शुक्रवार, 26 मई 2023

Klim Samgin - 3.1

 

क्लीम सम्गीन का जीवन

भाग – 3

 A,M.GorkyA. b  Translated :  A. Charumati Ramdas 

घर में अन्फ़ीमेव्ना अपने थके हारे जिस्म को एक कमरे से दूसरे कमरे में घसीट रही थी.

 “दफ़ना दिया? चलो,” शयन कक्ष में ग़ायब होते हुए वह कुछ अस्पष्ट सा बुदबुदाई, और वहाँ से सम्गीन  ने बुढ़िया की बदरंग आवाज़ सुनी: “समझ में नहीं आता कि इस ईगोर का क्या करूँ: पीता रहता है, पीता रहता है. अपने शाही कुलनाम की भी शरम नहीं है, मैंने तो हार मान ली.”

सम्गीन  ने चाय लाने को कहा और अपने अध्ययनकक्ष का दरवाज़ा बंद करके ध्यान से सुनने लगा, - खिड़की के बाहर लोगों के भारी-भारी कदम घिसटते जा रहे थे. ये निरंतर शोर किसी मशीन के काम करने का एहसास दे रहा था, जो मानो सड़क को चौड़ा करते हुए घर की दीवारों पर खटखट कर रही हो, फुटपाथ को समतल बना रही हो. घर के सामने वाला स्ट्रीट-लैम्प टूट गया था, जल नहीं रहा था – ऐसा लग रहा था कि घर अपनी पहले वाली जगह से सरक गया है.

 “ख़तम हो गया,” आँख़ें बंद करके सम्गीन  ने सोचा, और इस शब्द को अपने भावी लेख के शीर्षक के रूप में लिखा हुआ देखा; वो विस्मयवाचक चिह्न से समाप्त हो रहा था, मगर टेढ़ा खड़ा था और प्रश्नवाचक चिह्न की तरह प्रतीत हो रहा था. “इस मामले में दफ़न विधी से तात्पर्य है – पुनर्जीवन”.       

सब कुछ अलसाया हुआ और निराशाजनक प्रतीत हो रहा था; मित्रोफ़ानोव, ल्यूतोव परेशान कर रहे थे; निकोनोवा की याद परेशान कर रही थी. “कहीं उसीने तो मित्रोफ़ानोव की शिकायत नहीं कर दी?”

इसके बाद उसे याद आया कि पलंग पर उसकी बगल में सोना कितना असुविधाजनक था – वह काफ़ी जगह घेर लेती थी, और पलंग संकरा था. फिर सावधानी से चोली पहनने की उसकी आदत...

रास्तों पर कुछ घण्टे चलने का असर हो रहा था – जब अन्फ़ीमेव्ना चाय का प्याला लाई तो सम्गीन  सो चुका था. उसे वारवरा ने जगाया, वह उसका हाथ पकड़ कर इतनी ज़ोर से खींच रही थी, जैसे फ़र्श पर गिराना चाहती हो.

“उठो भी! तुम सुन रहे हो? युनिवर्सिटी के पास फ़ायरिंग हुई है...”

   उसने फ़र का कोट पहना था, उससे ठण्ड और पर्फ़्यूम की गंध आ रही थी, पिघली हुई बर्फ़ की बूंदें फ़र-कोट पर चमक रही थीं; गले पर हाथ रखते हुए वह चिल्लाई:

 “भयानक! काफ़ी तादाद में लोग मारे गए! बच्चे को...”

 “बच्चे को?” सम्गीन  ने दुहराया. “हो सकता है...”

“क्या – हो सकता है? आह, शैतान!”

आख़िरकार उसने कोई हुक खोल ही लिया, और, ठण्डा कोट सम्गीन  के घुटनों पर फेंककर, सिर से हैट खींचकर, वो पागल की तरह चीख़ती हुई कमरे में भागने लगी:

 “असल में – पहले ही गोलियाँ चलाने का फ़ैसला कर लिया गया था. ओह, ये जनाज़े! वैसे भी – तुम ख़ुद ही सोचो – आख़िर हम फ्रांस में तो नहीं रहते! क्या ऐसे जुलूस निकालना संभव है!”

डाइनिंग रूम से कूमोव की आवाज़ आई:

“कैसा...पागलपन!”

 “किसने गोली चलाई?” सम्गीन  ने अविश्वास से पूछा.

“मैदान से. फ़ौजें. स्त्रतोनोव – सही है: इन जनाज़ों के लिए यहूदियों को महँगी कीमत चुकानी पड़ेगी! मगर – मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है!” उसने हैट हिलाते हुए कहा: “पहले तो इजाज़त दे दी, फिर – गोलियाँ चलाते हैं! इसका क्या मतलब है? तुम चुप क्यों हो?”

और क्लीम को बोलने के लिए मजबूर न करते हुए वह भाग गई.

 “शायद बढ़ा-चढ़ाकर कह रही है”, बैठे-बैठे पत्नी की रुक-रुक कर आती चीख़ों को सुनते हुए उसने कल्पना की.

“हाँ-हाँ...भयानक!”

रास्ते पर लोगों के कदम जैसे तेज़ हो गए. उदासी से सम्गीन  बाहर डाइनिंग रूम में आया – और इसी पल से उसकी ज़िंदगी लम्बे समय के लिए एक दुःस्वप्न में बदल गई. वह कूमिन से टकराया, जो पलकें झपकाते हुए लाल-लाल हथेलियों से अपने बाल ठीक कर रहा था, उसने सिर को झटका दिया, और बाल फिर से बिखर कर उसके गालों आ गए.

“पा-गलपन,” उसने दाँतों को भींचते हुए कहा, टेलिफ़ोन की तरफ़ जाकर रिसीवर उठाया और उसे गाल पे रखा, कान के नीचे.

 “टेलिफ़ोन तो काम नहीं कर रहा है!” वारवरा चीख़ी.

 मुझे यकीन नहीं होता, बिल्कुल यकीन नहीं होता, कि पीटरबुर्ग पर फ़िर से जर्मनी राज कर रहा है, जैसा कि अलेक्सान्द्र तृतीय के ज़माने में पहली मार्च के बाद हुआ था,” रिसीवर की ओर देखते हुए कूमोव बुदबुदाया.

 “मैं आपको कहीं भी जाने नहीं दूँगी, कूमोव! आप ऐसा क्यों सोच रहे हैं कि वो भी निकीत्स्काया पे गया है? और, जो भी निकीत्सकाया पे जा रहे थे उन सभी को तो नहीं...”

किसी पंछी की तरह, जैसे उड़ते हुए ल्युबाशा सोमोवा डाइनिंग रूम में घुसी; उसके पीछे-पीछे एक कम्बल भी घिसटता हुआ कमरे में आया; अंधे की तरह गिरते-पड़ते, वह मेज़ से टकराई और, गहरी साँस लेकर, मेज़ पर मुट्ठी मारते हुए, अविश्वसनीय तेज़ी से बोलने लगी:

 “तुरोबोएव मारा गया...ज़ख़्मी, अस्पताल में, स्त्रास्त्नी रोड पर. अपनी सुरक्षा करना बेहद ज़रूरी है – वर्ना कैसे? मेडिकल पोस्ट बनानी होंगी! काफ़ी सारे ज़ख़्मी हैं, मारे गए हैं. सुनिए – आपको भी मेडिकल पोस्ट बनानी होगी! बेशक, विद्रोह होगा...यहूदी प्रोखोरोव फ़ैक्टरी में...”  

वारवरा ने रुखाई से और कुछ कड़वाहट से सवाल पूछते हुए उसकी बात काटी.

अन्फ़ीमेव्ना भीतर आई और चुपचाप ल्युबाशा का कोट उतारने लगी, मगर वो उसके हाथों से चिल्लाते हुए छिटक गई:

 “छोड़ो! मैं अभी चली जाऊँगी...ओह, माय गॉड, छोड़ो भी...”

“कोई पोस्ट-वोस्ट नहीं!” वारवरा ने तैश से पति के कानों में फ़ुसफ़ुसाकर कहा. “किसी हालत में नहीं! मैं – नहीं कर सकती, करने भी नहीं दूँगी...”

उछलते हुए, जैसे मेज़ पर चढ़ जाना चाहती हो, ल्युबाशा जल्दी से चिल्लाई:

“गोगिन लोग तो मेडिकल पोस्ट बनाने में जुट गए हैं, और ल्यूतोव से भी कहना होगा, क्लीम! उसका घर ख़ाली है. और वहाँ एक प्लॉट भी है, वहाँ – ज़रूरी है. उसके पास जाओ, क्लीम. फ़ौरन जाओ...”

 “हाँ, हाँ, जाओ, क्लीम,” वारवरा ने ज़ोर देकर दुहराया, सोमोवा ग़ुस्से से चीख़ रही थी:

 “मुझे जैकेट और कंबल दे दो!”

  “अरे – कहाँ चली, कहाँ जा रही है, तू?” न जाने क्यों अन्फ़ीमेव्ना ने नीची आवाज़ में कहा, मगर ल्युबाशा मेज़ पर रोज़ाब्रेड जैसा मुक्का मारते हुए, उस पर चिल्लाई:

 “आप कुछ नहीं समझतीं! आप ...मछली हैं! अलेक्सेइ गोगिन के पीछे कुछ लोग भागे...गोलियाँ चलाईं...”

अन्फ़ीमेव्ना ल्युबाशा को ले गई, वारवरा ने फ़ुसफ़ुसाकर पति से कहा:

 “तुम जाओ, ल्यूतोव को मनाओ, वो इज़्ज़तदार आदमी है, मगर हमारे यहाँ – नहीं, थैंक्यू!”

सम्गीन कपड़े पहनने चला गया, इसलिए नहीं, कि उसे मेडिकल पोस्ट्स ज़रूरी प्रतीत हो रहे थे, बल्कि इसलिए कि घर से बाहर निकल जाए, विचारों को व्यवस्थित कर ले. वह हक्का-बक्का रह गया था, अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहा था और सुनी हुई बात पर यकीन नहीं करना चाहता था. मगर, ज़ाहिर था, कि कोई फ़ूहड़ बात हुई तो है, और व्यक्तिगत रूप से उसके ख़िलाफ़ हुई है.

 अपने आपको बचाना ज़रूरी है. विद्रोह होगा,’ रास्ते पर निकलते हुए ख़यालों में वह ल्युबाशा की चीखें दुहरा रहा था. ईडियट.

मगर सोमोवा को गाली देने के बाद उसने सोचा कि ये संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी गलियाँ बैरिकेड्स बनाने के लिए सही रहेंगी. और इसके बाद बड़ी अप्रियता से याद आया कि कैसे 8 अक्टूबर को मज़दूरों ने अजनबी लोगों की नज़रों से शहर का निरीक्षण किया था, और इसके बाद अचानक उसे महसूस हुआ कि ये बड़ा-भारी, अस्तव्यस्त शहर – जो उसके लिए पराया है – वो मॉस्को नहीं है, जैसा कि वह अब से कुछ घण्टे  पहले हुआ करता था. उस पर ठण्डा अंधेरा गिर पड़ा है, और उसने लोगों को छोटे घरों में, बिल्डिंगों में ठेलकर रास्तों की, खिड़कियों की सारी बत्तियाँ बुझा दी हैं. सिर्फ कभी-कभार, खिड़की के शीशों पर जमी हुई मुलायम बर्फ़ के उस पार पीले धब्बे भिखारियों जैसी दयनीयता से टिमटिमा रहे थे. अंधेरे में नुकीले, चुभते हुए धूल के कण चमक रहे थे, खेल रहे थे. शहर अवास्तविक हो गया था, जैसी कि अंधेरे में हर चीज़ हो जाती है, सिवाय अंधेरे के.

और, जैसा कि अंधेरे में हर आदमी करता है, सम्गीन ने अप्रियता से अपनी वास्तविकता को महसूस किया. लोग बेहद जल्दी चल रहे थे, छोटे-छोटे समूहों में, और, हो सकता है कि उनमें से कुछ जानते थे कि कहाँ जा रहे हैं, बाकी के बस यूँ ही चल रहे थे, जैसे भटक गए हों – दो बार सम्गीन ने ग़ौर किया कि नुक्कड़ पे मुड़ने के बाद वे फ़ौरन पीछे लौट गए. उसने भी अनिच्छा से उन्हीं जैसा किया. करीब पाँच आदमियों का एक छोटा सा समूह उसके आगे निकल गया; उनमें से एक सिगरेट पी रहा था, कदमों के साथ जैसे ताल देते हुए सिगरेट बार-बार चमक उठती थी; किसी महिला की आवाज़ ने शिकायत के सुर में पूछा:

 “साथियों, - क्या ये गंभीर बात है?” और चीख़ी: “फेंकों अपनी सिगरेट!”                              

  सम्गीन काँप गया, उसने सोचा कि इस रात मॉस्को 10 जनवरी की रात वाले पीटरबुर्ग से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो गया है. वह तनाव से सुनने लगा, इस आशंका से कि राईफ़ल-शॉट्स की क्लिकसुनाई देगी. मगर कानों ने किसी और ही खट्खट् की आवाज़ पकड़ी, जैसे गेट्स या दरवाज़े धड़ाम्-धड़ाम् कर रहे हों, दूर से कोई समझ में न आने वाली चरमराहट सुनाई दी – जैसे बर्फ़ के कारण टूट रहा पेड़ चरमराता है. कभी ऐसा लगता कि कोई लोहे की छत पर चल रहा हो, कभी कुछ चरमराता और गिर जाता, जैसे अचानक कोई बागड़ गिर पड़ी हो. रास्तों और गलियों के चक्करों में भटकता; अंधेरे में, जो निरंतर गहराता जा रहा था, सम्गीन सोचने लगा, कि ल्यूतोव से मिलना बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा, और आख़िर में उसने निश्चय कर लिया: मेडिकल पॉइंट्स – बचकानी कल्पना है.

असल में मैं बिना सोचे-समझे घर से निकल पड़ा,’ कदम धीमे करके उसने सोचा, ‘ये फ़ायरिंग, शायद – ग़लतफ़हमी का नतीजा है’.

मगर, ये याद करके, कि 9 जनवरी के अपराध को भी वह ग़लतफ़हमी समझना चाह रहा था, उसने आज की घटनाओं के बारे में मन में उठ रही कल्पनाओं को दूर धकेला और घर वापस जाने का फ़ैसला कर लिया. 

अलीना को, बेशक, मालूम है, उसके पास जाने में कोई तुक नहीं है, तुरोबोएव का अंत ऐसे ही होना था. असल में, वह बहुत साहसी था. ऐसे लोग या तो ख़ुदकुशी कर लेते हैं, या चोरी के अपराध में जेल भेज दिए जाते हैं. नष्ट हो चुके वर्ग का एक छोटा सा अंश. हो सकता है, कि अलीना अब तक उससे प्यार करती हो. किसी ने कहा था, कि औरत ज़िंदगी भर पहले मर्द से प्यार करती है, मगर – यादों में, न कि जिस्मानी तौर पर. गली वाले कोने पर वह मुड़ गया; कुछ कदम चलने के बाद किसी ने उसे आवाज़ दी:

 “कौन है?”

उसके सामने एक ऊँचा आदमी खड़ा था, उसने माचिस की तीली जलाई और, उसके चेहरे पर प्रकाश डालकर, कड़ाई से पूछा:

“इस गली में रहते हो?”

 “नहीं.”

 “यहाँ का रास्ता बंद है.”

सम्गीन ने नहीं पूछा कि किसलिए. गली के भीतर, भुनभुनाते हुए, धीमी आवाज़ में बातें करते हुए, लोग जा रहे थे, किसी भारी चीज़ को ज़मीन पर घसीट रहे थे.          

 बेशक, स्टूडेंट्स हैं. छोकरे हैं’, मुश्किल से मुस्कुराते हुए और जल्दी से उस लम्बे ओवर कोट और साइबेरियन टोपी वाले आदमी से दूर होते हुए उसने सोचा. ठण्ड़ा अंधेरा, शरीर को दबोच रहा था और अलसाहट, उनींदापन पैदा कर रहा था. छोटे-छोटे ख़याल दिमाग़ को घेरे हुए थे, - दिमाग़ जैसे उनसे फ़टा जा रहा था. सम्गीन ने अनचाहे ही सोचा, कि अक्सर हमेशा बड़ी घटनाओं वाले दिनों में वह इन छोटे-छोटे विचारों के आधीन हो जाता है, विवरणों के आधीन हो जाता है, वे प्रमुख प्रभावों के ऊपर चक्कर लगाते रहते हैं, जैसे अलाव की राख के ऊपर चिंगारियाँ.                     

ये – एक कलाकार का गुण है,’ कोट की कॉलर ऊपर उठाते हुए उसने सोचा, जेबों में ख़ूब गहरे हाथ डाल लिए और ख़ामोशी से चलने लगा. कलाकार, शायद, अपने आविष्कारों में प्रमुख समस्या की सबसे बड़ी विशेषता के बारे में इसी तरह सोचते हैं. और हो सकता है, कि ये – बेवकूफ़ी के विनाशकारी प्रभाव से स्वयँ को बचाने की भावना का अपनी तरह का तरीका हो.

कोने पर पहुँचकर वह अपने रास्ते पर मुड़ गया, लोगों के एक छोटे से समूह से टकराते-टकराते बचा. वे दो छोटे-छोटे बगीचों के बीच में ठुँसे हुए थे, और उनमें से एक ने धीमी आवाज़ में, जल्दी से कहा:

“धर्म को - त्सार को - मातृभूमि को...”

ये तीन शब्द उसने इस तरह कहे, जैसे एक ही शब्द कह रहा हो. सम्गीन लोगों के सिर्फ सिर और पीठ ही देख रहा था, जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वह उनसे आगे निकल गया, मगर फ़िर भी बर्फीले सन्नाटे में जल्दी-जल्दी और स्पष्टतापूर्वक कहे गए शब्द उस तक पहुँच ही गए:

“हड़तालियों को यहूदियों ने ख़रीद लिया है, ये बात – साफ़ है, और देखिए दफ़नाया उन्होंने – किसको? हाँ – कैसे दफ़नाया? इस तरह से तो पिछले साल जनरल केलेर को भी नहीं दफ़नाया था, जबकि - वह हीरोथा!”            

 ये भी एक समझाने वाले महाशय हैं’, इधर उधर देखते हुए फ़ौरन अपने घर की ओर आते हुए क्लीम ने सोचा. जब डाइनिंग रूम में मोमबत्ती जलाई, तो पत्नी पर नज़र पड़ी : वह कपड़े पहने हुए ही ड्राइंग रूम में सोफ़े पर सो गई थी - दांत निकाले, एक हाथ सीने पे और दूसरा सिर के नीचे रखे.

 “ल्यूतोव आया था,” जागकर, माथे पर बल डालते हुए उसने कहा. “तुम्हें हॉस्पिटल में आने को कह गया है. वहाँ अलीना पागल हुई जा रही है. माय गॉड – दर्द के मारे मेरा सिर कैसे फ़टा जा रहा है! और ये सब क्या है...बकवास!” अचानक वह पैर पटकते हुए चीख़ी. “और ऊपर से – तुम! रात को घूमते हो...ख़ुदा ही जानता है कि कहाँ, कब ये...अब तुम स्टूडेण्ट तो नहीं हो...”

घबराहट से अपना ब्लाऊज़ उतारते हुए वह मोमबत्ती लेकर चली गई.

 “तुम भूल गईं कि तुम्हारी मर्ज़ी से ही गया था,” उसने पीछे से कहा और सोचा: ऐसी अस्त-व्यस्त हो रही है, जैसे ...

किसी औरत के लिए शर्मनाक शब्द को वह गटक गया और, अंधेरे में, गरम सोफ़े पर बैठ गया, सिगरेट पीने लगा, अंधेरे को सुनने लगा. फ़िर से और एक दर्दनाक चुभन से उसने ख़ुद को ठगा हुआ, अकेला, हर बात के बारे में सोचने की सज़ा पाए कैदी की भाँति महसूस किया.

क्या यही है – मेरा कार्य?’ उसने अपने आप से पूछा. लामार्क के मुताबिक – कार्य अवयव का निर्माण करता है. मनुष्य किस कार्य का अवयव है, अगर उससे लैंगिक प्रवृत्ति को निकाल दिया जाए तो? यदि टॉल्स्टॉय तर्क से घृणा करता है, तो वह सही है’.

सिगरेट बुझ गई. तीलियाँ न जाने कहाँ गिर गईं थीं. वह सुस्ती से उन्हें ढूँढ़ने लगा, मगर जब वे नहीं मिलीं तो जूते उतारने लगा, ये फ़ैसला करके कि बेडरूम में नहीं जाएगा: वारवरा शायद अभी तक सोई नहीं है, और उसकी बकवास सुनने से उसे नफ़रत होती थी. हाथ में जूते पकड़े-पकड़े उसे ख़याल आया कि यहीं इसी जगह, इसी तरह यहाँ कुतूज़ोव बैठा था.

बेशक, इस समय वह कहीं और जुनून भड़का रहा होगा...तभी सम्गीन को फ़ौरन महसूस हुआ कि उसके भीतर कोई नासूर फ़ूट गया है और पूरे शरीर में कड़वाहट की ठण्डी धाराएँ बह निकली हैं. और सही है!ख़यालों में वह चीख़ा. भड़कने दो जुनून को, नरक में जाने दो हर चीज़ को, इन तमाम घरों को, छोटे-छोटे क्वार्टर्स को, जो जनता की भलाई की चिंता करने वालों से, आलोचकों से, विश्लेषकों से, खूब पढ़े हुए लोगों से भरे हुए हैं...

 “तुम सोते क्यों नहीं हो?” हाथ में मोमबती लिए और हथेली के नीचे से उसकी ओर देखते हुए कड़े स्वर में वारवरा ने पूछा, जो दरवाज़े में आकर खड़ी हो गई थी. “आओ, प्लीज़! स्वीकार करने में शर्म आ रही है, मगर मुझे डर लग रहा है! ये लड़का...किसी डॉक्टर का बेटा...कैसे कराह रहा था...”

रात वाली लम्बी कमीज़ में, सिर पर टोपी और जूतियों में, वह बूशा के कार्टून जैसी लग रही थी.

“तुम भी ना, अजीब तरह से बर्ताव करते हो,” पलंग के पास आते हुए उसने कहा, “मुझे मालूम है – ये सब तुम्हें अच्छा नहीं लगता, मगर तुम...”

 “ख़ामोश!” दबी ज़ुबान से वह चिल्लाया, मगर ऐसे कि वह लड़खड़ा गई. “कहने की हिम्मत न करना – जानता हूँ!” कोट उतार कर फ़ेंकते हुए वह कहता रहा. वह बीबी पर पहली बार चिल्लाया था, मगर ये विद्रोह उसे अच्छा लगा था.

 “तुम पागल हो गए हो,” वारवरा बुदबुदाई, और उसने देखा कि उसके हाथों में मोमबत्ती का स्टैण्ड थरथरा रहा है और वह जूतियाँ घिसटती हुई, उससे दूर हट रही है.

“तुम क्या जानते हो? हो सकता है कि कल कत्लेआम, लूटपाट शुरू हो जाए...”

वारवरा गंभीरता से, कुछ असहजता से, उसके पास पीठ करके लेट गई; उसने मोमबत्ती बुझा दी और लेट गया, इस इंतज़ार में कि वह कुछ और भी कहेगी, और मन ही मन उससे बहुत सारा अपमानजनक सच कहने की तैयारी करने लगा. अंधेरे में छत के नीचे कई सारे धुएँ के धब्बे, गोले घूम रहे थे. काफ़ी इंतज़ार के बाद ख़ामोशी में धीमे शब्द सुनाई दिए:

“समझ में नहीं आता कि मुझ पर ग़ुस्सा करने की क्या ज़रूरत है? मैं तो क्रांति नहीं कर रही हूँ, ना...” 

उसे किन्हीं और शब्दों की उम्मीद थी. ये तो बिल्कुल बेवकूफ़ी से भरे शब्द थे, जिनका जवाब देने का कोई मतलब नहीं था, और कंबल के भीतर सिर छुपा कर उसने भी बीबी की तरफ़ पीठ कर ली.

 उस पर खीझ उतारने से कोई फ़ायदा नहीं है. बेवकूफ़ी है. चिल्लाना तो किसी और पे चाहिए. हो सकता है, अपने आप पर ही’.

मगर – अपने आप पर दया आ रही थी, और ख़याल अटपटे होते जा रहे थे. वारवरा, शायद, रो रही थी, लगातार नाक सुड़क रही थी, नींद में बाधा डाल रही थी.

शायद, मुझसे नफ़रत करती है. मगर, लगता है, कि मैं ख़ुद भी जल्दी ही अपने आप से नफ़रत करने लगूँगा.’. और इस विचार से अपने आप के प्रति दया की भावना और बढ़ गई.

आँख सुबह ही लग पाई, और जब उठा तो पत्नी के साथ हुए ड्रामे को याद करके जल्दी से ख़ुद को ठीक-ठाक कर लिया और, चाय पीकर, अवश्यंभावी सफ़ाई से बचने के लिए बाहर चला गया.

मॉस्को ने हथियार डाल दिए हैं’, अजीब तरह से शांत हो गए शहर के मुख्य मार्ग पर चलते हुए उसने सोचा.

दोपहर हो गई है, मगर रास्तों पर ज़्यादा लोग नहीं हैं और जो हैं, वे भी छोटे-मोटे निवासी हैं; चिंतित, उदास, छोटे छोटे झुण्ड बनाए गेट्स के पास खड़े थे. दो-दो, तीन-तीन या पाँच से ज़्यादा के झुण्ड में कहीं जा रहे थे. स्टूडेण्ट्स नज़र नहीं आ रहे थे, अकेले चलने वाले – बिरले ही थे, न गाड़ीवान नज़र आ रहे थे, न ही पुलिस के सिपाही, मगर बच्चे ज़रूर हर जगह से झाँक रहे थे, शायद उन्हें किसी चीज़ का इंतज़ार था.

उस गली में जाने का रास्ता, जिसमें कल सम्गीन को जाने नहीं दिया गया था, बिना पहियों की गाड़ी से, मेज़ों की दराज़ों से, बिस्तर से, अख़बार के किओस्क से और गेट के आधे दरवाज़े से बंद कर दिया गया था. इस सारे माल-असबाब के सामने सिमेंट की ख़ाली बोरी पर दाँतों में सिगरेट दबाए, लाल दाढ़ी वाला एक आदमी बैठा था; उसके घुटनों के बीच से बंदूक झाँक रही थी, और उसने इस तरह के कपड़े पहने थे जैसे शिकार पे निकला हो. बैरीकेड के पीछे तीन आदमी दौड़-धूप कर रहे थे: उनमें से एक तार की सहायता से गाड़ी से लकड़ी का मोटा फ़ट्टा बांध रहा था, दूसरे दो कम्पाऊण्ड से ईंटें उठा-उठाकर ला रहे थे. सम्गीन को ये सब वहाँ रहने वालों की शरारत जैसा दिलचस्प लग रहा था.

पेत्रोव्स्काया अस्पताल के वेटिंग रूम में अस्त-व्यस्त, मैला कुचैला, सूजी हुई आँखें, झुँझलाहट भरे चेहरे पर लाल धब्बे लिए ल्यूतोव क्लिम से बेतहाशा लिपट गया.

 “ओह, कित्ता इंतज़ार किया तेरा!” सम्गीन को पकड़ कर उसने सिसकारते हुए कहा और उसे कॉरीडोर में ले गया, खिड़की की सिल पर बिठा दिया.  “तो, वो - मर गया, ग्यारह बजकर सैंतीस मिनट पे. दो गोलियाँ, दोनों – पेट में. तड़प रहा था. ये बात है, भाई,” सम्गीन पर चढ़ते हुए, सीधे उसके चेहरे के सामने भर्राई आवाज़ में वह कह रहा था: “यहाँ – अलीना चिंघाड़े जा रही थी, चाहे कुछ भी हो जाए, वह उसे व्वेदेन्स्की कब्रिस्तान में दफ़नाना चाहती है बेवकूफ़ी है! आख़िर, पता भी नहीं – कि वो कहाँ है, ये व्वेदेन्स्की! और, वैसे भी वहाँ दफ़नाएँ भी कैसे? पादरी ने साथ आने से इनकार कर दिया. ईडियट. बोला, ‘ये, मर्डर है, क्रिमिनल केस है’ “मैंने पूछा, ‘कहाँ का क्रिमिनल केस? सैनिकों ने अपनी मर्ज़ी से थोड़े गोलियाँ चलाईं, बल्कि, ज़ाहिर है, अपने अधिकारी के आदेश पर ही चलाईं, मतलब, ये बेकाबू हुए स्टूडेण्ट्स से स्वयम् को बचाने के लिए की गई हत्या है!बोलते-बोलते ल्यूतोव का दम घुट रहा था, वह खाँसा और फ़िर, सम्गीन के कंधे का सहारा लेकर कहता रहा:

“तू, भाई, कोशिश कर, उसे इस आयोजन से रोक ले, - हाँ?”

उसकी टाँगें थरथरा रही थीं, झूलते हुए वह बैठ गया. सम्गीन ख़ामोशी से उसकी बात सुन रहा था, इस बात का अंदाज़ लगाते हुए कि इस आदमी को कैसी चोट लगी है? क्लिम को कंधे से दूर सरका कर, ल्यूतोव उसकी जगह पर दीवार से टिक गया, हाथ फ़ैला दिए:

“ये क्या शुरू हो गया है, हाँ? वो, बस ही-ही कर रहे थे! मैं उसके साथ ही जा रहा था, मुझे दोल्गोरूकोव स्ट्रीट पर एक यहूदी ने रोका, और अचानक – त्राख़!त्राख़! सुअर के पिल्ले! ये देखने के लिए भी करीब नहीं आए कि किसे मार डाला है, क्या ज़्यादा लोग मरे हैं? गोलियाँ चलाईं और गली में छुप गए. तो, तू, सम्गीन, उसे मना ले! मैं नहीं कर सकता! भाई, ये मेरे लिए – अचानक...समझ में न आने वाला था! मैं सोचता था, कि उसका दिल बहलाने के लिए – मकारोव है... आ रही है!” वह फ़ुसफ़ुसाया और कोने में सरक गया.

कॉरीडोर में दूर से धीरे धीरे चलती हुई अलीना दिखाई दे रही थी. कोट के बटन खुले हुए, कंधों पर शॉल, बिखरे बाल, वह अस्वाभाविक रूप से काफ़ी बड़ी लग रही थी. जब वह पास आई, तो सम्गीन को महसूस हुआ कि उसे मनाना फ़िज़ूल है: उसका चेहरा कड़ा था, आँखें काले गढ़ों में धँस गई थीं, और पुतलियाँ मानो उबल रही थीं, तैश से चमक रही थीं.

 “तो, कम से कम एक तो अकलमंद आदमी मिला,” दांतों को दबाए नीची आवाज़ में उसने कहा. “तुम, क्लीम, मुझे कब्रिस्तान ले चलोगे. और तुम, ल्यूतोव, मत आना! क्लीम और मकारोव जाएँगे. – सुन रहे हो?”

ल्यूतोव ने अपनी दाढ़ी नोंची, और उसका सिर नम्रता से झुक गया.

“मैंने कोई छह लोगों को किराए पर लिया है, वो ही ताबूत ले जाएँगे,” वह कहती रही और अचानक, पैर पटक कर, मोटी आवाज़ में बोली: “कहीं एक भी फूल नहीं है, कमीने!...”

वह आगे चली गई, और ल्यूतोव, तिरस्कार से अपना सिर हिलाते हुए बुदबुदाया:

 “तू क्या कर रहा है, सम्गीन? ऐह, भाई...क्या उसे छोड़ा जा सकता है...ऐह!”

और पंजों के बल वह अलीना के पीछे भागा.

कैसे बेहूदा हालात में फँस जाता हूँ’, इधर उधर देखते हुए सम्गीन ने सोचा. दरवाज़े बिना आवाज़ किए खुल रहे थे, नर्सें जल्दी-जल्दी भाग रही थीं, दीवार से दवाइयों की गंध आ रही थी, खिड़कियों के शीशों से हवा टकरा रही थी. मकारोव वार्ड से निकल कर कॉरीडोर में आया, वह चलते चलते एप्रन के बंध खोल रहा था, क्लीम की तरफ़ देखा, सोचते हुए पूछा:

 “तू?”

और उसका हाथ पकड़कर अंधेरे कमरे में ले गया, जिसमें एक खिड़की थी, शेल्फ़ों पर और अलमारियों में ख़ूब सारे काँच के बर्तन रखे थे. 

 सिगरेट पी ले, यहाँ पी सकते हैं,” उसने एप्रन उतारते हुए कहा. “बहादुरी से मरा, बिना किसी शिकायत के, हालाँकि पेट की ज़ख़म – बडी तकलीफ़देह होती है.”

मेज़ के कोने पे बैठकर वह मुस्कुराया:

“मुझसे बोला: अगर मुझे मालूम होता कि मैं ईमानदारी से मर रहा हूँ, तो मैं ख़ुश होता’. ये किसी अंग्रेज़ी के उपन्यास की तरह है. ईमानदारी से मरना – इसका मतलब क्या होता है? सभी मरते हैं – ईमानदारी से, मगर जीते हैं...”

सम्गीन सिगरेट पी रहा था, उसकी बात सुन रहा था और सोच रहा था: समय से पहले बूढ़ा हो चुका ये आदमी उसे इतना अप्रिय क्यों लगता है?

 “तो, सम्गीन, क्या हमारे यहाँ क्रांति हो रही है?” मकारोव ने भौंहे ऊपर करके, अपनी सिगरेट के धुँआ छोडते सिरे की ओर देखते हुए पूछा.

 “ज़ाहिर है.”        

 “तुम ख़ुश हो?”

“क्रांति – ट्रेजेडी है,” क्लीम ने फ़ौरन जवाब नहीं दिया.

 “तुमने जवाब नहीं दिया.”

 “ट्रेजेडी ख़ुशी नहीं देती.”

 “तू – बोल्शेविक है?”

 “बेशक – नहीं,” क्लीम ने जवाब दिया और फ़ौरन सोचा कि उसने जवाब देने में काफ़ी जल्दी कर दी.

 “मतलब – क्रांतिकारी नहीं है,” मकारोव ने हौले से कहा, मगर बिल्कुल सीधी सादे ढंग से और यकीन के साथ कहा. वह एक नए ही अंदाज़ में बात कर रहा था, उसका रवैया भी कुछ नया सा लग रहा था, जो सम्गीन के लिए अपरिचित था और किसी ख़तरे की सूचना दे रहा था, सतर्क रहने का इशारा कर रहा था.

“क्रांतिकारी – बोल्शेविक हैं,” मकारोव ने वैसी ही सादगी से कहा. “वे सीधे मार करते हैं: सिर को दीवार पर दे मारते हैं. हो सकता है, कि ऐसा ही होना चाहिए, मगर मैं, शायद उन्हें पसंद नहीं करता. मैं उनकी मदद करता रहा, पैसे से और वैसे भी...कभी किसी इन्सान को, तो कभी किसी चीज़ को छुपाया. क्या तूने मदद की?”

 “हुआ है ऐसा,” क्लीम ने सावधानी से जवाब दिया.

 “क्यों? किसलिए?”

ये महसूस करके कि मकारोव के सवाल अधिकाधिक अप्रिय होते जा रहे हैं, सम्गिन ने ख़ामोशी से कंधे उचका दिए. मगर वो कहता रहा:

“क्योंकि – अग्रिम दस्ता कभी नहीं जीतता, बल्कि ख़त्म हो जाता है, जैसा कि ल्यूतोव ने कहा था? दुश्मन की फ़ौजों पर पहला वार करता है और – ख़त्म हो जाता है? ये – ग़लत है. पहली बात – हमेशा नहीं ख़त्म होता, बल्कि सिर्फ अपर्याप्त तैयारी से किए गए हमले में ही ऐसा होता है, और दूसरी बात – नुक्सान तो वह पहुँचाता ही है!

“तो, सम्गीन, मेरा सवाल है : मैं गृह युद्ध नहीं चाहता, मगर मैं मदद करता रहा और, लगता है, कि उन लोगों की मदद करता भी रहूँगा, जो उसे शुरू करेंगे. यहाँ मुझे कुछ उलझन होती है. मैं उनसे सहमत नहीं हूँ, उन्हें पसंद नहीं करता हूँ, मगर, सोचो – जैसे मैं उनकी इज़्ज़त करता हूँ, और ...” वह हँस पड़ा, उँगलियाँ चटख़ाईं और कहता रहा:

 “तुझे – राजनीति के बारे में जानकारी है, बता तो...”

दरवाज़ा धड़ाम् से खुल गया, अलीना भीतर आई. सम्गीन ने सिगरेट का टुकड़ा फ़र्श पर फेंक दिया और राहत की साँस ली, और मकारोव ने कहा: “हम इस बारे में फ़िर बात करेंगे...”

मुश्किल है.क्लीम कहना चाहता था, मगर इसके बदले उसने हामी भरते हुए सिर हिला दिया.               किस बारे में?” चेहरे पर आईं पसीने की मोटी-मोटी बूंदें रूमाल से पोंछते हुए अलीना ने पूछा.

 “राजनीति के बारे में,” मकारोव ने कहा. “आप ओवर कोट तो उतार देतीं, ज़ुकाम हो जाएगा!”

दरवाज़े के पास पड़ी कुर्सी पे रखी किताबें फ़ेंककर अलीना उस पर बैठ गई.

“क्या मैं आप लोगों को डिस्टर्ब कर रही हूँ?” मर्दों की ओर देखकर उसने पूछा. “मैं राजनीति समझने लगी हूँ, मेरा भी दिल चाहता है कि किसी को मार डालूँ...किसी मिनिस्टर को ही सही.”

 “तुम्हें अपनी नींद पूरी करनी चाहिए,” उसकी ओर देखे बग़ैर मकारोव बुदबुदाया, मगर वह इत्मीनान से दबी ज़ुबान में कहती रही:

 “तो – मुझे भेज दे क्लीम! मैं - ख़ूबसूरत हूँ, ख़ूबसूरत लड़की को मिनिस्टर के पास जाने देंगे, और मैं उसे...”

हाथ लम्बा करके उसने चुटकी बजाई, - उसका चेहरा पहले जैसा ही कठोर बना रहा. मकारोव, झुककर, फ़िर से सिगरेट पीने लगा, और सम्गीन ने हँसते हुए पूछा;

 “क्या तू ऐसा सोचती है, कि किसी को मारने के लिए लोगों को मैं भेजता हूँ?”

 “कोई तो भेजता है,” ज़ोर से साँस लेकर उसने जवाब दिया. “शायद – निष्टुर लोग; और तू – निष्ठुर है. रात में,” उसने कहीं ऊपर की ओर इशारा करते हुए हाथ हिलाया, “मुझे याद आया, कि तुमने कैसे ईगोर के बारे में बताया था, कैसे फ़ौजी उसे काट देना चाहता था...तुमने – सब कुछ अच्छी तरह से देखा, मतलब – तुम निष्ठुर हो!”  

कुछ देर चुप रहने और सिर पर स्कार्फ़ लपेटने के बाद उसने हौले से आगे कहा, शायद अपने आप से:

 “वैसे, हो सकता है, ये इसलिए हो कि भय की आँख़ें बड़ी-बड़ी होती हैं’ – वे अच्छी तरह देखती हैं. आह, मैं आप सबको कितना...” मकारोव की ओर नज़र डालकर वह ख़ामोश हो गई, और फिर दबी ज़ुबान में बताने लगी:

“याल्टा में, एक शाम नशे में धुत् होने के बाद, मैं रोने लगी, शिकायत करने लगी: ऐ ख़ुदा तूने मुझे क्यों ख़ूबसूरती दी, और फ़िर कीचड़ में फ़ेंक दिया!इस तरह का कुछ चिल्ला रही थी मैं. तब ईगोर ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और ...बड़े प्यार से कहने लगा;

ये इन्सान का वास्तविक विलाप है!कभी कभी वो ऐसी बातें किया करता था, जैसे उसके भीतर कोई शैतान छुपा बैठा हो...”

इस आख़री शब्द को ल्यूतोव ने दरवाज़ा खोलकर डुबो दिया.

 “सब तैयार है,” उसने बेहद मरियल आवाज़ में कहा. “चलिए.”

एक घण्टे बाद सम्गीन उसकी बगल में फ़ुटपाथ पर चल रहा था, और रास्ते के बीच में, ताबूत के पीछे-पीछे मकारोव का हाथ पकड़ कर अलीना चल रही थी; उनके पीछे था – एक मुच्छड़, रिटायर्ड फ़ौजी जैसा; उसने हजामत नहीं की थी इसलिए ऐसा लग रहा था जैसे नीले-भूरे गालों पर नरम-मुलायम मास्क पहना हो; हाथ में मोटी छड़ी, बेहद फ़टीचर. उसकी बगल में चल रहा था एक हट्टा कट्टा नौजवान, फ़टे कोट की जेबों में हाथ डाले, बिना टोपी का सिर झुकाए; उसके बाल घुँघराले थे और वह पूरा थियेटर के किन्हीं घुंघराले चीथड़ों में था; वो दाँतों के बीच से अपने पैरों के नीचे लगातार थूकता जा रहा था. आधे कोट पहने दो मर्द ताबूत को जल्दी-जल्दी ले जा रहे थे, दोनों ही शायद अभी-अभी गाँव से आए थे: एक – भूरे मुड़े-तुड़े जूते पहने, पीठ पर थैला लटकाए था, दूसरे ने सैण्डल्स और मोटे कपड़े की पतलून पहनी थी, दाएँ कंधे पर काला पैबंद लगा था. ताबूत के सिरे पे – एक मोटा गंजा आदमी था, जिसने दो कोट पहने थे, एक – गर्मियों वाला, लम्बा, और उसके ऊपर – छोटा, घुटनों तक आता हुआ; उसके दूसरी ओर था –मॉस्को का ख़ास छोटा-मोटा व्यापारी, लम्बी ड्रेस में, दाढ़ी बिखरी हुई, सिर अण्डे जैसा था. वे तेज़ी से चल रहे थे और चारों ऐसे फ़ूहड़पन से आगे की ओर झुक रहे थे, जैसा कोई गाड़ी खींच रहे हों; मुच्छड़ भर्राई हुई आवाज़ में उन पर चिल्लाता:

 “ऐ, तुम – कदम मिलाओ!...”

अस्पताल वाले ताबूत के पीले ढक्कन पे ताड़ के पेड़ के दो पत्ते और घर में उगने वाले फूलों की टहनियाँ रखी थीं; अलीना – किसी स्मारक जैसी, फ़र का कोट पहने, कंधों पर भारी शॉल डाले – चल रही थी, ठोढ़ी को सीने से लगाए; हवा उसके लाल भूरे बालों को बिखेर रही थी; वह अक्सर तेज़ी से हाथ उठाकर ताबूत को छू लेती, जैसे उसे आगे धकेल रही हो, और पुल के पत्थरों की ठोकर से लड़खड़ा कर मकारोव को धक्का देती; वह ऊपर की ओर और कहीं दूर नज़र गड़ाए चल रहा था, पत्थरों पर उसके जूतों की स्पष्ट टक् टक् सुनाई पड़ रही थी.

 “नहीं पहुँच पाएगी, बेशक,” अलीना की ओर नज़र डालते हुए ल्यूतोव बुदबुदाया.

सम्गीन ये सोचने पर तुला था कि निर्धनता का ये सारा दिखावा ल्यूतोव द्वारा जानबूझकर किया गया है, - अक्टूबर का उदास दिन, ठण्डी हवा, सीसे जैसा आसमान, छह निर्धन आदमी, दयनीय ताबूत.

कुछ ही मिनट बाद वह यंत्रवत् सोच रहा था: भूतपूर्व इन्सान’, लोकप्रिय लेखक और लोकप्रिय थियेटर द्वारा प्रशंसित, प्राचीन कुलीन परिवार के वंशज का मृत शरीर कब्रिस्तान ले जा रहे हैं, जिसे निर्बल, अयोग्य त्सार के सैनिकों ने मार डाला था.इसमें कोई कटुतापूर्ण और परेशान करने वाली बात थी.

मगर इसमें – दिमाग़ वाली बात क्या है?’ क्लीम ने अपने आप से पूछा. कटुता या परेशानी?’

ल्यूतोव उसे तंग कर रहा था. वह एक जैसा नहीं चल रहा था, जैसे नशे में धुत् हो, - कभी सम्गीन से आगे भागता, कभी पीछे रह जाता, मगर अलीना से आगे निकलने की सोच भी नहीं रहा था, ज़ाहिर है, उसकी नज़रों में पड़ने से डर रहा था. चलते चलते दयनीयता से पुटपुटा रहा था:

“ सभी वर्गों के सहयोग से दफ़ना रहे हैं. गाड़ीवान को मनाया – ले चल! तुम, अपने मुर्दों समेत ख़ुदा के पास जाओ!और, पादरी भी – फ़ौजदारी का मामला है, हाँ? जानवर. हुँ, एक अजीब सा ड्रामा हो रहा है...बेहद पेचीदा! अलीना, बेशक, नहीं पहुँच पाएगी...कैसा दिल है, सम्गीन? ग़ज़ब का निर्मम, ईमानदार दिल है उसका. तू, सूखा-सट्, घमण्डी, बुद्धिजीवी, कदर नहीं कर सकता. नहीं समझेगा. बुद्धिजीवी, - ये शब्द भी नहीं समझेगा! ऐह, तुम लोग...त्यू...”

“बस करो,” सम्गीन ने ये सोचते हुए कहा, कि इन उनींदी, निर्जन गलियों में आगे जाने से कैसे इनकार किया जाए.

“ब्र्यूसोव, वालेरी, कविता लिखता है:

‘…तुमसे, जो मुझे ख़त्म करने वाला है,

मिलूँगा स्वागत-गीत के साथ.

झूठ बोलता है! भावी जंगलियों से डरता है और उनसे नफ़रत करता है! और – स्तुति गीत नहीं, बल्कि – मातमी गीत लिखा है. सही है ना?”

 “नहीं,” सम्गीन ने गुस्से से कहा. “और वैसे भी, तू...” वह ल्यूतोव से कोई अपमानजनक बात कहना चाहता था, मगर बड़बड़ाया: “मुझे, शायद, ज़ुकाम हो गया है, तबियत बहुत ख़राब हो रही है. प्लीज़, मुझे ...”

गली से शोर मचाते हुए, करीब बीस आदमी बाहर लपके. ये काफ़ी उत्तेजित और नशे में धुत थे.

सबसे आगे वाले, तंदुरुस्त, लाल मुँह वाले नौजवान ने, जिसने कानों को ढाँकती हुई टोपी और बिना बेल्ट वाली कमीज़ पे लोमड़ी की खाल का खुला कोट पहना था, ताबूत के सामने खड़े होकर, घुटनों के ऊपर पहुँचते हुए जूतों वाले पैर चौड़े फ़ैला लिए और इतने तैश से हाथ हिलाए कि उसका फ़ूला हुआ, तेल जैसा चिकना पेट दिखाते हुए कमीज़ ऊपर उठ गई, और कर्कश, जनानी आवाज़ में चिल्लाकर पूछा:

“ठहरो! किसे दफ़ना रहे हो? किस अपराधी को?”

“लो, देखो!” ल्यूतोव दुख से चीख़ा. एक ही जगह पर पैर पटकते हुए, वह, जैसे उछलने को तैयार था, और साथ ही हाथ मलते हुए बड़बड़ाया: “ओय, उसने रिवॉल्वर निकाल किया, आह! समझ रहा है?” सम्गीन को धकेलते हुए वह फ़ुसफ़ुसाया: “इस लड़की के पास – रिवॉल्वर है!”

सम्गीन समझ रहा था कि अब कोई बेहूदा बात होने वाली है, मगर फ़िर भी ल्यूतोव को डर के मारे काँपते हुए देखना अच्छा लग रहा था, और ल्यूतोव इतना डर गया था, कि उसकी तिरछी, परेशान आँखें बाहर निकली पड़ रही थीं, भँवें कृत्रिम तरीके से कनपटियों तक फ़ैल गईं. वह उन लोगों से कुछ कहना चाह रहा था, जिन्होंने ताबूत को घेर लिया था, मगर सिर्फ उनकी ओर देखते हुए हाथ हिला रहा था. ल्यूतोव का निरीक्षण करने के लिए समय नहीं था – ताबूत के चारों ओर कोई भयानक बात शुरू हो गई थी, जिससे सम्गीन की रीढ़ की हड्डी में ठण्ड़ी लहर दौड़ गई.

कुलियों ने ताबूत को पुल पे रख दिया और भीड़ के साथ मिल गए, मुच्छड़ आदमी दौड़कर फ़ुटपाथ पर पहुँच गया और छड़ी को पेट से चिपकाए हुए, फ़ौरन दूर हट गया; अलीना के सामने घुँघराले बालों वाला छोकरा खड़ा था, वह उसे धक्का दे रहा था, और अलीना उसके हाथों पर मुक्के मार रही थी; मकारोव उसके हाथ पकड़ते हुए चिल्लाया:

 “दूर हटो! तुम्हें क्या चाहिए?”

अलीना भी कुछ चिल्लाई, मगर उसकी आवाज़ लोमड़ी की खाल के ओवरकोट वाले नौजवान और उसके साथियों की चीख़ों में दब गई. ओवर कोट वाला नौजवान, सिर हिलाते हुए, टोपी के लम्बे-लम्बे कान झटकते हुए चिंघाड़ा:

“पादरी के बगैर क्यों? यहूदी को दफ़ना रहे हो, हाँ? फिर यहूदी को? ख़ुदा की बेइज़्ज़ती कर रहे हो? नहीं, रुक जाओ! वास्या – क्या किया जाए?”

उसके बाएँ हाथ के नीचे से रूई की जनाना जैकेट पहने, नंगे पैरों पर वाकर लगाए एक दुबला-पतला आदमी प्रकट हुआ, और उछलते हुए, भर्राई आवाज़ में दहाड़ा:

 “यहूदी चाहे – जीना, और हम – मारना! ऐह, इग्नाशा! लड़कों – साथ दो! हमारे हीरे हो तुम, इग्नात पेत्रोव. हमारी ढाल!”

पाँच और आदमी अलग अलग सुर में और बदहवासी से गरजे:

“हुक्म कर, इग्नात! साथ देंगे! ऐ-ऐह...”

ल्यूतोव भीड़ में टोपी उतारे, उसे हिलाते हुए गोल-गोल घूम रहा था, वह भी कुछ चिल्ला रहा था, मगर फ़र के ओवरकोट वाले ने नशे से थरथराते हाथ से उसे पकड़ने की कोशिश करते हुए अपनी उन्मादयुक्त चीख़ों से सारी आवाज़ों को डुबो दिया.

 “कुलीन घराने से है? राजकुमार है? नहीं जाने दूँगा – झूठ बोल रहे हो! पोप कहाँ है? पादरी, हाँ? राजकुमारों को दफ़नाते हैं गाजे-बाजे के साथ, हरामी! मार डाला? भाईयों – सुना? मार किसे डालते हैं?”

 “यहूदियों को, हड़तालियों को!” उसे जवाब दिया गया. घुँघराले बालों वाला नौजवान और मकारोव अलीना को फ़ुटपाथ पर धकेल रहे थे, - वो उनके हाथों में छटपटा रही थी, और सम्गीन ने उसकी घुटी-घुटी आवाज़ सुनी:

 “छोड़ो! मैं उसे मारूँगी...लहुलुहान कर दूँगी...”

अचानक ख़ामोशी छा गई भीड़ के पास काले-भूरे आधे कोट में एक बड़ा, मोटा आदमी आया, और लगभग सभी लोग उसकी ओर मुड़ गए.

 “क्या गुंडागर्दी मचा रखी है? उसने कहा. “बेकार में! देख रहे हो, लाल रिबन्स नहीं हैं, मतलब, हड़ताली नहीं है, तो? और साथ में महिला है...अच्छी-भली, शायद व्यापारियों के वर्ग से है, साफ़ ज़ाहिर है. ये महाशय भी – व्यापारी है, मैं इसे जानता हूँ, चाइना-टाऊन में कलम बेचता है, कुलनाम भूल गया. तो? ज़ाहिर है, किसी कर्मचारी को दफ़ना रहे हैं...”

“झूठ बोल रहा है!” नौजवान चिल्लाया, वाकर वाले आदमी ने उसका समर्थन किया:

“झूठ बोलता है, मोटा थोबड़ा! इग्नाशा, हमारी ढाल, - यकीन न करना. ये सब के सब – मोटे हैं, लुटेरे हैं, माँ...”

 “छोड़ना मत, इग्नात!” भीड़ में से लोग चिल्लाए.

  “ढक्कन उठाओ! जिन पर कल गोली चलाई थी, उनमें से एक यहूदी के बच्चे को दफ़ना रहे हैं...”

आधे कोट वाले आदमी ने इग्नात के कंधे पर हथेली रखते हुए कहा:

 “तू- कौन है? गुण्डा है क्या? हड़ताली?” उसने उलाहना देते हुए ज़ोर से पूछा.

 “भाईयों, - मैं कौन हूँ” इग्नात उसकी गर्दन से लिपटकर चिंघाड़ा. “जल्दी से बता दो, वर्ना – मैं अपने आपको ख़त्म कर दूँगा! यहीं ख़त्म कर दूँगा! भाईयों, ऐह...”

हाथ हिलाते हुए उसने अपना ओवरकोट उतार फेंका और अपने सिर पर मुक्के बरसाने लगा; सम्गीन ने देखा कि नौजवान के चेहरे पर आँसुओं की धार बह रही है, देखा कि भीड़ के ज़्यादातर लोग नौजवान को पसंद कर रहे हैं, जैसे वह कोई जादूगर हो, और वाकर वाले आदमी की कर्ण कटु चीख़ें सुनीं:

“इग्नाशा! पोर्ट-आर्थर न छोड़ना, शैतान के माथे पे मार! ढाल! मेरे ही-रे, तू!”

करीब पाँच आदमी ल्यूतोव को घेर कर उसकी बात सुन रहे थे, देख रहे थे कि वह महँगी टोपी को कैसे हिला रहा है, और उनमें से एक ने कहा:

मॉस्को पगला गया है, एकदम पगला गया है!”

 लो, हो गई छुट्टी’, सम्गीन ने सोचा. उसने चश्मा उतार कर जेब में रखा और सड़क की दूसरी ओर गया, जहाँ घुँघराले बालों वाला नौजवान और मकारोव अलीना को दीवार से सटा कर रोक रहे थे, मगर वह उन्हें धकेले जा रही थी. इसी समय इग्नात ने झुककर ताबूत को किनारे से पकड़ लिया, हौले से उसे उठाया और, सीधा खड़ा करके चिंघाड़ा:

 “ख़ुद ले जाऊँगा! मॉस्को नदी में!”

ल्यूतोव ने देखा कि दो और आदमी ताबूत को इग्नात के कंधे पर रखने लगे, मगर आधे कोट वाले आदमी ने उन्हें धक्का दिया, और इग्नात के सामने अलीना आ गई, दोनों हाथों की मुट्ठियाँ भींचकर, उसने इग्नात के मुँह पर मुक्का जड़ दिया, उसने सिर हिलाया, वह लड़खड़ाया और उसने धीरे से ताबूत को ज़मीन पे रख दिया. पल भर के लिए लोग ख़ामोश हो गए. दाएँ हाथ की ऊँगलियों पर पीतल की अँगूठियाँ चढ़ाते चढ़ाते मकारोव सम्गीन के सामने से भागा.

 “उसे ले जा... तू क्या, समझता नहीं है!” वह चिल्लाया. इग्नात के सामने घुँघराले बालों वाला नौजवान खड़ा हो गया और उससे पूछने लगा:

“शुरू करना है क्या?”

 “मारो उसे, लड़कों!” काले आधे कोट वाला आदमी लोगों को घुँघराले बालों वाले के ऊपर धकेलते हुए भौंका– “मारो! ये – साश्का सुदाकोव है, चोर!” सम्गीन ने देखा कि कैसे साश्का ने इग्नात को गिरा दिया, उसने सुना कि कैसे वह व्यंग्य से चिल्लाया:

 “ तो-ओ, बदमाश! शाबाश, चल!”

वाकर वाला आदमी गोल-गोल घूम रहा था, बदहवासी से चिल्ला रहा था:

 इग्नाशा, मेरे हीरो! क्या हार मान लेगा, ऐह!” और मकारोव के पास भाग कर उसकी बगल में सिर से वार किया, कॉलर पकड़ ली, मगर डॉक्टर ने उसे अपने से दूर हटा दिया और एक लात मारी. वह चिल्लाने लगा:

 “सबको नहीं मार सकोगे, सुअ-र! गोलियाँ चलाने वालों!” मकारोव ने अलीना को सम्गीन के पास ये कहते हुए धकेल दिया:

 “दूसरी गली, दाईं ओर वाली, बिल्डिंग नं. 9, ज़ोसिमोव का क्वार्टर – फ़ौरन! मैं वोलोद्का को छुड़ाऊँगा...”  

सम्गीन, औरत का हाथ पकड़कर तेज़ी से उसे ले चला; वह नम्रता से, चुपचाप चल रही थी, इधर उधर देखे बगैर, सिर पर शॉल लपेटे, अपने पैरों की ओर देखे जा रही थी, मगर भारीपन से कदम बढ़ा रही थी, जूतों के तलवे घिसट रही थी, लड़खड़ा रही थी, और सम्गीन उसे लगभग खींचता हुआ ले जा रहा था.

उस घृणित दृश्य से क्लीम के मन में जो डर पैदा हो गया था, वह अलीना के प्रति कड़वाहट में बदल गया था, - इसी के कारण तो इतने भयानक पल बिताने पड़े थे. पहली बार उसने इतनी तीखी कड़वाहट का अनुभव किया था, - उसका जी चाहा कि इस औरत को धक्का दे दे, उसे बागड़ों पर, घरों की दीवारों पर धकेल दे, साँझ के झुटपुटे में संकरी, निर्मनुष्य गली में छोड़कर चला जाए. वह बड़ी मुश्किल से इस इच्छा को रोक रहा था और ख़ामोश था, नाक सुड़कते हुए, ये महसूस करते हुए कि अगर कुछ कहेगा, तो उससे बड़े कठोर, अपमानजनक शब्द ही कहेगा, और इसी बात से डर भी रहा था.              

 “कैसे....बहादुर,” ज़ोर से साँस लेकर अलीना बुदबुदाई और उसने पूछा: “वोलोद्का को ख़ूब मारेंगे?”

सम्गीन ने जवाब नहीं दिया. उसे इस बात से आश्चर्य नहीं हुआ कि मकारोव द्वारा बताए गए क्वार्टर का दरवाज़ा दुन्याशा ने खोला.

 “ओ, माइ गॉड! कैसे मेहमान!” वह ख़ुशी से चिल्लाई. “और मैंने समोवार उबाल दिया है,” नौकरानी हड़ताल पे है! क्या...तुझे क्या हो रहा है, बहना?”

उसके मुँह से ये विस्मयजनक चीत्कार इसलिए निकला था, क्योंकि अलीना ने अपना ओवरकोट फ़र्श पर फेंक दिया था, और दीवार से टिककर चेहरा हाथों से ढाँक लिया था; उसकी ऊँगलियों के बीच से भर्राई, मगर साफ़-साफ़ सड़क छाप गालियाँ सुनाई दे रही थीं. सम्गीन हँस पड़ा, – उसे ये अच्छा लगा, इस बात ने औरत को उसकी नज़रों में और नीचे गिरा दिया था.

 “मुझे यहाँ से ले चलो...कहीं भी,” अलीना ने विनती की. क्लीम ने गरम कपड़े उतार दिए, वह उस अस्तव्यस्त कमरे में फ़ायरप्लेस की ओर गया, वहाँ मेज़ पर दो मोमबत्तियाँ जल रही थीं, समोवार बेतहाशा उबल रहा था, ढक्कन के नीचे से पानी उछल रहा था और उसे सराबोर कर रहा था, गंदे बर्तन पड़े थे, प्लेटों में अधखाई चीज़ें पड़ी थीं, बोतलें, एक खुली किताब भी पड़ी थी. उसने समोवार की टोंटी को चिमटे से ढाँक दिया और, अपने प्याले में चाय डालते हुए महसूस किया कि उसके हाथ थरथरा रहे हैं. प्याले पे हाथों को गरमाते हुए, वह कमरे में घूम रहा था, चारों ओर नज़र दौड़ा रहा था. छोटे से पियानो पर – बिखरे हुए नोट्स थे, दुन्याशा की हैट पड़ी थी, स्टियरिक एसिड से बनी मोमबत्तियाँ बिखरी हुई थीं; सोफ़े पर - मुड़ा तुड़ा कंबल, संतरे के छिलके; सारा फ़र्नीचर अपनी जगह से हटाया गया था, और कमरा होटल के किसी कैबिन जैसा प्रतीत हो रहा था,  जिसमें दो लोगों ने मद्यपान किया हो. सम्गीन ने अप्रसन्नता से मुँह बनाया और याद करने लगा:

अस्पताल में मकारोव क्या कहना चाह रहा था?’ दुन्याशा आई, और हालाँकि उसकी आँखें रोई हुई लग रही थीं, उसने शुरूआत इस तरह से की कि सम्गीन के गले में हाथ डालकर उसके होठों को चूमा, और फ़ुसफ़ुसाकर बोली: “ओय, मुझे ख़ुशी है कि तुम आए!”

मगर फ़ौरन मेज़ के पास लपकी और प्याले में चाय डालते हुए जल्दी-जल्दी, दबी ज़ुबान में पूछने लगी कि हुआ क्या था.

 वो – जैसे पत्थर बन गई है, पड़ी है, ख़ामोश है – भयानक!”

 सूखेपन से उसे बताते हुए सम्गीन ने देखा, कि इस समय, जब उसके बदन पे सादी काली ड्रेस है, और झाँइयों से ढँके उसके चेहरे पर कोई मेकअप नहीं है और लाल बाल चोटी में गुँथे हैं, - वह ज़्यादा प्यारी और ज़्यादा जवान लग रही है, हालाँकि नौकरानी की याद दिला रही है. उसकी बात पूरी सुने बिना चाय का प्याला और वाइन की बोतल लेकर वह भाग गई. सम्गीन खिड़की के पास गया; अभी ये देखना संभव था, कि आसमान में नीले बादलों के झुण्ड जमा हो रहे हैं, मगर सड़क पर अँधेरा हो चुका था.

यहाँ रात बिताना अच्छा होता...

दरवाज़े पर ज़ोर से खटखटाहट हुई; उसने इंतज़ार किया कि शायद दुन्याशा भागकर आएगी, मगर, जब दुबारा खटखटाहट हुई, तो उसने ख़ुद ही दरवाज़ा खोल दिया. पहले भीतर घुसा ल्यूतोव, उसके पीछे मकारोव और कोई तीसरा भी. ल्यूतोव ने फ़ौरन पूछा:

 “कैसी है वो? रो रही है? या – क्या?” मकारोव ने उसे दूर धकेला और कमरे में आया, और उसके पीछे पीछे सरका घुँघराले बालों वाला नौजवान और पूछने लगा:

 “वाश-रूम कहाँ है?”

 “चल,” उसके कंधे को थपथपाते हुए ल्यूतोव ने कहा, और सम्गीन से मुख़ातिब हुआ: “अगर ये न होता – तो वे मुझे मार डालते. चल, भाई! तौलिया? अभी लाया, रुक...”

वह ग़ायब हो गया. नौजवान मेज़ के पास आया, एक बोतल उठाई, दूसरी उठाई, गिलास में वाइन डाली, पी गया, ज़ोर से गुरगुराया और देखने लगा कि कहाँ थूके. उसका चेहरा सूज गया था, बाईं आँख करीब-करीब धँस गई थी, ठोढ़ी और गर्दन खून से सन गए थे. वो और भी घुँघराला हो गया था, - उसके बिखरे हुए बाल सीधे खड़े थे, और वह और भी फ़टेहाल हो गया था, - कमीज़ समेत कोट बगल से लेकर नीचे पल्लों तक उधड़ गए थे, और, जब नौजवान वाइन पी रहा था तो उसका पूरा पार्श्व नंगा हो गया.                                    

आपको बहुत ज़ोर से मारा?” सम्गीन ने उससे दूर कोने में हटते हुए हौले से पूछा, - नौजवान ने अपने लिए गिलास में और वाइन डालते हुए भर्राते हुए शांति से जवाब दिया: 

“अगर ज़ोर से मारा होता, तो मैं अपने पैरों पे खड़ा न होता”.

दुन्याशा और ल्यूतोव एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए आए, - मेहमान की हालत देखकर दुन्याशा लड़खड़ा गई, मगर उसने एक हाथ की उँगलियों से बगल वाले छेद को खींचते हुए और दूसरे हाथ से फ़टे हुए कॉलर को संभालते हुए शालीनता से झुककर उसका अभिवादन किया.               

 माफ़ कीजिए...”

“मैं अभी आपके लिए कपड़े लाती हूँ, चलिए,” दुन्याशा ने जल्दी से कहा.

“हुश्श!” लड़खड़ाकर और आँखों को कस कर भींचते हुए, मगर साथ ही मेज़ से बोतल उठाते हुए ल्यूतोव ने कहा. “ये भी ....क्या बात थी! शुक्र है ख़ुदा का – सस्ते में छूटे! मेरी कैप खो गई, बेशक, किसी ने चुरा ली! सिर पर धौल भी पड़ा, मगर – ज़ोर का नहीं.”

उसने वाइन पी ली, सोफ़े पर लुढ़क गया और – जल्दी जल्दी, बेतरतीबी से कहता रहा :

 “ताबूत को सराय में रख दिया है...कल उसे जहाँ ले जाना है, वहाँ ले जाएँगे. लोग मिल गए हैं. सौ रूबल्स. हुम्! अलीना, शायद, संभल रही है. वो – कभी कोई तमाशा नहीं करती है! मकारोव...” वह सोफ़े पर उछला, फिर बैठ गया, अचरज से भौंहे उठाईं. “क्या लड़ता है! ग़ज़ब का लड़ता है, शैतान ले जाए! मगर, वो वाला भी... नहीं, इग्नात कौन था, हाँ?” वह मेज़ के पास जाते हुए चिल्लाया, “तूने ग़ौर किया, समझा?”

एक हाथ से चाय डालते हुए, दूसरे से खींचकर टाई की गाँठ खोलते हुए, चेहरे पे चौड़ी मुस्कुराहट बिखेरते हुए, वह कहता रहा:

“सड़क अपना लीडर ख़ुद बना लेती है – बस, यही बात है! सिर चढ़ाती है, चढ़ाती है, समझ रहे हो? और वो, नंगे पैरों वाला, जो चिल्ला रहा था सुरक्षा, ख़ूबसूरतीवो तो मॉस्को-पेजहै! आह, शैतान...ग़ज़ब की चीज़ है, आँ?”

“तू ख़तरनाक ढंग से वर्णन करता है,” सम्गीन ने कहा.

 “और तू – तेरी नज़र कमज़ोर है, चश्मा गड़बड़ करता है! और उस कुत्ते की औलाद को यकीन था कि वो लीडर है! नहीं, ये...ग़ज़ब की बात है! वो हुक्म चला सकता है, किसी को भी मार सकता है, - हाँ?”       

सम्गीन सुनते हुए सोच रहा था:

ये भी वही देखता है, जो मैं देखता हूँ, मगर – दूसरी तरह से. बेशक, वास्तविकता को विकृत ये कर रहा है, न कि मैं. बाज़ारू औरत से प्यार करना – इसकी ख़ासियत है. काल्पनिक प्यार, और इसकी हर बात – काल्पनिक ही है’.

ल्यूतोव कुछ बेतुकी सी ख़ुशी से कह रहा था:

“अभी फ़ैसला नहीं कर पाए हैं, समझ नहीं पा रहे हैं – कि किसे मारना है!”

अलीना और दुन्याशा कमरे में आईं. अलीना का चेहरा वैसा ही कठोर था, बस, वो कुछ और पतला हो गया था; चढ़ी हुई भौंहों के नीचे से आँखें आपराधिक भाव से देख रही थीं. दुन्याशा कुछ पैकेट्स लाई और, उन्हें मेज़ पे रखकर, समोवार के पास बैठ गई. अलीना ल्यूतोव के पास गई और, उसके विरल बालों की ओर देखते हुए उसने हौले से पूछा:

 “तुझे मारा था?”

 “नहीं, क्या कह रही हो! मामूली बात है,” झुक कर उसका हाथ चूमते हुए वह खनखनाती आवाज़ में चीख़ा.                 

   “आह, तू, मेरे बुद्धू,” उसने कहा, गहरी साँस ली और आगे बोली, “होशियार,” और दुन्याशा की बगल में बैठ गई.

ल्यूतोव का पूरा शरीर अप्राकृतिक ढंग से सिहर उठा, जैसे उसके कोट के नीचे, पीठ पर और कंधों पर चूहे दौड़ रहे हों. सम्गीन को ये नज़ारा बड़ा घिनौना लगा, और उसके दिल में फ़िर से, और भी शिद्दत से अलीना के प्रति कड़वाहट भर गई, और ये कड़वाहट दो मोमबत्तियों से आलोकित उस छोटे से, बेतरतीब कमरे में मौजूद सब पर फ़ैल गई.

दुन्याशा भी अप्रिय लग रही थी, वो अपनी लचीली, उपहासभरी आवाज़ में सुना रही थी:

“ मेरा मरद क्रांति की शिकायत करने पीटरबुर्ग गया, मनाने के लिए कि उसे फ़ौरन रोक दिया जाए.”    

सिगरेट जलाते हुए मकारोव प्रकट हुआ, उसके पीछे पीछे घुंघराले बालों वाला नौजवान भी भीतर आकर रुक गया उसकी आँख़ पर बैण्डेज बंधा था; अलीना ने उसकी ओर हाथ बढ़ाकर कहा:

“प्लीज़...”

उससे हाथ मिलाए बिना उसने झुककर अभिवादन किया:

 “अलेक्सान्द्र सुदाकोव...”

“एक टिम्बर मर्चेंट है इस नाम का!” ल्यूतोव न जाने क्यों प्रसन्नता से चिल्लाया.

 “मेरे चाचा हैं,” सुदाकोव ने फ़ौरन जवाब नहीं दिया.

“चा-चा?” ल्यूतोव ने अविश्वास से पूछा.

“सगे चाचा. क्या मैं उनके जैसा नहीं हूँ?”       

सुदाकोव मेज़ पे महिलाओं के सामने बैठ गया, उसकी आँख़ बड़ी, कुछ हरी सी थी, उसमें एक दुष्ट भाव था, पूरे बटन लगे जैकेट की काली कॉलर से ढँकी गर्दन काफ़ी सफ़ेद थी. अलीना द्वारा उसकी ओर बढ़ाए गए चाय के प्याले को उसने बाएँ हाथ से लिया.              

क्या खब्बे हो?” ल्यूतोव ने ग़ौर से उसकी तरफ़ देखते हुए पूछा.

“दाएँ में चोट लगी है...”

सम्गीन सोफ़े के कोने में बैठा हैमके साथ ब्रेड खाते हुए निरीक्षण कर रहा था. उसने देखा कि मकारोव घर के मालिक जैसा बर्ताव कर रहा है, उसने पियानो से मोमबत्ती उठाई, उसे जलाया, दुन्याशा से कागज़ और स्याही मांगी और उसके साथ चला गया. अलीना ने खाँसते हुए गहरी साँस ली, जैसे कोई बोझ उठा रही हो, मगर उठा न पा रही हो. कुहनियों को मेज़ पर टिकाए, गालों को हथेलियों में रखकर, उसने सुदाकोव से पूछा:

 “तुमने इतनी हिम्मत कैसे कर ली?”

सुदाकोव चाय हिलाते हुए प्याले पर झुका, और उसने इस सवाल का जवाब नहीं दिया, मगर उसने ज़िद से दुबारा पूछा:

 “सबके ख़िलाफ़ अकेला?”

“उसमें हिम्मत क्या करनी थी?” सुदाकोव ने संजीदगी से कहा और इस तरह सिर को झटका दिया कि आधे बाल, जो स्कार्फ में नहीं बंधे थे, ऊपर की ओर उछल गए. “ मुझे हमेशा लोगों को मारने की इच्छा होती है.”

 “किसलिए?” ल्यूतोव तैश में आते हुए चीख़ा.

 “बेवकूफ़ी के लिए. कमीनेपन के लिए.”

 फेंक रहा है,’ सम्गीन उसका मूल्यांकन कर रहा था. अपने आप को हीरोसमझ रहा है. बेशक ये – व्यभिचारी है. दलाल, “स्त्री-लम्पटहै, शायद.   

दो घूँट में चाय ख़तम करके, अलीना के सिर के ऊपर देखते हुए और अपना निचला सूजा हुआ होंठ मुश्किल से हिलाते हुए सुदाकोव ने बदतमीज़ी से कहा:

“मारामारी का श्रेय मुझे मत दीजिए, और किसी काम के लायक तो मैं हूँ नहीं...”

“आप – क्या कह रहे हैं?” हँसते हुए ल्यूतोव ने पूछा, “क्या मालिकों के ख़िलाफ़ हैं?”

उसकी ओर देखे बिना सुदाकोव ने कहा:

 “मैं – किसान नहीं हूँ, अगर मालिकोंसे आपका तात्पर्य ज़मींदारों से है, तो मालिकों ने मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ा है. मगर व्यापारी – व्यापारियों को मैं नष्ट कर देता. वो भी – ख़ुशी-ख़ुशी!”

एक मिनट के लिए सब ख़ामोश हो गए, मगर सम्गीन धीरे से हँसा और उसने सुदाकोव को अपनी फूली हुई आँख़ से उसकी तरफ़ देखने पर मजबूर कर दिया.

 “आप कहाँ पढ़े हैं? उसकी तरफ़ ग़ौर से देखते हुए अलीना ने हौले से पूछा.

“कॉमर्स इन्स्टीट्यूट में. पूरा नहीं किया, चाचा ने मुझे लकड़ी के गोदाम में मैनेजर बना लिया. मैं पैसे खा गया, करीब छह सौ रूबल्स. मुक्केबाज़ बन गया. दो बार दंगों के इल्ज़ाम में सज़ा भी पा चुका हूँ.”

सुदाकोव आह्वानात्मक सुर में बोल रहा था और पूरे समय बाएँ हाथ की ऊँगलियों से डबल रोटी की कड़ी पर्त को तोड़े-मरोडे जा रहा था.

“तो, मैं - आपके मुकाबले का नहीं हूँ,” उसने अपनी बात पूरी की और ज़ोर से कुर्सी खिसकाकर उठ गया. “आप, मालिक लोग हैं, मुझे... कुछ रूबल्स दीजिए, मैं जा रहा हूँ...”

ल्यूतोव ने फ़ौरन कमीज़ के नीचे हाथ घुसाया. अलीना ने कहा:

“हमारे साथ कुछ देर बैठिए. आप कितने साल के हैं?”

 “बीस.”                     

ल्यूतोव के पैसे लेकर, उसने उसे धन्यवाद भी नहीं दिया, मगर, जब मकारोव ने आकर उसकी ओर प्रेस्क्रिप्शन बढ़ाया, तो उसने उस कागज़ पर नज़र डालकर कहा:

 “थैंक्यू. इसकी ज़रूरत नहीं है, वैसे ही ठीक हो जाएगा. सम्गीन ने भी बिदा ली और जल्दी से बाहर निकल गया, ये सोचकर, कि इस छोकरे के साथ बगैर किसी ख़तरे के जाया जा सकता है. रास्ते पर अंधेरे में तेज़ हवा चल रही थी, और उसके थपेड़ों से धकेले जा रहे सम्गीन ने जल्दी ही सुदाकोव को पकड़ लिया, - वह बिना जल्दबाज़ी किए चल रहा था, एक हाथ कमीज़ के भीतर छुपाए, और दूसरा पतलून की जेब में डाले, चाल तेज़ ही थी और सीटी बजाने की कोशिश कर रहा था, मगर बुरी तरह बजा रहा था, - शायद ज़ख़्मी होंठ परेशान कर रहा था.          

“क्या आप क्रांतिकारी हैं?” उसने अचानक कर्कश आवाज़ में पूछा, और क्लीम को उस टेढ़ी-मेढ़ी, पतली गली में चारों ओर देखने और कुछ ठहरकर, दबी आवाज़ में, नपे तुले शब्दों में जवाब देने पर मजबूर कर दिया:

“आप किसे क्रांतिकारी समझते हैं? ये – एक ढीली अवधारणा है, ख़ासकर हम रूसियों के लिए.”

“और मैंने सोचा, - जब मैंने व्यापारियों के बारे में कहा था, और आप हँस पड़े थे, - कि ये, शायद क्रांतिकारी है!”

 “ज़ाहिर है, मैं...”

मगर सुदाकोव बिना सुने ही बड़बड़ा रहा था:

“छुपते हो, लानत है तुम पर! बाउमैन के अंतिम संस्कार में जासूस मुझे समझ लिया गया. बेहद सावधान हैं. आजकल कहाँ जासूस होने लगे?”

वह अचानक रुक गया, जैसे किसी चीज़ से टकरा गया हो, और बोला:

“ठीक है, - अलबिदा मीत्यूखा, वर्ना – कान पे झापड़ रसीद करूँगा!...”

बदमाश,” क्लीम ने उत्तेजना से सोचा, जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए वह आहट ले रहा था कि कहीं छोकरा उसके पीछे तो नहीं आ रहा है. पक्का गुण्डा है’.

मगर गली में भयानक ख़ामोशी थी, सिर्फ हवा ज़मीन पर, लोहे की छतों पर घिसट रही थी और ये घिसटने की आवाज़ गली के ख़ालीपन को स्पष्ट कर रही थी, - लोग घरों में दुबक गए थे.

झुक कर, सम्गीन करीब-करीब दौड़ने लगा, और उसे ऐसा लगा कि उसके भीतर की हर चीज़ काँप रही है, ख़याल भी थरथरा रहे हैं.

वह भागकर एक खुले गेट के भीतर दुबक गया, - एक कोने से चार लोग जल्दी जल्दी बाहर निकले, और उनमें से एक बड़बड़ा रहा था:

सभी गिरजाघरों से जुलूस निकालना चाहिए – ये ज़रूरी है.”

छोटे कद का गोल मटोल आदमी सम्गीन के पास से गुज़रते हुए बोला:

“पादरी लोग, बेशक, महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे.”

“इंतज़ार कर रहे हैं, कि किसका पलड़ा ज़्यादा भारी है...”

जब शब्द अस्पष्ट हो गए, तो सम्गीन जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए आगे चल पड़ा, मगर ये कोशिश कर रहा था कि जूतों की टपटप का ज़्यादा शोर न हो. कहीं कहीं लोगों के झुण्ड अपने-अपने गेट के पास खड़े थे, और हवा हर झुण्ड से कुछ उत्तेजित शब्द उड़ाकर ला रही थी.

“निकोल्का बरानोव मज़दूरों को हथियार दे रहा है.”

“कौन सा बरानोव?”

“आसिफ का बेटा.”

“ दूर की छोड़ी!”

 “बस, अगर अखोत्नी गली...”

दूसरे झुण्ड में कोई बड़े विश्वास से कह रहा था:

“आगज़नी शुरू कर देंगे, देखते रहना!”

मगर पेडों वाले गलियारे की बेंच से एक प्रसन्न, सुकून दिलाती आवाज़ आई:

 “अरे, छोड़ो भी! मॉस्को ने कब विद्रोह किया है? उसके ख़िलाफ़ तो विद्रोह हुए हैं, मगर उसने – कभी नहीं!”

 “और- स्टूडेण्ट्स ?”

 “ओह, मिल गए तुझे विद्रोह करने वाले!”

“तुम कहाँ चलीं, औरतों?”

 “पहली बात – लड़कियों!”

आह, माफ़ कीजिए! कहाँ चलीं?”

“ ये देखने के लिए कि बेकरी वाले कैसे बेरिकेड्स बना रहे हैं...”

“अरे, ये – कोई दिलचस्प चीज़ नहीं है!...”

मगर, अंधेरे से आ रही आवाज़ों के बावजूद, ये विशाल शहर ख़ालीपन का, सुन्न हो जाने का एहसास पैदा कर रहा था. खिड़कियाँ जैसे अंधी हो गई हैं, गेट्स बंद हैं, उन पर ताले लग गए हैं, गलियाँ और ज़्यादा पतली और उलझनभरी हो गई हैं. तेज़ कानों ने दूर से आ रही फ़ायरिंग की आवाज़ पकड़ ली, हालाँकि सम्गीन समझ रहा था, कि वो सिर्फ ख़यालों में ही सुनाई दे रही हैं. फ़ाटक की कुंडी बजी. सम्गीन रुक गया. उसके आगे एक जानी पहचानी आवाज़ कह रही थी:

 “पीटर्सबुर्ग वाले कैसा बर्ताव करेंगे...”

फ़ाटक ज़ोर से बजा, आदमी रास्ते के दूसरी ओर चला गया.

पयार्कोव’, अपनी गली में घुसते हुए क्लीम ने पहचान लिया. गली ने काम के कारण हो रहे शोर गुल से उसका स्वागत लिया, वैसे ही शोर से, जैसा उसने कल सुना था. इस गली में रहने वालों के बारे में सोचते हुए सम्गीन चुपचाप चल रहा था, वह कल्पना कर रहा था: उनमें से कौन बेरिकेड बना सकता है? नुक्कड़ के पीछे से एक स्टूडेण्ट निकला, नर्स का भतीजा, जो पहले वारवरा के मकान में रहती थी, और अब – उसकी बगल में.

 “आह, ये आप हैं,” स्टूडेण्ट ने कहा. “रास्ते पर कोई फ़ौजी या पुलिस वाला तो नहीं है?”

आहट लेते हुए सम्गीन ने इनकार में सिर हिला दिया. गली के भीतर कोई हुक्म दे रहा था:

“आड़ा रखो! ठीक से!”

“बेरिकैड?” सम्गीन ने पूछा.

 “दो,” नुक्कड़ के पीछे छुपते हुए स्टूडेण्ट ने कहा. सम्गीन स्ट्रीट-लैम्प के खंभे के पास गया, और उससे टिककर काम देखने लगा. गली में अंधेरा था, और ऐसा लग रहा था कि करीब बीस-तीस लोग अंधेरे में घूम रहे हैं. ज़ोर से चिल्लाते हुए किसी ने फ़ुटपाथ के पत्थर पर लोहे का डंडा पटक दिया, इसी को एक भारी आवाज़ नर्मी से समझा रही थी:

“बस है! काफ़ी है, कॉम्रेड!”

लोगों के काले झुण्ड ने रास्ते को बंद कर रखा था; गली में नुक्कड़ के पीछे भी काम हो रहा था, फ़ुटपाथ पर कोई भारी चीज़ लुढ़काई जा रही थी. सभी घरों की खिड़कियाँ बंद थीं वारवरा के घर की खिड़कियाँ – बंद तो थीं, मगर गेट के दोनों पल्ले पूरे खुले हुए थे. आरी घरघरा रही थी, हल्की छिपटियाँ ज़मीन पर बिखर रही थीं.

लोगों की आवाज़ें खूब ज़ोर से नहीं, बल्कि ख़ुशी से चहक रही थीं, - ये ख़ुशी बेतुकी और झूठी प्रतीत हो रही थी. एक बेचैन और आत्मविश्वास से भरपूर आवाज़ खनखनाई:

“ये क्या कर रहे हो? पानी डाल रहे हो? ऐसा कभी नहीं करना चाहिए. गोली कड़ी बर्फ़ से टकराएगी – और बर्फ से पलटवार करेगी! ये मुझे पता है. जब सेंट निकोलस माउंटेन पर हम शिप्का का बचाव कर रहे थे, तो इस कड़ी बर्फ़ से तुर्कों ने हमें काफ़ी नुक्सान पहुँचाया था. ठहरो! बेकार में ही ड्रम क्यों रख रहे हो? उसमें हर तरह का कबाड़ ठूँसा जाना चाहिए. लाव्रूश्का, भाग के यहाँ आ!”

क्लीम को एहसास हुआ कि ठठेरा आदेश दे रहा है – वह बर्तन, समोवार बनाता था और दो बार अन्फ़ीमेव्ना की शिकायत करने भी आया था, जिसने उसे कम पैसे दिए थे. वह सूखा और दुबला-पतला था, भूरी मूँछों वाले मुँह के नीचे काले दाँतों के टुकड़े थे. बातूनी और बेवकूफ़ था. और लाव्रूश्का – उसका शागिर्द था, जिसे उसने गोद लिया था. वह नर्स का हर काम किया करता था, जो पहले वारवरा के घर में रहती थी. शरारती लड़का. उसे क्यों तू दुखी, है सुझेन गाना अच्छा लगता था, जबकि गाना चाहिए था – सुंझेन, सुंझेन का कज़ाक.

सिगरेट पीने के बाद, छुट-पुट विचारों में खो गए सम्गीन ने सुना:

“क्या गोली चलाओगे, दद्दू?”

 “गोली, और मैं – मुझे कुछ दिखाई ही नहीं देता! मुझे अगर इस ड्रम में घुसा दो तो गोली ड्रम के अंदर नहीं जाएगी.

ठठेरा बूढ़े मिस्त्री की अप्रिय याद दिला रहा था, जो हट्टे कट्टे मीशा या मीत्या को दीवार तोड़ने के लिए उकसा रहा था. सड़क के दूसरी ओर दो लोग जा रहे थे – एक स्टूडेण्ट और दूसरा कोई और; स्टूडेण्ट काफ़ी ज़ोर से बोल रहा था;

 “आप, कॉम्रेड याकोव, बेकार ही अकेले घूमते हैं, बिना किसी सुरक्षा के.”

काम का शोर रुक गया; ज़ाहिर था कि बेरिकैड बनाने वाले सिमट गए थे, और फिर, ख़ामोशी में पयार्कोव की आवाज़ गूंजी:

 “इनमें तो फँस जाओगे. पीछे हटने की सूरत में आँगनों से भागने का रास्ता होना चाहिए. फ़ेंसिंग्स खोलो...”

 “ठीक है,” ठठेरा चिल्लाया.

सम्गीन को महसूस हुआ कि उसके पैर जम रहे हैं और घर जाना चाहिए, मगर ये भी सुनने को जी चाह रहा था कि पयार्कोव और क्या कहता है.

मगर ये जक्खड़ बूढ़े किसलिए यह सब कर रहे हैं? ये भी अपनी तरह के क्रोपोत्किन और टॉल्स्टॉय हैं...

इस समानता ने उसे इतना परेशान कर दिया कि वह ख़ाँसने भी लगा, जैसे मुँह में धूल चली गई हो, मगर फिर उसे एक और बूढ़े की याद आई – इतिहासकार कज़्लोव की. वह समझ रहा था कि क्रांति की धारण उसकी आँखों के सामने मूर्त रूप ले रही है, कि, हो सकता है, कि कल उसके कमरे की खिड़कियों के नीचे लोग एक दूसरे को जान से मारना शुरू कर दें, मगर फ़िर भी वह इस बात में विश्वास नहीं करना चाहता था, इस बात को मान नहीं रहा था. उसका तर्क ज़िद्दीपन से हर उस छोटी-मोटी, मज़ाकिया बात से ही हिलगा हुआ था, जो रात में चल रहे इस अथक काम को नाटक के शौकीन लोगों के शोका स्वरूप प्रदान कर रहा था. ये समानता उसे एकदम सही लगी और इसने उसे कुछ हिम्मत भी दी. उसे मालूम था कि क्रांतियाँ कैसे की जाती हैं, इस बारे में उसने पढ़ा था. मगर जो हो रहा था वह पैरिस में, ड्रेस्डेन में हुई क्रांतियों के वर्णन की याद नहीं दिला रहा था. यहाँ तो लोग खेल-खेल में किसी चीज़ से अपने आप को बचा रहे हैं, जो, शायद होगा ही नहीं. और अगर हुआ भी, तो सैनिक आ जाएँगे, करीब पचासेक सैनिक, और इस बचकानी संरचना को उखाड़ फेंकेंगे. ऐसे कुछ तैश दिलाने वाले, कुछ संदेहास्पद विचारों में घर के निकट आया, उसने आँगन में झाँका – तहख़ाने के ऊपर वाले शेड का दरवाज़ा भी खुला था, उसके सामने हाथों में लालटेन लिए अन्फ़ीमेव्ना बिल्कुल घण्टे जैसी खड़ी थी और कह रही थी:

 “दिवान – ले जाओ, और गद्दा – ले जा सकते हो, मगर टब – नहीं दूँगी! संदूक भी ले सकते हो, उस पर लोहे की पट्टियाँ लगी हैं.”

सम्गीन ने न जाने क्यों टोपी उतारी, हाउस-कीपर के पास गया और पूछने लगा:

 “आप ये क्या कर रही हैं?”

उसने इतनी सख़्ती से नहीं पूछा, जैसे पूछना चाहता था; अन्फ़ीमेवा ने लालटेन ऊपर उठाई और उसका चेहरा देखते हुए कहने लगी:

 “बेकार की चीज़ें हटा रहे हैं, - हमारी बेरिकैड के लिए,” उसने इतनी सहजता से कहा जैसे किसी रोज़मर्रा के काम के बारे में बता रही हो, और, मुड़कर उलाहना देते हुए बोली: - आपको अकेले नहीं घूमना चाहिए, वार्यूशा परेशान हो जाती है...”                 

शेड में घरेलू कबाड़ के बीच गंभीर और ख़ामोश तबियत चौकीदार निकोलाय डोल रहा था, उसके साथ कोई अनजान आदमी भी था.

“सभी दे रहे हैं,” अन्फ़ीमेव्ना ने कहा, और फ़ौरन शेड के भीतर से एक अनजानी आवाज़ ने कहा:

 “नहीं देंगे – तो उठा लेंगे!”

हमारी बेरिकैडकिचन से होकर घर में घुसते हुए सम्गीन ने सोचा. अन्फ़ीमेव्ना – औरों के लिए एक ख़ास किस्म की आदर्श इन्सान, जिसकी वह तारीफ़ करता था –  वह भी बेरिकैड बनाने में सहयोग दे रही है, उन चीज़ों से, जो उसी की तरह, अपनी ज़िंदगी जी चुकी हैं, - इसमें सम्गीन कुछ अत्यंत संवेदनशील, कुछ हास्यास्पद और, जैसे बेरिकैड की आवश्यकता से समझौता करता हुआ सा - महसूस किए बिना नहीं रह सका – समझौता करता हुआ, हो सकता है, सिर्फ इसलिए, कि वो बेहद थक गया था.

मगर कपड़े बदलते हुए उसने सोचा:

फ़िर भी – ये कोई नौटंकी ही है, न कि इतिहास! ज़्लातोव्रात्स्की, अमूलेव्स्की...सुनहरे दिल’. सेन्टिमेंटल बकवास है’.                        

बीबी, माथे पर पट्टी बांधे, अपने कमरे में मेज़ के पास बैठी कुछ लिख रही थी.                 

जिस तरह से उसने मेज़ पर कलम फेंकी, कुर्सी से उठी, वह समझ गया कि अब झगड़ा होने वाला है, और उसने व्यंग्य से पूछा:

 “ये, क्या तुमने अन्फ़ीमेव्ना को हमारी बेरिकैड बनाने की इजाज़त दी है?”              

 “हमारी” – उसने ज़ोर देकर पूछा था. वारवरा, एक हाथ माथे पर रखे और दूसरा नचाते हुए उसके बिल्कुल नज़दीक आ गई और फ़ुफ़कारते हुए कहने लगी:

  “उसका तो बुढ़ापे के कारण दिमाग़ चल गया है, मगर तुम क्या चाहते हो, क्या?”

 साफ़ था कि वह बहुत रोई थी, उसकी पलकें सूज गई थीं, आँखें लाल हो गई थीं, ठोढ़ी थरथरा रही थी, वह एक हाथ से सीने का ब्लाऊज़ खींच रही थी, माथे की पट्टी खींचकर वह उसे नचाने लगी, जैसे सम्गीन के मुँह पे मारना चाहती हो, मगर निर्णय न कर पा रही हो.

 “तुम हैवान हो,” गहरी गहरी साँस लेते हुए वह कहने लगी. “क्या तुम पार्लियामेंट के सदस्य बनना चाहते हो? अपना कैरियर तो तुम बनाओगे नहीं, क्योंकि तुम किसी काबिल नहीं हो और...और...”

वह और ज़्यादा कर्कशता से चीख रही थी. सम्गीन, बिना कुछ कहे, तेज़ी से मुड़ा और अपने पीछे दरवाज़ा बंद करके अध्ययन कक्ष में चला गया. मेज़ पर रखी मोमबत्ती जलाते हुए वह अनुमान लगा रहा था कि वारवरा के तैश भरे हमले ने उसका कितना अपमान किया है. मेज़ के पास बैठकर गालों को ज़ोर से रगड़ते हुए वह सोच रहा था:

“डर से पगला गई है बुर्जुआ’.

वह गंभीरता से और संतोष से सोच रहा था – कब से अनजान हो गई इस औरत को ऐसी दयनीय हालत में देखकर लगभग ख़ुशी ही हो रही थी. उसकी उन्मादपूर्ण चीखें सुनते हुए भी ख़ुशी हो रही थी, - उसने दरवाज़े से झाँककर देखा. वारवरा से संबंध तोड़ने के बारे में उसने कभी गंभीरता से सोचा नहीं था; अब उसे ऐसा लगा कि ये सड़ा-गला बंधन टूट गया है.         

उसने अपने आप से पूछा कि अब अगला कदम क्या होना चाहिए: क्या कल ही होटल में रहने के लिए चला जाए? मगर – चारों ओर सब लोग हड़ताल कर रहे हैं...

आँगन में, सड़क पर शोर हो रहा था, भारी चीज़ें खींची जा रही थीं. इससे – परेशानी नहीं हो रही थी. सम्गीन, मुस्कुराते हुए सोच रहा था, कि शायद, हज़ारों वारवराएँ ख़ौफ़ से ये शोर सुन रही होंगी, - हज़ारों, मॉस्को की हज़ारों सड़कों पर, अपने छोटे, बड़े आरामदेह आशियानों में. मकारोव के शब्द याद आ गए, जो उसने महिलाओं के बोझिल तो नहीं, बल्कि हानिकारक वर्चस्व के बारे में कहे थे.

इसमें सच्चाई का कुछ अंश तो है – वे ज़िंदगी में काफ़ी सारी ओछी बातें ले आती हैं. मेरे लिए तो बस, एक कमरा काफ़ी है. मैं – अपने आप से संतुष्ट हूँ और मुझे लोगों की, पार्टियों की, किताबों के, थियेटर के बारे में बकवास की कोई ज़रूरत नहीं है. फिर मैंने हर तरह की फ़िज़ूल बातें देख ली हैं, अब मुझे पूरा हक है कि उन पर ध्यान न दूँ. मैं छोटे-मोटे प्रांत में चला जाऊँगा...

उसने महसूस किया कि ये विचार उसे ताज़गी और सुकून दे रहे हैं. बीबी के साथ हुए हंगामे ने न केवल उसके साथ के संबंधों को, बल्कि किसी और, अधिक महत्वपूर्ण बात को भी स्पष्ट कर दिया. आँगन में गड़गड़ाहट हुई, जैसे कोई बक्सा गिरकर टूट गया हो, सम्गीन काँप गया, और उसी समय वारवरा ने दबी आवाज़ में कहते हुए अध्ययन कक्ष का दरवाज़ा ज़ोर से भड़भड़ाया:

 “खोलो! मैं – अकेले नहीं रह सकती, मुझे डर लगता है! तुम सुन रहे हो?”

 “सुन रहा हूँ, मगर खोलूँगा नहीं,” उसने खूब ज़ोर से जवाब दिया. वारवरा कुछ देर ख़ामोश रही, फिर दुबारा दरवाज़ा खटखटाने लगी.

 “मुझे अकेला छोड़ दो,” सम्गीन ने कड़ाई से कहा और फ़ौरन बेडरूम में अपने बिस्तर के लिए चादर लाने चला गया; बिना बीबी से टकराए वह ये करने में कामयाब हो गया, और सुबह अन्फ़ीमेव्ना ने गहरी साँस लेते हुए उसे सूचित किया:

 “वार्यूशा ने कहा है कि वह कुछ दिन र्याखिनों के यहाँ बिताएगी, वोल्खोन्का में, - यहाँ, अकेले में उसे डर लगता है. उसका ख़याल है कि वोल्खोन्का में ज़्यादा सुकून रहेगा...”          

इस दिन से सम्गीन के लिए समय ने, जो अविश्वसनीय घटनाओं से लदा था, ऐसी गति पकड़ ली, जो उसे स्कूल के भौतिक शास्त्र के सबक की याद दिला गई, जहाँ हर छोटी-बड़ी चीज़, समान गति से जा रही थीं, कैसे विभिन्न वज़न की चीज़ें अंतरिक्ष में गिरती रहीं, जिससे हवा बाहर फेंक दी जाती थी. ऐसा लग रहा था, कि घटनाओं की गति दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती थी और वे किसी ख़ास मकसद से एक विशिष्ट दिशा की ओर उड़ रही हैं, यादों में छोड़े जा रही हैं सिर्फ सीटियाँ बजाते, दमकते शब्दों और वाक्यांशों के समूह, संक्षिप्त, जैसे अख़बारी लेखों के शीर्षक हों. अख़बार कानों को बहरा करते हुए चीख़ रहे थे, व्यंग्य-पत्रिकाएँ कर्णकटु सीटियाँ बजा रही थीं, उनके विक्रेता चिल्ला रहे थे, आम आदमी चिल्ला रहा था – और हर दिन अपने आप को एक नया शीर्षक दे रहा था:

“ नाविकों का विद्रोह” – एक का शीर्षक था, और दूसरा जोश-ख़रोश से घोषणा कर रहा था: “आठ घण्टे के कार्य दिवस के लिए संघर्ष”.

इससे पहले कि सम्गीन इन दो तथ्यों को एक साथ जोड़ता और समझ पाता, उसे सुनाई दिया:

“पीटर्सबुर्ग के मज़दूर प्रतिनिधियों की काँग्रेस ने आठ घण्टे के कार्य दिवस के लिए संघर्ष को समाप्त कर दिया है, क्रोन्श्ताड्त के नाविकों को फाँसी दिए जाने के विरोध में कालासागर की नौसेना ने हड़ताल कर दी है.” आए दिन कोई न कोई, डर या ख़ुशी के मारे चिल्लाकर किसानों द्वारा ज़मींदारों की संपत्ति नष्ट किए जाने के बारे मे कहता. रातों को सम्गीन के सामने सर्दियों वाली कोमल धरती की तस्वीर खुलती, जिसे सफ़ेद पृष्ठभूमि पर अग्निकाण्डों के बड़े-बड़े अलावों से रंगा गया था; आग की लपटें जैसे धरती के गर्भ से बाहर लपक रही थीं, और चारों ओर, चकाचौंध करते सफ़ेद खेतों पर, तैश से चिंघाड़ते हुए, एक ज्वालामुखी से दूसरे ज्वालामुखी तक काले लावा की धाराओं जैसे, विद्रोही किसान घूम रहे थे. सम्गीन को यकीन था कि ये अद्भुत और उदास, मगर ख़ूबसूरत तस्वीर अपने आप ही उसके सामने प्रकट हो गई है, उसकी कल्पनाशक्ति की ज़रा सी भी सहायता लिए, और ये उस तस्वीर से बिल्कुल भिन्न है, जिसके बारे में छोटे पादरी ने तीन साल पहले उसे बताया था. ये तस्वीर और भी ज़्यादा बयान कर रही है, एक दूसरी ही शक्ति आग के ब्रश से उसे बना रही है, - ये विद्रोही मज़दूर की शक्ति नहीं है, जिसके बारे में आए दिन अख़बारों में लिखा होता है, प्रकट रूप से – उससे मुग्ध होकर, मगर गुप्त रूप से, शायद, डरते हुए. नहीं, ये किसी अलौकिक शक्ति का काम है: विनाश के पागलपन से लोगों को संक्रमित करके, वह उन पर हँस रही है.                                             

कभी कभी सम्गीन को महसूस होता, कि वह एक नए, अपने ऐतिहासिक-दार्शनिक सत्य के आविष्कार की देहलीज़ पर खड़ा है, जो उसका पुनर्निमाण करेगा, उसे वास्तविकता से ऊपर और सभी पुरानी, किताबी सच्चाइयों से परे दृढ़ता से प्रस्थापित करेगा. उसे अपने आप को महसूस करने, पूरी तरह अपनी बात को सोचने नहीं दिया जा रहा था. हमेशा कोई न कोई आदमी भागकर सामने आ जाता, और अपने शब्दों से सम्गीन का मूडबदल देता. एक उदारवादी प्रोफ़ेसर ने किसी प्रभावशाली अख़बार में लिखा था:

“ लोग दिन ब दिन उनके ही द्वारा भड़काई गई शक्ति के सम्मुख, कम महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं, और कई लोग ये नहीं समझ रहे हैं, कि घटनाओं को वे नियंत्रित नहीं कर रहे हैं, बल्कि घटनाएँ उन्हें अपने साथ घसीट रही हैं”.

इन शब्दों को पढ़कर सम्गीन उद्विग्न हो गया, - ऐसा तो उसे कहना चाहिए था. और इस बात से ख़ुश होकर, कि इन शब्दों में छुपा अर्थ उसकी मनोदशा को मज़बूत कर रहा था, उसने उन्हें भूल जाने की कोशिश की, और वह उन्हें उतनी ही आसानी से भूल भी गया, जैसे किसी छोटे-मोटे सिक्के को खोने की बात भूल जाते हैं.

आजकल कूमोव उसे शर्मिन्दा कर रहा था, जिसे वह चालाक और महत्वाकांक्षी दिओमीदोव की अपेक्षा अयोग्य, बेवकूफ़ समझता था. कूमोव अक्सर आ जाता था, मगर वह कहाँ गया था? उसने क्या देखा?’- इन सवालों के जवाब ठीक से नहीं दे पाता था.

“शान्याव्स्की की यूनिवर्सिटी गया था – कित्ते सारे लोग! भयानक भीड़! मगर – वो बात नहीं है, पता है, ‘उसबारे में वो बात नहीं करते हैं!”      

वह किसी खुले हुए स्क्रू की तरह डोल रहा था, सिर हिला रहा था, हाथ नचा रहा था, अफ़सोस से चटख़ारे ले रहा था और, अचानक कमरे के बीचोंबीच ठहर कर, जैसे काठ बन गया, फ़र्श की तरफ़ देखा – दबी- घुटी आवाज़ में बोला:

 “सब वही – प्रोग्राम्स, प्रोग्राम्स के बारे में बहस, जबकि अंतिम आज़ादी का मार्ग खोजना चाहिए. ज़िंदगी के विनाशकारी प्रभावों से अपने आप को बचाना चाहिए, कॉस्मिक ज्ञान की गहराई में पैठ जाना चाहिए, जो ब्रह्माण्ड का नियंत्रण करता है. ये ज्ञान - ख़ुदा है या शैतान – इसका फ़ैसला – मैं नहीं करूँगा, मगर मैं महसूस करता हूँ, कि वह – न कोई संख्या है, न भार, न ही पैमाना, नहीं, नहीं! मैं जानता हूँ कि सिर्फ ब्रह्माण्ड (माक्रोकोज़्म) में ही आदमी को अपने स्वका वास्तविक मूल्य पता चलेगा, न कि लघु रूप’ (माइक्रोकोज़्म) में, न वस्तुओं के, प्रभावों के, परिस्थितियों के बीच, जिनका निर्माण उसने ख़ुद किया था और करता रहेगा...”                        

ये फ़िलॉसफ़ी क्लीम को काफ़ी अस्पष्ट, धुँधली, अप्रिय लगी.  मगर उसमें भी कुछ ऐसी बात तो थी, जो उसकी मनोदशा के अनुरूप थी. वह चुपचाप कूमोव की बात सुनता रहा, सिर्फ़ कभी-कभी छोटे से सवाल पूछ लेता, और इस बात का यकीन होने पर और भी ज़्यादा झल्ला गया कि इस खुले स्क्रू जैसे आदमी के शब्द उसके अपने विचारों से कहीं न कहीं मेल खाते हैं. ये करीब-करीब अपमानास्पद था.

घटनाएँ, जैसे पिघलती बर्फ़ के मौसम में, नदी में बहते हुए बर्फ़ के टुकड़ों जैसी, एक दूसरे को टक्कर मार रही थीं, वे न सिर्फ स्पष्टीकरण की माँग कर रही थीं, बल्कि सम्गीन को उनमें प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लेने पर भी मजबूर कर रही थीं. सम्गीन ने अपने आप को समझाया कि कई कारण हैं, जो इन भगदड़ वाले दिनों में उसे इस सब में हिस्सा लेने पर मजबूर कर रहे थे, और न तो उसमें इच्छा थी, न ही हिम्मत कि इस भगदड़ से दूर एक कोने में खड़ा रहे. वह ख़ुद भी समझ रहा था, कि उसके बर्ताव के पीछे निहित उद्देश्य उतने ठोस नहीं हैं, कि उसके आचरण और मनोदशा के विरोधाभास से समझौता कर लें. उसने प्रमाण सहित अपने आप को समझाया कि सिर्फ अपनी उत्सुकता को संतुष्ट करते हुए, स्वयँ को ख़तरे में डालने में कोई समझदारी नहीं है – ये हरेक के बस की बात नहीं है. मगर यह प्रमाणित करने के लिए वह तब मजबूर हुआ, जब भागदौड़ करती अन्फ़ीमेव्ना और बेरिकैड की रक्षा कर रहे लोगों के सामने उसे अटपटापन महसूस होने लगा. गली के अन्य निवासियों की ही भाँति, अन्फ़ीमेव्ना ने इन लोगों के ठहरने की व्यवस्था किचन में की थी. घर में बैठकर खिड़की से बेरिकैड की ओर देखते रहना अटपटा लग रहा था; वहाँ रहने वालों को उनकी आदत हो गई थी, वे उसके चारों ओर बर्फ़ जमा देते, उसे पानी से सींचते. मतलब, वास्तविकता ज़िद्दीपन से, बिना लाग-लपेट के माँग कर रही थी कि घटनाओं में भाग लिया जाए. वास्तविकता की दूत बनकर, हमेशा ख़ुशी के पर लगाए, औरों की अपेक्षा कहीं ज़्यादा,  ल्युबाशा सोमोवा उसके पास आ जाया करती. गिलहरी की खाल वाले हल्के, फ़ूहड़ से ओवरकोट में, फ़टी शॉल में लिपटी, वह रूई के बड़े गोले जैसी लुढ़कती हुई आती; ठण्ड के मारे लाल हो गए उसके गाल फूले-फूले रहते. 

“हुर्रे!” वह चिल्लाई. “क्लीम, प्यारे, ज़रा सोचो: हमारे यहाँ भी मज़दूरों के प्रतिनिधियों की काँग्रेस का आयोजन हुआ!” और वह हमेशा विनती करती, आदेश देती: “टेक्निकल स्कूल में भाग कर जाओ, गोगिन से कहना कि मैं कलोम्ना चली गई हूँ; फिर – शान्याव्स्की जाना, वहाँ पयार्कोव को ढूँढ़ना, और ये कागज़ – उसे दे देना! बस, -प्लीज़, चार बजे से पहले युनिवर्सिटी पहुँच जाना.”

उसके हाथों में कागज़ ठूँसकर उसने शॉल को अपने पेट पर और भी कसकर बांध लिया, कहती रही:

“कैसे कैसे लोग आ गए हैं, क्लीम! दुनाएव की याद है? आह...”

बेवकूफ़क्लीम ने इस बात को अनदेखा करते हुए सोचा. कुछ दिनों के बाद वह रास्ते पर उससे मिला. ल्युबाशा एक फ़टेहाल गाड़ीवान की स्लेज में बैठी थी, - स्लेज अख़बारों के बंडलों, रंगबिरंगे ब्रोशूरों से लदी थी; थोड़ा सा उठकर गाड़ीवान के कंधों को पकड़ते हुए सोमोवा चिल्लाने लगी:

“पीटर्सबुर्ग की कौन्सिल बर्ख़्वास्त!”

बेवकूफ़’.

मगर बेवकूफ़की बात मानते हुए, वह जाता रहा, विभिन्न लोगों को ढूँढ़ता रहा, उन्हें कुछ पैकेट्स देता रहा, और जब वह ख़ुद को इस बात की कैफ़ियत देने लगा, कि वह ये सब क्यों करता है, – तो उसे ऐसा लगा कि ल्युबाशा के काम करते हुए, उसे इस बात में यकीन हो चला था कि जो कुछ भी उसके साथी कर रहे हैं, उसमें ज़रा भी संजीदगी नहीं है. वह अक्सर अलेक्सेइ गोगिन से मिलता. अपनी फ़ैशनेबुल छबि को छोड़कर, दुबला हो गया गोगिन किसी बैंक के कर्मचारी जैसा ही रहा और उसी तरह मज़ाक करता रहा:

 “ कलोम्ना चली गई, ऐसा कह रहे हो?” उसने आँख बारीक करके पूछा. “कैसी भगोड़ी अपराधी है! हमने वहाँ पहले ही आदमी भेज दिया है. चलो, ठीक है! पयार्कोव को ढूँढ़ने की आपको ज़रूरत नहीं है, बल्कि आप जाइए...” – उसने पता बताया, और कुछ ही देर के बाद सम्गीन रशियन इन्शुरेन्स सोसाइटी की मानेझ के सामने वाली बिल्डिंग के एक फ्लैट में बैठा था, जहाँ, न जाने क्यों केरोसिन की बू आ रही थी. लिखने की मेज़ पर बिकफ़ोर्ड फ्यूज़ पड़ा था, बगल वाले कमरे में लम्बी नाक वाला एक साँवला लड़का कॉकेशस के कुछ लोगों को जापानी केमोसिस (आँखों का रोग – अनु.) के बारे में बता रहा था, जबकि ख़ूबसूरत, मगर बाल कटे पादरी जैसे, भावहीन चेहरे के आदमी ने गोगिन की चिट्ठी पढ़कर हुक्म दिया:

 “सामोतेका चले जाइए....वहाँ कॉम्रेड च्योर्त से मिलिए.”                                          

मन ही मन मुस्कुराते हुए सम्गीन कॉम्रेड च्योर्त के पास गया:

 च्योर्त! (इस रूसी शब्द का अर्थ है - शैतान – अनु.) खेल रहे हैं, बच्चों की तरह’.

सामोतेका में चेहरे पर चेचक के दाग वाले, एक ख़ुशमिजाज़ नौजवान ने उससे पूछा:

 “और डम्बेल्स कहाँ हैं?”

 “डम्बेल्स?”

 “हाँ भाई, डम्बेल्स! मैं क्या सिगरेट के डिब्बों से बम बनाऊँगा?” सम्गीन चला गया, उसे और भी ज़्यादा यकीन हो गया था, कि ये घटनाएँ, जिन्हें दसियों ऐसे लोग अंजाम दे रहे हैं, ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सकतीं, वो इतिहास का रुख नहीं बदल सकतीं. वह देखता था कि कुछ विभिन्न प्रकार के लोग बेरिकैड्स बना रहे हैं, जो किसी को परेशान नहीं करते, क्योंकि कोई भी उन्हें हटाने की कोशिश नहीं करता; वह देख रहा था कि आम इन्सान ने बेरिकैड्स से समझौता कर लिया है, उसे आसानी से उनका चक्कर लगाकर निकल जाने की आदत हो गई है; उसे मालूम था कि मॉस्को के मज़दूर हथियारों से लैस हो रहे हैं, मज़दूरों और सैनिकों की झड़पों के बारे में भी वह सुनता था, मगर उसे इस पर यकीन नहीं था, सडक पर न तो उसे सैनिक मिला, न ही कोई पुलिसवाला. ऐसा लगता था कि मॉस्कोवासियों को किस्मत के भरोसे छोड़ दिया गया है, मगर वे इससे परेशान नहीं है – उल्टे, वे कुछ ज़्यादा ही बहादुर और ख़ुशमिजाज़ हो चले हैं.

जैसे किसी ताकत ने अलग-अलग तरह के लोगों को घरों से बाहर धकेल दिया था, - वे तेज़ी से, फुर्ती से चलते, जैसा मॉस्को का स्टाइल नहीं था, रुक जाते, झुण्डों में खड़े हो जाते, किसी का भाषण सुनते, बहस करते, तालियाँ बजाते, तरु-मण्डित रास्तों पर टहलते, और ऐसा लगता था जैसे वे किसी त्यौहार का इंतज़ार कर रहे हों. सम्गीन उनकी ओर देखता, नाक-भौंह चढ़ाता, लोगों के छिछोरेपन के बारे में, और उन लोगों की मासूमियत के बारे में सोचता जो इन्हें ज़िंदगी के प्रति एक उचित रुख अपनाने की प्रेरणा दे रहे थे. रातों को उसके सामने फिर सफ़ेद धरती पर अलावों के लाल धब्बों और किसानों की काली धाराओं वाली तस्वीर आ जाती.

 “हाँ, सोशलिस्ट क्रांतिकारियों ने बड़ी गड़बड़ कर दी है,” किनारों पर फ़टे ओवरकोट में हड्डियों के ढाँचे जैसे पयार्कोव ने निराशा से कहा; ओवरकोट के छेदों से बाहर निकल रही रूई पयार्कोव की हड्डियों के ढाँचे से समानता को और ज़्यादा स्पष्ट कर रही थी. ऐसा लग रहा था कि उसके चेहरे की हड्डियाँ भूरी चमड़ी को फ़ाड़कर बाहर निकलने ही वाली हैं. वह हमेशा की तरह निराशा से, रूखेपन से बोल रहा था, मगर उसकी आँखें ज़्यादा नर्मी से और विशेष रूप से टकटकी बांधे देख रही थीं; सम्गीन ने इसका ये स्पष्टीकरण दिया कि आँखें कोटरों में गहरी धँस गई हैं, और भौंहें, जो पहले हमेशा चढ़ी रहती थीं, अब सीधी हो गई हैं.                                            

“बड़े सांस्कृतिक उद्योगों को तो मज़दूर कम नष्ट कर रहे हैं, मगर फिर भी हमें बहुत नुक्सान होगा,” पयार्कोव ने टूटी हुई सिगरेट को देखकर कहा, “शायद, यह अपरिहार्य है,” उसने आगे कहा और जेब से दूसरी सिगरेट निकाली, वो भी मुड़ी हुई थी.

जो कुछ भी उसने कहा, उसमें सम्गीन को हमें’ – ये शब्द परेशान कर गया. ये हमेंमतलब किसे? कौन है ये - हम?’ सम्गीन के इस सवाल के जवाब में, कि वह कहाँ काम करता है, - पयार्कोव ने जैसे अचरज से कहा:

 “क्रांति में....मतलब – सोवियत (यहाँ कौन्सिल से तात्पर्य है – अनु.) में! निर्वासन से मैं निकल गया, मुझे शैतान जाने कहाँ भगा रहे थे! मगर, नहीं, - सोचा - थैंक्स! और – वापस लौट आया.”

“और कुतूज़ोव कहाँ है?” क्लीम ने पूछा.

 पीटर (पीटर्सबुर्ग-अनु.) में था. अब – शायद – साउथ में हो.”

हम’ - पयार्कोव के पास से लौटते हुए सम्गीन ने व्यंग्य से दुहराया. वह बड़ी देर तक किसी मज़ाकिया, अपमानकारक उपमा को ढूँढ़ता रहा, मगर नहीं ढूँढ़ पाया. हमने जुताई की’ – ठीक नहीं लगा.

शाम को घर लौटते हुए अपनी सड़क के नुक्कड पर सम्गीन मित्रोफ़ानोव से टकरा गया. इवान पेत्रोविच बिना अभिवादन किए उससे दूर छिटक गया.

“उसे बहुत बुरा लग रहा होगा’, सम्गीन ने सोचा, ‘सामान्य ज्ञानवाले आदमी की बदतमीज़ी से परेशान सम्गीन ने सोचा. पीछे मुड़ कर देखा, तो पाया कि मित्रोफ़ानोव भी रुक गया है, और उसकी तरफ़ देख रहा है. क्लीम सांत्वना के सुर में चिल्लाकर कहना चाहता था:

 ये सब – कुछ ही दिनों की बात है!

मगर मित्रोफ़ानोव अपनी जगह से हटा और जल्दी से आगे निकल गया.                             

दो बार वारवरा आई, सिर तानकर, क्लीम के कंधे से ऊपर देखते हुए ठण्डेपन से नमस्तेकी, अपने कमरे में चली गई, और अपने लिए कपड़े इकट्ठा करने लगी.

पहली बार उसके साथ र्याख़िन आया था, डेमॉक्रेट्स जैसे फ़र का जैकेट और नमदे के जूते पहने, दरबान जैसा लग रहा था.

“लोग घटनाओं को समझने लगे हैं, - ‘17 अक्टूबर यूनियनका गठन हो गया है” – वह बता रहा था, मगर पूरे यकीन से नहीं, जैसे उसे शक हो रहा है कि क्या वह वे ही शब्द कह रहा है और क्या उन्हें इसी लहज़े में कहना चाहिए? “यहाँ, जानते हैं, स्त्रातोनोव तेज़ी से आगे आ रहा है, बेहद प्रभावशाली व्यक्ति, बेहद!”

कुछ देर चुप रहकर उसने हथेलियों से अपने लाल, फूले-फूले चेहरे को सहलाया, जो उसके छोटे से सिर पर अजनबी जैसा लग रहा था, और आगे कहा:

“कुछ कैडेट्स उसके साथ हैं...हाँ! उनका लीडर, वो मिल्यूकोव का अनुयायी – एडवोकेट, यहूदी - विद्रोह कर रहा है - क्या नाम है उसका? हाँ – प्रैस! ज़हरीला...हुम् ! मालूम है ना यहूदियों की ये उत्तेजना, बिना धरती के लोग और हमारे निहिलिज़्मसे संक्रमित...”   

यहूदियों के बारे में वह बहुत कुछ बता सकता था. अपनी बैंगनी ज़ुबान से होठों को चाटते हुए बताता रहता, और उसकी कुंद आँखों में कोई नुकीली, तिकोनी, कम्पास के सिरे जैसी चीज़ चमकने लगती. हमेशा की तरह उसने अपना भाषण सामान्य ढंग से समाप्त किया:

 “मगर मैं – आशावादी हूँ. मुझे मालूम है: हम चिल्लाएँगे और जैसे ही दो छोरों के बीच औसत परिणाम प्राप्त होगा, रुक जाएँगे.”

मगर इस बार उसने गहरी साँस लेकर सम्गीन से पूछा:

“आपका क्या ख़याल है?”

सम्गीन ख़ुश हो गया, कि वारवरा ने उसके जवाब में ख़लल डाला. वह कंधों को इस तरह से उठाए डाइनिंग रूम में आई, जैसे किसी ने उसके सिर पे मारा हो. इससे उसकी लम्बी गर्दन सामान्य, ज़्यादा छोटी हो गई, मगर चेहरा लाल हो रहा था, और आँखों से हरे शोले निकल रहे थे.

 “ये तुमने अन्फ़ीमेव्ना को रेड क्रॉसमें चादरें देने की इजाज़त दी थी?” ज़ोर से खाँसते हुए उसने क्लीम से पूछा.

 “मैंने किसी बात की इजाज़त नहीं दी, उसने मुझसे किसी भी बारे में नहीं पूछा...”

 “उसने सारे तौलिए, चादरें और बहुत कुछ...शैतान ही जाने क्या क्या!”

 “सब पुराना था, वार्या, पुराना, मरम्मत किया हुआ – उसका अफ़सोस न कर!” दरवाज़े से झाँकते हुए अन्फ़ीमेव्ना ने कहा.

वारवरा झटके से उसकी ओर मुड़ी, मगर बुढ़िया का बड़ा, पिलपिला चेहरा ग़ायब हो चुका था, और, पैर पटकते हुए, उसने र्याख़िन को हुक्म दिया:

“चलो!”

उसे अध्ययन कक्ष में बुलाकर सम्गीन ने कहा:

 “तुम, बेशक, समझ रही हो, कि मैं दूसरी जगह क्यों नहीं जा सकता...”

पूरी बात सुने बगैर उसने हाथ हिलाया:

“आह, छोड़ो! क्या इस सब के लिए यही समय है, जब, हो सकता है...”

और, होठों पे रुमाल रखकर, वह जल्दी से चली गई.

लोग प्रकट होते थे, ग़ायब होते थे, जैसे गढ़ों में गिर गए हों, और फ़िर से उछल कर बाहर आ गए हों. औरों के मुकाबले में ब्रागिन ज़्यादा प्रगट होता था. वह पस्त हो गया था, कुम्हला गया था, सम्गीन की ओर शिकायत भरी, हिकारत भरी नज़रों से देखता और सवालिया अंदाज़ में कहता:

संघर्षअख़बार में छपा है...क्या आप सहमत हैं? ‘रूसी समाचारइशारा करता है...क्या ये सच है?”

उसने सम्गीन को अंकल क्रिस्टोफ़र के बिनबुलाए मेहमान - मीशा ज़ुयेव और उसके निराशाजनक भाषणों को याद करने पर मजबूर कर दिया:

मरीना-बगियामें – गिरफ़्तारियाँ. नीझ्नी में. त्वेर में...

ठण्ड से, थकान से बेहाल, और बचे खुचे अंक बेचने वाले किसी अख़बार बाँटने वाले छोकरे की तरह, ब्रागिन चिल्लाया:

“रोस्तोव बटालियन के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया. निकोलायेव्स्की रेल्वे लाइन पर पुलों को उड़ा देने का प्रस्ताव है. सरातोव में मज़दूरों ने रदिश्चेव म्यूज़ियम को उड़ा दिया. ओरेखोवो-ज़ूएवो में फ़ैक्टरियों पर बम फेंक रहे हैं.”

उसकी सारी सूचनाएँ अविश्वसनीय थीं, और सम्गीन को पहले से ही ये मालूम था, क्योंकि, ये ग़ज़ब के समाचार सुनाकर, ब्रागिन पूछता:

“क्या वाकई में पुल उड़ा देंगे? यकीन नहीं होता, कि म्यूज़ियम को उड़ा दिया...”

 “यकीन मत करो,” सम्गीन उसे सलाह देता. “ये सब अफ़वाह है.”

 “आख़िर कौन फ़ैलाता है अफ़वाहें?”

 शायद – तुम’, सम्गीन ने सोचा.

उसने ग़ौर किया कि जब ये लम्बा आदमी चौंकाने वाली ख़बरें लाता है, तो उसके काले बाल सिर पे चिपक के बैठे रहते हैं, और उनकी लट माथे के घूमड़ को ढाँक लेती है, मगर जब वह कम डरावनी बात सुनाता है, तो – बाल बिखरे होते हैं, घूमड़ दिखाई देता है. लम्बा, कठपुतली जैसा, बातूनी और पहले ख़ुशमिजाज़, मगर अब अवसादग्रस्त, - सम्गीन को वह कभी भी पसंद नहीं आया, मगर अब तो वह और भी अप्रिय लगने लगा था, कुछ अजीब से संदेह उत्पन्न करने लगा था. ऐसा लगता था कि जितना वह बोलता था, उससे ज़्यादा समझता था, और – ये कि वो जानबूझकर अपनी उत्तेजनाओं और अपनी बेवकूफ़ी को बढ़ाचढ़ाकर दिखा रहा है, जैसे किसी को चिढ़ा रहा हो.

“आपका क्या ख़याल है: क्या हम समाजवाद की तरफ़ बढ़ रहे हैं?”

हुँ, ज़्यादा दूर नहीं हैं.”

“मगर – बोल्शेविक्स?”

उसके लम्बे चेहरे, सिकोड़ी हुई आँखों में देखते हुए सम्गीन ने जवाब दिया:

 “राजनीति में, व्यापार ही के समान, ‘सवाल जेब में नहीं रखा जाता’.

 “हाँ, बेशक, ऐसा ही है!” ब्रागिन ने सिर हिलाते हुए कहा और गहरी साँस लेकर कहा, “ये मुहावरा मैंने कल ही किसी पर्चे में पढ़ा था.” और सम्गीन से हाथ मिलाते हुए अपनी बात ख़त्म की: “आपके पास से हमेशा संतुष्ट होकर ही जाता हूँ. आपके पास स्पष्ट, शांत दिमाग़ है – ईमानदारी से!”

‘’मगर ये तो ताना दे रहा है, जानवर’ – सम्गीन ने भाँप लिया. “शैतान ही जाने – कहीं जासूस तो नहीं है?’

मगर इससे भी ज़्यादा अप्रिय आधा घण्टा उसने मकारोव के साथ बिताया. वह सुबह-सुबह प्रकट हो गया, जब सम्गीन बेरिकैड्स के रक्षकों के बारे में - जो शिफ्टों में उसके किचन में गर्मी पाने के लिए आ जाते थे - अन्फ़ीमेव्ना की प्यारी बातें सुनते हुए कॉफ़ी पी रहा था, बुढ़िया उन्हें चाय पिलाती और उनके साथ उसकी दोस्ती हो गई थी.

बेवकूफ़ी और उकताहट की वजह से’, सम्गीन ने अपने आप को समझाया. वह पहले भी स्वयँ को घर का मालिक नहीं समझता था, हालाँकि रहता मालिक की तरह था; वह समझता था कि उसे अन्फ़ीमेव्ना के बारे में टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है, मगर, इस बारे में भूलकर – कर भी देता था. इस सुबह उसका मूड अच्छा नहीं था.       

“ पता है, अन्फ़ीमेव्ना, ये उतना आसान नहीं है,” उसकी तरफ़ देखे बिना सम्गीन ने धीरे से कहना शुरू किया; बुढ़िया ने उसकी बात काट दी:

 “हाँ, रातों को, ठण्ड में ड्यूटी देना लोगों के लिए कैसे आसान होगा, जबकि उन्हें इसकी आदत नहीं है?”

“आप मेरी बात समझी नहीं, मैं उस बारे में नहीं कह रहा हूँ...” मगर अन्फ़ीमेव्ना ने उसकी बात सुनी ही नहीं, वह चिंता से, धीमी आवाज़ में कहती रही:

 “और, बताइए तो, इस ईगोर का मैं क्या करूँ? पीता रहता है, पीता रहता है, और पकाना नहीं चाहता: छोड़ो, कहता है, सब भूख से मर जाएँगे अगर त्सार को...’ ”

ठीक इसी समय मकारोव किचन में प्रकट हुआ और उसने मुस्कुराते हुए पूछा:

“ये तेरे किचन में क्या है – विद्रोहियों का हेडक्वार्टर?” वह ओवरकोट, टोपी, फेल्ट के गहरे जूते पहने था. बगल में छड़ी दबाए, हाथों से दस्ताने उतार रहा था. पता चला कि वह रात भर इसी सड़क पर एक जच्चा के यहाँ था.

 “डर के मारे गर्भपात हो गया; कल कुछ बदमाश उसका पीछा कर रहे थे. देखा - यहाँ तो बेरिकैड है! और दूसरा भी है. याद आया कि तू यहीं रहता है...” 

बात करते हुए उसने ओवरकोट को कुर्सी पर फेंक दिया, टोपी दिवान के कोने में उछाल दी, मगर जूते उतारना भूल गया और इससे सम्गीन की उसके प्रति अप्रिय भावना को और बढ़ा दिया.

“ये तुम सुरक्षा कर रहे हो, या तुम्हारी सुरक्षा की जा रही है?” उसने मेज़ के पास बैठते हुए पूछा.

सम्गीन ने पूछा:

 “कॉफ़ी पियोगे?”

 “दे.”

और, जैसे वे कल ही मिल चुके हों, मकारोव ने फ़ौरन उस बारे में बात शुरू कर दी, जो अस्पताल में पूरी नहीं कर पाया था. “याद है, मैंने अस्पताल में कहा था...”

 “हाँ,” आराम से सिर हिलाते हुए क्लीम ने कहा, और अप्रियता से उन लोगों के बारे में सोचने लगा, जो ये मानते हैं, कि उसे वे सारी बेवकूफ़ीभरी बातें याद रखनी चाहिए, जो उन्होंने कही थीं. उसका मूड और ज़्यादा ख़राब हो गया; अपने ही ख़यालों में मगन, उसने बगैर ध्यान दिए मकारोव के शांत, नपे तुले भाषण को सुना.

 “अगर ये बात नहीं होती – जच्चा वाली, तो भी मैं तुम्हारे पास आने ही वाला था. दिल खोलकर बात करनी है, ऐसी ज़रूरत आ पड़ी है. तुम पर, क्लीम, मैं – भरोसा करता हूँ...और भरोसा नहीं भी करता हूँ, उसी तरह, जैसे अपने आप पर...इन शब्दों से काफ़ी गरमाहट छलक रही थी, दोस्तानापन महसूस हो रहा था. सम्गीन ने सिर उठाया और अविश्वास से उभरे माथे वाले चेहरे की ओर देखा, जो दो रंगों की लटों और काली, मगर काफ़ी सफ़ेद हो चली नुकीली दाढ़ी की फ़्रेम में जड़ा था. ये स्वीकार करना अच्छा नहीं लग रहा था कि मकारोव की ख़ूबसूरती दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी. आँखें अच्छी थीं, घनी भौंहों से ढँकी हुई, मगर सीधी, कठोर नज़र अच्छी नहीं लगती थी. अलीना का अजीब और दुहरे अर्थ वाला वाक्य याद आया: कोस्त्या सच में ख़ूबसूरत है – अपने आप के लिए, मगर औरतों के लिए नहीं’.    

“पता है, मेरे यहाँ कभी कभी बोल्शेविक रात बिताते हैं. अँ, मेरा सवाल उनके बारे में नहीं है. कभी-कभार कॉम्रेड बोरोदिन आता है, ग़ज़ब का इन्सान है, मैं तो कहूँगा कि वह गणित की तरह सुलझा हुआ इन्सान है...”

मकारोव ने दोनों हाथों से हवा में एक वृत्त बनाया.

“गोलाकार आदमी है. बड़ी गेंद की तरह, - न तो उसे पकड़ सकते हो, न ही गले लगा सकते हो.”

“मोटा, बड़ी दाढ़ी, व्यंग्यात्मक आँखों वाला?”

“हाँ, करीब करीब. मगर दाढ़ी बनाता है.”

शायद – कुतूज़ोव’, सम्गीन ने सोचा और ध्यान से सुनने लगा.

“उसके लिए...और, वैसे भी उन सभी के लिए नैतिकता से जुड़े प्रश्नों का कोई अस्तित्व नहीं है. उनकी अपनी नैतिकता है...”

कॉफ़ी पीकर उसने सम्गीन के सिर के ऊपर से खिड़की में देखा और अपनी बात कहता रहा.

“ असल में, ये नैतिकता नहीं, बल्कि, कुछ बायो-सोशल हाइजिन (जैविक-सामाजिक स्वास्थ्य प्रणाली) है. हो सकता है, कि वे सही हों, क्योंकि वे अपने आप को काफ़ी बड़ा समझते हैं, मेरे मुकाबले में, तुम्हारे और वैसे ही – हमारी तरह के सब लोगों के मुकाबले में. मगर उनसे इन्सान के बारे में, किसी व्यक्ति के बारे में बात करना – बिल्कुल फ़िज़ूल है. बोरोदिन ने मुझसे कहा: इन्सान – बाद में आएगा’. ‘कब?’ ‘जब उसके आज़ादी से बढ़ने के लिए ज़मीन जोत ली जाएगी’. दूसरे, काफ़ी गंभीर व्यक्ति ने कहा: इन्सान अभी नहीं है, सिर्फ एक अति आज्ञाकारी सेवक है. आप, बोला, अपने इस इन्सान से रोशनी को रोक रहे हैं. इन्सान, नैतिकता, समाज – ये तीन चीड़ के पेड़ हैं, जिनके कारण आप को जंगल नहीं दिखाई देता’. वे, मेरे भाई, काफ़ी मंजे हुए लोग हैं.”

सम्गीन की ओर ख़ाली कप बढ़ाकर, वह सिगरेट पीने के लिए उठा, और जिस तरह इत्मीनान से वो ये कर रहा था, उसने सम्गीन को सोचने पर मजबूर कर दिया:

ये – काफ़ी देर चलेगा’.

मकारोव ने धुँए की लम्बी लकीर छोड़ी, आँखों को सिकोड़ा:

 “तो, मतलब ये हुआ, कि मैं – अति आज्ञाकारी सेवक हूँ,” उसने गहरी साँस ली. “इस लिहाज़ से” – मेज़ पर कोहनियाँ टिकाए और एकटक सम्गीन के चेहरे की ओर देखते हुए, वह शब्द ढूँढ़ रहा था – “मैं – विज्ञान की सेवा करता हूँ, विशिष्ट रूप से कहें तो – औरतों की सेवा करता हूँ. उनका इलाज करता हूँ, प्रसूति में उनकी सहायता करता हूँ. ये मुझे पूरी तरह व्यस्त नहीं रखता. तो – बोरोदिन की और उसके कॉम्रेड्स की मदद करता हूँ, संभावित ख़तरे को महसूस करते हुए, और उससे न डरते हुए. ख़ुशी ख़ुशी ही मदद करता हूँ. मगर इस बात में – कि वे क्रांति करेंगे – विश्वास नहीं करता. और वैसे भी मैं इस बात में विश्वास नहीं करता कि ये”  – उसने हाथ से खिड़की की तरफ़ इशारा किया – “क्रांति है और वह हमारे देश को कुछ दे सकती है.”

कुर्सी की पीठ से टिककर, झूलते हुए और मुस्कुराते हुए वह कहता रहा:

“समझ रहे हो, न कि बात क्या है? लोगों पर तो मैं विश्वास करता हूँ और उनकी बहुत इज़्ज़त भी करता हूँ, मगर – उस काम पर, जो वे कर रहे हैं – विश्वास नहीं करता. हो सकता है, सिर्फ दिमाग़ से विश्वास नहीं करता, हाँ? और तुम – कैसे?”              

“क्या?” सम्गीन ने पूछा, वह महसूस कर रहा था कि ये बातचीत पीड़ादायक होती जा रही है.

 “तुम क्यों मदद करते हो?” उसने पूछा.

 “ज़रूरी समझता हूँ,” सम्गीन ने कंधे उचकाते हुए जवाब दिया.

“बस, इसी पॉइन्ट से मैं तुम्हें नहीं समझ पाता, जैसे कि अपने आप को भी नहीं समझ पाता,” मकारोव ने सोच में पड़कर हौले से कहा. “तुम्हें, शायद, मैं नहीं समझ पाऊँगा. तुम – उनके साथ हो, मगर – उनके जैसे नहीं हो,” मकारोव उसकी तरफ़ देखे बिना कहता रहा. “मैं सोचता हूँ, कि हम दोनों अति आज्ञाकारी सेवक हैं, मगर – किसके? बस, यही मैं समझना चाहता था. अति आज्ञाकारी सेवक की भूमिका से मुझे चिढ़ है. याद है, जब हम स्कूल में पढ़ते थे, तब लेखक कातिन के यहाँ जाया करते थे – वही पॉप्युलिस्ट? मैं तभी समझ गया था, कि मैं अति आज्ञाकारी सेवक नहीं बन सकता. मगर फ़िर भी, उसके बाद, धीरे धीरे...”

खिड़की के नीचे कर्णकटु सीटी सुनाई दी.

“पुलिस की सीटी?” मकारोव ने अचरज से पूछा.

क्लीम बड़ी फ़ुर्ती से उछलकर खिड़की के पास पहुँचा और बोला:

“ कुछ हो गया है, लोग भाग रहे हैं...”

लाल बिखरे बालों वाला लाव्रूश्का बेतहाशा कमरे में घुसा और, टोपी हिलाते हुए, उत्तेजना भरी ख़ुशी से चिल्लाया:

 “सैनिक आ रहे हैं! अन्फ़ीमेव्ना पूछ रही है कि क्या दरवाज़े बंद कर दें?”

मकारोव भी उछलकर खड़ा हो गया:

 “शैतान ले जाए...”

 “बंद कर दें?” लाव्रूश्का चीख़ा. सम्गीन ने उसकी तरफ़ देखकर हाथ झटक दिया, इस बात का इंतज़ार करते हुए कि मकारोव क्या करेगा. वो, फ़ौरन ओवरकोट पहनते हुए, बड़बड़ाया:

 “डॉक्टर का कर्तव्य...”

वह ठठेरे के शागिर्द के पीछे पीछे बाहर भागा. धुंधले पड़ गए काँच को पोंछते हुए सम्गीन फ़ायरिंग की परिचित आवाज़ों का इंतज़ार कर रहा था. चरमराते हुए दरवाज़े बंद हो गए – वह काँपा और लड़खड़ा गया. दिल ये महसूस करना चाहता था कि वह शांत है, मगर कई छोटे छोटे ख़याल ऐसा नहीं होने दे रहे थे; वे भड़क उठते और फ़ौरन बुझ भी जाते, सिर्फ एक ख़याल, बुझने के बाद भी फिर से भड़क गया:

इन लोगों के बारे में, जो किचन में हैं, जवाब देना पड़ेगा...

किचन में ख़ामोशी थी, रास्ते पर – गोलियाँ नहीं चल रही थीं, मगर बंद दरवाज़ों से होकर दबी-दबी, उत्तेजित आवाज़ें आ रही थीं. अप्रिय तनाव को दबाने की ज़बर्दस्त कोशिश करते हुए सम्गीन आराम से कपड़े पहनने लगा. बाएँ हाथ को ओवरकोट की आस्तीन ही नहीं मिल रही थी.

मैं अपना ख़याल इस तरह रखता हूँ, जैसे अपने दुश्मन का रखता हूँ’, वह तैश में आ गया, झटके से टोपी पहनी, गुस्से से गलोशों (रबड़ के ऊँचे जूते, जो मामूली जूतों के ऊपर पहने जाते हैं – अनु.)  में पैर घुसाए , किचन के पोर्च में निकला, कुछ देर खड़ा रहा, गेट के बाहर से आ रही आवाज़ों का शोर सुनता रहा, और निश्चयपूर्वक सड़क पर निकल पड़ा.

फ़ीके पड़ गए मंद सूरज की मरियल रोशनी भेड़ की खाल जैसे बादलों से छनकर आ रही थी, और भुरभुरे बर्फ़ की पाउडर से थुपे बेरिकैड के पास खड़े, विभिन्न प्रकार के कपड़े पहने करीब पंद्रह लोगों पर पड़ रही थी; सूरज से उनके ऊपर ठण्ड के सफ़ेद से धब्बे पड़ रहे थे. लोग भी सम्गीन ही की तरह ठिठुर रहे थे. हवा भागदौड़ कर रही थी, लोगों के पैरों के नीचे से बर्फ उड़ा ले जाती, छतों पर बर्फ़ का धुँआ उड़ाती, उसे लोगों के सिरों पर बिखेर देती. मकारोव कम्पाऊण्डर विनोकूरोव के घर के पोर्च में लाव्रूश्का के पास खड़ा था और लाल बालों वाले की बारीक आवाज़ सुनते हुए मुस्कुरा रहा था. बेरिकैड के पीछे सोफ़ा घुमाते हुए कोई चल रहा था, सोफ़े के भीतर से रूई बाहर निकल रही थी, और ये इतना घृणित लग रहा था – जैसे सोफ़ा उल्टी कर रहा हो. क्लीम लोगों के पास आया. उनके बीचोंबीच हुड वाली टोपी पहने एक छोटे से चेहरे वाला आदमी भूरी मूँछों पर ताव देते हुए खड़ा था, फटी हुई, फ़र की साइबेरियन हैट पहने एक छोकरा खनखनाती आवाज़ में उससे कह रहा था:

 “ करीब चालीस आदमियों की टुकड़ी, बगैर अफ़सर के...”

“क्या सिविलियन थे?” भूरी मूँछों वाले ने पूछा.

 “करीब सात-आठ...”

“ठीक से गिनना चाहिए, अंदाज़न नहीं.”

“वे बिखरे हुए थे, न कि एक झुण्ड में...”

“बमों से डरते हैं!” ठठेरा ख़ुशी से चीख़ा. हुड़ वाली टोपी पहना आदमी नाक खुजाते हुए बोला:

“मतलब, रोस्तोव वालों ने झूठ नहीं बोला था, कि हमारे ख़िलाफ़ शिकारियों को भेज रहे हैं. क्या उनमें – पिये हुए थे?”

 “ध्यान नहीं दिया.”

“ध्यान देना चाहिए, - आपको, कॉम्रेड तफ़रीह के लिए नहीं भेजा है.”

हुड़ वाला आदमी शांति से, नर्म आवाज़ में, मगर एक ख़ास तरह की स्पष्टता से बोल रहा था. “लाव्रेन्ती,” हुड के कोने खींचता वह चिल्लाया, - “मतलब, ये तूने सीटी बजाई थी?”

 “मुझे, कॉम्रेड याकोव, गली के स्टूडेण्ट ने कहा था – आ रहे हैं...

“तेरे कान मरोड़ना चाहिए, प्यारे! आप, कॉम्रेड बल्यास्नी, इससे सीटी वापस ले लीजिए. गश्त पे इसकी ड्यूटी – न लगाएँ.”

“मतलब, झूठमूठ की दहशत,” घड़ी पर नज़र डालकर सम्गीन के पास आते हुए मकारोव ने कहा. “ मेरा ड्यूटी पर जाने का समय हो गया है, फिर मिलेंगे! दो-एक दिन में फ़िर आऊँगा. सुन,” – आवाज़ नीची करके वह कहता रहा, “इस लाल बालों वाले लड़के पर ध्यान दे – ग़ज़ब का दिलचस्प है!”

दाढ़ी वाले आदमी ने मकारोव को धकेला.

“फिर मिलेंगे,” न जाने क्यों बड़ी प्रसन्नता से डॉक्टर चिल्लाया.

बेरिकैड्स की हिफ़ाज़त कर रहे लोगों की ओर ग़ौर से देखते हुए सम्गीन ने उसकी तरफ़ देखकर सिर भी नहीं हिलाया. उनमें से कुछ को वह पहले भी किचन में देख चुका था, - जब वह उनके पास से गुज़र रहा था तो उन्होंने झुककर उसका अभिवादन किया, वह उनकी ओर देखकर प्यार से मुस्कुराया. उनमें से एक, लाल गालों और चपटी नाक वाले, वास्या ने, जिसे अन्फ़ीमेव्ना लकड़ियाँ लाने और किचन की भट्टी गरमाने पर मजबूर करती थी, बड़े सम्मान के साथ उसे रास्ता दिया. उसने करीब दस लोगों को देखा था, मगर अब वे थे उन्नीस: ग्यारह राइफ़ल्स और रिवॉल्वर्स से लैस थे, बाकी के – बेहथियार. ज़ाहिर था कि हुड वाला आदमी, कॉम्रेड याकोव, उनका कमाण्डर था – दुबला-पतला, फ़ुर्तीला; ऐसा लगता था कि उसकी भूरी मूँछें बेहद पतली, जैसे बिना नथुनों वाली नाक के नीचे चिपकाई गई हों, तेज़, नीली आँख़ें ध्यान से और सतर्कता से देख रही थीं. उसका चेहरा आम तौर से भूरा था, पुरानी फ़ैशन का था, हो सकता है कि वह लम्बे समय तक जेल में रहा हो और वहाँ – सूख गया हो. उसकी उम्र पच्चीस भी हो सकती थी, और चालीस भी.

“तो, कॉम्रेड्स, अब बेरिकैड्स से दूर नहीं हटना है,”  वह कह रहा था, और सब चुपचाप, उसकी बात बिना काटे सुन रहे थे. “दोनों बेरिकैड्स पर पैंतीस आदमी होने चाहिए, इस वाली पर – बीस. कृपया, अपनी अपनी जगह पर जाइए.”

पाँच लोग बाहर निकल कर नुक्कड की तरफ़ चल पड़े; उसने आवाज़ ऊँची किए बिना पीछे से उनसे कहा: “आज आपको दो और राइफ़ल्स और रिवॉल्वर दी जाएँगी. हो सकता है, कि बम भी दें.”

बेरिकैड के पीछे से चौकीदार निकोलाय बाहर आया.

 “मुझे भी राइफ़ल की ज़रूरत है...”

“देंगे, कॉम्रेड, ज़रूर देंगे!” याकोव खाँसा, उसने अपना गला साफ़ किया और आगे बोला: “सराय की दीवार गिरा दी? ठीक है. कोने वाले मकान की छत पर जाने के लिए सीढ़ी - है? बढ़िया. वहाँ - बम हैं? मतलब – सब ठीक है. कॉम्रेड्स बल्यास्नी और कलीतिन अनुशासन बनाए रखेंगे. तो, हमारी जानकारी के अनुसार सात फ़ौजी दस्ते निकल चुके हैं, सैनिक और सौ ग़ैर प्रशिक्षित. कुल मिलाकर – साढ़े तीन सौ – चार सौ, हो सकता है, ज़्यादा भी हों. ग़ैर प्रशिक्षित करीब डेढ़ सौ हैं. शायद तोपें भी हैं, तीन इंची. मतलब – बहुत नहीं हैं! मगर, बेशक, उनका आकार बढ़ सकता है. रोस्तोव वाले – नहीं आएँगे, ये – पक्की बात है!”

शायद – क्लर्क है’ – सम्गीन ने इन मिलेजुले फ़ौजियों के और दूसरे मुहल्लेवालों के झुण्ड को देखकर सोचा. इन मुहल्लेवालों में थे – मकान मालिक, कम्पाऊण्डर और गठिया का इलाज करने वाला विनोकूरोव, तोते जैसी नाक वाला, ऊँचा बूढ़ा - रिटायर्ड स्टाफ़-कैप्टेन ज़ात्योसोव, कबूतरों के ख़ूबसूरत शिकारखाने का मालिक - बहरा इंजीनियर द्रगूनोव. अचरज की बात ये थी कि रास्ते पर बहुत कम स्टूडेण्ट्स थे और छोटे आदमी भी कम ही थे, जो इसी सड़क के घरों में रहकर टीन के समोवार बनाते, रबड़ के जूते बनाते, साइकिलों की मरम्मत करते और इसी तरह के छोटे-मोटे कामों से रोज़ी-रोटी चलाते थे.

किसकी हिफ़ाज़त कर रहे हैं?’ सम्गीन समझने की कोशिश कर रहा था. हिफ़ाज़त करने वालों लोगों में उसने एक गंभीर चेहरे वाले प्लम्बर को पहचाना, जो कभी कभी वारवरा के यहाँ काम किया करता था, उनमें एक स्टूडेण्ट भी था – शादियाँ करवाने वाली, मकान मालकिन उस्पेन्स्काया का बेटा, और, कम्पाउण्डरनी के भतीजे के अलावा दो और स्टूडेण्ट्स भी थे – जिन्हें वह तब से जानता था जब वे स्कूल में पढ़ते थे. नौजवानों की संख्या ज़्यादा थी, ज़ाहिर है – कारीगर थे, मगर करीब पाँच दाढ़ी वाले भी थे, चौकीदार निकोलाय के अलावा. उनमें से एक दाढ़ी वाले की माथे पर खिसकी टोपी के नीचे से सफ़ेद बाल झाँक रहे थे, और उसके कान – रूई से बंद थे.

सब कृत्रिम था और साथ ही उसी तरह अप्रिय, जैसे ये धुंधला दिन, बदरंग सूरज, चुभती हुई हवा. कृत्रिम लग रही थी लोगों की काफ़ी सेवा कर चुके कचरा-घर की ऊँची और खूब मोटी दीवार. दिवान का फ़टा हुआ पेट ख़ासतौर से आँखों में चुभ रहा था, जिसमें से स्प्रिंग्स और भीतर भरी चीज़ों के टुकड़े बाहर झाँक रहे थे. दिवान की पीठ से फ़र्श साफ़ करने वाले ब्रश का डंडा फिट कर दिया गया था और उस पर लाल झण्डा फ़हरा रहा था. इस सड़क पर रहने वाले सभी – अपनी ज़िंदगी जी चुके लोग थे. ठण्ड से काँपते हुए सम्गीन ने चौकीदार निकोलाय की ओर देखा जो टेलिग्राफ़ के, शायद बेहद ठण्डे तार को नंगे हाथों से घुमा रहा था. उसने सोचा:

ये यहाँ किसलिए है?’

कानों में दबी रूई वाला आदमी उसकी बगल में खड़ा हो गया और आस्तीन से राइफ़ल की नली को पोंछते हुए प्रशंसा के सुर में बोला:

“बड़ा प्यारा दिन है, आज.”

सम्गीन ने उसकी ओर अविश्वास से देखा – क्या ये मज़ाक कर रहा है?”

 “आप क्या इसी सड़क पे रहते हैं?” उसने पूछा.

 “नहीं, मुझे ब्लागूशा स्ट्रीट से यहाँ भेजा गया है,” राइफ़ल पर हाथ फेरते हुए उस आदमी ने जवाब दिया, और गहरी साँस ली: “कारतूस कम हैं हमारे पास.”

“ये बेरिकैड किसकी हिफ़ाज़त करती है?” क्लीम ने पूछा और परेशान हो गया – सवाल इतनी कठोरता और इतनी बेवकूफ़ी से फूटा था, और उस आदमी ने अचरज से उसके चेहरे की ओर देखा और कहा: “मज़दूर लोग क्रांति की हिफ़ाज़त करते हैं, और क्या?”

हाथ हिलाते हुए वह समझाने लगा:

“वहाँ है करेत्नी र्याद स्ट्रीट, और वहाँ, मतलब, वहाँ भी हमारे ही लोग हैं – और हम, याने कि, तीसरी पंक्ति हैं...

“आहा,” सम्गीन ने कहा और दूर हट गया, उसे डर था कि कुछ और अटपटी बात न बोल दे.

उसे अच्छा नहीं लग रहा था, - जिस्म में तकलीफ़ हो रही थी, जैसे बीमार हो गया हो, जैसा कि दो महीने पहले हुआ था, जब डॉक्टर ने बताया था कि एसिडिटीबढ़ गई है.

अति आज्ञाकारी सेवक...ये किसने कहा था: बुद्धिजीवी – इतिहास के ठेले से बंधा हुआ कैदी है’? जगन्नाथ का रथ...सब बकवास है. और बेरिकैड्स भी – बकवास हैं’ – उसने मकारोव की याद को मिटाने की कोशिश की, और चाल भी तेज़ कर दी. मगर इससे कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

दिल से या दिमाग़ से? वह कैसे बात कर रहा था? बेबसी के कारण कल्पना कर रहा था, यही बात है. नालायक आदमी...

मकारोव की यादें वह मन ही मन दुहरा रहा था, मगर उनसे होकर कहीं और ही पहुँच गया:

बेशक, - प्रशंसक. विद्रोह के असली आर्टिस्ट – गाँव में हैं. वे हमेशा से वहाँ थे, - राज़िन, पुगाचोव. और ये कॉम्रेड याकोव, - वो कौन है?’ बेध्यानी में ही सम्गीन तरुमण्डित मार्ग तक पहुँच गया, वहाँ वह रुका और नंगे पेडों को देखने लगा, - वे इतने दयनीय लग रहे थे, जैसे अब कभी भी अपने आप को पत्तों से नहीं ढाँक पाएँगे. घर जाने का मन नहीं हो रहा था. और वैसे भी वारवरा के साथ हुई अपमानजनक नोंकझोंक के बाद वहाँ से फ़ौरन निकल जाना चाहिए था. सम्गीन ने घड़ी पर नज़र डाली और ल्युबाशा का काम करने के लिए गोगिनों के घर की ओर चल पड़ा. उसने अपनी चाल तेज़ कर दी, जिससे कुछ गरमाहट मिले और सोचना न पड़े, जिससे हर चीज़ जल्दी से अपने अंत तक पहुँच जाए. कूमोव की बातें याद आ गईं:

जीवन के प्रति मनुष्य का रवैया अंतराल में उसकी गतिविधियों पर निर्भर करता है. हमारा, पृथ्वी का अंतराल, ऐसी सीमाओं से बंधा है, जो हमारी आत्मा के लिए अपमानजनक हैं, मगर फिर भी, उसमें भी...आगे कूमोव इंगलैण्ड के, रूस के, सिसिली के नॉर्मन्स के बारे में कोई समझ में न आने वाली बात बता रहा था.

तरुमण्डित रास्ते से अर्बात के पास आते हुए सम्गीन ने दाईं ओर, दूर, राइफ़ल चलने की जानी-पहचानी खट्सुनी, उसके बाद – दूसरी. हौले से चल रही गोलियों की आवाज़ ने ज़रा भी आश्चर्यचकित नहीं किया, ज़ाहिर है – अगर बेरिकैड्स बनाए हैं, तो गोलियाँ तो चलानी ही पडेंगी ना. मगर जब उसके सामने चौक आया, तो उसने देखा कि कई पैदल चलने वाले बेतहाशा चारों ओर भाग रहे हैं, गाड़ीवानों के ढाबे के आँगन में छुप रहे हैं, सिर्फ एक ऊँचा बूढ़ा, हाथ में लाठी पकड़े, एक लड़के के कंधे पर हाथ रखे धीरे धीरे और गरिमा से चौक के बीचों बीच अर्बात की दिशा में चल रहा है. बूढ़े की आकृति जैसे जानी-पहचानी थी, - अगर साथ में वो बच्चा और चलने का तरीका ऐसा न होता, तो बिल्कुल चर्च का डीकनलगता, मगर डीकनसिर झुकाए, मुश्किल से चलता था, और इसका सिर सीधा और तना हुआ है, जैसे कोई अंधा आदमी हो.

पोवार्स्काया स्ट्रीट की तरफ़ से किसी की लम्बी अस्पष्ट चीख सुनाई दी, और फ़ौरन चर्च के पीछे से क्लीम के सामने एक मोटी औरत भागते हुए आई; वह घोड़े की तरह सिर को झटका दे रही थी, वह फ़ुफ़कारते हुए बोली:

 “ओह, गॉड, ओह...”

उसके पीछे पीछे काला जैकेट पहने एक आदमी उछल कर बाहर आया, माँ-बहन की गालियाँ देते हुए, उसने पीछे से औरत का स्कार्फ पकड़ कर उसे पीछे खींचा, और गरजते हुए बोला:

“चर्च के पीछे खड़ी रह, बेवकूफ़, शैतान, चर्च पे गोलियाँ नहीं चलाएँगे...”

 “ह-हट जा!” सम्गीन ने एक आहत चीख़ सुनी, वह भी चर्च के कोने की तरफ़ लपका और उसी आदमी और औरत की बगल में दीवार से लगकर खड़ा हो गया.

“ख़ामोश,” अपनी पीठ से औरत को दीवार में दबाते हुए आदमी ने दबी आवाज़ में हुक्म दिया. “आवाज़ नहीं. इंतज़ार करना पड़ेगा कि किधर जाते हैं...एख़, बच गए,” वह और तैश में गालियाँ देने लगा, उसकी आवाज़ से ग़ुस्सा टपक रहा था. सम्गीन ने सावधानी से झाँककर कोने के पीछे देखा; चौक में अभी भी तीन लोग घूम रहे थे, लड़का बूढ़े से छिटक कर अलेक्सान्द्रोव्स्की इन्स्टीट्यूट की तरफ़ दौड़ा, और बूढ़ा, छड़ी को ज़मीन पे गड़ाए एक ही जगह खड़ा था और कुछ कह रहा था, - दाढ़ी थरथरा रही थी. दोनों हाथों में राइफ़ल पकड़े, एक ऊँचा सैनिक पोवार्स्काया स्ट्रीट से बाहर निकला, और उसके पीछे, एक दूसरे से दस-दस कदम की दूरी पर बिखरे हुए, हाथों में बंदूकें पकड़े छोटे सैनिक और करीब दस नागरिक आराम से आगे बढ़ रहे थे; इस टुकड़ी के बीच में पानी के पाइप जितनी मोटी नली की एक तोप थी; उसका पिछला हिस्सा कुछ झुका हुआ था जैसे चौक के पत्थर को सूंघ रहा हो, जिस पर इस तरह बर्फ़ बिखरी थी, जैसे फूस में रखे मुर्गी के अँडे. तोप की बगल में लाल घोड़े पर सवार, खिलौने के सैनिक जैसा, त्सार निकोलाय जैसी छोटी दाढ़ी वाला अफ़सर जा रहा था, उसके पैर इतने सफ़ेद थे, जैसे लम्बे मोज़ों में हों. सफ़ेद दस्ताने वाले हाथ में उसने चाबुक पकड़ रखा था और, काली टोपी के नीचे, सफ़ेद चेहरे के पास ले जाकर सिगरेट का धुँआ छोड़ रहा था. सिर्फ सामने वाले सैनिक को छोड़कर बाकी सैनिक भी खिलौनों की ही तरह प्रतीत हो रहे थे, सब बदरंग थे, कई खेलों से इकट्ठे किए गए ताश के पत्तों जैसे अलग-थलग लग रहे थे.

सम्गीन की पीठ के पीछे, उसे आगे धकेलकर, भर्राई हुई आवाज़ में, औरत चिल्लाई, हौले से डाँटने की आवाज़ आई और एक हल्का सा थप्पड़ सुनाई दिया, मगर सम्गीन मंत्रमुग्ध सा देख रहा था, कि कैसे सामने वाले सैनिक ने और अन्य दो सैनिकों ने कंधों पर बंदूकें रखकर फ़ायरिंग शुरू कर दी. पहले, अपने पैर को ऊपर लहराते हुए, वज़्द्विझेन्का की ओर भागता हुआ आदमी गिरा, उसके पीछे, घुटनों को मोड़कर बूढ़ा भी धड़ाम् से गिरा, और लाठी को पत्थरों पर मारते हुए, हाथ को फ़ुटपाथ पर टिकाए, घिसटने लगा; उसकी रोएँ वाली टोपी गिर गई और सम्गीन ने पहचान लिया – ये डीकन है.                                          

सैनिकों ने आठ बार फ़ायरिंग की; सुनाई दिया कि कैसे एक गोली ने कहीं काँच को तोड़ दिया. बूढ़े की भर्राई हुई चीख़ों पर ध्यान न देते हुए, जैसे उसे देखा ही न हो, सामने वाला सैनिक उसके पास से गुज़रा; उसी तरह उदासीनता से कई और सैनिक गुज़र गए – वे दर्दनाक सुस्ती से चल रहे थे. बूढ़े को अपने पहिए से करीब-करीब दबाते हुए तोप भी निकल गई, सड़े से, गंदे-हरे रंग के,एक छोटे सैनिक ने बंदूक के दस्ते से उसकी पीठ पर ऐसे वार किया, जैसे पत्थर से मार रहा हो; डीकन अजीब तरह से झुका, घुटनों का सहारा लिया, दोनों हाथों से लाठी पकड़ ली और उसे घुमाने लगा; तभी ओवर कोट पहने एक आदमी, जिसकी बेल्ट बंधी थी, उछल कर उसके पास आया और भयानक आवाज़ में चिल्लाया:”आह, कमीने! ये-ए – यही है...”    

वह झुका और डीकन के जिस्म में संगीन घुसेड़ दी, जैसे भट्टी में चिमटा घुसा रहा हो; बूढ़ा गिर पड़ा, लाठी नागरिक के पैरों के पास गिर पड़ी, - वह खड़ा था और खींचकर संगीन बाहर निकाल रहा था. ये सब आश्चर्यजनक फुर्ती से हुआ, मगर सैनिक उसी तरह सुस्ती से चलते रहे, और तोप भी उसी तरह धीरे धीरे चलती रही – असाधारण ख़ामोशी से; ख़ामोशी शायद सैनिकों के कदमों की सुस्त धम्-धम् को, तोप की खड़खड़ाहट को, पत्थरों पर हो रही घोड़ों की नालों की नपी तुली मार को और ज़ख़्मी की हल्की कराहों को समझ नहीं पा रही थी, उसे ग्रहण नहीं कर रही थी. ज़ख़्मी आदमी फ़ेन्सिंग के पास घिसट रहा था, गाडीवानों वाले आँगन के बंद गेट पर मुट्ठी से खटखटा रहा था. सम्गीन ने साफ़-साफ़ सुना कि कैसे सड़े हुए सैनिक ने कहा:

“तुम्हें आता ही नहीं है.”

सम्गीन के पीछे वाला आदमी घुटी हुई आवाज़ में बुदबुदाया:

“ भिखारी को मार डाला, अंधे को, बास्टर्ड्स, - देखो तो!”

औरत गहरी-गहरी साँस ले रही थी:

“ओ, गॉड! चलो, क्राइस्ट की ख़ातिर, इगोर्शा! तोप तो...”

नागरिक ने, संगीन बाहर निकालकर और डीकन को हिलाकर, हथियार को पैर के पास रखा, जेब से एक कपड़ा या दस्ताना निकाला, उसे संगीन पर नीचे से ऊपर फेरा, फिर उस चीथड़े को छुपा दिया, और अपनी पिछाड़ी पर हाथ फेरा. सैनिक ऐसे उछला जैसे रबड का हो, हवा में संगीन उठाई और स्पष्टता से बोला:

 “देख, ऐसे करते हैं – एक, दो! फ़ौरन मार दो, - कैसे मारोगे?”

नागरिक ने टोपी उतारी, चर्च की ओर देखकर सलीब का निशान बनाया, टोपी से दाढ़ी वाला चेहरा पोंछा.

“इस बूढ़े को हम बहुत पहले से जानते हैं, यही तो है,” नागरिक ने बोलना शुरू किया, मगर एकदम कई  गोलियाँ चलीं, सैनिक भागा, नागरिक भी गोलियों की आवाज़ सुनते ही कंधे पर बंदूक लटकाकर भागा. गोली लगने से कहीं लोहा झनझना उठा, कहीं पास ही प्लास्टर बिखर गया.         

“लगता है, ये हम पर चलाई गई हैं?” जैकेट वाले आदमी ने फ़ुसफ़ुसाकर पूछा और कंधे से पकड़कर सम्गीन को अपनी तरफ़ खींचा. “वज़्द्विझेन्का की तरफ़ जा रहे हैं! घूम जाओ, महाशय! फ़ौरन!” औरत को पीठ से धकेलते हुए, उसने दूसरे हाथ से सम्गीन को चर्च के पीछे खींचा, गर्म साँस छोड़ते हुए बोला:

 “आय-आय! किस हद तक गिर गए हैं, आँ?”

“ख़ुदा का शुक्र है, कि तोप गोले नहीं बरसा रही है,” औरत सिसकियाँ लेते हुए बिसूरने लगी.

“भिखारियों पर गोलियाँ चलाते हैं, आँ? दिन दहाड़े? क्या होने वाला है, महाशय?” उस आदमी ने कठोरता से पूछा और और ज़्यादा कठोरता से आगे बोला: “आपको मालूम होना चाहिए! क्या सीखा है आपने?”

 “आप ख़ुद ही जानते हैं – जनता ख़ुश नहीं है,” दाँतों को भींचते हुए सम्गीन ने जवाब दिया, मगर इस जवाब से वह आदमी संतुष्ट नहीं हुआ.

“जनता तो हमेशा ही नाराज़ रहती है, ये – सबको पता है. मगर, जब आज़ादी की घोषणा हुई, मतलब – इकट्ठे हो जाओ, समस्याओं पर विचार करेंगे...जहाँ तक मैं समझता हूँ – सही है?”        

“चल, जाएँगे, इगोर्शा,” औरत ने कहा.

“थोड़ा रुक, बहना, रुक! वो चले गए...”

टोपी निकालकर इगोर्शा ने अपना पसीने से लथपथ, भरा-पूरा, गालों और ठोढ़ी पर लाल, नर्म घुंघराले बालों के गुच्छों से ढँका चेहरा पोंछा – पोंछ कर चष्मे के नीचे से अपनी मिचमिची, साफ़ आँखों से जवाब की आशा में सम्गीन की ओर देखने लगा.

 “व्यभिचार कौन कर रहा है, आँ? पिछले से पिछले साल हमारे यहाँ, साइबेरिया में सैनिक व्यभिचार कर रहे थे, तो, फिर अब?”

चौक की तरफ़ देखते हुए, खुली जगह से डर महसूस करते हुए सम्गीन ख़ामोश रहा. उसके पैर भारी हो गए थे, जैसे धरती में जम गए हों. इगोर्शा धीमी आवाज़ में बोले जा रहा था, मगर वह उत्तेजना से अपने चेहरे के सामने टोपी हिला रहा था:

“इससे - कुछ हासिल होने वाला नहीं है, ये गर्मियों में फ़र कोट...”

कंधा घुमाकर सम्गीन दीवार से दूर हटा और अर्बात की ओर चल पड़ा, दाँत भींचे, नाक से साँस लेते हुए, - वह चल रहा था और सुन रहा था उसके भारी हो चुके पैर ज़रूरत से ज़्यादा आवाज़ कर रहे हैं. पीठ और सीना पसीने से लथपथ थे; उसे महसूस हो रहा था जैसे वह एक ख़ाली बोतल है, - जिसके छोटे से मुँह में हवा जा रही है और गूँज रही है:

 “ओ-ऊ-ऊ...”

डीकन से बीस कदम दूर जाने के बाद उसने चश्मे के नीचे से उसकी ओर देखा, - बूढ़ा, पैरों को मोड़कर, लाल, फ़टे हुए कालीन पर पड़ा था; दूर से कालीन के चीथड़े मोटे, फूले-फूले नज़र आ रहे थे.

इन्सान के भीतर कितना खून है’, सम्गीन ने सोचा, और गोगिनों के फ़्लैट में पहुँचने तक यही एक स्पष्ट विचार उसके दिमाग़ में घूमता रहा.

अलेक्सेइ के कमरे में करीब बीस लोग बैठे और खड़े थे, और सम्गीन ने जो पहले सुनी, वो कुतूज़ोव की आवाज़ थी, खोखली, भर्राई, मगर – ये उसीकी आवाज़ थी. लोगों के सिरों और पीठों के कारण सम्गीन उसे देख नहीं पाया, मगर उसके सामने भारी-भरकम आकृति तैर गई - चौड़ा, ज़िद्दी चेहरा, व्यंग्यात्मक आँखें, बाएँ हाथ की मोटी कोहनी मेज़ पर, और दाएँ हाथ के विश्वासपूर्ण हाव-भाव.

“माफ़ कीजिए, कॉम्रेड,” सम्गीन ने सुना. “ मज़दूरों के आंदोलन की आंशिक विफ़लताओं पर विचार करना अनुचित और अनैतिहासिक है...”

“स्वघोषित लीडरों की आपराधिक ग़लतियाँ!” सम्गीन का काली दाढ़ी वाला, स्थूल पड़ोसी चिल्लाया, जिसकी मुड़ी हुई नाक पर बिना कमानी का चष्मा था.  

“उन्हें इतिहास का सबक समझना ज़्यादा समझदारी होगी...” सम्गीन और उसके सामने वाले लोगों को धकेलते हुए बिना कमानी के चष्मे वाला आदमी आगे जाने का असफ़ल प्रयत्न कर रहा था, मगर उसे कोई जाने ही नहीं दे रहा था, और वह सिरों के ऊपर से चिल्ला रहा था:

 “कितने मज़दूरों को आप मारोगे?”

“पूंजी के ख़िलाफ़ संघर्ष में हर रोज़ जितने मरते हैं, उनसे कम,” फ़ौरन और जैसे लापरवाही से कुतूज़ोव ने जवाब दिया. “ तो, कॉम्रेड्स...”

मगर उसकी आवाज़ को एक ऊँचे, लम्बी गर्दन वाले आदमी की उदास, घनगंभीर आवाज़ ने दबा दिया:

“आपके दोनो गुट सामाजिक आंदोलन को, नेतृत्व को तोड़े डाल रहे हैं; जनता के विद्रोह का नेतृत्व एक ही पार्टी को करना चाहिए, ये – वर्णमाला है! (यहाँ बुनियादी से तात्पर्य है-अनु.) ”            

“जाइए, जाकर बच्चों को ये वर्णमाला सिखाइए,” कुतूज़ोव ने फ़ौरन जवाब दिया.

पयार्कोव की रूखी आवाज़ सुनाई दी:

 “कृपया शांति बनाए रखें, कॉम्रेड्स!”                          

मगर लोग शांत नहीं हुए, और हालाँकि सम्गीन बेहद तनाव में था, मगर फिर भी उसने ग़ौर किया कि हमेशा मीटिंगों में जैसे होता है, उससे ज़्यादा भयानक तरीके से लोग चिल्ला रहे हैं.

 “ज़ाहिर है, उसे यहीं होना चाहिए”, सम्गीन ने सुस्ती से कुतूज़ोव के बारे में सोचा, ये महसूस करते हुए कि उसे अपने विचारों से मुक्ति पा लेना चाहिए, इस बारे में बताना चाहिए कि चौक पर उसने क्या देखा. उसने कोट के बटन खोल दिए, न जाने क्यों चष्मा उतार दिया और, उसे जेब में रखकर, ज़ोर से चिल्लाने लगा:

“अभी अभी अर्बात चौक पर...” उसने इस विश्वास के साथ शुरूआत की, कि देर तक बोलेगा, सबको ख़ामोश रहने पर मजबूर कर देगा और कोई सनसनीखेज़ बात कहेगा, मगर सिर्फ बीस-तीस शब्द ही कह पाया था, कि उसकी आवाज़ ही बंद हो गई, अंतिम शब्द उसने चीत्कार से कहा और तभी उसे पयार्कोव की तैशभरी टिप्पणी सुनाई दी:

“कृपया, अपनी चिल्लाचोट बंद कीजिए! यहाँ, भाड़ में जाए, उस डीकन का क्या काम है? यहाँ कोई शोकसभा नहीं हो रही है. शांति बनाए रखें!”    

क्लीम को लगा जैसे उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा रहा है, पैर मुड़ रहे हैं. इसके बाद उसने अपने आप को एक छोटे से कमरे के कोने में पाया, - उसके सामने खड़ा था गोगिन, एक हाथ में गिलास पकड़े, और दूसरे हाथ से उसके चेहरे पर खूब ठण्डा और गीला तौलिया रखते हुए:

“ये आपको क्या हो गया है? आपकी नाक से खून आ रहा है. प्लीज़, पी लीजिए...आप किस डीकन के बारे में चिल्ला रहे थे?”

बर्फ़ीले पानी ने, जिसमें कोई खट्टी चीज़ मिलाई गई थी, क्लीम को ताज़गी प्रदान कर दी, थोड़े से शब्दों में उसने अलेक्सेइ को याद दिला दिया कि डीकन कौन था.

“आहा, याद है, बूढ़ा किसान, हाँ-हाँ! मार डाला? हुम्...कोई अफ़सोस नहीं करेगा. कल सिस्टर को पकड़ लिया – खूब पीटा.” गोगिन जल्दी जल्दी, बेध्यानी से कह रहा था, मगर अचानक गुस्से से आगे बोला: “और – काम की बात, अपनी बहादुरी की शेखी न बघार, बेवकूफ़ी न कर!”

दिवान पर बैठकर वह फिर से जल्दी-जल्दी और कामकाजी अंदाज़ में कहने लगा:

“ तो, कैसे हैं आप? तबियत कुछ संभली? घर जाओगे? तो सुनिए, वहाँ, आपके इलाके में बेरिकैड्स हैं और उनके पास होगा कॉम्रेड याकोव, ऐसा...” गोगिन ने चुटकी बजाई, चेहरे को सिकोड़ा.

कहना मुश्किल है, कि कैसा है, हाँ, आप ढूँढ़ लेंगे उसे. तो, उसे ये चिट्ठी दे दीजिए. आप इसे सिगरेट-होल्डर में छुपा लीजिए, और सिगरेट को पी चुकने के बाद बुझा दीजिए. अगर कोई ऐसी-वैसी बात हो जाए, - मतलब, आपको पकड़ लिया जाए तो आप सिगरेट-होल्डर को काटकर चबा जाइए. ठीक है? चिट्ठी अनजान लोगों के हाथ में नहीं पड़ना चाहिए, - समझ गए? ठीक है! आपको कामयाबी मिले!”

सम्गीन से हाथ मिलाकर वह ग़ायब हो गया.

सम्गीन बाहर ड्योढ़ी में आया, इधर उधर देखा, आहट ली, - चारों ओर सब सुनसान और ख़ामोश था, सिर्फ कहीं, किसी आँगन में लकड़ियाँ काट रहे थे. दिन गरमा रहा था, आसमान में लाल बादलों के पट्टे फैले हुए थे, जैसे क्षितिज से आकाश के उच्चतम बिंदु तक विशाल लाल सीढ़ी जा रही हो. इससे मनुष्यहीन चौक और डीकन की याद आ गई, जिसके चारों ओर फुटपाथ पर खून के लाल चीथड़े फ़ैले थे.

सम्गीन सावधानी से जा रहा था, जैसे बसंत में नदी पर जमी बर्फ की पतली सतह पर चलते हैं, कनखियों से बंद दरवाज़ों, गेट्स, छोटे-छोटे गूंगे हो गए चर्चों की ओर देख लेता था. मॉस्को बेहद ख़ामोश हो गया था, रास्ते और गलियाँ छोटी हो गई थीं.

छोटी, क्योंकि मैं जल्दी-जल्दी चल रहा हूँ’, उसने अंदाज़ लगाया. दिमाग़ में ये ख़याल आया कि शहर में दस लाख से ज़्यादा लोग रहते हैं, उनमें से – छह लाख मर्द हैं, कई सैनिक टुकड़ियाँ हैं, और मज़दूर, शायद, एक लाख से भी कम हैं, उनमें से, कहते हैं कि पाँच सौ के करीब लोगों के पास हथियार हैं. और ये पाँच सौ लोग पूरे शहर को दहशत में रखे हुए हैं. ये सोचकर अफ़सोस हो रहा था कि क्लीम सम्गीन, एक ऐसा आदमी, जिसे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है, जिसने किसीका कुछ भी बुरा नहीं किया है, सड़क पर तेज़ी से जा रहा है और जानता है कि वे उसकी जान ले सकते हैं. किसी भी पल. बिना सज़ा पाए...                   

श्रमिकों ने काम बंद कर दिया, और – ज़िंदगी ठहर गई. हाँ, श्रमिकों की ताकत ही गतिमान जीवन की शक्ति है...पीटरबुर्ग में हड़ताली कर्मचारियों के बदले कुछ स्टूडेण्ट्स और अन्य लोग पोस्टऑफ़िस में काम कर रहे हैं...  

इन विचारों ने सम्गीन को सरकारी शासन की नपुंसकता की भयानक वास्तविकता, एवम् अपनी व्यक्तिगत असुरक्षितता का दर्दभरा अहसास करा दिया. 

सरकार की नपुंसकता इस बात में निहित है, कि वो व्यक्ति का मतलब नहीं समझती...

ये सम्गीन के विचारों के बवण्डर से निकला निष्कर्ष नहीं था, बल्कि अपने आप कहीं से आया हुआ ख़याल था, और इसने उसकी मनोदशा को नहीं बदला. वह और तेज़ चलने लगा, जिससे कि शाम से पहले पहुँच सके.

अभी इस याकोव से मिलता हूँ...मैं अपनी मर्ज़ी से, आज़ादी से, बिना कुछ पाने की उम्मीद से क्रांति में हिस्सा ले रहा हूँ, न कि एक पॉलिटीशियन की तरह. मुझे मालूम है कि गिदोन का ज़माना बीत चुका है और तीन सौ सैनिक पूंजीवाद के जेरिको को नहीं ख़त्म कर सकते (संदर्भ पवित्र बाइबिल से लिया गया है – अनु.)  

बाइबल के उदाहरण ने एक बार फिर अब्राहम के बलिदान की याद दिला दी.

हाँ, - वाकई में: श्रमिक वर्ग – इसहाक है, जिसकी बलि चढ़ाई जाती है. इसीलिए मैं उन लोगों के साथ नहीं खड़ा हो सकता, जो बलि चढ़ाते हैं’.

उसे ऐसा लगा, जैसे उसने आख़िरकार अपने आचरण को स्पष्ट कर दिया है, और उसे अफ़सोस हुआ कि ये विचार उसके दिमाग़ में सुबह क्यों नहीं आया, जब मकारोव मौजूद था.

नहीं, मैं अति आज्ञाकारी सेवक नहीं हूँ!

अपनी गली में घुसते ही उसे ऐसा लगा, जैसे घर पहुँच गया हो, वह और ज़्यादा ख़ामोशी से चलने लगा, जल्दी ही उसके सामने दाँतों में सिगरेट दबाए, हाथों में रिवॉल्वर पकड़े एक आदमी प्रकट हुआ.

 “ये - मैं हूँ, सम्गीन.”

आदमी चुपचाप एक ओर हट गया और मुँह में उँगलियाँ रखकर उसने दो बार ज़ोर से सीटी बजाई. बेरिकैड के ऊपर हवा लालिमा लिए थी और ऐसे बह रही थी, जैसे मरीचिका हो, - धुँए की गंध नथुनों को गुदगुदा रही थी. बेरिकैड के उस ओर, एक छोटे से अलाव के सामने संदूक पर कॉम्रेड याकोव बैठा था और बेहद स्पष्ट आवाज़ में बोल रहा था:

“मतलब, हमारे सामने ये प्रमुख लक्ष्य हैं: पहला - एकतंत्र को नष्ट करना! दूसरा – जेलों से और निर्वासन से सभी कॉम्रेड्स को आज़ाद करना! तीसरा - हमारी अपनी श्रमिकों की सरकार का गठन करना! गिनते हुए वह हथेली को संदूक पर मार रहा था, और ऊनी जूतों वाले पैर से बर्फ़ पर धमधम कर रहा था, ये आवाज़ें पतवार के काम की याद दिला रही थीं – चप्पुओं वाले आँकडे पर उसकी खट्-खट् और पानी की हल्की सी छपछपाहट. करीब सात लोग याकोव को सुन रहे थे, उनमें – दो स्टूडेण्ट्स, लाव्रूश्का और मोटे चेहरे वाला वास्या भी थे – वास्या भँवें चढ़ाए, आँखें सिकोड़े और निचला होंठ लटकाए सुन रहा था, जिससे उसके भिंचे हुए दाँत नज़र आ रहे थे.

“तो, त्सार के ख़िलाफ़ हम – अकेले नहीं, बल्कि सबके साथ हैं, मगर आगे – अकेले और बाकी सब – हमारे ख़िलाफ़ हैं.”

“क्यों?”

सम्गीन अलाव की रोशनी में आया, उसे सिगरेट थमाई.

अंदर – चिट्ठी है.”

याकोव बड़ी देर तक सावधानी से सिगरेट होल्डर, और फिर चिट्ठी को घुमाता रहा; अलाव की तरफ़ झुककर काफ़ी देर तक उसे पढ़ता रहा, फिर कागज़ को आग में फेंककर बोला:

 “तो, ऐसी बात है.”

गरम हवा में हाथ रखकर और उन्हें मलते हुए, हालाँकि वे ठण्ड से जम नहीं गए थे, सम्गीन ने पूछा:

“क्या आपको डर नहीं लगता कि आग को देखकर फ़ायरिंग शुरू हो जाएगी?”

 “रात को – नहीं घुसेंगे,” याकोव ने विश्वास से कहा. “उन्हें रात को लड़ने की इजाज़त नहीं है,” उसने आगे कहा, और उसकी नर्म आवाज़ में मज़ाक का पुट था.

लाव्रूश्का बीच में कूद पड़ा, - उसने गर्व से कहा:

“आज उन्हें कलान्चेव्स्काया स्ट्रीट पर कुत्तों की तरह खदेड़ दिया...”

बेरिकैड के किनारे पर बैठकर सम्गीन वो सब बताने लगा, डीकन के बारे में, जो उसने देखा, दुनाएव के नाम का भी ज़िक्र किया.

 “दुनाएव?” याकोव ने ज़िंदादिली से पूछा. “कैसा दिखता है वो?”

और क्लीम का वर्णन सुनकर मुस्कुराते हुए उसने सिर हिलाया:

 “वही है! वो हमारे चीता में काम करता था.

अगर वे सब एक दूसरे को जानते हैं, तो उनकी संख्या ज़्यादा नहीं है’, सम्गीन ने ग़ौर किया.

फिर से दो बार हल्की सी सीटी बजी.

 “अपने ही हैं,” लाव्रूश्का ने कहा.

 दो लोग प्रकट हुए: एक ने हैट पहनी थी, – उसका नाम था कलीतिन, और उसके साथ वाला कोई मुच्छड़ था, फ़र का जैकेट और शिकारियों वाले जूते पहने; उसने आपराधिक भाव से हौले से कहा:

“चला गया.”

“ऐह,” याकोव ने गहरी साँस ली और आग में थूककर, लाव्रूश्का से कहा. “मतलब, ऐसा है: कल तू उससे कहेगा कि खुली जगह पे बात करने से डरता है, - डरता है, हम देखेंगे, - ठीक है?”

“मुझे मालूम है.”

और उसे ड्यूटी-कैबिन में बुलाना. और आप, कॉम्रेड बुर्दुन्दुकोव और मीशा, वहाँ मौजूद रहियेगा. ठीक है, मैं – राऊण्ड लगाता हूँ. पन्फ़ीलोव और त्रेपाचेव - मेरे साथ. रिवॉल्वर ले लेना, राइफ़ल की ज़रूरत नहीं है!”

स्टूडेण्ट पन्फ़ीलोव ने कलीतिन को राइफ़ल दे दी, - उसने उसे लेते हुए कहा:

“राइफ़ल, मज़दूर की छड़ी है!”

सम्गीन घर की ओर चल पड़ा, खूब भूख लगी थी, भूख से पेट में दर्द होने लगा था. किचन में मेज़ पर एक सस्ता, टीन का लैम्प जल रहा था, मेज़ पे ठठेरा बैठा था, उसके सामने – रसोइया, फ़र्श पे भट्टी के पास कोई सो रहा था, अन्फ़ीमेव्ना के कमरे से दो-तीन दबी-दबी आवाज़ें आ रही थीं. ठठेरा, जल्दी-जल्दी, गुस्से में, मेज़ पर हाथ नचाते हुए बोल रहा था:

“ मेरे पास भूसा भरा शेर है, मेडल है, वो भी जॉर्ज-मेडल, और मैं...”

 “बेवकूफ़,” दबी ज़ुबान से रसोइए ने कहा. आम तौर से वो, नशे में भी, सम्गीन को देखकर आदर से झुक कर अभिवादन करता था, मगर इस बार – हिला तक नहीं, सिर्फ अपनी सफ़ेद, बेतहाशा फ़टी आँखें उस पर जमा दीं.

लम्बे-चौड़े किचन को बुरी तरह से आलोकित करते हुए, लैम्प चीज़ों को विकृत कर रहा था: अलमारी में रखे तांबे के बर्तन हथियारों जैसे लग रहे थे, और सफ़ेद भट्टी – जैसे किसी कब्र पर बना स्मारक हो. रोशनी के मटमैले बुलबुले में बूढ़े इस तरह बैठे थे, कि उन्हें सिर्फ मेज़ का कोना ही अलग कर रहा था. ठठेरे के नाखून हरे लग रहे थे, बल्कि वह पूरा का पूरा ही कॉपर-ऑक्साइड से लबालब भरा प्रतीत हो रहा था. रसोइया, जिसने ठोढ़ी तक बंद किए बटन्स का ओवरकोट पहना था, सीधा और तन कर बैठा था, जैसे बूढ़े नहीं बैठते हैं; घुटने पर टोपी रखकर वह उसे एक हाथ से दबा रहा था, और दूसरे हाथ से अपनी विरल मूँछों पर ताव दे रहा था.

 “देखो, कॉम्रेड सम्गीन, मैं जूडा से बहस कर रहा हूँ,” मेज़ पर हथेलियाँ थपथपाते हुए ठठेरे ने कहा.

 “तू ख़ुद ही – जूडा और कुत्ता है”, रसोइए ने जवाब दिया और सम्गीन से मुख़ातिब हुआ. “उस बेवकूफ़ बुढ़िया से कहिए कि मेरा हिसाब कर दे.”

अपने पैरों पर उछलकर, दाँतों के काले अवशेष दिखाते हुए ठठेरा चीख़ा:

“तुझे तो गोली मार देनी चाहिए – यही है तेरा हिसाब! आप समझ रहे हैं – वह सम्गीन की ओर उछला, - “ हत्यारा रक्षा कर रहा है – त्सार की! जैसे कि इसे हक है – गला घोंटने का, आँ?”

“अधिकार है,” रसोइए ने कहा, उसकी आँख़ें और ज़्यादा बाहर निकल आईं, ठोढ़ी थरथराने लगी.

 “मैं सैनिक हूँ! समझ रहा है?” अपने सीने पर घूँसे मारते हुए, मानो वह कोई तख़्ता हो, ठठेरा बदहवासी से चीख़ा, और तैश में आगे बोला, “उसकी दो बार सेवा की – नॉन-कमिशण्ड – क्या? तो मैं उसे...मैं उसे...”

 दफ़ा हो जा!” रसोइया भर्राई हुई आवाज़ में चिल्लाया और टोपी को फ़र्श पर फेंककर उसे पैर से रौंदने लगा.

बूढ़ों का निरीक्षण करते हुए सम्गीन ख़ामोश रहा. वह इस दृश्य की कॉमेडी को अच्छी तरह समझ रहा था, मगर देख रहा था, और कुछ और भी महसूस कर रहा था, जो उसे बोझिल कर रहा था. बूढ़े एक ही ऊँचाई के थे, दोनों – सूखे-सट् थे, कई सालों की मेहनत से निचुड़ गए थे. ठठेरा ऐसी घरघराहट से साँस ले रहा था, जैसे उसकी पूरी चमड़ी ही चरमरा रही हो. रसोइए का छोटा, हमेशा लाल रहने वाला चेहरा काले, मिट्टी के रंग में रंग गया था – कंपकंपाहट उसे विकृत किए दे रही थी, आँखें पागलपन से देख रही थीं, और ठठेरे की सिकोड़ी हुई आँखें नफ़रत बरसा रही थीं; वह रसोइए के सामने खड़ा था, सीने पे मुट्ठी चिपकाए, और, ऐसा लग रहा था, कि रसोइए को मारने ही वाला है. 

सम्गीन उनके बीच में खड़ा हो गया, और जितना संभव था, उतने प्रभावशाली ढंग से बोला;

“ कृपया, अपनी बहस बंद कीजिए. ईगोर, आपका हिसाब कर दिया जाएगा. आज ही. अन्फ़ीमेव्ना कहाँ है?

रसोइए मुड़ गया, वह बैठा, और फ़र्श से टोपी उठाई, उसे घुटने पर झटका और पहन लिया. ठठेरे ने खिन्नता से जवाब दिया:

“अन्फ़ीमेव्ना स्लेज में सामान ले गई है मालकिन के लिए. आपके लिए समोवार तैयार है. और – खाना भी.”

“शुक्रिया,” सम्गीन ने कहा. “मगर – कृपया शोर न करें!”

 “ठीक है,” ठठेरे ने थकी हुई आवाज़ में वादा किया.

बच्चे हो गए हैं,’ डाइनिंग रूम में घुसते हुए सम्गीन ने परिभाषा कर डाली, परिभाषा भी कर डाली और माथे पर बल भी डाल लिए, - बूढ़ों की बहस के लिए ये हल्के-फुल्के शब्द काफ़ी नहीं हैं.        

ल्युबाशा, बेशक, कहती: देखो कितना गहरा...वगैरह. इसी तरह का कुछ-कुछ, गहराई के बारे में...

वह कमरे के बीच में खड़ा था, देख रहा था समोवार से भरभराकर निकलती भाप को जो बर्नर पर रखी केतली को अपने आग़ोश में ले रही थी, लैम्प की निश्चल लौ को, इकलौते गिलास और दो तश्तरियों को, जो नैप्किन से ढँकी थीं, - खड़ा था, आज की घटनाओं और लोगों के बारे में सोचते हुए और अपनी तर्क बुद्धि से किसी समाधान की, किसी विश्लेषण की उम्मीद करते हुए. आज के अनुभव को किसी भी तरह के शब्द समूह में रखना नितान्त कठिन था. बेहद भूख लगी थी, मगर अपनी जगह से हिलने को जी नहीं चाह रहा था. किचन में ठठेरे की कल-कल करती आवाज़ आई, फिर हल्के कदमों की आहट सुनाई दी, और दरवाज़े में खड़े होकर ठठेरे ने कहा:

“आप, कॉम्रेड सम्गीन, उसकी बात पे ध्यान न दीजिए. वो जाएगा कहाँ? ऐसे वक्त में – कहाँ खाना बनवाते हैं? पकाने को – कुछ है ही नहीं. बेशक, ये झक्की और – ईडियट भी है, मगर, फिर भी – मज़दूर आदमी है...”

“क्या उसने आपसे कहा है, मुझे बताने के लिए?” बूढ़े के कुचले हुए जूतों की ओर देखते हुए सम्गीन ने हौले से पूछा.

उसने?” ठठेरा उपहास से चहका. “वो- कहेगा, ऐसा....हरामी! वो – टूट जाएगा, मगर नहीं झुकेगा. कित्ती देर से मैं उसके साथ सिर फ़ोड़ रहा हूँ! नहीं, ये – ताँबा है, उसे नहीं चबा पाओगे!”

 “ठीक है,” सम्गीन ने कहा, ये महसूस करते हुए कि बूढ़ा और भी काफ़ी देर तक अपने दुश्मन की ज़िद्दी कठोरता का वर्णन करता रहेगा. ठठेरे के जूते, फ़र्श पर घिसटते हुए ग़ायब हो गए, सम्गीन ने सावधानी से सिर उठाया, उसकी झुकी हुई पीठ की ओर देखा. फिर उसने ठण्डा, बेस्वाद बीफ़ खाया, उबली कड़वी चाय पी और इतिहासकार पिमेन के शब्दों को याद करने की कोशिश करने लगा: “यूँ ही नहीं... ख़ुदा ने मुझे गवाह बनाया है” – और याद न कर सका: गवाह किसका? क्या कहा था? सुस्ती के कारण स्टडी रूम में जाकर किताब लाने का मन नहीं हो रहा था, थकान, गर्मी और असाधारण ख़ामोशी के कारण आई सुस्ती शरीर के हर कण में समा गई थी और आज उसकी सुनने की ताकत को और स्वाद को भी अपनी गिरफ़्त में ले लिया था – कसैलापन, कड़वापन महसूस हो रहा था. वह बड़ी देर तक इस ख़ामोशी में बैठा रहा, निश्चल बैठा रहा, इस डर से कि दिमाग़ की ऊँघ को न डरा दे, सावधानी से ग़ौर कर रहा था कि कैसे इस ख़ामोशी में दिन भर के सारे अनुभव समाते जा रहे हैं; वह हौले-हौले दिन को ढाँक रही थी, जैसे बर्फ़ जुती हुई धरती को, ऊबड़-खाबड़ रास्ते को ढाँक लेती है. मगर दो अधपगले बूढ़े उसके काम में बाधा डाल रहे थे. सम्गीन ने लैम्प उठाया, बेडरूम में गया और कपड़े उतारते हुए सोचने लगा कि वह कुँआरी ज़िंदगी के लिए ही बना है, और वारवरा से उसका संबंध – एक ग़लती थी, अत्यंत अप्रिय घटना थी.                           

बहुत मुमकिन है, कि अगर ये न होता – तो मैं साहित्यकार बन जाता. मैं बहुत कुछ देखता हूँ, मेरी निरीक्षण शक्ति बेहद बढ़िया है, मगर – शब्दों में ठीक तरह से प्रकट नहीं कर पाता, मेरा शब्द भण्डार बहुत कम है. ये किसने कहा था: जंगली लोग और कलाकार बिंबों के माध्यम से सोचते हैं? जैसे, इन बूढ़ों का वर्णन करना चाहिए...

बूढ़े परेशान किए जा रहे थे. सम्गीन स्टडी रूम में गया, अंदाज़ से किताब निकाली, वापस आया, लेट गया. पता चला कि उसने ग़लती कर दी थी, किताब – पूश्किन की नहीं थी, बल्कि नेपोलियन का इतिहासथी. वह होरेस वेर्न के चित्र देखने लगा, मगर आँखों के सामने दो झगड़ते हुए बूढ़े खड़े हो गए.

तीव्र भावनाओं के प्रति मेरी अयोग्यता – नैसर्गिक है, ये – सभ्य, सुसंस्कृत व्यक्ति का लक्षण है’, सम्गीन ने किसी से प्रतिवाद किया, उसने किताब को वारवरा के बिस्तर पर फेंक दिया और लैम्प बुझाकर सिर को कम्बल में छुपा लिया.

गोलियाँ चलने की झटके देती हुई आवाज़ ने उसकी नींद खोल दी, गोलियाँ इतनी पास चल रही थीं, कि हर फ़ायर के साथ खिड़की के काँच भयानक, दर्द भरी थरथराहट से गूँज उठते, और ये थरथराहट सम्गीन की पीठ की चमड़ी में, पैरों में फ़ैल जाती. वह उछला, पतलून पकड़ी, बर्फ़ीली खिड़की के पास गया, - सड़क पर सुबह के सूरज की तिरछी किरणों में कुछ भूरी आकृतियाँ उछल रही थीं.

खिड़की के पल्ले बंद करना भूल गए’, सम्गीन ने क्षोभ से ग़ौर किया. डरी हुई पतलून में एक पैर घुसाने की कोशिश में वह भी दूसरे पैर पर उछलने लगा, पतलून हाथों से छूटी जा रही थी, और खिड़की के पीछे क्लिक करने की, कड़कड़ाने की आवाज़ें आ रही थीं. खिड़की पर जमी हुई बर्फ़ से दिखाई दे रहा था कि कि फुटपाथ पर बंदूकें ताने चार लोग लेटे हैं, बड़े सितारों जैसे; उनके पीछे एक आदमी गोली चला रहा था, घुटने पर बंदूक रख कर, पाँचवाँ, और हर फ़ायर के बाद बंदूक की संगीनें उछल जातीं, जैसे हवा को सूंघ रही हों और देख रही हों कि गोली कहाँ जा रही है. एक पैर पतलून में डाले सम्गीन पलंग के पास उछला, साइड-टेबल से पिस्तौल निकाली, मगर, उसे बिस्तर पर फेंक कर पतलून, जूते, जैकेट पहने और दुबारा खिड़की की तरफ़ भागा; जो सैनिक घुटने के बल फ़ायर कर रहा था, वो फुटपाथ के किनारे पर लुढ़क रहा था, वो जो उसके आगे था, - ग़ायब हो गया, और बाकी तीन अभी तक लेटे हुए गोलियाँ चला रहे थे. सम्गीन ने अच्छी तरह सुना, कि बेरिकैड के दाईं ओर के मुकाबले में बाईं तरफ़ ज़्यादा और ज़ोरदार फ़ायरिंग हो रही है.                 

बेशक, सबको चुन-चुनकर मार डालेंगे!  

रिवॉल्वर उठाकर वह बाहरी हॉल में भागा, जूतों में पैर घुसाए, ओवरकोट पहना और, उछलकर किचन की ड्योढ़ी में गया, ठहर गया.

छुप रहे हैं...भाग रहे हैं...

कलीतिन, पन्फ़ीलोव और तीन और आदमी एक के पीछे एक, एक दूसरे को धकेलते हुए, एक दूसरे से आगे निकलते हुए आँगन से होते हुए शेड में भागे; बड़े फ़ाटक के छोटे दरवाज़े के पास, झिरी से बाहर सड़क पर देखते हुए चौकीदार निकोलाय हाथों में लोहे का डंडा लिए खड़ा था, और आँगन के बीच में – अन्फ़ीमेव्ना रंगबिरंगे आसमान में सलीब का निशान बना रही थी.

“क्या?” निकोलाय के पास भागकर पहुँचे सम्गीन ने हौले से पूछा.

 “अब...पीछे से आ रहे हैं,” निकोलाय ने फुसफुसाहट से जवाब दिया.

यहाँ, खुले में, गोलियों की आवाज़ ज़ोर से आ रही थी, और हर आवाज़ के बाद सिर झटकने को जी चाहता था, जिससे कि कानों से सूखी, कर्कश आवाज़ बाहर निकाल दें. उड़ती हुई गोलियों की दर्दभरी चीत्कार भी सुनाई दे रही थी. सम्गीन ने पीछे देखा – शेड के दरवाज़े खुले थे, उसकी पीछे वाली दीवार गिरा दी गई थी; चौड़े छेद के सामने आसमान की नीली पृष्ठभूमि में एक नंगा पेड खड़ा था, - शेड के भीतर कोई नहीं था.          

“ये—“ चौकीदार दबी आवाज़ में चिल्लाया और, गेट खोलकर, सड़क पर उछला,- वहाँ, पास ही में, अलग-अलग आवाज़ों में लोग चिल्ला रहे थे:

“हु-र्रे-ए-ए!”

सम्गीन भी सड़क पर फिंक गया, जैसे रस्सी से चौकीदार के साथ बंधा हुआ हो. उसने देखा कि कैसे निकोलाय ने लोहे के डंडे को घुमाया और उसे सबसे पास वाले सैनिक के पैरों के नीचे फेंका, उसके पास खड़ा हो गया और बंदूक पकड़ कर गरजा:

“दे, कुतिया के पिल्ले!”

सम्गीन को लगा, जैसे निकोलाय ने सैनिक को ज़मीन से उठाया और बंदूक से हिलाया, और जब उसकी ओर सैनिक की पीठ हो गई, तो उसने बंदूक के हत्थे से मारकर, उसे फिर से सीधा किया, और चिल्लाते हुए कहा:

“गोलियाँ दे दे!”

सैनिक मुँह के बल गिर गया, एक करवट ली और बदहवासी से अपना पेट सहलाने लगा.

सामने, गेट के पास वैसा ही छोटा, हरा सा सैनिक तिरछा खड़ा था, वह संगीन को हवा में घुमा रहा था, बंदूक का घोड़ा खट्खट् कर रहा था, मगर उसकी बंदूक गोलियाँ नहीं बरसा रही थी. निकोलाय, छड़ी की तरह बंदूक घुमाते हुए उसकी ओर दौड़ा; सैनिक ने बायाँ पैर बाहर निकाला, बंदूक तानी, और भी छोटा हो गया, और चिल्लाया:

 “भाग जा!”

गालियाँ देते हुए निकोलाय ने उसके हाथों से बंदूक छीन ली, उसे पकड़ा, और दोनों बंदूकों को ऊपर उठाकर दहाड़ा:

“ मेरे पास भी है! गोलियाँ दे!”

सैनिक का मुँह खुला रह गया, वो धीरे धीरे ज़मीन पर रेंगते हुए गेट की तरफ़ गया, बैठ गया, और ओवरकोट की आस्तीन में चेहरा छुपाकर, वह भी अपने पेट पर हाथ फेरने लगा. निकोलाय ने उसे ठोकर मारी और बेरिकैड की तरफ़ आया, जिसके पीछे से लोग उछल-उछल कर बाहर आए और उसका स्वागत करने लगे, सबसे आगे था लाव्रूश्का, वह चिल्ला रहा था:

“कारतूस ले ले!”  

 सम्गीन ने देखा कि कैसे वह गेट के पास बैठे सैनिक के पास उछला, उससे चिल्लाकर कुछ कहा, सैनिक ने उसकी टाँग पकड़ कर खींची, - लाव्रूश्का उसके ऊपर गिर पड़ा, मगर सैनिक फ़ौरन ऊपर नज़र आया; लाव्रूश्का बदहवासी से चीखा;

 “अंकल मिकोल...”

एक बंदूक ज़मीन पर फेंक कर, चौकीदार छलांग लगाते हुए उसकी ओर लपका. सम्गीन ने आँखें बंद कर लीं...

फ़ायरिंग कब बंद हुई ये उसने सुना नहीं – दिमाग़ में अभी भी सूखी, ग़ूस्से भरी खट्खट् गूंज रही थी, मगर वह समझ गया कि सब ख़त्म हो गया है. बैरिकेड के रक्षक गली से और सड़क से उसकी तरफ़ दौड़े चले आ रहे थे, बेहद शोर-गुल का और प्रसन्नता का वातावरण था, सब एक साथ बोल रहे थे.

“बुरा नहीं रहा, कॉम्रेड्स!”

 “धीरे धीरे सीख रहे हैं...”

“याकोव का अनुमान सही था!”

स्टूडेण्ट पन्फ़ीलोव और ठठेरा सैनिक को आँगन में लाए, वो सिसक रहा था, ठठेरे ने ग़ुस्से से उससे कहा:   

“ये, भाई, तेरे लिए – सबक है! जहाँ ज़रूरत न हो, वहाँ मत घुसो!”

गेट के पास वाला सैनिक पीठ के बल लेटा था, सिर को एक ओर मोड़कर, खून के पोखर में, - उसमें से हल्की भाप निकल रही थी. लंगड़ाते हुए, तिरछे होते हुए, घुटना मलते हुए, बेरिकैड के पीछे से याकोव बाहर निकला और तीक्ष्ण आवाज़ में चीख़ा:

 “कृपया शांत हो जाइए, कॉम्रेड्स! सैनिक को और वास्या को बाग में ले जाइए! जल्दी...”

चौकीदार ऐसे हँसा जैसे शराबी हो; क्लीम ने उसे कभी भी हँसते हुए नहीं सुना था, और कभी भी किसी मर्द की ऐसी उन्मादपूर्ण हँसी नहीं सुनी थी.

“दो बंदूकें छीन लीं,” वह चीख़ा, “ सफ़ाई से, भाइयों, आँ?”

वह सबसे चिपक रहा था, कभी – भाइयों, कभी – कॉम्रेड्स कहकर शेखी मार रहा था.

जैसे पूछ रहा हो: क्या भाइयों कहे, या कॉम्रेड्स कहे?’

चौकीदार के आचरण ने सम्गीन को विशेष रूप से अचरज में डाल दिया: हर शनिवार को और इतवार को ये आदमी चर्च जाया करता था, और अब ख़ुश हो रहा है, कि बगैर सज़ा के डर से वह किसी को मार सका है. निकोलाय की तारीफ़ हो रही थी, उसके कंधे पर थपथपाहट हो रही थी, - वह बहक रहा था और चीख रहा था:

 “अगर मैं न होता – तो छोकरा ख़तम हो जाता!”             

 मुहल्ले के लोग सावधानी से अपने-अपने गेट से झाँक रहे थे, उनमें से कुछ लोग बेरिकैड के रक्षकों से बातें कर रहे थे, - ये सम्गीन पहली बार देख रहा था, और उसे ऐसा लगा कि वे वैसी ही अस्पष्ट सी, सकुचाती सी ख़ुशी से मुस्कुरा रहे हैं, जो उसे भी उत्तेजित कर रही है, सहला रही है.

याकोव उसकी बगल में आकर खड़ा हो गया, उसके हाथों से पिस्तौल निकाल ली, उसे चेहरे के पास लाया, जैसे सूँघ रहा हो, और बोला:

 “इसे खोलकर केरोसिन से साफ़ करना चाहिए. इसे – नमी में रखा गया था.”

उसने रिवॉल्वर को सम्गीन के ओवरकोट की जेब में डाल दिया और अपनी मूँछों पर ताव देते, कॉम्रेड्स की ओर नज़र डालकर ख़ामोश हो गया.

 “क्या आप – घायल हो गए हैं?”      

 “घुटने पे चोट लगी है,” याकोव ने जवाब दिया और हँसते हुए, लाव्रूश्का का कंधा पकड़ लिया. “ज़िंदा है, शैतान बिल्ला? मगर – मैं तेरे कान उखाड़ लूँगा, जिससे तू मेरी बात सुने...”

 “कॉम्रेड याकोव!” लाव्रूश्का ने प्रार्थना करते हुए कहा, “मुझे भी बंदूक दीजिए ना, निकोलाय के पास तो  दो-दो हैं! मुझे सीखना चाहिए. मैं – लोगों पे नहीं, बल्कि गली के स्ट्रीट-लैम्प्स पे, प्रैक्टिस करूँगा, शाम को, जब अँधेरा हो जाएगा.”

याकोव ने, चुपचाप उसकी टोपी आँख़ों तक खींची, उसे धकेला और सख़्ती से चिल्लाया:

“ कॉम्रेड्स – शांत हो जाइए! अभी से डान्स करना – जल्दबाज़ी होगी! अपनी अपनी जगह पे जाइए!”

सम्गीन के सामने से मरे हुए सैनिक को आँगन में ले गए, - उसके हाथों को कानों में रूई लगाए आदमी ने पकड़ा था, पैरों को – स्टूडेण्ट पन्फ़ीलोव ने. 

रात को बाहर गली में ले जाना. और - वास्या को भी,” उन्हें अपनी बगल से गुज़रने देते हुए याकोव ने धीरे से, नकीली आवाज़ में कहा और आँगन में चला गया.

सम्गीन ने पतलून की जेब से घड़ी निकाली, वह ग्यारह बजकर बत्तीस मिनट दिखा रही थीं. हथेलियों पर घड़ी की वज़नदार गर्माहट को महसूस करना अच्छा लग रहा था. और वैसे भी हर चीज़ कुछ असाधारण-सी, प्यारी-सी उत्तेजना लिए थी. शहद के रंग का फ़ूला-फ़ूला सूरज आसमान में पिघल रहा था. कम्पाउण्डर विनोकूरोव लोहे की मुड़ी-तुड़ी बाल्टी और ब्रश लेकर सड़क पर आया, उसने खून के पोखर पर राख बिखेरी, उसे खुरच कर वापस बकेट में डाल दिया. उसने ये इतनी जल्दी और आसानी से किया, जितनी आसानी और जल्दी से सड़क के इस टुकड़े पर हर असाधारण और भयानक घटना घटित हुई थी.      

चौंक कर सम्गीन आँगन में चला गया. किचन की ड्योढ़ी में दुबला-पतला सैनिक बैठा था, पीले, बूढ़े-से चेहरे वाला, आँख़ें ऐसी काली की उनकी सिर्फ पुतलियाँ ही नज़र आती थीं; छोटे से सिर को हिलाते हुए, अपने पतले होठों को तिरछा करके वह मुस्कुरा रहा था और धीरे से, मज़ाकिया अंदाज़ में कलीतिन और प्लम्बर से कह रहा था:   

“इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता कि मैं लिज़ल्व बटालियन से हूँ, सब एक ही है: सैनिक पर गोली नहीं चला सकते...”

 “और तू मुझ पर – चला सकता है?” गंभीर प्लम्बर ने घुटी-घुटी आवाज़ में पूछा.

याकोव ड्योढ़ी की बगल में लकड़ी के लट्ठे पर बैठा था और, गेट की तरफ़ देखते हुए, चुपचाप सिगरेट पी रहा था.

“मैं तुम पर – चला सकता हूँ, मैं सैनिक हूँ, अंदरूनी दुश्मनों के ख़िलाफ़ मैंने शपथ ली है...”          

प्ल्म्बर ने बंदूक को बाईं ओर रखा और दाएँ हाथ की हथेली से कैदी के माथे को धकेला:

 “और अगर – मैं भी सैनिक होऊँ तो?”

 “जा, जा – ये तो तू गप मार रहा है.”

 “झूठ बोल रहा हूँ?”

 “छोड़ भी, तिमोफ़ेयेव, मत छेड़,” कलीतिन ने कैदी को ग़ौर से देखते हुए कहा.

मगर तिमोफ़ेयेव उछला और बंदूक की करामातें दिखाने लगा, हर करतब के बाद तैश में पूछता:

 “देखा? देखा, हरामी? देखा?” और सैनिक के सामने संगीन का हमला करके चीख़ कर उससे कहा:

 “तेन्गिन्स्की रेजिमेन्ट, चौथी कम्पनी, ज़ख़ार...” 

याकोव फ़ौरन उठा और उसे कंधे से धकेलकर बोला:

“अपना पता भी दे दे उसे,” वह सैनिक से मुख़ातिब हुआ: “तेरे जैसे बेवकूफ़ ही सारी बुराइयों की जड़ हैं...”

इनकार में सिर हिलाते हुए गहरी साँस लेकर वह बोला:

“सैनिक बेवकूफ़ नहीं होता. मगर आप – जो त्सार और पितृभूमि के प्रति गद्दार हो गए हैं, और आपके हिस्से में...”

प्लम्बर उस पर बायाँ हाथ चलाने ही वाला था, मगर याकोव ने कोहनी के नीचे उसका हाथ पकड़ लिया, वार को रोक दिया:

“”फ़िर भी, कॉम्रेड, अनुशासन ज़रूरी है.”

सैनिक ने टोपी के किनारे से काली आँखें याकोव पर गड़ा दीं और सरलता से, बिना किसी उत्साह के, जैसे मेहेरबानी सी करते हुए कहा:

“बंदूक के कारनामे तो सिविलियन भी आसानी से कर लेते हैं. जैसे ये,” उसने हाथ से अपने कंधे के पीछे इशारा करते हुए कहा: “जिसे घर के भीतर ले गए हैं, वो भी – जैसे चाहो!”

“सिविलियन?” टोपी को माथे पर खिसकाते हुए कैप्टेन ने पूछा.

 हूँ, ठीक कहते हो.”

 “शिकारी ?” याकोव ने शांति से पूछा.

क्लर्क है, मशरूम्स का व्यापार करता है.”

 “मैं पूछ रहा हूँ: क्या तू शिकारियों की रेजिमेंट में है?”

“हम सब - शिकारी हैं” सैनिक समझ गया और फिर से गहरी साँस लेकर आगे बोला, “ इश्तेहार पे आए हैं – जो चाहे.”

तीनों एकदम सैनिक के नज़दीक आए.

मार डालेंगे’, सम्गीन ने तय कर लिया और, दो ही छलाँगों में ड्योढ़ी की पाँच सीढ़ियाँ लांघकर किचन में आ गया.

वहाँ मेज़ के पास चौख़ानों वाली जैकेट और धारियों वाली पतलून पहने एक लडका बैठा था; उसके खिंचे हुए गालों पर ऊन जैसे घने पीले बाल थे, बड़ी बड़ी हल्की भूरी आँख़ों से आँसू बह रहे थे और इस ऊन को भिगो रहे थे, एक हाथ से उसने मेज़ पकड़ी थी, दूसरे से – कुर्सी की सीट; उसका बायाँ पैर, जो नंगा और घुटने के ऊपर तौलिए से बंधा था, लकड़ी की कुर्सी पर रखा था.

 “देखिए, मालिक, मेरे पैर का सत्यानाश कर दिया,” उसने रोते हुए सम्गीन से कहा.

 “रो रहा है, बस रोए जा रहा है!” लम्बी छड़ी को चाकू से छीलते हुए अचरज और प्रसन्नता से निकोलाय चहका. “कोई औरत भी इत्ता नहीं रो सकती!”

“मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, मालिक, मेरी मदद कीजिए!” हिचकियाँ लेते हुए लड़के ने विनती की. “आप, वकील हैं...”

“ये हमारे यहाँ भुनी हुई मछली ला रहा था,” निकोलाय बीच में टपक पड़ा और जल्दी-जल्दी कुछ और भी बताने लगा, मगर सम्गीन उसकी बात सुन ही नहीं रहा था.

जानता है, मुझे! जब सब ख़तम हो जाएगा, और ये सही-सलामत बच जाएगा...

और किन्हीं शब्दों की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई, इस अंदाज़ से दिमाग़ में काफ़ी परेशान करने वाले ख़याल आ गए.

अन्फ़ीमेव्ना के कमरे से हाथों में बैण्डेज लिए स्टूडेण्ट पन्फ़ीलोव और पानी का तसला लिए नौकरानी नास्त्या बाहर आए; स्टूडेण्ट घुटनों के बल खड़ा होकर लड़के का पैर खोल रहा था, और वो कसकर आँखें बंद किए, बिसूरने लगा.

 “ऊ-ऊ-ह! वकील सा, आप गवाह हैं...मैं अदालत में जाऊँगा...”

 “बेवकूफ़ है!” स्टूडेण्ट चीखा और हँसने लगा. “कैसे चिल्ला रहा है? हड्डी तो सही सलामत है. चुप हो जा, ठस दिमाग़! एक हफ़्ते में नाचने लगेगा...”

मगर लड़का बिना रुके बिसूर रहा था, चिंघाड़ रहा था, किचन स्टूडेण्ट की चीखों से, नास्त्या की नाराज़ झिड़कियों से, चौकीदार की निरंतर बकवास से भर गया. सम्गीन दीवार से चिपक कर खड़ा था, और बंदूक की तरफ़ देख रहा था, जो गैस स्टोव पर पड़ी थी, संगीन स्टोव से बाहर निकल रही थी और उसके नीचे रखे समोवार से निकलती भाप में लिपटी थी, - संगीन के सिरे से चमकदार बूँदें टपक रही थीं.

“छड़ी दीजिए,” स्टूडेण्ट ने निकोलाय से कहा, और लड़के को हुक्म दिया. “उठ! मुझे पकड़, ले, छड़ी ले! खड़ा हो गया? शाबाश! और – गला फ़ाड़ रहा था, फ़ाड़े जा रहा था!”

लड़का मुँह टेढ़ा करके खड़ा था, और बड़बड़ा रहा था:

 “आह, या ख़ुदा...”

आँगन वाला दरवाज़ा खुला, एक के बाद एक याकोव, सैनिक, प्लम्बर भीतर आए; सैनिक ने किचन का मुआइना किया और बोला:

 “बंदूक मुझे दे दो, - वो रही, वहाँ!”

याकोव लड़के के पास गया और सैनिक की तरफ़ इशारा करते हुए बड़ी नर्मी से पूछने लगा:

“क्या वो तुम्हारी टुकड़ी का नेतृत्व कर रहा था?”

 “वही,” लड़के ने पैर छूते हुए कहा.

अकेला?”

“एक सीनियर भी था, वो – भाग गया.”

“महाशय, आप लोग, कोई मेरे जज-वज नहीं हो,” सैनिक ने गंभीरता से कहा. “आप मेरा कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि मैं ऑर्डर का पालन कर रहा था...”

“तो, कॉम्रेड,” याकोव प्लम्बर से मुख़ातिब हुआ.

सम्गीन डाइनिंग रूम में चला गया.

मुझे याकोव से कह देना चाहिए, कि ये ईडियट मुझे जानता है, क्योंकि...”

मगर याकोव को सूचित करने का कोई कारण उसे नहीं मिला.

ये सब – कितना बेवकूफ़ी भरा है!खिड़की के पास बैठते हुए उसने तय कर लिया. “निहायत नाउम्मीद बेवकूफ़ी से भरा, जिसे सुधारा नहीं जा सकता.

लाव्रूश्का समोवार लाया, उसे दन् से मेज़ पर रख दिया और, पूरा मुँह फ़ाड़कर, कुछ उम्मीद से सम्गीन पर नज़रें जमा दीं. सम्गीन चष्मे से, कनखियों से, उसकी हरकतें देख रहा था. लाव्रूश्का और इंतज़ार न कर सका और हौले से बोला:

“सैनिक को यकीनन गोली मार देंगे, या ख़ुदा!”

“अकेले को? सम्गीन ने पूरी उदासीनता से पूछा.

 “मैं तो – दोनों को मार देता! किस शैतान को उनकी ज़रूरत है? वे – बहुत सारे हैं, और हम – मुट्ठी भर...”

“हाँ,” सम्गीन ने उड़ा उड़ा सा जवाब दिया. लाव्रूश्का दरवाज़े की ओर भागा, मगर मुड़ा और उत्तेजना से बोला:

“एक गोली ने बोर्ड को उखाड़ दिया, और बोर्ड ऐssसे कॉम्रेड याकोव के पैर से टकराया, वो फ़ौरन घूम गया! और जब वास्का को गोली लगी, तो मैंने सिर संदूक से भिड़ा दिया. ये मैंने डर के मारे किया था, कोसारेव तो इत्ता कराह रहा था, जब ज़ख़्मी हुआ था, स्टूडेण्ट...”

वह ग़ायब हो गया. चाय बनाते हुए और प्याले में समोवार के नल से उबलते पानी की बहती धार को देखते हुए, सम्गीन महसूस कर रहा था, कि उसकी चमड़ी के नीचे ठण्डी धार बह रही है.

लड़का – सही कह रहा है, लड़ाई बिना किसी दया के होनी चाहिए...

किचन से याकोव की आश्चर्यजनक रूप से स्पष्ट आवाज़ आ रही थी.

सम्गीन कुछ अनिश्चय से उठा, किचन के सामने वाले आधे अंधेरे कमरे में आया, ओवरकोट की जेब से रिवॉल्वर निकाला और उसने किचन में झाँका, - वहाँ याकोव नास्त्या से कह रहा था:

“मज़दूर लोग दुख भी अपनी ही बेवकूफ़ी के कारण उठाते हैं...”

 “क्या आप चाय पियेंगे?” सम्गीन ने पूछा.

“धन्यवाद, समय नहीं है.”

तब सम्गीन ने उसे रिवॉल्वर दिखाया.

“क्या आप मुझे सिखाएँगे, कि इसे कैसे साफ़ किया जाता है?”

याकोव ने पिस्तौल हाथ में ली, उसे ओवरकोट की जेब में घुसा दिया.

“हमारे यहाँ ये काम करने वाला एक कारीगर है, वह कर देगा. सम्गीन दरवाज़ा थोड़ा सा बंद करना चाहता था, मगर याकोव ने पैर रखकर, उससे पूछा. 

 “मुझे बताया गया है, कि ये ज़ख़्मी लड़का आपको जानता है.”

“हाँ, ज़रा सोचिए...”

सिर के टोप की डोरियाँ सीने पर बाँधते हुए याकोव ने सोच में पड़कर कहा:

“आपके लिए मुसीबत हो सकती है...”

“हो सकता है. अगर, बेशक, विद्रोह कामयाब नहीं हुआ तो,” सम्गीन ने कहा और सोचा, कि, शायद, उसने इन शब्दों के मतलब और लहज़े को सवालिया अंदाज़ मे कह दिया है. याकोव ने उसकी ओर देखा, वह हँस पड़ा और आँगन वाले दरवाज़े की तरफ़ जाते हुए, स्पष्टता से कहा:

“अगर इस बार नहीं, तो – दूसरी बार...”

डाइनिंग रूम में लौटकर सम्गीन उदासी से खिड़की की ओर गया. लालिमा लिए आसमान में चिड़ियों का झुण्ड उड़ रहा था. सड़क – सुनसान थी. स्टूडेण्ट हाथ में बंदूक लिए दौड़ते हुए गुज़रा. बिल्ली गेट से बाहर निकली. सफ़ेद काली. सम्गीन मेज़ पे बैठ गया, प्याले में चाय डाली. अपने भीतर, कहीं काफ़ी गहरे, उसने ट्यूमर जैसी कोई चीज़ महसूस की: दर्द नहीं हो रहा था, मगर वह भारी था, वह बढ़ रहा था. लब्ज़ों से उसे खोलने का - मन नहीं हो रहा था.

ये सैनिक, बेशक – बेवकूफ़ है, मगर – विश्वसनीय सेवक है. जैसे रसोइया. अन्फ़ीमेव्ना. तान्या कुलीकवा. और- ल्युबाशा भी. असल में, समाज इन्हीं लोगों के भरोसे टिका है. बिना किसी स्वार्थ के अपनी पूरी ज़िंदगी, पूरी ताकत दाँव पे लगा देते हैं. ऐसे लोगों के बिना किसी भी संगठन की संभावना ही नहीं है. निकोलाय – दूसरी किस्म का है...और वो, ज़ख़्मी, भुनी हुई मछली बेचने वाला...      

ख़ासकर इस आदमी के बारे में सोचने का मन नहीं था, क्योंकि उसके बारे में सोचना – अपमानजनक लग रहा था. ट्यूमर दर्द करने लगा, ऐसा लगने लगा, जैसे मतली आने वाली हो. क्लीम सम्गीन, मेज़ पर झुककर दोनों हाथों से कनपटियाँ दबाने लगा.

कितनी बेमतलब है ज़िंदगी...

अन्फ़ीमेव्ना अंदर आई और दरवाज़े के हैण्डल से हाथ हटाए बिना, कुर्सी में धँस गई.

“ईगोर ग़ायब हो गया है,” उसने घुटी-घुटी आवाज़ में कहा, जैसे ये उसकी आवाज़ न थी, और नीली पड़ गई पलकों को उठाकर, लाल-लाल नसों की थैली में बंद अपनी धुंधली, काँच जैसी पुतलियाँ क्लीम पर गड़ा दीं. “खो गया,” उसने दुहराया.  

डरावनी आँखें हैं!क्लीम ने ग़ौर किया और हौले से पूछा: “क्या फ़ैसला किया है इन ... सैनिकों के बारे में?”

अन्फ़ीमेव्ना मुश्किल से उठी, अलमारी के पास गई और वहाँ, बर्तनों को खड़खड़ाते हुए उसने भी पूछा: “करना क्या है?” और हाथ में चाय का प्याला लेकर मेज़ के पास आते हुए बुदबुदाई: “ रात को कहीं दूर ले जाएँगे, और वहाँ गोली मार देंगे.”

सम्गीन अपनी कुर्सी पर सीधा हो गया, इस बात की राह देखते हुए कि वह और क्या कहेगी, मगर बुढ़िया, भारी साँस लेते हुए, नाक सुड़कते हुए, देर तक प्याले में चाय डालती रही, - उसके हाथ थरथरा रहे थे, उँगलियाँ शक्कर के टुकड़े को फ़ौरन पकड़ नहीं पाईं.

 “हरेक को – अपने ही लिए अफ़सोस होता है,” मेज़ पे बैठते हुए उसने कहा, “ऐसे ही जी रहे हैं.”

सम्गीन इंतज़ार करते-करते थक गया और उसने निश्चयात्मक, और कड़ी आवाज़ में पूछा:

 “इसको भी और उसको भी?”

शक्कर के छोटे-छोटे टुकड़े करते हुए अन्फ़ीमेव्ना बिना जल्दबाज़ी किए, बड़बड़ाते हुए और उदासीनता से बताने लगी:

“मैंने याकोव से, कॉम्रेड से, कहा: छोड़ ही देते सैनिक को, वो – क्या बुरा है? वो बेवकूफ़ है, और – बेवकूफ़ों को मारने में क्या तुक है? मिखाइलो की बात - और है, वो यहाँ सबको जानता है – विनोकूरोव को, और लिज़ाबेता कोन्स्तान्तिनोव्ना के भतीजे को, और ज़ात्योसोवों को – सबको! वो असल में स्वर्गीय द्मित्री पेत्रोविच का बेटा है, - याद है, वो, गंजा सा, रास्पोपोवों के आउट-हाउस में रहता था, बोरिसोव – कुलनाम था? पियक्कड़ आदमी था, मगर था बेहद ज़हीन और भला.”              

बातें करते हुए वो चाय की चुस्कियाँ ले रही थी, और ख़त्म करने के बाद प्याले पर अँगूठे से टक्-टक् करने लगी.

“ये देखो दरार, जबकि बिल्कुल नया सेट है! ओह, नस्तास्या, भालू जैसे पंजे...”

सम्गीन उसके बोझिल शब्द सुन रहा था, और उसके भीतर, दिल को गर्माते हुए, इस व्यक्ति के प्रति आदर की, कृतज्ञता की भावना बढ़ने लगी, हिलोरें लेने लगीं; वह इतना आनंदित हो गया कि उसे प्रकट करने के लिए शब्द ही नहीं ढूँढ़ पा रहा था.

“ऊपर से मिखाइलो तो ज़ख़्मी भी हो गया है, मैंने कहा. अच्छा आदमी है ये कॉम्रेड, याकोव. सख़त है. सब समझता है. सब. ईगोर को सब डाँटते हैं, मगर ये ईगोर से सरलता से बात करता है...कहाँ चला गया ये ईगोर? दिमाग़ काम नहीं कर रहा है...”

“आप तो अक्सर उसके साथ झगड़ा करती थीं,” सम्गीन ने प्यार से याद दिलाई.

लगातार प्याले की ओर देखते हुए, नीले नाख़ून से उस पर टक्-टक् करते हुए अन्फ़ीमेव्ना ने कहा:

“शौहर है.”

“क्या?” सम्गीन ने पूछा, उसे यकीन था कि वह ग़लत बोल गई है, मगर बुढ़िया ने गहरी साँस लेकर वही शब्द दुहराया:

“शौहर है. किस्मत मेरी.”

उसकी पुतलियाँ जैसे भड़क उठीं, एक पल के लिए चमक उठीं और फ़ौरन भूरे आँसू से धुँधला गईं, पिघल गईं. चुँधिया गई आँखों से मेज़ पर देखते हुए, थरथराते हाथ से उसे छूते हुए, उसने प्याले को प्लेट के पास रख दिया.

“ग्यारह साल उसके साथ रही. शादी हुई थी. सैंतीस सालों से उसके साथ नहीं रहती हूँ. कहीं मिलते हैं – पराए जैसे. पिछली मुलाकात से पहले नौ साल उसे नहीं देखा था. सोचती थी – मर गया. मगर, वो तो सुखारेव्का में था, बदमाश-गुण्डों को पेस्ट्रियाँ खिलाता था. अपने काम में – उस्ताद, ऐ-ऐह!”

एप्रन के कोने से आँखें पोंछते हुए, वह किसी जवान लड़की की तरह सिसक रही थी, कराह रही थी.

सम्गीन उठा और, परेशान होते हुए, पूरी ईमानदारी से कहने लगा:

“आप, अन्फ़ीमेव्ना, - ग़ज़ब की औरत हैं! आप, वाकई में महान इन्सान हैं! ज़िंदगी आप जैसे लोगों की कोमल और अटूट शक्ति के बल पर ही टिकी हुई है! हाँ ये – वो...”

उसका दिल चाहा कि उसे नाम और उपनाम से संबोधित करे, मगर उसका नाम वह नहीं जानता था. बुढ़िया ने इस अंतराल का फ़ायदा उठाते हुए कहा:

“ क्या कहूँ...ये, वार्यूशा तो...मैं उससे बेटी की तरह प्यार करती हूँ, कोई ननभी ख़ुदा के लिए इतना नहीं करती होगी, जितना मैं उसके लिए करती हूँ, और उसने पुरानी चादरों के लिए मुझे चोर समझा. चीख़ी-चिल्लाई, पैर पटकने लगी, वहाँ – सैंकड़ों कालों के सामने, उस साण्ड के सामने. मुझे क्या करना है? चादरें तो – ज़ख़्मियों के लिए हैं. नौकर हड़ताल पे चले गए, मगर मैं – काम करती रही, प्यारे! सोचो – क्या मुझे शरम नहीं आई होगी? और फिर तुम – तुम कभी यहाँ, कभी वहाँ – मौत घूम रही है, मगर वो चली गई, हाँ-आ!”                      

सम्गीन का कुछ कहने का मन नहीं हो रहा था, और बुढ़िया की तरफ़ देखना भी अटपटा लग रहा था.

“चलो, ठीक है,” वह उठ गई. “तुम्हें खिलाऊँगी क्या? घर में कुछ भी नहीं है, कहीं से मिल भी नहीं सकता. लड़के भी भूखे हैं. दिन-रात ठण्ड में. मेरे पैसे पूरे खर्च करके मैंने उन्हें खिला दिया. और नास्तेन्का भी. तुम कुछ पैसे दे देते...”

 “बेशक!” सम्गीन फ़ौरन उठा. “ज़ाहिर है. ये...”             

“फ्राइड अंडे बना लूँगी. मिडवाइफ़ की मुर्गियाँ अभी सही-सलामत हैं...”                               

जब अन्फ़ीमेव्ना चली गई, तो उसने खुलकर साँस ली. कमरे में चहल-कदमी करते हुए वह सोच रहा था कि जैसे वह झूले में जी रहा है: ऊपर, नीचे झूल रहा है.

बहुत बढ़िया वर्णन किया है सोलोगूब ने...

अपने, किसी के भी द्वारा पहले न कहे गए वाक्यों को सोचने का मन हो रहा था, मगर वैसे शब्द नहीं मिले, ज़ुबान पर पुराने, कब के परिचित वाक्य ही घूमते रहे.

वाकई में – रहस्यमय हैं लोग. लोग, जो सबसे पहले नैतिकता से जुड़े सवालों को सुलझाते हैं. मार्क्सिस्ट बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं...कितनी आसानी से उसने ये सवाल सुलझा लिया, मिखाइलो वाला...

उसके मन में फिर से इस बूढ़ी नौकरानी के प्रति कृतज्ञता की लहर उठी. मगर अब कृतज्ञता में कुछ अटपटापन भी शामिल हो गया, शर्मिंदगी जैसा. अकेले रहना बेहद अटपटा लग रहा था. उसने कपड़े पहने और बाहर आँगन में निकल गया.

निकोलाय गेट का फ़ाटक खोल रहा था, बंद कर रहा था, जो कर्कशता से चरमरा रहा था; उसने लोहे के डंडे से गेट को थोड़ा सा ऊपर उठाया और कुल्हाडी के हत्थे से लूप में कील ठोकने लगा, - उसके मुँह से दो कीलें बाहर झाँक रही थीं. वह हमेशा की ही तरह काम कर रहा था, और ये याद करने को जी नहीं चाहता था कि उसने सैनिक को मार डाला है, जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था, कि वैसा – हुआ था. रास्ते पर भी सब कुछ रोज़मर्रा की तरह ही था, नया था सिर्फ सामने की तरफ़, गेट के नीचे लाल-सा धब्बा, - सहायक डॉक्टर ने उसे पूरी तरह साफ़ नहीं किया था. सूरज भी मटमैला-लाल था; इक्कादुक्का बर्फ़ के फ़ाहे उड़ रहे थे, और सूरज की किरणों में वे भी लाल नज़र आ रहे थे, जैसा कि सर्दियों के मौसम में चटखदार सूर्यास्त के समय होता है.

पड़ोस के घर की ड्योढ़ी में एक गंदे लड़के के साथ लाव्रूश्का बैठा था; लड़के ने हरी बेल्ट बांधी थी, साइड में – लकड़ी के खोल में पिस्तौल थी. वह दिलचस्पी से सिगरेट पी रहा था, और लाव्रूश्का उससे कह रहा था:

“मुझे डरना अच्छा लगता है; बहुत मज़ा आता है, जब डर के मारे पीठ की चमड़ी ठण्डी पड़ने लगती है.”

लड़के ने थूका, हथेली से बर्फ के एक बड़े फ़ाहे को पकड़ा, जैसे मक्खी पकड़ रहा हो, मुट्ठी खोली, - उसमें कुछ भी नज़र नहीं आया. वह हँस पड़ा और बोला:

“मुझे तो मालिक ने डरना सिखाया, मैं चिमनी साफ़ करने वाले के यहाँ रहता था, क्योंकि मैं – यतीम था. वो अक्सर चिल्लाता:

चढ़ ऊपर, हरामी, कुतिया के पिल्ले!पत्थर की दीवार पे चढ़ना था, कहीं और नहीं. वो भट्टी बनाने वाला भी था. उसे बहुत हँसी आती थी, कि मैं डरता हूँ.”

“क्या गुस्सैल था?”

“जब गंभीर होता, तो – ख़ुश रहता था. पूछता ही रहता: “क्या बात है – सिर सलामत है?” बस, गंभीर वो कभी-कभी ही रहता था.”

लड़के की आँखें – छोटी-छोटी, मगर बेहद चमकीली थीं, गहराई तक नीली रोशनी से लबालब.

दो औरतें गुज़रीं, - उनमें से एक खून के धब्बे को लांघ गई, और मुड़कर दूसरी से बोली:

“देख, - जैसे घोड़े की ड्राइंग बनाई हो! उसने, बिना देखे, शॉल में अपने आपको लपेट लिया, और जब वे सहायक डॉक्टर की ड्योढ़ी के पास रुकीं, तो देखा:

“हमारी गली में तोप चलाना मुश्किल है, - आड़ी-टेढ़ी है, गोला घरों पे ही गिरेगा.” 

बेरिकैड के सामने हौले-हौले सीटी बजाते हुए कलीतिन घूम रहा था, उसके साथ-साथ एक दुबला-पतला, पैनी आँख़ों वाला आदमी घूम रहा था, जिसकी दाढ़ी हजामत बनाने के ब्रश जैसी थी, उसने कहा; 

“ ये लोग गोलियाँ – ठीक-ठाक ही चलाते हैं. वैसे – ये शिकारियों की रेजिमेंट्स – तमाशा है! मगर कज़ाकों वाली – वो जो भी सामने आए, उसे मार देते हैं. जब हम प्रेस्ना में श्मित की फ़ैक्टरी के पास प्रदर्शन कर रहे थे...”

कलीतिन रुका, उसने जेब से काली घड़ी निकाली और चिल्लाया:

 “लाव्रेन्ती, जा! टाइम हो गया! जा, मकेयेव.”

सम्गीन का दिल चाह रहा था कि कलीतिन से बातें करें, और वैसे भी वह इन लोगों को करीब से जानना चाहता था, पता लगाना चाहता था, कि जो भी वे कर रहे हैं, उसे कहाँ तक समझ रहे हैं. उसे महसूस हो रहा था कि स्टूडेण्ट्स किसी कारणवश उसके साथ निष्ठुरता से, बल्कि शायद, उपहास से पेश आते हैं, और टुकड़ी के उस तरफ़ के बाकी सारे लोग, जो किचन और अन्फ़ीमेव्ना की सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं, उसकी तरफ़ ध्यान ही नहीं देते. अब क्लीम समझ गया कि यदि स्टूडेण्ट्स के बर्ताव से वह परेशान न हुआ होता, तो वह कब का मज़दूरों के पास खड़ा होता.

लाव्रूश्का और दाढ़ी वाला आदमी चले गए. अंधेरा हो रहा था. बेरिकैड के उस ओर लोग आ जा रहे थे, प्लम्बर की परिचित, उदास आवाज़ कह रही थी:

 “यहाँ – पास ही में.”

“क्या बाप ले जाएगा उसे?”

 “भाई.”

“अफ़सोस है वास्या पे.”

कलीतिन ने बेरिकैड के किनारे-किनारे चहल कदमी करते हुए सिगरेट जलाई. सम्गीन उसके साथ हो लिया, पूछा:

“बहुत तकलीफ़ हुई कॉम्रेड को?”

 आह तक नहीं किया,” धुँए की लम्बी लकीर छोड़ते हुए कलीतिन ने कहा. “ आँख में लगी थी गोली.”

 “वो कहाँ काम करता था?”

“नानबाई था.”

 “क्या कोई और भी ज़ख़्मी हुआ है?”

 “तीन लोग. गंभीर रूप से नहीं.”

कलीतिन के छोटे-छोटे जवाब उसके साथ बात करने की इच्छा को पूरी नहीं कर रहे थे, मगर फिर भी सम्गीन ने कुछ देर चुप रहकर पूछा:

“आप क्या हासिल करने की उम्मीद करते हैं?”

कलीतिन रुक गया और बोला:

 “साफ़ तौर से ज़ाहिर है: मज़दूर वर्ग के लिए आज़ादी!”

और इसके बाद उसने, जैसे सहानुभूति से पूछा:

“आप, क्या मेन्शेविक हैं? कैडेट्स के साथ गठबंधन के पक्ष में हैं? प्लेखानोव के अनुसार: त्वेर तक – साथ साथ?”                                   

उसके शब्दों से तो नहीं, मगर लहज़े से सम्गीन समझ गया कि यह आदमी जानता है कि उसे क्या चाहिए. सम्गीन ने विरोध करने का, बहस करने का फ़ैसला किया और उसने शुरूआत की:

“ कहीं आप ये तो नहीं सोचते...”

मगर कलीतिन, रुक गया, कान देकर कुछ सुनने लगा, बुदबुदाया:

“थोड़ा रुकिए-कोई...”

सुनाई दे रहा था, कि सड़क पर कहीं दूर लोग तेज़-तेज़ चल रहे हैं और कोई भारी चीज़ खींच रहे हैं.

किसी नए नाटक की आशंका से सम्गीन वारवरा के घर के गेट की ओर चल पड़ा, उसके सामने से ज़ोर से और ख़ुशी से फ़ुसफ़ुसाते हुए लाव्रूश्का गुज़रा:

“पकड़ लिया!”

एक घुटी-घुटी आवाज़ सुनते हुए सम्गीन गेट के पास वाले गढ़े में रुक गया:

“पकड़ लिया, कॉम्रेड कलीतिन! कैसे हाथ-पैर मार रहा था-आँ! हट्टा-कट्टा है! उसके मुँह में दस्ताना घुसाना पड़ा...”

“शेड में ले जाओ,” कलीतिन चिल्लाया. क्लीम जल्दी से आँगन में घुसा, एक कोने में खड़ा हो गया; दो लोग गेट में एक तीसरे को घसीटते हुए लाए; वह पैर जमाए था, बर्फ खोद रहा था, घुटनों पर गिर रहा था, गुर्रा रहा था. उसे मार रहे थे, कोई दाँत भींचकर फुफ़कारा:

“च--ल...”

सम्गीन किचन में जाना चाहता था, मगर शेड में रोतली हँसी के बीच इवान पेत्रोविच मित्रोफ़ानोव बोलने लगा:

 “फ्-फ़्फ़ू...जीज़स क्राइस्ट! डराते रहे, डराते रहे...” असाधारण रूप से जल्दी जल्दी और हिचकियाँ लेते हुए वह बोल रहा था.

और, इस तरह फ़ट पड़ा, मानो होंठ उबलते हुए पानी से जल गए हों, अब वह और भी जल्दी-जल्दी बड़बड़ाने लगा:

“प्ली--ज़, प्ली—ज़! मैं विरोध नहीं कर रहा हूँ...ये, - डॉक्यूमेन्ट्स... मैं – मैं भी मज़दूर इन्सान हूँ. घड़ी. ये पैसे. और – बस, मेरी बात का यकीन कीजिए...”

आँगन से होते हुए कलीतिन और प्लम्बर शेड में पहुँचे, वहाँ आग जलाई. सम्गीन हौले से उस तरफ़ जाने लगा, अपने आप से ये कहते हुए कि ऐसा नहीं करना चाहिए. वह शेड के आधे, बिना खुले दरवाज़े के पीछे खड़ा हो गया; दरार से होते हुए उसके ओवरकोट पर रोशनी का पट्टा आ रहा था और दो हिस्सों में बँट रहा था; हाथ से इस पीले पट्टे को साफ़ करते हुए, वह दरार से भीतर देखते हुए सुनने लगा.

“ये आप ठीक नहीं कर रहे हैं,” मित्रोफ़ानोव और भी जल्दी-जल्दी और ज़ोर से कह रहा था. “ऐसे नहीं करना चाहिए, महाशयों...कॉम्रेड्स...हम एक देश में रहते हैं...”

 “ख़ामोश,” दबी हुई आवाज़ में उससे कहा गया.

 “हाँ – नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है? आप क्या...क्या...ओह, माइ गॉड...” और अचानक भयानक आवाज़ में वह चीख़ा:

 “संतरी...छोड़िए- आप क्या कर रहे हैं? रुक जाइए!”

असाधारण रूप से मुख़्तसिर और दबी-दबी आवाज़ में गोली चली, और फ़ौरन आग बुझ गई.

सम्गीन ने महसूस किया कि उसके ऊपर एक हल्का बोझ गिर पड़ा है, जिसने उसे इस तरह से ज़मीन्दोस्त कर दिया कि उसके घुटने मुड़ गए.

कुछ देर की ख़ामोशी के बाद आग फिर से जल उठी, और कलीतिन की आवाज़ आई:

 “ये तूने – बेकार ही में किया! ये, कॉम्रेड, ठीक काम नहीं है.”

 “तो - क्या हुआ? ये रहा – डॉक्यूमेन्ट!...”

“याकोव का इंतज़ार करना चाहिए था...”

कोई मित्रोफ़ानोव जितनी ही तेज़ी से कह रहा था.

“लाव्रूश्का से वो पूछ रहा था, कि किस-किसका क्या-क्या नाम है, तो? मुझसे – पूछा था या नहीं? एडवोकेट के बारे में? कहाँ काम करता क्या है? और आमतौर से...”

 “इसे गार्डन में ले जाओ,” कलीतिन ने कहा. “ मुझे किताब और बाकी सब दो...”

सम्गीन दरवाज़े के सामने खड़ा हो गया और बोला:

 “वो क्रिमिनल इन्वेस्टिगेटर था...”

मगर मकेयेव, उससे टकराकर, गहरी आवाज़ में तैश से चिल्लाया:

“गार्ड! सफ़ाई से, जैसे फ़ार्मेसी में करते हैं! परेशान न हों...”

उसने कुछ और भी कहा, मगर ये देखते हुए कि कैसे प्लम्बर मित्रोफ़ानोव को बगल से पकड़कर, फ़र्श पर घसीटते हुए दीवार में बने छेद की तरफ़ ले जा रहा है, सम्गीन उसकी बात सुन ही नहीं रहा था. मित्रोफ़ानोव सीने पर सिर लटकाए, चेहरा छुपाए घिसट रहा था; ओवरकोट और जैकेट के बटन खुले हुए थे, कमीज़ पतलून के नीचे से बाहर झाँक रही थी, पैर फ़र्श पर घिसट रहे थे, मोज़े पलट रहे थे.

कलीतिन लालटेन के सामने पालथी मारे बैठा था. कुछ कागज़ देख रहा था और बड़बड़ा रहा था:

“काम इतना है आज...सेक्यूरिटी वाला कार्ड, देखो...”

“ये रहा उसका रिवॉल्वर,” मकेयेव सम्गीन के मुँह के सामने धातु का काला टुकड़ा नचाते हुए बोला. “उसने मुझ पर करीब-करीब गोली चला ही दी थी, मगर अब – मैंने उसे इसीसे...”

सम्गीन आँखें बंद किए खड़ा रहा.

“बस करो, बेवकूफ़ों!” कलीतिन ने सख़्ती से कहा. “मकेयेव, याकोव के पास चलते हैं. फिर भी भाई, ये...कोई तरीका नहीं है, अगर हर कोई...”

“ऐ, शैतानों, मेरी मदद करो!” प्लम्बर गार्डन से चिल्लाया.

मगर कलीतिन और मकेयेव आँगन से चले गए. सम्गीन घर के अंदर गया, उसे दुर्गंध महसूस हो रही थी, जी मिचला रहा था. शेड से डाइनिंग रूम इतनी दूर प्रतीत हो रहा था; इस दूरी को पार करने से पहले उसे शराबखाने में बैठे मित्रोफ़ानोव की याद आई, उस दिन, जब मज़दूर मोर्चा लेकर क्रेमलिन जा रहे थे, त्सार के स्मारक की ओर, छोटे-छोटे क्रॉस से, सलीब का निशान बनाते हुए, ‘कॉमन सेन्सवाला आदमी जोश में फुसफुसाया: मैं तैयार हूँ, तहे दिल से! ईमानदारी से: प्यार और समर्पण के कारण धोखा देता रहा’.

कितनी आसानी से मार देते हैं. हालाँकि, जासूस, दुश्मन होता है...

मित्रोफ़ानोव को याद करते हुए कोई दया, कोई आवेश महसूस नहीं हुआ, बल्कि उसकी जगह पे दूसरा दुश्मन खड़ा हो गया, चालाक, भयानक, बेनाम, और ऐसा जिसे पकड़ा नहीं जा सकता.

ये कौन है, जो मुझे पूरी ज़िंदगी पीड़ादायक, बोझिल दृश्यों का, घटनाओं का, गवाह बनने पर मजबूर कर रहा है?’ भट्टी की गर्म टाइल्स से पीठ टिकाते हुए सम्गीन सोच रहा था. और अचानक, जैसे किसीने उससे कहा :

विदेश जाना चाहिए. किसी छोटे से, शांत शहर में’.

मोमबत्ती की दुरंगी लौ की ओर देखते हुए, उसने अपने आपसे कहा:

ये ख़याल मेरे दिमाग़ में पहले क्यों नहीं आया? माँ से मिल लूँगा.

माँ पैरिस के निकट रहती थी, कभी-कभार ख़त लिख देती थी, मगर ख़त काफ़ी लम्बे और शिकायत भरे होते थे: सर्दियों में घरों के भीतर ठण्ड की शिकायत होती थी, ज़िंदगी की अनेक असुविधाओं के गिले-शिकवे होते थे, रूसियों की शिकायत होती थी, जो विदेशों में रहना नहीं जानते’, और उसकी स्वार्थी, क्षुद्र बकवास में किसी प्रांतीय बुढ़िया की हास्यास्पद देशभक्ति का एहसास होता था...

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला, और उससे भी ज़्यादा धीरे कमरे में अन्फ़ीमेव्ना के भारी-भरकम शरीर ने प्रवेश किया, शाम के धुँधलके में भारीपन से तैरता हुआ अलमारी के पास पहुँचा और, चाभियों की झनझनाहट करते हुए, बेहद धीरे धीरे, सुर में कहने लगा:

“ईगोर वासीलिच ने फ़ाँसी लगा ली...”

 “ओह, माय गॉड,” निराशा से, और करीब-करीब बदहवासी से, सम्गीन धीरे से चिल्लाया.

 “अटारी में लटक रहा है,” बुढ़िया ने बोतल में से गिलास में कुछ डालते हुए कहा. सम्गीन ने बोतल के तंग मुँह से गिरते हुए द्रव की बुदबुदाहट सुनी.

 बिसूरती रहेगी’.                   

मगर अन्फ़ीमेव्ना ज़ोर से ख़ाँसी, और उसी तरह ख़यालों में डूबे-डूबे, सुर में अपनी बात कहती रही:

“उतारने की कोशिश की, मगर ताकत तो नहीं है. निकोलाय ने इनकार कर दिया, उसे लटकते हुए लोगों से डर लगता है. और ख़ुद ने तो, सुन, फ़ौजी को मार डाला.”

 “क्या करना होगा?” सम्गीन ने पूछा.

 “क्या करना है? मगर – आपको कुछ नहीं करना है, मैं ख़ुद ही...ख़ुद ही सब कर लूँगी. ठठेरा मदद कर देगा. अच्छा नहीं होगा, आपसे पूछेंगे कि नौकर ने फाँसी क्यों लगा ली?” 

वह ख़ामोश हो गई, और फिर से काँच की खनखनाहट हुई, बोतल की गर्दन में डुबक्-डुबक् होने लगा.

ये वोद्का पी रही है’, सम्गीन ने अंदाज़ लगाया.

“और खाने-पीने का सामान भी नहीं है,” बुढ़िया ने आह भरी. “ओह-हो. मालूम नहीं क्या खिलाऊँगी.”

“कुछ नहीं चाहिए,” चिल्लाने की इच्छा को मुश्किल से दबाते हुए सम्गीन ने कहा. आप.... फ़िक्र न करें...”

“करना क्या है,” जाते-जाते अन्फ़ीमेव्ना बोली; वह ऐसे चल रही थी, जैसे तेज़ हवा के थपेड़ों के बीच जा रही हो.

“तो – मैं उतार लूँगी, मगर – रखना कहाँ है?” उसने दरवाज़े तक पहुँचकर पूछा....

सम्गीन ने दोनों हाथों से चेहरा ढाँप लिया. भट्टी की टाइल्स, अधिकाधिक गरम होते हुए, पीठ को जला रही थीं, ये अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था, मगर भट्टी से दूर हटने की ताकत ही नहीं थी. अन्फ़ीमेव्ना के जाने के बाद कमरों में ख़ामोशी और ज़्यादा बोझिल, ज़्यादा गहरी हो गई, शायद सिर्फ इसलिए कि याकोव की आवाज़ स्पष्ट सुनाई दे, - वह किचन से कोई तीखी, कड़वी गंध लिए बाहर लपका:

“जब हम नहीं सीखेंगे...”

सम्गीन ने टिप्पणी की: कहना – नहीं आता, कहना ये चाहिए था – अगर’, न कि – जब’.    

“.... संगठित होकर काम करना, वर्ना तो हमें कुछ भी हासिल नहीं होगा. नहीं कर पाया, कहते हो? करना चाहिए था, कॉम्रेड कलीतिन...ऐसी नाकामयाबियाँ...”

सम्गीन लड़खड़ाते हुए भट्टी से दूर हटा और अध्ययन कक्ष में चला गया, अपने पीछे दरवाज़ा कस के बंद कर लिया.

दिन और भी ज़्यादा धीरे धीरे गुज़र रहे थे, हालाँकि हर दिन पहले ही की तरह अपने साथ अविश्वसनीय अफ़वाहें और अजीबोग़रीब कहानियाँ लेकर आता था. मगर, ज़ाहिर था कि लोग चरमराती ज़िंदगी की उत्तेजनाओं और शोर गुल के आदी हो चुके थे, जैसे चिड़ियाएँ और कौवे सुबह से शाम तक शहर के ऊपर उड़ने के आदी हो जाते हैं. सम्गीन खिड़की से उनकी तरफ़ देखता और महसूस करता कि उसकी थकान बढ़ती जा रही है, ज़्यादा बोझिल होती जा रही है, पागलपन की हद तक पहुँच रही है. अब वो पहले की तरह हर बात ग़ौर से नहीं देखता था, और लोग जो भी कर रहे थे, कह रहे थे, जैसे शीशे की सतह से परावर्तित हो जाता था.

दुबली पतली, बड़ी-बड़ी आँखों वाली नौकरानी नास्त्या उसकी ख़िदमत करती थी; उसकी आँखें भूरी थीं, पुतलियों में सुनहरी चमक लिए हुए, और इस तरह देखती थीं, जैसे नास्त्या हमेशा कोई बात ध्यान से सुन रही है, जिसे सिर्फ वही सुन सकती है. अन्फ़ीमेव्ना से भी ज़्यादा उसे इस बात की फ़िक्र थी कि बेरीकैड की सुरक्षा करने वालों को खूब चाय पिलाए और खाना खिलाए. उसने किचन को शराबख़ाना बना दिया.

अन्फ़ीमेव्ना सर्दी खा गई और बीमार हो गई. जिस दिन रसोइए ने फाँसी लगाई थी, उसके दूसरे दिन देर शाम को सम्गीन ने आख़री बार उसे चलते हुए देखा था.

किचन में कोई नहीं था, बेरीकैड वाले लगभग सभी लोग, पहरेदारों को छोड़कर, शेड में जमा थे. सम्गीन को शेड से आता हुआ शोर परेशान कर रहा था; उसने लैम्प उठाया और पीछे वाली ड्योढ़ी में आया, देखा कि बुढ़िया, पीछे से रसोइए को बगल से चिपटाए, उसकी छोटी सी आकृति को एक एक सीढ़ी नीचे उतार रही है. रसोइया, बाएँ कंधे पे सिर लटकाए और ज़ुबान बाहर निकाले, मुड़ नहीं रहा था, उसके पैर मज़बूती से एक दूसरे से चिपके थे, ऐसा लग रहा था, कि उसका एक ही पैर है, जो सीढ़ियों पे ज़ोरदार खट्खट् कर रहा था, जैसे ज़िंदा आदमी का पैर हो, और वह उस पैर से विरोध प्रकट कर रहा था, जैसे नीचे नहीं उतरना चाहता हो. अन्फ़ीमेव्ना के हाथों पर प्रकाश डालकर, जो रसोइए के सीने पर सूजे हुए पड़े थे, सम्गीन ने उसके गोल, तरबूज़ जैसे चेहरे पर प्रकाश डाला, जो उसके हाथों की तरह ही बैंगनी रंग से रंग गया था, जबकि रसोइए का चेहरा काला था, किसी बड़े आलू की तरह.                    

“कहाँ, आप उसे कहाँ ले जा रही हैं?” सम्गीन ने फ़ुसफ़ुसाते हुए पूछा. बुढ़िया ने गला साफ़ करते हुए और मुश्किल से साँस लेते हुए कहा:

“ कुछ नहीं, परेशान न होइए. मेरे पास सामान वाली स्लेज-गाड़ी है. ठठेरा ले जाएगा. वो – बहुत मदद करता है...”

सीढ़ियों से उतरकर उसने रसोइए के जिस्म को कंधे पर उठाने की कोशिश की और – ऐसा न कर पाने के कारण उसे अपने पैरों के पास लिटा दिया. सम्गीन ये सोचते हुए वहाँ से चला गया:

कोई और समय होता, तो मैं उसकी मदद करता’.

उसका दिमाग़ इतना कुंद हो गया था कि इस दृश्य ने उसे परेशान नहीं किया.

अब अन्फ़ीमेव्ना हाँफ़ते हुए अपने कमरे में पड़ी थी, उसकी देखभाल सफ़ेद बालों वाला, हमेशा होश में रहने वाला, बेहद बातूनी, मगर पूरी स्ट्रीट के लिए आदरणीय मेडिकल असिस्टेन्ट विनोकूरोव कर रहा था, जिसने कई दिनों से दाढ़ी नहीं बनाई थी.

अपनी ईमानदारी के लिए मशहूर, लाजवाब औरत,” उसने भर्राई आवाज़ में कहा. मगर नहीं खींच पाएगी. निमोनिया. अफ़सोस है. बूढ़े लोग – मर रहे हैं, नौजवान – गुण्डागर्दी कर रहे हैं. ओह, बीमार है रूस...”

दो बार सैनिक आए, मगर उन्होंने दूर से ही फ़ायरिंग की, वो भी थोड़ी सी; बिना कोई नुक्सान पहुँचाए फ़ायरिंग करते और चले जाते. बेरिकैड उन्हें जवाब नहीं देती, और ठठेरा मुस्कुराता:

“बेकार ही में गोलियाँ बर्बाद कर रहे हैं, हरामी...” और शेख़ी मारते हुए कहता;

“अगर पुराना ज़माना होता तो छोकरे – संगीनें लिए होते! और हमारे प्यारे पाँच ही मिनट में ख़ामोश हो जाते...”

लाव्रूश्का को पता चला कि “गोलियाँ इस तरह चटकती हैं, जैसे माथे पर चम्मच बज रही हो.”

एक बार दिन में मुख्य मार्ग की तरफ़ जैसे गुस्से में, और लगातार गोलियाँ चलने लगीं. लाव्रूश्का और उसके गन्दे साथी को ये देखने के लिए भेजा गया कि मामला क्या है? करीब बीस मिनट बाद गन्दा लड़का खून से लथपथ लाव्रूश्का को सहारा देकर किचन में लाया, - उसके बाएँ हाथ में कुहनी के ऊपर गोली लगी थी. कमर तक नंग़े बदन, वो स्टूल पे बैठा था, पूरा भाग खून से सना था, - ऐसा लग रहा था कि उसके बाएँ हिस्से की चमड़ी छिल गई है. लाव्रूश्का के बदरंग चेहरे पर आँसू बह रहे थे, ठोढ़ी काँप रही थी, दाँत किटकिटा रहे थे. स्टूडेण्ट पन्फ़ीलोव उसके ज़ख़्म पर पट्टी बाँधते हुए उसे मना रहा था:

“ हिल मत. शरम की बात है.”

मगर लाव्रूश्का काँपते हुए, अचरज से आँख़ें घुमाकर, हिचकियाँ लेते हुए बुदबुदा रहा था:

“ओय, दर्द हो रहा है! अरे, दुख रहा है, ओह गॉड! अरे – छुओ तो नहीं...कैसे जिऊँगा मैं हाथ के बिना?” – तंदुरुस्त हाथ से स्टूडेण्ट का कंधा पकड़कर वो ख़ौफ़ से पूछ रहा था; कंधे को दबाते हुए, मारते हुए, गीली आँखों से अपने हाथ पर नज़र डालते हुए वो बड़बड़ाया:

“एक हाथ का क्रांतिकारी भी कोई क्रांतिकारी है? कॉम्रेड पन्फ़ीलोव – क्या हाथ काट देंगे?”                       

मगर शाम को वह पट्टी बँधे हाथ से मेज़ के पीछे बैठा था, चाय पी रहा था और याकोव से शिकायत कर रहा था:

“देर तक खींचते रहे, तो जीत नहीं पायेँगे, कॉम्रेड! हमें इंतज़ार नहीं करना चाहिए, बल्कि फ़ौरन टूट पड़ना चाहिए, जित्ते भी हज़ार हों, सबको कैद कर लेना चाहिए.”

याकोव ने पूरी संजीदगी से उससे कहा:

“ऐसा ही होगा. ज़रूर टूट पडेंगे, और – वो ढक्कन के नीचे! बस, प्यारे, तुझे अपने हाथ का इलाज कर लेना चाहिए.”

क्लीम सम्गीन पहली बार इस आदमी को बिना हुडकी टोपी के देख रहा था, और उसे इस बात का अचरज हुआ कि याकोव के चेहरे में कोई ख़ास बात नहीं थी. साधारण चेहरा, - ऐसे चेहरे अक्सर रेलगाडियों के कण्डक्टर्स के बीच दिखाई दे जाते हैं, - सिर्फ उसकी आँखें ख़ास तरह से, ग़ौर से देखती हैं. कलीतिन और अन्य कई मज़दूरों के चेहरे काफ़ी ख़ासतरह के हैं.

 ये क्यों इनका नेतृत्व कर रहा है?’ सम्गीन ने सोचा, मगर अपने सवाल का जवाब उसने नहीं ढूँढा. उसने महसूस किया कि उसे सबने छोड़ दिया है, और ख़ाली घर में कैद कर दिया है.

अब, जब अन्फ़ीमेव्ना, जली हुई लकड़ी की तरह, न तो भड़क सकती थी, न ही बुझ सकती थी, बल्कि दिन-रात कराहती रहती, चरमराती हुई लकड़ी की खाट पर करवट बदलती रहती, - अब नास्त्या उसे समय पर चाय नहीं देती, खाना भी बुरा ही देती, कमरे की सफ़ाई नहीं करती, बिस्तर भी ठीक-ठाक नहीं करती थी. वह समझता था कि उसकी ख़िदमत करने के लिए नास्त्या के पास समय ही नहीं है, मगर फिर भी ये अपमानजनक और असुविधाजनक लगता था.               

ठण्ड बढ़ती जा रही थी. शामों को किचन में करीब दस आदमी गरमाने के लिए बैठ जाते; वे ज़ोर-ज़ोर से बहस करते, झगड़ते, प्रांतों में हो रही घटनाओं के बारे में बातें करते, पीटरबुर्ग के मज़दूरों को गालियाँ देते, पार्टी के नेतृत्व की शिकायत करते, जिसमें पर्याप्त रूप से स्पष्टता नहीं थी. सम्गीन उनकी बातों को ध्यान से नहीं सुनता, मगर इन लोगों के चेहरों की ओर देखकर सोचता कि वे असंभव में विश्वास से संक्रमित हैं, - उस विश्वास से, जिसे वह सिर्फ पागलपन समझता था. उनका रवैया उसकी तरफ़ वैसा ही था, जैसे उस आदमी के प्रति होता है, जिसकी उन्हें ज़रूरत नहीं है, मगर जो उनके काम में बाधा भी नहीं डालता.

काफ़ी समय से कोई उससे मिलने नहीं आता था, - वारवरा के दोस्त, शायद, उस गली में आने से डरते थे, जहाँ बेरिकैड्स थे. ल्युबाशा सोमोवा भी ग़ायब हो गई थी. वह महसूस कर रहा था कि दिन प्रतिदिन कुंद होता जा रहा है, थकान से बेहाल हुआ जा रहा है. शाम को, देर से, वह सड़क पे निकल जाता, असाधारण, अगम्य ख़ामोशी को ग़ौर से सुनता, - ऐसा लगता था कि हर गुज़रते दिन के साथ वह घनी होती जा रही है, उसकी पर्तें सिकुड़ते हुए, मोटी होती जा रही है और – उसका विस्फ़ोट तो होना  चाहिए! वर्ना – पागल हो जाओगे.           

दोनों बेरिकैड्स पर, सड़क वाली पर और गली वाली पर भी, खूब बर्फ जम गई थी; ठठेरे के विरोध के बावजूद, उन पर हमेशा पानी डाला जाता था. अब तो वे बर्फ़ के बड़े-बड़े ढेले बन गई थीं,उनका आकार किसी नौका की तरह हो गया था, जिसका पेंदा ऊपर को कर दिया गया हो. गली में रहने वाले पानी डाला करते; गली में तो बेरिकैड्स पर दो बार गंदा पानी फ़ेंक देते.                

एक बार शाम को राइफ़ल्स लिए करीब पाँच आदमी आए और धीमी आवाज़ में कुछ कहने लगे, मगर उनकी बात सुनकर लाव्रूश्का तैश में आकर चिल्लाया:

“नहीं, कभी नहीं! ये – हमारी बेरिकैड है, हम नहीं जाएँगे! कैसे हो तुम लोग!”

और सुबह, चाय देते हुए नास्त्या ने कहा:

 “ अन्फ़ीमेव्ना – ख़तम हो गई...मर गई.”

सम्गीन ने चुपचाप हाथ हिला दिए, मगर नौकरानी ने पूछा:

“उसका क्या किया जाए? रात को तो मुझे उससे डर लगेगा, और फिर गर्मी में रखना मुनासिब नहीं है. शेड में ले जाने की इजाज़त देंगे?”

 “बहुत अच्छा,” उसने कहा. उसे लगा कि ये लड़की ज़िद्दीपन से बोल रही है, मगर, मेज़ पर झुकते हुए उसे धीमी हिचकी सुनाई दी.   

“ ये, रोना किसलिए हो रहा है?” उसकी तरफ़ देखे बिना उसने कहा. “अन्फ़ीमेव्ना...बहुत बूढ़ी थी! वह एक बेहद आदर्श इन्सान थी...”

“क्लीम इवानोविच,” उसने दुखभरी आवाज़ सुनी, - “हमारे लोग कहते हैं, कि पीटरबुर्ग से बड़े भारी तोपखाने के साथ रेजिमेंट भेजी गई है...”

सम्गीन ने सिर उठाया. एप्रन से मुँह ढाँके और हिचकियाँ लेते हुए, दबी ज़ुबान में, दयनीय स्वर में नास्त्या, ने कहा:

 “हमारे लोगों के चीथड़े उड़ा देंगे तोप के गोलों से. वो बहस किए जा रहे हैं: यहाँ से चले जाएँ या लड़ते रहें, पूरी रात बहस करते रहे. कॉम्रेड याकोव कहता है, कि दूसरी जगह चले जाएँ, जहाँ हमारे वाले ज़्यादा हैं... आप उनसे कहिए, कि चले जाएँ. कलीतिन से कहिए, मकेयेव से और...सबसे!”

“हाँ, मैं, बेशक, कहूँगा!” सम्गीन ने बड़े जोश से वादा किया, जिसका ख़ुद उसे ही आश्चर्य हुआ. “हाँ, हाँ, तोपों के ख़िलाफ़, - अगर ये सही है तो...”

 “सही है! कल निकोलायेव्स्की रेल्वे स्टेशन पे ऑपरेटर्स पे गोलियाँ चलाईं थीं” नास्त्या ने शिकायत की.  

 “हूँ, मगर ऑपरेटर्स पे क्यों?” सम्गीन ने सोच में डूबकर कहा. “शायद, ऑपरेटर्स वाली बात सही न हो. मगर यहाँ से चले जाना चाहिए. – आप जाइए, मैं बात करूँगा...”

उसने जल्दी से चाय ख़तम की, सिगरेट सुलगाई और ड्राइंग रूम में आया, - वहाँ सब कुछ अस्तव्यस्त था, सफ़ाई नहीं की गई थी. आईने में उसे करीब तीस साल के एक ख़ूबसूरत इन्सान की झलक दिखाई, जिसका चेहरा विवर्ण था, कनपटियों के बाल आधे-सफ़ेद थे और नुकीली पतली दाढ़ी थी. काफ़ी दिलचस्प था ये चेहरा, जैसे नया चेहरा हो. सम्गीन ने कपड़े पहने, किचन में आया, - वहाँ अपने नंगे पैर के अँगूठे के नीले नाख़ून की ओर देखते हुए कॉम्रेड याकोव बैठा था.

“लाव्रूश्का ने गलती से बंदूक के हत्थे से मार दिया,” क्लीम के सवाल के जवाब में उसने नाख़ून को छूकर त्यौरी चढ़ाती हुए कहा. “मेहमान आए हैं, सिम्योनोव्स्की रेजिमेन्ट,” उसने धीरे से बताया. “आप पूछ रहे हैं, कि अब हम क्या करेंगे? लड़ेंगे.”

“तोपों के ख़िलाफ़,” मेज़ पर ठण्डी गोभी को काटते हुए नास्त्या ने याद दिलाई.

“तोप – एक औज़ार है, जो इसका इस्तेमाल करता है, उसीकी वह ख़िदमत करता है,” होंठ काटकर और पैर पे जूता चढ़ाते हुए याकोव ने समझाते हुए कहा; वह खड़ा हो गया और, पैर को आगे करके ग़ौर से उसकी ओर देखा. “मतलब, हमारे ख़िलाफ़ त्सार की रेजिमेन्ट भेजी गई है, ख़ा-सम-ख़ा-स फ़ौज,” लम्बे शब्द को तोड़कर उसने व्यंग्य से क्लीम की तरफ़ देखा. “तो...” यहाँ याकोव कोई एक शब्द गटक गया, “तो, प्यारे मालिक, धन्यवाद और परेशान न हों: आज हम यहाँ से चले जाएँगे.”

 “मैं परेशान नहीं हो रहा हूँ,” सम्गीन ने कहा.

 “हूँ-ऊँ, ऐसा कैसे? सभी परेशान हो रहे हैं.”

“आप जाएँगे कहाँ?” सम्गीन ने पूछा.

“प्रेस्न्या. वहीं से उन पर मार करेंगे. या – ख़ुद ही वहाँ ख़तम हो जाएँगे.”

एक आँख बंद करके, कुछ सोचते हुए उसने दूसरी आँख़ नास्त्या के सिर पे टिका दी. सम्गीन समझ गया, कि वो – फ़ालतू है, और आँगन में निकल गया. वहाँ निकोलाय दिल लगाकर नई झाडू से आँगन साफ़ कर रहा था; कई दिनों से उसने ये नहीं किया था. सड़क पर ख़ामोशी थी, मगर बर्फ़ीली हवा में लाव्रूश्का की निराश आवाज़ गूँज रही थी.

 “मैंने तो कहा था: तोपें खोदीन्को पे खड़ी हैं, वहाँ जाकर सब बिगाड़ देना चाहिए, मगर हम यहीं बैठे रहे.”

पड़ोस वाले घर के गेट से जैकेट और टोपी पहने पन्फ़ीलोव निकला, टोपी उसके सिर के लिए बहुत बड़ी थी.

 “पता – याद है ना? तो, ठीक है. वहाँ शांति से बैठे रहना. मालकिन – डॉक्टर है, वो तेरा हाथ एकदम ठीक कर देगी. अलबिदा.”

लाव्रूश्का तेज़ी से बेरिकैड्स की दिशा में गया और उसके पीछे छुप गया; स्टूडेण्ट ने टोपी ठीक करके, पीछे से उसे देखा और, सीटी बजाते हुए आँगन में लौट आया.

दिन मटमैला, ठण्डा और गुमसुम था. घरों के चांदी जैसे, रोएँदार काँच आँखें सिकोड़े एक दूसरे की ओर देख रहे थे,- ऐसा लग रहा था कि सभी घरों के चेहरे त्यौरियाँ चढ़ाए किसी बात का इंतज़ार कर रहे हैं. सम्गीन धीरे-धीरे मुख्य रास्ते की ओर जा रहा था, मन में कुछ अस्पष्ट विचार उठ रहे थे, मगर परेशान करते ख़याल उनमें बाधा डाल रहे थे.ज़ाहिर है, लाव्रूश्का को छुपा रहे हैं...अजीब इन्सान है, ये याकोव...

सड़क के मोड़ तक पहुँचने पर उसे किसी की इत्मीनान भरी, जोशीली आवाज़ सुनाई दी:

 “बढ़िया जवाब दिया. करीब चालीस आदमी थे, अफ़सर घोड़े पे था.”

सम्गीन घर की ओर लौट गया, और जब गेट के पास पहुँचा, तो उसने तोप के गोले की पहली आवाज़ सुनी, वह ज़बर्दस्त नहीं, बल्कि मरियल सी थी, जैसे हवा के झोंके से गेट के पल्ले बंद हो गए हों. सम्गीन रुक गया, उसे शक हुआ – क्या तोप चली है? मगर फिर से हौले से, अजीब सी फुट्सुनाई दी. उसने कंधे उचकाए और किचन में आया. स्टोव के पास काम कर रही नास्त्या मुँह खोलकर सवालिया अंदाज़ में उसकी ओर मुड़ी.

“हाँ, गोले दाग रहे हैं तोपों से,” उसने कमरों में घूमते हुए कहा. डाइनिंग रूम में खिड़की के ऊपरी, बर्फ़ से बिना ढँके शीशे बुरी तरह कराह रहे थे, भट्टी के पाइप में हवा गूँज रही थी, दूर छतों पर चिड़िया और कौए गोल-गोल चक्कर लगा रहे थे, कभी-कभी वे शरद ऋतु के पत्ते की तरह चमक जाते.      

इस पागलपन में अप्रत्यक्ष...अथवा अनचाहे रूप से भाग लेने को मेरा सीधा सहयोग ही समझा जाएगा’, - बादलों पर पड़ी काली जाली को देखते हुए और ऊँघते हुए सम्गीन ने सोचा.

“मेरा हिसाब कर दीजिए, क्लीम इवानिच.” चौकीदार की परिचित, आदरयुक्त आवाज़ ने उसे जगा दिया; वो दरवाज़े में तनकर खड़ा था, फ़ौजी की तरह, उसने त्यौहारों वाला कोट पहना था, जैकेट पर घड़ी की दुहरी, चाँदी की चेन लटक रही थी, बाल करीने से कढ़े हुए थे और चमक रहे थे, उसके जूते भी चकाचक थे.

“आप कहाँ जा रहे हैं?”सम्गीन ने उनींदेपन से पूछा.

“गाँव”.

हवेलियों को जलाने के लिए,’ सम्गीन ने उदासीनता से सोचा, जैसे ये निकोलाय का हमेशा का काम हो, मगर उसने कड़ी आवाज़ में कहा:

लोगों को मार रहे हैं. वहाँ,” उसने खिड़की की ओर इशारा करते हुए काठ की तरह हाथ बढ़ाया, “ रास्ते से जा रहे एक आदमी को सीधे आँख में गोली मार दी. नामुमकिन है रहना.”

मगर तूने भी तो मार डाला था’, सम्गीन कहना चाहता था, मगर वह एकटक निकोलाय के चेहरे की ओर देखते हुए ख़ामोश रहा, जो पहले ख़ूबसूरत, भरा-भरा, तना हुआ लगता था, मगर अब लटक गया था; उसकी छितरी, मगर पहले घुंघराली दाढ़ी के बाल अजीब तरह से लटक रहे थे और सीधे हो गए थे. वह वैसी ही कड़ी आवाज़ में बोला:

“अन्फ़ीमेव्ना को आपको फ़ौरन कब्रिस्तान ले जाना चाहिए, वर्ना – चूहे उसे ख़राब कर रहे हैं. गाल खा गए हैं, देखने में भी डर लगता है. जासूस को तो कॉम्रेड्स कब के गार्डन से बाहर ले गए, और ईगोर वासिल्येविच भी शेड में ही है. शेड की दीवार मैंने ठीक कर दी है. मतलब, सब ठीक है. कोई निशान बाकी नहीं है.”

सर्टिफ़िकेट और पैसे लेकर वह चला गया, जाते-जाते, थोड़ा झुककर, संक्षिप्त सा “अलबिदा” कह गया.

भयानक आदमी है,’ फिर से खिड़की के पास खड़े होकर और आहट सुनते हुए सम्गीन ने सोचा. खिड़की के काँच पर जैसे किसी अदृश्य तकिए से प्रहार हो रहे थे. उसे पक्का यकीन था कि इस समय हज़ारों लोग, उसके ही समान, खिड़कियों के पास खड़े होकर सुन रहे हैं, अंत का इंतज़ार कर रहे हैं. कुछ और हो ही नहीं सकता. खड़े हैं और इंतज़ार कर रहे हैं. घर में बड़ी देर से असामान्य शांति थी. घर, जैसे हवा के हल्के थपेड़ों से लड़खड़ा रहा था, और छत पर जैसे बर्फ़ सरसरा रही थी, जैसे वो बसंत के मौसम में पिघल कर, लोहे की चादर से फ़िसलते हुए सरसराती है,

 

गोले रुक-रुककर, बिना जल्दबाज़ी किए और, हो सकता है, शहर के कई भागों में चल रहे थे. गोलों के बीच का विराम गोले चलने से ज़्यादा दुखदाई था, और जी चाहता था, कि वे जल्दी-जल्दी, लगातार बरस जाएँ, लोगों को न सताएँ, जो अंत की राह देख रहे हैं. सम्गीन थककर मेज़ के पास बैठ गया, उसने चाय पी, जो अप्रिय रूप से गरम थी, कमरे में घूमा, फिर वापस खिड़की के पास वाली ड्यूटी पे खड़ा हो गया. अचानक, जैसे छत से, कमरे में ल्युबाशा सोमोवा टपक पड़ी, और उसकी उत्तेजित, गुस्साई हुई आवाज़ गूँज उठी, उलझे-उलझे शब्द बिखरने लगे:

“ये आपके यहाँ हो क्या रहा है? आपने इसकी इजाज़त कैसे दी? निकोलायेव्स्काया पर पुलों को क्यों नहीं उड़ाया गया?” वह पूछ रही थी. उसका चेहरा अनजाना, बूढ़ा-सा, भूरा था, होंठ भी भूरे थे, आँखों के नीचे गहरे साये थे, - वह अंधों जैसी आँख़ें मिचमिचा रही थी.

“क्या बेरिकैड्स छोड़कर जा रहे हैं? क्या एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी ने ये आदेश दिया है? तुम्हें मालूम है?”

सम्गीन को पराया कोट पहनी इस पीड़ित लड़की पर थोड़ी दया आ रही थी, कोट उसके लिए काफ़ी लम्बा था, पैरों में भारी भूरे जूते थे, - सिर पर बँधे स्कार्फ़ के नीचे से बिखरे हुए और न जाने कब से नहीं धोए गए बालों की लटें झाँक रही थीं.

“ओय, अगर तुम जानते, कि प्रांत में क्या हो रहा है! मैं छह शहरों में गई थी. तूला में... मुझे बताया गया कि वहाँ सात सौ राइफ़ल्स, कारतूस हैं, मगर...कुछ भी नहीं था! कोलोम्ना में तो मुझे करीब-करीब...मुश्किल से वहाँ से भागी...वहाँ कोई सैनिक आए थे...भयानक! मुझे खाने के लिए कुछ दो...”

उसने ब्रेड का टुकड़ा लिया, थोड़ा सा खाया और, मेज़ पर फेंक कर सिर हिलाते हुए आँखें बंद कर लीं.

 “फिर भी...ऐसा नहीं हो सकता! हम जीतेंगे! प्यारे, मेरा कमिटी के किसी आदमी से मिलना बेहद ज़रूरी है...और फ़ौरन दो जगहों पर जाना है. एक जगह तुम जाओ, - गोगिनों के यहाँ, ठीक है?”

सम्गीन इनकार न कर सका और उसने सिर हिला दिया, और वह ब्रेड चबाते हुए, बड़बड़ाई:

“मिउसा स्ट्रीट पे तोप से गोले चला रहे हैं. रास्तों पर भयानक कम लोग हैं! मुझे यहाँ नुक्कड़ पे रोक लिया, - किन्हीं बदमाश, गुण्डों ने गालियाँ दीं. हम साथ ही निकलेंगे, ठीक है?”

 “डर लग रहा है?” सम्गीन ने उससे और ख़ुद से भी पूछा.

“मेरे पास छोटी सी पिस्तौल है,” उसने कहा, “फ़ायर करना तो सीख लिया, मगर गोलियाँ बची हैं सिर्फ तीन. तुम्हारे पास पिस्तौल है?”

 “नहीं, - साफ़ करने के लिए दी है...”

 “चलो, क्लीमुशा, अंधेरा हो रहा है...”

हाँ, खिड़कियों के काँच ब्रोकेड जैसे हो गए थे. सड़क पर ल्युबाशा आसमान की ओर देखकर, कुछ आहट सी लेते हुए फिर से बोलने लगी:

“गोलियाँ नहीं चला रहे हैं. हो सकता है...आह, कितने कम हथियार हैं हमारे पास! मगर, फिर भी, मज़दूरों की जीत तो होगी ही, क्लीम, तुम देख लेना! कैसे लोग हैं! तुम कुतूज़ोव से तो नहीं मिले?”

सिर उठाकर, सम्गीन के चश्मे के नीचे देखते हुए उसने इस तरह मुस्कुराकर कहा, कि उस पल, वो जवान होकर, फिर से पहले वाली, गुलाबी गालों वाली ल्युबाशा बन गई:

 “पता है, मैं और वो...हम, शायद...”

अपनी बात वह पूरी नहीं कर पाई. कोने के पीछे से तीन लोग बाहर निकले, आगे – काले ओवरकोट में एक लम्बा आदमी, हाथ में छड़ी लिए; उसने सम्गीन का गिरेबान पकड़ लिया और धीमी आवाज़ में कहा:

“तलाशी लो.”

अपनी आँखों से कुछ ऊपर सम्गीन ने काली मूँछों वाला, मोटे गालों वाला चेहरा देखा, जो बेतहाशा चेचक के निशानों से भरा था, और उस पर थीं बदसूरत, छोटी-छोटी काली आँखें, गोल-गोल और चमकदार, जैसे बटन हों. उसने देखा कि कैसे ल्युबाशा चीख़कर उछली और मुट्ठी से खिड़की के काँच पर वार करके उसे तोड़ दिया. 

“लड़की को पकड़,” काली मूँछों वाले ने सम्गीन को झकझोरते हुए हुक्म दिया.

सम्गीन का दम घुट रहा था, वह भर्रा रहा था; फुर्तीले हाथों ने उसका ओवरकोट, जैकेट खोल दिया, जेबों की तलाशी ली, चश्मा फेंक दिया, और भारी-भरकम हथेली ने उसके कान पर झापड़ जमाकर उसे बहरा कर दिया.

 “हथियार - नहीं है,” एक ख़ुशनुमा और किसी बात से संतुष्ट सुरीली आवाज़ ने कहा, और तीसरा, भर्राई हुई आवाज़ में डर और दहशत से चीख़ा:

“छोड़, कमीनी! साशा!”

चेचकरू आदमी ने सम्गीन को दूर धकेला, उसका सिर दीवार से दे मारा, छड़ी घुमाई और फ़ुर्ती से दो बार हाथ पर, कंधे पर जमा दी. सम्गीन गिर गया, वह लगभग अपने होश खो रहा था, मगर उसने गोली चलने की आवाज़ सुनी और एक घुटी-घुटी आवाज़ चिल्लाई:

“सा-आशा, मार!”

अजीब सी आवाज़ में कोई कराहा, जैसे डकार ले रहा हो, - चेचकरू आदमी ने जंगलीपन से गाली दी, उसने सम्गीन की बगल में लात मारी और भागा, उसके पीछे-पीछे, परछाईं की तरह, कोई और भी लपका.

आँखें खोलने पर सम्गीन ने धुँध के बीच देखा की खम्भे की चौकी पे, किसी छुपकर बैठे जानवर की तरह, ल्युबाशा का भूरा जूता झुका हुआ है, और खम्भे से पीठ टिकाए, पेट पर टोपी दबाकर उसे दोनों हाथों से पकड़े, अपना काले नमदे के जूते वाला पैर घुमाते हुए, रोएँदार ओवरकोट पहने एक छोटे कद का आदमी बैठा है; उसका चेहरा कँपकँपा रहा था, गोल–गोल घूम रहा था, वह स्पष्ट, दुखभरी आवाज़ में बोला:

“मार डाला बेवकूफ़ ने...”. वह गिर पड़ा – करवट के बल और, एक हाथ से टोपी को पेट पर दबाए, दूसरे हाथ से उसने खंभे के आधार को पकड़ा, उठा और पुकारते हुए चलने लगा:

“साश-शा! वासिल्...” और तीखी, औरतों जैसी आवाज़ में चीख़ा:

 “ओह, गॉड!...”

जब वह एक मंज़िला हरे मकान के कोने पर पहुँचा, तो घर जैसे हिलने लगा, और उसमें से ज़मीन पर लोग गिरने लगे. सम्गीन ने फ़िर से आँखें बंद कर लीं. आवाज़ें ऐसे निकल रही थीं, जैसे पानी के पाइप से पानी बह रहा हो:

“लीज़ा, तुम बेकार ही में अपनी नाक घुसेड़ रही हो...”

“चुप रहो! सुबह तक वह हमारे घर में सोएगी.”

“क्या आप ज़ख़्मी हैं?”

“तुम्हें मालूम होना चाहिए, कि आजकल कितना ख़तरनाक...”

“क्या आप उठ सकते हैं?”

सम्गीन नहीं जानता था – कि वह उठ सकता है या नहीं, मगर उसने कहा:

 “ठीक है.”

उसे अचरज हुआ कि वह आसानी से अपने पैरों पे खड़ा हो गया, लड़खड़ाते हुए, दीवार को पकड़कर, लोगों से दूर जाने लगा, और उसे ऐसा लगा कि चार खिड़कियों वाला, एक मंज़िला, हरा घर उसके आगे-आगे चल रहा है, उसका रास्ता रोक रहा है. उसे याद ही नहीं रहा कि वह कैसे घर तक पहुँचा, मगर जब आँख खुली तो उसने अपने आप को अध्ययन-कक्ष में दीवान पर पाया; उसके सामने सहायक डॉक्टर विनोकूरोव खड़ा था, जो तामचीनी के बेसिन में तौलिया निचोड़ रहा था.

“क्या हुआ है?” उसने पूछा; उसकी आवाज़ दबी-दबी, जैसे बहुत दूर से आ रही थी; सम्गीन ने जवाब नहीं दिया, उसने सोचा:

कहीं मैं बहरा तो नहीं हो गया हूँ?’

“कृपया देखने दीजिए कि कहाँ चोट लगी है,” सहायक डॉक्टर ने दीवान पर बैठते हुए कहा, और वह सीने को, नितम्बों को टटोलने लगा; उसकी उँगलियाँ बर्दाश्त से बाहर ठण्डी, लोहे जैसी कड़ी थीं और चुभ रही  थीं.       

“क्या गिर पड़े थे, या, पड़ोस के लोगों ने हमला किया था?”

“मुझे अकेला छोड़ दीजिए,” सम्गीन ने विनती की, मगर सहायक डॉक्टर उसके सिर को टटोलते हुए बड़बड़ाता रहा:

“ओह, ये पड़ोसी भी... दर्द हो रहा है?”

अपने होठों को कसकर बंद करते हुए सम्गीन ख़ामोश रहा, - उसका दिल चाह रहा था कि सहायक डॉक्टर के पेट में लात मारे, मगर वो ये कहते हुए उठ गया:

“लगता है, जैसे सब ठीक है.”

“प्लीज़, मुझे अकेला छोड़ दीजिए,” सम्गीन ने विनती की.

 सही है,” सहायक डॉक्टर ने सहमति दर्शाई. “आपको शांति चाहिए. मैंने नौकरानी को आपकी बीबी को बुलाने के लिए भेज दिया है.”

वह चला गया, और कमरे में ख़ामोशी छा गई. दीवार के पास, धूम्रपान वाली छोटी मेज़ पर कम्बल में लिपटे श्शेद्रिन की तस्वीर को रोशन करते हुए एक मोमबत्ती जल रही थी; गंभीर दढ़ियल चेहरे की त्यौरियाँ गुस्से से चढ़ी थीं, भँवें हिल रही थीं, हाँ और सब कुछ, कमरे की सारी चीज़ें, ख़ामोशी से घूम रही थीं, झूल रही थीं. सम्गीन को ऐसा महसूस हुआ, जैसे वह तेज़ भाग रहा है, और उसके भीतर की हर चीज़ इस तरह हिलोरें ले रही है, जैसे बर्तन में रखा पानी, - हिलोरें लेता है और, भीतर से धक्का देते हुए, उसे और ज़्यादा झुलाता है.

सोमोवा को चेचकरू आदमी पर गोली चलानी चाहिए थी,” उसने सोचा. “वो, रोएँदार ओवरकोट वाला, डरावनी आवाज़ में ख़ुदा को पुकार रहा था, उसकी आवाज़ लोगों तक पहुँची ही नहीं. मगर चेचकरू आदमी मुझे मार सकता था’.

दीवान पर बहुत तकलीफ़ हो रही थी, वो गड़ रहा था, बगल में दर्द हो रहा था, कंधे की हड्डियाँ दर्द कर रही थीं. सम्गीन ने शयनकक्ष में जाने का इरादा किया, सावधानी से उठने की कोशिश की, - पैना दर्द कंधे को चीर गया, पैर मुड़ गए. दरवाज़े के हैण्डल को पकड़े हुए उसने दर्द के थमने का इंतज़ार किया, और वह शयनकक्ष में गया, आईने में देखा: आँख को ढाँकते हुए बायाँ गाल घिनौने ढंग से सूज गया था, चेहरा नशे में धुत् लग रहा था और, अपनी पहचान खोकर जिला अदालत के रजिस्ट्रार के चेहरे जैसा हो गया था, जिसके मसूड़े अक्सर फूले रहते थे.

नास्त्या आई, बोली:

 “मालकिन कल सुबह आएँगी.” और बदली हुई आवाज़ में आगे बोली:

“ओय, कितना बिगाड़ दिया है चेहरे को...”

और, शायद, ढाढ़स देने के लिए आगे बोली:

 “सभी को मारने लगे हैं.”

“बाथरूम में गरम पानी तैयार करो,” सम्गीन ने गुस्से से हुक्म दिया.

एक घण्टे बाद गरम, बदन को सहलाते पानी में बैठे हुए वह याद कर रहा था: क्या ल्युबाशा चिल्लाई थी? मगर उसे सिर्फ इतना ही याद आया कि उसने हरे घर की खिड़की का काँच तोड़ दिया था. शायद इसी घर के लोगों ने उसकी मदद की थी.”

अगर वो चेचकरू आदमी पर गोली चलाती, - तो कुछ भी नहीं होता. चेचकरू आदमी गुण्डा नहीं था, चोर नहीं था, बल्कि – बदला लेने वाला था’.

हल्के-फुल्के ख़याल, चिड़ियों के झुण्ड के समान तितर-बितर हो गए.

दूसरे दिन वह जल्दी उठा और सिगरेट पीते हुए, विदेश जाने का सपना देखते हुए बड़ी देर तक बिस्तर पे लेटा रहा. दर्द अब उतना पैना नहीं था, हो सकता है, इसलिए, कि जाना-पहचाना था, मगर किचन में और रास्ते पर छाई ख़ामोशी जानी-पहचानी नहीं थी, परेशान कर रही थी. मगर जल्दी ही खिड़कियों के गुलाबी शीशों पर लगते झटके उसे हिलाने लगे, और हर झटके के साथ एक गहरी, ज़बर्दस्त गरज सुनाई देती, जो बिजली की गड़गड़ाहट जैसी नहीं थी.

ऐसा सोच सकते थे, कि आसमान पे बादलों के बदले कोई चमड़ा कस कर तान दिया गया हो और उस पर किसी भारी-भरकम मुट्ठी से कोई यूँ प्रहार कर रहा है, जैसे ड्रम बजा रहा हो.

ये - बेहद बड़ी – तोपें हैं’, सम्गीन ने सोचा, और विरोध करते हुए, दबी आवाज़ में कहा: ये कमीनापन है!”

वह फ़र्श पर उछला, दर्द के मारे चीख बस निकलते-निकलते बची, कपड़े पहनने लगा, मगर फिर से लेट गया, ठोढ़ी तक अपने आप को ढाँक लिया. 

ये पागलपन और कायरता है – तोपों से गोले दाग़ना, घरों को, शहर को बर्बाद करना. दसियों लोगों की हरकतों के लिए लाखों लोग ज़िम्मेदार नहीं हैं.

क्रोधित विचारों ने उसमें अजीब सा जोश भर दिया, और इस जोश ने उसे चौंका दिया. गोलों की आवाज़, कंधे और बगल का दर्द सोचने में बाधा डाल रहे थे, भूख लगी थी. उसने नास्त्या को बुलाने के लिए कई बार घण्टी बजाई, आख़िरकार वह चिड़चिड़ाते हुए किचन से चिल्लाई:

“ हाँ - दे तो रही हूँ!”

जब वह डाइनिंग हॉल में आया, तो नास्त्या अलमारी ने तख़्ते पर इतने तैश में ब्रेड काट रही थी, जैसे एक बार अन्फ़ीमेव्ना ने मुर्गी काटी थी: चाकू कुंद था, मुर्गी, मरना नहीं चाहती थी, चीख़ रही थी, प्रतिकार कर रही थी.

 “आह, ख़ुदा तुझे जन्नत दे,” अन्फ़ीमेव्ना चिल्लाई और उसने मुर्गी का सिर काट दिया.

“ये गोलियाँ कहाँ चल रही हैं?”

“प्रेस्न्या पे.”

नास्त्या ने चिल्लाकर जवाब दिया, उसका चेहरा सूजा हुआ था, आँख़ें लाल थीं.

“वहाँ लोगों को मार रहे हैं, और ये – रास्तों पर झाडू लगा रहे हैं...जैसे त्यौहार से पहले करते हैं, कोई फ़रक ही नहीं पड़ता,” उसने ज़ोर-ज़ोर से एडियाँ खटखटाकर जाते हुए जवाब दिया.

शयन कक्ष में ही सम्गीन ने कुछ खुरचने की आवाज़ सुनी थी, - अब खिड़की से देखा कि सहायक डॉक्टर विनोकूरोव, कानों पर नीला स्कार्फ़ बाँधे, लोहे के ब्रश से फुटपाथ साफ़ कर रहा है, और स्कूली बच्चों वाली हैट पहने एक लड़का झाडू से बर्फ हटा-हटा कर उसके ढेर बना रहा है; उनकी बाईं ओर, बेरिकैड के पास, कोई और भी काम कर रहा है. वे इस तरह काम कर रहे थे, जैसे उन्हें आहें भरती हुई गोलियों की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही हो. मगर अब फ़ायरिंग रुक गई और सड़क से आती खुरचने की आवाज़ स्पष्ट हो गई, और कंधे की हड्डियाँ और ज़्यादा दर्द करने लगीं.

 क्या – सब हो गया?’

डाइनिंग हॉल में घड़ी दोपहर दिखा रही थी. दो बार और धमाकों की आवाज़ आई, मगर उतनी शक्तिशाली नहीं थी और किसी और जगह से आई थी.

विनोकूरोव और आम तौर से ये...सुअर, बेशक, पड़ोसियों की ओर इशारा करेंगे, जो...जिनके यहाँ मज़दूर आग तापते थे’.

नाले में फ़ेंकी गई रबड़ की गेंद की तरह, गोल-गोल घूमते हुए, दिमाग़ में उलझे हुए विचारों और शब्दों का गुच्छा तैर रहा था.

गोलियाँ ऐसे चल रही हैं, जैसे माथे पर चम्मच बज रही हो’, लाव्रूश्का ने कहा था. इस बार नहीं, तो अगली बार ही सही,’ याकोव ने वादा किया था, और ल्युबाशा ने ज़ोर देकर कहा था: जीत हमारी होगी’.

अपने घर के गेट पर राजकोष का एक भूतपूर्व क्लर्क, सूदखोर और घूसखोर – इव्कोव - खड़ा था और आसमान की ओर ऐसे देख रहा था, जैसे हवा को सूँघ रहा हो. आसमान में आज कौओं और चिड़ियों की संख्या काफ़ी ज़्यादा थी. बेरिकैड की ओर इशारा करते हुए इव्कोव चिल्ला रहा है, और मुस्कुरा रहा है, - वह स्टाफ़-कैप्टेन ज़ात्योसोव से चिल्लाकर कुछ कह रहा है, जो ग़ौर से देख रहा है कि कैसे उसका झुके हुए कंधों वाला बूढ़ा चौकीदार, फ़ेन्सिंग का निकला हुआ तख़्ता वापस बिठा रहा है.

इन्हें यकीन है कि सब ख़तम हो गया है’.

फ़ायरिंग थम गई थी, मगर ख़ामोशी सन्देहास्पद लग रही थी, कुछ इस तरह की टीस का एहसास हो रहा था, जैसे कोई पका हुआ फ़ोड़ा बस फ़ूटने वाला हो. ये भी अजीब बात थी, कि किचन में ख़ामोशी थी.

सम्गीन को लगभग ख़ुशी ही हुई, जब शाम को लाल गाल लिए, ज़िंदादिल वारवरा आई. वह हौले से मुस्कुराई, मुस्कुराहट में कोई व्यंग्य नहीं था, उसके चेहरे की ओर देखकर, और, फ़ौरन सलीब का निशान बनाकर पूछने लगी.

“ओ, माय गॉड... कितना भयानक! क्या तुमने ये पूछने के लिए किसी को भेजा, कि सोमोवा कैसी है?”

 “भेजने के लिए कोई है ही नहीं.”

“सहायक डॉक्टर से ही कह देते. चलो, कोई बात नहीं. मैं ख़ुद ही चली जाती हूँ. आह, प्यारे क्लीम...कैसे दिन आ गए हैं!”

वह इस तरह बर्ताव कर रही थी, जैसे उनके बीच कोई झगड़ा ही नहीं हुआ था, और उसने हौले से और आवेग से प्यार भी जताया, मगर फ़ौरन उछली और कमरे में तेज़-तेज़ घूमते हुए, सभी ओनों-कोनों को देखते हुए, तुनक कर त्यैरियाँ चढ़ाईं और बड़बड़ाई:

 “गॉड, कैसी बेतरतीबी, धूल, गंदगी! मगर, र्याख़िनों के यहाँ भी ...”

उसका चेहरा लाल हो गया, ब्लाऊज़ के बटन्स को ऊँगलियों से छूते हुए और अपनी हरी आँख़ों को बदसूरती से  विस्फ़ारित करते हुए, वह सम्गीन के पास आई.

“उनके यहाँ - न जाने क्या हो रहा है! सब, अचानक, - इस हद तक पगला गए हैं, बेकाबू हो गए हैं – भयानक! तुम्हें मालूम है, कि मैं भावुक नहीं हूँ, और ये...ये...”

एक साँस लेकर, आवाज़ नीची करके उसने अपनी बात पूरी की:

“क्रांति मेरे लिए अनजान है, मगर वो तो – कुछ ज़्यादा ही! अभी तो ये भी पता नहीं है, कि कौन ज़्यादा ताकतवर है, और वो अभी से चिल्लाने लगे: पीटो, गोली मार दो, कठोर कारावास की सज़ा दे दो! ऐसे, पता है...बदला लेने वाले हैं! और ये स्त्रतोनोव – गुण्डा, बदमाश, जंगली, एकदम समझ से बाहर की चीज़ है! साण्ड...”

उत्तेजना के कारण वह पसीने में नहा गई, उसने अपने आपको दीवान पर झोंक दिया और, रूमाल से चेहरे पर हवा करते हुए आँखें बंद कर लीं. उसके शब्दों की अशिष्टता को सम्गीन समझ रहा था, मगर उसकी उत्तेजना की सच्चाई में विश्वास नहीं हो रहा था, फिर भी वह ध्यान से सुन रहा था.

 “और ये प्रैस – याद है, छोटा सा यहूदी?”

 “हाँ, हाँ”, क्लीम ने कहा.

 ओह, ये यहूदी!” उँगली से धमकाते हुए, वह चहकी, “इन्हीं पर मुझे विश्वास नहीं है!  बदला लेने वाली कौम; कत्लेआम के बारे में कभी भी नहीं भूल सकते! वैसे, वो काफ़ी जोश से अपनी बात कहता है, ये प्रैस, लाजवाब वक्ता है! हमें’, वो कहता है, ‘सरकार का आभारी होना चाहिए, इसलिए, कि वह संगीनों के बल पर लोगों के ग़ुस्से से हमारी हिफ़ाज़त करती है’, - समझ रहे हो? फिर, ये तगील्स्की भी है, कॉम्रेड प्रोसेक्यूटर, बिल्कुल सनकी लगता है और, ज़रूर गुप्त रोगों का शिकार है, इतना भयानक परफ्यूम लगाता है, मगर फ़िर भी – आयडोफॉर्म की बदबू आती रहती है... जोकर और कसाई के बीच की कोई चीज़ है’, ऐसा उसके बारे में र्याखिन की बहन ने कहा था, छोटी वाली ने, जो पगली सी है...”

जेब में हाथ डालकर उसने एक छोटी सी किताब निकाली.             

देखो, मैंने उसके दो-तीन विरोधाभासों को लिख लिया है,जैसे: सामाजिक न्याय की विजय लोगों की आध्यात्मिक मृत्यु की शुरूआत होगी’. कैसा लगा? या : “जीवन का आरम्भ और अन्त – व्यक्तित्व में है, और चूँकि व्यक्तित्व की पुनरावृत्ति नहीं हो सकती, इतिहास – अपने आप को दुहराता नहीं है.क्या तुम बोरहो रहे हो?” अचानक उसने पूछा.

“नहीं, बल्कि मज़ा आ रहा है,” क्लीम ने जवाब दिया.

मगर वो फिर से कमरे में भागने लगी.

हर चीज़ इतनी भयानक हो गई है! बेचारी अन्फ़ीमेव्ना! आख़िर मर ही गई. हालाँकि ये उसके लिए अच्छा ही हुआ. वो इतनी जक्खड़-बूढ़ी हो गई थी. और ज़िद्दी भी. घर में उसे रखना मुश्किल हो जाता, और अस्पताल भेजना – अटपटा लगता. जाऊँ, जाकर उसे देख आऊँ.”

चली गई. कंधे में दर्द के बावजूद सम्गीन ने सिर झटका, जैसे उसमें से धूल झटक रहा हो.

नहीं, ये औरत – बर्दाश्त से बाहर है! मैं उसके साथ नहीं रह सकता’.

वारवरा कुछ ही मिनटों में लौट आई, लम्बा चेहरा पीला पड़ गया था, उस पर पीड़ा के भाव थे.

 “कैसे खा गए हैं चूहे, ऊफ़!” उसने दीवान पर बैठते हुए कहा. “तुमने – देखा? तुम – ग़ौर से देखो! भयानक!”

थरथराकर उसने सिर झटक दिया.

“सड़क पर कुछ चिल्ला रहे हैं...”

और, सम्गीन की ओर खिसक कर उसने उसके घुटने पर हाथ रखा:

“पता है, मैं विदेश जाना चाहती हूँ. मैं इतनी थक गई हूँ, क्लीम, इतनी थक गई हूँ!”

 “बुरा ख़याल नहीं है,” उसने कहा, वह सुन रहा था और सोच रहा था: कितनी दयनीय है ये! और – बनावटी. लाड़ कर रही है, क्योंकि विदेश जा रही है, शायद अपने प्रेमी के साथ’.

“अब मैं जवान तो नहीं हूँ,” वारवरा ने गहरी साँस लेकर कहा.

“ज़रा ठहरो!”

सम्गीन उठा, खिड़की के पास गया – रास्ते पर बेतरतीब सैनिकों का झुण्ड जा रहा था; सबसे आगे वाला अपनी बंदूक हिलाते हुए कुछ चिल्लाया. सम्गीन ने ध्यान से सुना – और समझ गया:

“दरवाज़े, गेट्स, वेन्टिलेटर्स बंद करो, , तुम! बंद करो – गोली चला देंगे!”

क्लीम चौखट के पीछे सरक गया. सैनिक करीब बीस थे; उनके बीच आग बुझाने वालों का एक झुण्ड था, तीन – काले, हेल्मेट में, करीब दस लोग भूरे – टोपियों में, कमर में कुल्हाड़ियाँ बाँधे. हरे रंग की गाड़ी जा रही थी, मोटे घोड़े सिर हिला रहे थे.

“ये कहाँ जा रहे हैं?” वारवरा ने सम्गीन से चिपकते हुए फ़ुसफ़ुसाकर पूछा; वो एक ओर हट गया, ये देखते हुए कि आग बुझाने वाले लोगों ने कैसे गाड़ी से सब्बल उतारे, बेरिकैड के पास गए. लगातार मारने की आवाज़ सुनाई देने लगी, लकड़ी चरमराई, उसके टुकड़े बिखरने लगे.

 “आह, तो ये बात है!” वारवरा चीख़ी.

सम्गीन देख रहा था कि बेरिकैड वाले टापू को खोलते हुए, हिम के टुकड़े कैसे उछल रहे हैं, कैसे दो आग बुझाने वाले दीवान की पीठ तोड़कर, उसमें भरे हुए स्पंज के टुकड़े खींच खींचकर उसे तीसरे की तरफ़ फेंक रहे हैं, और उसने, घुटनों के बल खड़े होकर, अपने जैकेट की आस्तीन से रगड़कर माचिस की तीली जलाई; तीलियाँ बुझती रहीं, मगर उनमें से एक जल उठी, आग बुझाने वाले ने उसे स्पंज के ढेर में घुसा दिया, और चालाक, घुंघराली लपटें, सभी दिशाओं में भागने लगीं, ग़ायब हो गईं, और अचानक एक लाल लपट बनाते हुए इकट्ठा हो गईं; तब एक आग बुझाने वाले ने आग के ऊपर गठरी उठाई, उसमें से घास-फूस, लकड़ी की चिपटियाँ झटक दीं; घना, भूरा धुँआ लहराते हुए उठा - आग बुझाने वाले ने उसमें गठरी डाल दी, धुँआ और घना हो गया, और उसके बाद गठरी से घनी लाल लपट बाहर निकली. सड़क पर प्रसन्नता और शोर-शरावा फ़ैल गया, सामने वाला घर लाल हो गया, जवान हो गया, आग बुझाने वाले और सैनिक भी जवान हो गए, पतले, छरहरे हो गए.                    

घोड़े भी ऐसे चमकने लगे, जैसे तेल में नहाए, लाल आँखों वाले ताँबे के घोड़े हों. बड़ी आसानी से हिम के टीले से तोड़-तोडकर कुर्सियों को, संदूकों को, किसी दरवाज़े को, गाड़ीवान के ठेले को, टेलिफ़ोन के खम्भे के बड़े टुकड़े को निकाल कर आग में झोंक दिया गया. करीब पाँच सैनिक भी, अपने कॉम्रेड्स को बंदूकें थमाकर पुरानी, जर्जर चीज़ों को तोड़ रहे थे, उनके टुकड़े कर रहे थे, - बाकी के सैनिक आग के पास आते जा रहे थे; धुँएदार-नीली और लाल - दो रंगों वाली हवा में संगीनें चमक रही थीं, मोमबत्तियों की लम्बी लौ की तरह, और उसी तरह ऊपर की ओर लपक रही थीं. कुछ कुछ सैनिकों के हाथों में दो-दो बंदूकें थीं, - एक की लाल संगीन जैसे सिर से निकल रही थी, और दूसरा, बेहद मज़बूत कद-काठी का, हाथ हिलाते हुए आग के सामने उछल रहा था, और चीख़ रहा था.        

हेल्मेट और काले जैकेट पहने आग बुझाने वाले विनोकूरोव के घर के गेट के पास खड़े थे और इस काम में हिस्सा नहीं ले रहे थे; उनके ताँबे के सिर जैसे पिघल रहे थे, और रोमन सैनिकों जैसे सिरों वाली इन काली निश्चल आकृतियों में कोई ख़ास बात तो थी.

“सुंदर,” सम्गीन ने हौले से कहा. वारवरा ने कंधे से उसे धक्का देकर पूछा: “अच्छा?”

और फ़ौरन पीछे हटकर आहत स्वर में बोली:

 “खिड़की के दासे से पानी टपक रहा है, - छि:!”

सम्गीन मुस्कुराकर ये सोचते हुए दूर हटा, कि वो अक्सर इस बात के लिए उसे उलाहना देती है, कि वह हर ख़ूबसूरत चीज़ के प्रति उदासीन है, मगर ख़ुद नहीं देख रही है कि ये दृश्य कितना शानदार है. उसने महसूस किया कि इस दृश्य ने उसके दिल को छू लिया है, जैसे उसे बेरिकैड के बारे में दुख हो रहा था और साथ ही वह किसी चीज़ के लिए किसी का एहसानमंद भी था. अपने अध्ययन कक्ष में आया, वहाँ बड़ी देर तक खिड़की के पास खड़ा रहा, बस यूँ ही देखते हुए कि अलाव कैसे जल रहा है, और उसके चारों ओर तथा उसके ऊपर शाम का धुँधलका गहराता जा रहा था, भारी, भूरे धुँए में विलीन होते हुए, कैसे आग के नीचे से फुटपाथ पर काली, डामर जैसी धाराएँ बह रही हैं. अलाव अब कुछ धीमा पड़ गया था; तब आग बुझाने वाले, आँगनों में घुसकर, वहाँ से लकड़ियों के गट्ठे लाए, उन्हें आग में डाल दिया, एक मिनट को धुँआ और गहरा हो गया, मगर फिर आग उसे चीरती हुई बाहर निकली, और आग की लपटों ने घरों को थरथराने पर, सिकुड़ने पर मजबूर कर दिया. फिर मकान काले हो गए, लाल हुई संगीनें और हेल्मेट्स जम गईं और ऊँचा आग बुझाने वाला वहाँ से भागा और अँधेरे में पड़े कोयलों के ढेर को फाँद गया.

सुबह से ही फ़ायरिंग होने लगी. उनकी आवाज़ ज़्यादा ताकतवर थी, जैसे ठण्ड से जम गई धरती में फ़ौलाद के स्वचालित हथौड़े से मार-मारकर भारी-भरकम खम्भे को गाड़ा जा रहा हो...

त्सार की सत्ता को मज़बूत बनाने का संदेहास्पद तरीका’, सम्गीन ने कपड़े पहनते हुए बड़ी शांति से सोचा, उसे ख़ुद ही अचरज हुआ कि वह शांति से सोच रहा है. डाइनिंग रूम में वारवरा जोश से काँच के बर्तनों की आवाज़ कर रही थी.

यकीन नहीं होता!” उसके आते ही वह चहकी. “ शैतान जाने क्या हो रहा है! कितने सारे बर्तन टूट गए हैं.”

सिर पर बँधे सफ़ेद रूमाल, एप्रन, थके हुए चेहरे में वह नौकरानी जैसी लग रही थी.

“आह, अन्फ़ीमेव्ना,” किचन में भागते हुए और वहाँ से लौटते हुए उसने गहरी साँस ली.

वह, जैसे, खिड़की के शीशों की डरी हुई चीख, दीवारों पर पड़ते हुए हवा के धक्के, भट्टी के पाइप में घुटी हुई, भारी-भारी साँसे नहीं सुन रही थी. असाधारण फ़ुर्ती से, जैसे किन्हीं प्रसिद्ध और अपेक्षित मेहमानों का इंतज़ार कर रही हो, वह धूल झाड़ रही थी, बर्तन गिन रही थी, न जाने क्यों फ़र्नीचर छू रही थी. सम्गीन ने सोचा कि इस शोर-शरावे वाले काम में वह उसके प्रति अपने गुनाह के एहसास को छुपा रही है. मगर उसके गुनाह के बारे में और वैसे भी, उसके बारे में सोचने को जी नहीं चाह रहा था, - उसने स्पष्टता से हज़ारों गृहणियों की कल्पना कर ली, जो, शायद, आज इसी तरह से भाग दौड़ कर रही होंगी.

“नस्तास्या का पता ही नहीं है!” वारवरा तैश में आ गई थी. “हिसाब कर दूँगी. तुमने उस बदमाश, दरबान को क्यों छोड़ दिया? क्लीम, हम नौकरों के साथ सही तरह से पेश नहीं आते हैं, हम उनके साथ अपनापन दिखाने लगते हैं, और उन्हें मनमानी करने देते हैं. मैं – डेमोक्रेटिज़्म के ख़िलाफ़ नहीं हूँ, मगर फ़िर भी, ये ज़रूरी है, कि लोगों को अपने ऊपर एक मज़बूत, ताकतवर हाथ महसूस होता रहे...”

ये बात भी आज हज़ारों लोग कह रहे होंगे’, अपने दुखते हुए कंधे को सहलाते हुए क्लीम ने ग़ौर किया.

शाम तक वह किसी बूढ़े को पकड़ लाई, जिसने अन्फ़ीमेव्ना के दफ़न की ज़िम्मेदारी ले ली. ये बूढ़ा अस्वाभाविक रूप से ज़िंदादिल और फ़ुर्तीला था - भूरी, करीने से कटी हुई दाढ़ी की फ़्रेम में जड़ा गुलाबी, नुकीला, चूहों जैसी छोटी-छोटी आँखों और पंछी जैसी नाक वाला थोबड़ा. उसके हाथ सभी दिशाओं में उड़ रहे थे, हर चीज़ छू रहे थे, महसूस कर रहे थे : दरवाज़े, दीवारें, स्लेज गाड़ी, बूढ़े, सुस्त घोड़े की ज़ीन. बूढ़े ने किशोरों जैसे कपड़े पहन रखे थे, उसमें कोई घृणित, बनावटी बात थी.

“गोलियों के बल पर अपनी बात मनवा रहे हैं,” उसने सवालिया अंदाज़ में सम्गीन से कहा, जैसे इस वाक्य से वाकिफ़ हो, कहा और आसमान की ओर देखकर आँखें मिचकाईं,जैसे आसमान से गोलियाँ चल रही हों.

गोलियाँ जैसे ज़िद्दीपन से चल रहीं थीं. ऐसा लग रहा था कि ये बूम-बूम की मार कोहरे से भरी हवा में सड़ी हुई बदबू फ़ैला रही थी, जैसे भारी-भरकम सड़े हुए अण्डे फूट रहे हों.

“तू उसे चर्च तक ले जा,” वारवरा ने स्लेज-गाड़ी में रखे चौड़े ताबूत की ओर देखकर गालों पर रूमाल फ़ेरते कहा.

मैं नहीं सोचता, कि उसे इसकी ज़रूरत थी,” वह बुदबुदाया और चल पड़ा.

वारवरा ने उसका हाथ पकड़ा; उसने उसकी आँखों में आँसू देखे; देखा, कि उसके होंठ काँप रहे हैं, वह उन्हें काट रही है, और उसने उस पर यकीन नहीं किया. अपनी नीली हथेली से अस्पताल के पीले ताबूत को सहलाते हुए बूढ़ा स्लेज की बगल में चल रहा था, और गाड़ीवान से कह रहा था:

“सब मर जाएँगे, चचा...पंछियों की तरह!”

सम्गिनों के पीछे-पीछे सहायक डॉक्टर विनोकूरोव चल रहा था, उसने दो-एक बार ज़ोर से अपने बारे में एहसास दिलाया:

“ इन्साफ़ पसंद थी बुढ़िया...लाजवाब!”

बूढ़ा रुका और इंतज़ार करने लगा कि कब सहायक डॉक्टर उसके पास पहुँचे, और चूज़े जैसे छोटे-छोटे कदमों से चलते हुए जल्दी-जल्दी, दबी ज़ुबान में कहने लगा:

“तुम क्या करोगे? जनता कुछ नहीं चाहती, नहीं चाहती! ख़ुद त्सार उसके सामने झुका, बोला – माफ़ करो, मैं वाकई में छोटे देश के साथ युद्ध हार गया, - शर्मिंदा हूँ! मगर लोगों को कोई सहानुभूति ही नहीं है...”

 “तुम हो कौन?” सहायक डॉक्टर ने कड़ाई से पूछा.

 “मैं? चर्च का चौकीदार हूँ. तो क्या?”

“ये, कि बदतमीज़ी से बात कर रहे हो!” गहरी आवाज़ में सहायक डॉक्टर ने जवाब दिया.

“ख़ैर, मगर फ़िर भी, मैं सही कह रहा हूँ,” हाथों को हिलाते हुए बूढ़े ने कहा और वही वाक्य दुहरा दिया, जो, ज़ाहिर है, उसे अच्छा लगा था:

“मतलब – गोलियों के बल पर जनता को मनाने की कोशिश कर रहे हैं, - शांति से रहो! क्या मॉस्को में ऐसा कभी हुआ था? कि मॉस्को में गोलियों से, जहाँ त्सारों की शादियाँ होती हैं, हाँ?” टोपी पकड़े हुए हाथ को झटक कर वह अचरज से चहका, और, कुछ देर चुप रहकर, बोला: “ये समझना चाहिए!”

सम्गीन मुड़ा, उसने गुलाबी चेहरे की ओर देखा, - वो जोश से चमक रहा था.

“माफ़ कीजिए,” रूई जैसे बालों के गुच्छों से ढँकी अपनी पीली खोपड़ी को झुकाकर बूढ़े ने कहा, “बकवास किए जा रहा हूँ, रूह के डर से.”

 “मैं और आगे नहीं जाऊँगा,” उस नुक्कड़ तक जाकर, जिसके पीछे उसे पीटा था, सम्गीन फ़ुसफुसाया. वारवरा आगे चल पड़ी, और वह रुक गया, सुनता रहा कि नंगे पत्थरों पर स्लेज की पट्टियाँ कैसे चरमरा रही हैं, सोचा, कि हरे वाले घर में जाकर ल्युबाशा के बारे में पूछना चाहिए, मगर घर चला गया.

वारवरा पूछ लेगी’.

गोलियाँ रुक गई थीं. भूरा आसमान दो रंग़ों में चमक रहा था, एक – वहाँ, जहाँ सूरज डूब रहा था, दूसरा – प्रेस्न्या की तरफ़. हमेशा की तरह, शाम के समय चिड़ियों और कौओं का झुण्ड चक्कर लगा रहा था. गली से तीर की तरह घोड़ा बाहर निकला, - स्लेज में गुड़ी-मुड़ी होकर ल्यूतोव बैठा था.

“रुको!” वह चीख़ा और इससे पहले कि गाड़ीवान घोड़े को रोकता, आसानी से फुटपाथ पर कूद गया, सम्गीन की ओर भागा और उसके पैरों को खुले हुए ओवरकोट के पल्लों से ढाँक दिया.

“अरे, तुम कैसे बदल गए हो!बड़ी अजीब तरह से, बल्कि कुछ आदर के साथ वह चहका. “और हाथ – क्या हुआ?”

क्लीम की संक्षिप्त कहानी सुनकर वह चुप हो गया और सिर्फ प्रवेश कक्ष में ओवरकोट फेंककर उसने पूछा:

घर के जापानियों को आसानी से मारते हैं?”

सम्गीन ने भी पूछा:

“ये - व्यंग्य है या प्रशंसा?”

ल्यूतोव को देखकर उसे ख़ुशी हुई थी, मगर वो नहीं चाहता था, कि ल्यूतोव समझ जाए, और ख़ुद भी नहीं समझ पा रहा था: ख़ुशी क्यों हुई थी? और ल्यूतोव, हाथ मलते हुए बोला:

“रूसी दलदल में गिट्टी डाल रहे हैं, नई राह के लिए पुल बना रहे हैं...”

वो असाधारण रूप से हट्टा-कट्टा, चुस्त-दुरुस्त लग रहा था – साधारण कोट पहने, काली टाई पर हीरे की पिन, बाल कटे हुए, चिकना चेहरा. उसकी चंचल आँखें भी शांत हो गई थीं और जैसे ज़्यादा बड़ी हो गई थीं.

 “आज मैंने एक अच्छा वाक्य सुना; ‘गोलियों के बल पर मना रहे हैं’,” सम्गीन ने कहा.

“बुरा नहीं है!” एकटक उसकी ओर देखते हुए ल्यूतोव सहमत हो गया.

“तू ऐसे क्यों ...देख रहा है?”

“पहचान में नहीं आ रहा है,” ल्यूतोव ने जवाब दिया और ज़ोर से गहरी साँस लेकर जम के कुर्सी पर बैठ गया...”मैं, भाई, टाऊन-हॉल से आ रहा हूँ, मारे गए और घायल लोगों का बंदोबस्त करने के लिए अपने घर में एक रिसेप्शन-पॉइन्ट बनाना चाहता हूँ. ये, ज़ाहिर है, अलीना, वो, भाई...”

ल्यूतोव ने अपनी मुट्ठी पर रोएँदार टोपी रख ली और उसे घुमाने लगा.

“वहाँ, शैतान जाने क्या हो रहा था! अलीना किसी अराजकतावादी को पकड़ लाई...मोनाखोव, इनोकोव, ऐसा जानवर, - उसके पास से गुज़र ही नहीं सकते!”                              

“अगर – इनोकोव है, तो मैं उसे जानता हूँ,” सम्गीन ने उदासीनता से कहा.

उसका पुराना दोस्त है. फिर, ये भी, सुदाकोव,” उसे भी गोली लगी थी.”

उसने सिर हिलाते हुए फिर गहरी साँस ली.

“ऊफ़्फ़!”

“तो, टाऊन-हॉल में क्या हुआ?” सम्गीन ने पूछा.

“पूछने लगे: “बंदोबस्त कर लिया?” – “कर लिया”. -  “किसलिए?” - “जिससे तुम्हारे गंदे कामों को छुपा सकें...”

“शायद – झूठ बोल रहा है”, सम्गीन ने सोचा.          

“कुछ देर तक बहस करते रहे. मुझसे लिखवा लिया कि शहर छोड़कर नहीं जाऊँगा, और मैं अलीना को विदेश भेजना चाहता था.”

अचानक, जैसे छत के ऊपर, तोप के गोले की आवाज़ गरजी, - इतनी ताकत से गरजी, कि दोनों उछल पड़े, ल्यूतोव ने त्यौरियाँ चढ़ाकर टोपी फ़र्श पर गिरा दी और चिल्लाया:

 “ये-ए हरामी! क्या छत टूट गई है? फ़ायरिंग दुबारा हुई. दोनों ख़ामोश हो गए, तीसरी फ़ायरिंग का इंतज़ार करने लगे. सम्गीन सिगरेट पीने लगा, उसे महसूस हो रहा था, कि उसके भीतर कुछ दर्द कर रहा है, उसी तरह जैसे खिड़की के शीशे कराह रहे हैं. दो-एक मिनट ख़ामोश रहे. ल्यूतोव ने टोपी घुटने पर रख ली और अपनी बात जारी रखी, हल्की आवाज़ में, चिंता से:

“वहाँ, टाऊन-हॉल में, एक कमीना है, जो मेरे प्रति ईमानदार है, मुझे थोड़ी बहुत जानकारी देता रहता है, जो हमेशा सही होती हैं. तो, तेरे बारे में पता है, कि तूने बेरिकैड्स बनाई थीं...”

सम्गीन की ओर सवालिया नज़र से देखते हुए वह ख़ामोश हो गया, और क्लीम, अपने धुँए से चेहरा छुपाए बोला:

“बकवास.”

 “नहीं, इस बारे में संजीदगी से सोचो,” ल्यूतोव ने सलाह दी. “वहाँ कोई लिहाज़ नहीं करता! डॉक्टर, - उपनाम भूल गया, - विनोकूरोव के पास, शायद, आए थे – तलाशी लेने, और प्राइवेट पुलिस ऑफ़िसर ने गोली मार दी. पीछे - सिर में. हाँ. और उसी तरह कोस्त्या मकारोव को भी दबोच लिया, - वो, हमारे वहाँ लोगों का इलाज कर रहा था और हमारे ही यहाँ रहता था, तीन दिन हो गए, उसका पता ही नहीं है. फ़र्नीचर फ़ैक्टरी के मालिक स्मिथ को – जानते हो?”

“मिल चुका हूँ.”

“उसे गिरफ़्तार कर लिया, उसकी आँखों के सामने करीब बीस मज़दूरों को गोली मार दी. ऐसी बात है! कोलोम्ना में – शैतान जाने क्या हुआ, ल्यूबेर्त्स में – पता है? रास्तों पर मार रहे हैं, चूहों की तरह.”

ल्यूतोव शांति से कह रहा था, जैसे मनन कर रहा हो और, आँखें मिचकाते हुए लगातार सम्गीन की ओर देखे जा रहा था, जिससे उसे अटपटापन महसूस हो रहा था, और उसे ये सोचने पर मजबूर कर रहा था, कि अब कोई बेतुकी बात होने वाली है. हुआ भी ऐसा ही. ल्यूतोव के चेहरे पर अचानक लाल-लाल धब्बे छा गए, उसने फ़र्श पर टोपी मारी और विलाप करने लगा:

“ वो-ओ पागल, डरपोक सुअर! फ़-फ़ायरमैन...लोगों का ईंधन झोंक रहा है, आँ?”

उसने चिड़चिड़ाहट से, तैश में, सोफ़े के हत्थे को खटखटाते हुए गालियाँ देना शुरू कर दिया, मगर ये सब वो इस तरह कर रहा था, जैसे उसके जिस्म का सिर्फ आधा हिस्सा ही तैश में हो, क्योंकि सम्गीन ने देखा: एक आँख झपकाते हुए, दूसरी आँख़ से ल्यूतोव उसकी तरफ़ देख रहा था.

“हमारे यहाँ इतना कमीना शासन कभी नहीं था!” वह चिंघाड़ रहा था, फुफ़कार रहा था. “इवान ग्रोज़्नी, पीटर – उनके पास कोई उद्देश्य...उद्देश्य था, मगर – ये? ये किसलिए? नाकाबिल जानवर...”

“चिल्लाने से - कोई फ़ायदा नहीं है,” सम्गीन बड़बड़ाया, जब ल्यूतोव शब्दों की बौछार कर रहा था.

“और – आमीन!” टोपी पहनते हुए ल्यूतोव चीख़ा. “और तू – भाग जा! इस बारे में दुन्याशा भी तुझसे कहेगी. निकल जा, भाई! ख़तम कर देंगे.”

उसने सम्गीन का हाथ पकड़ा, उसे खींचते हुए, चश्मे के नीचे से देखते हुए ख़ामोश हो गया, और अचानक हौले से, व्यंग्य से पूछा:

“और – अचानक उनकी तोपें छीन ली जाएँ? अचानक प्रोखोरोव के मज़दूरों का पलड़ा भारी हो जाए, आँ? क्या होगा?”

सम्गीन मुस्कुराते हुए कहने लगा:

 “क्या तू बिना नाटक किए नहीं रह सकता!”

 “नहीं, सोच, क्या होगा, आँ?” ओवरकोट पहनते हुए ल्यूतोव फ़ुसफ़ुसाया.

और बेहद गरम हाथ से सम्गीन का हाथ दबा कर ग़ायब हो गया.

सम्गीन को ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे वह समझ ही नहीं पा रहा हो, कि उसके ऊपर गरम पानी डाल दिया गया है, या ठण्डा पानी? कमरे में चहलकदमी करते हुए उसने ल्यूतोव के सभी शब्दों को, उसकी सभी चीख़ों को एक वाक्य में पिरोने की कोशिश की. ये – नहीं हो पाया, हालाँकि निकल जा’, ‘भाग जाये शब्द सबसे ज़्यादा प्रभावशाली लग रहे थे. वह खिड़की के ठण्डे काँच से माथा टिकाकर खड़ा हो गया. रास्ता बिल्कुल सुनसान था, सिर्फ कोई औरत, झुककर अलाव के काले घेरे का चक्कर लगा रही थी और कोयले चुनकर डलिया में रख रही थी. एक ख़ास किस्म की ख़ामोशी थी. न जाने कब से सम्गीन ने ऐसी मासूम ख़ामोशी नहीं सुनी थी. और, बगैर शब्दों के. उसने सोचा:

“हो सकता है – ख़त्म हो गया हो...”

ख़ामोशी बढ़ रही थी, गहराती जा रही थी, एक अप्रिय एहसास हो रहा था, - जैसे फ़र्श नीचे धँस गया हो, पैरों के नीचे से फ़िसल गया हो. जैकेट की जेब में घड़ी टिकटिक कर रही थी, किचन से नमक लगी मछली की तीव्र गंध आ रही थी. सम्गीन ने झरोखा खोला, और, ठण्ड के साथ-साथ कमरे में विलाप करती कमाण्ड सुनाई दी:

“सावधा-आ-न!”

धुँधली हवा में संगीनों के बर्फ से ढँके सिरे उछल रहे थे, फुटपाथ की तरफ़ सैनिकों का झुण्ड जमा हो गया; उनके पास धीरे-धीरे चलते हुए कज़ाकों के छोटे, गुस्सैल घोड़े आए; बीच में अपने अगले पैरों को ऊँचा उठाते हुए, दाँत भींचे हुए, एक भारी लाल घोड़ा चल रहा था, - उसकी पीठ पर शान से सवार था एक मोटा, मुच्छड़ योद्धा, लाल, फूले-फूले चेहरे वाला, सीने पर मेडल्स लटकाए; सफ़ेद दस्ताने में बंद मुट्ठी में, उसने कोड़ा पकड़ रखा था, - उसे सीने की ऊँचाई पर रखा था, जैसे पादरी सलीब उठाए चलते हैं. वह सड़क पर बिखरे हुए सैनिकों की ओर न देखते हुए गुज़र गया, - उसके पीछे, ज़ीनों में उछलते हुए, फिर से लपकते हुए कज़ाक आए; आख़री वालों में से एक, दढ़ियल, ज़ीन में उछला, सैनिक की बगल से एक थैली छीन ली, और ये थैली फ़र के स्कार्फ में बदल गई; सैनिक ने संग़ीन घुमाई, मगर दढ़ियल कज़ाक के साथ दो और ने अपने घोड़ों को उछलने पर, गोल घूमने पर मजबूर कर दिया, - सैनिक बिखर गए, घरों की दीवारों से चिपक गए.    

लाल घोड़ा भारीपन से उछलते हुए जा रहा था और, अपने दाँतों को और भी ज़्यादा दिखाते हुए वो हिनहिनाया:

 “ये-ए कैसे घुड़सवार हैं? कमाण्डर कौन है?”

सम्गीन परदे के पीछे से झाँकते हुए, हँस पड़ा, - ऐसा लग रहा था, कि ये घुड़सवार नहीं, बल्कि घोड़ा पूछ रहा हो.

डाइनिंग हॉल में वारवरा ने चिल्लाना शुरू किया:

“कमीने! और ये – रक्षक हैं!”

सम्गीन ने दरवाज़े से देखा कि वह डाइनिंग रूम में कैसे दौड़ रही है, कंधों से ओवरकोट उतार कर फेंक रही है, सिर से टोपी निकाल कर फेंक रही है, कुर्सियों से टकरा रही है, जैसे अंधी हो.

“तुम – समझ रहे हो? पकड़ लिया, तलाशी ली...तुम सोच भी नहीं सकते – कैसे! दस्ताने खींच लिए, स्कार्फ़ छीन लिया...ये तो सरासर – लूट है!”

वो भागते हुए सोफ़े पे गिर गई और, हिचकियाँ लेते हुए, अजीब तरह से जल्दी जल्दी पैर पटकने लगी. सम्गीन ने कनखियों से उसके ब्लाऊज़ का खुला हुआ कॉलर देखा और, गहरी साँस लेकर पानी लाने चल दिया.

अगले कुछ दिन आश्चर्यजनक ढंग से शांत, खाली और बेहद धीरे-धीरे बीते. सम्गीन को ये सोचने का बहाना मिल गया, कि उसने सभी परेशानियों को सहन कर लिया है और अब उसे आराम करने का हक है, जिसकी उसे ज़रूरत थी. मगर पता चला कि आराम उतना ज़रूरी नहीं था और परेशानी, जिसे उसने सहा नहीं था और जो अपमानजनक ढंग से अपने नयेपन के कारण उसे हैरान करने वाली थी, अभी बाकी थी. ये नई परेशानी लोगों से बातचीत करने की माँग कर रही थी, कुछ घटनाओं की माँग कर रही थी, मगर लोग आ ही नहीं रहे थे, घर से निकलने में सम्गीन को ख़तरा महसूस हो रहा था, और ठीक भी है, टूटा फूटा चेहरा लिए घूमना अटपटा लग रहा था. घटनाएँ, बेशक, हो रही थीं और रातों को और दिन में भी कभी कभार बंदूकों और रिवॉल्वरों की गोलियों की आवाज़ आ जाती थी, मगर स्पष्ट था, कि अब पूर्ण विराम लगने वाला है.

खिड़कियों के सामने से कज़ाकों के गश्ती दल गुज़रते, काफ़ी दिनों से दिखाई नहीं दिए पैदल पुलिस वालों की टुकड़ियाँ गुज़रती, वारवरा अपने आप को काबू में रखते हुए शोर मचाती, सम्गीन की ओर ऐसी नज़र से देखती, जो कुछ चाहती थी.

 “ये – क्रांति नहीं है, - बल्कि बचपना है, - वह डाइनिंग हॉल में किसी से कह रही थी. “तोपों के ख़िलाफ़ पिस्तौलों से!”

सम्गीन महसूस कर रहा था, कि वो बहस करना चाहती है, झगड़ा करना चाहती है, और वह अपने अध्ययन कक्ष में बैठा हुआ ख़ामोश रहता.

मगर ये सब धीरे-धीरे गुज़र रहे दिनों के ख़ालीपन को भरने में असमर्थ था और परेशान होने की आदत को भी संतुष्ट नहीं कर रहा था: थका देने वाली, मगर ज़िद्दी आदत को. अख़बार कुछ अस्पष्ट सी, बूढ़ों की कुड़कुड़ाहट जैसी बकवास करते; अख़बार कुछ भी नहीं बताते थे, और वो थे भी बहुत थोड़े. अन्फ़ीमेव्ना की जगह पे एक दुबली-पतली, सपाट छातियों वाली औरत आई, उसकी उमर का पता नहीं चलता था; ख़ामोश तबियत, जेल के वार्डन जैसी, वह इस तरह घूमती, जैसे काठ की बनी हो, अप्रिय ढंग से सीधे चेहरे की ओर देखती, - उसकी आँख़ें धुँधले काँच जैसी थीं; जब वारवरा उसे कोई हुक्म देती, तो वो, प्रयत्नपूर्वक अपने पतले, हमेशा कस कर बंद किए होठों को अलग करती, मुख़्तसिर सा जवाब देती:

“सुन रही हूँ. समझ गई.”

 

                 

           

         

 

            

 

  

            

                          

     

        

      

 

 

                

           

 

   

          

    

             

           

     

        

      

                                                                                            

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