की ओर देखते हुए कूमोव बुदबुदाया.
 “मैं आपको कहीं भी जाने नहीं दूँगी, कूमोव! आप ऐसा क्यों सोच रहे हैं कि वो भी निकीत्स्काया पे गया है? और, जो भी निकीत्सकाया पे जा रहे थे उन सभी को तो नहीं...”
किसी पंछी की तरह, जैसे उड़ते हुए ल्युबाशा सोमोवा डाइनिंग रूम में घुसी; उसके पीछे-पीछे एक कम्बल भी घिसटता हुआ कमरे में आया; अंधे की तरह गिरते-पड़ते, वह मेज़ से टकराई और, गहरी साँस लेकर, मेज़ पर मुट्ठी मारते हुए, अविश्वसनीय तेज़ी से बोलने लगी:
 “तुरोबोएव मारा गया...ज़ख़्मी, अस्पताल में, स्त्रास्त्नी रोड पर. अपनी सुरक्षा करना बेहद ज़रूरी है –वर्ना कैसे? मेडिकल पोस्ट बनानी होंगी! काफ़ी सारे ज़ख़्मी हैं, मारे गए हैं. सुनिए – आपको भी मेडिकल पोस्ट बनानी होगी! बेशक, विद्रोह होगा...यहूदी प्रोखोरोव फ़ैक्टरी में...  
वरवारा ने रुखाई से और कुछ कड़वाहट से सवाल पूछते हुए उसकी बात काटी.
अन्फ़ीमेव्ना भीतर आई और चुपचाप ल्युबाशा का कोट उतारने लगी, मगर वो उसके हाथों से चिल्लाते हुए छिटक गई:
 “छोड़ो! मैं अभी चली जाऊँगी...ओह, माय गॉड, छोड़ो भी...”
“कोई पोस्ट-वोस्ट नहीं!” वरवारा ने तैश से पति के कानों में फ़ुसफ़ुसाकर कहा. “किसी हालत में नहीं! मैं – नहीं कर सकती, करने भी नहीं दूँगी...”
उछलते हुए, जैसे मेज़ पर चढ़ जाना चाहती हो, ल्युबाशा जल्दी से चिल्लाई:
“गोगिन लोग तो मेडिकल पोस्ट बनाने में जुट गए हैं, और ल्यूतोव से भी कहना होगा, क्लीम! उसका घर ख़ाली है. और वहाँ एक प्लॉट भी है, वहाँ – ज़रूरी है. उसके पास जाओ, क्लीम. फ़ौरन जाओ...”
 “हाँ, हाँ, जाओ, क्लीम,” वरवारा ने ज़ोर देकर दुहराया, सोमोवा ग़ुस्से से चीख़ रही थी:
 “मुझे जैकेट और कंबल दे दो!”
  “अरे – कहाँ चली, कहाँ जा रही है, तू?” न जाने क्यों अन्फ़ीमेव्ना ने नीची आवाज़ में कहा, मगर ल्युबाशा मेज़ पर रोज़ाब्रेड जैसा मुक्का मारते हुए, उस पर चिल्लाई:
 “आप कुछ नहीं समझतीं! आप ...मछली हैं! अलेक्सेइ गोगिन के पीछे कुछ लोग भागे...गोलियाँ चलाईं...”
अन्फ़ीमेव्ना ल्युबाशा को ले गई, वरवारा ने फ़ुसफ़ुसाकर पति से कहा:
 “तुम जाओ, ल्यूतोव को मनाओ, वो इज़्ज़तदार आदमी है, मगर हमारे यहाँ – नहीं, थैंक्यू!”
सम्गीन कपड़े पहनने चला गया, इसलिए नहीं, कि उसे मेडिकल पोस्ट्स ज़रूरी प्रतीत हो रहे थे, बल्कि इसलिए कि घर से बाहर निकल जाए, विचारों को व्यवस्थित कर ले. वह हक्का-बक्का रह गया था, अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहा था और सुनी हुई बात पर यकीन नहीं करना चाहता था. मगर, ज़ाहिर था, कि कोई फ़ूहड़ बात हुई तो है, और व्यक्तिगत रूप से उसके ख़िलाफ़ हुई है.
 अपने आपको बचाना ज़रूरी है. विद्रोह होगा,’ रास्ते पर निकलते हुए ख़यालों में वह ल्युबाशा की चीखें दुहरा रहा था. ईडियट.
मगर सोमोवा को गाली देने के बाद उसने सोचा कि ये संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी गलियाँ बैरिकेड्स बनाने के लिए सही रहेंगी. और इसके बाद बड़ी अप्रियता से याद आया कि कैसे 8 अक्टूबर को मज़दूरों ने अजनबी लोगों की नज़रों से शहर का निरीक्षण किया था, और इसके बाद अचानक उसे महसूस हुआ कि ये बड़ा-भारी, अस्तव्यस्त शहर – जो उसके लिए पराया है – वो मॉस्को नहीं है, जैसा कि वह अब से कुछ घण्टे  पहले हुआ करता था. उस पर ठण्डा अंधेरा गिर पड़ा है, और उसने लोगों को छोटे घरों में, बिल्डिंगों में ठेलकर रास्तों की, खिड़कियों की सारी बत्तियाँ बुझा दी हैं. सिर्फ कभी-कभार, खिड़की के शीशों पर जमी हुई मुलायम बर्फ़ के उस पार पीले धब्बे भिखारियों जैसी दयनीयता से टिमटिमा रहे थे. अंधेरे में नुकीले, चुभते हुए धूल के कण चमक रहे थे, खेल रहे थे. शहर अवास्तविक हो गया था, जैसी कि अंधेरे में हर चीज़ हो जाती है, सिवाय अंधेरे के.
और, जैसा कि अंधेरे में हर आदमी करता है, सम्गीन ने अप्रियता से अपनी वास्तविकता को महसूस किया. लोग बेहद जल्दी चल रहे थे, छोटे-छोटे समूहों में, और, हो सकता है कि उनमें से कुछ जानते थे कि कहाँ जा रहे हैं, बाकी के बस यूँ ही चल रहे थे, जैसे भटक गए हों – दो बार सम्गीन ने ग़ौर किया कि नुक्कड़ पे मुड़ने के बाद वे फ़ौरन पीछे लौट गए. उसने भी अनिच्छा से उन्हीं जैसा किया. करीब पाँच आदमियों का एक छोटा सा समूह उसके आगे निकल गया; उनमें से एक सिगरेट पी रहा था, कदमों के साथ जैसे ताल देते हुए सिगरेट बार-बार चमक उठती थी; किसी महिला की आवाज़ ने शिकायत के सुर में पूछा:
 “साथियों, - क्या ये गंभीर बात है?” और चीख़ी: “फेंकों अपनी सिगरेट!”                              
  सम्गीन काँप गया, उसने सोचा कि इस रात मॉस्को 10 जनवरी की रात वाले पीटरबुर्ग से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो गया है. वह तनाव से सुनने लगा, इस आशंका से कि राईफ़ल-शॉट्स की क्लिकसुनाई देगी. मगर कानों ने किसी और ही खट्खट् की आवाज़ पकड़ी, जैसे गेट्स या दरवाज़े धड़ाम्-धड़ाम् कर रहे हों, दूर से कोई समझ में न आने वाली चरमराहट सुनाई दी – जैसे बर्फ़ के कारण टूट रहा पेड़ चरमराता है. कभी ऐसा लगता कि कोई लोहे की छत पर चल रहे हो, कभी कुछ चरमराता और गिर जाता, जैसे अचानक कोई बागड़ गिर पड़ी हो. रास्तों और गलियों के चक्करों में भटकता, अंधेरे में, जो निरंतर गहराता जा रहा था, सम्गीन सोचने लगा, कि ल्यूतोव से मिलना बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा, और आख़िर में उसने निश्चय कर लिया: मेडिकल पॉइंट्स – बचकानी कल्पना है.
असल में मैं बिना सोचे-समझे घर से निकल पड़ा,’ कदम धीमे करके उसने सोचा, ‘ये फ़ायरिंग, शायद – ग़लतफ़हमी का नतीजा है’.
मगर, ये याद करके, कि 9 जनवरी के अपराध को भी वह ग़लतफ़हमी समझना चाह रहा था, उसने आज की घटनाओं के बारे में मन में उठ रही कल्पनाओं को दूर धकेला और घर वापस जाने का फ़ैसला कर लिया. 
अलीना को, बेशक, मालूम है, उसके पास जाने में कोई तुक नहीं है, तुरोबोएव का अंत ऐसे ही होना था. असल में, वह बहुत साहसी था. ऐसे लोग या तो ख़ुदकुशी कर लेते हैं, या चोरी के अपराध में जेल भेज दिए जाते हैं. नष्ट हो चुके वर्ग का एक छोटा सा अंश. हो सकता है, कि अलीना अब तक उससे प्यार करती हो. किसी ने कहा था, कि औरत ज़िंदगी भर पहले मर्द से प्यार करती है, मगर – यादों में, न कि जिस्मानी तौर पर. गली वाले कोने पर वह मुड़ गया; कुछ कदम चलने के बाद किसी ने उसे आवाज़ दी:
 “कौन है?”
उसके सामने एक ऊँचा आदमी खड़ा था, उसने माचिस की तीली जलाई और, उसके चेहरे पर प्रकाश डालकर, कड़ाई से पूछा:
“इस गली में रहते हो?”
 “नहीं.”
 “यहाँ का रास्ता बंद है.”
सम्गीन ने नहीं पूछा कि किसलिए. गली के भीतर, भुनभुनाते हुए, धीमी आवाज़ में बातें करते हुए, लोग जा रहे थे, किसी भारी चीज़ को ज़मीन पर घसीट रहे थे.          
 ‘बेशक, स्टूडेंट्स हैं. छोकरे हैं’, मुश्किल से मुस्कुराते हुए और जल्दी से उस लम्बे ओवर कोट और साइबेरियन टोपी वाले आदमी से दूर होते हुए उसने सोचा. ठण्ड़ा अंधेरा, शरीर को दबोच रहा था और अलसाहट, उनींदापन पैदा कर रहा था. छोटे-छोटे ख़याल दिमाग़ को घेरे हुए थे, - दिमाग़ जैसे उनसे फ़टा जा रहा था. सम्गीन ने अनचाहे ही सोचा, कि अक्सर हमेशा बड़ी घटनाओं वाले दिनों में वह इन छोटे-छोटे विचारों के आधीन हो जाता है, विवरणों के आधीन हो जाता है, वे प्रमुख प्रभावों के ऊपर चक्कर लगाते रहते हैं, जैसे अलाव की राख के ऊपर चिंगारियाँ.                     
ये – एक कलाकार का गुण है,’ कोट की कॉलर ऊपर उठाते हुए उसने सोचा, जेबों में ख़ूब गहरे हाथ डाल लिए और ख़ामोशी से चलने लगा. कलाकार, शायद, अपने आविष्कारों में प्रमुख समस्या की सबसे बड़ी विशेषता के बारे में इसी तरह सोचते हैं. और हो सकता है, कि ये – बेवकूफ़ी के विनाशकारी प्रभाव से स्वयँ को बचाने की भावना का अपनी तरह का तरीका हो.
कोने पर पहुँचकर वह अपने रास्ते पर मुड़ गया, लोगों के एक छोटे से समूह से टकराते-टकराते बचा. वे दो छोटे-छोटे बगीचों के बीच में ठुँसे हुए थे, और उनमें से एक ने धीमी आवाज़ में, जल्दी से कहा:
“धर्म को- त्सार को - मातृभूमि को...”
ये तीन शब्द उसने इस तरह कहे, जैसे एक ही शब्द कह रहा हो. सम्गीन लोगों के सिर्फ सिर और पीठ ही देख रहा था, जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वह उनसे आगे निकल गया, मगर फ़िर भी बर्फीले सन्नाटे में जल्दी-जल्दी और स्पष्टतापूर्वक कहे गए शब्द उस तक पहुँच ही गए:
“हड़तालियों को यहूदियों ने ख़रीद लिया है, ये बात – साफ़ है, और देखिए दफ़नाया उन्होंने – किसको? हाँ – कैसे दफ़नाया? इस तरह से तो पिछले साल जनरल केलेर को भी नहीं दफ़नाया था, जबकि- वह हीरोथा!”            
 ये भी एक समझाने वाले महाशय हैं’, इधर उधर देखते हुए फ़ौरन अपने घर की ओर आते हुए क्लीम ने सोचा. जब डाइनिंग रूम में मोमबत्ती जलाई, तो पत्नी पर नज़र पड़ी : वह कपड़े पहने हुए ही ड्राइंग रूम में सोफ़े पर सो गई थी - दांत निकाले, एक हाथ सीने पे और दूसरा सिर के नीचे रखे.
 “ल्यूतोव आया था,” जागकर, माथे पर बल डालते हुए उसने कहा. “तुम्हें हॉस्पिटल में आने को कह गया है. वहाँ अलीना पागल हुई जा रही है. माय गॉड – दर्द के मारे मेरा सिर कैसे फ़टा जा रहा है! और ये सब क्या है...बकवास!” अचानक वह पैर पटकते हुए चीख़ी. “और ऊपर से – तुम! रात को घूमते हो...ख़ुदा ही जानता है कि कहाँ, कब ये...अब तुम स्टूडेंट तो नहीं हो...”
घबराहट से अपना ब्लाऊज़ निकालते हुए वह मोमबत्ती लेकर चली गई.
 “तुम भूल गईं कि तुम्हारी मर्ज़ी से ही गया था,” उसने पीछे से कहा और सोचा: ऐसी अस्त-व्यस्त हो रही है, जैसे ...

किसी औरत के लिए शर्मनाक शब्द को वह गटक गया और, अंधेरे में, गरम दीवान पर बैठ गया, सिगरेट पीने लगा, अंधेरे को सुनने लगा. फ़िर से और एक दर्दनाक चुभन से उसने ख़ुद को ठगा हुआ, अकेला, हर बात के बारे में सोचने की सज़ा पाए कैदी की भाँति महसूस किया.