सम्गीन हैरानी से, अपने ही आप पर व्यंग करते हुए सोच रहा था, कि उसे घर
में और सड़क पर बेरिकैड्स की सुरक्षा करने वालों को देखना, कॉम्रेड
याकोव की स्पष्ट, नर्म आवाज़ सुनना अच्छा लगता. अन्फ़ीमेव्ना की
कमी महसूस हो रही थी, और ये सोचकर अटपटा लग रहा था, शर्मिन्दगी
हो रही थी कि उसके भले चेहरे को चूहों ने खा लिया था. आम तौर से – लोग ही नहीं थे, वे भी नहीं, जो पहले
बुरे लगते थे, फ़ालतू नज़र आते थे. रात दिन सड़क पर, छतों पे
हवा गरजती रहती, जो तेज़ तो नहीं थी, मगर लगातार
चलती रहती और घरों और लोगों के बीच पराएपन की दीवारें खड़ी करती; ये दीवारें
दिखाई तो नहीं देती थीं, मगर जिस तरह से लोग ख़ामोश हो गए थे, संदेह और निराशा
से एक दूसरे को देखते थे, सामना होने पर छिटक कर अलग-अलग दिशाओं में चले
जाते थे, उससे महसूस ज़रूर होती थीं. दो-एक बार शाम को सम्गीन
ताज़ी हवा खाने बाहर निकला, और उसे ऐसा महसूस हुआ कि जान-पहचान के लोगों
में से सभी उसका अभिवादन नहीं कर रहे थे, जैसा पहले करते थे, और उसकी ओर
इतनी अप्रियता से देखते, जैसे उसने ताश के खेल, ‘प्रेफरान्स’ में
बेरहमी से उन्हें हरा दिया हो.
‘अगर मुझे
गिरफ़्तार कर लिया जाता है, तो, ये, शायद ख़ामोश नहीं रहेंगे’, सम्गीन
कल्पना करता और उसने फ़ैसला कर लिया कि इन लोगों की आँखों के सामने न पड़ना ही बेहतर
होगा.
उसने सैर
पर जाना इसलिए भी बंद कर दिया कि मुहल्ले वाले विशेष उत्साह से सड़क पर झाडू लगा
रहे थे, लोहे की छडों से फुटपाथ साफ़ कर रहे थे. साफ़ नज़र आ रहा
था कि वारवरा को भी उदासी ने घेर लिया है. वारवरा पूरे-पूरे दिन अलमारियों में, शेड में, एटिक पे
कुछ ढूँढ़ती रहती, और खाने के समय, चाय के समय, दबी ज़ुबान
से शिकायत करती:
“बना ली
ज़िंदगी! बाहर निकलने में भी डर लगता है. जल्दी ही त्यौहार शुरू होने वाले हैं, क्रिसमस
आने वाला है, मैं कल्पना कर सकती हूँ कि कितना मज़ा आएगा...काश, तुम जानते
कि अन्फ़ीमेव्ना ने गृहस्थी में कितनी गड़बड़ कर रखी थी...”
सम्गीन चुप
रहा,
मगर
जब चुप रहना बदतमीज़ी जैसा, अटपटा लगने लगा, तो वो सहमत
हो गया:
“हाँ, वो अजीब
तरह से बर्ताव करती थी...”
वह महसूस
कर रहा था कि दिनों का ख़ालीपन उसके भीतर घुल रहा है, शरीर को
फुला रहा है, विचारों को अटपटा बना रहा है. सुबह से ही, चाय के बाद
वह अपने आप को अध्ययन कक्ष में बंद कर लेता, इन दो
महीनों के अनुभव को सीधे सादे शब्दों में रखने की कोशिश करता. और, उसे निराशा
से यकीन हो जाता कि शब्द वो नहीं प्रकट कर रहे हैं, जो वह
देखना चाहता था, वे ये दिखाने में असमर्थ हैं कि पुराने ढर्रे
का सैनिक, जो अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभा रहा है, उतना ही
नफ़रत के काबिल प्रतीत होता है, जितना चौकीदार निकोलाय, मगर ये
कॉम्रेड याकोव, कलीतिन मन में नफ़रत नहीं पैदा करते?
‘हो सकता है
– हो सकता है, उन्होंने भी हत्याएँ की हों...’
एक बार, अपने लिखे
हुए को मिटाते हुए, उसने डाइनिंग हॉल में अनजान आवाज़ें सुनीं; रूमाल से
चश्मा पोंछते हुए वो बाहर आया और दीवान पर वारवरा की बगल में बैठे ब्रागिन को देखा, और भट्टी
के पास, लम्बा कोट और जूते पहने, हथेलियों
से टाइल्स को थपथपाते हुए एक ऊँचा आदमी खड़ा था.
“देप्सामेस,” उसने
सम्गीन की ओर अपना लाल हाथ बढ़ाते हुए कहा.
आम तौर से
इतने ऊँचे आदमी मोटी आवाज़ में बोलते हैं, मगर ये तो बिल्कुल बच्चों जैसी पतली आवाज़ में
बात कर रहा था. उसके सिर पे – आधे सफ़ेद बिखरे बालों का टोप था, चेहरे के
बाएँ हिस्से को एक गहरे घाव के निशान ने विकृत कर दिया था, घाव के
निशान ने निचली पलक को खींच रखा था, जिससे बाईं आँख दाहिनी आँख़ के मुकाबले में बड़ी
प्रतीत हो रही थी. ठोढ़ी और निचले मोटे होंठ को स्पष्ट रूप से दिखाते हुए, गालों से
भूरी दाढ़ी की दो लहरिएदार लटें झूल रही थीं. अपना
कुलनाम बताने के बाद उसने अपनी अलग-अलग साइज़ की आँखों से एकटक क्लीम को देखा और
फिर से टाइल्स थपथपाने लगा. आँखें – काली और बेहद चमकदार थीं.
ब्रागिन
बड़े तैश से वारवरा को बता रहा था कि कैसे उसे और देप्सामेस को दो बार रोका गया, उनकी तलाशी
ली गई,
- वो
भी तैश में आ गई:
“भयानक दिन
हैं! ये सरकार की समझ में न आने वाली कपट नीति है...”
“तब मैंने
ज़ख़ार बोरिसोविच को सुझाव दिया कि आपके यहाँ चलेंगे... देप्सामेस डोलने लगा और
चुटकुले वाले यहूदी के लहज़े में कहने लगा:
“ तो मैंने
ये कहा कि – चलेंगे, क्योंकि मैं पहले ही बहुत मार खा चुका हूँ, - आपका
बहुत-बहुत शुक्रिया!”
तोते जैसी
नाक वाला, उसका सुस्त-उदास चेहरा लाल हो गया, और, दाएं कंधे की
तरफ़ सिर झुकाकर हल्के-फुल्के व्यंग्य से उसने क्लीम से पूछा:
“क्या आपके
यहाँ ये झगड़े-फ़साद वाले दिन काफ़ी समय तक चलेंगे? क्या आपको
मालूम है? तो, कौन जानता है?”
उसकी
ऊँगलियाँ जल्दी-जल्दी दाढ़ी की लटों से खेल रही थीं.
“ओय, आपको कत्लेआम बेहद पसंद है!”
वारवरा को
अलमारी से क्रॉकरी और बोतलें निकालने में मदद करते हुए ब्रागिन ने दृढ़ता से कहा कि
बद्धिजीवी कत्लेआम नहीं करते हैं!
“आप कहते
हैं – नहीं? मगर क्या आपके निहिलिस्टों (नास्तिवादियों) ने, आपके
पिसारेव-समर्थकों ने पूश्किन की हत्या की योजना नहीं बनाई थी? ये तो सूरज
पर थूकने जैसा ही हुआ!”
“ज़ख़ार
बोरिसोविच पूश्किन की अतिशयोक्ति से तारीफ़ करते हैं,” ब्रागिन ने
इस बार कुछ परेशानी से कहा.
“हाँ, ठीक है, मैं अतिशयोक्तिपूर्ण
हूँ!” देप्सामेस ने ब्रागिन की तरफ़ हाथ झटककर सहमति दर्शाई. “चलो, ऐसा ही
सही! मगर मैं आपसे कहता हूँ, कि आपसे ज़्यादा तो चूहे रूसी साहित्य को पसंद
करते हैं. और आप पसंद करते हैं अग्निकाण्ड, बर्फ़ का
तेज़ प्रवाह, तूफ़ानी हवाएँ, आप हर उस रास्ते
पर भागते हैं, जहाँ कोई गड़बड़ हो रही हो. क्या ये – ग़लत है? ये – सच
है! ज़िंदा रहने के लिए, आपको संकट के समय की ज़रूरत पड़ती है. आप – धरती
पर सबसे भयानक लोग हैं...”
सम्गीन को
ऐसा लगा कि ये आदमी जानबूझकर तीखे अंदाज़ में बात कर रहा है और वाकई में उसमें कोई
अतिशयोक्तिपूर्ण बात तो है.
“आप थियेटर में घुमक्कड़ों को देखते हैं और धूल
में सोना ढूँढ़ने के बारे में सोचते हैं, मगर वहाँ – सोना ही नहीं है, वहाँ है
पाइराइट, जिससे गंधक का तेज़ाब बनाते हैं, जिससे कि
ईर्ष्यालु औरतें उसे फेंक सके अपनी प्रतिवादियों पर...”
“प्रतिद्वन्दियों पर...” ब्रागिन ने उसकी गलती
सुधारी.
“और आपके
बोल्शेविक, क्या ये – नरसंहार नहीं है, नहीं?”
वह अचानक
हौले से, नर्मी से हँस पड़ा, उसने क्लीम
सम्गीन को ये सोचने पर मजबूर कर दिया:
‘इस तो
तीखेपन से हँसना चाहिए’.
इस बात ने
कि देप्सामेस की हँसी उसकी पतली आवाज़ से मेल नहीं खाती थी, उसके प्रति
सम्गीन के अविश्वास को और दृढ़ कर दिया. मगर उसने दाईं आँख़ मारी और, मुस्कुराते
हुए अपनी बात जारी रखी:
“
बोल्शेविक – ये ऐसे लोग हैं जो इतिहास से सौ मील आगे भागना चाहते हैं, - इसलिए
समझदार लोग उनके पीछे नहीं भागेंगे. समझदार कौन हैं? ये वो लोग
हैं,
जो
क्रांति नहीं चाहते, वे सिर्फ अपने लिए जीते हैं, और कोई भी
अपने लिए क्रांति नहीं चाहता. तो, जब बावजूद इसके, थोड़ी बहुत
क्रांति लाने की ज़रूरत पड़ती है, तो ये थोड़े बहुत पैसे दे देते हैं और कहते
हैं: “प्लीज़, मेरे लिए क्रांति कर दो – पैंतालीस रूबल्स में!”
आँख़ें
सिकोड़ कर वह अचानक बेहद नर्मी से हँसा, और ये भी उस पर जँचा नहीं.
“क्या आप
सोशलिस्ट हैं?” क्लीम ने पूछा.
“मैं –
यहूदी हूँ!” देप्सामेस ने कहा. “रेनान के मुताबिक – सभी यहूदी – सोशलिस्ट हैं. मगर
ये कोई कॉम्प्लिमेन्ट नहीं है, क्योंकि सभी लोग – सोशलिस्ट हैं; ये उन्हें
उतना नहीं बिगाड़ता, जितना बाकी सारी बातें बिगाड़ती हैं.”
“ज़खार
बोरिसोविच, शायद – ज़िओनिस्ट (फिलिस्तीनवादी) हैं,” ब्रागिन ने
जोड़ा.
“थैन्कू !” देप्सामेस चहका, और अब साफ़
पता चल रहा था कि उसने जानबूझ कर शब्द को बिगाड़ा है, - ये भी उसके
विकृत चेहरे और सफ़ेद बालों से मेल नहीं खा रहा था. “ब्रागिन महाशय ज़िओनिज़्म को एक
प्यारा मज़ाक समझते हैं: ज़िओनिज़्म – मतलब, जब एक यहूदी दूसरे यहूदी को तीसरे यहूदी के
पैसे से फ़िलिस्तीन भेजता है. कई लोग मज़ाक करना ज़्यादा पसंद करते हैं, बजाय सोचने
के...”
वारवरा ने
सबको मेज़ पर आमंत्रित किया. यहूदी के सामने बैठते हुए सम्गीन को तगील्स्की के शब्द
याद आ गए: ‘हमारी ज़िंदगी की सबसे घृणित घटना है – रूसी निहिलिज़्म
(नास्तिवाद) से संक्रमित यहूदी’. ये – निहिलिस्ट नहीं है. और – प्रैस भी नहीं
है...”
सम्गीन को
यहूदियों से नफ़रत थी, मगर ये जानते हुए कि ये घृणा – शर्मनाक है, वो, कई सारे
लोगों की तरह, इसे मुहावरों की एक प्रणाली में छुपाने की
कोशिश करता था, जिसे फ़िलोसेमिटिज़्म कहते हैं. उसे यहूदी किसी जर्मन
या फ़िन से ज़्यादा पराया प्रतीत होता था, और उसे शक था कि हर यहूदी में एक परिष्कृत
समझबूझ होती है, जिसकी बदौलत वह अन्य जातियों की अपेक्षा उसके, एक रूसी के, प्रकट
एवम् अप्रकट दोष ज़्यादा पैनेपन और स्पष्टता से देख सकता है. ये समझते हुए कि रूस
में यहूदियों का भाग्य कितना दुखद है, उसे शक था, कि
यहूदियों की मानसिकता रूसियों के प्रति स्वाभाविक दुश्मनी से, अपमान और
पीड़ा का बदला लेने की इच्छा से संक्रमित होनी चाहिए, उसके बोझ
तले दबी होनी चाहिए. वह इंतज़ार कर रहा था कि इस बातूनी, पतली आवाज़
वाले हँसोड़ व्यक्ति में यही गुण प्रकट होगा.
“आपको थोड़ी सी क्रांति चाहिए थी? ठीक है, आपके पास
बहुत ज़्यादा क्रांति होगी, जब आप किसानों को अपने पैरों पर खड़ा करेंगे और
वे दूर-दराज़ की सीमाओं तक भाग कर जाएंगे और आपके लिए सिर फोडेंगे और अपने लिए भी.”
“ मैं
भविष्यवाणियों में विश्वास नहीं करता,” ब्रागिन बुदबुदाया, मगर वारवरा
ने उत्साहपूर्वक सिर हिलाते हुए कहा:
“नहीं, ये बेहद, बेहद सही
है!”
देप्सामेस
उसकी ओर मुख़ातिब हुआ; उसके एक हाथ में फ़ोर्क चमक रहा था, दूसरे में
उसने ब्रेड का टुकड़ा पकड़ा था, - खाने के लिए मौका न मिलने के कारण कब से उसे
पकड़ रखा था.
“हर यहूदी थोड़ा-बहुत पैगम्बर होता है, क्योंकि वह
खून ख़राबे का विरोधी है, मगर संघर्ष और ख़ून-ख़राबे की अनिवार्यता को
समझता है, हाँ!”
सम्गीन देख
रहा था कि यहूदी पिता समान प्यार से बोलना चाहता है, बिना
व्यंग्य के, - उसकी उदास आँखों की काली नर्म सी चमक से ये प्रकट हो
रहा था, - मगर पतली आवाज़, इस भावना
से मेल नहीं खा रही थी, कानों को चीर रही थी.
“और आपके
दो-मुँहे राज्य में पैगम्बर होना बेहद आसान है. क्या आपने ग़ौर नहीं किया कि आपके
उकाब का किसानों वाला बड़ा सिर दाईं ओर देखता है, और बाईं ओर
देखता है सिर्फ क्रांतिकारियों का छोटा सा सिर? तो, जब आप
किसान वाला सिर बाईं ओर मोडेंगे, तो आप देखेंगे कि वो ख़ुद को आपका किस तरह का त्सार
बना बैठेगा!”
‘दुनिया भर
के चालाक,’ उसकी बातों को सुनते हुए, जो
अपमानजनक रूप से उसके कुछ विचारों से मेल खाती थीं, सम्गीन सोच
रहा था, ‘उन विचारों की आलोचना करते हैं, शिक्षा
देते हैं, जिन पर औरों का अधिकार होता है...हेन, मार्क्स...
‘
‘औरों का
अधिकार’ शब्दों से टकराकर सम्गीन ने सुनना बंद कर दिया.
“अगर समाज
व्यक्ति का सम्मान नहीं करता, तो वह उसे समाज के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया
रखने का अधिकार दे देता है.”
इन दो शब्दों
ने,
जो
खुलकर दस शब्द बन गए थे, अपने भीतर छुपी हुई अराजकता ढूँढ़ ली थी. ये
अप्रिय लग रहा था. देप्सामेस, ब्रेड का टुकड़ा पकड़े हुए हाथ को हिलाते हुए वारवरा
से कह रहा था:
“ यहूदी –
वो लोग हैं, जो सब के लिए काम करते हैं. रोथशील्ड, मार्क्स ही
की तरह, सभी के लिए काम करता है – है कि नहीं? मगर क्या रोथशील्ड, चौकीदार की
तरह,
झाडू
लगाकर सड़क से पैसे इकट्ठा करके उनका ढेर नहीं बनाता, जिससे वे उड़कर
आँखों में न चुभें? और आप सोचते हैं, कि अगर
रोथशील्ड न होता, तो भी मार्क्स तो होता ही होता, - आप ऐसा
सोचते हैं?”
वारवरा को
लगा कि ये बड़ी मज़ाहिया बात है, और वह हँस पड़ी, मगर
ब्रागिन ने परेशानी से अपने लम्बे बदन को कुर्सी पर हिलाते हुए, अटपटेपन से
मुस्कुरा कर सम्गीन की तरफ़ देखा; उसने शायद आँख भी मारी और, आख़िरकार, पूछ ही
लिया:
“क्या आपसे दो बातें कर सकता हूँ?”
वे अध्ययन
कक्ष में आए, और वहाँ ब्रागिन जल्दी-जल्दी दबी ज़ुबान में कहने लगा:
“ आप मुझे
माफ़ कीजिए कि मैं उसे यहाँ ले आया, - मेरा आपसे मिलना ज़रूरी था, और वह
अकेले घूमने से डरता है. वो, असल में, काफ़ी
दिलचस्प और प्यारा इन्सान है, मगर – देख रहे हैं ना- बोलता रहता है! सभी
विषयों पर और जितना चाहो, उतना...”
सम्गीन ने
काफ़ी अर्से से ब्रागिन को इतना आत्मसंतुष्ट, करीने से
बाल काढ़े हुए, दमकते हुए नहीं देखा था.
“मैं आपको
आगाह करने आया हूँ, - आपको मॉस्को से बाहर चले जाना चाहिए. ये –
हमारे बीच ही रहे – मैं वारवरा किरीलोव्ना को परेशान नहीं करना चाहता, मगर –
किन्हीं तबकों में आपके बारे में कहते हैं...”
वो ख़ामोश
हो गया, इस इंतज़ार में कि सम्गीन उससे कुछ पूछेगा; मगर क्लीम
ने,
सिगरेट
पीते हुए, पूछ ही नहीं. तब ब्रागिन ने और भी हल्की आवाज़ में
अपनी बात जारी रखी:
“देप्सामेस
– ग़लत नहीं है: सोशलिस्ट्स कट्टर दक्षिणपंथियों के हाथों की कठपुतली बन गए हैं –
ये सच है!”
देप्सामेस डाइनिंग
हॉल में चीख़ रहा था:
“तो, ये ऐसा होगा – एक पाँव में चमड़े का नया जूता, दूसरे में –
पुराना चटाई का...”
“आप सोच भी
नहीं सकते कि मॉस्को में कैसा माहौल बन गया है,” - ब्रागिन फ़ुसफ़ुसा रहा था. “मॉस्को और
बेरिकैड्स...ये तो किसी को भी गुस्सा दिला देगा! साधारण आदमी भी – जैसे, गाड़ीवान...”
“मैं समझता
हूँ,”
क्लीम
ने मुस्कुराते हुए कहा. “ख़ास तौर से गाड़ीवानों को तो बेरिकैड्स गुस्सा दिलाएँगी ही
दिलाएँगी...”
“नहीं, तुम इसे गंभीरता से लो,” उसने पैरों
पर झूलते हुए विनती की, “लोग, जो आपको जानते हैं, मिसाल के
तौर पे र्याख़िन, तिगील्स्की, प्रैस, ख़ास तौर से
– स्त्रातोनोव, - बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व है! – और – यकीन
कीजिए कि उनका राजनैतिक भविष्य बहुत उज्ज्वल है....”
“क्या उनसे छुपना चाहिए?” क्लीम ने
ब्रागिन के बेवकूफ़ी भरे और अचानक लाल पड़ गए चेहरे की ओर देखते हुए पूछा, - कंधे
सिकोड़कर ब्रागिन ने अपमानित और ऊँची आवाज़ में कहा:
“मैंने अपना कर्तव्य समझा, आपके प्रति
सहानुभूति की, इज़्ज़त की ख़ातिर…”
“तहे दिल
से आपका शुक्रिया अदा करता हूँ,” उसका हाथ दबाते हुए सम्गीन ने जल्दी से कहा, और ब्रागिन, दोनों
हाथों में उसकी हथेली दबाकर और तीनों हाथों को ज़ोर से हिलाते हुए, परेशानी से
फ़ुसफ़ुसाया:
“आप अंदाज़ भी नहीं लगा सकते कि इन दिनों ऐसे
आदमी के लिए जीना कितना मुश्किल है, जो सबके लिए सिर्फ भलाई ही चाहता है...यकीन
कीजिए,”
उसने
और भी हौले से कहा, “वे आपके महत्व को भाँप रहे हैं...”
साँप जैसे
छोटे से सिर को हिलाते हुए, वह डाइनिंग हॉल में फ़िसल गया, और सम्गीन
ने उसकी लम्बी, लचीली पीठ की ओर देखते हुए सोचा:
‘नहीं जानता
कि किसके साथ जाना चाहिए, किसकी सेवा करना चाहिए’.
इससे
मकारोव और उसके साथ हुई अप्रिय बातचीत की याद आ गई. डाइनिंग हॉल में देप्सामेस
हौले से हँस रहा था, और वारवरा जोश में दुहराए जा रही थी:
“ये आश्चर्यजनक रूप से सच है, बिल्कुल सच
है!”
सम्गीन ने
खिड़की से देखा – आसमान में, जो चर्च के घण्टों वाले टॉवर्स के कारण
जगह-जगह टूट गया था, सांझ की लाली दहक रही थी और पंछी, जैसे लाल
कपड़े पर काला उलझा हुआ डिज़ाइन बनाते हुए बेतहाशा चक्कर लगा रहे थे. पंछियों की ओर
देखते हुए सम्गीन उनकी हलचल से ऐसे वाक्य बनाने की कोशिश कर रहा था, जिन्हें
नकारा नहीं जा सकता. ब्रागिन के हाथ में हाथ डालकर वारवरा ने सड़क
पार की, विचित्र यहूदी पीछे पीछे चल रहा था.
अँधेरा होने
के बाद अलेक्सेइ गोगिन आया, फ़र कोट और जूते पहने; कोट के बटन
खोलते हुए वो बुदबुदाया:
“कैसी घिनौनी नौकरानी है आपके यहाँ, आख़ें –
बिल्कुल जासूस जैसी हैं.”
ज़ुकाम के कारण खाँसते हुए मेज़ के पास बैठ कर
उसने पूछा:
“वोद्का है?”
और एक जाम
पीकर,
उसने
जल्दी से ब्रेड पर नमक छिड़का और ग्लास में और वोद्का डाली.
‘जैसे सराय
में’
सम्गीन
ने ग़ौर किया. ब्रेड चबाते हुए गोगिन ने कहना शुरू किया:
“आपसे
विनती करते हैं, दोस्त, कि आप
रूसगोरद जाकर वहाँ एक आण्टी से पैसे लेकर आएँ,- संक्षेप
में कहूँगा: ग़ज़ब की आण्टी है! बिरली सुंदरता, और बेवकूफ़
भी नहीं है. पैसे कोर्ट की डिपॉज़िट लॉकर में रखे हैं, और कोई
कानूनी कार्रवाई करनी होगी. कर सकते हैं?”
“और – विस्तार से?” सम्गीन ने
पूछा;
अलेक्सेइ
ने हाथ नचाए:
“विस्तार से – कुछ भी नहीं जानता. महिला का नाम
है – ज़ोतोवा, ये रहा उसका पता. वो, शायद, स्तेपान
कुतूज़ोव की रिश्तेदार या दोस्त है.”
‘यहाँ से
निकलने का अच्छा मौका है,’ सम्गीन ने सोचा. ‘और ये
अंतिम काम होगा’.
जब क्लीम
ने कहा कि वो जाएगा, तो गोगिन ने पूछा, “क्या ये
सच है कि जब आप पर बदमाशों ने हमला किया था, तो
ल्युबाशा ने एक को गोली मारी थी?”
उस हमले को
याद करना अच्छा नहीं लग रहा था.
“हाँ, उसने गोली चलाई थी,” रूखेपन से
सम्गीन ने जवाब दिया.
“मार डाला?”
“वह उठा और चला गया. और मैं रिवॉल्वर लेना भूल
गया था.”
इतना कहने
के बाद सम्गीन को याद आया कि उसका रिवॉल्वर याकोव ने ले लिया था, और उसे
अपने आप पर गुस्सा आ गया: ऐसा क्यों कह दिया?
“हूँ, इसीकी कीमत
चुका रही है,” उदासीनता से गोगिन ने कहा. “ल्युबाशा- हमारे यहाँ है, और मानसिक
तौर पर उसकी बुरी हालत है,” गोगिन थकावट से अपनी बात कह रहा था. “उसका हाथ
टूट गया है, और वो बुरी तरह टूट चुकी है. हमारे यहाँ रात को आई थी, अपनी जीत
से पूरी तरह हताश, और अभी तक समझदार और नासमझ लोगों को मारने के
अधिकार के बारे में बकवास कर रही है. निष्कर्ष ये निकलता है, कि उसे, मतलब
ल्युबाशा को मारना उचित है, वो – समझदारी से काम करती है – मगर उसे ख़ुद को, जैसी कि वह
है,
हरामी
हमलावर को मारने का अधिकार नहीं है. वो एक अच्छी कॉम्रेड है, बहुमूल्य
कार्यकर्ता है, मगर ईसाई भावनाओं के लोकप्रिय विक्षोभ से
छुटकारा नहीं पा सकती. वहाँ, मेरी बहन से ऐसी-ऐसी बहस करती है, कि बस, भाग जाओ!
मतलब – एक प्रहसन है, जैसा कुतूज़ोव कहता है.”
वह उठा, आईने की
तरफ़ गया, ज़ुबान निकाल कर उसे देखा और बुदबुदाया:
“बीमार हूँ, शैतान ले
जाए! बुखार है, जिस्म टूट रहा है. अचानक गिर पडूँगा, आँ?”
वह फिर से
मेज़ के पास आया, वोद्का का एक और पैग पिया और अपने कोट के हुक
बंद करने लगा. क्लीम ने पूछा:
“पार्टी अब
क्या करेगी?”
“बेशक, वही,” अचरज से
गोगिन ने कहा. “मज़दूरों के मॉस्को के प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि छोटा-मोटा आदमी
ताकत के पीछे है – उम्मीद भी यही थी. सर्वहारा वर्ग को नई क्रांति के लिए तैयार
होना होगा. हथियारों से लैस होना पड़ेगा, सैनिकों के बीच प्रचार तेज़ करना होगा. पैसों
की ज़रूरत है और – हथियार, हथियार!”
वह प्रांत
में मज़दूरों के सशस्त्र प्रदर्शनों, आतंक के आँकडों, सैंकड़ों
अशिक्षित लोगों से मुठभेड़ों, कृषक आंदोलनों के विस्फ़ोटों को गिनाने लगा; वो इस सब
के बारे में इस तरह बता रहा था, जैसे अपने आप को याद दिला रहा हो, और पूर्ण
विराम लगाते हुए हौले-हौले मेज़ पर मुट्ठी से खटखट कर रहा था. सम्गीन
पूछना चाह रहा था: ये सब कहाँ ले जाएगा? मगर उसे अचानक पूरी स्पष्टता से महसूस हुआ कि
वो बड़ी उदासीनता से पूछता, समझदार व्यक्ति की कर्तव्य भावना से ही पूछता.
इस सवाल के लिए कोई और वजह वह नहीं ढूँढ़ पाया.
“देखने में
तो ये –कुछ अराजकता लगती है, मगर वास्तव में – क्रांतिकारियों को दी जा रही
शिक्षा है, जिसकी ज़रूरत है. पैसों की ज़रूरत है, हथियारों
के लिए पैसे, ये बात है,” उसने गहरी साँस लेते हुए दुहराया, और चला गया, और सम्गीन, उसे बिदा
करने के बाद कमरे में चहल कदमी करने लगा, खिड़कियों से बाहर देखते हुए, अपने आप से
पूछते हुए:
‘क्या
गोगिनों, कुतूज़ोवों द्वारा सिर्फ उनके सीखे हुए सिद्धांत की
ताकत को ही आगे बढ़ाया जाता है? नहीं, उनकी इच्छा
के अधीन कुछ और भी है – जो प्रकट रूप में वर्गीय मानसिकता की स्थिरता पर उनके
विश्वास के विरुद्ध है. मज़दूरों को – समझा जा सकता है, कुतूज़ोवों
को – नहीं समझ सकते...’
सामने वाले
लैम्प पोस्ट को सुधार दिया गया था, वह तेज़ रोशनी फेंक रहा था, उस घर को
रोशन करते हुए, जिसके दर्शनीय भाग की हर दरार से वह परिचित
था.
‘ऐसे घरों
में लाखों लोग रहते हैं, जो किसी भी ताकत की आज्ञा मानने को तैयार हैं.
इसी कारण उनका महत्व ख़त्म हो जाता है...’
एक दिन बाद
वह फिर से असाधारण घटनाओं के क्षेत्र में फँस गया. शुरूआत इस तरह से हुई, कि रात को कुपे
में ज़ोरदार झटके से बर्थ से नीचे फेंक दिया गया, और जब
चौंककर अपने पैरों पर उछला, तो कोई भर्राई आवाज़ में उसके चेहरे के ठीक
सामने चीख़ा:
“क्या हुआ? दुर्घटना?” और कंधे से
धक्का देकर उसे फिर से बर्थ पर फेंक कर, गरजा:
“माचिस...शैतान!
ऐ,
आप, कौन है
यहाँ?
माचिस!”
कुपे उछल
रहा था, हिल रहा था, इंजिन फ़ुफ़कार रहा था, लोग चिल्ला
रहे थे; अंधेरे में दिखाई न देने वाले क्लीम के पड़ोसी ने
खिड़की से परदा खींच लिया और आसमान का हल्का नीला वर्गाकार टुकड़ा और उसमें टँके दो
सितारे दिखाई देने लगे; सम्गीन ने माचिस की तीली जलाई और अपने सामने
एक चौड़ी पीठ, मोटी गर्दन, चिकनी खोपड़ी देखी; इन चीज़ों
का मालिक, माथे को काँच से चिपकाए, ललकार भरे
लहजे में कह रहा था:
“हुआ क्या है? सिग्नल के
पास खड़े हैं. तो?”
कुपे का
दरवाज़ा खुला, कण्डक्टर ने लैम्प की रोशनी से उसे प्रकाशित किया, पूछने लगा:
“सब ठीक है? किसी को
चोट तो नहीं आई?”
“थ-थोबड़े,” उस आदमी ने
कहा,
उसने
कण्डक्टर के हाथ से लैम्प छीन लिया, सम्गीन के ऊपर रोशनी डाली, कुछ पल
एकटक उसके चेहरे को देखता रहा, फिर ज़ोर से खखारकर मेज़ के नीचे थूक दिया और
बोला:
“अब सोना –
नामुमकिन है!”
लैम्प की
क्षीण और बेचैन रोशनी मोटे, उल्लू जैसी गोल गोल आँखों वाले काले चेहरे को
प्रकाशित कर रही थी; चौड़ी, भारी नाक
के नीचे घनी, भूरी मूँछें खड़ी थीं, - एकदम गोल
खोपड़ी पर रीछ की खाल जैसे घने बाल थे. ये आदमी बर्थ पर हाथ टिकाए बैठा था, पीठ दीवार
की तरफ़, देख रहा था छत की तरफ़ और एक लय में नाक सुड़क रहा था.
उसके बदन पर - मोटी ऊनी कमीज़, पाइपिंग वाली पतलून, पैरों में
धारियों वाले मोज़े थे; कुपे के कोने में भूरा ओवरकोट, फ्रॉक कोट, तलवार वाली
बेल्ट,
ऑफ़िसर
वाली तलवार, रिवॉल्वर और फूस में लिपटा फ्लास्क लटक रहा था.
“ शैतान
जाने,
हम
खड़े क्यों हैं?” उसने चेहरे की एक भी रेखा हिलाए बिना पूछा.
“ज़िंदा हैं – मतलब आगे जाना चाहिए. आप उतरकर देख आते...”
“आप, मतलब फ़ौजी, के लिए ये
करना ज़्यादा आसान रहेगा,” सम्गीन ने कहा.
“फ़ौजी के
लिए!” ऑफ़िसर ने गुस्से से दुहराया. “मुझे जूते पहनने पड़ेंगे, और मेरा
पाँव दर्द कर रहा है. इन्सान को विनम्र होना चाहिए...”
उसने
फ्लास्क निकाला, ढक्कन खोला और कुछ गटक कर, भारीपन से
साँस ली. इस डर से कि ऑफ़िसर उससे बुरा-भला कहेगा, सम्गीन ने
जल्दी से ओवरकोट पहना और कड़ाके की ठण्ड में कुपे से बाहर आया. रात पारदर्शी और साफ़
थी,
- काफ़ी
ऊँचाई पर, कम सितारों वाले आसमान में, असाधारण
रूप से छोटा चाँद ठण्डेपन और प्रखरता से चमक रहा था, और चारों
ओर की हर चीज़ अभूतपूर्व थी: बर्फ से ढँके पेडों की घनी दीवार, इंजिन के
पास छोटे, काले लोगों की भीड़, मज़बूत लोग मुश्किल
से कुपे से बर्फ पर कूद रहे थे, और दूर – स्टेशन की झबरी बत्तियाँ जो सुनहरी
मकड़ियों के समान थीं.
सम्गीन
इंजिन की ओर बढ़ा, - मुसाफ़िर उसे पीछे छोड़ते हुए भाग रहे थे, पाँच ख़ुश
मिजाज़ सैनिक भागते हुए निकल गए; इंजिन के पास भीड़ के बीचोंबीच एक ऊँचा, चश्मे वाला
पुलिस का सिपाही, और बंदूकें लिए दो सैनिक खड़े थे, - इंजिन के
पिछले भाग से फ़र की टोपी पहने ड्राइवर उनकी तरफ़ झुका था. वे धीमी आवाज़ में बोल रहे
थे,
और
हाँलाकि शब्द साफ़ सुनाई दे रहे थे, मगर सम्गीन को महसूस हो रहा था, कि सब लोग
किसी चीज़ से डर रहे हैं.
“क्या
स्टेशन तक खींच लोगे?” सिपाही ने पूछा.
“नहीं,” ड्राइवर ने कहा. किसी ने गहरी साँस ली.
“शैतान! मार डालेंगे – और तुम आह तक नहीं कर
सकोगे.
सम्गीन ने
धीरे से सैनिक से पूछा:
“क्या हुआ
है?”
“इंजिन में
कुछ,”
अनिच्छा
से सैनिक ने जवाब दिया, मगर दूसरे ने उसका प्रतिवाद किया:
“ओह, नहीं!
सिग्नल पे पटरी टूट गई है.” हट्टा-कट्टा सैनिक सम्गीन की पीठ के पीछे से मुड़ा, उसके चेहरे
की ओर देखा और काफ़ी ज़ोर से बोला:
“ये हमें, शांति बनाए
रखने वालों को, कुछ दुष्ट मिटा देना चाहते थे!”
और कुछ
रुककर,
उसने
आगे कहा:
“चश्मे
में.”
पहला सैनिक
शांति से बातचीत में शामिल हो गया:
“कुछ भी पता नहीं है.”
मगर
हट्टा-कट्टा सैनिक पीछे हटने को तैयार नहीं था:
“सिपाही ने
बताया : जान से मारने की कोशिश.”
हट्टे-कट्टे
सैनिक की आवाज़ ऊँची होती गई, उसकी आवाज़ कुछ नकीली हो गई और व्यंग्यात्मक लग
रही थी.
‘ऐसी आवाज़ें
स्कैण्डल्स को भड़काती हैं’, सम्गीन ने फ़ैसला कर लिया और पटरियों की बगल
में,
बर्फ़
से बुरी तरह लदे फ़र वृक्षों के मण्डप के नीचे बनी पगडण्डी से आगे बढ़ चला, स्टेशन की
तरफ़.
उसके आगे
लोमड़ी की खाल के कॉलर वाला फ़र का कोट और फ़र की लम्बे कानों वाली टोपी पहने एक आदमी
भारी कदमों से चल रहा था, - पटरियों पर भी मुसाफ़िर चल रहे थे; टोपी वाले
आदमी ने संयत स्वर में कहा:
“हमारे
यहाँ कानून-व्यवस्था काफ़ी कम हो गई है.”
“परेशान
दिमाग़,”
सम्गीन
की पीठ के पीछे से किसी आवाज़ ने उसका समर्थन किया.
“कोई किसी
से डरता ही नहीं,” फ़र के कोट वाले आदमी ने कहा, वह मुड़ा, उसने
सम्गीन के चेहरे की तरफ़ देखा और उसे रास्ता देते हुए पटरियों पर चला गया.
इंजिन के
पास लोग गुस्से से चीख रहे थे:
“आपका
कमाण्डर कहाँ है?”
“तेरा काम
नहीं है. तू हमारा बॉस नहीं है.”
“मेरी तरफ़
देख!”
नकीली आवाज़
चीखी: “तुझे क्या देखना है, तू क्या – लड़की है? तेरे चश्मे
पे तो मैं थूकता हूँ!”
‘ये उसने
पुलिस वाले से कहा है’, सम्गीन ने सोचा और चश्मा निकालकर ओवरकोट की
जेब में रख लिया.
“काफ़ी कम
है कानून-व्यवस्था,” लोमड़ी की खाल के ओवरकोट वाले ने कहा और लम्बी
उबासी ली.
सम्गीन को
महसूस हुआ जैसे वो नींद में है, और उसने दूर तक नज़र दौड़ाई, जहाँ बर्फ़
की नीली सी पहाड़ियों के बीच झोंपड़ियों के काले टीले नज़र आ रहे थे; चर्च की
सफ़ेद दीवार, खिड़कियों के लाल धब्बों और घण्टे के टॉवर के हिलते
हुए सुनहरे लैम्प को प्रकाशित करते हुए अलाव जल रहा था. स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर
तीन बंदूकधारी सैनिकों को घेरे करीब दो दर्जन मुसाफ़िर खड़े थे और हौले से पूछ रहे
थे:
“तो – मारा?”
“आ- ऐसे
कैसे?”
“हुक्म
देंगे – तो आपको भी मारेंगे...”
“और – औरतों को – नहीं मारना पड़ा?” लम्बे
कानों की टोपी वाले आदमी ने पूछा और भाषण देने के अंदाज़ में, जवाब का
इंतज़ार किए बिना आत्मविश्वास से कहना शुरू किया: “औरतों को तो ख़ासकर के डराना
चाहिए,
औरत
पराए माल के प्रति मर्द के मुकाबले ज़्यादा लालची होती है...”
प्लेटफॉर्म
की ओर मुसाफ़िरों का एक और झुण्ड आया; सामने, लंगड़ाते
हुए एक ऑफ़िसर चल रहा था, जो कैम्प यूनिफॉर्म में और ज़्यादा मोटा और गोल
नज़र आ रहा था.
“तो, बात क्या
है?”
वो
तीखी आवाज़ में चीखा; टोपी वाला आदमी, ओवरकोट की
गंध छोड़ते हुए, सीधा हो गया, चापलूसी के
अंदाज़ में कहने लगा:
“शक है, कि
दुर्घटना करना चाहते थे...”
“मैं आपसे नहीं पूछ रहा हूँ,” ऑफ़िसर तैश
में रेंका, “स्टेशन मास्टर कहाँ है?”
चष्मे वाला
सिपाही भाग कर आया, उसने लोगों को धकेला और, गहरी-गहरी
साँस लेते हुए बताया कि स्टेशन मास्टर रेल मार्ग के नुक्सान के बारे में टेलिग्राम
भेज रहा है, मज़दूर माँग रहा है.
“मुझे
षडयंत्र का संदेह हो रहा है, युअर ऑनर, सिग्नल के
पास वाली पटरियाँ...”
“तो, तू क्या
देख रहा था, थोबड़े?” ऑफ़िसर ने पूछा और एक हाथ से मूँछों पर ताव
देते हुए, दूसरे से बगल में लटक रहे रिवॉल्वर को हाथ लगाया, - लोग उससे
दूर हट गए, कुछ लोग फ़ौरन पीछे ट्रेन की तरफ़ चले गए; पुलिस वाले
ने अपमानित स्वर में पूछा:
“युअर
हाइनेस, मेरी ड्यूटी यहाँ कल ही लगाई गई है...”
“ड्यूटी लगाई गई है, तो फिर –
उबासी न ले!”
ऑफ़िसर ने
उसकी तरफ़ पीठ मोड़ी:
“ये कैसे
सैनिक हैं?”
“बुज़ूलूक्स्की
लेज़र्व बटालियन की टुकडी का हूँ, विदोह कर रहे गाँव में तैनात किया गया है,” जल्दी-जल्दी
कोमल,
औरतों
जैसी आवाज़ वाले ऊँचे सैनिक ने कहा.
“विद्रोह
कर रहे, बेवकूफ़! भाग यहाँ से...”
ऑफ़िसर ने
जेब से सिगरेट्स का पैकेट निकाला, जाते हुए सैनिकों को देखता रहा और चीख़ा:
“ मुर्गों
जैसे चल रहे हो...” माँ-बहन की गालियाँ देने के बाद उसने चारों ओर देखा और ये कहते
हुए सम्गीन के पास आया: - प्लीज़...”
और क्लीम
की सिगरेट से अपनी सिगरेट सुलगाकर पीने के बाद अपना नाम बताया:
“लेफ्टिनेन्ट त्रिफ़ोनोव.”
“सम्गीन.”
“टीचर हो?”
“ज्यूरिस्ट.”
“एडवोकेट,” कुछ
सोचकर लेफ्टिनेन्ट ने कहा और सिर हिलाया. “छोटे-मोटे हो,” वह
मुस्कुराते हुए कहता रहा. “बड़े - मोटे होते हैं, और आप –
उनमें से हैं, जो क्रांति को, कॉन्स्टिट्यूशन
को हवा देते हैं, - सही है ना?”
सम्गीन ने
दूर हटने की कोशिश की, मगर लेफ्टिनेन्ट ने उसका हाथ पकड़ लिया और
अटपटे चौड़े कदम रखते हुए, बाएँ पैर से लँगड़ाते हुए, उसे घसीटते
हुए, सम्गीन को
अपने साथ ले चला. वह भर्राई आवाज़ में बोल रहा था, बार-बार
भारी साँस छोड़ रहा था, भाप की लम्बी लकीर छोड़ रहा था, जो वाइन और
तम्बाकू की गंध से सराबोर थी.
“असफ़ल
लोगों में से हैं,” वह सम्गीन को धकेलते हुए बोला. “कु-उछ भी नहीं
होगा तुमसे, पापा जी, तुम जैसों को हम झकझोर कर रख देंगे, अण्डों की
तरह चूर-चूर कर देंगे...”
‘जानवर’, सम्गीन ने
मन ही मन उसे गाली दी और गुस्से से पूछा: “ आप ऐसा क्यों सोचते हैं, कि मैं...”
“मैं – सोच
नहीं रहा हूँ, मैं – मज़ाक कर रहा हूँ,” लेफ्टिनेन्ट
ने कहा और थूक दिया. स्टेशन मास्टर भागकर उसके पास आया:
“आपने मुझे बुलाया?”
लेफ्टिनेन्ट
ने थोड़ा सा ठहर कर उसकी तरफ़ देखा, कुछ देर चुप रहा और हाथ हिला दिया.
“ज़रूरत
नहीं है.”
कोहनी से
सम्गीन का हाथ कसकर दबाए, भुनभुनाते हुए, वह मुड़े-तुड़े शब्द
कहता रहा, बिना उन्हें पूरा किए:
“मैं ख़ुद
भी – असफ़ल हूँ. तीन बार ज़ख़्मी हुआ, क्रॉस भी मिला है, मगर ज़िंदा
रहने के लिए – कुछ नहीं है. खर्राटे वाले बदमाश के यहाँ रहता हूँ...लोमड़ी की खाल
के ओवरकोट वाले. वो ज़बर्दस्ती मुझसे डेढ़ सौ रूबल्स खींच लेता है. रेल्वे स्टेशन पर
मेरा सुनहरा सिगरेट केस चोरी हो गया, दोस्तों ने प्रेज़ेन्ट दिया था...”
ट्रेन के
पास आए,- ऑफ़िसर कुपे की सीढ़ी के पास रुका और एकटक सम्गीन के
चेहरे को देखते हुआ बुदबुदाया:
“वैसे, मैंने उसे
गिरवी रख दिया है, सिगरेट केस को. बहन से कह दूँगा – चोरी हो
गया.”
बाहर निकली
हुई,
केंकड़े
जैसी आँखें उसके तने हुए, गोल-गप्पा चेहरे को कार्टून जैसा बना रही
थीं. दस्ताने वाले हाथ में ताँबे का हैण्डल पकड़कर उसने पूछा:
“कोन्याक चाहिए? फ़्रांसीसी...”
सम्गीन ने
इनकार कर दिया. कुपे की सीढ़ी पर पाँव रखकर लेफ्टिनेन्ट त्रिफ़ोनोव जम गया. बेहद
सन्नाटा था, सिर्फ लोगों के पैरों के नीचे की बर्फ चरमरा रही थी, टेलिग्राफ़
के तार झनझना रहे थे और लेफ़्टिनेन्ट की नाक सुड़सुड़ा रही थी. अचानक एक ऊँची, दमदार आवाज़
ने बेचैन शब्दों को सफ़ाई से गाते हुए ख़ामोशी को झकझोर दिया:
आज का, अंतिम, प्यारा
दिन...
घूम
रहा हूँ तुम्हारे साथ, दोस्तों.
“देनिसोव, कुत्ते की औलाद,” लेफ्टिनेन्ट ने
आँखें बंद करके कहा. “ ऑपेरा का कोरस सिंगर. सैनिक – कहीं से भी नहीं, लोफ़र, पियक्कड़.
मगर,
क्या
गाता है – सुन रहे हैं, ना?”
दो आवाज़ें
गा रही थीं, दूसरी मोटी और उदास थी, मगर पहली
ऊँचे,
और
ऊँचे चढ़ती जा रही थी.
“ओह, नहीं! उसे छुपा
नहीं सकते,” ग़ायब होते हुए लेफ्टिनेन्ट बुदबुदाया.
आसमान में, चाँद से
कुछ ही दूरी पर, एक बड़ा सितारा, जैसे धरती
पर गिरते हुए, चमक रहा था. धीरे धीरे ट्रेन के आख़िरी छोर की
ओर जाते हुए, सम्गीन ने पहली बार सीधे सादे रूसी गीत की टीस को
इतनी शिद्दत से महसूस किया. इस नीली, ठण्डी ख़ामोशी में, जो इतनी
घुप थी, जैसी सिर्फ सपनों में ही होती है, उसे ये गीत
स्वाभाविक ही महसूस हुआ. सिपाही ने भागते हुए उसे पीछे छोड़ दिया, मगर वो और
उसकी काली परछाईं – सब कुछ परीकथाओं जैसा था, उसी तरह, जैसे बर्फ़
से लदे पेड़, चाय की प्लेट जितना बड़ा चाँद, उसके पास
वाला बड़ा सितारा और नीलाभ, कड़ी बर्फ जैसा, आसमान, सफ़ेद
टीलों के ऊपर, गाँव में, चर्च के
पास वाले अलाव के लाल धब्बे के ऊपर; यकीन नहीं हो रहा था कि वहाँ विद्रोही रहते
हैं.
मगर गाना
अचानक रुक गया, और फ़ौरन कई आवाज़ें ज़ोर ज़ोर से बहस करने लगीं, स्टेशन
मास्टर की तीखी आवाज़ गूँजी:
“और तू –
कौन है रे तू?”
एक ज़ोरदार, दोस्ताना
हँसी फूटी और उसे चीरती हुई गुस्से भरी आवाज़:
“मतलब क्या-आ?”
किसी ने
ज़ोर से सीटी बजाई, जवाब में दूर से इंजन की खोखली सीटी सुनाई दी.
ग़ौर से सुनते हुए सम्गीन रुक गया, मगर वहाँ, सामने, लोग ठहाके
लगा रहे थे, ज़ोर-शोर से सीटियाँ बजा रहे थे और कोई चिल्लाया:
“खींच, घसीट उसे, सबको
घसीट...”
उनसे दूर
होकर सिपाही सम्गीन की तरफ़ आने लगा, उसका चश्मा चमक रहा था; एक हाथ में
उसने कुछ कागज़ पकड़े थे, दूसरे हाथ की ऊँगलियाँ सीने पर पड़ी रिवॉल्वर
की डोरी को खींच रही थीं, पुलिस वाले की बगल में, उससे एक
कदम आगे अपने झबरे सिर पर दोनों हाथों से टोपी खींचते हुए सुदाकोव चल रहा था; चाँद उसके
सूखे, धृष्ठ
चेहरे और पेट पर पड़े बेल्ट के ताँबे के बकल को अच्छी तरह प्रकाशित कर रहा था; सम्गीन ने
उसके उखड़े-उखड़े शब्द सुने:
“बेवकूफ़ी न
कर,
बुढ़ऊ!”
“चल, चल!”
सिपाही ने सख़्ती से कहा. इस डर से कि कहीं सुदाकोव उसे पहचान न ले, सम्गीन उछल
कर कम्पार्टमेन्ट की सीढ़ी पर चढ़ गया, कंधे की सीध में कनखियों से, नज़दीक आते
हुए सुदाकोव को देखा, मगर उसने अचानक दोनों हाथों से पुलिस वाले के
कंधों और कमर को छुआ, उसे धक्का दे दिया; पुलिस वाला
उछला,
ज़ोर
से कराहा, मगर उसकी चीख़ इंजिन की सीटियों और फुसफुसाहट में दब
गई,
- वह
बगल वाली पटरियों पर धीरे धीरे दौड़ रहा था और दो लाल प्रकाश पुंजों से उसने पुलिस
वाले को सुदाकोव से अलग कर दिया, जो उछल कर कम्पार्टमेन्ट की सीढ़ी पर चढ़ गया और
सम्गीन की कमर में कोई ठोस चीज़ घुसा दी.
अपने पैरों
पर खड़ा न रह सका सम्गीन, वह इंजिन और डिब्बों के बीच वाले तंग गलियारे
में कूदा और उसने आपको मज़दूरों के झुण्ड में पाया, - वे भी, इंजिन और
उसके भट्टी वाले भाग से कूदते हुए सम्गीन को धकेल रहे थे, और इंजिन
की दूसरी तरफ़ पुलिस वाला चीख़ रहा था, जवान आवाज़ें चीख रही थीं:
“तू, परेशान न कर, चचा!”
“गड़बड़ न कर, बुढ़ऊ, इजाज़त नहीं
है!”
“कौन भागा?”
पीछे की ओर
चलते हुए इंजिन फ़ुफ़कार रहा था, रास्ते में जलते हुए कोयले फेंक रहा था, पहियों के ब्रेकेट्स
पर हथौड़ा ज़ोर ज़ोर से आवाज़ कर रहा था, लोहे की कड़ियाँ झनझना रही थीं; सम्गीन कमर
सहलाते हुए धीरे धीरे अपने कम्पार्टमेन्ट की ओर जा रहा था. वह सुदाकोव
को याद कर रहा था, जैसा कि उसने मॉस्को में रेल्वे स्टेशन पर
देखा था: तब वो दीवार से टिककर खड़ा था, सिर झुकाकर हथेली पर चाँदी के सिक्के गिन रहा
था;
उसके
बदन पर काला ओवरकोट था, जिस पर ताँबे के बकल वाला बेल्ट था, बगल में –
छोटी सी थैली, सिर की टोपी उसके बालों को ढाँक नहीं रही थी, वो सभी
दिशाओं में झाँक रहे थे और गालों पर स्प्रिंग्स की तरह लटक रहे थे.
‘ठस दिमाग़,’ तब सम्गीन
ने सोचा था, मगर अब वह उसकी जानवरों जैसी फ़ुर्ती के बारे में सोच
रहा था: ‘अगर वो पुलिस वाले को कुछ ही पलों के बाद धक्का देता, - तो पुलिस
वाला इंजिन के पहियों के नीचे ही गिरता...’
“ऐ, मालिक, जल्दी
जल्दी आगे बढ़!” उसके पीछे से लोग चिल्लाए. बगैर इधर-उधर देखे, सम्गीन
लगभग भागने ही लगा. स्टेशन पर बेहद शोर था, मगर ऐसा
लगा,
जैसे
फ़ौलादी शोर को ठण्डी, सब कुछ निगलने वाली ख़ामोशी में लुप्त हो जाने
की जल्दी पड़ी थी. कम्पार्टमेन्ट के कॉरीडोर में चीफ़-कण्डक्टर और पुलिसवाला खड़े थे, लेफ़्टिनेन्ट
त्रिफ़ोनोव कुपे के दरवाज़े को अड़ाए खड़ा था.
“”सिविलियन?” दबी ज़ुबान
में,
अचरज
से और भर्राई आवाज़ में उसने पूछा. “रिवॉल्वर छीन लिया?”
“एकदम ठीक,” पुलिस वाले
ने हौले से जवाब दिया; वह उस तरह नहीं खड़ा था, जैसा अफ़सर
के सामने खड़ा होना चाहिए, बल्कि – कंधे ऊपर उठाए और सिर तिरछा किए, मगर हाथ
पतलून से सटे थे.
“”हथियार
छीन लिया? और – भाग गया?”
“बिल्कुल सही. ट्रेन में ही होगा.”
“सैनिक
ढूँढ़ रहे हैं,” चीफ़ ने जोड़ा.
लेफ़्टिनेन्ट
ने हौले से तीन बार, अलग-अलग ठहाके लगाए:
“हा-हा-हा!
ये-ए–है - नमूना!” पलकों को आँखों पर मारते हुए, होठों से
चप्-चप् करते हुए उसने कहा.”आह, तू, थ्-थोबड़ा! तो – अच्छी
पड़ेगी तुझे! और – तू इसी काबिल है! तो, - तू चाहता क्या है, आँ?”
“युअर हाइनेस...”
“मेरे लोगों को भगाना? नहीं, आदाब अर्ज़
है! शुक्रिया कहो, कि तेरे थोबड़े में गोली नहीं
घुसाई...हो-हो-हो! और – चलता बन! मार्च!...”
पुलिसवाले
ने मुश्किल से हाथ उठाकर सैल्यूट किया और झूलते हुए आगे बढ़ गया, चीफ़ भी
उसके पीछे पीछे चला गया, और लेफ़्टिनेन्ट ने सम्गीन का हाथ पकड़कर उसे
कुपे में खींचा, बर्थ पे धकेला और, दरवाज़ा बंद
करके,
ठहाके
लगाते हुए, क्लीम के सामने बैठ गया – दोनों के घुटने टकरा रहे
थे.
“समझ रहे
हैं,
- बदमाश
ने पुलिसवाले की रिवॉल्वर छीन ली और भाग गया, आँ? नहीं, - आप इस बात
को समझिये: विशेष दर्जे वाला हिस्सा, सुरक्षा बल, तेरी
माँ... इन्हें तो चूहे पकड़ना चाहिए, न कि क्रांतिकारी! ये तो – कॉमेडी है! ओह...”
हँसी के
मारे उसका दम घुटने लगा, आवाज़ भर्रा गई, गोल-गोल
आँखें और बाहर निकल आईं, चेहरा लाल होकर गोल-गप्पा हो गया, उसने एक
हाथ की मुट्ठी अपने घुटने पे मारी और दूसरे से फ्लास्क पकडकर उसमें से एक घूँट पिया
और उसे सम्गीन के हाथों में थमा दिया. क्लीम को भी ठण्ड महसूस हो रही थी, इसलिए उसने
भी ख़ुशी से पी ली.
“बढ़िया मज़ाक! क-क्रांति, जानते हैं, आँ? बदमाश
पिस्तौल बेच देगा, या फिर – किसी को मार गिराएगा... उत्सुकतावश
चला देगा गोली. ओह गॉड! बड़ा दिलचस्प है, इन्सान को मारना...”
‘चढ़ गई है,’ चश्मे के
भीतर से लेफ़्टिनेन्ट की ओर देखते हुए सम्गीन ने सोचा, मगर वह हल्की
आवाज़ में, करीब-करीब फ़ुसफ़ुसाते हुए, जल्दी
जल्दी कहने लगा:
“एक इस्टेट
की सुरक्षा के लिए जा रहा हूँ, किसी सिनेटर का ‘प्लान्ट’ है, वैसे –
वज़नदार आदमी है! इस साल – ये चौथी बार है. छोटी मछली, जहाँ किसी
और को नहीं भेज सकते, वहीं ठूँस देते हैं. सिम्योनोव लोग – मीन, रीमान, वैसे –
जर्मन्स हैं, रूस को बस में रखने के लिए चाय-पानी का
ख़र्चा मिलता है उन्हें... ख़ूब मिलता है! और मैं, शायद, सिर पर
डंडे खाऊँगा. या – ईंट, पत्थर...पी लो, फ्रेंच
है...”
ज़ोर से
साँस लेकर, उसने अपनी आँखों पर भारी, नीली सी
पलकें गिरा लीं और सिर हिलाया.
“नींद नहीं
आती! डेढ़ महीना हो गया. दिमाग़ में – छर्रे बिखरे पड़े हैं, पता है –
मैं उन्हें करीब-करीब देख सकता हूँ: लुढ़कते हुए छोटे छोटे गोले, ऐ ख़ुदा! आप
ख़ामोश क्यों हैं? आप – घबराइए नहीं, मैं – शांत
स्वभाव का हूँ! सब – साफ़ है! आप – ग़ुस्सा दिलाते हैं, मैं – शांत
करता हूँ. ‘ज़िंदगी, ज़िंदगी की ख़ातिर ही मिली है’, - जैसे किसी
मकारी ने कहा था, कवि था. मुझे कवि, लेखक, और आपके
सारे भाई-बंधु पसंद नहीं हैं – नहीं हैं
पसंद!”
उसने फिर
से फ्लास्क से एक घूँट पिया और, कानों को हथेलियों से ढाँककर, बड़ी देर तक
कोन्याक से मुँह को खंगालता रहा. फ़िर, आख़ें घुमाकर, हाथों को
सिर पर रखकर, और ज़ोर से बोलने लगा:
“मैं –
लोगों को शांत करता हूँ, और मुझे भी – वश में कर लेते हैं. मेरे सामने
एक ग़ज़ब का बूढ़ा खड़ा था, थोबड़ा – ज़हीन, ईमानदार
थोबड़ा – बाज़! मैंने उसे दाढ़ी से पकड़ा, रिवॉल्वर – नाक पे. ‘समझ रहा है?’ मैंने कहा.
‘सही फ़रमाया, युअर
हाइनेस, समझ रहा हूँ, कहने लगा, मैं ख़ुद भी
तुर्की-युद्ध का सैनिक रह चुका हूँ, क्रॉस, मेडल्स
मिले हैं मुझे, समझौता करवाने के लिए जाता था, मर्दों को
कोड़े लगाता था, मारिए गोली मुझे – मैं इसी लायक हूँ! सिर्फ, बोला, इससे आपको
कोई फ़ायदा नहीं होगा, युअर हाइनेस, आदमियों के
लिए जीना नुश्किल हो गया है, बग़ावत तो वो करेंगे ही, सबको तो आप
नहीं ना मार सकते’. हुम्...ये था – थोबड़ा, आँ?”
अपनी बात
कहते हुए वह पूरे समय सिर झटक रहा था, जैसे उसके रीछ जैसे बालों में मक्खी रेंग रही
हो. वह ख़ामोश हो गया और एकटक सम्गीन के चेहरे की ओर देखते हुए, एक हाथ से
बर्थ पे फ्लास्क ढूँढ़ने लगा, दूसरे हाथ से गर्दन सहलाता रहा, फ़िर
फ्लास्क उठाकर, उसे सम्गीन के घुटनों पे फेंक दिया.
“पी भी लो, क्या बकवास
है!...”
‘हो सकता है, कि ये
सामान्य न हो’. सम्गीन ने सोचा, उसने
कोन्याक गटक ली और फ्लास्क को अपनी बगल में रखकर बर्थ के कोने में पड़े रिवॉल्वर पर
नज़र डाली.
“बढ़िया बूढ़ा था! लीडर, ग्रेनेडियर.
शैतान ने मेरे भीतर उसके झोंपड़े में एक जग दूध पीने की ख़्वाहिश पैदा की, तो – बात
समझ में आ रही थी: गर्मी थी, थक गया था! सुअर के बच्चे, सार्जेन्ट
ने,
एड्जुटेन्ट
से न जाने क्या कहा; एड्जुटेन्ट फ़ोगेल, हमारी
रेजिमेन्ट का कमाण्डर – सामन्त ज़िल्ले – वो, जग मेरे
यहाँ पे बैठा!”
लेफ़्टिनेन्ट
अपनी गर्दन को हथेली से थपथपा रहा था. कम्पार्टमेन्ट को झटका लगा, लेफ़्टिनेन्ट
उछला और चिल्लाया:
“बास्टर्ड्स!
चलो – पियेंगे! आप ख़ामोश क्यों हैं?”
“आपकी
नौटंकी के बारे में सोच रहा हूँ,” सम्गीन ने कहा.
“नौटंकी,” फ्लास्क को
बेल्ट से झुलाते हुए लेफ़्टिनेन्ट ने दुहराया. “इसमें – कोई नौटंकी-वौटंकी नहीं है, बल्कि –
नौकरी है! मैं थियेटर बर्दाश्त नहीं कर सकता. सर्कस – अलग बात है, उसमें
फ़ुर्ती होती है, ताकत होती है. आप सोच रहे हैं - मैं समझता
नहीं हूँ, कि क्रांतिकारी क्या होता है?” घुटने पर
मुट्ठी मारते हुए उसने अचानक पूछा, और तनाव के कारण उसका चेहरा नीला भी पड़ गया. “
जाओ सब लोग भाड़ में, ख़ूब कर ली आपकी ख़िदमत, ये होता है
मतलब क्रांतिकारी का, - समझ रहे हैं? ह-ड़-ताली...”
“बेशक,” सम्गीन ने
शांति से कहा, मगर इससे लेफ़्टिनेन्ट शांत नहीं हुआ; उसने क्लीम
के घुटने को उँगलियों से पकड़ लिया और भर्राते हुए फ़ुसफ़ुसाया:
“आप, सिविलियन, सोचते हैं
कि ये आसान है: आदमियों पर कोड़े बरसाए - सतरह या नौ, चार – सब
एक ही है! – और बेशक – सो गए, और अगली ड्यूटी तक सोते रहे, हाँ? नहीं, माफ़ कीजिए, ये इतना
आसान नहीं है. इससे पहले पीना पड़ता है, और इसके बाद भी – पीना और पीना! और – काफ़ी देर
तक,
खूब
सारी?
मीन, रीमन, रेन्नेंकाम्फ़
के लिए – आसान है, वो – क्या कहते हैं – प्रेटोरियन गार्ड्स हैं, वो नीरोन
की ख़िदमत करते हैं और आम तौर से – नेपोलियन की, मगर हम, पैदल
सैनिकों को ... कैप्टेन तातार्निकोव – पढ़ा है? जिसने
किसानों पर गोलियाँ चलाई, इसकी रिपोर्ट की और फ़ौरन वहीं पर ख़ुद को भी
गोली मार ली थी. इसे कहते हैं – स्कैण्डल! सवाल उठा: उसे बाजे-गाजे के साथ दफ़नाया
जाए या बगैर गाजे-बाजे के? और वो, जापान वाले
युद्ध में बटालियन का कमाण्डर रह चुका था, दो
जॉर्जियन मेडल्स मिले थे, ज़हीन था, ख़ुश मिजाज़, क्या ग़ज़ब
की बिलियार्ड खेलता था...”
कम्पार्टमेन्ट
को फ़िर से झटका लगा, लेफ़्टिनेन्ट करवट के बल गिरा और उसने पूछा:
“क्या चल
पड़े?”
और जब
ट्रेन स्टेशन के सामने से गुज़र रही थी, तो उसने खिड़की से बाहर देखा, और ख़ुश
होकर कहा:
“पुलिसवाला
तो,
खड़ा
है,
थोबड़ा!
रिवॉल्वर के लिए उसकी अच्छी हजामत होगी.”
अब, ट्रेन के
फ़ौलादी शोर में, उसकी तेज़ आवाज़ और भी धीमी हो गई, शब्द मुश्किल
से सुनाई दे रहे थे. वह पीठ के बल लेटा था, सिगरेट पी
रहा था, उसका गोल-गोल, ढीला-ढाला
पेट उछल रहा था, और ऐसा लग रहा था, कि शब्द
पेट के भीतर उमड़-घुमड़ रहे हैं:
“पैदल
फ़ौज... मज़दूरों की ताकत है, वो कभी न कभी आपको ऐ-ए-सा स्पेन दिखाएगी, ऐ-ए-सा
न-ज़ा-रा...”
सम्गीन सुन
नहीं रहा था, उसे पता था कि जितना कह चुका है, उससे
ज़्यादा लेफ़्टिनेन्ट कुछ नहीं कहेगा.
‘निरंकुशता
का सहारा’, अपनी ऊँघ के बीच, ये ग़ौर
करते हुए उसने सोचा, कि कैसे मोमबत्ती की लौ लेफ़्टिनेन्ट की दाईं
आँख़ में परावर्तित होकर उसे भौंरे के पंख जैसा बना रही है.
‘शायद, वो – अकेला
ही ऐसा नहीं है. और, बेशक, कोड़े
बरसाएगा, गोली मारेगा. मतलब, ज़्यादातर
लोग अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, उसके मतलब में यकीन न करते हुए’.
ये बहुत
अप्रिय ख़याल था. सम्गीन कम्बल में दुबक गया और उसने अपने जिस्म को झटकों और
हिचकलों की सुकून देती जड़ता के हवाले कर दिया. कण्डक्टर ने दरवाज़ा खोलकर उसे
जगाया:
“रूसगोरद.”
लेफ्टिनेन्ट
कुपे से जा चुका था, कोन्याक की गंध, छोटी सी
मेज़ के नीचे पड़ी मुड़ी हुई ताँबे की छड़ और छोटा सा परदा ही उसकी याद दिला रहे थे.
खिड़की से
चाँदी जैसा सूरज झाँक रहा था, आसमान – उसी तरह ठण्ड़ापन लिए नीला था, जैसा वह
रात को था, और चारों ओर की हर चीज़ वैसी ही सहलाती उदासी से भरी
थी,
जैसी
कल थी,
सिर्फ
अब उसे चमकते रंगों से रंग दिया गया था. दूर, चाँदी के
शानदार ब्रोकेड में लिपटी पहाड़ी पर, घरों की चिमनियाँ गुलाबी धुँआ छोड़ रही थीं, छतों पे
पड़ी बर्फ़ पर धुँए की परछाइयाँ रेंग रही थीं, आसमान में
चर्चों के गुम्बज़ और सलीब चमक रहे थे, सफ़ेद खेत में एक कारवाँ जा रहा था, काले
छोटे-छोटे घोड़े सिर हिला रहे थे, मोटे आदमी भेड़ की खाल के कोट पहने चल रहे थे, - हर चीज़
खिलौनों जैसी छोटी नज़र आ रही थी और देखने में प्यारी लग रही थी.
फुर्तीला
लाल घोड़ा जल्दी और आसानी से क्लीम को स्टेशन से शहर के भीतर ले आया; सड़क पर लोग, मोटे और
गूँगे,
सर्दियों
वाली फुर्तीली चाल से आ-जा रहे थे; बर्फ के जैकेट्स से दबे घर, जिनकी
फ़ेन्सिंग्स एक दूसरे से जुड़ी थीं, कड़ाई से एक साथ जम गए थे, मज़बूती से
खड़े थे; फ़ेन्सिंग्स पे, गुलाबी
पोस्टरों से काले शब्द आँखों में घुस रहे थे: “बुद्धि से दुर्भाग्य” – सफ़ेद
पोस्टर्स भी काले अक्षरों से एव्दोकिया स्त्रेश्नेवा की दूसरी कॉन्सर्ट की सूचना
दे रहे थे.
इस नाम से
सम्गीन को कुछ भी पता नहीं चला, मगर, जब वो होटल के कॉरीडोर से गुज़र रहा था, तो एक कमरे
का दरवाज़ा खुला, और घण्टे जैसा फ़र-कोट और फ़र की टोपी पहने एक
छोटी सी औरत ख़ुशी से, मगर धीमी आवाज़ में चिल्लाई:
“माइ गॉड! आप? यहाँ?”
सम्गीन एक
कदम पीछे हटा और उसने दुन्याशा का लोमड़ी जैसा चेहरा, उसकी चंचल, सुरमा लगी
आँखें,
छोटे-छोटे
दाँतों की चमक को देखा; वह उसके सामने खड़ी थी, हाथ इस तरह
उठाए थी, जैसे अभी उसे आगोश में ले लेगी. सम्गीन ने फ़ुर्ती से
उसके हाथों को चूमा, उसने सम्गीन के माथे को चूमा, होठों को
भींचकर मज़ेदार ढंग से बोली:
“म्-म्-
मेरे प्यारे...”
“जल्दी-जल्दी
ख़ुशी से कहने लगी:
“मतलब – ये
सच है कि सपने में पंछियों को देखने का मतलब होता है – आकस्मिक भेंट! मैं जल्दी ही
लौटूँगी...”
सम्गीन को
बेहद ख़ुशी हुई, कि दुन्याशा उससे इस तरह मिली थी, जैसे वह
उसका प्रेमी हो, जिसका उसे लम्बे समय से और बेसब्री से इंतज़ार
था. एक घण्टे बाद वे समोवार के सामने बैठे थे, और वो, प्याले में
चाय डालते हुए जल्दी जल्दी बताने लगी:
“स्त्रेश्नेवा – क्यों? ये मेरा
शादी से पहले का कुलनाम है, पापा – पावेल स्त्रेश्नेव, थियेटर में
बढ़ई थे. अपने पवित्र पति से – अलग हो गई. वो – आदमी नहीं, बल्कि – कोई
धर्मगुरू था और वकील नहीं, बल्कि डॉक्टर था, हर बात – सेहत
के बारे में, रातों को भी – बस, सेहत के
बारे में, कितनी पीड़ा! अपनी आवाज़ के बल पर मैं बढ़िया ज़िंदगी जी
सकती हूँ...”
सम्गीन
प्रसन्नता से और चाहत से उसे देख रहा था, इतनी भलमनसाहत से मुस्कुरा रहा था, जितना
मुस्कुरा सकता था. वो – राख के रंग की मखमल की ड्रेस में, गोल-गोल और
नर्म-मुलायम लग रही थी. उसके लाल, करीने से काढ़े हुए बाल चमक रहे थे, जैसे लाली
लिए हुए खरा सोना हो; बर्फ के कारण लाल हो गए गाल, छोटे-छोटे
गुलाबी कान, चमकदार सुरमा लगी आँख़ें और फुर्तीली, सहज हलचल –
ये सब उसे ख़ुशनुमा लड़की बना रहे थे, जो अपने आप को बेहद पसंद करती है, मर्द से
मिलकर सचमुच में ख़ुश हो जाती है.
“पता है, क्लीम्चिक, मैं –
कामयाब हूँ! कामयाब और बेहद कामयाब!” उसने अचरज से और कुछ डर से
दुहराया. “और ये सब – अलीना की वजह से, ख़ुदा उसे ख़ुश रखे, उसीने मुझे
अपने पैरों पर खड़ा किया! उसने और ल्यूतोव ने मुझे काफ़ी कुछ सिखाया. “तो, कहने लगी, बस हो गया, दून्का, अच्छे
रिव्यूज़ के लिए प्रांत में जाना होगा”. वो ख़ुद – प्रतिभाशाली नहीं है, मगर – सब
समझती है, सही-सही – कपड़े कैसे पहनना और उतारना चाहिए. उसे
प्रतिभा अच्छी लगती है, प्रतिभा की ख़ातिर ही वह ल्यूतोव के साथ रहती
है.”
साफ़-सुथरे
कमरे में गर्माहट थी, वो काफ़ी आरामदेह था, समोवार की
बुदबुदाहट प्यारी लग रही थी, चाय की स्वादिष्ट ख़ुशबू और दुन्याशा के सेन्ट
की ख़ुशबू नाक में प्यार से गुदगुदी कर रही थी. बातें करते हुए दुन्याशा बिस्किट
चबा रही थी, हरे भारी जाम से पोर्टवाइन के घूँट ले रही थी.
“यहाँ मेरी
एक परिचित व्यापारी की पत्नी है, - उसने भी मेरी बहुत मदद की; कित्ती
ख़ूबसूरत है, क्लीम – अलीना से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत! पूरा शहर उससे
प्यार करता है.”
उसने हाथ
उठाकर मुट्ठियाँ भींचीं और अपने सुनहरे सिर के ऊपर उन्हें हिलाया:
“ऐह, काश मैं
ख़ूबसूरत होती! धूम मचा देती...”
और, वह उछलकर
क्लीम के घुटने पर बैठ गई, उसकी गर्दन में हाथ डाल दिए और पूछने लगी:
“हम तुम
यहाँ कुछ समय साथ रह सकते हैं, हाँ?”
“ज़ाहिर है,” उदारता से
क्लीम ने कहा. दरवाज़े पर खटखट हुई.
“शायद, अख़बार वाला
है,”
दुन्याशा
गुस्से से फ़ुसफ़ुसाई और, दरवाज़े को थोड़ा सा खोलकर उसने चिड़चिड़ाहट से
पूछा: “कौन है? आह – आती हूँ...”
क्लीम को
एक हवाई-चुम्बन देकर वो ग़ायब हो गई, और वह उठा, जेबों में
हाथ डालकर, कमरे में घूमने लगा, अपने आपको
आईने में देखा, सिगरेट पी और ये सोचकर हँस पड़ा कि इस औरत ने
कितनी जल्दी उस भयानक ऑफ़िसर को भूलने में उसकी मदद की है. लेफ़्टिनेन्ट त्रिफ़ोनोव
की याद दिलाई त्सार अलेक्सान्द्र द्वितीय के ताम्बे के पुतले ने, जो खिड़की
से बाहर, छोटे से चौक के बीचोंबीच खड़ा था, - त्सार की
टोपी,
मूँछों
और कंधों पर भुरभुरी बर्फ़ बिखरी थी, उसके दाईं ओर सूरज चमक रहा था, उभरी हुई, स्थिर आँख़
अप्रिय ढंग से चमक रही थी. स्मारक के चारों ओर जंज़ीरों से बंधी हुईं तोपें थीं, जो ज़मीन में चौकियों जैसी गड़ी हुई थीं, एक जैसे
कटे हुए छोटे-छोटे पेड़ भी थे, जो सफ़ेद फूलों के गुलदस्तों जैसे लग रहे थे.
“क्या, ताऊ?” सम्गीन ने
दबी ज़ुबान में पूछा और, इस शरारत से चौंककर, जो उसकी
अपनी नहीं थी, उसने त्सार की निश्चल आँख की ओर देखना बंद कर
दिया.
‘दिमाग़ की नसें...’
कॉरीडोर
में शोर होने लगा, दरवाज़ा खुला, दुन्याशा
के साथ काली पोषाक में एक बड़ी औरत अंदर आई, और सूरज के
सामने रुककर उसने भारी और रसीली आवाज़ में दुन्याशा से कहा:
“नहीं
पहचानेगा.”
मगर क्लीम
ने पहचान लिया, - ये मरीना प्रेमीरोवा थी, वैसी ही शानदार, जैसी शादी
से पहले थी; अब और ज़्यादा ऊँची, पतली हो गई
थी.
“ज़रूरत से ज़्यादा बूढ़ा हो गया है,” शब्दों को
सुर में खींचते हुए, अलसाएपन से उसने कहा; फिर अपनी
अंगूठियों वाली गर्म ऊँगलियों से सम्गीन का हाथ कस के पकड़ लिया और उसे अपने से दूर
हटाकर सिर से पाँव तक देखकर बोली: “ तो, फिर भी आदमी अभी ठीक-ठाक ही है! कितने सालों
से नहीं देखा? ओह, न गिनना ही बेहतर होगा.”
वह उतने
जंगलीपन से और ज़ोर से डराते हुए नहीं हँस रही थी, जैसा
पीटरबुर्ग में हँसती थी, नज़ाकत से और हौले-हौले चल रही थी, वैसी गरिमा
से,
जो
सिर्फ अधिकार और प्रभाव के बल पर ही प्राप्त होती है.
‘पक्की
व्यापारी है’, उसके सवालों के जवाब देते हुए, सम्गीन ने
जल्दी से अपनी राय बना ली.
“अच्छा, और –
द्मित्री?” मरीना ने पूछा. “नहीं मालूम? तो ऐसा है.
हाँ,
हाँ, तूरोबोएव
को गोली मार दी. ज़्यादा ही हरकत में आ गया था,” उसने
उदासीनता से पुश्ती जोड़ी. “नेखाएवा की याद तो है ना?”
आँख़ों को
ध्यान से सुनने का भाव प्रदान करते हुए पलकें ख़ूबसूरती से थरथराईं. सम्गीन
महसूस कर रहा था कि वह उसे तौल रही है, परख रही है. गहरी साँस लेकर वह बोली:
“ हमारे
परिचितों में और कौन हैं?”
“कुतूज़ोव,” क्लीम ने
याद दिलाई.
“उससे मैं
कभी-कभी मिलती हूँ. तू चुप क्यों है?” मरीना ने दुन्याशा के कस कर बांधे हुए बालों
को देखते हुए पूछा, - दुन्याशा उससे चिपक गई, जैसे कोई
किशोर लड़की अपनी माँ से चिपकती है. मरीना फिर से पूछने लगी:
“क्या पॉलिटिक्स में तुम भाई से अलग हो गए?”
सम्गीन को
अच्छा नहीं लगा कि वह उससे ‘तुम’ कहकर बात कर रही थी; उसने
रूखेपन से जवाब दिया:
“नहीं, बस, ऐसे ही...एक दूसरे से दूर रहते हैं, कभी-कभार
ही मिलना होता है.”
“तू – क्या सोशल-डेमोक्रेट है?”
“हाँ.”
“कहीं – बोल्शेविक तो नहीं?”
“मैं – पार्टी में नहीं हूँ.”
“ये, ज़्यादा
अच्छा है. शादी शुदा हो?”
“था,” सम्गीन ने
फ़ौरन जवाब नहीं दिया. “और तू – कैसे रहती है?”
“चार साल हो गए विधवा हूँ.”
अपनी घनी
भँवें नचाकर उसने गाँव की किसी औरत की तरह कहा:
“मेरा शौहर
मेरे लिए बच्चे छोड़कर नहीं गया, सिर्फ़ अपने लिए दर्द छोड़कर गया...”
उसने सिर
झुकाकर कुछ देर सोचा और उठ गई.
“मेरे यहाँ
आओ,
करीब
पाँच बजे, चाय पिएँगे, बतियाएँगे.”
औरतें चली
गईं,
स्त्रेश्नेवा
– आगे-आगे, मरीना – उसके पीछे, अपने डील-डौल
से पूरी तरह उसे छुपाते हुए.
दाँतों में
सिगरेट दबाए कमरे में घूमते हुए, चश्मा पोंछते हुए, सम्गीन
मरीना के बारे में सोचने लगा. उसके तंदुरुस्त जिस्म की हलचल, आवाज़ के
ख़ूबसूरत उतार-चढ़ाव, सुनहरी आँख़ों की नज़ाकत भरी, मगर कुछ
भारी नज़र – हर चीज़ ख़ूबसूरत थी, स्वाभाविक लग रही थी.
‘अपने प्रति
सम्मान का भाव पैदा करती है...शायद, करती है’.
मगर क्लीम सम्गीन को विरोधाभास ढूँढ़ने की आदत
हो गई थी, वह इसे अपना कर्तव्य समझता था, ये उसके
निरंकुश विचारों की माँग थी. उसका जी चाहने लगा कि मरीना में भी कुछ कृत्रिमता, कोई झूठ
ढूँढ़े.
‘पॉलिटिक्स
के बारे में पूछ रही थी. कुतूज़ोव से मिलती रहती है,’ उसने कारण
गिने.
कुतूज़ोव
सम्गीन के सभी विचारों को एक निश्चित दिशा में मोड़ देता था, और कुतूज़ोव
से हमेशा ख़ामोश रहकर ही बहस की जा सकती थी.
‘एक मामूली, सीमित
विचारों वाला आदमी है, जैसे उस जैसी मानसिक-प्रवृत्ति के सभी लोग
होते हैं. ये वो हैं जिन्होंने राजनीतिक सोच वाले आदमियों को दर्जन भर पार्टियों
में बाँट दिया है. अगर ये मान लें, कि केवल वे ही कार्यरत हैं - आत्म रक्षा की
भावना के सहारे नहीं, बल्कि मज़दूरों की वर्ग भावना के सहारे. मगर
यूरोप के सोशलिस्ट्स इस भावना के अस्तित्व पर संदेह करते हैं. बुर्जुआ के सिर्फ
शीर्ष स्तर पर वर्गीय पहचान देखी जाती है... हमारे यहाँ, हो सकता है, ऐसे पाँच
सौ या हज़ार लोग होंगे, जैसे वो कॉम्रेड याकोव...ज़ाहिर है, ये –
विनाशकारी शक्ति है...मगर – मैं किस बात का अफ़सोस कर रहा हूँ?’ अचानक इन
विचारों को परे धकेल कर, जिन पर वह दर्जनों बार विचार कर चुका था, उसने अपने
आप से पूछा, - और उसे याद आया, कि उस
ऊँचाई से जिस पर उसे स्वयम् को देखने की आदत हो गई थी, वो, पिछले कुछ
समय से, अक्सर, अनचाहे ही इस सवाल पर फ़िसल कर आ जाता है.
‘मैं किसी
भी व्यक्ति से, और किसी भी चीज़ से जुड़ा हुआ नहीं हूँ,’ उसने अपने
आप को याद दिलाया. ‘वास्तविकता मेरी दुश्मन है. मैं उसके ऊपर यूँ
चलता हूँ, जैसे रस्सी पे चल रहा हूँ’.
रस्सी पर
चलने वाले नट से अपनी तुलना करना अप्रत्याशित और अपमानजनक था.
‘“अफ़सोस करने की – कोई वजह ही नहीं है’, आधे
सवालिया लहजे में उसने दुहराया, अपने विचारों को मानो दूर से, हट कर और
किसी नए विचार के आईने से देखते हुए, जिसे अब तक शब्दों में प्रकट नहीं किया गया
था. और इस बात ने, कि उसके सभी पुराने विचारों के पीछे रहने
वाला और निरीक्षण करने वाला एक और विचार भी है, जो हालाँकि
अस्पष्ट है, मगर, हो सकता है कि वो सबसे ज़्यादा सशक्त हो, सम्गीन के
भीतर अपनी जटिलता के, मौलिकता के, अपनी
आंतरिक सम्पन्नता के प्यारे एहसास को जगा दिया. कमरे के बीच में खड़े खड़े वह सिगरेट
पी रहा था, अपने पैरों के नीचे रोशनी के लाल धब्बे को देख रहा था, और अचानक
उसे पूरबी शिक्षाप्रद कहानी याद आ गई, उस आदमी के बारे में, जो धूप में
एक चौराहे पर बैठा हुआ ज़ार-ज़ार रो रहा था, और जब वहाँ
से गुज़रने वाले एक आदमी ने उससे पूछा: आँसू क्यों बहा रहे हो? – तो उसने
जवाब दिया: “ मेरी परछाईं मुझसे छुप गई है, और सिर्फ
वही जानती थी कि मुझे कहाँ जाना चाहिए”. कहानी का रोतला आदमी बेवकूफ़ कहलाया.
सम्गीन ने सिगरेट का टुकड़ा कोने में फेंक दिया, घड़ी की ओर
देखा – चार बज रहे थे. सूरज डूब रहा था, त्सार के स्मारक पे बर्फ रूबी जैसी चमक रही थी, स्कूली लड़के
और लड़कियाँ हाथों में स्केट्स लिए जल्दी-जल्दी जा रहे थे; भूरे घोड़ों
वाली स्लेज गाड़ी गुज़र रही थीं; घोड़े नीली जाली से ढँके हुए थे, गाड़ी में
एक बड़ा फ़ौजी बैठा था, दो पुलिस वाले उसके पीछे घोड़ों पर जा रहे थे, काले घोड़े
ऐसे चमक रहे थे, जैसे उन पर मोम की पॉलिश की गई हो. दुहरी
खिड़कियों के कारण सड़क से आवाज़ें भीतर नहीं आ रही थीं, और ऐसा लग
रहा था कि चौक पर सब कुछ, वास्तव में नहीं बल्कि यादों में जी रहा हो.
दुन्याशा
भागती हुई आई और जल्दी मचाने लगी:
“चलो, चलो.
ज़ोतोवा राह देख रही है...”
“ज़ोतोवा?” सम्गीन ने
पूछा. दुन्याशा ने होठों पर लिपस्टिक फेरते हुए, सिर हिलाया, और उसने
मुँह बना लिया: ज़ाहिर है, मरीना ही वो औरत थी, जिसके बारे
में गोगिन ने उसे बताया था. इससे उसका काम तो आसान तो हो गया, मगर इसमें
कुछ अप्रिय बात थी.
‘कहीं इस
व्यापारी औरत को षड़यंत्रों में तो मज़ा नहीं आता?’
रास्तों पर
हर चीज़ बचपन से जानी पहचानी, शांत थी और जैसे वास्तव में उसका अस्तित्व था
ही नहीं, बल्कि गुज़रे ज़माने की यादों की बदौलत पैदा हुई थी.
दुन्याशा
ने,
जो
उससे कसकर चिपकी हुई चल रही थी, कहा:
”यहाँ सब
ख़त्म हो गया है, सिर्फ इस बारे में बहस करते हैं, कि ड्यूमा
में किसे बैठना चाहिए. यहाँ बहुत अच्छे लोग हैं, मुझे इस
तरह स्वीकार करते हैं – तुम देखोगे ही कि कैसे! तीन-तीन बार ‘वन्स-मोर’ पे गाती
हूँ. गानों के दीवाने हैं...
तेज़ रोशनी
से जगमगाती दुकान की खिड़की के सामने रुके. काँच के पीछे सुनहरी जिल्दों में एनामेल
और बहुमूल्य पत्थर जड़े ‘होली बाइबल्स’ के बीच में
काले मखमल पर काँच के कवर में ढाँककर बिशप की पदसूचक टोपी रखी थी, अल्टार पर
क्रॉस रखे थे, दो और तीन मोमबत्तियों वाले स्टैण्ड्स रखे थे.
“ये – उसकी
है!” दुन्याशा ने कहा. “बेहद अमीर है,” चर्च संबंधी सामान से ठसाठस भरी दुकान में
जाने वाला भारी दरवाज़ा ठेलते हुए वह फ़ुसफ़ुसाई. चाँदी के मोमबत्तियों के स्टैण्ड
चकाचौंध पैदा कर रहे थे, अलमारी के काँच के पीछे दान में दी जाने वाली वस्तुओं
के सुनहरे संदूक चमक रहे थे, छत से धूपदान लटक रहा था; सफ़ेद और
पीली चमक में चुस्त काली रेशमी पोषाक में लिपटी भारी-भरकम औरत खड़ी थी.
“इस तरफ़ आ जाइए,” आसानी से
मोमबात्तियों और बप्तिज़्मा के सामान के बीच से गुज़रते हुए उसने कहा. “दुकान बंद कर
दे और घर चला जा!” उसने भूरे बालों वाले छोकरे से कहा, जिसने
सम्गीन को दिओमीदोव की याद दिला दी.
दुकान के
पीछे,
छोटे
से कमरे को हल्की गुलाबी धुँध से भरते हुए दो लैम्प जल रहे थे; फ़र्श पर
मोटी कालीन पड़ी थी, दीवारों पर भी कालीन लटक रहे थे, दीवार पर
ऊपर की ओर – काली फ़्रेम में जड़ी, चाँदी की पत्तियों से सजी एक तस्वीर थी; कोने में
एक चौड़ा अर्धगोलाकार सोफ़ा रखा था, उसके सामने मेज़ पर लाल ताँबे का समोवार उबल
रहा था, काँच, चीनी के बर्तन हल्के से चमक रहे थे. ऐसा लग
रहा था कि चाँदी और सोने को फ़ूहड़पन से चमकाने वाली दुकान यहाँ से दूर थी.
“मैं यहाँ
सुबह से शाम तक रहती हूँ, अक्सर रात भी यहीं गुज़ारती हूँ; मेरे घर
में – ख़ालीपन है, और बहुत दुखभरा वातावरण है,” मरीना
पुराने भरोसेमंद दोस्त की तरह बात कर रही थी, मगर सम्गीन
ने,
ये
याद करके, कि पहले वो कैसी बदतमीज़ और ज़िद्दी थी, - उस पर
विश्वास नहीं किया.
“तो, बताओ,- कैसे रहे, क्या करते
हो?”
उसने
कहा;
क्लीम
ने जवाब दिया:
“कहानी
लम्बी है और दिलचस्प नहीं है.”
“बनो मत, कुछ तो
तुम्हारे बारे में मैं जानती हूँ. सुना था, कि तुम
लोगों के साथ जैसे बदतमीज़ी से, फूहड़पन से पेश आते थे, वैसे ही
अभी भी हो. ये तस्वीर देख रहे हो? मेरा शौहर.”
मरीना ने
लैम्प से शेड हटाया, उसे उठाकर तस्वीर के पास लाई. किसी अच्छे
आर्टिस्ट ने लम्बे-लम्बे स्ट्रोक्स से सिकुड़े कंधों पर एक बड़ा गंजा सिर बनाया था, पीला चेहरा, नाक लम्बी, चटख नीली
आँखें,
मोटे
लाल होंठ, - ये चेहरा था किसी बीमार, और शायद, उलझे हुए
चरित्र वाले आदमी का.
“दिलचस्प
चेहरा है,” सम्गीन ने कहा, मगर ये
महसूस करते हुए कि इतना कहना काफ़ी नहीं है, आगे जोड़ा: “बेहद
मौलिक चेहरा है.”
“वह लोर्दुगिन परिवार से है,” मरीना ने
कहा और हँस पड़ी. “क्या कभी ये कुलनाम नहीं सुना? बेशक नहीं!
कौनसा साहित्यकार, स्लावोफिल, दिसेम्बरिस्ट
किसका रिश्तेदार था, - ये तो आप, बुद्धिवादी
अच्छी तरह जानते हो, मगर उन अध्यात्मिक गुरुओं को, जिन्हें
जनता ने विश्वविद्यालयों से बाहर प्रसिद्धी प्रदान की – उन्हें आप नहीं जानते.”
“लोर्दुगिन?” क्लीम ने
फिर से पूछा, मरीना के व्यंग से उसके भीतर दिलचस्पी जाग गई थी.
“जो जानते
नहीं हो, उसे याद करने की कोशिश मत करो,” उसने जवाब
दिया और दुन्याशा की ओर मुख़ातिब हुई:
“ ‘बोर’ हो रही हो, दून्या?”
वो, कुर्सी में
बिल्कुल सीधी, काठ के समान बैठी हुई, जैसे कोई
ग़रीब रिश्तेदार हो, कोने की तरफ़ देख रही थी, जहाँ हैंगर
पर टंगे ओवरकोट बिना सिर के गार्ड्स जैसे नज़र आ रहे थे.
“ओह, क्या कह
रही हो,” वह चौंक गई. “मुझे ‘बोर’ होना आता
ही नहीं...”
“कोई बात
नहीं,
थोड़ा
‘बोर’ हो लो,” मरीना ने
उसे बिल्ली की तरह सहलाते हुए इजाज़त दे दी.”
“द्मित्री
को तो,
शायद, किताबें
पूरी तरह खा गईं?” अपने मज़बूत सफ़ेद दाँत दिखाते हुए उसने पूछा. “मुझे
अच्छी तरह याद है कि कैसे वो मेरे पीछे-पीछे फ़िरता था. अब – हँसी आती है, मगर तब –
दुख होता था: लड़की शादी करना चाहती है, और वो उसे
लगातार किन्हीं अनदेखे लोगों के बारे में बताता रहता है, कभी
तिवेरियन्स के बारे में, तो कभी उग्लिचों के बारे में, और पश्चिमी
यूरोपीय महाकाव्य पर पूरब के प्रभाव के बारे में! कभी कभी तो जी करता था कि सीधे
उसके माथे पे घूँसा जमा दूँ, आँखों के बीचोंबीच...”
लजीज़ रूसी
भाषा के शब्दों को वह इतने प्यार से कह रही थी, कि सम्गीन
को शक होने लगा: उसके लिए शब्द इतने प्यारे हैं, कि उनके
अर्थ से उसे कोई मतलब नहीं है, और उनसे खेलना उसे अच्छा लगता है. उसे
व्यापारी की पत्नी की, खाते-पीते घर की, तंदुरुस्त
औरत की भूमिका पसंद है. बेशक उसके कई सारे आशिक हैं और वह अक्सर
उन्हें बदलती रहती है.
और मरीना, दुन्याशा
को कस कर बाँहों में पकड़े हुए कहती रही:
“उन दिनों
मर्द मेरे सामने बड़े डरावने और दुहरे रूप में डोला करता था, कभी- जिस्म
दिखाई देता, तो कभी- रूह. बातें तो मैं वैसे ही करती थी जैसे सब
करते हैं – साधारण तरीके से, मगर सोचती असाधारण थी और अपने असली विचारों को
शब्दों में ज़ाहिर नहीं कर पाती थी...”
‘झूठ बोलती
है...,’
खूब
बढ़िया केक खाते हुए और मरीना और कुतूज़ोव के किस्से को याद करके सम्गीन ने सोचा. ‘और ये
दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह मौलिक है’.
शाम के
धुँधलके में, कालीनों और गुदगुदे फ़र्नीचर के बीच, मरीना मोटे
ब्रश से किसी फ्रेंच कलाकार द्वारा बनाई गई ओडॅलिस्क की तस्वीर की याद दिला रही
थी. उसके चारों ओर की ख़ुशबू भी – पूरबी थी: सरू की, लोभान की, कालीनों
की.
“क्या लीज़ा
स्पिवाक की याद है? कैसी ख़ामोश, पंखहीन
आत्मा थी. उसने मुझे गाना सीखने की सलाह दी. देखती हूँ – सभी गीतों में औरतें अपनी
प्रकृति का रोना रोती हैं...”
“प्रकृति
की शिकायत सभी करते हैं, और संग़ीत भी इस बारे में शिकायत ही करता है,” दुन्याशा
ने गहरी साँस लेकर कहा, मगर फ़ौरन मुस्कुराने लगी. “वैसे, मर्द : ‘दूर ख़तरनाक
मौसम से परे, है एक ख़ुशनुमा देस...’ गाना पसंद
करते हैं’.
मरीना भी
मुस्कुराते हुए अलसाए सुर में बोली:
“ये तो
पॉलिटिशियन्स गाते हैं, वैसे, जैसे –
सम्गीन. उन्होंने, परंपरावादियों की तरह, ज़िंदगी के
डर से, अपने लिए ‘अपोन्स्की
राज्य’
की
कल्पना कर डाली.”
“कैसी अजीब
बातें करती हो,” सम्गीन ने उत्सुकता से उसकी ओर देखते हुए कहा.
“ऐसा लगता है, कि हम काफ़ी सुरक्षित समय में जी रहे हैं, मतलब –
काफ़ी निडरता से रहते हैं.”
मरीना ने
ऐसे हाथ झटका मानो मच्छर भगा रही हो.
“मेरे शौहर
की पहली बीबी के एक रिश्तेदार को जापान वाली लड़ाई में दो जॉर्जियन मेडल्स मिले, पियक्कड़ है, मगर – बेहद
अक्लमंद आदमी है. वो कहता है : ‘भीरुता के लिए मेडल्स मिले हैं, पीछे भागने
में डर लगा – गोली मार देंगे, तो, बस चला गया आगे!’
उसने जाम
से वाइन का एक घूँट पीकर, उसके बाद चाय पी, और आराम से
होठों पर जीभ फ़ेरते हुए वह कहती रही:
“आप, बुद्धिवादी, दल बदलू भी, डर के मारे
ही तो पॉलिटिक्स में घुसते हैं. जैसे, जनता को बचाना चाहते हैं, मगर – जनता
क्या करती है? जनता तो आपकी – बेहद दूर की रिश्तेदार है, वो आपको, छोटे लोगों
को – देखती तक नहीं है. और आप चाहे कितना ही उसे क्यों न बचाएँ, नास्तिकता
के कारण ज़रूर मार खा जाओगे. पॉप्युलिज़्म – धार्मिक होना चाहिए. ज़मीन के बदले –
ज़मीन,
ज़मीन
तो वह ख़ुद भी जीत लेगी, मगर, इसके अलावा, उसे धरती
पर किसी चमत्कार की अपेक्षा है, उसे ज़िओन के जगमगाते शहर का इंतज़ार है.”
ये सब उसने
छोटे से रूमाल से तमतमाते हुए चेहरे को हवा देते हुए, हौले-हौले सम्गीन
की तरफ़ बिना देखे कहा. क्लीम को महसूस हुआ: इसे उम्मीद नहीं है कि उसके शब्दों को
कोई समझेगा. उसने इस बात पर भी गौर किया कि मरीना के कंधे के पीछे से दुन्याशा
विनती सी करती हुई देख रही है, वह – उकता रही थी.
“तुम ऐसा सोचती हो?” उसने
मुस्कुराते हुए कहा. “क्या कुतूज़ोव इन ख़यालों से वाकिफ़ है?”
“ऐसे ख़यालों के लिए स्तेपान तैयार नहीं है,” मरीना ने
भँवें हिलाकर सुस्ती से जवाब दिया. “मगर, औरों के मुकाबले, वह इनके
ज़्यादा करीब है. उसे कॉन्स्टीट्यूशन की ज़रूरत नहीं है.”
वह चुप हो
गई. सम्गीन का भी बोलने का मन नहीं था. उसे महसूस हुआ कि मरीना की बातों में
व्यंग्य है, वह उसे चिढ़ाना चाहती है, खुलकर बात
करने के लिए मजबूर करना चाहती है. दुन्याशा के सामने गोगिन द्वारा दी गई
ज़िम्मेदारी के बारे में कुछ कहना उसे संभव नहीं लगा. आधे घण्टे बाद वह दुन्याशा के
हाथ में हाथ डाले चाँद की रोशनी में नहाई चौड़ी सड़क पर चल रहा था, और
दुन्याशा की जल्दी-जल्दी कही गई बातें सुन रहा था:
“मैं उसे -
पसंद नहीं करती, मगर पता है, - मैं उसकी
तरफ़ ऐसे खिंची चली आती हूँ, जैसे ठण्ड से गर्माहट में, या – धूप
से छाँव में. अजीब बात है, है ना? उसके अंदर
कोई मर्दानी बात है, क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता?”
“वह ओछी
बातें करती है,” सम्गीन ने गुस्से से कहा. “ये उसके शौहर –
व्यापारी- ने उसके दिमाग़ में बेवकूफ़ियाँ भर दी हैं. – तुम उससे कहाँ मिली थीं?”
दुन्याशा
ने कहा कि उसका पति अदालत में मरीना का कोई काम कर रहा था, और वह
अक्सर मॉस्को में उसके पास आया करती थी.
“वह उसकी
बेहद तारीफ़ करता था और, जानते हो, पूरे समय
मुर्गे की तरह उसके चारों ओर उछलता रहता था...”
सामने कुछ
लोग हँस रहे थे, ‘हुर्रे’ चिल्ला रहे
थे;
घर
के गेट से लोगों का एक झुण्ड बाहर आया, और एक मुलायम गहरी आवाज़ गाने लगी:
“त्सार ने मूत्सिओ...
मूत्सिओ स्त्सेवोला जैसे,”
काफ़ी सुर
में कोरस ने गाना शुरू किया:
“दिया हमें कॉन्स्टीट्यूशन ...
अपनी मर्ज़ी से.”
“मगर –
किसलिए?” गहरी आवाज़ ने पूछा, - कोरस ने
जवाब दिया:
“ इसलिए, कि जनता
आगे बढ़े, मिलजुल
के!”
“अच्छा
गाते हैं,” दुन्याशा ने चाल धीमी करते हुए कहा.
“अपना शासन कम किया.”
गहरी आवाज़
गाने लगी, - कोरस ने पकड़ लिया:
“बस, चीखो नहीं
और अपने पास रखीमोनो-मोनोपोली.”
“और – वो
किसलिए?” फिर से गंभीर आवाज़ ने पूछा, - कोरस ने
जवाब दिया;
“पीने दो महान जनता को
अपनी आख़िरी कौड़ी!”
“ओय, कितना
दिलचस्प है!” दुन्याशा हल्के से चिल्लाई, चाल धीमी
करते हुए, और गंभीर आवाज़ फिर से गाने लगी:
“इस मौके पर
हमारे पियक्कड”
कोरस आगे
गाता रहा:
“जमा होंगे झुण्डों में
बैठेंगे सब मेज़ों पे.”
“मगर –
किसलिए?”
“पियेंगे जाम जनता के नाम,
पवित्र नारे “आगे बढ़ो!” की ख़ातिर”
दुन्याशा
हँस पड़ी. लोग फुटपाथ पे एक दूसरे से सटे हुए चल रहे थे, आगे-आगे भेड़
की खाल की टोपी पहने एक ऊँचा स्टूडेन्ट था, उसकी बगल
में एक छोटा, मोटा आदमी नाच रहा था, गेंद की
तरह उछल रहा था; जब वह दुन्याशा और क्लीम के करीब आया, तो
उँगलियों से अपने टेंटुए को हिलाते हुए बकरी जैसी आवाज़ में गाने लगा:
“प्यार को करे सलाम, हर उम्र का
जवान...”
आदमियों और
औरतों की कई आवाज़ें फ़ौरन चिल्लाने लगीं:
“उसे
हटाओ!”
“मीश्का, तमाशा
नहीं!”
“कैसी
बेहूदगी है!”
और सिर पर
टोपी पहने घुंघराले बालों वाली एक मोटी लड़की ने ख़ुशी से और शायद घबरा कर ज़ोर से
घोषणा की :
“ साथियों, ये –
स्त्रेश्नेवा है, कसम से!”
ऊँचे
स्टूडेन्ट ने टोपी उतार कर माफ़ी माँगी:
“ये –
अच्छा ही लड़का है, आप इसे माफ़ कर दीजिए...”
अच्छा लड़का
दुन्याशा के पैरों के पास लेट गया, अपने सीने पर हाथ मारते हुए बुदबुदाने लगा:
“ इस तरह
मारा गया मिखाइलो क्रीलोव अपनी ही बेवकूफ़ी से.”
महिलाओं ने
दुन्याशा के साथ चलकर उसे वहाँ से निकालने की पेशकश की, - उसने प्यार
से हँसते हुए इन्कार कर दिया; लम्बी, मोटी चोटी
वाली लड़की चिल्लाई:
“नागरिकों!
मैं सुझाव देती हूँ, कि अकल से काम लें!”
नौजवानों
के घेरे से फ़िसल कर दुन्याशा ने क्लीम को अपने साथ लिया और इधर-उधर देखते हुए, प्रसन्नता
से बोली:
“कितने
प्यारे हैं, आँ?” कितनी होशियारी से काली आँख़ों वाली ने कहा: -
तुमने सुना? “मैं सुझाव देती हूँ कि अकल से काम लें!”?
“आधुनिक
वाक्य है,” सम्गीन ने बेहद धीमे सुर में कहा.
ऊँचा
स्टूडेन्ट फिर से गाने लगा:
“इसी वजह से
हमारे उदारवादी”
कोरस ने इस
पंक्ति को उठा लिया.
इस गीत ने
सम्गीन को ‘अंतिम यात्रा’ की तर्ज़ पर
नौजवानों के गाने ‘ डाउन, डाउन अन्याय!
स्वागत है, आज़ादी !” की याद दिला दी.
“मुझे बहुत
ख़ुशी है, कि नौजवान मुझे पसंद करते हैं, - मेरे सीधे –सादे
गीतों के लिए. पता है, मेरी ज़िंदगी कैसी थी...”
“क्रांति
का खेल खेल रहे हैं और ख़ुद ही उसका मज़ाक उड़ा रहे हैं,” सम्गीन
बड़बड़ाया.
“उस समय
मेरे लिए जीना दुश्वार था, मगर अभी के मुकाबले ज़्यादा सरल, ख़ुशी और
दुख भी सीधे-सादे थे.”
“बोलो मत, गला ख़राब
हो जाएगा,” गाने को सुनते हुए सम्गीन ने दुन्याशा को सलाह दी.
“मगर फ़ायदेमंद, उनकी नज़र
में,
जनता का हटना पीछे ...”
“हमारे जर्नलिस्ट्स...”
गंभीर आवाज़
गाने लगी, मगर होटल का दरवाज़ा खुला और गाना बीच ही में टूट गया.
दुन्याशा
ने रेस्तराँ में जाकर खाना खाने का सुझाव दिया; वह तैयार
हो गया, मगर मरीना के केक से कुछ भारी सा महसूस करने के कारण
उसने बहुत कम खाया और इससे महिला ने परेशान होकर पूछ लिया:
“क्या
तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है?”
डिनर के
बाद वह उसके पास आई – और घण्टे भर बाद उत्तेजना से फुसफुसा रही थी:
“मैं तुमसे
इसलिए प्यार करती हूँ, कि तुम हर चीज़ जानते हो, मगर चुप
रहते हो.”
सम्गीन को
याद आया कि ऐसा कहने वाली वह पहली औरत नहीं है, वारवरा ने
भी इसी तरह की बात कही थी. वह बिस्तर पे लेटा था, और
दुन्याशा, अर्धनग्न, उसके ऊपर झुककर अपनी हल्की, गर्माहट
भरी हथेली से उसके माथे और गालों को सहला रही थी. खिड़की के ऊपरी काँच के चौकोन में
चाँद का धुँधला चेहरा नज़र आ रहा था, - मोमबत्ती की पीली लौ वाला ब्रश जैसे मेज़ पर जम
गया था.
“सारे पढ़े
लिखे लोग कितना ज़्यादा और बेरहमी से बोलते हैं,” दुन्याशा
कह रही थी. “ख़ुदा – नहीं है, त्सार की – ज़रूरत नहीं है, लोग – एक
दूसरे के दुश्मन हैं, सब कुछ – वैसा नहीं है! मगर – है क्या, और क्या –
सही है?”
थका हुआ सम्गीन, मुस्कुरा
रहा था – ये औरत अपनी बकवास से उसका जी बहला रही थी, हालाँकि
उसके आराम करने में ख़लल भी डाल रही थी.
“ असल
सच्चाई क्या है?” उसने पूछा.
“औरत के
लिए – बच्चे,” उसने अलसाहट से, और कुछ
कहने के लिए कह दिया.
“बच्चे?” दुन्याशा
ने घबराकर दुहराया. “ मैं सोच भी नहीं सकती, कि मेरे –
बच्चे हैं! भयानक अटपटा लगता मुझे उनके साथ. मुझे अच्छी तरह याद है, कि बचपन
में मैं कैसी थी. शरम आती मुझे...अपने बारे में बच्चों को बिल्कुल कुछ भी नहीं
बताना चाहिए, मगर वो तो पूछेंगे!”
“ये भी
फ़लसफ़ा बघार रही है,’ सम्गीन ने उदासीनता से सोचा.
मगर वो
कहती रही, इस तरह बैठ कर, कि चाँद
की रोशनी उसके सिर पे, चेहरे पे पड़ रही थी, उसकी चंचल
आँखों में सुनहरी चिंगारियाँ प्रज्वलित कर रही थी, और मरीना
की आँखों जैसा बना रही थी:
“नहीं, बच्चे –
मुश्किल और भयानक चीज़ है! ये – मेरे लिए – नहीं है. मैं – ज़्यादा नहीं रहूँगी!
मेरे साथ कुछ होने वाला है, कोई बेवकूफ़ी...भयानक!”
सम्गीन ने
अपने आप से पूछते हुए आँख़ें बंद कर लीं: मरीना क्या चीज़ है?
“मेरे ख़याल
से हर वो चीज़ – असली सच्चाई है, जो तुम्हें अच्छी लगती है, जिसे तुम
प्यार करते हो. ख़ुदा भी, त्सार भी, और सब कुछ.
आज – एक है, कल – दूसरी. तुम सोना चाहते हो? ठीक है, सो जाओ!”
उसे चूमकर, वह पलंग से
उतरी और, मोमबत्ती बुझाकर, ग़ायब हो
गई. उसके जाने के बाद कमरे में रह गई सेन्ट की ख़ुशबू और छोटी वाली मेज़ पर लाल
पत्थरों का ब्रेसलेट. ब्रेसलेट को उँगली से मेज़ की दराज़ में धकेल कर सम्गीन ने
सिगरेट पी, दिन भर के अनुभवों को सलीके से रखने की कोशिश की और
उसे फ़ौरन यकीन हो गया कि उनके बीच दुन्याशा की एक बेहद छोटी जगह है. इस पर यकीन
करना भी अटपटा लग रहा था, - उसे अपने आपको समझाने की ज़रूरत महसूस हुई.
‘खाली दिमाग़
वाली और पागल औरत की सनक...’
काफ़ी पहले
से और ख़ुद भी न जानते हुए, अपने स्वयम् के अनुभव के, अपने
द्वारा पढ़े हुए उपन्यासों के आधार पर उसने औरतों के लिए अप्रिय निष्कर्ष निकाला
था: औरतें हर जगह, सिवाय शयनकक्ष के, जीवन में
बाधा डालती हैं, और शयनकक्ष में ज़्यादा देर तक अच्छी नहीं
लगतीं. उसने शोपेनहाउर, नीत्से, वैनिंगर को
पढ़ा था, और उसे मालूम था कि औरतों के प्रति उनकी राय से आम
तौर पे सहमत नहीं होते. औरतों के प्रति इन जर्मनों के दृष्टिकोण को मकारोव
इण्डोजर्मन निराशावाद की एक भयानक विकृति कहता था. मगर ख़ुद मकारोव की ‘वाक्य-प्रणाली’ में औरत
मर्द को फ़ैशनेबल वस्तुओं के शो-रूम का एक सेल्समैन समझती है, - जिसे औरत
को सबसे बढ़िया भावनाएँ और विचार दिखाना चाहिए, मगर वो
उनका भुगतान हमेशा एक ही तरह से करती है – बच्चों से.
इस रात, अनजान शहर
के एक होटल के घृणित कमरे में सम्गीन को महसूस हुआ कि औरतों के प्रति विचार उस पर पूरी
शिद्दत से हावी होते जा रहे हैं, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था. वह उठा, दरवाज़े के
पास गया, ताले में चाभी घुमाई, चाँद की ओर
देखा,
- कमरे
में खूब रोशनी डालते हुए, वह बिल्कुल अनावश्यक प्रतीत हो रहा था, जी चाहा कि
उसे बुझा दे. आधे कपड़ों में, वह रात के
लिए पूरी तरह कपड़े उतारने लगा – उस तरह महसूस करते हुए, जैसा उसने
एक बार डॉक्टर के कमरे में किया था, इस डर से कि डॉक्टर को उसमें कोई गंभीर बीमारी
मिल जाएगी. तकिए को हटा कर इस तरह रखा जिससे चाँद का बदमाशी से चमकता चेहरा न देखे, सिगरेट पी
और अटकलबाज़ियों, ख़ुद को सही साबित करने की कोशिशों, विरोधाभासों
और तानों के भूरे धुँए में डूब गया.
‘मकारोव इस
बात पर ज़ोर देता है, कि औरत के साथ रिश्ते में मर्द की तरफ़ से
असीमित ईमानदारी की माँग की जाती है,’ दीवार की ओर मुँह करके, आँख़ें बंद
किए,
वह
सोच रहा था और कल्पना नहीं कर पाया कि दुन्याशा के साथ, वारवरा के
साथ असीमित ईमानदारी कैसे हो सकती है. सिर्फ एक औरत, जिसके साथ
वह औरों के मुकाबले में काफ़ी खुल गया था, वह थी – निकोनोवा, मगर, वो इसलिए
कि उसने कभी भी, किसी भी बात के बारे में नहीं पूछा.
‘गुप्तचर
विभाग की उसकी नौकरी – बेशक, मजबूरी थी, ये उस पर
अत्याचार था. पुलिस वाले सभी को उनके लिए काम करने का सुझाव देते हैं, मुझे भी तो
प्रस्ताव दिया था’.
उसने बड़ी
स्पष्टता से, पूरी चेतना से निकानोवा को याद किया, उसकी
दुन्याशा से तुलना की और ये पाया, कि वो ज़्यादा आसान थी, और ये –
सबसे ज़्यादा अच्छी तरह जिस्म का लुत्फ़ उठाना जानती है.
‘मैं काफ़ी
बिगड़ा हुआ हूँ,’ उसने स्वीकार किया.
अपने आपको
भावुक व्यक्ति मानते हुए, उसे, अपने आप से पूरी स्वीकारोक्ति के क्षणों में, शक भी होता
था,
कि
उसके भीतर सेक्स संबंधी उत्सुकता काफ़ी ठण्डी है. इसे समझाना ज़रूरी था, और उसने ख़ुद
को यकीन दिलाया, कि ये सिर्फ किसी मादा के प्रति जानवरों जैसे
खुले आकर्षण से कहीं ज़्यादा साफ़-सुथरा, ज़्यादा बौद्धिक है. इस रात समगीन को एक अलग ही, कम कृत्रिम
और ज़्यादा निराशापूर्ण स्पष्टीकरण प्राप्त हुआ.
नई सिगरेट
पीने के लिए दियासलाई जलाते हुए उसने सोचा, ‘उम्र
भावनाओं को शांत कर देती है. मैंने औरों के विचारों और साँचेबद्ध ख़यालों के ख़िलाफ़
संघर्ष करने में काफ़ी ताकत गँवा दी है.’ पिछले कुछ समय से वह अक्सर देखता था कि उसके
लगभग हर विचार की एक अपनी परछाईं, अपनी प्रतिध्वनि है, मगर ये
दोनों ही जैसे उसके दुश्मन हैं. ऐसा इस बार भी हुआ.
‘ख़यालों के
बारे में सोचना तथ्यों के बारे में सोचने की अपेक्षा ज़्यादा आसान है.’
इस अप्रिय
संशोधन को एक स्पष्टीकरण की ज़रूरत थी, - सम्गीन को वह फ़ौरन मिल गया:
‘आम तौर से
बुद्धिवादियों की ये विशेषता है. ज़्यादा सही होगा - ये बुद्धि का गुण है...जो जीवन
के अनुभवों से निराश नहीं हुई है, कुचली नहीं गई है’.
इसके साथ
ही उसने सोचा:
‘थक गया हूँ
मैं और बेवकूफ़ी से किन्हीं छोटी-छोटी बातों में उलझ रहा हूँ. आख़िर किसी पियक्कड़
ऑफ़िसर,
दुन्याशा, मरीना से
हुई आकस्मिक मुलाकातों का मेरे लिए क्या महत्व हो सकता है?’
मरीना के
शानदार व्यक्तित्व ने उसके विचारों के प्रवाह को एकदम पलट दिया:
‘क्या ये
औरत धार्मिक है? यकीन नहीं होता, कि इतने
ताकतवर जिस्म को वाकई में ख़ुदा की ज़रूरत होगी’.
मरीना को
तुरंत अलग-थलग करके देखने की ज़रूरत थी. उसने काफ़ी देर तक, ध्यान से
उसका निरीक्षण किया, पीटर्सबुर्ग वाली लड़की से उसकी तुलना की और
अचानक उसे लेस्कोव के नायक, अहील देस्नीत्सिन और उसकी गरज की याद आ गई:
“घायल हो
गया,
घायल
हो गया...”
इस बेमौके
की याद ने सम्गीन को गुस्सा दिला दिया.
‘बुढ़ापे में
वो इतनी ही भयानक हो जायेगी, जैसे अन्फ़ीमेव्ना... और उसी तरह दयनीय...’
इससे उसने चर्च के सामान वाली दुकान की मालकिन
को नष्ट नहीं किया. सोने और चाँदी की चमक में कई सारे मोमबत्ती के स्टैण्ड्स, धूपदानों
और बप्तिज़्मा के सामान के बीच, जैसे प्राचीन सुनहरी आँखों वाला बुत सजीव हो
उठा. और उसके पास – दिओमीदोव की तरह, फ़रिश्ते से मिलता जुलता लड़का, उसके बेटे
जैसा.
‘छद्म वेष
धारण किए लोगों की सबसे ज़्यादा अजीब और बेहूदा परेड, जो मैंने
अब तक देखी है’, सम्गीन ने अपने आप को शांत करने की कोशिश की, मगर उसके
दिमाग़ में दिओमीदोव बदहवासी से चिल्ला रहा था:
‘किसी भी
चीज़ पे विश्वास नहीं करते, मगर – विश्वास किसलिए नहीं करते? विश्वास
करने से डरते हो, डर के कारण विश्वास नहीं करते! हर चीज़ का मज़ाक
उड़ाया,
नंगे
हो गए,
लहू-लुहान
हो गए,
नशे
में धुत किन्हीं भिखारियों की तरह...’
ये रात की
यादों वाली परेड एक भयानक दु:स्वप्न में बदल गई. ऐसी तूफ़ानी तेज़ी से, जैसी सिर्फ
सपनों में ही संभव हो सकती है, सम्गीन ने अपने आपको पुराने बर्च वृक्षों की
दो कतारों के बीच, एक निर्मनुष्य, टूटे-फूटे
रास्ते पर देखा, - उसकी बगल में एक और क्लीम सम्गीन चल रहा थ.
धूप निकली थी, सूरज पीठ को झुलसा रहा था, मगर न तो
सम्गीन की, न उसके डुप्लिकेट(प्रतिरूप) की, और न ही
पेड़ों की परछाईं कहीं नज़र आ रही थी, ये काफ़ी परेशानी की बात थी. डुप्लिकेट ख़ामोशी
से सम्गीन को रास्ते के गड्ढों में धकेल रहा था, पेड़ों पे
धकेल रहा था, - वह चलने में इतनी बाधा डाल रहा था कि क्लीम ने भी उसे
धक्का दे दिया; तब वो क्लीम के पैरों के नीचे गिर गया, उसने
उन्हें पकड़ लिया और जंगलीपन से चिल्लाया. ये महसूस करते हुए कि वो भी गिर रहा है, सम्गीन ने
अपने हमराही को पकड़ लिया, उसे ऊपर उठाया, और उसे
महसूस हुआ कि डुप्लिकेट का तो, परछाईं की तरह, कोई वज़न
ही नहीं है. मगर उसने कपड़े तो ठीक वैसे ही पहन रखे थे, जैसे सचमुच
के,
ज़िंदा
सम्गीन ने पहने थे, और इसलिए, उसका कुछ न
कुछ वज़न तो होना ही चाहिए था! सम्गीन ने उसे ऊँचा उठाया और ज़मीन पे, दूर फेंक
दिया,
- उसके
टुकड़े-टुकड़े हो गए, और फ़ौरन सम्गीन के चारों ओर उसीके जैसी दसियों
आकृतियाँ पैदा हो गईं; उन्होंने उसे घेर लिया, उसके साथ
साथ दौड़ने लगीं, और हालाँकि वे भारहीन, परछाइयों
की तरह पारदर्शी थीं, मगर वे ख़ूँखार तरीके से उसे दबाए जा रही थीं, धक्के दे
रही थीं, रास्ते से भटका रही थीं, आगे की ओर
हाँक रही थीं, - उनकी संख्या बढ़ती जा रही थी, वो सब गरम
थीं,
और
उनकी ख़ामोश, स्तब्ध भीड़ में सम्गीन का दम घुटने लगा. वह उन्हें
अपने से दूर फेंक रहा था, उनके टुकड़े-टुकड़े कर रहा था, हाथों से उन्हें
फ़ाड़ रहा था, लोग उसके हाथों में ऐसे फूट रहे थे, जैसे साबुन
के बुलबुले हों; एक पल को तो सम्गीन को लगा कि वह जीत गया है, मगर दूसरे
ही पल – उसके डुप्लिकेट्स की संख्या अनगिनत हो गई, उन्होंने
उसे फिर से घेर लिया और ऐसी जगह से, जहाँ परछाइयाँ नहीं थीं, धुँए भरे
आसमान की ओर हाँकने लगे; आसमान घने, गहरे नीले
बादलों के रूप में धरती पर झुक रहा था, और उनके केंद्र में एक दूसरा सूरज धधक रहा था, बिना
किरणों वाला, खूब विशाल, आड़ा-तिरछा, सपाट, भट्टी के
मुँह की तरह, - इस सूरज पर छोटे-छोटे काले गोले उछल रहे थे.
जब दरवाज़े
पर हो रही ज़िद्दी खटखटाहट ने सम्गीन को जगाया, तो उसकी
आँखों में काले गोले तैर ही रहे थे, कमरे में सर्दियों के दिन की ठण्डी, असहनीय रूप
से तेज़ धूप भर गई, - रोशनी इतनी ज़्यादा थी, कि जैसे
उसने खिड़की को चौड़ा कर दिया था, और दीवारों को दूर धकेल दिया था. कंधों पर
कम्बल ओढ़े सम्गीन ने दरवाज़ा खोला और दुन्याशा के अभिवादन के जवाब में बोला;
“शायद, मैं बीमार
हूँ...”
“मैं ये
तीसरी बार खटखटा रही हूँ...क्या हुआ है तुम्हें?”
“उठा तो
पसीने में नहाया था.”
उसने पूछा
कि क्या डॉक्टर को बुलाए; सम्गीन ने उड़ा-उड़ा, लापरवाह सा
जवाब दिया, उसी तरह जैसे वो
वारवरा से बात करता था. अपने डुप्लिकेट्स की भीड़ से संघर्ष के बाद वह
स्वयम् को शारीरिक रूप से तोड़ा-मरोड़ा गया महसूस कर रहा था, उसकी कमर
के निचले हिस्से में अजीब सी पीड़ा हो रही थी और पैरों के स्नायु बेहद दर्द कर रहे
थे,
जैसे
वाकई में वह काफ़ी भागा हो. दुन्याशा एस्पिरिन लाने चली गई. वह आईने
के पास आया और उसमें बड़ी देर तक लगभग अनजान, पीली त्वचा
वाले सूखे, लम्बे चेहरे को देखता रहा, जिसकी
आँखें धुँधली थीं, - उनमें एक अप्रिय, अजीब सा
भाव जैसे जम गया था, या तो ये परेशानी का भाव था, या भय का.
उसने कनपटी के भूरे बालों को उँगलियों से महसूस किया, आँखों के
कोटरों में परछाइयों को छुआ, काँच पर हीरे से लिखी गई दो पंक्तियों को पढ़ा:
“इन्नोकेन्ती काब्लूकोव
रहा यहाँ और – था ऐसा.”
‘इनोकेन्ती
एक ‘न’ से लिखा
जाता है. या, हो सकता है – दो ‘न्न’ से? कुछ भी हो –
अश्लीलता है’.
खिड़की के
बाहर बर्फ की लाखों चिनगारियाँ चकाचौंध पैदा कर रही थीं, कहीं पास
ही में मिलिट्री बैण्ड का संगीत गरज रहा था, आस पास
रहने वाले वहीं जा रहे थे –गाड़ियों में और पैदल, एक दूसरे
को पीछे छोड़ते हुए बच्चे भाग रहे थे, और ये सब पराया लग रहा था, ग़ैर ज़रूरी
लग रहा था, दुन्याशा की भी ज़रूरत नहीं थी. वह पंछी की तरह कमरे
में लपकी, उसे एस्पिरिन लेने पर मजबूर किया, अपने कमरे
से कुछ खाने पीने का सामान, वाइन, चॉकलेट्स, फूल लाई, मेज़ को
ख़ूबसूरती से सजाया और, शोख़ रंगों वाला किमोनो पहने, कस कर बंधे
बालों वाले सिर को हिलाते, कंधे उचकाते हुए, सम्गीन के
सामने बैठकर धीमी आवाज़ में जल्दी-जल्दी, अप्रत्याशित और मज़ेदार लहज़े में बोली:
“ आज –
गाने वाली हूँ! ओय, क्लीम, डर लगता
है! तुम आओगे? तुमने – लोगों के सामने भाषण दिए हैं? क्या वो भी
डरावनी बात है? ये तो गाने से ज़्यादा डरावना होना चाहिए! मैं
जब स्टेज पर, पब्लिक के सामने निकलती हूँ, तो अपने पैरों की आहट तक
नहीं सुनती, पीठ में ठण्डक, सीने में –
दर्द! आँखें, आँखें, आँखें,” वह हवा में
चुटकी बजाते हुए बोली. “औरतें! दुष्ट, लगता है, जैसे वो
मुझे गालियाँ दे रही हों, इंतज़ार ही कर रही होती हैं, कि मेरी
आवाज़ फट जाए, मुर्गे जैसी गाने लगूँ,- ये इसलिए, कि हर मर्द
मुझसे बलात्कार करना चाहता है, और उन्हें – जलन होती है!”
वह हौले से, डरते-डरते
हँसी:
“क्या मैं
बकवास कर रही हूँ?”
“एकदम
बकवास,”
सम्गीन
ने उसके आमंत्रित करते शानदार सीने और लालसा भरे होठों की ओर देखते हुए ज़ोर देकर
कहा.
“अकलमंद
होना मुश्किल है,” दुन्याशा ने गहरी साँस ली. “पहले, जब मैं
कोरस में गाती थी, तब मैं ज़्यादा अकलमंद थी, कसम से! ये
तो मैं अपने शौहर के कारण बेवकूफ़ हो गई हूँ. बर्दाश्त से बाहर! उससे तीन शब्द कहो, तो वह
तुम्हें – तीन सौ चालीस सुना देगा! एक बार, रात को, बातों में इतना
खो गया कि मैंने उसे माँ की गाली दे दी...दुन्याशा लाल पड़ गई और इतनी अजीब तरह से
ठहाके लगाने लगी, कि सम्गीन भी, जो हँसने
में बहुत कंजूस था, इस बात की कल्पना करके कि उसके शौहर को कितना
अचरज हुआ होगा, हल्के से हँस पड़ा.
“नहीं, या ख़ुदा, तुम ज़रा
सोचो,
- आदमी
लेटा है, बिस्तर में अपनी बीबी के साथ और उसे उलाहने दे रहा है, कि उसे
फ़्रांसीसी क्रांति में दिलचस्पी क्यों नहीं है! वहाँ, कोई एक
मैडम थी, जिसे थी दिलचस्पी, तो उसका
सिर काट दिया गया, - अच्छा ख़ासा कैरियर है – आँ? तब पैरिस
में ये फ़ैशन हे था – सिर काटने का, और वह उन सबको गिनता था और बोलता जाता, बोलता
जाता...मुझे ऐसा लगता, जैसे वह मुझे डराना चाहता था इस...सिर काटने
वाली मशीन से, क्या कहते हैं उसे?”
“गिलोटिन,” क्लीम ने
बताया.
“और उसकी
राय में, जैसे क्रांति इसलिए शुरू हुई थी, क्योंकि
फ़्रांसीसी औरतें बड़ी बेशरम थीं.”
मेज़ पर
नैपकिन फेंककर वह अपने पैरों पर उछली और सिर को दाहिने कंधे पर झुकाकर, हाथों को
पीठ के पीछे ले गई, सैनिकों जैसी चाल से चलते हुए, नथुने
फुलाकर, खींचती हुई, दुखभरी
आवाज़ में बोली:
“अब
तुम्हें समझ में आ गया होगा कि मैरी अंतोनिएत ने किस तरह राजतंत्र के विनाश में
योगदान दिया...”
वह बेहद
मज़ेदार लग रही थी, उसकी मस्तीभरी शरारत सम्गीन को आकर्षित कर रही
थी,
खुले
हुए किमोनो से काली जुराबें पहने उसकी सुडौल टाँगें और सीने को खोलती हुई छोटी सी नीली
कमीज़ दिखाई दे रही थी. ये सब सम्गीन के दिल में दुन्याशा का शुक्रिया अदा करने का
महान ख़याल पैदा कर रहा था, मगर, जब उसने उसे अपने पास खींचा, तो वह बड़ी
सफ़ाई से उसके हाथों से फ़िसल गई.
“कॉन्सर्ट
के पहले – नहीं कर सकती,” उसने दृढ़ता से कहा. “वहाँ, पब्लिक के
सामने,
मुझे
ऐसा रहना पड़ता है – जैसे कोई काँच हो!”
“क्या
बकवास है,” क्लीम ने आपत्ति जताई, गुस्से से
नहीं,
बल्कि
अचरज से.
“नहीं कर
सकती,”
हाथों
को फ़ैलाते हुए उसने दुहराया. “बात ये है, कि...”
छत की ओर
देखते हुए उसने कुछ देर सोचा.
“फूली हुई
औरतें,
बेशर्म
मर्द,
ये
– सच है, मगर ये – आगे की ही कतारों में होते हैं. उन्हें, शायद, अपमानजनक
भी लगता होगा, कि उन्हें किसी छोटी सी चीज़ को सुनना पड़ रहा
है,
शैतान
ले जाए. मगर हमेशा दूसरे भी लोग होते हैं, और उनके
सामने अच्छी तरह, ईमानदारी से गाना पड़ता है. समझ रहे हो?”
“पूरी तरह
नहीं,”
सम्गीन
ने कहा. “ईमानदारी से गाना – इसका क्या मतलब है?”
अपने गालों
को सहलाते हुए, वह फिर से ख़यालों में खो गई, फिर जल्दी-जल्दी
कहने लगी:
“मेरे पिता
ताशों के खेल में हमेशा अभागे रहे, और जब, ऐसा होता, कि हार
जाते,
तो
मम्मा से दूध में पानी मिलाने को कहते, - हमारे यहाँ दो गाएँ थीं. मम्मा दूध बेचा करती
थी,
वो
ईमानदार थी, उसे सब प्यार करते थे, उस पर यकीन
करते थे. काश, तुम्हें पता होता कि जब उसे दूध में पानी
मिलाना पड़ता तो उसे कितना दुख होता था, वो कितना रोती थी. तो, बस, जब मैं
बुरा गाती हूँ, तो मुझे भी शरम आती है, - समझे?”
सम्गीन ने
प्रशंसा से उसकी पीठ थपथपाई और ये भी कहा:
“ये तुमने
बिल्कुल बच्चों जैसे अंदाज़ में समझाया...”
“हाँ, बेवकूफ़, बेवकूफ़ हूँ,” उसके माथे
को चूमते हुए वो फ़ौरन मान गई. “कॉन्सर्ट के बाद मिलेंगे, हाँ?”
उसने थोड़ा
सा दिल तो बहलाया था, मगर, जैसे ही वह दरवाज़े के पीछे छुप गई, अपने भीतर
कुछ सुनते हुए, बढ़ती हुई अस्पष्ट परेशानी को महसूस करते हुए
सम्गीन उसके बारे में भूल गया.
‘थक गया हूँ. बीमार हो
रहा हूँ’.
अख़बार लेकर
वह सोफ़े पर लेट गया. ‘हमारी बात’ अख़बार का
संपादकीय बड़े-बड़े, झुके हुए प्रिन्ट में, अनेक प्रश्नवाचक और विस्मयबोधक चिह्नों समेत
उन लोगों के बारे में ज़ोर-शोर से आक्रोश प्रकट कर रहा था, जिनके पास ‘देश और इतिहास
के प्रति ज़िम्मेदारी की भावना नहीं है’.
“हम –
ईमानदार डेमॉक्रेट्स हैं, निरंकुशता के ख़िलाफ़ हमारे अनेक वर्षों के अथक
संघर्ष ने, हमारे सांस्कृतिक कार्यों ने ये सिद्ध कर दिया है. हम
– अराजकता के छुपे हुए प्रचार के ख़िलाफ़ हैं, ‘अनिवार्यता
के दायरे से आज़ादी के साम्राज्य में’ छलांग लगाने के पागलपन के ख़िलाफ़ हैं, हम –
सांस्कृतिक विकास के पक्षधर हैं! और ये कैसे संभव हो सकता है, कट्टर विरोधाभासों
में घिरे बिना, इच्छा शक्ति की स्वतंत्रता के बगैर और साथ ही
अशिक्षित लोगों को ये सिखाए बिना, कि – कूद पड़ो!”
“प्रांत
में लोगों की सोच काफ़ी सीधी-सादी है; ये हमारे लिए अक्सर हास्यास्पद हो सकता है, मगर
प्रांतवासियों के लिए तो इसी तरह लिखना चाहिए,’ सम्गीन ने
ग़ौर किया, फिर पूछा: किसके लिए – क्या हमारे लिए?’ – इस सवाल को
उसने कागज़ की सरसराहट में दबा दिया. इस पृष्ठ के पीछे एक शोक-संदेश छपा था, एक ऐसे
आदमी का, जिसका अजीब सा कुलनाम था: उपवाएव. उसके बारे में लिखा
था: ‘बेहद शरीफ़
आदमी,
इवान
कलिस्त्रातोविच - सच्चा, निष्पक्ष मानवतावादी था, ज़िंदगी के
विरोधाभासों की वास्तविकता में पैंठने की बिरली क्षमता उसमें थी, जिसने उसे
कट्टर विरोधाभासों में भी समझौता करवाने की शक्ति प्रदान की थी.”
‘थियेटर’ स्तम्भ में
किसी इद्रोन ने लिखा था:
“आज हम एक
बार फिर ए.वी. स्त्रेश्नेवा द्वारा लोकगीतों की आदर्श प्रस्तुति सुनेंगे. एक बार
फिर वह ‘मर्चेन्ट्स हॉल’ में दिल
खोलकर आवाज़ों के रंगबिरंगे फूल बिखेरेगी, फिर से हमें उत्तेजित करेगी संगीतमय आहों और
ज़बर्दस्त चीखों से, जिन्हें उसने मूल लोक-कला के अनंत स्त्रोत से
एकदम सही-सही सुना था”.
सम्गीन ने
अख़बार फ़र्श पर फेंक दिया, आँखें बंद कर लीं, और उसके
सामने फिर से रात वाले दुःस्वप्न की तस्वीर सजीव हो गई, उसके
डुप्लिकेट्स का झुण्ड नाच रहा था, मगर अब ये परछाइयाँ नहीं थीं, बल्कि
इन्सान थे, जिन्होंने उसीके जैसे कपड़े पहने थे, - वे धीरे
धीरे गोल घूम रहे थे, और उसे दबा नहीं रहे थे; ये देखना
बहुत बुरा लग रहा था, कि वे – बिन चेहरों वाले थे, चेहरे की
जगह पर उनमें से हरेक के कुछ था, हथेली जैसा, - वे तीन-तीन
हाथों वाले प्रतीत हो रहे थे. ये आधा-सपना उसे डरा रहा था, - आँखें
खोलकर वह उठ गया और चारों ओर देखने लगा:
‘मेरी
कल्पना दर्दनाक मोड़ ले रही है’.
कुछ ताज़गी
महसूस करने के इरादे से वह बाहर सड़क पर आ गया; दूर से
उसकी तरफ़ एक जनाज़े का जुलूस आ रहा था.
‘शायद, उपवाएव को
दफ़ना रहे हैं’, उसने सोचा, गली में
मुड़ गया और कहीं नीचे की ओर चल पड़ा, जहाँ गली को तीन गुम्बदों वाले चर्च की हरी, कुबड़ी छत
ने बंद कर रखा था. बर्फ की मोटी-मोटी टोपियों से ढँकी, छोटे-छोटे, एक दूसरे
से चिपके, फूले-फूले घरों की दो कतारें उसकी तरफ़ झुक रही थीं.
सम्गीन को लगा कि वे ओवरकोट पहने आदमियों जैसे लग रहे हैं, और घरों की
दीवारें और खिड़कियाँ जेबों जैसी हैं. एक भूरी, ठण्डी
उकताहट की मोटी तह ने शहर को ढाँक लिया था. दूर से चर्च के कोरस का निराशापूर्ण गीत
सुनाई दे रहा था.
‘सब कुछ
कितना जाना-पहचाना, एक जैसा है. और – हमेशा के लिए. ज़मीन में
मज़बूती से बैठ गया है’.
उसने फिर
उतनी ही उदासीनता से सोचा, कि अगर वह साहित्यिक काम में अपने आप को लगा
लेता,
तो
ज़िंदगी की दुष्ट उकताहट की शांत विजय के बारे में चेखव से बुरा नहीं लिखता और, बेशक, लिओनिद
अन्द्रेयेव से ज़्यादा चुभते हुए अंदाज़ में लिखता.
चर्च के
पीछे,
छोटे
से चौक के कोने में, एक मंज़िला घर के पोर्च के ऊपर एक मुड़ा हुआ
हरा-पीला बैनर था: ‘रेस्टॉरेन्ट पेकिंग’. वह छोटे से, गर्माहट
भरे कमरे में घुसा, दरवाज़े के पास, कोने में, एक पुराने, विशाल रबर
के पेड़ के नीचे बैठा; आईना उसे सात आदमियों को दिखा रहा था, - वे बुफ़े के
पास दो मेज़ों पर बैठे थे, और उसके पास उनके शब्द आए:
“तुम्हें
ना,
इवान
वासिल्येविच, क्या है कि, ज़्यादा निडरता से इन चालबाज़ों का पर्दाफ़ाश
करना चाहिए था, वर्ना तो वो, क्या है कि, चुनावों
में हमारा बेड़ा गर्क कर देंगे!”
आवाज़ मोटी, चिड़चिड़ी थी; उसी समय एक
पतली और गुस्साई आवाज़ भी गूँज रही थी:
“वो, शैतान की
दुम,
कहाँ
का यहूदी हुआ, अगर बचपन से अब तक पूरी ज़िंदगी नींबू का ही
व्यापार करता रहा हो?”
“वे सब
यहाँ मज़दूरों का भेस बना लेते हैं,” तीसरे ने कहा.
आईने में
इन लोगों के धुँधले प्रतिबिम्ब देखते हुए, सम्गीन ने
उनके बीच में इवान द्रोनोव के लम्बे कानों वाले सिर को देखा. वह उठकर जाना चाहता
था,
मगर
तभी वेटर कॉफ़ी ले आया; सम्गीन कप के ऊपर झुक गया और सुनता रहा:
“रहते रहे –
रहते रहे और अचानक पता चला कि सब के सब यहूदी हैं, क्या बात
है!”
“मरहूम
उपवाएव जेसुइट था, और उसने उन्हें अच्छा मज़ा चखाया! याद है, सिटी-गार्डन
में,
आँ?”
“अरे, क्यों
नहीं! ‘क्या रोशनी काफ़ी नहीं है? महाशय, क्या वक्त
नहीं आ गया है कि आप सांस्कृतिक जागीरों के अलाव बुझा दें? सब कुछ –
साफ़ है! सब लोग लालच, ईर्ष्या, नफ़रत जैसी मौलिक
ताकतों के विनाशकारी परिणामों को देख रहे हैं – उन ताकतों के परिणाम, जिन्हें
आपने जगाया है!
“क्या
याददाश्त है तेरी, ग्रीशा!”
“अच्छी बात
के लिए...”
“मगर बदमाश
तो मरहूम था!”
“सब ख़ुदा
के हाथ में है.”
ये गुट प्यार
भरे अंदाज़ में ठहाके लगा रहा था, मगर द्रोनोव से मुलाकात करना न चाहते हुए, जाने की
जल्दी में, सम्गीन इस हँसी के बीच प्लेट पर चम्मच बजाने लगा. मगर
द्रोनोव ने कहा:
“अच्छा –
मेरा एडिटर-ऑफ़िस जाने का समय हो गया है,” और अपने छोटे पैरों के छोटे-छोटे कदम रखते हुए
वह सम्गीन की मेज़ के पास आया, ठीक उस समय जब नौकर पैसे गिन रहा था.
“ब्बा!
कहाँ से?”
उसने
सम्गीन की ओर अपना हाथ नहीं बढ़ाया, हो सकता है, इसलिए कि
उसने पी रखी थी. दोनों हाथ मेज़ पर टिकाये, आँखें
सिकोड़ कर, वह बेझिझक क्लीम को देखे जा रहा था, नाक से
साँस ले रहा था और खनखनाती आवाज़ में पूछ रहा था, बता रहा
था:
“क्या ‘वोल्गा’ में ठहरे
हो?
मैं
आऊँगा. यहाँ – स्त्रेश्नेवा है, ग़ज़ब की गायिका है! और मैं, भाई, ‘हमारी बात’ अख़बार में
उप-सम्पादक हूँ. ‘हमारा प्रदेश’, ‘हमारी बात’ – सब, भाई, हमारा
है!”
पूरी तरह
नए कपड़ों में, वह रेडीमेड कपड़ों की दुकान के नौकर जैसा लग
रहा था. कुछ मुटा गया था, खाया-पिया चेहरा चमक रहा था, गुलाबी
गालों पर छोटी सी नाक मुश्किल से नज़र आ रही थी, नथुने
ज़्यादा चौड़े हो गए थे.
“प्रचार
करने आए हो, हाँ? एसडी (सोशल-डेमोक्रेट्स – अनु.) के लिए?”
सम्गीन ने
रूखेपन से कहा कि उसे कोर्ट में काम है, मगर द्रोनोव ने ठहाका लगाया, आँख मारी
और उछलते हुए आगे बढ़ गया, ये दुहरा कर कि: “आऊँगा.”
चश्मे के
भीतर से उसे देखते हुए, पीड़ा से त्यौरियाँ चढ़ाए, सम्गीन ने
सोचा:
‘विगत से
अनावश्यक और अप्रिय मुलाकातें कितनी ज़्यादा हो रही हैं...’
वह पैदल ही
कॉन्सर्ट के लिए चल पड़ा, देर हो गई, कॉन्सर्ट
शुरू हो चुकी थी और उसे हॉल के प्रवेश द्वार के पास खड़ा रहना पड़ा. लम्बा हॉल, मोटे
स्तम्भों की दो कतारों से छोटा हो गया था, खचाखच
दर्शकों से भरा था; जैसे ये एक घनी भीड़ थी, जो
स्तम्भों के पीछे, कुर्सियों के पीछे, और दरवाज़ों
जैसी चौड़ी-चौड़ी खिड़कियों की सिलों पर चिपक कर खड़े लोगों के दबाव से समतल होकर, स्टेज की
तरफ़ बढ़ी जा रही थी. गैलरी से नौजवानों के सिर लटक रहे थे, - नीचे से, स्तम्भों
पर लगे झुम्बरों की रोशनी से, प्रकाशित चेहरे असाधारण एकाग्रता से देख रहे
थे. दुन्याशा स्टेज पर झूल रही थी, जैसे हवा में तैर रही हो, - उसके पीछे, अपनी
चिकनी-सफ़ाचट ठोड़ी को दुन्याशा के सुनहरे सिर पर टिकाए, सुनहरी
फ़्रेम में त्सार अलेक्सान्द्र द्वितीय विराजमान था. पियानो के पीछे बैठा था एक
मोटा,
गंजा
आदमी,
जो
धीरे धीरे और किफ़ायत से पियानो की कुंजियों के नीचे से हौले-हौले सुर बाहर निकाल रहा
था.
लेस की
कॉलर वाली एक साधारण काली ड्रेस में, कमर के पास लाल गुलाब लगाए, छोटी सी, बिल्कुल
किसी किशोरी जैसी, दुन्याशा हॉल को उतने ही सीधे-सादे शब्दों से
भर रही थी, जैसी वह स्वयम् थी. उसकी आवाज़, जो दमदार
तो नहीं, मगर पारदर्शी थी, निरंतर
गूँज रही थी और एक तनाव भरी ख़ामोशी का वातावरण पैदा कर रही थी. सम्गीन को, जो गीत के
एक जैसे सुरों को ध्यान से नहीं सुन रहा था, इस ख़ामोशी
में कुछ प्यारा सा महसूस हो रहा था, वह ढूँढ़ने लगा - वो क्या है? और उसे
आसानी से जवाब मिल गया: सैंकड़ों लोग चुपचाप और, कह सकते
हैं,
कृतज्ञता
से उस औरत की आवाज़ सुन रहे हैं, जिस पर उसका, चाहे जैसा
अधिकार है. वह हँस पड़ा, उसने चश्मा उतारा और उसे पोंछते हुए, गर्व से
सोचा कि दुन्याशा – प्रतिभावान है. अचानक प्रसन्नता भरी तालियों और चीखों ने
ख़ामोशी को ख़त्म कर दिया, - गैलरी वाले नौजवान गरजते हुए चीख रहे थे, और कहीं
पास ही में एक भारी नीची आवाज़ ने अकड़ते हुए कहा:
“थैं-क्-क्यू!”.
मज़ेदार तरह
से झूलते हुए, दुन्याशा ने हाथ हिलाए, अपने ताँबे
जैसे लाल सिर को झुकाया; उसका मेकअप वाला चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था; दोनों
हाथों की उँगलियाँ भींचकर, उसने अपने चेहरे के सामने मुट्ठी हिलाई और
मुट्ठी चूम कर, हाथ फैला दिए, पब्लिक को
फ्लाइंग किस भेज दिया. इस अदा से तो हॉल और गैलरी में बेतहाशा चीखें, प्रसन्नता
भरी हँसी गूँज उठी. अपने आस पास के लोगों को, ख़ास तौर से
रेल्वे- मिनिस्ट्री का यूनिफॉर्म पहने मोटे को देखते हुए सम्गीन भी हँस पड़ा, वो दूरबीन
से दुन्याशा को देख रहा था और चटखारे लेते हुए ज़ोर से कहने लगा:
“कित्ती
प्यारी है, छोटी सी बिल्ली! ख़तरनाक ख़ूबसूरती...”
उसे बड़ी
देर तक गाने नहीं दिया गया, फिर उसने पब्लिक से कुछ कहा और फिर से बड़ी
आसानी से ख़ामोशी में गाने लगी. सम्गीन को अचानक महसूस हुआ, कि इस सब
से उसका अपमान हो रहा है. वह पब्लिक से दूर संगमरमर की दो सीढ़ियों के बीच बने
चौकोर पर हट गया, उसने अपने आप को इन सैंकड़ों लोगों से दूर हटा
लिया. उसने बिस्तर वाली दुन्याशा को सजीवता से देखा, नग्न, बिखरे
बालों वाली, हवस से दाँत दिखाती हुई. और ये कामुक, निरंकुश
लड़की मजबूर कर रही है कि उसे सुना जाए, सैंकड़ों लोग उससे सिर्फ इसलिए उत्तेजित होते
हैं,
क्योंकि
वह बेवकूफ़ी भरे गीत गा सकती है, औरतों और लड़कियों के विलाप, मादा की नर
के प्रति प्यास को व्यक्त करने की योग्यता रखती है.
‘कुछ लोग
ऐसे भी होते हैं, जो निरंतर चक्की-अनाज की तरह जिए जाते हैं, जीवन के
मीठे-कड़वे अनुभवों को पीसते हुए, जिससे उनमें कुछ खोज सकें या उन्हें किसी चीज़
में परिवर्तित कर दें. ऐसे लोगों का बेवकूफ़ों के इस झुण्ड के लिए अस्तित्व नहीं
है. इस औरत का – अस्तित्व है’.
इस बात पर
विचार करते हुए सम्गीन को दुखभरे गीत के स्वर सुनाई दिए और उसके मन में दुन्याशा
के प्रति और ज़्यादा कड़वाहट भर गई, और जब ख़ामोशी में फिर से विस्फ़ोट हुआ, तो वह काँप
गया,
उसने
दुहराया:
“बेवकूफ़!”
हॉल में
सैंकड़ों मुर्गियों के पंख फ़ड़फ़ड़ा रहे थे, गैलरी से कोई चिल्लाया:
“उक्राइन
की लड़की!”
फूलों की
टोकरी लिए दो नौजवान भागते हुए सीढ़ियों पे आए, पब्लिक
उनके पास भागी, - जैकेट पहने, चौड़ी, सफ़ेद दाढ़ी
वाले आदमी ने कहा:
“अद्भुत!
ये है – हमारा! ये है – रूस!”
गहरी लाल
ड्रेस पहने, रंगबिरंगी शॉल ओढ़े, मरीना
सम्गीन के पास आई:
“नीचे चलते
हैं,
वहाँ
चाय पी सकते हैं,” उसने कहा और, सीढ़ियों से
उतरते हुए ज़ोर से गहरी साँस ली:
“कितने
दिलकश अंदाज़ से सजाती है वो गीतों को, और कैसी पाकीज़गी है आवाज़ में, बेझिझक कह
सकते हैं – रोशन आवाज़!”
जब वह बोल
रही थी, तो उसकी भँवें थरथरा रही थीं – आदरयुक्त अभिवादनों का
जवाब शानदार अंदाज़ में सिर झुकाकर दे रही थी.
“लोक गीतों
का मूल्यांकन मैं अच्छी तरह नहीं कर पाता,” रुखाई से
सम्गीन ने कहा.
“गीत – एक
बात है, गाना – दूसरी बात.”
मरीना के
साथ चलना सम्गीन को अटपटा लग रहा था, - शहर वाले लोग बगैर किसी लिहाज़ के उस पर उत्सुक
नज़रें गड़ा रहे थे, बिना माफ़ी माँगे धक्का दे रहे थे. नीचे बड़े
कमरे में उनकी भीड़ जमा हो गई, जैसे रेल्वे स्टेशन पर होती है, झुण्ड बनाए
वे बुफ़े की तरफ़ चल रहे थे; बुफ़े बोतलों के रंगबिरंगे काँच से चमक रहा था, और बोतलों
के बीच, छोटे से दरवाज़े के ऊपर, दो
अलमारियों के बीच, एक भारी प्रतिमा रखने का केस था, उसमें
सुनहरे अंगूर थे, उसके अंदर – काली प्रतिमा थी; प्रतिमा के
सामने,
क्रिस्टल
के लैम्प में लौ फ़ड़फड़ा रही थी, और ये सब बुफे को अजीब तरह से चर्च की
प्रतिमाओं वाली दीवार जैसा बना रहे थे. और जब लोगों ने जाम उठाए – तो ऐसा लगा, जैसे वे
सलीब का निशान बना रहे हैं. कहीं पास ही में बिलियार्ड की गेंदों की खटखट सुनाई दे
रही थी, जैकेट वाले दढ़ियल के शब्दों को पूर्ण विराम लगाते
हुए:
“हमारे
ज़माने में प्राचीन, प्यारी ख़ूबसूरती की याद दिलाना – ये बड़ी इज़्ज़त
की बात है!”
बाईं ओर, खुले हुए
दरवाज़ों के पार, तीन मेज़ों पर हट्टे-कट्टे लोग ताश खेल रहे थे.
हो सकता है, वे आपस में बात कर रहे थे, मगर शोर ने
उनकी आवाज़ों को दबा दिया था, और हाथों की गतिविधियाँ इतनी यन्त्रवत् थीं, जैसे सभी
बारह आकृतियाँ यंत्र-मानव थीं.
दबी ज़ुबान
में गायिका की तारीफ़ करते हुए और कुछ सोचते हुए मरीना कोने में, छोटी सी
मेज़ पर बैठ गई, और, चाय मँगवाकर उसने सम्गीन की कोहनी को उँगलियों
से छुआ.
“इतने उदास
क्यों हो?”
“देख रहा
हूँ,
सुन
रहा हूँ.”
“अहा – इसे? ये यहाँ का
डॉन जुआन है...”
क्लीम से
दो कदम दूर, उसकी ओर पीठ किए, फ्रॉक-कोट
पहने एक पतला आदमी खड़ा था और चौड़ी आस्तीन में अपना हाथ हिलाते हुए दो मोटों से
ज़ोर-ज़ोर से कह रहा था:
“हाँ, क्रांति –
ख़त्म हो गई! मगर – उसका अफ़सोस नहीं करेंगे, - हम
बुद्धिजीवियों को, उसने बड़ा फ़ायदा पहुँचाया. उसने हमसे वो सब साफ़
कर दिया, दूर फेंक दिया, जो
अनावश्यक, किताबी था, जो हमें जीने में बाधा पहुँचा रहा था, जैसे सींपियाँ
और शैवाल जहाज़ को आगे बढ़ने में बाधा डालते हैं...”
“नौकरी कर
चुका,
और
– अपना ही पर्दाफ़ाश कर रहा है,” हौले से हँसते हुए मरीना ने टिप्पणी की.
“अब हमारे
सामने एक ज्वलंत, व्यावहारिक काम है...”
“कुलीनों
के डिस्ट्रिक्ट लीडर का बेटा...” मरीना फुसफुसाई.
“राज्य
की तरक्की...”
“ख़ामोश!” एक
भर्राई हुई आवाज़ रेंकी. सम्गीन, थरथराते हुए उठ गया, सबके सिर
बुफे की ओर घूम गए, कई सारी आवाज़ों की बातचीत थम गई, बिलियार्ड
की गेंदें ज़ोर से आवाज़ करने लगीं, और जब निपट ख़ामोशी छा गई, तो किसी ने
उनींदी आवाज़ में कहा:
“तो? चिड़ी चलता
हूँ...”
बुफ़े के
पास लेफ्टिनेन्ट त्रिफ़ोनोव खड़ा था, दाएँ हाथ में तलवार का दस्ता, और बाएँ से
एक गंजे आदमी का कॉलर पकड़े, जो उससे एक सिर जितना ऊँचा था; वह गंजे को
अपनी तरफ़ खींच रहा था, धकेल रहा था और भर्रा रहा था:
“ऐसे कचरे
की हिफ़ाज़त करना, और वो...”
गंजा, डोलते हुए, हाथों को
अटेन्शन की मुद्रा में रखे, मिमिया रहा था.
“ड्यूटी
ऑफ़िसर को बुलाइए!” फ्रॉक कोट वाला आदमी चिल्लाया और जुआरियों के कमरे में भागा.
“चेहरा तो
देखो,
- ऊह!”
काफ़ी उदासीनता से मरीना ने कहा.
सम्गीन
एकटक लेफ्टिनेन्ट के लाल, बदसूरत फूले हुए चेहरे और उसके सीने की ओर
देखे जा रहा था; लेफ्टिनेन्ट इतनी ज़ोर से इतनी तेज़-तेज़ साँस ले
रहा था, कि उसके सीने पर सफ़ेद सलीब उछल रहा था. पब्लिक फ़ौरन ग़ायब हो गई, - जैकेट वाला
आदमी लम्बे-लम्बे डग भरते हुए लेफ्टिनेन्ट के पास आया और, सिगरेट
वाला हाथ पीठ के पीछे छुपाकर पूछने लगा:
“माफ़ कीजिए, - बात क्या
है?”
“भाग जा,” गंजे को
दूर धकेल कर लेफ्टिनेन्ट ने थके हुए सुर में कहा, उसने ट्रे
से जाम लेने की कोशिश की, उसे उलट दिया, काउन्टर
पर मुक्का मारा और भर्राने लगा:
“और तू, बेवकूफ़, ये क्या किसान
की तरह सजधज कर आया है?” वह जैकेट वाले आदमी पे चिल्लाया. “मैं –
किसानों पे कोड़े बरसाता हूँ! समझ रहा है? गाने सुनते हो, जुआ, बिलियर्ड, और मेरे
यहाँ लोग ठण्ड से जम गए हैं, शैतान तुम्हें ले जाए! और मुझे – उनके लिए
जवाब देना पड़ता है.”
लेफ्टिनेन्ट
ने ज़ोर से हाथ फैलाकर सीने पर मारा और भद्दी गालियाँ देने लगा...
“कमाण्डेन्ट
को फ़ोन कीजिए,” दाढ़ी वाला आदमी चिल्लाया और, कुर्सी
पकड़कर उसने अपने और लेफ़्टिनेन्ट के बीच रख ली, - उसने, तलवार का
दस्ता खींचते हुए, म्यान को बाएँ हाथ से नहीं पकड़ा था.
“चलो, जाएँगे,” मरीना ने
सुझाव दिया. सम्गीन ने इनकार में सिर हिलाया, मगर उसने
उसका हाथ पकड़ा और आगे ले चली. बिलियार्ड के कमरे से, रूमाल से
हाथ पोंछते हुए, एक ऊँचा, पतली
टाँगों वाला ऑफ़िसर उछल कर बाहर आया, - वो इतने छोटे-छोटे कदमों से बुफे की ओर भाग
रहा था, कि मरीना ने टिप्पणी की:
“भाग रहा
है,
मगर
– जल्दी में नहीं है.”
“क्रांति
करते हैं, फिर दहाड़ते हैं, गुण्डे, - करो इनकी
हिफ़ाज़त!” लेफ्टिनेन्ट चिल्ला रहा था; ऑफ़िसर उसके बिल्कुल पास पहुँचा और उसने ज़ोर से
नाक छिनकी, मानो इस बदहवास चीख को डुबोना चाहता हो.
“तुम्हारा
चेहरा कितना भयानक हो रहा है, क्या हुआ है तुम्हें?” मरीना
सम्गीन के कान में फुसफुसाई, वह बुदबुदाया:
“मैंने
उसके साथ एक ही कुपे में सफ़र किया था. वो – लोगों को शांत करने के लिए जा रहा था. उसका
– दिमाग़ ठीक नहीं है...”
“ओय, तुम ठीक नहीं
हो,
ठीक
नहीं हो, तुम.” मरीना सीढ़ियों पे जाते हुए बोली.
रुक-रुक कर
घण्टी बज रही थी, कोई बदहवासी से लोगों को बुलाने लगा:
“महाशय!
कॉन्सर्ट का दूसरा भाग शुरू हो रहा है...”
सीढ़ियों पर
मरीना ने सम्गीन का हाथ छोड़ दिया, - वो फ़ौरन नीचे ड्रेसिंग रूम में गया, अपना कोट
पहना और वापस चला गया. बर्फ के गहरे फ़ाहे गिर रहे थे, ख़ामोशी को
जैसे सील करते हुए, हौले-हौले हवा चल रही थी.
“मैं किस बात से डर गया?” सम्गीन
धीरे धीरे चलते हुए सोच रहा था, - ‘ठीक नहीं हो, उसने कहा
था...इसका क्या मतलब है? उदासीन गाय’, उसने मरीना
को गाली दी, मगर उसे फ़ौरन महसूस हुआ कि उसकी चिड़चिड़ाहट इस औरत से
संबंधित नहीं है.
‘लेफ्टिनेन्ट
नशे में धुत है, या पागल हो गया है, मगर वो –
सही है! हो सकता है, कि मैं भी चिल्लाने लगूँ. हर समझदार इन्सान को
चिल्लाना चाहिए: ‘मुझ पर ज़बर्दस्ती करने की हिम्मत न करना!’
लेफ्टिनेन्ट
की नशीली गर्जना के साथ-साथ दिमाग़ में प्राचीन, प्यारी
ख़ूबसूरती के बारे में, जहाज़ की तली मे चिपकी हुई सींपियों और शैवाल
के बारे में शब्द गूँज रहे थे, उस बारे में भी, कि क्रांति
ख़त्म हो गई है.
‘झूठ!’ सम्गीन
ख़यालों में चिल्लाया. ‘ख़त्म नहीं हुई है. जब तक मुझे तड़पाना बंद नहीं
करेंगे, वो ख़त्म नहीं हो सकती...’
उसे अपने
विचारों का फूहड़पन से भरा बचकानापन नज़र आया, और इससे वह
और भी परेशान, अपमानित महसूस करने लगा. अपने प्रति और लोगों
के प्रति इस भावना के वश, कटु अपमान की भावना के वश, जिसकी वजह
उसके विचार न तो ढूँढ़ सके थे, न ही जिसे वे बुझा सके थे, वह घर आया, उसने लैम्प
जलाया,
उससे
दूर एक कुर्सी पर कोने में बैठ गया और बड़ी देर तक धुँधलके में बैठा रहा, अपने आप को
किसी चीज़ के लिए तैयार करते हुए. वह बैठा था और आदत के मुताबिक याद करता रहा - दिन भर में
जो भी देखा था, और – किसने – किसी न किसी तरह से, - मगर हमेशा
प्रतिकूल रूप से उस पर मानसिक दबाव डाला था . उसने अपने आप को याद दिलाया, कि ऐसे, हज़ारों-हज़ारों
लोग हैं, जिन्हें अकेलेपन की सज़ा मिली है, और, हो सकता है, कि वह भी
उनमें से एक हो, - वो, - जिसे सबसे गहरी पीड़ा मिलती है. यादों के भार
से लदा वक्त बेहद धीरे-धीरे खिंच रहा था; घड़ी कबकी आधी रात का समय दिखा चुकी थी, और सम्गीन
के दिमाग़ में एक ख़याल कौंध गया:
“प्यारे
अतीत के प्रशंसक उसे किसी सराय में खिला रहे हैं’.
ये स्वीकार
करना अच्छा नहीं लग रहा था, कि वह दुन्याशा का इंतज़ार कर रहा है.
“मैं इंतज़ार
उसका नहीं कर रहा हूँ. मैं – प्यार नहीं करता. नौकर नहीं हूँ’.
मगर जब
कॉरीडोर में सरसराहट हुई, जैसे हवा गुज़र गई हो, और
दुन्याशा भागती हुई भीतर आई, उसके गालों को अपनी ठण्डी हथेलियों से पकड़ा, माथे को
चूमा,
- तो
सम्गीन को हल्की सी ख़ुशी महसूस हुई.
“इंतज़ार कर
रहे हो?” उसने जल्दी-जल्दी फुसफुसाते हुए पूछा. “प्यारे!
मैं सोच ही रही थी: शायद – इंतज़ार कर रहा हो! जल्दी,- मेरे कमरे
में चलते हैं. तुम्हारी बगल में कोई ख़तरनाक और, शायद, परिचित
आदमी आया है. सो नहीं रहा है, अभी दरवाज़े से बाहर झाँक कर देखा था,” उसे अपने
साथ खींचते हुए वह फ़ुसफ़ुसाई; वह चल रहा था और महसूस कर रहा था, कि उसके
भीतर एक अजीब, कड़वी, ठण्डक भरी
ख़ुशी बढ़ती जा रही है.
“प्लीज़, पैर मत
बजाओ,”
कॉरीडोर
में दुन्याशा ने विनती की. “वो लोग, बेशक, मुझे डिनर
के लिए ले गए, ये - हमेशा ही होता है! बड़े प्यारे हैं, और आम तौर
से...मगर फिर भी – सुअर हैं,” उसने अपने कमरे में घुसकर ऊपर वाली ड्रेस
फेंकते हुए, गहरी साँस लेकर कहा. “मुझे महसूस होता है: उनके लिए
गायिका, नर्स, नौकरानी – उनकी ख़िदमत के लिए ही हैं.”
“कल तुम
कुछ और कह रही थीं,” सम्गीन ने याद दिलाया.
“क्या हर
रोज़ एक ही जैसी बात कहनी चाहिए? इस तरह से तो तुम ख़ुद अपने आप से, और लोग भी
तुमसे नफ़रत करने लगेंगे.”
मेज़ पर
समोवार उबल रहा था, एक बेडौल लैम्प धुँआ छोड़ रहा था,” सम्गीन ने
उसकी लौ कम कर दी.
“आह, ये ऐसा
कमीना है,” दुन्याशा ने लैम्प की ओर हाथ नचाकर कहा. “तो, बताओ: मैं
कैसा गाती हूँ? नहीं, ठहरो – हाथ
धोकर आती हूँ, - बेतहाशा चूमते रहे, रंग लगाते
रहे,
शैतान.”
वह
पार्टीशन के पीछे छुप गई और वहाँ गुस्सा करते हुए वाश बेसिन के लोहे को खड़खड़ाती
रही:
“ऊ, शैतान...”
लैम्प फिर
से धुँआ छोड़ने लगा. सम्गीन ने दो मोमबत्तियाँ जलाईं और लैम्प बुझा दिया.
“ये ज़्यादा
अच्छा है,” पार्टीशन के पीछे से फ़र की किनारी वाला गाउन पहनकर
निकलते हुए दुन्याशा ने कह; चोटी उसने खोल दी थी, शानदार लाल
बाल पीठ पर, कंधों पर बिखरे थे, उसका चेहरा
तीखा लग रहा था और सम्गीन की नज़रों में उसने लोमड़ी के चेहरे का रूप ले लिया.
हाँलाकि दुन्याशा मुस्कुरा नहीं रही थी, मगर उसकी भागती हुई, चंचल आँख़ें
ख़ुशी से चमक रही थीं और, जैसे दुगुने आकार की हो गई थीं. सम्गीन के
कंधे पे सिर झुकाए वह सोफ़े पे बैठ गई.
“प्यारे, मैं – ख़ुश
हूँ! इतनी ख़ुश हूँ, जैसे – नशे में धुत हो गई हूँ और रोने का भी
मन कर रहा है! ओय, क्लीम, कितना अचरज
होता है, जब महसूस करते हो, कि तुम
अपना काम बख़ूबी कर सकते हो! सोचो, - मतलब, मैं क्या
हूँ?
कोरस
में गाने वाली एक लड़की, माँ – दूध बेचने वाली, बाप – बढ़ई, और अचानक –
कर सकती हूँ! किन्हीं लोगों के सिर, कई सारे पेट होते हैं आँखों के सामने, मगर मैं –
गाती हूँ, और , अब – दिल फ़ट जाएगा, मर जाऊँगी!
ये...ग़ज़ब की बात है!”
उसके मुँह
से शराब की गंध नहीं आ रही थी, सिर्फ सेन्ट्स की महक थी. उसकी उत्तेजना ने
क्लीम को उस कड़वाहट की याद दिला दी, जिससे वह कॉन्सर्ट में उसके और अपने बारे में
सोच रहा था. उसकी ख़ुशी अच्छी नहीं लग रही थी. मगर वह सरक कर उसके घुटनों पर बैठ गई, उसका चश्मा
उतार दिया और, उसे मेज़ पर फेंक कर, आँखों में
देखने लगी.
“तो, बताओ: क्या
तुम्हें अच्छा लगा?”
चश्मे की
तरफ़ हाथ बढ़ाते हुए सम्गीन इस तरह झुका, कि वह उसके घुटनों से फिसल गई; तब वह उठ
गया और, हाथ में शराब का गिलास लेकर कमरे में घूमते हुए, बोलने लगा, उसे मालूम
नहीं था, कि वह क्या कहने जा रहा है:
“मुझे देर
हो गई थी, दरवाज़े के पास खड़ा होना पड़ा, वहाँ ठीक
से सुनाई नहीं दे रहा था, और इन्टरवल में...”
वह विस्तार
से लेफ़्टिनेन्ट से हुए अनचाहे परिचय के बारे बताने लगा, इस बारे
में भी बताया कि लेफ़्टिनेन्ट ने बूढ़े पुलिस वाले से कैसी क्रूरता का बर्ताव किया
था. मगर पुलिस वाले की बदनसीबी दुन्याशा के दिल को न छू सकी, और जब
सम्गीन ने बताया कि कैसे बदमाश ने रिवॉल्वर छीन लिया था, - तो उसने
दुन्याशा को फ़ुसफ़ुसाते हुए सुना:
“शाबाश...”
क्लब में
लेफ्टिनेन्ट के विद्रोह के बारे में बताते हुए सम्गीन ने चिड़चिड़ाहट से उसकी ओर
देखा. दुन्याशा बच्चों की तरह थोड़ा सा मुँह खोले, आँखें
झपकाते हुए सुन रही थी, और धीरे धीरे अपने बालों का गुच्छा बनाकर उससे
गालों को सहला रही थी.
“इस हंगामे
के बाद मैं वहाँ से निकल गया, और तुम्हारे बारे में सोचता रहा,” सिगरेट के
धुँए की तरफ़ देखते हुए, और उससे हवा में आठ का अंक बनाते हुए, दबी ज़ुबान
में सम्गीन कह रहा था. “ ये कल्पना करता रहा, कि तुम, ऊपर, गा रही हो, और
तुम्हारी आवाज़ जानवरों को इन्सान बना रही है, और, नीचे...”
“ऑफ़िसर – जानवर क्योंकर हुआ?” भँवे
सिकोड़कर, अचरज से दुन्याशा ने पूछा. “वह सिर्फ – बेवकूफ़ और कोई
फ़ैसला लेने के काबिल नहीं है. वो तो क्रांतिकारियों के पास चला जाता और कहता: मैं
तुम्हारे साथ हूँ! बस यही बात है.”
अपने लिए
मदैरा का एक जाम भरकर उसने कहा:
“और मैं –
कुछ भी नहीं सोच रही हूँ.”
“ज़ाहिर है, कि
लेफ्टिनेन्ट में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है, मगर
तुम्हारे भविष्य में है...”
और, दुन्याशा
के सामने ठहरकर, वह उसके भविष्य की तस्वीर खींचने लगा.
“आवाज़
तुम्हारी ज़्यादा दमदार नहीं है और वह लम्बे समय तक नहीं चलेगी. कलाकारों की दुनिया
– ये ऐसे लोगों की दुनिया है जिन्हें पब्लिक सिर पे चढ़ा लेती है, अज्ञानी, ढीली-ढाली
नैतिकता वाले, बेलगाम लोगों की दुनिया. उनमें से किसी से –
मिसाल के तौर पर, अलीना से – शायद, तुम भी
प्रभावित हो चुकी हो.”
उसने देखा
कि दुन्याशा का चेहरा खिंच रहा है, उस पर से ज़िंदादिली लुप्त होती जा रही है, चेहरे का
रंग बदल रहा है, - उस पर झाईयाँ उभर आई हैं, और उसने आँख़ें
सिकोड़ीं.
“सामाजिक
जोकर,
वो
खाए-पिए लोगों का दिल बहलाने के लिए जीते हैं...”
“आह, माय गॉड!” आश्चर्य से हाथ नचाते हुए दुन्याशा
चीखी,
“मुझे
उम्मीद नहीं थी! तुम बिल्कुल वैसे ही बोल रहे हो, जैसे मेरा
शौहर बोला करता था...”
“अगर वो
ऐसा कहता था, तो वो बेवकूफ़ नहीं था,” सम्गीन ने
उससे दूर जाते हुए कहा, और वो, कंधों तक
लाल होते हुए, बालों को पीछे फेंकते हुए आगे बोली:
“नहीं –
बेवकूफ़ ही था! वो – ख़ाली है. उसमें सब कुछ – सिर्फ नियम, सब कुछ –
किताबों से, और दिल में – कुछ भी नहीं, बिल्कुल
ख़ाली दिल! नहीं, रुको!” सम्गीन को बोलने न देते हुए वह चीखी.
“वो – कंजूस है, भिखारी जैसा. वो किसी से प्यार नहीं करता, न इन्सानों
से,
न
कुत्तों से, न बिल्लियों से, बच्चों
जैसा दिमाग़ है. और मैं इस तरह जीती हूँ: क्या तुम्हारे पास ख़ुशी देने के लिए कुछ
है?
लोगों
को दो,
बाँट
लो! मैं ख़ुशी की ख़ातिर जीना चाहती हूँ...मुझे मालूम है, कि ऐसा –
कर सकती हूँ!”
मगर अब
उसकी आँखों से आँसू लुढ़कने लगे, और सम्गीन ने सोचा, कि रोना –
उसे आता नहीं है: आँखें खुली हैं और खूब चमक रही हैं, मुँह पे
मुस्कुराहट है, वह घुटनों पे मुक्के मार रही है और आक्रामकता
से उत्तेजित हो गई है. उसके आँसू – वास्तविक नहीं हैं, उनकी ज़रूरत
नहीं है, ये – दर्द के, अपमान के
आँसू नहीं हैं. उसने नीची आवाज़ में कहा:
“वो –
बेवकूफ़ है. हमेशा – बेवकूफ़” खड़े हुए, बैठे हुए, लेटे हुए.
ऐसे लोगों पे कोड़े बरसाने चाहिए...बल्कि गोली मार देनी चाहिए, - धुँआ मत
छोड़,
बदबू
न फ़ैला, बेवकूफ़!”
सम्गीन सुन
रहा था और महसूस कर रहा था कि उसे गुस्सा आ रहा है. नींबू के टुकड़े पर सिगरेट बुझा
कर उसने दाँतों के भींचते हुए कहा:
“रुको, तैश में मत
आओ...”
वह नहीं
रुकी. सोफ़े की पीठ से टिकते हुए, सीट पर हाथ जमाए और सम्गीन को अचरज से देखते
हुए,
वह
कह रही थी:
“मुझे ज़रा
भी समझ में नहीं आता, कि तुम उसीकी धुन पे कैसे गा सकते हो? तुम तो उसे
जानते भी नहीं हो. और अचानक, तुम, इतने अक्लमन्द...शैतान जाने, ये क्या
है!”
सम्गीन ने
कंधे उचकाते हुए कहा:
“तुम गाती
हो मीठे-मीठे गीत, और ईडियट्स को यकीन हो जाता है, कि सब कुछ
ठीक-ठाक है.”
वह समझ रहा
था कि बहुत बुरा बोल रहा है और ये भी कि उसके शब्द दुन्याशा तक नहीं पहुँच रहे
हैं. उसका जी चाह रहा था कि चिल्लाए, पैर पटके, मतलब – इस
छोटी सी औरत को डराए, ताकि वह दूसरी तरह के आँसुओं से रोए. उसके
प्रति दुश्मनी की भावना, मदहोश करते हुए, वासना
जगाने लगी, बदले की भावना पैदा करने लगी. वह उसके सामने घूमता
रहा,
अपनी
आँखों के सामने ऐसे चित्र की कल्पना करते हुए, जिसमें वह
सनकीपन से उस पर अत्याचार कर रहा है, उसे पकड़ने को, मसलने को, उसे दर्द
पहुँचाने को, उसे रोने पर, कराहने पर
मजबूर करने को बेताब है; वह अब सुन नहीं रहा था कि दुन्याशा क्या कह
रही है, बल्कि उसकी करीब–करीब अनावृत छातियों की ओर देख रहा
था और उसे मालूम था कि बस अभी...मगर उसने ख़ुद ही ने, सम्गीन का
हाथ पकड़ कर, उसे अपनी बगल में बिठा लिया और उसके सिर को कसकर अपनी
बाँहों में लेते हुए जल्दी-जल्दी, उत्तेजित फुसफुसाहट से पूछा:
“तुम्हें
क्या हुआ है, प्यारे? किसने तुम्हारा अपमान किया है? बोलो, बताओ मुझे!
माय गॉड, कैसी वहशियत भरी, दयनीय
आँख़ें हो गई हैं तुम्हारी”.
ये बेवकूफ़ी
थी,
मज़ाक
था और अपमानजनक था. उसे इस बात की उम्मीद नहीं थी, इसकी वह
कल्पना भी नहीं कर सकता था, कि दुन्याशा या कोई और औरत उससे इस अंदाज़ में
बात करने लगेगी. वह कुछ भी नहीं सुन रहा था, जैसे उसके
सिर पे किसी नरम, मगर भारी चीज़ से वार किया गया हो, उसने
दुन्याशा के मज़बूत हाथों से आज़ाद होने की कोशिश की, मगर उसने, प्रतिकार
करते हुए सम्गीन को और भी कस कर अपने सीने से चिपटा लिया और उत्तेजना से उसके कान
में फ़ुसफुसाई:
“मुझे
मालूम है, कि तुम्हें मुश्किल हो रही है, मगर आख़िर ये
– कुछ ही समय की बात है, क्रांति – होगी, ज़रूर
होगी!”
“प्लीज़,” वह भुनभुनाया, और गुस्से
भरा,
तंज़
भरा,
आहत
करने वाला कुछ कहने वाला था, मगर उसने सिर्फ इतना कहा: “मुझे – तकलीफ़ हो
रही है.”
वाकई में
तकलीफ़ हो ही रही थी: दुन्याशा उसका सिर झुला रही थी, कमीज़ की
कड़ी कॉलर गर्दन की चमड़ी में चुभ रही थी, दुन्याशा की अँगूठी कान को दर्दनाक तरीके से
दबा रही थी.
“तुम –
अकलमंद हो,” वह फुसफुसाई. “मुझे तुम्हारे बारे में बहुत कुछ मालूम
है,
सुना
था कि कैसे अलीना ल्यूतोव को बता रही थी, और मकारोव भी कह रहा था, और ख़ुद
ल्यूतोव भी अच्छा ही बोल रहा था...”
आख़िरकार
अपने सिर को छुड़ाते हुए, बाल ठीक करते हुए क्लीम उछल कर खड़ा हो गया.
“ल्यूतोव
मेरे बारे में, और आम तौर से किसी के भी बारे में, अच्छी बात
कह ही नहीं सकता.”
उसे महसूस हो रहा था, कि जो बोलना चाहता है – वो कह नहीं रहा है, जैसा करना
चाहता है – वैसा बर्ताव नहीं कर रहा है और, हो सकता है, मज़ाकिया लग
रहा है.
“नहीं, नहीं, ये सही
नहीं है,” दुन्याशा फ़ौरन, ज़ोर देते
हुए चहकी, “उसने मेरे ही सामने मकारोव से कहा था: ‘सम्गीन
अटारी से सड़क को देख रहा है और वक्त का इंतज़ार कर रहा है, और जब
इंतज़ार पूरा हो जाएगा, तो बाहर आएगा – तब हम सब – चकित हो जाएँगे!’ सिर्फ वो
ये कहते हैं कि तुम बहुत घमण्डी और घुन्ने हो.”
वह उसके
कंधों पर हाथ रखकर खड़ी थी,- हाथ भारी थे, और आँखें
बेतहाशा चमक रही थीं.
‘बेहद घटिया
दृश्य है,’ सम्गीन ने अपने आप से कहा, मगर सुनता
रहा.
“ ल्यूतोव –
ग़ज़ब का इन्सान है! वो – बिल्कुल अकीम अलेक्सान्द्रोविच निकीतिन है, - जानते हो ना, सर्कस का
डाइरेक्टर? – जो सभी आर्टिस्ट्स के – इन्सानों के और जानवरों के आर
पार देखता है.”
उसने
दुन्याशा की कमर पकड़ी थी, मगर उसके हाथ जैसे ज़्यादा-ज़्यादा भारी होते जा
रहे थे और उसके ख़तरनाक इरादों को नष्ट कर रहे थे, बदला लेने
की भावना से उत्तेजित वासना को ठण्डा किए जा रहे थे. मगर फिर भी इस औरत को उसकी
जगह दिखानी ही थी.
“ओह, बस!” उसने
कहा और, जानबूझकर कस के, कठोरता से
उसे पकड़ा, कुछ ऊपर उठाया, मगर वह
उसके हाथों से छिटक गई, उछल कर मेज़ पे बैठ गई.
“नहीं, रुको! क्या
तुम ये सोचते हो, कि मैं – बेवकूफ़ हूँ, सड़क छाप
बेवकूफ़ लड़की की तरह? क्या तुम ये सोचते हो कि मैं – लोगों को नहीं
पहचानती? कल यहाँ का अख़बार वाला, ऐसी तोते
जैसी नाक वाला, मोटा सुअर...तो, - कहने की
ज़रूरत नहीं है!” और गाऊन को सीने पे डालकर, उसने ज़ोर
से कहा:
“ कमीनापन
नहीं,
बल्कि
ख़ुशी बांटनी चाहिए...”
“बस भी करो,” सम्गीन ने
उसके पास जाते हुए दुहराया.
“छोड़ो, तुमने मुझे
दुखी कर दिया और ...थक गई हूँ मैं!”
गहरी साँस
लेकर वह उकताहट से उसके चेहरे से नज़र हटाकर कंधे के पीछे देखती रही.
“मैंने
उम्मीद की थी, - तुम्हारे साथ मिलकर थोड़ी सी ख़ुशी मनाऊँगी! मगर
– ऐसा हुआ नहीं... तुम – जाओ. मैं बेहद...’मूड’ में नहीं
हूँ! और – देर भी हो चुकी है. जाओ, प्लीज़!”
सम्गीन चला
गया,
एक
भी शब्द कहे बिना, ये उम्मीद करते हुए, कि इससे
उसका अपमान करेगा या ये समझने पर मजबूर करेगा, कि उसका –
अपमान हुआ है. वह वाकई में अपने आप पर ताव खा रहा था, कि इस अजीब
दृश्य में उसने मूर्खतापूर्ण भूमिका की है.
‘शैतान ही
उससे बात करने के लिए मुझे खींच रहा था! वो तो बहस करने के लिए है ही नहीं. बहुत
घटिया छोकरी है’, - वह कपड़े उतारते हुए गुस्से से सोच रहा था, और बिस्तर
पे इस पक्के इरादे के साथ लेटा कि कल ही मरीना से पैसों वाले काम के बारे में बात
करेगा और कल ही क्रीमिया चला जाएगा.
मगर सुबह, जब वो चाय
पी रहा था, तो द्रोनोव प्रकट हुआ.
अपने पूरे
अस्तित्व के साथ उसने ख़ुशी का इज़हार किया, गोल्ड
प्लेटेड दाँत दिखाते हुए चौड़ी मुस्कुराहट बिखेरी, अपनी आँखों
को सम्गीन के चेहरे और बदन पर गोल-गोल घुमाया, पैर ऐसे घुमा
रहा था,जैसे मक्खी हो, और अपने
हाथ इतने कस के रगड़ रहा था, कि त्वचा चरमरा रही थी. उसके साफ़ चेहरे ने
क्लीम को सपने वाले लोगों की याद दिला दी, जिनके
चेहरे की जगह पे – हथेलियाँ थीं.
“बुड्ढ़ा हो
गया है तू, सम्गीन, बाल सफ़ेद होते जा रहे हैं, और बिरले
हो गए हैं,” उसने टिप्पणी की और दोस्ताना अंदाज़ में उलाहना दिया: “
जल्दी कर दी! हाँलाकि वक्त ऐसा है, कि ज़्यादा जवान भी हुआ जा सकता है.”
सम्गीन ने
उसे चाय दी, मगर द्रोनोव ने वाइन माँगी.
“यहाँ सफेद
वाइन मिलती है,’ग्राव’ – बहुत हल्की
और बेहद प्यारी! चीज़ भी मँगवाओ, और फिर – कॉफी का ऑर्डर देंगे,” उसने
चालाकी से सम्गीन को प्रेरित किया. “माफ़ करना, मगर मैं
करीब –करीब पूरी रात सोया नहीं हूँ, कॉन्सर्ट के बाद – डिनर, और उसके
बाद – ड्रामा: ऑफ़िसर पागल हो गया, उसने तलवार से पुलिस वाले को काट दिया, गाड़ीवान को, और रात के
वाचमैन को ज़ख़्मी कर दिया और आमतौर से – युद्ध करता रहा!”
“ बहुत मज़ेदार ढंग से सुना रहे हो,” सम्गीन ने
मुस्कुराते हुए कहा; द्रोनोव ने एक आँख़ सिकोड़ कर उसकी ओर देखा और, अपनी चिकनी
ठोढ़ी को खुजाते हुए, बड़ी सादगी से कहा:
“मैं, भाई, सनकी होता
जा रहा हूँ. ज़िंदगी व्यंग्य करना सबसे अच्छी तरह सिखाती है.”
और, बेवकूफ़ की
तरह,
उसने
आगे,
हँसते
हुए,
बोला:
“अब, जब उसे
काफ़ी झकझोर चुके, तो वह – सड़ी हुई बदबू छोड़ रही है. क्या
तुम्हें महसूस नहीं होता?”
“नहीं”, सम्गीन ने
ये सोचते हुए जवाब दिया, कि अगर उसे ये बताऊँ कि लेफ्टिनेन्ट ने ट्रेन
में कैसा बर्ताव किया था, क्या-क्या कहा था, - तो द्रोनोव
इसके बारे में लिख देगा और सब कुछ घटिया बना देगा.
“नहीं महसूस
करते?”
द्रोनोव
ने दुहराया और, दोस्ताना अंदाज़ में नौकर को वाइन, चीज़, कॉफ़ी का
ऑर्डर देकर, उबासी ली.
“और, पता है, - यहाँ
लीदिया वराव्का रहती है, उसने घर ख़रीद लिया है. लगता है – उसने शादी कर
ली थी,
बेवा
हो गई और – यकीन कर सकते हो? – बिल्कुल पाखण्डी हो गई है, लोगों के
नैतिक-धार्मिक पुनरुद्धार के लिए काम कर रही है, ये – एक
जिप्सी औरत और वराव्का की बेटी है! ये तो, भाई, अच्छा ख़ासा
मज़ाक हो गया, - है ना? अमीर औरत है. यहाँ, एक
व्यापारी की बीबी, ज़ोतोवा, जो चर्च का
सामान बेचती है, उसे तैयार करती है. कहते हैं कि वो भी
सांप्रदायिक है, मगर – बेहद ख़ूबसूरत छोकरी है...”
सम्गीन को
ये जानकर अच्छा नहीं लगा कि लीदिया इसी शहर में रहती है, और उसका
मरीना के बारे में पूछने को जी चाहा.
“किस लिहाज़
से - तैयार करती है, - सांप्रदायिक दृष्टि से?”
“शैतान
जाने! जैसे – लीदिया को उससे घर ख़रीदने पर मजबूर किया,” बगैर किसी
दिलचस्पी के, फिर से उबासी लेकर द्रोनोव ने कहा, उसने अपने
पैर लम्बे किए, हाथ पतलून की जेबों में रखे और जल्दी-जल्दी
पूछने लगा:
“तो, तुम्हारे
यहाँ,
केंद्र
में,
क्या
हाल है? अख़बारों से समझ में नहीं आता: क्या – अभी तक क्रांति
चल रही है, या फिर - दमन
की कार्रवाई चल रही है? मैं, बेशक, उस बारे
में नहीं जानना चाहता, कि क्या कहते हैं और क्या लिखते हैं, बल्कि –
क्या सोच रहे हैं? जो कुछ भी लिखते हैं, उससे तो बस
पगला जाते हो. एक कहता है: आग को हवा दो, दूसरा – उसे बुझा दो! और तीसरा कहता है, कि आग को
घास से बुझाओ…”
“और तुम ख़ुद
क्या सोचते हो?” क्लीम ने पूछा; वह राजनीति
के बारे में बात नहीं करना चाहता था, और ये अंदाज़ लगाने की कोशिश कर रहा था, कि मरीना
ने परिचितों के नाम गिनाते समय लीदिया का नाम क्यों नहीं लिया?
“मैं क्या सोचता हूँ?” द्रोनोव ने
सवाल दुहरा दिया, उसने जाम में वाइन डाली, उसे पी गया, फ़ौरन रूमाल
से अपने होंठ साफ़ किए, और उसके सपाट चेहरे से प्रसन्नता के सभी लक्षण
ग़ायब हो गए; कनखियों से क्लीम की ओर देखते हुए, वह होंठों
को चबा रहा था और गले से निगलने की क्रिया कर रहा था, जैसे उसका
जी मिचला रहा हो. सम्गीन ने इस अंतराल का फ़ायदा उठाया.
“फ़िर भी:
वो क्या चीज़ है – ये औरत? ज़ोतोवा?”
“और...तुझे
उसकी क्या ज़रूरत है?”
क्लीम ने
कहा कि वह अपने क्लाएण्ट के ज़ोतोवा के साथ किसी काम के सिलसिले में आया है.
“ऊहू,” द्रोनोव
चहका. “तेरे क्लाएण्ट ने कानूनी काम के लिए अच्छा समय ढूँढ़ा! चल, जाम
टकराएँ!”
मिठास के
साथ आँख़ें बंद करके, द्रोनोव ने वाइन की चुस्की ली और गहरी साँस
ली:
“ज़ोतोवा? ख़ूबसूरत है, अमीर है, कहते हैं –
अकलमंद है और जैसे कि, जिस्मानी ख़ुशियों के लिए नहीं बनी है, शहर में
उसकी इज़्ज़त है, और आम तौर से – संदेहास्पद औरत है! उसका शौहर, कहते हैं, कि कोई
घरेलू दार्शनिक था, सांप्रदायिक और सूदखोर, उसने किसी
को पूरी तरह बर्बाद कर दिया, उस आदमी ने ख़ुद को गोली मार ली. उसके बारे में
तुम लीदिया से पूछो,” उसने सिकुड़ते हुए कहा, जैसे उसे
ठण्ड लग रही हो. “शायद, वह लीदिया को चूस रही है. लीदिया तो अमीर है
ना – ऊ-ऊ! मैंने पब्लिशिंग हाउस के लिए उससे पैसे माँगे, मेरा सपना
है – किताबें छापना! राज़ी हो गई, वादा किया, मगर इस, ज़ोतोवा, ने ज़ाहिर
है,
उसे
मना कर दिया. ठीक है – शैतान ले जाए! पैसे तो मैं इकट्ठा कर ही लूँगा. नहीं, तू मुझे
बता: क्या हमारे यहाँ कॉन्स्टिट्यूशन आएगा?”
“आएगा,” सम्गीन ने
उसकी ओर देखे बिना वादा कर दिया.
“तो...”
द्रोनोव थोड़ा
उठा,
उसने
अपना पैर मोड़ा और उस पर बैठ गया और अपने होंठ काटते हुए, घड़ी के
पट्टे से खेलते हुए कुछ पल सम्गीन के चेहरे की ओर देखता रहा; फिर उसने
पूछा:
“और क्या
तुम्हें उसकी ज़रूरत है? कॉन्स्टिट्यूशन की?”
“अजीब सवाल
है.”
“नहीं, - गंभीरता से
?”
“एक कदम आगे,” - कंधों को
सिकोड़ते हुए, न चाहते हुए भी क्लीम ने कहा.
“और क्या –
आगे,
दूर
तक?”
द्रोनोव
लगातार कोशिश कर रहा था.
प्यालों
में वाइन डालते हुए, क्लीम ने फ़ौरन जवाब नहीं दिया:
“देखेंगे.”
“सावधानी
से जवाब दिया है,” द्रोनोव ने गहरी साँस ली. “और मैं, भाई, न जाने
क्यों मुझे सुख में विश्वास ही नहीं है. रूस – प्र-ति-कू-ल देश है,” उसने
तुर्गेनेव के पिगासोव की याद दिलाते हुए कहा. “पूरी तरह से प्रतिकूल. और उस पर
रोमानोव नहीं, बल्कि करमाज़ोव राज करते हैं. शैतान राज करते
हैं. ‘तरह तरह के
शैतान घूम रहे हैं’.
‘नशा चढ़ रहा
है’,
सम्गीन
ने सोचा.
द्रोनोव का
चेहरा ख़ुशी से फ़ैल गया, उसकी नाक से सीटी सी बजने लगी, नथुने
फ़ड़कने लगे, कान लाल हो गए और फूल गए.
“तमीलिन की
याद है? वह भविष्य को देख सकता है. यहाँ आया था भाषण देने “आदर्श, वास्तविकता
और दोस्तोयेव्स्की का ‘शैतान’” इस विषय
पर. सबने उसे एक साथ हूट कर दिया. और तूला में या अर्योल में तो उसे मारना भी
चाहते थे. तू क्यों मुँह बना रहा है?”
“सिर दर्द
कर रहा है.”
“बोल्शेविक
या मेन्शेविक?”
“मैंने
राजनीति छोड़ दी है.”
सम्गीन के
जवाब ने या उसकी उदासीनता ने जैसे द्रोनोव को संजीदा बना दिया, - उसने
सुनहरी घड़ी निकाली और, उसकी ओर देखते हुए, एकदम
संजीदगी और सीधे-सादे ढंग से कहा:
“हाँ, तू उन
मछलियों में से नहीं है, जिन्हें बन्सी डालकर पकड़ा जाता है! मैं भी –
उनमें से नहीं हूँ. तमीलिन, ज़ाहिर है, किताबों की
पूरी लिस्ट है, जिन्हें कोई नहीं पढ़ता, और दिखावटी
बेवकूफ़. भविष्यवाणी करता है – डर के मारे, जैसे कि
सारे भविष्यवेत्ता करते हैं. तो, शैतान के पास फेंक दो उसे!”
जंज़ीर वाली
घडी हिलाते हुए और ख़यालों में खोकर सम्गीन के चेहरे की ओर देखते हुए, वह कहता
रहा:
“मगर – किस
धारा में तैरना है? ये मेरा सवाल है, साफ़-साफ़
कहता हूँ. मैं, भाई, किसी पर विश्वास नहीं करता. और तुम पर भी
विश्वास नहीं करता. राजनीति तुम करते हो, - सारे चश्मे वाले लोग राजनीति करते हैं. और, ऊपर से, तुम
एडवोकेट हो, और हर एडवोकेट का लक्ष्य होता है गाम्बेटा और ज्यूल्स
फ़ाव्रे.”
“ये लाजवाब
चीज़ है,” सम्गीन ने कहा, ये जानकर
कि कुछ तो कहना चाहिए.
द्रोनोव उठा, उसने अपने
पैरों की ओर देखा जो लेगिंग्स में थे.
“देख रहा
हूँ कि तू दिल खोलकर बात करने के मूड में नहीं है,” उसने मुस्कुराते
हुए कहा. “और मेरे पास तुझे तंग करने का वक्त नहीं है. ज़ाहिर है, मैं –
समझता हूँ: एक साज़िश है! तीन दिन पहले इनोकोव से सड़क पर मिला था, उसे आवाज़
भी दी,
मगर
उसने,
जैसे
मुझे पहचाना ही नहीं. हूँ.. हमारे बीच – कर्नल वासिल्येव को उसीने गोली मारी थी, - सही है! तो, फिर क्या, - अलबिदा, क्लीम
इवानोविच! कामयाबी! तेरी कामयाबी की कामना करता हूँ.”
ऐसा लगा कि
द्रोनोव गया नहीं, बल्कि गंधक के धुँए की तरह हवा में विलीन हो
गया.
‘छोटा-मोटा
बदमाश महान बनना चाहता है, मगर किसी बात से डरता है’, उस कुर्सी
को दूर धकेल कर, जिस पर द्रोनोव बैठा था, सम्गीन ने
निष्कर्ष निकाला और मरीना के यहाँ जाने के लिए अच्छी तरह कपड़े पहनने लगा.
‘वो भी
ज़िंदगी के डर के बारे में कह रही थी’, चाँदी जैसी धूप में चलते हुए उसे याद आया. रात
भर में बर्फ से सज गया शहर, ग़ज़ब का साफ़ था और असाधारण, प्यारी
उकताहट से भरा था.
मरीना की
दुकान और भी चकाचौंध वाली चमक से भरी थी, जैसे चर्च वाली सभी वस्तुओं को दिल लगाकर चाक
से साफ़ किया गया हो. ख़ास तौर से आँख़ों में समा रहा था सोने का पानी चढ़ा क्राइस्ट, जिसे सूरज
दिल खोलकर प्यारी धूप से आलोकित कर रहा था – और जो काले
संगमरमर की सलीब पर मुखर हावभाव से लटका हुआ था. मरीना फ़र का जैकेट पहने एक बूढ़े
को गले में पहनने वाले सोने के सलीब बेच रही थी, वह सोच में
डूबा उन्हें एक ढेर से उठाकर दूसरे में डाल रहा था, और उसने
प्यार से प्रभावशाली ढंग से कहा:
“पवित्र
चीज़ों का ज़्यादा मोल-भाव करना – ठीक नहीं है!”
“मगर ख़रीदार
तो मुझसे भाव-ताव करेगा ही ना? बूढ़े ने सिर हिलाते हुए पूछा. “उसे भी पाक
चीज़ों को सस्ते में लेने का शौक होता है...”
उसी प्यार
भरे लहज़े में, जिससे वह ख़रीदार से बात कर रही थी, मरीना ने
सम्गीन से कहा:
“कृपया, वहाँ
जाईये!”
सम्गीन को
ऐसे लगा कि दुकान के पीछे वाले कमरे को सभी छोटी-छोटी बातों समेत वह काफ़ी पहले से
जानता है. ये एहसास इतना अजीब था कि उसका स्पष्टीकरण ज़रूरी था, मगर सम्गीन
को वह मिला नहीं.
‘मेरी
दृश्य-स्मरण शक्ति उतनी अच्छी नहीं है’, उसने सोचा.
मिट्टी की
मूरत जैसे छोकरे ने दुकान वाला दरवाज़ा कस के बंद कर दिया, - इससे कमरा
और ज़्यादा अप्रिय रूप से रहस्यमय हो गया. गर्म, दमघोंटू
शाम भी अप्रिय थी.
‘संदेहास्पद
औरत.’,
क्लीम
को द्रोनोव की बात याद आई और उसने संदेह से सोचा: ‘जैसे मक्खी, हर चीज़ पर
अपने गंदे निशान छोड़ जाती है’.
चाभियाँ
खनकाते हुए मरीना कमरे में आई: उसने उसे फ़ौरन बताया कि वह क्यों आया है, मगर उसने
ध्यान से उसकी बात सुनकर अलसाए हुए ढंग से कहा:
“अल्योशा
गोगिन को तो, शायद, मालूम ही नहीं है कि कुतूज़ोव के कहने पर पैसे
देकर, गिरफ़्तारी
मैंने ही करवाई थी. ठीक है, इसका
इंतज़ाम मैं कर दूँगी, मगर तुम मेरी मदद करोगे, - इस काम के
लिए मैं अपने एडवोकेट के पास नहीं जाना चाहती. तुम - क्या – स्तेपान के साथ ही काम
करते हो?”
“एकदम तो
नहीं,”
सम्गीन
ने कहा. “जितना हो सकता है, उतनी मदद कर देता हूँ.”
“हमदर्दी
रखते हो,” उसने इस तरह कहा, जैसे इस
शब्द को बड़े-बड़े अक्षरों में लिख कर ख़ुद ही समझा रही हो: “ हमदर्दी रखना – मतलब
आधा हिस्सा लेना. चाय पिएँगे?”
उसने
समोवार को छुआ, घण्टी का बटन दबाया और, जब छोकरे
ने दरवाज़े से झाँका, तो उससे कहा;
“गरम करके
ला,
मीश्का!”
उसके बाद फिर सम्गीन से मुख़ातिब हुई:
“कौन से सच
की हिमायत करते हो? मार्क्सिस्ट तो हो ही?”
“उसकी
अर्थ-संबंधी शिक्षा को मानता हूँ...”
“स्तेपान
कहता है, कि मार्क्स को या तो पूरा का पूरा स्वीकार करना चाहिए, या फिर
बेहतर है, कि उसे छुआ ही न जाए.”
सम्गीन ने
मुस्कुराते हुए पूछा:
“तुम –
परेशान नहीं होतीं?”
वह जवाब
नहीं दे पाई, - दुकान में ज़ोर-ज़ोर से घण्टी बजने लगी. सम्गीन और आराम
से कुर्सी में जम के बैठ गया, ये सोचते हुए:
“स्वीकारोक्ति
चाहती है. औरतों वाली उत्सुकता...’
उसने दिमाग़
पर ज़ोर देकर पीली जर्सी पहनी मरीना को एक आक्रामक लड़की के रूप में, और उसके
बेवकूफ़ी भरे शब्दों को याद करने की कोशिश की: ‘जर्सी
इसलिए पहनती हूँ, क्योंकि टॉल्स्टॉय के उपदेशों को बर्दाश्त
नहीं कर पाती’. कुतूज़ोव उसे ‘घूमता-शहर’ कहता था.
और, अपनी
इच्छा के बावजूद, सम्गीन को स्वीकार करना पड़ा कि इस औरत में कोई
प्यारा सा हताश करने वाला, जोशीला आकर्षण है.
‘सादगी? ईमानदारी? जिज्ञासु
टाइप. अजीब बात है, कि वह अभी तक कुतूज़ोव के साथ अच्छे संबंध बनाए
हुए है’. दुकान में एक मुलायम, भारी आवाज़
धीरे-धीरे गा रही थी:
“कितना
ख़ूबसूरत दिन भेजा है ख़ुदा ने हमें और प्रकृति भी नागरिकों की ख़ुशी से कैसा मेल खा
रही है, जो आज़ादी की भावना से जी उठे हैं...”
इसके बाद
भारी आवाज़ हल्की आवाज़ में बोलने लगी, मगर मरीना ने कठोरता से कहा;
“एक सौ
पैंतीस, उससे कम में – नहीं दे सकती.”
“आपका शहर, आदरणीया, छोटा सा है, चर्चों से
आने वाले – रईस नहीं हैं, चारों ओर – काफ़िर, मोर्दोविया
के लोग हैं.
“नहीं दे
सकती”,
मरीना
ने दुहराया.
“ओह, सौ रूबल्स
कित्ती बड़ी रकम है!”
सम्गीन सुन
रहा था और मुस्कुरा रहा था. ख़ूबसूरत मीश्का बड़े तैश से उबलता हुआ समोवार लाया और
उसने अपनी काली भँवों वाली आँख़ों से गुस्से से मेहमान की तरफ़ देखा, - ऐसा लग रहा
था,
कि
वो या तो कुछ पूछना चाहता है या गाली देना चाहता है, मगर तभी ये
कहते हुए मरीना प्रकट हुई:
“पोप लोग
बड़ी कठोरता से मोल-भाव करते हैं! ये चौथी बार आया है, और ख़ुद –
किसी दूर की काऊन्टी से है. यहाँ रहते हुए कितना पैसा खा जाएगा.”
चाय बनाते
हुए वह कहती रही:
“मुझे
तुमसे बातें करने का बड़ा शौक है, ऐसे, जानते हो, खुलकर, बिना डॉट्स
के...,
ये
मेरे लिए बेहद ज़रूरी है, मगर देखो कैसे रुकावट डालते हैं! तुम किसी शाम
को मेरे पास यहाँ, या घर पे आ जाओ.”
“शौक से,” सम्गीन ने
कहा.
“देखो –
कल. इतवार है, दो बजे तक बिक्री करती हूँ. मुझे याद है कि
तुम सहमत न होने वाले व्यक्ति हो, मगर ऐसे ही लोग सबसे ज़्यादा दिलचस्प होते
हैं.”
सम्गीन ने
ये चेतावनी देना ज़रूरी समझा कि वह मुश्किल से ही दिलचस्प प्रतीत होगा.
“ओह, ये क्या
बात हुई?” उसने प्यार से प्रतिवाद किया. “इन्सान अपनी आधी
ज़िंदगी जी चुका है...”
“इन्सान की
ज़िंदगी, असल में, अपने आप से ही झगड़ने में बीत जाती है,” सम्गीन ने
करीब-करीब गुस्से से कहा, जिसकी ख़ुद उसे भी उम्मीद नहीं थी, और इससे
उसे और भी गुस्सा आ गया.
“ये – सही
है,”
मरीना
आसानी से सहमत हो गई, जैसे उसने अत्यंत साधारण शब्द सुने हों.
“समझी नहीं
है’,
त्योरियाँ
चढ़ाए,
दाढ़ी
खींचते हुए उसने सोचा, और इस बात से ख़ुश हो गया कि मरीना ने अनिच्छा
से की गई उसकी स्वीकारोक्ति को इतनी आसानी से लिया. मगर मरीना कहती रही:
“ ‘अस्सी हज़ार
मील अपने ही इर्द-गिर्द ’, जैसा कि ग्लेब इवानोविच उस्पेन्स्की ने लेव
टॉल्स्टॉय के बारे में कहा था. और ये, मुलाहिज़ा फ़रमाइए, हमेशा के
लिए सिद्ध हो गया है, कि धरती सूरज के इर्द-गिर्द घूमती रहे, और इन्सान –
अपनी रूह के चारों ओर.”
किसी चाल
की अपेक्षा से सम्गीन ने सवालिया नज़र से उसकी ओर देखा; उसने उसे चाय
का कप थमाकर गहरी साँस ली:
“बेहद
प्यारा इन्सान था ग्लेब उस्पेन्स्की! मैंने उसे तब देखा था, जब वह
आध्यात्मिक दृष्टि से बिल्कुल ख़त्म हो चुका था, और मेरा शौहर
उसे अच्छी तरह जानता था, दोनों साथ बैठकर पिया करते थे, वह इसे
अपनी कहानियाँ भेजा करता, मगर फिर वैचारिक दृष्टि से वे अलग-अलग हो गए.”
हथेलियों
से घुटनों पर पड़े स्कर्ट को सहलाते हुए वह हँस पड़ी:
“अपनी
कहानी ‘दिमाग़ में चढ़ गई’ के
पुनर्मुद्रण पर उसने मेरे शौहर को लिखा था: ‘ढूँढ़ रहा
था तू साम्यावस्था, पहुँच गया दुर्बोधता तक’.”
जब वह
ख़ामोश होकर चाय पीने लगी, तो सम्गीन ने पूछा: “वैचारिक दृष्टि से अलग
होने का क्या मतलब है?”
“मतलब, - विचार करने
की आदत में, उनकी दिशा में,” मरीना ने
कहा,
और
उसकी भँवें थरथरा गईं, आँखों पर परछाईं उतर आई. “उस्पेन्स्की तो, जैसा तुम
जानते हो, वासनाओं पर काबू रखता था और उसे ऐसा महसूस होता था कि
वह दुनिया का शिकार है, मगर मेरा शौहर – भोगवादी था, मगर सिर्फ
शारीरिक सुख की दृष्टि से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सुखों की दृष्टि से.”
उसकी काली
होती हुई आँखों की ओर देखते हुए क्लीम ने ज़ोर देकर पूछा:
“ये बात
मैं नहीं समझा...”
“हाँ, तुम्हारे
लिए ये समझना मुश्किल है,” मरीना ने सहमति दर्शाई. “यूँ ही तो तुम चेहरे
से भी उस्पेन्स्की से नहीं मिलते हो.”
“मैं”
सम्गीन ने अचरज से पूछा. “चेहरे से भी? ये – भी- किसलिए? क्या तुम
ऐसा सोचती हो, कि मैं भी – दुनिया का शिकार हूँ?”
“हुम्, और कौन –
नहीं है उसका शिकार?” मरीना ने पूछा और अचानक सिर को झटक कर इतनी
ज़ोर से हँसने लगी कि उसके शानदार भूरे बाल धुँए की तरह हिलने लगे. हँसते-हँसते वह
बोली:
“अरे, तुम क्यों
डर गए?
तुम
मुझे पीटर्सबुर्ग में एक बेवकूफ़ के रूप में जानते थे, - वो याद मत
करो,
मैं
अब दूसरी तरह की बेवकूफ़ हूँ.”
“मैं –
नहीं डरा,” वह दूर हटते हुए बुदबुदाया, “मगर मान लो, कि...”
मरीना उठ
गई और हाथ बढ़ाते हुए बोली:
“मतलब – कल
मिलेंगे? करीब दो बजे. अच्छा, - तंदुरुस्त
रहो!”
उसे बाहर
छोड़ने आते हुए, दुकान में उसने कहा:
“सुना
तुमने – ऑफ़िसर ने लोगों को काट दिया? कितना ख़ौफ़नाक!”
“हाँ,” सम्गीन ने
कहा.
‘वाकई में
संदेहास्पद औरत है’, शाम के ठण्डे धुँधलके में सड़क पर चलते हुए वह
सोच रहा था. वह गुस्से से सोच रहा था और महसूस कर रहा था, कि एक
अप्रिय उत्सुकता इस औरत के प्रति गंभीर और ख़तरनाक दिलचस्पी में बदलती जा रही है.
जैसे,
वह
किसी के सामने सफ़ाई पेश कर रहा था:
‘हर चीज़
जानना चाहती है. भोगवाद. क्या बकवास है! ज़ाहिर है – काफ़ी पढ़ रखा है. लेस्कोव की
नायिका के अंदाज़ में बात करती है. लेफ्टिनेन्ट के बारे में सबसे आख़िर में याद आई
और वो भी उदासीनता से. कोई और देर तक ख़ौफ़ से काँपती रहती. और – भावुकता
से...बुद्धिजीवी ख़ौफ़ हमेशा और आमतौर से भावुकतापूर्ण होते हैं... मुझमें, शायद, डरने की
प्रवृत्ति नहीं है. नहीं जानता. ये – गुण है या दोष?’
दुन्याशा
से मिलने की इच्छा नहीं थी, इसलिए वह रेस्तराँ में घुस गया, वहीं खाना
खाया,
बड़ी
देर तक कॉफ़ी पीता रहा, सिगरेट पी और निरीक्षण करता रहा, मरीना के
बारे में सोचता रहा, मगर ऐसा नहीं लगा, कि वह उसे
ज़्यादा समझ रहा है. कमरे में दुन्याशा की चिट्ठी थी, - उसने सूचित
किया था कि बर्तनों की फ़ैक्ट्री में गाने के लिए जा रही है, एक दिन बाद
लौटेगी. चिट्ठी के कोने में बहुत ही बारीक अक्षरों में लिखा था: ‘तुम्हारे
बगल वाले कमरे में एक संदेहास्पद व्यक्ति रह रहा है, और उसके
पास सुदाकोव आया था. सुदाकोव की याद है?’
सम्गीन ने
चिट्ठी के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए, उन्हें एश-ट्रे में जला दिया, दीवार के
पास गया, कान लगाकर सुनने लगा, - बगल वाले
कमरे में ख़ामोशी थी. सुदाकोव और ‘संदेहास्पद व्यक्ति’ मरीना के
बारे में सोचने में बाधा डाल रहे थे, - उसने घण्टी बजाई, कॉरीडोर
वाला नौकर आया – छोटा सा बूढ़ा, पूरी सफ़ेद ड्रेस में और उसके बाल भी सफ़ेद थे.
‘कितना...अवास्तविक’, सम्गीन ने
गौर किया. “समोवार और लाल वाइन की बोतल, प्लीज़! क्या मेरी बगल में कोई रहता है?”
“दोपहर को
रेल्वे स्टेशन चले गए,” बूढ़े ने विनम्रता से उत्तर दिया.
ये सुनकर
अच्छा लगा, और सम्गीन फ़ौरन मरीना की तरफ़ लौटा.
‘बेवकूफ़ –
दूसरी तरह की’? ख़ुदा में यकीन करती है. और, लगता है कि
ख़ुद अपना ही मज़ाक उड़ा रही है. कहीं – चर्च वाले ख़ुदा में तो नहीं? असल में, वो भी, अपने आकार
के बावजूद – अवास्तविक है. असाधारण है’, उसने जैसे
किसी के सामने हार मान ली, जो विरोध करना चाहता था.
जले हुए
कागज़ की बू ने उसे वेन्टिलेटर खोलने पर मजबूर किया. शहर के विभिन्न भागों में चाँद
की ओर देखकर कुत्ते विलाप कर रहे थे, भौंक रहे थे. चाँद फ़ायर-टॉवर के ऊपर था, - ‘जैसे i अक्षर के ऊपर वाला बिंदु’, - सम्गीन को म्यूसे
की कविता की पंक्ति याद आई, - और तभी उसे पूरी स्पष्टता से समझ में आया कि
कैसे ये चमकदार गोला, धरती से आगे निकलते हुए, घूमता है - और धरती
घूमती है अपनी धुरी पर, सूरज के चारों ओर, तेज़ी से –
और अपनी धुरी पर भी – एक गिरते हुए असीमित अवकाश में; और धरती पर, उसके एक
अत्यंत छोटे से बिंदु पर, एक छोटे से शहर में, जहाँ
कुत्ते विलाप कर रहे हैं, एक सुनसान सड़क पर, लकड़ी के
पिंजरे में, कोई एक क्लीम सम्गीन खड़ा है और चाँद के मृत चेहरे को
देख रहा है.
ठण्ड लगने
लगी, - काँप कर उसने वेन्टिलेटर बंद कर दिया. आकाशीय
चित्र लुप्त हो गया, मगर क्लीम सम्गीन रह गया, और पूरी
तरह स्पष्ट था, कि ये भी कोई अवास्तविक आदमी है, बेहद
अप्रिय और उसके लिए पूरी तरह पराया, जो उसके बारे में सोच रहा है, एक अनजान
लकड़ी के शहर में, कुत्तों के उनींदे, डरावने
विलाप के बीच.
‘बात ये है, कि मैं
ज़िंदगी में वो बिंदु नहीं पा सकता, जो मेरे समूचे अस्तित्व को अपनी ओर आकर्षित कर
सके’.
अपने आप पर
दया आई, और तब उसने सोचा:
‘ये –
असाधारण प्रतिभाशाली, अलग तरह की योग्यता वाले लोगों का गुण है.’
‘मगर, हो सकता है, - ऐसे भी
लोगों का गुण हो...जो वास्तविकता के प्रहारों से टूट चुके हों’.
‘अयोग्य
लोगों का? नहीं. अयोग्यता – आकारहीनता, अनिश्चितता
है. मैं – काफ़ी हद तक निश्चित हूँ’.
दूसरे
सम्गीन ने भी गंभीरता से, मगर कठोरता से और काफ़ी रूखेपन से उसका विरोध
किया:
‘ काश, तू ऐसी
बेवकूफ़ियाँ न करता, जैसे यहाँ आना. तू लोगों के एक समूह का काम कर
रहा है, जो सामाजिक क्रांति का सपना देखते हैं. तुझे तो वैसे
ही किसी भी क्रांति की ज़रूरत नहीं है, और तू सामाजिक क्रांति की ज़रूरत में विश्वास
भी नहीं करता. इससे बढ़कर मज़ाकिया बात और क्या सकती है कि एक नास्तिक चर्च जाए और धार्मिक
सम्प्रदाय में शामिल हो जाए?’
इस वाद
विवाद ने फ़ौरन भयानक रूप ले लिया; अब एक तीसरा सम्गीन भी शामिल हो गया – छोटे
ख़यालों वाला सम्गीन.
‘धार्मिक सम्प्रदाय
के बारे में कह रही थी दुन्याशा...’
पहले
सम्गीन ने विचारों को स्पष्ट किया.
‘सम्प्रदाय
में शामिल होना – मतलब कि अपने को किसी एक सम्पूर्ण इकाई का अंश मानना और अनुभव
करना,
अपने
आप से इनकार करना. संभव है, कि इसकी कल्पना की जा सकती है, मगर, महसूस तो
ये मुश्किल से होगा. अपने आप को धोखा देने का एक तरीका, जैसे ‘लोगों के
प्रति प्यार’, ‘वर्गीय एकजुटता’.
‘और –
स्तेपान कुतूज़ोव?’
‘उसने
स्वयम् ही ये तर्क दिया है, कि पूंजीवादी समाज सामाजिक वृत्ति को नष्ट
करता है’.
‘वह – करता
है,
“करने
वाला – मतलब विश्वास करने वाला”.’
‘वह वो नहीं
करता,
जो
सब करते हैं, बल्कि सबके विपरीत करता है. तुम बिना विश्वास किए
करते हो. मुश्किल से ही तुम कभी निस्वार्थता ढूँढ़ते हो.
तुम्हारे विचारों की सारी गड्ड्मड्ड में ज़िंदगी के प्रति भय छुप कर बैठा है, अंधेरे के
प्रति बचकाना भय, जिसे तुम आलोकित नहीं कर सकते, तुममें
उतनी शक्ति ही नहीं है. और तुम्हारे विचार भी – तुम्हारे नहीं हैं. ढूँढो, कम से कम
किसी एक विचार के बारे में ही बता दो, जो तुम्हारा हो, जिसे तुमसे
पहले किसी ने भी प्रकट न किया हो?’
ये, नया सम्गीन
स्पष्ट रूप से हावी हो चुका था, और वह, जो अपने
आपको असली, वास्तविक समझ रहा था, उसका ज़रा
भी विरोध नहीं कर रहा था, बल्कि सिर्फ थकावट से सोच रहा था:
‘क्या मैं
बीमार हो रहा हूँ, या ठीक हो रहा हूँ?’
ये ख़ामोश
बहस चलती रही. निपट शांति थी, और ये शांति, जैसे माँग
कर रही थी, कि इन्सान अपने बारे में सोचे. वह सोच भी रहा था.
वाइन पी रहा था, चाय पी रहा था, एक के बाद
एक सिगरेट फूँक रहा था, कभी कमरे में घूमता, मेज़ पे बैठता, उठकर फिर
से घूमने लगता; धीरे धीरे कपड़े उतारने लगा, कोट उतारा, जैकेट
उतारा,
टाई
की गाँठ खोली, कमीज़ की कॉलर का बटन खोला, जूते
उतारे.
विचार
नीरसता से अपने आप को दुहराते जा रहे थे, क्रमशः सुस्त होते जा रहे थे, - वो
मच्छरों के झुण्ड की तरह उड़ रहे थे, अपने खेल के लिए उन्होंने किसी ख़ाली जगह को
चुन लिया था, मगर ये जगह मुक्त नहीं थी, छोटी-छोटी
सीमाओं से घिरी हुई थी. फिर सम्गीन ने लैम्प बुझा दिया और बिस्तर पे लेट गया, - तब उसे और
ज़्यादा ख़ामोशी, सूनेपन और अपमान ने घेर लिया. अपमान की भावना
बढ़ती गई, और एक दूसरी भावना में बदल गई, जो न जाने
किसके प्रति भय के समान थी. अप्रिय रूप से, लहरों की
तरह लपकती हुई ऊँघ उस तक आई, मगर नींद नहीं आई, भीतर से
जैसे धक्के लग रहे थे, जो शरीर में कँपकँपी पैदा कर रहे थे. ये वीरान, गूँगी रात
बेहद लम्बी खिंचती रही, फिर सुबह की प्रार्थना का घण्टा बजने लगा, - तांबे का
घण्टा इतनी ज़ोर से गा रहा था, कि खिड़कियों के काँच कराहने लगे, इस आवाज़ ने
दाँत के दर्द की शुरूआत की याद दिला दी.
‘दो बजे तक
इंतज़ार करना है – मतलब सात घण्टे’, सम्गीन ने झल्लाहट से गिना. अभी अँधेरा ही था, जब उसने
उठकर हाथ-मुँह धोकर कपड़े पहनना शुरू किया; वह सब कुछ
बिना जल्दबाज़ी के करने की कोशिश कर रहा था और उसे एहसास हुआ कि वह जल्दी ही मचा
रहा है. इससे बड़ी चिड़चिड़ाहट हुई. फिर चाय ने गुस्सा दिलाया, जो काफ़ी
गरम थी, और सारी चिड़चिड़ाहट की एक ख़ास वजह थी: उसका नाम लेने
का इरादा नहीं था, मगर जब उसने गरम पानी से अपनी ऊँगली जला ली, तो अनचाहे
ही कटुता से सोचने लगा:
‘मैं ऐसा
बर्ताव कर रहा हूँ – जैसे इम्तिहान के पहले करते हैं. या – किसी आशिक जैसा’.
मुश्किल से
दोपहर तक समय काटकर सम्गीन ने कपड़े पहने और बाहर निकल गया.
मुलायम, चाँदी जैसे, दिन ने
उसका स्वागत किया. हवा में बर्फ की धूल चमक रही थी, जो टेलिग्राफ़
और टेलिफ़ोन के तारों पर गिर-गिरकर फ़ौरन जम रही थी, - इस धूल से
धुँधला सूरज झाँक रहा था. फिर नया हल्का-भूरा कोट, भूरी
रोँएदार टोपी पहने एक आदमी उसे पीछे छोड़कर निकल गया, टोपी इतनी कसी
हुई थी, कि उसके कान बदसूरती से बाहर दिखाई दे रहे थे.
वह खूब तेज़
चल रहा था, सिर झुकाए, जेबों में हाथ डाले, और उसकी
चाल ने सम्गीन को याद दिलाया कि वह इस आदमी को पहले भी होटल के कॉरीडोर में देख
चुका है, - उसकी झुकी हुई पीठ देख चुका है और काले, चिपके हुए
बालों वाला चपटा सिर देख चुका है.
‘शायद
दुन्याशा वाला संदेहास्पद व्यक्ति हो. जासूस जैसा – नहीं है. और फिर
संदेहास्पद व्यक्ति तो कल चला भी गया है...’
वह आदमी
नुक्कड़ तक गया, रुका और, झुक कर, पैर थोड़ा
ऊपर उठाकर, अपने गालोशों को ठीक करने लगा; ठीक कर
लिया,
टोपी
को और ज़्यादा खींचा और नुक्कड़ के पीछे छुप गया.
सुनसान सड़क
सम्गीन को मुख्य रास्ते पर लाई, - दो रास्तों का समकोण बनाते हुए चौक पर निकलीं; चौक से
नीली जाली से ढ़ँके, भूरे घोड़ों की जोड़ी बाहर लपकी; सूरज की
रोशनी में वे ऐसे चमक रहे थे, जैसे उन पर तेल की मालिश की गई हो, और वे अपने
पैर इतनी शान से, इतनी ख़ूबसूरती से फेंक रहे थे, कि उनकी
शानदार, तेज़ दौड़ को देखते हुए सम्गीन रुक गया. बक्से पर, हाथ फ़ैलाए, नीली चौकोर
सिरे वाली फ़र की टोपी पहने भारी-भरकम गाड़ीवान बैठा था, स्लेज में –
जनरल,
सबसे
चौड़े ओवरकोट में; नीली गोल टोपी से ढँके सिर को ऊदबिलाव की कॉलर
में छुपाए वह सीसे में ढले घण्टे जैसा लग रहा था. स्लेज के पीछे-पीछे काले ओवरकोट
और सफ़ेद दस्ताने पहने दो पुलिसवाले लाल घोड़ों पर तेज़ी से उछलते हुए जा रहे थे.
सम्गीन ने
देखा कि स्लेज के पीछे एक झाडू जैसी अग्नि शलाका का विस्फ़ोट हुआ, बिजली की
छोटी सी कड़क से हवा जैसे फट गई, बर्फ और हरे से धुँए का बादल उछला; चारों ओर
की हर चीज़ काँपने लगी, शीशे झनझनाने लगे, - सीने पर, चेहरे पर
हवा के धक्के से सम्गीन लड़खड़ाया, और कोने में दीवार से कस कर चिपक गया. उसने देखा
कि कैसे धुँए और बर्फ के पारदर्शी बादल में टोपी गोते खा रही थी; सबसे पहले
वो ज़मीन पर गिरी, और उसके पीछे एक दूसरे को पकड़ते हुए चिपटियाँ, भूरे और लाल
चीथड़े;
उनमें
से दो तो काफ़ी ऊँचे उड़ गए थे और, हल्के होने के कारण भयानक धीमी गति से नीचे
गिर रहे थे, इसलिए कि हमेशा के लिए दिमाग़ में रह जाएँ. सम्गीन ने
देखा,
कि
कैसे यहाँ-वहाँ बर्फ पर लाल धब्बे प्रकट हो गए हैं, - उनमें से
एक तो उसके करीब ही आकर गिरा, बर्फ से ढँके खम्भे की नींव पर, और ये इतना
अप्रिय था, कि वह दीवार से और भी कस कर चिपक गया.
उसने यह
नहीं देखा कि पतली टाँगों वाला काला घोड़ा कहाँ से उछलता हुआ आया और तेज़ी से नुक्कड़
पे रुक गया, - उसे सुदाकोव ने रोका था, बक्से के
पीछे से उछल कर, हाथों से कस के पकड़ लिया था; नुक्कड़ के
पीछे से भूरे ओवरकोट वाला एक आदमी उछल कर आया और स्लेज में कूद गया, - घोड़ा सम्गीन
की बगल से गुज़र गया, और देखा कि कैसे भूरे आदमी ने कंधों पर फ़र का
कोट डाल लिया और फर की टोपी पहन ली.
भूरे घोड़ों
की जोड़ी काफ़ी आगे निकल चुकी थी, और उनके पीछे, गाड़ीवान
बर्फ़ पर लुढ़क रहा था; लाल घोड़ों में से एक, अजीब ढंग
से गर्दन बाहर निकाले, तीन टाँगों पे चल रहा था और भर्रा रहा था, और चौथी
टाँग की जगह बर्फ पर खून की चौड़ी धार टिकी थी; दूसरा घोड़ा
भूरे के पीछे उछल रहा था, - सवार उसकी गर्दन से लिपटा था और चिल्ला रहा था; जब वो एक
किनारे से इश्तेहारों वाले खम्भे से टकराया, तो सवार
नीचे गिर गया, और वो खम्भे से चिपक कर कर्कश आवाज़ में
हिनहिनाने लगा.
दूसरा
पुलिस वाला, गंजा, बगैर टोपी के, बर्फ पे
बैठा था; उसके पैरों पर स्लेज का किनारे वाला डंडा पड़ा था, वह अपना
बिना दस्ताने, बिना हड्डी वाला हाथ हिला रहा था, - हाथ से खून
का फ़व्वारा निकल रहा था, - दूसरे हाथ से उसने अपना चेहरा ढाँक लिया था और
अमानवीय आवाज़ में चिल्ला रहा था, जो भेड़ की मिमियाहट जैसा था.
बहरा हो
चुका सम्गीन थरथराते पैरों पर खड़ा था, शिद्दत से वहाँ से जाना चाह रहा था, मगर नहीं
जा पाया, जैसे कोट की पीठ दीवार के साथ जम गई थी और हिलने नहीं
दे रही थी. वो आँखें भी बंद नहीं कर पा रहा था, - अभी तक
विस्फोट के उड़ रही सफ़ेद धूल और ऊन के टुकड़े नीचे गिर रहे थे; ज़ख़्मी
पुलिसवाले ने, चेहरा खोलकर रीछ की खाल का कम्बल ओढ़ लिया था; लोग नज़र
आने लगे, न जाने क्यों सब छोटे-छोटे थे, - वे अपने
अपने कम्पाऊण्ड से, घरों के दरवाज़ों से उछलकर आए और अर्धगोल बनाकर
खड़े हो गए; सम्गीन की बगल में कई लोग खड़े थे, और उनमें
से एक ने हौले से कहा:
“अब हमारे
यहाँ भी...”
किसी ने भी
भूरे और लाल चीथड़ों के आकारहीन ढेर के पास जाने की हिम्मत नहीं की, - वह खून से लथपथ
था,
और
खून से भाप निकल रही थी. ये सब बड़ा डरावना नज़र आ रहा था, जिसका
इन्सान से किसी भी तरह का साम्य नहीं था, जो कटा-फ़टा और – छोटा सा था. चीथड़ों के इस ढेर
में लोगों की आँखें गौर से कोई मानवीय चीज़ ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थीं, और सम्गीन
ने अपनी आँखें तभी बंद कीं, जब उसे फर के कम्बल के नीचे पीला गाल, कान और
उसकी बगल में खुली हुई हथेली नज़र आई. लोगों की आवाज़ें ज़ोर से गूँजने लगीं, दो लोग
पुलिसवाले के पास गए, उसके ऊपर झुके. हाथों में स्केट्स लिए एक ऊँची
महिला ने सम्गीन से पूछा:
“क्या आप
ज़ख़्मी हैं?”
उसने सिर
झटका,
दीवार
से दूर हटा और चल पड़ा; चलने में बेहद मुश्किल हो रही थी, जैसे रेत
पर चल रहा हो, लोग परेशान कर रहे थे; उसकी बगल
में सिर पर पट्टा बांधे एक आदमी चल रहा था, उसने एप्रन
पहना था, और आँख़ों पर चश्मा भी था, मगर वो
धुँधला था.
“वो ‘महामहिम’ थे,” उसने सम्गीन
की कोहनी पकड़कर हौले से कहा, और फुसफुसाया: “अपने गाल से खून तो पोंछ लो, नहीं तो
गवाह समझकर पकड़ लेंगे.”
जल्दी से
जेब से रूमाल निकाल कर सम्गीन ने उसे दाएँ गाल पे दबा लिया और एक तेज़, चुभता हुआ
दर्द महसूस करके, घबरा कर कॉलर ऊपर उठा लिया. गाल का दर्द तेज़
तो नहीं था, मगर वह पूरे बदन में फैल गया और सम्गीन को कमज़ोर कर
गया. चारों ओर देखते हुए, वह नुक्कड़ पे रुका; इश्तेहारों
वाले खम्भे के पास उखड़े पैर वाला घोड़ा पड़ा था, दस्ताने से
ओवरकोट की बर्फ झटकते हुए पुलिसवाला खड़ा था, दूसरे
पुलिसवाले को हाथों से पकड़कर ले जा रहे थे, और सड़क के
बीच में – टूटी-फूटी स्लेज पड़ी थी, चीथड़ों का लाल-भूरा ढेर सूरज की रोशनी में चमक
रहा था; किरणें उसमें से अधिकाधिक खून निचोड़ रही थीं. वो जैसे, पिघल रहा
था;
सम्गीन
को लगा कि आसमान, और बर्फ और खिड़कियों के काँच – सब कुछ चमक
रहा है, - चकाचौंध करते हुए, और बेशर्मी
से दमकते हुए. वह सावधानी पूर्वक जा रहा था, जैसे कड़ी
बर्फ पर चल रहा हो, - उसे ऐसा लग रहा था, कि अगर वह
तेज़-तेज़ चलेगा तो गिर पड़ेगा. हो सकता है, वह मरीना की दुकान से आगे भी निकल जाता, मगर वह
फुटपाथ पर खड़ी थी.
“क्या
गवर्नर को?” उसने हौले से पूछा और, सम्गीन के
कोट की बाँह पकड़कर, उसे दुकान के दरवाज़े में धकेल दिया. “ओय, ये क्या
हुआ है, तुम्हें? क्लीम – कहीं तुम तो...?”
उसकी भारी
फुसफुसाहट से, पीठ पर पड़ते धक्कों से, सम्गीन ने
अंदाज़ लगाया कि वह डर गई है और, शायद, उस पर शक
कर रही है. उसने जल्दी-जल्दी बुदबुदाकर कुछ कहा, और मरीना
ने उसे कमरे में धकेला, ज़ोर से और संजीदगी से कहने लगी:
“अच्छा, दिखाओ! ज़ख़म
में कुछ है...बैठो! “
वह ये
पूछते हुए कमरे के कोने में भागी:
“क्या बम
फेंकने वाला पकड़ा गया? नहीं?”
फिर उसने
यूडीकोलोन से उसका गाल जलाया, उसे नुकीले नाखून से ज़ोर से दबाया और पूरे
इत्मीनान से कहा:
“छोटा सा
लोहे का टुकड़ा घुस गया, - छोटी बात है! अगर आँख में...अच्छा, बताओ!”
मगर वह बोल
नहीं सका, गले में कोई गरम सूखी चीज़ घूम रही थी, जो साँस
नहीं लेने दे रही थी; मरीना भी परेशान कर रही थी, उसने गाल
के ज़ख्म पर गोल प्लास्टर चिपका दिया. सम्गीन ने उसे दूर धकेला, उछल कर खड़ा
हो गया, - उसका दिल चाह रहा था कि चीखे, वह डर रहा
था,
कि
औरतों जैसे सिसकियाँ लेने लगेगा. कमरे में घूमते हुए उसने सुना:
“ओय, कैसी चोट
लगी है! अच्छा, जल्दी से पी जाओ...और अपने आप पर काबू
रखो...ये तो अच्छा हुआ कि वो बदमाश मीश्का नहीं है, कहीं भाग
गया,
वर्ना...वो
अपनी कहानी बनाता. चल, बस हो गया, क्लीम, बैठो!”
सम्गीन
चुपचाप बैठ गया, आँख़ें बंद कर लीं, लम्बी साँस
ली और बताने लगा, बदहवासी से चाय की चुस्कियाँ लेते हुए, गिलास पर
दाँत किटकिटाते हुए. वह जल्दी-जल्दी बता रहा था, बगैर किसी
सिलसिले के, महसूस कर रहा था कि अनावश्यक बातें बता रहा है, और उसने
अपने आपको रोका, मगर देर हो ही गई.
‘सुदाकोव का
नाम नहीं बताना चाहिए था’. मरीना भँवे चढ़ाए, अपनी
विस्फ़ारित आँखों की पीली पुतलियाँ उस पर जमाए, ज़ुबान की
नोक होठों पर फेरते हुए सुन रही थी, - उसके गुलाबी चेहरे पर, जैसे भीतर
से,
ठण्डी
छाया आ गई.
“जब छोकरा
आयेगा – तब इसके बारे में कुछ मत कहना,” उसने आगाह किया.
और उसके
चेहरे से नज़र हटाए बिना, दोनों हाथों से अपने भूरे बालों को संभालती
हुए,
वह
दबी ज़ुबान में कहती रही:
“ओह –
कितना आघात पहुँचा है तुम्हें! ये – उम्मीद नहीं थी! तुम तो ऐसे थे...कितने
संतुलित. तुम्हारा क्या होने वाला है, आँ?”
सम्गीन ने
कंधे उचका दिए, - उसका लहज़ा उसे बुरा नहीं लगा, और वह
कठोरता से, किसी बड़े की तरह उससे सवाल करती रही:
“क्या बीबी
से – हमेशा के लिए रिश्ता ख़त्म हो गया? दुन्याशा के साथ – क्या गंभीरता से ले रहे हो? कैसे और
कहाँ रहने के बारे में सोच रहे हो?” वह उसे संक्षेप में जवाब देता रहा, खुलकर, और इस
साफ़गोई पर उसे ख़ुद को भी कुछ आश्चर्य हुआ, धीरे-धीरे
वह शांत हो रहा था.
“अपने ही
उद्देश्य की ओर जा रहे हो ना?” उसने सोच में डूबकर पूछा और फ़ौरन ये कहते हुए
हँस पड़ी: “तो, उससे सिर्फ चीथड़ों का ढेर ही बचा? और था वो बड़ा...कमीना.
वे तीन हैं: ये, कुलीनों का ज़िला-अध्यक्ष, और सरकारी
ज़मीनों का मैनेजर – किशोरियों को बर्बाद करना उन्हें अच्छा लगता था. बिशप ने
पीटर्सबुर्ग में उसके बारे में शिकायत भेज दी, - उससे
मिशनरी-स्कूल की स्टूडेण्ट को छीन लिया था, और वह उसे
अपने लिए रखना चाहता था. अब वो लड़की – यहाँ की सबसे महँगी तवायफ़ है. लो, ये आ गया, बदमाश!” वह
उठी,
दुकान
में गई, और वहाँ से उसके कड़े सवाल सुनाई दे रहे थे:
“तू – क्या
– बदमाश, भूल गया, कि दुकान बंद करना चाहिए? और तुझे
क्या करना था? ठीक है – नहीं पकड़ा, तो – तुझे
इससे क्या?”
वापस आकर
उसने दबी ज़ुबान में कहा:
“किसी को
नहीं पकड़ा. तुम, क्लीम इवानोविच, होटल के अपने
कमरे में जाओ, वहाँ नज़र आओ...”
सम्गीन उठा
और आश्चर्य से पूछने लगा:
“कहीं तुम
ये तो नहीं सोच रही हो...”
“कुछ भी
नहीं सोच रही हूँ, मगर – नहीं चाहती, कि दूसरे
सोचें! अरे, ठहरो, मैं तुम्हारे ज़ख़्म पर पावडर लगा देती हूँ...”
और अपनी
गरम ऊँगली से उसके गाल पे पावडर डालते हुए उसने कहा:
“अगर
उकताहट होने लगे, तो मेरे घर पे आ जाना, करीब छह
बजे. ठीक है?”
और – उसने
गहरी साँस ली.
“चरमरा रही
है हमारी ज़िंदगी ऊपर से नीचे तक.”
वह ख़ामोश
हो गई,
जैसे
कुछ सुन रही हो, सीने पर पड़ी हुई घड़ी की चेन से खेलती रही, फिर दृढ़ता
से बोली:
“तो – कोई
बात नहीं! जब बुरी ज़िंदगी से उकता जाएँगे – तो अच्छी ज़िंदगी जीने लगेंगे! करने दो
विद्रोह, सारा जुनून सामने आ जाए! मालूम है, बूढ़े लोग
क्या कहा करते थे? ‘जब तक गुनाह नहीं करोगे – पश्चात्ताप नहीं
होगा,
जब
पश्चात्ताप नहीं होगा – तो अपने आपको बचा न सकोगे’. इसमें, मी दोस्त, बड़ा ज्ञान
छुपा है. और – ऐसी मानवता, इसके जिसी कोई और, ढूँढ़ने पर
भी नहीं मिलेगी...तो...शाम को मिलेंगे?”
सम्गीन
बिना जल्दबाज़ी किए, टहलने वाले की चाल से, इस औरत के
बारे में सोचते हुए जा रहा था.
“ये तो हो
नहीं सकता कि उसने मुझे आतंकी हमले में शामिल मान लिया हो. ये – या तो मेरे बारे
में चिंता प्रकट कर रही थी, या – अपने लिए कोई ख़तरा नहीं मोल लेना चाहती, - ख़तरा, जो सुदाकोव
के बारे में बता कर मैंने पैदा किया है. मगर उसने हत्या को कितनी शांति से लिया!’ उसने अचरज
से सोचा, ये महसूस करते हुए, कि मरीना
की शांति उस तक पहुँच गई है.
शहर में
मातमी सन्नाटा था, स्केटिंग रिंग पर म्यूज़िक नहीं बज रहा था, पैदल चलने
वाले इक्का-दुक्का ही थे, उनसे कहीं ज़्यादा तो किराए की और ‘अपनी ख़ुद
की गाड़ियाँ’ थीं; वे सभी दिशाओं में हट्टे-कट्टे और चिंतित
लोगों को ले जा रही थीं, और सम्गीन ने गौर किया कि लगभग सभी जाने वाले
सिकुड़ कर, अपने ओवरकोट्स की कॉलर्स से चेहरे छुपाए बैठे हुए थे, हालाँकि
ठण्ड नहीं थी. जहाँ गवर्नर को उड़ाया था, उस जगह के सामने वाले घर की खिड़की को नीले रंग
का तकिया ठूँस कर बंद किया गया था, प्लास्टर का एक हिस्सा उखड़ गया था, ईंट का लाल
माँस अप्रियता से झाँक रहा था, और सड़क के बीच में विस्फ़ोट के कोई लक्षण नहीं
बचे थे, सिर्फ बर्फ की सतह और ज़्यादा ताज़ी, ज़्यादा
सफ़ेद हो गई थी, और टीले जैसी ऊपर उठ गई थी. सम्गीन ने इस टीले
पर नज़र डाली और आगे बढ़ गया.
वेस्टिब्यूल
में उसका स्वागत सेबों और सूखे कुकुरमुत्तों की घरेलू और सुकून देती ख़ुशबू ने किया, और
ख़ुशमिजाज़, प्यारी बूढ़ी मालकिन ने दयनीय और आपराधिक भाव से कहा:
“आपने सुना, कितनी भयानक घटना हुई है? धरती पर ये
हो क्या रहा है? हमारा शहर कितना शांत था, हम लोग
किसी को भी दुख पहुँचाए बिना रहते थे...”
“हाँ, कठिन समय
है,”
सम्गीन
ने हाँ में हाँ मिलाई. अपने कमरे में आकर वह सोफ़े पर लेट गया, सिगरेट पी
और फिर से मरीना के बारे में सोचने लगा. वह अपने आप को बेहद अजीब महसूस कर रहा था; ऐसा लग रहा
था,
कि
सिर गर्म कोहरे से भर गया है और कोहरा शरीर में कमज़ोरी का ज़हर फ़ैला रहा है, जैसे
गरम-गरम गुसलखाने से निकलने के बाद होता है. उसने मरीना को अपने सामने इतनी
स्पष्टता से देखा, मानो वह मेज़ के पास वाली आरामकुर्सी में बैठी
हो.
‘उसके कोई
बच्चे क्यों नहीं हैं? वह ऐसी औरत जैसी लगती ही नहीं है, जिसकी
भावना को तर्क ने दबा दिया हो, हाँ और – क्या ऐसी औरतें होती हैं? अपने जिस्म
को बिगाड़ना नहीं चाहती, दर्द के सामने हार मान गई है? बात वह
अपने ही अंदाज़ में करती है, मगर इसका ये मतलब भी नहीं हुआ कि वह वैसा ही
सोचती है. कह सकते हैं, कि वह उन औरतों में से किसी के भी जैसी नहीं
है,
जिन्हें
मैं जानता हूँ’.
इस सबसे, जो वह सोच
रहा था, मरीना और ज़्यादा अगम्य होती जा रही थी, और सबसे
ज़्यादा समझ में न आने वाली बात थी आतंक वाली घटना के प्रति उसका रवैया.
चमकदार
चाँद वाली शाम को वह एक मंज़िला घरों की दो कतारों के बीच से गुज़रती चढ़ाव वाली सड़क
पर जा रहा था, घरों को लम्बी-लम्बी बागड़ें अलग कर रही थीं; बर्फ से
लदे,
पेड़ों
के घने समूह इन घरों को और भी ज़्यादा अलग कर रहे थे, जैसे
उन्हें बर्फ के टीलों में छुपाया गया हो.
ज़ोतोवा का
घर भी एक मंज़िला ही था, उसकी पाँच खिड़कियों के पल्ले बंद थे, दो
खिड़कियों की झिरी से प्रकाश के पट्टे बाहर आकर रिबन्स की तरह घर की घनी छाया पर पड़
रहे थे. पोर्च नहीं था. सम्गीन ने गेट के पास घण्टी का हैण्डिल खींचा और – काँप
गया: घण्टी – बड़ी और स्पष्ट थी, उसने चार बार काफ़ी तेज़ घण्टे बजाए, जो बर्फ
में दबी इस ख़ामोशी के लिए काफ़ी थे. जैकेट पहने, एक चौड़े
कंधों वाले आदमी ने गेट खोला, सिर पर काले बालों की टोपी थी; उसका चेहरा
घनी,
चौड़ी
दाढ़ी से ढँका था, और उससे धुँए की गंध आ रही थी. चुपचाप एक तरफ़
हटकर उसने मेहमान को लकड़ी के पुलों से पोर्च की दो सीढ़ियों तक छोड़ा, जो घर की
दीवार में बिठाई हुई अलमारी जैसा था. जंज़ीर खनखनाते हुए, तंदुरुस्त भेड़ जितना ऊँचा, काला
कुत्ता भौंकने लगा. संदूकों से अटे प्रवेश कक्ष में, एक बड़ी-बड़ी
आँखों वाली, ऊँची और दुबली-पतली औरत ने सम्गीन की कोट उतारने में
मदद की.
“समय के
पाबंद हो,” मरीना ने दरवाजे के प्रकाशित चौकोर से बाहर झाँकते
हुए कहा, जैसे वह किसी फ्रेम के भीतर से देख रही हो. “समोवार
देना,
ग्लाफ़िरूश्का.”
बड़े कमरे में पेंट किए गए फ़र्श पर सलीब की
शक्ल में रास्ते बनाते हुए काले कार्पेट्स पड़े थे, मुड़ी हुई
टाँगों वाली पुरानी कुर्सियाँ, उसी तरह की दो मेज़ें रखी थीं; उनमें से
एक पर ताँबे का भालू था, जिसने अपने पंजों में लैम्प का डंडा पकड़ा था; दूसरी पर
काला म्यूज़िक बॉक्स रखा था; दीवार के पास, दरवाज़े के
निकट,
कवर
चढ़ा हुआ ऑर्गन था, कोने में – कुज़्नेत्सव फ़र्म की शोख़ टाइल्स
वाली भट्टी, भट्टी की बगल में – सफ़ेद दरवाज़े; सम्गीन ने
सोचा कि ये दरवाज़े बाहर ठण्ड में, बर्फ से ढँके टेरेस पर जाते होंगे. गहरे लाल
और सुनहरे वॉलपेपर चिपका कमरा शानदार, मगर ख़ाली नज़र आ रहा था, दीवारें
ख़ाली थीं, सिर्फ सामने वाले कोने में छोटे से सलीब पर चाँदी का
आइकन चमक रहा था और खिड़कियों के बीच वाली दीवार पर तीन उँगलियों वाले तांबे के पंजों
जैसे ब्रेकेट्स बदसूरती से बाहर निकल रहे थे.
“क्या –
उबाऊ है कमरा?” मरीना ने पूछा, प्रवेश
कक्ष से निकलकर वह कार्पेट्स की क्रॉसिंग पर रुक गई थी; काश्मीरी
शॉल के हुड में वह और भी बड़ी, ऊँची और चौड़ी नज़र आ रही थी, सीने पर दो
मोटी चोटियाँ पड़ी थीं. “मेरे शौहर की पसंद है, उसे खुलापन
पसंद था, न कि चीज़ें,” दीवारों की ओर देखते हुए उसने कहा. “म्यूज़िक
पसंद था, - उसके पास सात ऐसे म्यूज़िक बॉक्स थे, कभी-कभी
रातों को भी उठकर बजाया करता. ऑर्गन बजाता था. मगर ग्रामोफ़ोन और एकॉर्डियन उससे
बर्दाश्त नहीं होते थे. ‘खोवान्शिना’ ऑपेरा बहुत
पसंद था, जान बूझ कर राजधानी जाता था, सुनने के
लिए.
सम्गीन ने
ग़ौर किया कि अपने शौहर के बारे में वह बेहद अमीर बुर्जुआ घराने की लड़की के समान
बात कर रही है, जो शादी से पहले किसी दूर दराज़ की काऊन्टी में
रहती थी, और सौभाग्य से जिसकी शादी प्रांतीय शहर के एक अमीर
व्यापारी से हो गई हो और अब कृतज्ञता के साथ, गर्व के
साथ वह अपनी सफ़लता के बारे में सोच रही है. वह ध्यान से सुनने लगा: उसकी बातों में
कोई छुपा हुआ व्यंग्य तो नहीं है?
सफ़ेद
दरवाज़े एक छोटे कमरे में जाते थे, जिसकी खिड़कियाँ सड़क पर और बाग में खुलती थीं.
यहाँ वो रहती थी. कोने में, फूलों के बीच स्टैण्ड पर बिना फ्रेम का एक बड़ा
आईना रखा था, - ऊपर की ओर लकड़ी का ड्रैगन कत्थई पंजों से उसका आलिंगन
कर रहा था. मेज़ के पास तीन आराम कुर्सियाँ थीं, दरवाज़े के
पीछे कई सारे रंगबिरंगे कुशन्स वाला चौडा तख़्त, उसके ऊपर, दीवार पर, - महँगा
रेशमी कालीन, आगे – अलमारी, किताबों से
खचाखच भरी हुई, उसकी बगल में – नेस्तेरोव की तस्वीर ‘जादूगर के
पास’
की
एक अच्छी प्रतिकृति.
छोटी सी
अण्डाकार मेज़ पर निकल का समोवार खौल रहा था; लैम्प के
चौड़े,
लाल
शेड के नीचे – चीनी मिट्टी की क्रॉकरी, काँच के फूलदान और सुराहियाँ रखी थीं.
“ये – मेरा
दिन का बसेरा है, और वहाँ – शयन कक्ष,” मरीना ने
हाथ से अलमारी की बगल में एक आसानी से न दिखाई देने वाले सँकरे दरवाज़े की तरफ़
इशारा किया. “व्यापार के अपने काम मैं दुकान में करती हूँ, और यहाँ
मालकिन की तरह रहती हूँ. बुद्धिमानी से.” वह अलसाएपन से हँसी और आवाज़ में उतार
चढ़ाव लाए बिना कहती रही: “और, समाज-सेवा का काम, वहीं, शहर में, करती हूँ, और यहाँ
मेरे पास लोग सिर्फ नए साल पे, और ईस्टर पे आते हैं, हाँ और, बेशक, मेरे जनम
दिन पे भी.”
सम्गीन ने
पूछ लिया: समाज-सेवा से उसका क्या मतलब है?
“देखो, मैं ‘अनाथ
लड़कियों की सेवा कमिटी’ की उपाध्यक्ष हूँ, - हमारा
स्कूल,
अच्छा
ही है,
कामयाब
स्कूल है, बढ़िया सिलाई-कढ़ाई सिखाते हैं, लड़कियों की
शादियाँ करवाते हैं, प्रलोभनों से उन्हें बचाते हैं. जेल कमिटी की
सदस्य हूँ, महिला-विंग पूरी मेरे हाथों में है.” घनी भौंहों को
थोड़ा उठाकर, वह फिर से और कड़वाहट से हँसी.
“मतलब, उस तरह के
लोग,
जैसे
तुम,
और
कुतूज़ोव, और अल्योशा गोगिन, राज्य को
नष्ट करने पर तुले हो, मगर मैं – उसकी दरारों को भरती हूँ, - तो, मतलब ये
हुआ कि हम एक दूसरे के विरोधी हैं और अलग-अलग राहों पर चल रहे हैं.”
कुछ कहने
के लिए सम्गीन ने याद दिलाया:
“सभी
रास्ते रोम की तरफ़ ही ले जाते हैं. क्या सिगरेट पी सकता हूँ?”
“पियो. मैं
भी पीती हूँ, पढ़ते हुए.”
कुछ देर
चुप रह कर, प्यालों में चाय डालते हुए, उसने अचानक
पूछ लिया:
“कौन से
वाले रोम की तरफ़?”
“भविष्य
में,”
क्लीम
ने कंधे सिकोड़कर जवाब दिया.
“मगर, ये एकदम
सही जवाब नहीं है! मैंने सोचा, कि तुम कहोगे: “कब्र में. आँखों से तो तुम
निराशावादी लगते हो.”
सम्गीन
इंतज़ार कर रहा था, कि वह कब उससे पूछना शुरू करेगी, और वह भी
उससे पूछेगा: रहती कैसे हो?
‘मैं पैंतीस
साल का हूँ, ये – मुझसे करीब तीन-चार साल छोटी है’, उसने हिसाब
लगाया,
मगर
मरीना बड़ी ख़ुशी से बेहद सुगन्धित चाय पी रही थी, घर के बने
बिस्किट्स खा रही थी, चमकदार होठों को बारबार टिशू पेपर से पोंछ रही
थी,
जिससे
होंठ और भी चमकदार हो रहे थे, और आँख़ें बेतहाशा चमक रही थीं.
“यहाँ, दूर, शहर की
सीमा पर अकेले रहने में डर नहीं लगता?”
“यहाँ कहाँ
की सीमा हुई? बगल में ही – कुलीन लड़कियों की संस्था है, आगे –
पहाड़ी पे – सेना के गोदाम हैं, वहाँ चौकीदार होते हैं. और फिर मैं – अकेली
नहीं हूँ, - चौकीदार है, नौकरानी है, खाना बनाने
वाली है. बाहर आऊट हाउस में – सुनार रहते हैं, दो भाई, एक की –
शादी हो गई है, उसीकी बीबी मेरी नौकरानी है. मगर, औरत की
दृष्टि से – अकेली हूँ,” - अप्रत्याशित रूप से और बिल्कुल सीधे-सादे ढंग
से मरीना ने जोड़ा.
“उकताहट होती है?” सम्गीन ने
उसकी तरफ़ देखे बगैर कहा.
“अभी तक तो
नहीं. कई लोग पीछे पड़े रहते हैं, क्योंकि हम – दौलतमंद औरत हैं और अन्य कई
योग्यताएँ भी हैं. इसलिए प्यार जताते हैं – चिढ़ होती है! वैसे – अच्छी तरह ही रहती हूँ! पढ़ती हूँ. अंग्रेज़ी सीख रही हूँ, इंग्लैण्ड
जाने की इच्छा है...”
“इंग्लैण्ड
ही क्यों?”
वह हँस पड़ी, मज़बूत, कसकर चिपके
हुए दाँत चमक उठे, और आँखों में विनोदपूर्ण चमक आ गई.
“पता है, मेरा शौहर
दो बार वहाँ गया था, पाँच साल से कुछ ऊपर वहाँ रहा और अंग्रेज़ों के
बारे में बड़ी दिलचस्प बातें बताया करता था. मेरे दिमाग़ में ये बात बैठ गई कि
अंग्रेज़ – सबसे मज़ेदार, सरल और यकीन करने लायक लोग होते हैं.
ब्लावात्स्काया पर यकीन किया और ऐनी बीसन्ट पर भी, और
राजकुमार प्योत्र क्रोपोत्किन, रूरिक वंश का, और नीत्शे, फ्रेडरिक –
अंग्रेज़ों पर प्रभाव नहीं डाल पाए, हालाँकि हमारे यहाँ फ्रेडरिक को, दोस्तोयेव्स्की
के बाद भी पैगम्बर समझा जाता था. और उनके वैज्ञानिक, क्रुक्स, मिसाल के
तौर पर, ऑलिवर लोज – और क्या बस ये ही दो? – साठ साल
नास्तिक की तरह रहते हैं और – ख़ुदा में यकीन करने लगते हैं. हालाँकि, यहाँ शायद
एक अनुशासित विधि की आदत का भी योगदान है, और – चर्च
के ख़ुदा के मुकाबले ज़्यादा संगठित, अनुशासित विधि और कहाँ है? सही है ना?”
“अजीब मज़ाक
करती हो तुम,” सम्गीन ने कुछ तैश से कहा, मगर अनचाहे
ही वह उसकी शोखी और विद्वत्ता को सराह रहा था.
“अजीब -
क्यों?”
उसने
फ़ौरन भँवे उठाकर कहा. “और मैं मज़ाक कर भी नहीं रही हूँ, ये तो मेरा
अंदाज़ है, बड़े-बड़े ज्ञानी लोगों के बारे में इस तरह बात करती
हूँ,
जैसे
कोई घरेलू बात कर रही हूँ. मुझे ऐसे लोगों में बेहद दिलचस्पी है, जो रूह की
आज़ादी ढूँढ़ते रहे, ढूँढ़ते रहे और जैसे – उसे पा भी लिया, मगर ये
आज़ादी तो निकली उद्देश्यहीनता, कोई इन्द्रियातीत ख़ालीपन. बस ख़ालीपन, और – उसमें
कोई भी ऐसा बिन्दु नहीं है, जहाँ इन्सान सहारा पा सके, सिवाय उसकी
कल्पना के.”
“कहीं
तुम... मैंने सोचा था कि तुम – ख़ुदा में यकीन करती हो,” सम्गीन ने
अविश्वास से उसके चेहरे को, काली गहरा गईं आँखों को देखते हुए कहा, वह कहती
रही,
आसानी
से शब्दों को जोड़ते हुए:
“अफ़सोस होता है, जब इन्सान
अपनी रूह को, जो कि ब्रह्माण्ड की शुरूआत है, नज़र अंदाज़
करते हुए या उसे चोट पहुँचाते हुए, सारा ध्यान अपने जिस्म और बुद्धि पर केंद्रित
करता है. अरस्तू ने ‘राजनीति’ में कहा था, कि समाज से
बाहर मनुष्य – या तो ख़ुदा होता है या जानवर. ख़ुदा जैसे लोगों को तो मैंने नहीं
देखा है, मगर उनके बीच जानवर – या तो छोटे चूहे फिर बिज्जू, जो सिर्फ दुर्गंध से ही अपनी ज़िंदगी की और अपने
बिल की हिफ़ाज़त करते हैं.”
जितनी सहजता
से वह बोल रही थी, उससे सम्गीन ने अनुमान लगाया कि वह अक्सर इस
तरह के भाषण देती है, और उसने महसूस किया कि उसके शब्दों में कुछ
ऐसा है, जिसने उसे संदेहास्पद ढंग से सतर्क हो जाने पर मजबूर
किया.
“क्या तुम बहुत पढ़ती हो?” उसने पूछा.
“मैं काफ़ी पढ़ती हूँ,” उसने जवाब
दिया और लम्बी चौड़ी मुस्कुराहट बिखेर दी, आँखों की पीली पुतलियाँ और ज़्यादा चमकदार हो
गईं – मगर अरस्तू से, वैसे ही जैसे मार्क्स से, - सहमत नहीं
हूँ: और बुद्धि पर समाज के, और चेतना पर जीवन के दबाव को नहीं नकारती, मगर मेरी रूह
– सीमाओं में नहीं बंधी है, रूह – ज़मीनी ताकत नहीं है, बल्कि –
ब्रह्माण्ड की है, कह सकते हैं.”
वह शांति
से बोल रही थी, किसी उपदेशकर्ता की तरह नहीं, बल्कि ऐसे
इन्सान के दोस्ताना लहज़े में, जो अपने आपको सुनने वाले से ज़्यादा अनुभवी
मानता है, मगर जिसे इस बात में दिलचस्पी नहीं है कि सुनने वाला
उससे सहमत है या नहीं. उसके ख़ूबसूरत, मगर कुछ भारी चेहरे की रेखाएँ कुछ और पतली, स्पष्ट हो
गईं.
“अख़बारों और पत्रिकाओं के हमारे अरस्तू, छोटे-मोटे
तानाशाह और अत्याचारी, समाज को करीब-करीब ख़ुदा बना देते हैं, ये माँग
करते हैं कि मैं बिना ना-नुकर किए मुझ पर शासन करने के उसके अधिकार को मान लूँ,” सम्गीन सुन
रहा था.
ये तो उसे
कब से मालूम था और बहुत कुछ याद दिला सकता था, मगर उसने
यादों को परे धकेल दिया और ख़ामोश रहा, इस इंतज़ार में कब मरीना अपने विचारों का सार
स्पष्ट करेगी. उसकी एक जैसी, रसीली आवाज़ उसके भीतर कुछ ऐसी अवस्था पैदा कर
रही थी, जो हल्की सी ऊँघ के समान थी, जो गहरी
नींद का, ख़ूबसूरत सपने देखने का पैग़ाम लाती है, मगर फिर भी
अविश्वास उसे बीच बीच में धक्का दे ही देता था. और आश्चर्य हो रहा था कि जैसे उसे
अपनी बात ख़त्म करने की जल्दी पड़ी थी.
‘इसे बात
करना पसंद है, और आता भी है’, जब वह चुप
हो गई,
और
उसने पैर फ़ैलाकर, सीने पर हाथ रख लिए, तो सम्गीन
ने सोचा. वो भी ये कल्पना करते हुए चुप था:
‘इसने कहा
क्या था? असल में – कुछ भी मौलिक नहीं था’.
और उसने
पूछा:
“ ‘रूह’ शब्द से
तुम्हारा क्या मतलब है?”
“ये उसे
नहीं समझाया जा सकता, जिसके भीतर वह जाग न चुकी हो,” उसने पलकें
नीची करते हुए कहा. “और – जब जाग जाएगी, तब किसी स्पष्टीकरण की ज़रूरत ही न रहेगी.”
वह कुछ और
नहीं पूछ पाया, - मरीना फिर से बोलने लगी:
“क्या तुम
जानते हो, कि लीदिया वराव्का यहाँ रहती है? नहीं? वो – याद है? – पीटर्सबुर्ग
में मेरी बुआ के यहाँ रहती थी, हम दोनों फिलॉसोफ़िकल सोसाइटी के भाषण सुनने
जाया करते थे, वहाँ बिशप्स और पादरी सीज़रोकैथोलिज़्म की
शिक्षा दिया करते थे, - थी एक ऐसी धार्मिक-विनोदी सोसाइटी. वहीं मैं
अपने शौहर, मिखाइल स्तेपानोविच से मिली थी…”
उसने पहली
बार अपने शौहर का नाम लिया और फिर से प्रांतीय व्यापारी की बीबी बन गई.
“हूँ – और, लीदिया के
बारे में क्या?” सम्गीन ने पूछा.
“आज
पीटर्सबुर्ग से आई है, और बम के हमले में आते-आते बची; कहती है, कि
आतंकवादी को देखा है, वो भूरे घोड़े पर जा रहा था, फर का ओवरकोट
और फर की टोपी पहने. ख़ैर, ये, शायद, उसकी
कल्पना है, न कि आतंकवादी. और समय भी तो इतना नहीं था, कि वह
विस्फ़ोट होते ही सही-सलामत उछल जाती. गवर्नर तो उसके शौहर का चचा था. मैं उसके
यहाँ गई थी, - पड़ी है, बीमार है, थक गई है.”
मरीना ने
पोर्टवाइन का जाम उठाया, एक घूँट पिया और काँच पर ऊँगलियाँ बजाते हुए
आगे बोली:
“वो बुरी
इन्सान नहीं है, मगर टूट चुकी है और बेहद बुरी हालत में है.
उदासी भरी ज़िंदगी जीती है, और उदासी के कारण लोगों को धार्मिक-नैतिक
शिक्षा देती है, - एक ग्रुप बनाया है. धोखा देते हैं उसे. उसकी
शादी हो जानी चाहिए. एक दुख भरी घड़ी में तुमसे प्यार के बारे में बताया था.”
“कल्पना कर
सकता हूँ, कि उसने क्या बताया होगा,” सम्गीन
बुदबुदाया.
“बहुत
अच्छा बताया, - तुम ग़लत हो,” मरीना ने कुछ सख़्ती से विरोध किया. “दिल छू
देने वाला रोमान्स, और दोषी कोई भी नहीं. दोषी किसी का भी नहीं था, सिवाय आपकी
जवानी के, - ये वह अच्छी तरह समझती है.”
“अजीब बात
है,
कि
न उसके, न तुम्हारे कोई बच्चे हैं,” स्वयम् के
लिए भी अप्रत्याशित और जैसे आह्वान देते हुए सम्गीन बोल पड़ा. मरीना ने फ़ौरन पुश्ती
जोड़ी:
“और
तुम्हारे भी नहीं हैं.”
कुछ देर
ख़ामोश रहे. फिर उसने पूछा:
“क्या
तुम्हें ऐसा नहीं लगता, क्लीम सम्गीन, कि बच्चे –
अपने माँ-बाप के लिए सबसे ज़्यादा पराए होते हैं?”
लीदिया के
बारे में उसने उसके प्रति सहानुभूति के किसी लक्षण के बगैर बताया था, उतनी ही
बेदर्दी से ये बच्चों वाला वाक्य भी कह गई, मगर यह
वाक्य किसी भावना की माँग तो करता था: चाहे आश्चर्य की, या दुख की, या फिर
व्यंग्य की.
“जैसे –
मेरे पड़ोसी और परिचित मुझसे कभी नहीं कहते कि मैं उस तरह से नहीं जीती हूँ, जैसे जीना
चाहिए,
मगर
बच्चे,
शायद, कह देते.
तुम तो सुनते हो ना, कि कैसे आजकल बच्चे अपने बाप पे चिल्लाते हैं –
ऐसे नहीं, बस – ऐसे नहीं! और मार्क्सिस्टों ने जनवादियों का
पत्ता कैसे साफ़ किया था? ख़ैर – वो पॉलिटिक्स है! मगर डेकडेन्ट्स
(ह्रासवादी)? डेकडेन्ट्स तो – रोज़मर्रा की ज़िंदगी है! वो अपने बाप
से चिल्लाकर कहते हैं: तुम वैसे घरों में नहीं रहते हो, वैसी
कुर्सियों पे नहीं बैठते हो, किताबें भी वो नहीं पढ़ते जो पढ़नी चाहिए! और
ग़ौर करने वाली बात ये है, कि नास्तिक-माँ बाप के बच्चे – पादरी हैं...”
सम्गीन ने
सोचा कि ये सब कुछ तैश से, कड़वाहट से, चिंता से
कहना चाहिए था, मगर उसने ऐसे कहा था, जैसे
अनचाहे किसी को चिढ़ा रही हो, और कहने के बाद – उबासी लेने लगी:
“ओय, माफ़ करना!”
घबराहट से
हाथ मलते हुए, ऊँगलियाँ चटकाते हुए, सम्गीन उठ
गया.
“दिलचस्प
इन्सान हो तुम...”
“थैन्क्स,” उसने
मुस्कुराते हुए कहा.
“मगर – मैं
तुम्हें समझ नहीं पाता हूँ...”
“ज़्यादा
बात करेंगे – तो समझ जाओगे!...लीदिया के पास तो जाओ, मैंने उससे
कह दिया है कि तुम यहाँ हो. तंदुरुस्त रहो...”
चाँद की
चुभती हुई ठण्डी चमक में, कुरकुराती ख़ामोशी में बागडों और दीवारों की
लकड़ी चरमरा रही थी, मानो छोटे छोटे, ख़ामोश घर
ज़मीन में पक्के जमना चाह रहे थे, उससे अधिकाधिक चिपक रहे थे. बर्फ चेहरे में
चुभ रही थी, साँस लेना मुश्किल बना रही थी, बदन को
सिकोड़ने पर, छोटा होने पर मजबूर कर रही थी. जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते
हुए,
सम्गीन
निष्कर्ष निकाल रहा था:
“चर्च के
सामान का व्यापार करती है और प्रचलित धार्मिक रिवाजों पर शक करती है, उन्हें
नकारती है. डींग मारती है कि बहुत पढ़ती है. खूब जमकर खाती और पीती है. मगरूर है.
झूठ बोलती है, कि ‘औरत के अर्थ में – अकेली है’, शायद – कोई
आशिक है...’
इसके अलावा
उसे कुछ और नहीं मिला, हो सकता है – इसलिए, कि जल्दी
में ढूँढ़ रहा था. मगर इसने न तो औरत को छोटा बनाया, न ही उसकी
निराशा के भाव को कम किया; वह बढ़ता ही गया और उसे उकसा रहा था: उसने बीस
साल तक ज़िंदगी के एक बड़े हिस्से के बारे में सोचा था, कई तरह के
अनुभवों को झेला था, काफ़ी लोगों को देखा था और काफ़ी किताबें पढ़ी
थीं,
बेशक
मरीना से ज़्यादा; मगर वह निर्णय लेने के आत्मविश्वास को, उस आंतरिक
संतुलन को नहीं हासिल कर पाया था, जो इस भारी-भरकम, खाती-पीती
औरत के पास है.
‘अगर उसने
वो किताबें नहीं पढ़ी हैं, जो मैंने पढ़ी हैं, - तो इससे
कुछ भी स्पष्ट नहीं होता. रूह के बारे में उसके शब्द – किसी बचकानी बकवास जैसे ही
हैं...’
आखिरकार
उसे मानना ही पड़ा कि मरीना उसके प्रति दिलचस्पी जगा रही है, जैसी आज तक
किसी और औरत ने नहीं जगाई थी, और ये – दिलचस्पी, उसमें अप्रिय
रूप से चिड़चिड़ाहट पैदा कर रही है.
दूसरे दिन
वह लीदिया के घर गया.
वह दो
रास्तों के कोने में बने एक दोमंज़िला मकान में रहती थी, जिसका कोना
एक पुराने, जर्जर चर्च द्वारा काटा गया था; उसमें
भाषण-मंच के सामने एक ‘नन’ डोल रही थी – उसकी काली आकृति के ऊपर, जो लगता था, लकड़ी से
बनाई गई है, चाँदी के लैम्प में छुपाई गई लाल लौ थरथरा रही थी.
चर्च लीदिया के मकान की दीवार से सटा था, उसकी निचली मंज़िल पर एक ‘स्टेशनरी
और हैण्डिक्राफ्ट्स’ की दुकान थी; दुकान के
दरवाज़े की बगल में पत्थरों की तीन सीढ़ियाँ, उनके ऊपर –
दलदली ओक का, बिना हैण्डल वाला, दरवाज़ा, दरवाज़े के
बीच में ताँबे की नेम प्लेट जिस पर काले अक्षरों में लिखा था: ‘एल. टी.
मूरोम्स्काया’.
सम्गीन ने
अपने आप से सवाल करते हुए घण्टी बजाई:
‘ये मैं छोटी
छोटी तफ़सीलों में अपना दिमाग़ क्यों ख़राब करता हूँ?’
दरवाज़ा
अधेड़ उम्र की नौकरानी ने खोला, जिसने सिर पर सफ़ेद स्कार्फ़ बांधा था और
स्टार्च लगा एप्रन पहना था; उसका चेहरा पीला, लम्बा था, और होंठ
इतने पतले, कि जैसे मुँह सिला हुआ हो, मगर जब
उसने पूछा: ‘आपको कौन चाहिए?’ – तो पता चला, कि उसका
मुँह बहुत बड़ा है, और बड़े-बड़े मज़बूत दाँतों से भरा है.
सीढ़ियों पर
कुछ अँधेरा था, हर ऊपर बढ़ते कदम के साथ नौकरानी और ज़्यादा
लम्बी होती जा रही थी, और सम्गीन को लगा, कि वह ऊपर
नहीं बल्कि नीचे जा रहा है.
‘जैसे
दरियाली तंग घाटी में...’
प्रवेश
कक्ष में तो धुँधलका और भी गहरा था; नौकरानी ने उसका ओवरकोट उतारकर सख़्ती से कहा:
“दाईं ओर
जाइए.”
सम्गीन एक
खिड़की वाले छोटे से कमरे में आया; खिड़की के परदे में गहरा-लाल सूरज रुक गया था, कोने में
दो सुनहरे फ़रिश्ते आईना पकड़े खड़े थे, आईने में सम्गीन का धुँधला प्रतिबिम्ब पड़ रहा
था.
’और, मुलाहिज़ा
फ़रमाइए, सही है! मैं ग्लेब उस्पेन्स्की के समान हूँ’, उसने सोचा, चश्मा
उतारा और मुँह पर हाथ फेरा. उस्पेन्स्की से समानता ने एक गंभीर विचार को जन्म
दिया:
‘ऐसे लोगों
के बीच आसानी से पागल हो सकते हैं’.
बाईं ओर एक
परदा खुला, जिस पर उसका ध्यान नहीं गया था, और नन जैसी
काली पोशाक में, जिसकी कॉलर सफ़ेद लेस की थी, ख़ामोशी से
एक औरत बाहर निकली. उसने धुँधला चश्मा पहना था; सिर के ऊपर
घुंघराले बालों के जूड़े पर मोतियों की जाली थी, मगर फिर भी
कंधों के मुकाबले में सिर काफ़ी बड़ा था. सम्गीन सिर्फ आवाज़ से ही पहचान पाया कि ये –
लीदिया है.
“माय गॉड, - बिल्कुल
उम्मीद नहीं थी! हालाँकि मरीना ने मुझसे कहा था, कि तुम
यहाँ हो...”
दस्ताने
कुर्सी पर फेंक कर उसने अपनी पतली, गरम ऊँगलियों से सम्गीन का हाथ कस कर दबाया.
“मैं
गवर्नर की मेमोरियल सर्विस में जा रही थी. मगर अभी समय है. बैठेंगे. सुनो, क्लीम: मैं
– कुछ भी समझ नहीं पा रही हूँ! अब कॉन्स्टीट्यूशन तो दे दिया है, तो और क्या
चाहिए?
तुम
कुछ बूढ़े हो गए हो: कनपटी सफ़ेद हो गई है और बेहद दुखी चेहरा है. ये बात समझ में
आती है – कैसे दिन आ गए हैं! बेशक, वह मज़दूरों को बड़ी निर्दयता से दण्ड देता था, मगर – किया
क्या जाए, क्या?”
वह लगातार
बोले जा रही थी, दबी ज़ुबान में और नाक में, और कुछ कुछ
शब्द तो उसके तीन सुनहरे दाँतों के कारण चीख जैसे और नकियाते हुए निकल रहे थे.
सम्गीन सोच रहा था, कि वह उच्च वर्गीय महिला की भूमिका कर रही
किसी प्रांतीय एक्ट्रेस की तरह बोल रही है.
उसके चश्मे
के काँच से वह आँख़ें नहीं देख पा रहा था, मगर उसने देखा कि उसका चेहरा बिल्कुल
जिप्सियों जैसा हो गया है, त्वचा – धूप में फ़ीके पड़ चुके कागज़ के रंग़ की; आँखों के
पास पतली, पेन्सिल से बनाई किसी तस्वीर जैसी झुर्रियाँ उसके
चेहरे पर मुस्कुराहट का और चालाकी का भाव पैदा कर रही थीं; ये उसके
शिकायत करते शब्दों से मेल नहीं खाता था.
“वह लिबरल
था,
बल्कि
– और भी ज़्यादा, मगर इस दर्दनाक मौत के कारण ख़ुदा साम्राज्यवाद
के विचार से विश्वासघात के लिए उसे माफ़ कर देगा.”
सिगरेट
निकालते हुए सम्गीन झुका और उसने अनचाही मुस्कान को छुपा लिया. फ़र्श पर – मोटा लाल
रंग का कार्पेट, चारों तरफ़ – करेलियन बर्च का खूब सारा फ़र्नीचर, धुँधलेपन
से चमकती ताँबे की चीज़ें; दीवारों पर प्राचीन शिलालेख, कमरे में
एक मीठी, अप्रिय गंध. लीदिया – इतनी पतली, जैसे चारों
ओर की हर चीज़ ने उसे दबा कर, छत की ओर बढ़ने को मजबूर कर दिया हो.
“तुम भी, बेशक, कॉन्स्टीट्यूशन
के पक्ष में हो?”
सम्गीन ने ‘हाँ’ में सिर
हिलाया, ये उम्मीद करते हुए कि जल्दी ही शब्दों का प्रवाह सूख
जाएगा.
“मैं –
समझती हूँ, तुम – नास्तिक हो! सिर्फ एक आस्तिक ही साम्राज्यवादी
हो सकता है. लोगों का नैतिक मार्गदर्शन – धार्मिक अनुष्ठान है...”
नहीं, उसका चुप
रहने का कोई इरादा नहीं था. तब सम्गीन ने, सिगरेट
पीने के बाद, चारों ओर देखा, - ऐशट्रे
कहाँ है? और उसने माचिस की डिब्बी को हथेली पर इस तरह रखा, कि लीदिया
देख ले. मगर उसने इस पर भी ध्यान नहीं दिया, साम्राज्यवाद
के बारे में कहती रही. सम्गीन ने खुल्लम खुल्ला सिगरेट की राख को कालीन पर झटका और
करीब-करीब गुस्से से पूछा:
“अपने
राजनीतिक विचारों को मेरे सामने पेश करने की तुम्हें इतनी जल्दी क्यों पड़ी है?”
“स्पष्टता
ज़रूरी है, क्लीम!” उसने फ़ौरन जवाब दिया और, शेल्फ से
एक मोती जड़ी चाँदी की छोटी सी गहरी प्लेट मेज़ पर रख दी: ‘ये रही
ऐशट्रे.”
“क्या मैं
तुम्हें रोक रहा हूँ?”
“नहीं, नहीं!
मैंने मेमोरियल सर्विस की बात इसलिए कही, क्योंकि वो मुझे परेशान कर रही है. वहाँ बहुत
सारे ऐसे लोग होंगे, जो उससे नफ़रत करते थे. मगर वो – इतना ज़िंदादिल
था,
इतना
बुद्धिमान था, और इतना...”
कोई लब्ज़ न
मिलने के कारण, उसने चुटकी बजा दी, फिर चश्मा
उतारा जिससे सिर के ऊपर वाली जाली ठीक कर ले; उसकी आँखों
की काली पुतलियाँ फैली हुई थीं, नज़र परेशान थी, मगर इससे
वह काफ़ी जवान लग रही थी. अंतराल का फ़ायदा उठाते हुए सम्गीन ने पूछ लिया:
“क्या तुम
ज़ोतोवा के बेहद करीब हो?”
“उसीकी
बदौलत मैंने यहाँ रहने का फ़ैसला किया है, - इससे सब साफ़ हो जाता है!” लीदिया ने बड़ी शान
से जवाब दिया और वह खाँसी, जैसे कुछ ज़्यादा बोल गई हो.
“किस तरह
की इन्सान है वो?”
“जितने
लोगों को मैं जानती हूँ, उनमें सबसे ज़्यादा अकलमंद है, सचमुच में
आज़ाद और दूसरों को प्रेरित करने वाली आंतरिक शक्ति,” उसी तरह
शानदार अंदाज़ से लीदिया ने कहा. उसीने मेरे लिए ये घर ढूँढा, - आरामदेह, है ना? और सारा वातावरण
इतना भरोसेमंद, इतना सुकूनभरा. मैं नई चीज़ें बर्दाश्त नहीं कर
सकती,
- वे
रातों को चरमराती हैं. मुझे ख़ामोशी पसंद है. दिओमीदोव की याद है? ‘सिर्फ मुकम्मिल
ख़ामोशी में ही इन्सान अपने नज़दीक पहुँचता है’. क्या तुम दिओमीदोव
के बारे में कुछ भी नहीं जानते?”
“नहीं,” सम्गीन ने
रूखेपन से कहा और, मरीना के बारे में कुछ और सुनने की इच्छा से, फिर से
उसके बारे में कहने लगा.
“मगर तुम
तो उसे तभी से तो जानते हो, जब से मैं उसे जानती हूँ,” लीदिया ने
चश्मा पहनते हुए, जैसे अचरज से कहा. “मेरी राय में – वह तब से
बहुत ज़्यादा नहीं बदली है.”
क्लीम को
उसके शब्दों का अंदाज़ बनावटी लगा, और वह इतनी तन कर, सीधी बैठी
थी,
जैसे
किसी बात से इनकार करने के लिए बहस करने को तैयार बैठी हो.
‘बेवकूफ़ी से
पेश कर रही है अपने आप को और पराए विचारों से तनी हुई है’, सम्गीन ने
फ़ैसला कर लिया, और वो, गहरी साँस
लेकर बोली:
“हाँ, वो बिल्कुल
वैसी ही है, जैसी शादी से पहले थी, - अकलमंद, सच्ची, पूरी तरह –
अपने लिए. मैं उसकी आंतरिक स्वतंत्रता की बात कर रही हूँ,” उसकी संदेहपूर्ण
मुस्कुराहट देखकर उसने जल्दी से आगे जोड़ा; इसके बाद
पूछने लगी: “क्या पापा की किताबें मुझसे लेना चाहोगे? मुझे पता
नहीं,
कि
उनका क्या करूँ. वो ख़ूबसूरत जिल्दों में हैं, सिटी
लाइब्रेरी में देने में - दुख हो रहा है और – ये असंभव है! उनकी आदत थी मार्जिन
में टिप्पणियाँ लिखने की, और वो इतनी बेदर्दी से सोचते थे रूस के बारे
में,
धर्म
के बारे में...और वैसे, आम तौर पर ...कई सारी टिप्पणियों को तो बेटी
होने की भावना से मैंने रबड़ से मिटा दिया...”
“ये भी
किया?”
सम्गीन
व्यंग्य से चहका.
“तुम भी –
शक्की मिजाज़ हो, - तुम्हें इससे परेशानी नहीं हो सकती,” उसने कहा, और उसका
दिल चाहा कि किसी चुभती सी बात से उसे जवाब दे, मगर, जब तक वह
सोचे – किस बात से? – वह फिर से शुरू हो गई:
“क्रीमिया
में ल्युबोव सोमोवा से मिली थी, डेन्टिस्ट के यहाँ, - यहूदन, बेशक. वो
इतनी दयनीय, अधबीमार लग रही थी, हो सकता है, एबोर्शन्स
करवाएँ हों.”
“उसे
मॉस्को में बदमाशों ने मारा था,” सम्गीन ने चिड़चिड़ाहट से कहा.
“हाँ? इसीलिए
उसके दिल में हरेक के प्रति कड़वाहट है. वो मेरे पास समर-कॉटेज में आई थी, मगर हमारा
बस,
झगड़ा
होते होते बचा.”
सम्गीन को
भी महसूस हो रहा था, कि अगर वो यहाँ से ना निकला, तो –
मालकिन से झगड़ा हो जाएगा. वह उठ गया.
“चल, तुझे
मेमोरियल - सर्विस जाना है ना.”
‘हाँ, अफ़सोस है.
मगर – तुम फिर आओगे ना?”
“अगर चला
नहीं गया तो.”
“आ जाना, आ जाना,” उसने ज़ोर
से उसका हाथ हिलाते हुए कहा.
वह बेहद
चिड़चिड़ाते हुए बाहर आ गया, इससे उसे आश्चर्य भी हुआ.
‘ये मुझे
क्या हो रहा है, क्यों? ठीक है –
घिनौनी है, बेवकूफ़ है, बनावटी है, मगर मुझे
इससे क्या?’
चिड़चिड़ाहट
की वजह ढूँढ़ते हुए, वह आराम से चल रहा था और सामने से आने वाले हर
इन्सान की आँख़ों में देखते हुए ख़यालों में ही हरेक से झगड़ा कर रहा था. रास्तों पर
लोग काफ़ी थे, अधिकांश जल्दी-जल्दी चल रहे थे और चौक की दिशा में जा
रहे थे, जहाँ गवर्नर का महल था.
‘हत्या से
उत्साहित’, उसे मित्रोफ़ानोव – ‘कॉमन सेन्स’ वाले आदमी
के शब्द याद आ गए, - वे शब्द जो एक डिटेक्टिव ने उस ख़ुशी के बारे
में कहे थे, जिससे मॉस्को ने मिनिस्टर प्लेवे की मौत का स्वागत
किया था. और वह फिर से लीदिया के ख़यालों में डूब गया.
‘वो ज़ोतोवा
के बारे में बात नहीं करना चाहती थी – ये तो स्पष्ट है! क्यों?’
कमरे में
पहुँचकर वह कपड़े भी नहीं उतार पाया था, कि दुन्याशा भागते हुए आई, और उसकी
गर्दन में हाथ डालकर, चुपचाप उसके सीने पे सिर टिका दिया, - वह लड़खड़ा
गया,
और
उसके सिर और कंधे पे हाथ रखकर हौले से उसे दूर हटाते हुए,
मुस्कुराकर सोचने लगा:
‘कैसे औरतों
वाले दिन हैं!’
मगर
दुन्याशा को देखना अच्छा लग रहा था, - उसने करीब-करीब प्यार से पूछा:
“तो, कैसी हो
तुम – बदमाशों को सफ़लता से काबू में किया या नहीं?”
उससे छिटककर लीदिया ने अपने आप को सोफ़े पर गिरा
लिया,
उसका
मेकअप लगा चेहरा फ़ौरन आँसुओं से भीग गया; हाँफ़ते हुए, हिचकियाँ
लेते हुए, एक हाथ में पकड़ा हुआ रूमाल हिलाने लगी, दूसरा हाथ
सीने पर मारने लगी और होंठ काटते हुए बिसूरने लगी.
‘क्या ये
नशे में है?’ सम्गीन ने सोचा, वह मुड़ा और
जार से गिलास में पानी डालने लगा, मगर दुन्याशा घुटी-घुटी आवाज़ में जल्दी-जल्दी
और असंबद्ध सा कुछ बोलने लगी:
“मज़ाक
उड़ाने का तुम्हें कोई हक नहीं है, - तुम्हें शर्म आ रही है, अकलमंद
इन्सान! मुझे तो – पता नहीं था...”
उसने कंधे
के ऊपर से उसकी तरफ़ देखा, - नहीं, वह होश में
थी,
आँसुओं
से धुली आँखों में साफ़ चमक है, और उसके शब्द भी दृढ़ता से निकल रहे हैं.
“मगर, अगर मैं
जान भी जाती, तो भी, मैं कर क्या सकती थी?”
“समझ नहीं
पा रहा हूँ” सम्गीन ने उसे पानी देते हुए कहा. “हुआ क्या था?”
“वहाँ
उन्होंने – शैतान जाने क्या कर दिया था,” उसका हाथ धकेलकर दुन्याशा कहने लगी. “एक लुहार
की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी, उसके तो पैर ही बेकार हो गए, चार लोगों
को गोली मार दी, नौ ज़ख़्मी हो गए. और मैं, बेवकूफ़, गा रही
हूँ! कै-से वो सीटियाँ बजा रहे थे!” ख़ौफ़ से आँख़ें चौड़ी करके, उसने कहा
और सिर हिलाते हुए उसने आँखें बंद कर लीं. “मैं, जैसे ज़मीन
में धँसती जा रही थी, - कुछ भी समझ नहीं पा रही थी! तुमने उस समय ठीक
कहा था – हरामी हैं वो! तुमने ही भविष्यवाणी की थी मेरे लिए! सैनिक थे वहाँ, कोई
कैप्टेन. मज़दूरों के क्वार्टर्स में शीशे टूटे हैं, खिड़कियों
से तकिए बाहर निकल रहे हैं...लाल गिलाफ़ों में, जैसे गोश्त
हो. मैं शाम को पहुँची थी, कुछ भी नहीं देखा...”
सम्गीन
सिगरेट पी रहा था, माथे पर बल डाल रहा था और अचानक उसने महसूस
किया कि वो लम्बा और पतला हो गया है, जैसे धागा हो, - वह उलझा
हुआ,
ज़मीन
पर फैला है, और किसी का अदृश्य, दुष्ट हाथ
उसमें कसकर गाँठें लगा रहा है.
“तुम शांत
हो जाओ,” अपने आप को बचाते हुए वह बुदबुदाया, मगर
दुन्याशा, गीले रूमाल से लाल हो गए चेहरे पर हवा करते हुए, दूसरे हाथ
की मुट्ठी लहराते हुए बोली:
“मैंने
उससे,
उस
खटमल जैसी आँखों वाले जानवर से – क्या नाम था उसका? – नशे में
धुत थोबड़ा! ‘आप ऐसे कैसे, मैंने कहा, सभाओं की
आज़ादी की घोषणा की गई है, और – आप गोलियाँ चला रहे हैं?’ और वो, हरामी, दाँत
दिखाता है: ‘ये घोषणा, कहने लगा, इसीलिए की
गई है,
कि
गोलियाँ मारने में आसानी हो!’ समझ रहे हो? स्त्रातोनोव, ये नाम था
उसका. उसकी बीबी, गाय जैसे थोबड़े वाली – छाती – ये इत्ती बड़ी!”
दुन्याशा
ने हाथों को फ़ैलाकर, उनसे गोल बनाकर और उँगलियों के सिरों के थोडा
दबाकर,
भारी
भरकम छाती का आकार दिखाया.
“ ‘मेरा बाप, वह बोला, - किसान का
बेटा था, पेड़ों की छाल के जूते पहनता था, मगर जब मरा, तो कम्पनी
का सलाहकार था; वो, बोला, अपने हाथों
से मज़दूरों को मारता था, और वे उसकी इज़्ज़त करते थे’. ‘आह, तू, मैंने सोचा, माँ...’ माफ़ करना, प्लीज़, क्लीम!”
वह फिर से
हौले-हौले रोने लगी, और सम्गीन ने एक उदासी भरे तनाव से महसूस किया, कि कैसे प्रभावों
की एक नई गाँठ बन रही है. एक चौंकाने वाली वास्तविकता से उसे दिखाई देने लगा मरीना
का घर और लीदिया का घर, मॉस्को की सड़क, बेरिकैड, गोदाम, जहाँ
मित्रोफ़ानोव को गोली मारी गई थी – गवर्नर की हवा में घूमती टोपी, जगमगाती
हुई चर्च के सामान वाली दुकान.
“ठीक है, अब बस भी
करो,
बस
करो,”
यंत्रवत्
वह उसे मना रहा था, हालाँकि दुन्याशा उसे परेशान नहीं कर रही थी, और उसने
उसे अपने से बहुत दूर देखा, तम्बाकू के धुँए के पीछे. उसने महसूस किया कि
उसकी तबियत ख़राब है, वह थक गया है, टूट चुका
है,
और
फिर से सोचने लगा:
‘पागल हो
जाऊँगा...’
दुन्याशा
ने अपनी तैशभरी शिकायतों को एकदम रोककर कहा:
“मैं - कुछ खाना चाहती हूँ, पीना चाहती
हूँ!”
सम्गीन
चुपचाप घण्टी की तरफ़ बढ़ा और, दुन्याशा के करीब से गुज़रते हुए हल्के से उसके
कंधे को सहलाया, - इससे उसका आक्रोश फिर जाग उठा:
“वहाँ वो
नशे में धुत् थे, दहाड़ते हुए ‘हुर्रे!’ कर रहे थे, जापानियों
की तरह, - जानते हो ना, कैसे.
नेपोलियन्स–विजेताओं जैसे, और गोदाम में लोगों को बंद कर दिया था, सत्ताईस
लोग,
बर्फ़
– भयानक, सब चरमरा रहा था, और वहाँ, गोदाम में हैं
ज़ख़्मी. ये सब मुझे अलीना के एक परिचित – इनोकोव ने बताया.”
“इनोकोव? वो वहाँ
क्यों था?” सम्गीन ने कमरे के बीच में रुकते हुए पूछा.
“पता नहीं.
शायद,
नौकरी
करता है. बड़ा गलीज़ है. क्या तुम उसे जानते हो?”
“ये – वो
नहीं है,” सम्गीन ने कहा.
“जब गवर्नर
को मारा गया, तो वो शहर में था...”
“धीरे,” सम्गीन ने
चेतावनी दी. “और वहाँ सुदाकोव को तो नहीं देखा?”
“नहीं.”
सम्गीन
ख़ामोश हो गया, ये दिखाते हुए, जैसे
इनोकोव और सुदाकोव के बारे में उसने नहीं पूछा है, और इन
लोगों में उसे कोई दिलचस्पी नहीं है.
“तुम ख़ामोश
क्यों हो?” दुन्याशा ने ज़िद्दीपन से पूछा; इसी समय
कॉरीडोर वाले सेवक ने कहा, कि ‘खाना मालकिन के कमरे में लगा दिया है’, और सम्गीन
जवाब नहीं दे पाया.
“यहाँ
लगाओ!” दुन्याशा गुस्से से चिल्लाई, और जब खाना और वाइन लाई गई तो उसने फ़ौरन
वोद्का का जाम पी पिया, त्यौरियाँ चढ़ाते हुए इधर-उधर देखा, और धीरे से
बोली:
“शैतान
जाने क्या हो रहा है! शायद, ये ही अच्छा होता कि मैं कमीज़ें सिलती, अस्पतालों
के लिए चादरें... कहो तो,- शायद – यही बेहतर होता?”
“खाओ,” सम्गीन ने
कहा. “शिकायत करने से – कोई फ़ायदा नहीं है. सब कुछ – पूर्व निर्धारित होता है...”
“पूर्व
निर्धारित होता है,” – उसने मुँह बनाते हुए दुहराया. “कैसा बुरा शब्द
है. जैसे जूते पहना दिए हों. एक कहावत है: “फ़ेद्का - पहने छाल के जूते, फ़ेदुल अपने
– होंठ फुलाए, - मुझे चाहिए छाल के जूते, और फेद्का
की पतलूनें, और फ़ेद्का जाए मज़दूरी पे!”
इस मज़ाहिया
कहावत ने उसकी आँख़ों में फिर से आँसू ला दिए; ऊँगलियों
से गालों पर आ गए आँसू पोंछकर, उसने मस्ती से कहा:
“जाम
टकराएँ! और चलो, नशे में धुत् हो जाएँ!”
सम्गीन
उसकी ओर देखते हुए मुस्कुराया.
“तो? क्या?” उसने पूछा
और,
उसके
ऊपर टिश्यू पेपर फेंककर, करीब-करीब चिल्ला पड़ी: “अरे – तुम अपना चश्मा
उतारो! ऐसा लगता है, जैसे वो तुम्हारी रूह पर लगा है – सही में!
तुम हर चीज़ ग़ौर से देखते हो, मुस्कुराते हो...देखो, कहीं तुम
पर ही लोग हँसने न लगें! तुम – कम से कम आज अपने आप को इस जंज़ीर से आज़ाद कर लो. कल
मैं चली जाऊँगी, फिर कब मिलना हो, और – क्या
मिल भी पाएँगे? मॉस्को में तुम्हारी बीबी है, वहाँ, तुम्हें
मेरी ज़रूरत ही नहीं होगी.”
‘इसका दिल
हंगामा करने को चाह रहा है,’ क्लीम ने चश्मा उतारते हुए सोचा. “मालूम नहीं
था,
कि
ये सनकी है’.
अपने आप को
प्यार से मुस्कुराने पर मजबूर करते हुए, उसने परेशानी से दुन्याशा की तरफ़ ग़ौर से
देखा और पाया कि उसके गाल बदरंग हो गए हैं, भौंहें चढ़ी
हुई;
होंठ
चबाकर,
आँखें
सिकोड़कर उसने लैम्प की लौ की ओर देखा, उसकी आँखों से आँसू बह निकले. वो थरथराते हुए
बोतल पर चाय का चमच बजाए जा रही थी.
‘कितना
दुष्ट चेहरा है’, सम्गीन ने गहरी साँस लेकर गिलासों में वाइन
डालते हुए सोचा.
काँपते
हाथों की छोटी-छोटी उँगलियों से दुन्याशा अपना ब्लाऊज़ खोलने लगी, वह उसकी
मदद करने लगा, मगर दुन्याशा ने उसका हाथ हटा दिया.
“मुझे घुटन
हो रही है.”
और, उसके चेहरे
पर नज़र डालकर हौले से बोली:
“तुमने तब, कॉन्सर्ट
के बाद, मेरा अपमान किया था,”
सम्गीन ने
उससे दूर हटते हुए पूछा:
“कैसे?”
“नहीं, अपमान नहीं
किया,
बल्कि
मुझे चौंका दिया. अचानक, ऐसा इनसान, जो किसी के
भी जैसा नहीं है, मेरे शौहर की तरह बात करने लगा!”
उसने वाकई
में ये अचरज से कहा था और, कंधे हिलाकर, जैसे ठण्ड
लग रही हो, मुट्ठियाँ बंद कर लीं, उनको एक
दूसरे पर मारने लगी.
“जब मैंने
ज़ोतोवा को अपने शौहर के बारे में बताया, तो वह फ़ौरन उसे समझ गई और एकदम सही समझी. वो, उसने कहा, उदासी के
कारण क्रांतिकारी है! – नहीं? किसी और चीज़ के कारण, उसे क्या
कहते हैं? जब तुम सबसे नफ़रत करने लगते हो?”
अब वो ज़ोर ज़ोर
से सम्गीन के कंधे पर मुट्ठियाँ मारने लगी – इतनी ज़ोर से कि दर्द होने लगा; उसने बात
पूरी की:
“मानवद्वेष
से?”
“करेक्ट!
इसी से. मैं समझ सकती हूँ, जब आप पुलिस से नफ़रत करते हो, पोप लोगों
से,
जैसे
– क्लर्कों से, मगर वो – सभी से नफ़रत करता था! नौकरानी –
मोत्या से भी, नफ़रत करता था; मैं उसके
साथ सहेली की तरह रहती थी, मगर वो कहता: “ नौकरों की वजह से - अटपटापन
महसूस होता है, उनके बदले मशीनों से काम लेना चाहिए’. मगर मेरे
ख़याल में, अटपटापन सिर्फ उससे महसूस होता है, जिसे आप
समझते नहीं हो, और अगर समझ जाओगे, तो अटपटापन
महसूस नहीं होगा.”
वह उछल कर
खड़ी हो गई और, पैर पटकते हुए, कुछ गुस्से
से मुस्कुराते हुए, कहती रही:
“मोत्या का
एक दोस्त था, मैकेनिक, वो शान्याव्स्की में पढ़ता था, गंभीर
किस्म का, बदतमीज़, मेरी तरफ़ शक से देखता था. और अचानक मैं समझ गई
कि वो...उसकी रूह कोमल है, मगर उसे इस बात से शरम आती है. मैं कहती: ‘पाखोमोव, आप बेकार
ही जंगली होने का नाटक करते हैं, मैं आपके आर-पार देख सकती हूँ!’
पहले तो वो
गुस्सा हो गया: ‘आप, कहने लगा, कुछ नहीं
देखती हैं और देख भी नहीं सकती हैं!’ मगर फिर मान गया: ‘सही है, दिल मेरा
बेहद नाज़ुक है और बुद्धि से बिल्कुल मेल नहीं खाता, बुद्धि
मुझे कुछ और सिखाती है’. वह वाकई में बुद्धिमान था, पढ़ालिखा, और वो भी –
क्रांतिकारी है - अपने मज़दूर भाई से प्यार के कारण! कलान्चेव्स्काया चौक पर वह लड़ा
था और करेत्नी पर भी, वहाँ एक ऑफ़िसर ने उसके कंधे पे गोली मार दी, मोत्या ने
उसे मेरे यहाँ छुपाया था, और शौहर...”
वह रुक गई, आँख़ें
सिकोड़ते हुए, कोने की ओर देखा, फिर, मेज़ के पास
आकर वाइन का घूँट पिया, गालों को सहलाया.
“तो, शैतान ले
जाए,
शौहर
को! अलग हो गई और – उसके नाम पे थूक दिया.”
वह फिर से, जल्दी-जल्दी
और असंबद्ध सा कुछ कहती रही, मैकेनिक के किसी ख़ुशमिजाज़,
क्रांतिकारी साथी के बारे में, जो ज़ख़्मी
मैकेनिक को कहीं ले गया” सम्गीन सतर्कता से, किसी नए विस्फ़ोट
की आशंका से सुन रहा था; ये तो साफ़ था कि वह, जल्दी-जल्दी
बोलते हुए, किसी ख़ास बात की ओर जा रही है, जो वह कहना
चाहती है. तनाव के कारण सम्गीन की कनपटियों पर पसीना आ गया.
“मेरे ख़याल
में – इन्सान तभी तक जीता है, जब तक वो प्यार करता है, और अगर वो लोगों
से प्यार नहीं करता, तो – फिर उसकी ज़रूरत क्या है?”
क्लीम की
ओर झुकते हुए, उसने अपने हाथों से उसका सिर पकड़ लिया और, उसे हिलाते
हुए ठीक उसके चेहरे के सामने गर्मजोशी से बोली:
“और तुम
ख़ामोशी से सबको प्यार करते हो, मगर तुम्हें शर्म आती है और तुम कठोर, नाख़ुश होने
का दिखावा करते हो, ख़ामोश रहते हो और ख़ामोशी से सबके लिए दुखी
होते हो, - ऐसे हो तुम! तो...”
सम्गीन को
इसकी उम्मीद नहीं थी; ये उसने दूसरी बार उसे जैसे उसे स्तब्ध कर
दिया था, हैरान कर दिया था. उसकी आँखों में बेहद चमकती, जलती आँखें
देख रही थीं; उसने क्लीम के माथे को चूमा, कुछ कहती
रही,
उसकी
कमर में हाथ डाले, वह उसके शब्द नहीं सुन रहा था. उसे महसूस हो
रहा था, कि उसके जिस्म की गर्माहट के साथ-साथ उसके हाथ किसी
और तरह की गर्माहट भी सोख रहे हैं. वह भी गर्माने लगा, मगर सकुचा
भी रहा था, शर्म जैसी कोई भावना जगाते हुए – क्या ये अपराध-बोध
था?
इसने
उसे फुसफुसाने पर मजबूर कर दिया:
“बस, तुम गलती
कर रही हो...”
“नहीं, मैं किसी
कुत्ते से भी ज़्यादा अच्छी तरह जानती हूँ, कि कौन –
कैसा है! मैं अकलमंद नहीं हूँ, मगर – जानती हूँ...”
सम्गीन ने
उसके सीने पे कसके अपना गाल रख दिया.
“प्यारे, प्यारे –
जानती हूँ. कहना नहीं आता मुझे, मगर – महसूस करती हूँ...”
एक घण्टे
बाद थका हुआ सम्गीन आराम कुर्सी पर बैठकर वाइन के घूँट लेते हुए सिगरेट पी रहा था.
इस एक घण्टे में दुन्याशा ने जो बेवकूफ़ी भरी बातें कही थीं, उनमें से
सिर्फ एक सम्गीन के दिमाग़ में रह गई:
‘जब मैं
सचमुच की औरत बनी थी’, ऊँघने की या आधी नींद की अवस्था पाँच मिनट पड़े
रहकर उसने कहा था. उसे भी कई बार उससे कुछ असाधारण बातें कहने की इच्छा
महसूस हुई, मगर – वो कुछ ढूँढ़ नहीं पाया.
अब वह उसके
अनावृत कंधे को और तकिए पर बिखरे हुए लाल बालों को देख रहा था, ये कल्पना
करते हुए: कि वह इतने घने बालों में इतने करीने से कैसे कंघी करती होगी? फिर, उसके बाल
ग़ज़ब के पतले भी हैं.
‘इसके अंदर
वाकई में काफ़ी कुछ सीधा-सादा, औरतों जैसा है. अच्छा है, दोस्ताना
औरतपन है’, उसे सही शब्द मिल ही गए. ‘कल चली
जाएगी...’ – उसने उकताहट से सोचा, वाइन ख़त्म
की,
उठा
और खिड़की के पास गया. शहर के ऊपर लाल ताँबे के रंग के बादल छाए थे, बेहद उकताऊ
और बोझिल. क्लीम सम्गीन को स्वीकार करना ही पड़ा, कि किसी भी
औरत ने उसके दिल में ऐसी बेचैनी नहीं पैदा की थी, जैसी इस –
लाल बालों वाली ने की थी. इसमें कोई अपमानजनक बात तो थी, कि ये
अननुभूत उत्तेजना उस औरत ने पैदा की थी, जिसके बारे में उसकी राय प्रशंसात्मक नहीं थी.
‘औरतों वाले
दिन,’
उसने
दुहराया, ‘मज़ाक...’
कराह कर
दुन्याशा ने करवट बदली, - सम्गीन ने हौले से पूछा:
“ शायद, अपने कमरे
में जाना चाहोगी?”
“मैं अपने
ही कमरे में हूँ,” उसने नींद में कहा. सम्गीन ने मुस्कुराते हुए
अपने लिए और वाइन गिलास में डाल ली. ‘तो – ये ऐसा है: वो – हर जगह अपने ही कमरे में
होती है, किसी भी बिस्तर में’. ये भी
अपमानजनक ख़याल था, मगर, उसे तौलते हुए, सम्गीन तय
नहीं कर पाया, कि दोनों में से किसके लिए अपमानजनक है? वह छोटे, सँकरे सोफ़े
पर लेट गया; काफ़ी असुविधा हो रही थी, और इस
असुविधा ने अपने आप के प्रति दया की भावना को और बढ़ा दिया.
‘ये – हर
जगह अपने ही कमरे में होती है, और मैं – हर जगह अपने आप के ख़िलाफ़ रहता हूँ, - यही साबित
होता है. क्यों? ‘अस्सी हज़ार मील अपने आप के चारों ओर’? ये दिलचस्प
है,
मगर
सही नहीं है. ‘मनुष्य अपनी आत्मा के चारों ओर घूमता रहता है, जैसे धरती
घूमती है सूरज के चारों ओर’… अगर मरीना इसकी आधी
भी ईमानदार होती...’
वह ऊँघने
लगा,
फिर
किसी शोर ने उसे जगा दिया, - ये दुन्याशा थी, जो जूते
पहनते हुए कुर्सी सरका रही थी. पलकों के झरोखे से उसने देखा, कि कैसे इस
औरत ने अपनी चीज़ें इकट्ठा करके उन्हें बगल में दबाया, मोमबत्ती
बुझा दी और दरवाज़े की ओर चल दी. एक सेकण्ड को रुकी, और सम्गीन
ने अंदाज़ लगाया, कि वह उसकी तरफ़ देख रही है; शायद पास
आए. मगर वह नहीं आई, बल्कि, बिना शोर
किए दरवाज़ा खोलकर, ग़ायब हो गई.
ये अच्छा
हुआ,
क्योंकि
असुविधा के कारण सम्गीन की मांसपेशियों में दर्द हो रहा था. उसके कमरे के ताले की आवाज़
का इंतज़ार करके, वह बिस्तर पर आ गया, मस्ती से
हाथ-पैर फ़ैला दिए, मोमबत्ती जलाई, घड़ी पर नज़र
डाली,
- करीब-करीब
आधी रात हो गई थी. छोटी वाली साइड टेबल पर एक चमड़े की ब्रीफ़केस पड़ी थी, उसमें से
एक कागज़ बाहर झाँक रहा था, - सम्गीन ने यंत्रवत् उसे लिया और बच्चों जैसे
गोल-गोल, बड़े अक्षरों में लिखी हुई इबारत पढ़ने लगा:
‘…ओह, अलीनोच्का, ऐसे घटिया
हैं,
और
मैं ठीक उनकी भीड़ में फँसी, सबसे ज़्यादा गलीज़ था एक बड़ा, ऐसा बदमाश
बेशरम’.
सम्गीन ने
आगे नहीं पढ़ा, ख़त को उसने ब्रीफ़केस पर रख दिया और ये सोचते
हुए मोमबत्ती बुझा दी:
‘ये किसी
खतरे में फँसेगी. साफ़ दिल वाली है. आख़िरकार – वो प्यारी है...’
सुबह, जब वह
हाथ-मुँह धो रहा था, तो दुन्याशा आई – वह सफ़र के लिए तैयार थी.
“मैंने
पैकिंग भी कर ली है.”
उसका चेहरा
खिंचा हुआ था, भँवें चढ़ी हुई, आँखें काली
हो रही थीं.
“ठीक
है...अगर कभी मुझसे मिलना चाहो – तो ल्यूतोवों को हमेशा पता रहता है, कि मैं
कहाँ हूँ...”
“बेशक – मिलना
चाहूँगा!”
“चाय पीने
का समय नहीं है, तुम सो रहे थे,” उसने गहरी
साँस लेकर, होंठों को चबाते हुए कहा, फिर कुछ
चिढ़कर पूछा: “क्या डर नहीं लगता, कि तुम्हें गिरफ़्तार कर लेंगे?”
“मुझे? किसलिए?” सम्गीन ने
अचरज से पूछा.
“क्या –
किसलिए! बनो मत. मेरे ख़याल में – हम सबको एक-एक करके गोली मार देंगे.”
“ओह, बस करो,” सम्गीन ने
उसका हाथ चूमते हुए कहा, और अचानक पूछ लिया: “क्या तुमने ज़ोतोवा को
अपने बारे में सब कुछ बता दिया?”
“उसे – हर
वो चीज़ बतानी पड़ती है, जो वह जानना चाहती है, वो
ऐसा...चूसने वाला पम्प है!”
उसके करीब
आकर,
उसने
उसकी नाक से चश्मा हटाया और, उसकी आँखों में देखते हुए, हौले से
बुदबुदाई:
“बुरा मत
मानना,
कि
– मुझे तुम पर दया आती है, सही में – बुरा मानने वाली बात नहीं है! पता
नहीं,
कैसे
कहूँ! अकेले हो तुम, हाँ? बेहद अकेले?”
सम्गीन
चकरा गया, - पहली बार ऐसी भावना से उससे कुछ कहा गया था. हाथों की
अनचाही हलचल से उसने उस औरत को कस के गले लगा लिया और बुदबुदाया:
“ये तुम
क्या कह रही हो? किसलिए?”
और – चुप
हो गया, ये न जानते हुए कि क्या बेहतर होगा: कि वो बोले, या उसे
चूमना चाहिए – और इस तरह उसे चुप रहने पर मजबूर किया जाए? मगर वह
गर्मजोशी से फुसफुसाई:
“तुम – कुछ
न सोचो, मैं दस साल तक नहीं कहूँगी कि मुझे माशूका बना लो, मैं तो
सिर्फ यूँ ही, दिल से, - क्या तुम
ऐसा सोचते हो, कि मुझे मालूम नहीं है, कि चुप
रहने का मतलब क्या होता है? एक चुप रहता है – उसके पास कहने को कुछ नहीं
है,
और
दूसरा – कहने के लिए कोई नहीं है.”
हथेलियों
से ज़ोर से उसकी कनपटियाँ दबाते हुए, उसने और भी धीमी आवाज़ में कहा:
“और – एक
बात और: “तुम ज़ोतोवा से बहुत ज़्यादा नहीं...”
‘ईर्ष्या
करती है?’ सम्गीन के दिमाग़ में पहेली कौंध गई, और – सब
कुछ ज़्यादा सरल हो गया, ज़्यादा समझ में आने लगा.
“ज़्यादा
खुलने की ज़रूरत नहीं है उसके साथ.”
उसने, मुस्कुराते
हुए उसका सिर सहलाया और पूछा:
“क्यों?”
“उसके बारे
में यहाँ अच्छा नहीं कहते हैं.”
“कौन?”
“कई लोग.”
दरवाज़े पर
खटखट हुई, बूढ़े नौकर ने सिर अंदर घुसाया और कहा:
“आपको ले
जाने के लिए आ गए हैं!”
“अच्छा, अलबिदा,” दुन्याशा
ने कहा. सम्गीन ने महसूस किया कि वह उसे हमेशा की तरह नहीं चूम रही है, - ज़्यादा नज़ाकत
से तो नहीं...उसने भी फुसफुसाकर कहा:
“थैन्क्यू!
ये मैं नहीं भूलूँग़ा. रूमाल से आँसू पोंछते हुए वह चली गई. सम्गीन भाप जमी खिड़की
की ओर गया, काँच साफ़ किया और ये याद करते हुए काँच पर माथा टिका
दिया: और कब वो इतना परेशान हो गया था? जब वारवरा ने एबोर्शन करवाया था?
‘मगर तब मैं
डर रहा था, और – अब?’
ये स्पष्ट
था: उसे दुन्याशा के जाने का दुख हो रहा है.
‘ईर्ष्या कर
रही है’ – मेरा ये सोचना बेवकूफ़ी थी’.
होटल के
प्रवेश द्वार के पास दो त्रोयकाएँ खड़ी थीं. एक सफ़ेद बालों वाले फ़ौजी ने दुन्याशा
को स्लेज में बिठा दिया, उसमें पाँच और हट्टे-कट्टे लोग बैठ गए. भूरे
घोड़े पर मरीना आई. त्रोयकाओं के जाने का इंतज़ार करके, सम्गीन ने
भी रेल्वे स्टेशन जाने का फ़ैसला कर लिया, साथ ही वहाँ नाश्ता भी कर लेगा.
बुफ़े में
खिड़की के पास खड़े होकर, चौखट के पीछे से वह प्लेटफॉर्म की तरफ़ देख रहा
था.
उसे
घेरे हुए लोगों की भीड़ में दुन्याशा नज़र नहीं आ रही थी. सम्गीन ने यंत्रवत् उन
लोगों को गिना जो उसे छोड़ने आए थे: आदमियों और औरतों को मिलाकर कुल सैंतीस लोग थे.
सबसे स्पष्ट नज़र आ रही थी - मरीना.
‘सैंतीस,’ – उसने अपने
आप से दुहराया. ‘बड़ी बात है!’
सफ़ेद बालों
वाले फ़ौजी ने हौले से दुन्याशा को कम्पार्टमेन्ट की सीढ़ी पर रखा, और इसके
साथ ही, जैसे उसने कम्पार्टमेन्ट को धक्का दिया, - छोड़ने आए
लोगों ने तालियाँ बजाईं, दुन्याशा ने उनकी तरफ़ फूल फेंके.
आँखों से
उसे बिदा करते हुए सम्गीन को जाना पहचाना वाक्य याद आया: ‘ज़िंदगी की
किताब का एक और पन्ना पढ़ लिया’. उसे बहुत दुख का अनुभव हो रहा था – और अपने आप
को उलाहना देना पड़ा:
“मैं वैसे
भी कुछ भावुक किस्म का हूँ!’
वह आईने के
सामने कॉफ़ी पीने बैठा और उसकी अगम्य गहराई में अपना बेहद थका हुआ, बदरंग
चेहरा देखा, और अपने कंधे के पीछे – एक बड़ा, चौड़े माथे
वाला सिर देखा, झबरे सफ़ेद बालों के गुच्छों में, जो रस्सी
के रेशों जैसे थे; सिर मेज़ पर काफ़ी झुका हुआ था, फूला-फूला
लाल हाथ काँटे से फ़्राइड मीट के टुकड़े खींच खींच कर मुँह में डालते हुए प्लेट पर
घूम रहा था. बहुत गलीज़ हाथ था.
जब बुफ़े के
दरवाज़े में मरीना की रसीली आवाज़ गूँजी, तो झबरे बालों वाला सिर अपना अजीब सा, फूला फूला
चेहरा दिखाकर एकदम ऊपर उठा, उसकी नाक चौड़ी थी और आँखें असाधारण थीं – खूब
बड़े सफ़ेद ढेलों पर छोटी-छोटी आसमानी नीली पुतलियाँ. इस चेहरे का मालिक जल्दी से उठा, उसने आईने
में अपना चेहरा देखा, एक हाथ से बालों को ठीक करने की कोशिश की, और दूसरे
हाथ के टिश्यू पेपर से चेहरा पोंछा, जैसे रूमाल से पोंछते हैं – गाल, माथा, कनपटियाँ.
फिर बेचैनी से पलकें झपकाते हुए वह बैठ गया; उसकी भँवें
सफ़ेदी लिए थीं, वैसी ही छोटी-छोटी मूँछें भी थीं, मगर
फूले-फूले, सूजे हुए चेहरे की पीली सी त्वचा पर ये फ़सल मुश्किल
से नज़र आ रही थी. मरीना उसके पास आई, - वह खड़ा हो गया और फूहड़पन से उसकी ओर कुर्सी
सरका दी; उसने गिरती हुई कुर्सी को पकड़ लिया और उसकी पीठ पर
हथेली से खटखट करते हुए, बेहद धीमी आवाज़ में इस झबरे बालों वाले आदमी
से कुछ कहा; उसने जवाब में सिर झटक दिया और भर्राई हुई आवाज़ में
खाँसा,
और
मरीना सम्गीन की तरफ़ आई.
“क्या
दुन्याशा को बिदा करने में देर हो गई?” उसने ग़ौर से उसकी तरफ़ देखते हुए पूछा. “इतनी
ठण्ड है, और तुम पसीने में नहाए हो. मेरे पास आना, पैसों के
लिए.”
“कब आऊँ?”
उसने कहा
कि आधे घण्टे बाद वह दुकान में होगी, और चली गई. सम्गीन को लगा कि वह उसके साथ
रुखाई से बात कर रही थी, और आँख़ों में भी कठोरता थी.
उसने आईने
में देखा कि झबरे बालों वाला आदमी भी कटुतापूर्वक उसका निरीक्षण कर रहा था और, लग रहा था
कि उसके पास आने को तैयार है. ये सब बहुत उकताहटभरा था.
‘दो-एक दिन
और,
फिर
– यहाँ से चला जाऊँगा,’ उसने फ़ैसला कर लिया, मगर तभी वारवरा
की कल्पना की. ‘क्रीमिया चला जाऊँगा’.
जब वह
मरीना की दुकान में आया, तो ख़ूबसूरत मीशा ने नीचे झुककर चुपचाप कमरे के
दरवाज़े की तरफ़ इशारा कर दिया. मरीना सोफ़े पर बैठी थी, समोवार के
पीछे,
उसके
हाथों में - एक चाँदी का क्रॉस था, वह हेयरपिन से उसे खुरच रही थी और स्वेड के
टुकड़े से पोंछती जा रही थी. उसने प्याले में चाय डाली, बिना पूछे –
कि वह पीना चाहता है, या नहीं, इसके बाद
पूछा:
“गवर्नर के
अवशेषों को दफ़नाने नहीं गए?”
“नहीं.
शायद कहते हैं: पार्थिव शरीर?”
“सही है, पार्थिव
शरीर! प्रोसेक्यूटर ने आपको संबोधित करते हुए धमकाने वाला भाषण दिया. तुम – क्या
चुपके से, आतंक के प्रति सहानुभूति रखते हो?”
“न तो लाल, न ही सफ़ेद
के प्रति मुझे कोई दिलचस्पी है.”
“कल एक
स्कूली लड़के ने ख़ुद को गोली मार ली, अमीर व्यापारी का इकलौता बेटा.
बाप...सीधा-सादा, रूसी है, माँ –
जर्मन,
और
बेटा,
कहते
हैं कि बॉम्बर था. तो ऐसा है,” वह क्लीम की ओर बिना देखे कहती जा रही थी, मन लगाकर
क्रॉस को खुरच रही थी. उसने पूछा:
“ये तुम
क्या कर रही हो?”
“पादरी ने
क्रॉस बेचा है, चीज़ – अच्छी है, प्राचीन, जर्मनी की
बनी हुई. कहता है: ज़मीन के नीचे मिला. मगर मेरा ख़याल है कि झूठ बोल रहा है. शायद
किसानों ने किसी आलीशान घर की दीवार से उतार ली है.
“लीदिया के
यहाँ गया था,” सम्गीन ने कहा, और, मर्ज़ी के
ख़िलाफ़ उसके शब्द, जैसे चुनौती दे रहे थे.
“पता है.
मेरे बारे में पूछ रहे थे. सम्गीन ने ग़ौर किया, कि उसके
कान लाल हो गए हैं, और उसने नर्मी से कहा:
“यकीन करो, कि ये
सिर्फ साधारण उत्सुकता नहीं थी.”
“यकीन करती
हूँ. बहुत अच्छी बात है, अगर साधारण नहीं है. वह ख़ामोश हो गई. सम्गीन
ने,
कुछ
देर इंतज़ार करने के बाद, बिल्कुल समझौता करने के अंदाज़ में कहा:
“तुम
गुस्सा न करो, - ख़ुद ही कुसूरवार हो! न जाने किस रहस्यमय आवरण
के पीछे अपने आप को छुपाती हो.”
“बस करो, वर्ना
बेवकूफ़ी भरी बातें कह दोगे, शरम आएगी,” उसने क्रॉस
को ध्यान से देखते हुए चेतावनी दी. “मैं गुस्सा नहीं कर रही हूँ, समझती हूँ:
दिलचस्प है! एक लड़की थियेटर में गाने का सपना देख रही थी, कलात्मकता
और सुरूचि से ख़ुश थी और – अचानक किसी व्यापारी से शादी कर ली, चर्च के
सामान का व्यापार करती है, अजीब भी लगता है...”
“ये साधारण
नहीं है,” सम्गीन ने पुश्ती जोड़ी, मगर वह
अलसाहट और उदासीनता से कहती रही:
“यकीन कर
सकती हूँ, कि तुम आत्मा की मजबूरी के कारण दिलचस्पी दिखाते
हो...मगर सबसे आसान ये पूछना होता कि: किसमें विश्वास करती हो?”
कुछ सुनते
हुए,
वह
तन गई,
और
क्रॉस को सोफ़े पर फेंक कर, चुपके से दुकान के दरवाज़े की तरफ़ गई, कठोरता से
कहने लगी:
“तू क्या
कर रहा है? आँ? दुकान बंद कर और घर जा. क्या-आ?
दुकान में छुप
गई और,
जब
तक वह मिट्टी की मूरत जैसे किशोर की ख़बर लेती रही, सम्गीन, अपने आप से
पूछते हुए, खड़ा हो गया:
“मुझे इससे
क्या चाहिए?”
कोने में
एक छोटी से शेल्फ पर चमड़े की एक जैसी जिल्दों में करीब दो दर्जन किताबें रखी थीं.
उसने बाइण्डिंग कवर पे देखा: बुल्वर लित्तोन ‘केनेल्म
चिलिंग्ली’, म्युसेत ‘कन्फ़ेशन ऑफ़ अ चाइल्ड ऑफ़ सेंचुरी’, सेन्केविच ‘विदाउट
डॉग्मा’, बूर्झे ‘ डिसाइपल’, लिख़्तेन्बेर्झे
‘
फ़िलॉसफ़ी
ऑफ नीत्शे’, चेखव ‘ ए बोरिंग स्टोरी’. सम्गीन ने
कंधे उचकाए: अजीब है!
“किताबें
देख रहे हो?” मरीना ने पूछा, और उसकी
आवाज़ मखौल उड़ाती सी लगी: “दिलचस्प हैं? सभी – एक ही विषय पर हैं, - मन से
भिखारियों के बारे में, उनके बारे में, ‘जिनकी
इच्छा शक्ति की लाली विचारों के उत्पीड़न से पीली पड़ गई है’, - जैसा
शेक्सपियर ने कहा है. मेरे शौहर को ख़ासतौर से बुल्वर और चेखव की ‘ए बोरिंग
स्टोरी’ पसंद थी.”
“और तुम, शायद, धर्म से, फिलॉसफ़ी से
संबंधित प्रश्नों के बारे में पढ़ती हो?”
“पढ़ा है
थोड़ा-बहुत, मगर – बड़ा दुख भरा है वो,” उसने फिर
से सोफ़े पर बैठते हुए कहा, और, हाथ में पिन लेकर आगे बोली:
“धर्मगुरूओं
और दार्शनिकों के मुकाबले में लेखक ज़्यादा पारदर्शी होते हैं, उनमें
विचार चरित्रों के माध्यम से प्रकट होते हैं और विचारों की अपर्याप्तता – साफ़ तौर
से नज़र आती है.
पिन से काम
करते हुए, हौले से गहरी साँस लेकर, वह कहती रही:
“क्या तुम
जानना चाहते हो, कि मैं ख़ुदा में यकीन करती हूँ या नहीं? यकीन करती
हूँ. मगर – उस ख़ुदा में, जिसे प्राचीन काल में प्रोपातर, प्रोअर्ख, एयोन कहते
थे – क्या तुम ‘ग्नोस्टिक्स’ को जानते
हो?”
“नहीं, - मतलब...”
“नहीं
जानते. तो, ऐसा है...वो ये शिक्षा देते थे, कि एयोन –
उत्पत्तिरहित है, मगर कुछ लोग इस बात पर ज़ोर देते थे कि उसकी
उत्पत्ति उसके बारे में कैथोलिक चिंतन में है, उसके बारे
में जानने की उत्कट इच्छा में है, और इस उत्कट इच्छा से ही एयोन से संबंधित
विचार – एन्नोइया का प्रादुर्भाव हुआ...ये – तार्किक बुद्धि नहीं है, बल्कि एक
शक्ति है, जो धरती और जिस्म से जुदा, अत्यन्त
शुद्ध आत्मा की गहराई से उत्पन्न तार्किक बुद्धि से संचलित होती है...”
समोवार में
जैसे मच्छर भिनभिना रहे थे. सम्गीन की ओर बिना देखे, तन्मयता से
क्रॉस को कुरेदते हुए, मरीना दबी ज़ुबान में बोल रही थी, जैसे अपने
आप से ही कह रही हो; सम्गीन परेशानी से, यकीन किए
बिना, मगर
किन्हीं बेहद सीधे-सादे, गंभीर शब्दों की उम्मीद करते हुए सुन रहा था, और सोच रहा
था कि उसके ख़ूबसूरत, छरहरे बदन पर दुकानदारिन की मामूली, काली ड्रेस
शोभा नहीं दे रही. वह क्रिश्चियन धर्म के पाखण्डियों, रूढ़िवादियों, समर्थकों, दार्शनिकों
के नाम ले रही थी, - सम्गीन के लिए या तो वे अल्पपरिचित थे, या अपरिचित, और उनके
विभिन्न मतों में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह काफ़ी देर तक बोलती रही, मगर सम्गीन
बेध्यानी से सुन रहा था, रूह के बारे में उसके अतिविद्वत्तापूर्ण शब्द
उसके करीब से फ़िसल गए, सिगरेट के धुएँ के साथ ग़ायब हो गए, दिमाग़
सिर्फ कुछेक वाक्य ही ग्रहण कर पाया.
“ मन
शारीरिक वासनाओं में लिप्त है, आत्मा – वासनारहित है, और उसका
उद्देश्य है – मन का शुद्धिकरण, अध्यात्मिकीकरण, क्योंकि
दुनिया बेजान मनों से...”
क्रॉस को
सोफ़े के कोने में घुसाकर, ऊँगलियों को टिश्यू पेपर से साफ़ करते हुए, वह और भी
धीरे,
और
ज़्यादा उदासीनता से बोलती रही, और इस उदासीनता ने सम्गीन के मन में
अप्रसन्नता का भाव भर दिया.
‘इस
तंदुरुस्त, भरे-भरे सीने वाली और, बेशक, कामुक औरत
को इस प्रकार के शब्दों के आवरण की ज़रूरत क्यों है?’ सम्गीन सोच
रहा था. ‘अगर वह अपनी मीठी आवाज़ में चर्च के, पादरियों
के,
मॉन्क्स
के,
गाँव
की औरतों के ख़ुदा के बारे में कहती तो ज़्यादा स्वाभाविक और विश्वसनीय होता’.
उसने देखा
कि क्रॉस सोफ़े के कोने में सिर दुबकाए पड़ा है और मरीना कुछ देर चुप रहने के बाद अब
बिस्किट पे जैम लगा रही है. इन छोटी छोटी बातों ने सम्गीन को निराशा महसूस हुई, जैसे मरीना
ने उससे कोई हल्की-सी उम्मीद भी छीन ली हो.
“ये सब
काफ़ी विद्वत्तापूर्ण है और...मेरी समझ से काफ़ी दूर है,” उसने कहा
और मुस्कुराने की कोशिश की, मगर मुस्कुराहट चेहरे पे आई ही नहीं, मगर मरीना
प्यार से हँस पड़ी.
“देख रही
हूँ,
कि
तुम उकता रहे हो.”
“और, असल में, - अपने बारे
में तुमने बताया ही क्या है?”
“जितना
बताना था, उतना...”
उसने ये
तिरस्कार से और मखौल उड़ाते हुए पूछा था, ये चाहते हुए कि वह गुस्सा हो जाए, मगर उसने
उस इनसान की तरह जवाब दिया, जो बहस नहीं करना चाहता और यकीन दिलाना चाहता
है,
क्योंकि
अलसा रहा है. सम्गीन ने महसूस किया, कि उसने अपने शब्दों में उसके सवाल से ज़्यादा
तिरस्कार भर दिया है, और ये – वास्तविक है. बिस्किट खाकर, उसने अपने
होठों पर ज़ुबान फेरी, और उसकी बातों का धुँआ फिर से मंडराने लगा:
“तुम, बुद्धिवादी, आँकड़ों में
यकीन करते रहे: गिनती, माप, वज़न! ये वैसा ही है, जैसा शैतान
के बारे में भूलकर छोटे-छोटे भूतों के सामने सिर झुकाओ...”
“और शैतान
कौन है?”
“बेशक, बुद्धि.”
“ओह, मरीना, ये कितना
पुराना और सपाट है,” सम्गीन ने गहरी साँस लेते हुए कहा.
“असली रूसी, परंपरागत.
और आप लोगों ने – क्या सोचा है? कॉन्स्टीट्यूशन? तुम्हारी
मौत जैसी उकताहट में कॉन्स्टिट्यूशन कैसे मदद करेगा?”
“मैं मौत
के बारे में नहीं सोचता.”
“उकताहट ही
मौत है. इसीलिए नहीं सोचते, क्योंकि तुमने जीना बंद कर दिया है.”
इतना कहकर
उसने क्रॉस उठाया और बाहर दुकान में चली गई.
‘बेशक, ये इस
बकवास से नहीं जीती है’, सम्गीन ने उसके सुडौल बदन को आँखों से बिदा
करके,
चिढ़कर
तय कर लिया. उसकी आरामदेह माँद को ग़ौर से देखा, आँगन में
खुलता हुआ लोहे की पट्टियाँ जड़ा दरवाज़ा देखा और वह सजीवता से कल्पना करने लगा, कि कैसे
मरीना,
यहाँ
रात बिताते हुए अपने यार के लिए दरवाज़ा खोलती है.
‘बस, यही – सच
है!’
इसके बाद
उसने फ़ैसला कर लिया, कि कल मॉस्को चला जाएगा और उसके बाद क्रीमिया.
“सुनो-तो, मैं तुमसे
क्या कहने वाली हूँ,” मरीना ने चाभियाँ खनखनाते हुए उसके सामने खड़े
होकर कहा. और हर शब्द से उसे आश्चर्यचकित करते हुए, उसने
गंभीरत से प्रस्ताव रखा: क्या वह इस शहर में बसना चाहता है? उसे यकीन
है,
कि
उसे इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता कि कहाँ रहना है...”
“तुम ऐसा
क्यों सोचती हो?”
“ ये छोटा
सा शहर ख़ामोश है, यहाँ शांति है,” उसकी बात
का जवाब न देकर वह कहती रही. “जीना सस्ता है. मैं तुम्हें अदालत के लिए अपने कुछ
काम दे दूँगी, तुम्हारे लिए प्रैक्टिस का इंतज़ाम भी कर दूँगी, क्वार्टर
का इंतज़ाम कर दूँगी. तो – क्या सोचते हो?”
“प्रस्ताव -
अप्रत्याशित है, और...सोचना पड़ेगा,” सम्गीन ने
ये महसूस करते हुए कहा, कि उसका आश्चर्य ख़ुशी में बदल रहा है.
“सोचो. और
अब – मुझे छुट्टी दो, गवर्नरनी को सांत्वना देने जाऊँगी. हमारे यहाः
गवर्नरनी – गवर्नर की बहन है, वो विधुर था, और ये उसे
तकली की तरह घुमाती थी.”
बातें करते
हुए उसने गरम कपड़े पहने. वे बाहर कम्पाऊण्ड में आए. मरीना ने पुरानी बड़ी वाली चाभी
से लोहे का दरवाज़ा बंद किया और चाभी को आस्तीन में छुपा लिया. कम्पाऊण्ड छोटा सा, तंग था, और चारों
ओर से उसकी ओर खिड़कियाँ देख रही थीं, सम्गीन को बहुत अटपटा महसूस हो रहा था.
“तो – सोच
लो! यहाँ रहोगे, आराम करोगे, दिमाग़ ताज़ा
हो जाएगा.”
वे अलग-अलग
दिशाओं में मुड़ गए. मरीना के प्रस्ताव को तौलते हुए, सम्गीन
आराम से चल रहा था, हालाँकि उसने मान लिया था कि यह उसके लिए बुरा
नहीं होगा.
‘शांति से
रहूँगा, अकेला, सिर्फ अपने साथ...’
मगर, ये याद
करके कि वह तो हमेशा सिर्फ अकेला, अपने ही साथ रहा है, उसने ‘अकेला’ शब्द को
हटा दिया.
‘दुन्याशा आती
रहेगी. कभी-कभार. भटका हुआ बच्चा. उसकी ज़िंदगी अत्यंत दिलचस्प और उत्सुक लोगों ने
बनाई है. और ये ज़ोतोवा अपने प्रोपातर समेत. अपना भाषण उसने बड़े अजीब ढंग से ख़त्म
किया. मैं बेकार ही उसपे ताव खा रहा था’.
उसने दूसरे
ही दिन अपना निर्णय उसे सुना दिया.
“बड़ी अच्छी
बात है,” उसने ख़ुशी से कहा. “पैसे ले लो, मॉस्को चले
जाओ,
अल्योशा
गोगिन को मेरा नमस्ते कहना.”
“क्या तुम
उसे जानती हो?”
“हाँ! वह
यहाँ रहा था, करीब दो महीने, यहाँ से
काम करता था. हमारा शहर – सोशल-डेमोक्रेट्स का है ना, और अल्योशा
को चोंचे मारते थे.”
“दिलचस्प
इनसान हो तुम!” क्लीम सचमुच में चकित हो गया. “ये तुम कैसे जोड़ लेती हो रहस्यवाद
और...”
“पहली बात –
ग्नोस्टिसिज़्म बिल्कुल रहस्यमय नहीं है, और दूसरी बात – एक कहावत है: ‘बड़ी थैली –
नहीं मिट्टी का घड़ा, जो भी रखो – रहे पूरा का पूरा, समझो –
उठाओ,
ज़ोर
से न हिलाओ’.
“क्या ये –
हव्वा की उत्सुकता है?”
मरीना ने
मुस्कुराकर जवाब दिया:
“हव्वा को
तो बस एक ही गुनाह में दिलचस्पी थी, मगर मुझे, हो सकता है
– सभी...”
“उत्सुकता
से जिया नहीं जाता,” सम्गीन ने गहरी साँस लेकर कहा, और मरीना
ने पूछ लिया:
“क्या
कोशिश की थी?”
इसके बाद
वे दोनों कुछ देर तक हँसते रहे.
मॉस्को में
सब कुछ बड़ी आसानी से हो गया. वारवरा उससे ऐसे मिली, जैसे किसी
पुराने परिचित से मिली हो, जो नहीं भी आ सकता था, मगर फिर भी
जिसे देखना अच्छा लगता है. दो हफ़्तों में वह दुबली हो गई थी, रंग फ़ीका
पड़ गया था, आँखों के चारों ओर काले घेरे पड़ गए थे, उनमें एक
सवाल था, और वे उत्तेजना से चमक रही थीं. बिना किसी डिज़ाइन वाली काली ड्रेस में वह किसी
उनींदी विधवा जैसी प्रतीत हो रही थी. जब सम्गीन ने उससे कहा कि अब वह प्रांत में
रहना चाहता है, तो उसने सिर नीचा करके, फ़ौरन कोई
जवाब नहीं दिया, और सम्गीन को सोचने पर मजबूर कर दिया:
‘अब कुछ
अप्रिय, झूठा ड्रामा होने वाला है!’ मगर वह ग़लत
था. गहरी साँस लेकर, वारवरा ने कहा:
“मैं
तुम्हें समझ सकती हूँ. एक साथ रहने में – अब कोई मतलब नहीं रह गया है. और, वैसे भी
मैं प्रांत में नहीं रह सकती, मैं मॉस्को से इतनी जुड़ी हुई हूँ! और अब, जब उस पर
मुसीबत टूट पड़ी है, - वो मेरे दिल के और नज़दीक हो गया है.”
मॉस्को से
अपने जुड़ाव के बारे में वारवरा बड़ी देर तक काव्यात्मक सा, किताबी सा
बोलती रही, - उसकी बात न सुनते हुए सम्गीन सोच रहा था:
‘था बिन
ख़ुशी का प्यार’, मगर मुझे ये उम्मीद नहीं थी, कि ‘जुदाई होगी
बिना दर्द की’.
और उसने
महसूस किया, कि ‘बिना दर्द के’ कुछ
अपमानजनक तो है, इसलिए भी अपमानजनक है, क्यों कि वारवरा ने कामकाजी भाव से बात करना शुरू कर
दिया था और उसकी आँखें शांत नज़र आ रही थीं:
“सोचती हूँ, कि विदेश
चली जाऊँ, वहाँ बसंत तक रहूँगी, इलाज
करवाऊँगी और अपने आप को ठीक-ठाक कर लूँगी. मुझे यकीन है कि ड्यूमा सांस्कृतिक
कार्यों के लिए काफ़ी संभावनाएँ प्रदान करेगा. लोगों के सांस्कृतिक स्तर को अगर ऊँचा
न उठाएँगे तो हमें निरर्थक ही काफ़ी बौद्धिक ताकतों से वंचित होना पड़ेगा –
बीते साल ने मुझे यही प्रेरणा दी है, और सारी
भयावहताओं के लिए उसे माफ़ करते हुए, मैं उसकी शुक्रगुज़ार हूँ.”
सम्गीन ने
व्यंग्य से सोचा:
‘सफ़ाई से
बोल रही है. पट्टी पढ़ाई है – ज़्यादा बेवकूफ़ हो गई है’.
दिल चाह
रहा था, कि उसकी एकसुरी बात – शिशिर की बारिश जैसी, गूँजना बंद
हो जाए, मगर वारवरा करीब बीस मिनट शब्दों से सजती रही, और सम्गीन
उनमें से एक भी ऐसा विचार नहीं पकड़ पाया, जिसे वह न जानता हो. आख़िर में वह मेज़ पर रूमाल
छोड़कर चली गई, जिसमें से सेन्ट्स की तेज़ गंध आ रही थी, और वह अपने
अध्ययन कक्ष में चला गया, किताबें समेटने, जो उसकी
इकलौती दौलत थी.
अवैध
लिफ़ाफ़ों, मुक्तकों, सेन्सर द्वारा प्रतिबंधित कविताओं के संग्रह वाली एक फ़ाइल उसे मिली, और, भौंहे
चढ़ाकर वह इन कागज़ों को देखने लगा. ये स्वीकार करना बड़ा अप्रिय लग रहा था कि आजकल
व्यंग्य पत्रिकाओं में जो छपता है, उसके मुकाबले में ये सब कितना फ़ीका, तुच्छ और एकदम
सामान्य था.
“विगत’, उसने सोचा
और,
उसमें
‘मेरा’ न जोड़ते
हुए,
वह
सस्ती वैचारिक स्वतंत्रता और अपनी जवानी के शौक के बारीक-बारीक टुकड़े करने लगा.
राजपुत्र निकोलाय!
यदि राज करना पड़ा,
तो तू न भूलना,
पुलिस संघर्ष करती है कड़ा!
-सम्गीन ने
पढ़ रहा था, और उसके माथे पर बल पड़ रहे थे, - आजकल ऐसी
चीज़ें – सूट इतना घिस गया है कि उसे भिखारी को देने में भी शरम आएगी.
‘सैंकड़ों
लोग इसके दीवाने थे’, उसने कागज़ों को और भी जल्दी जल्दी फाड़ते हुए, अपने आपको
सांत्वना देने की कोशिश की. विगत से अपने इस संबंध को नष्ट करके टोकरी में
फ़ेंके हुए कागज़ों को पैरों तले कुचल दिया और प्रसन्नता से सिगरेट पीने लगा.
एक घण्टे बाद वह गोगिनों के क्वार्टर में
तात्याना के सामने बैठा था. इस लड़की से वह कभी-कभार ही मिलता था, उसे याद था
कि वह एक ख़ुशनुमा, बेवकूफ़ी की बातें करने वाली, चमकती, चंचल, नीली, आँखों वाली
लड़की हुआ करती थी. वह हरेक का मज़ाक उड़ाया करती थी, उसे अच्छी
नहीं लगती थी और मन में कभी उसे निकट से जानने की इच्छा ही उत्पन्न नहीं हुई. अब, उसकी आँखें
थकी हुई पलकों से ढँकी थीं, चेहरा पतला हो गया था, बाहर निकल
आया था, गालों पर बीमार लाली फैली थी, - वह खाँसते
हुए,
चौख़ानों
वाले कंबल से ढँके पैर फैलाए सोफ़े पर लेटी थी. खोखली, निर्जीव
आवाज़ में उसने कहा:
“पैसे –
देर से आए. अलेक्सेइ को रोस्तोव में गिरफ़्तार कर लिया गया और उसके साथ ल्युबाशा
सोमोवा को भी. क्या आप स्पिवाक को जानते थे? उसे भी
गिरफ़्तार कर लिया, छापाखाने समेत, उसे शुरू
भी नहीं कर पाई थी. उसका बेटा, अर्कादी, हमारे यहाँ
है.
“क्या आप
बीमार हैं?” सम्गीन ने पूछा.
“आप देख ही
रहे हैं. और एक प्योत्र ऊसोव था, अंधा; उसने
मीटिंग में भाषण दिया, और घर जाते हुए रास्ते में ही उसे मार डाला, बिल्कुल
कुचल दिया, पैरों तले. युद्ध करने वाली टुकड़ियाँ होनी चाहिए, और – ‘आँख़ के
बदले आँख, दाँत के बदले दाँत’. आतंक के
सवाल पर सोशल डेमोक्रेट्स में फूट पड़ने वाली है.”
वह असंबद्ध
सा बोले जा रही थी, उसकी आँख़ें बेतहाशा चमक रही थीं.
“शायद आपका
बुखार बढ़ रहा है.”
“ कुछ नहीं
होता,
बैठ
जाइए!”
सम्गीन ने
कहा कि उसके पास समय नहीं है, - तात्याना ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाकर पूछा:
“आपका क्या
करने का इरादा है?”
“अभी तय
नहीं किया,” जाने की जल्दी में सम्गीन ने रुखाई से जवाब दिया.
‘वास्तविकता
से कहीं दूर रह गई है, उन्माद भरे विगत में जी रही है’, बाहर
निकलते हुए उसने सोचा. आश्चर्य से और बल्कि, अपने आप के
प्रति अविश्वास से भी, उसे महसूस हुआ, कि मॉस्को
के बाहर बिताए ये दस दिन उसे इस शहर से और तात्याना जैसे लोगों से बहुत दूर ले गए
हैं. ये अजीब बात थी, और इसका विश्लेषण करने की ज़रूरत थी. ये जैसे
इस बात की ओर इशारा कर रहा था, कि थोड़ी सी तीव्र इच्छा शक्ति से वास्तविकता
के विषैले चक्र से बाहर निकला जा सकता था.
‘छोटी छोटी
आवश्यकताओं के साम्राज्य से आज़ादी के साम्राज्य की ओर’, वह मन ही
मन हँसा और उसे याद आया कि ऐसी छलांग के लिए उसने इच्छा शक्ति को तैयार नहीं किया
है.
ये और भी
विचित्र था. अपनी मनोदशा की स्थिरता के प्रति अविश्वास परेशान करने लगा.
‘दुनिया की
हर चीज़ कुछ कम-ज़्यादा स्थाई संतुलन की ओर बढ़ती है’, उसने अपने
आप को याद दिलाया. ‘वास्तविकता को क्रांतिकारी धक्का दिया गया है, वह डगमगा
रही है, आगे बढ़ गई है और अब...’
“नमस्ते, कॉम्रेड
सम्गीन!”
हौले से
अभिवादन करके, मुस्कुराकर उसके चेहरे की ओर देखते हुए, उसके साथ
साथ चल पड़ा लाव्रूश्का. उसने लम्बा और काफ़ी ढीला-ढाला नीला ओवरकोट पहना था, सिर पे घिस
घिस कर लगभग गंजी हो चुकी कराकुल के फ़र की टोपी पहनी थी, पैरों में
फेल्ट के जूते थे.
सम्गीन ने
दो बार उसे निगाहों से नापा और, अपने ओवरकोट का कॉलर उठाकर इधर-उधर देखा, चाल तेज़ कर
दी,
मगर
लाव्रूश्का जल्दी जल्दी, दबी ज़ुबान में, ख़ुशी से
बोल रहा था, जैसे रिपोर्ट दे रहा हो:
“हाथ – ठीक
हो गया, सिर्फ दाग बचा है, जैसे चेचक
का निशान हो. अब – मैं पढ़ता हूँ. और पावेल मिखाइलोविच मर गया.”
“वो कौन है?” सम्गीन
ने पूछा.
“मेडीकल
वाला! ठठेरे को – भूल गए?”
“अहा...”
“ज़ुकाम हो
गया और – फट्!”
“अच्छा, - ख़ुश रहो!”
सम्गीन ने गाड़ीवान की तरफ़ बढ़ते हुए कहा, मगर थोड़ा सा ठहर कर हल्की आवाज़ में पूछ लिया:
“ और –
याकोव?”
“ठी-क है!”
लाव्रूश्का ने भी धीमे से और वैसे ही ख़ुशी से कहा. “सही-सलामत है. अब वह याकोव
नहीं है. अब – वो वाकई में...”
“अच्छा, अलबिदा!”
गाड़ीवान की
स्लेज में बैठकर सम्गीन कल्पना कर रहा था:
‘मैंने
याकोव के बारे में क्यों पूछ लिया? दिमाग़ी सनक...लगता है – ये कुछ और नहीं हो
सकता,
- सिर्फ
सनक है’. मगर तभी सोचने लगा:
“लगता है, मैं – अपने
आप को यकीन दिला रहा हूँ?”
इसके बाद
ओवरकोट की कॉलर नीची करके, उसने गाड़ीवान से सख़्ती से कहा:
“जल्दी!”
दिल चाह
रहा था कि आज ही, अभी मॉस्को से चला जाए. बर्फ पिघल रही थी, फुटपाथ लाल
हो रहे थे, नम हवा में घोड़े की लीद की गंध थी, घरों को, जैसे पसीना
छूट रहा था, लोगों की भुनभुनाती आवाज़ें आ रही थीं, नंगे
पत्थरों पर दौड़ती स्लेज-गाड़ियों की पट्टियों की आवाज़ कानों को बहरा किए दे रही थी.
वारवरा के साथ बातचीत करने, और उसके दोस्तों से मिलने से बचने के लिए
सम्गीन दिन में म्युज़ियम्स, और शाम को थियेटर चला जाता; आख़िरकार किताबें और चीज़ें रजिस्टर्ड डिब्बों
में पैक कर दी गईं.
उसने
करीब-करीब धन्यवाद की भावना से वारवरा का हाथ चूमा, वो – आँखों
पे रूमाल दबाए, एक ओर को मुड़ गई.
और, इस तरह, बिना किसी
दर्द के उस औरत से संबंध तोडकर, ज़िंदगी का ये दौर ख़त्म करके, अपने आप को
आज़ाद महसूस करते हुए, काव्यात्मक रूप से हल्का महसूस करते हुए, वह – कौन
सी बार? – दूसरे दर्जे के कम्पार्टमेंट में बैठा है, चिर परिचित, साधारण
लोगों के बीच में, मगर आज उनमें कोई नई बात नज़र आ रही है और वे
एकदम साधारण विचारों को नहीं जगा रहे हैं. उसकी बगल में, खिड़की के
पास,
एक
छोटा-सा आदमी व्यंग्यात्मक-पत्रिका पढ़ रहा है, गुलाबी गाल, तीखी नाक, गोल-गोल और
बेहद नीली आँखें, जैकेट के बटन जितनी बड़ी. टाई से लेकर जूतों तक
उसकी हर चीज़ नई थी, और जब वह हिलता – तो कुछ सरसराहट होती, - हो सकता है, कलफ़ की हुई
कमीज़ या नीले जैकेट की लाइनिंग हो. दूसरी ओर – ऊनी कपड़े पहने एक मोटी औरत बैठी थी, गोल-गोल
चश्मा पहने, टोपियाँ रखने का प्लायवुड का गोल डिब्बा लिए; डिब्बे में
बिलौटे थे, जो म्याऊ-म्याऊ कर रहे थे. सामने – लाल बालों वाला
आदमी,
जिसके
चेचकरू चेहरे पर बिखरी हुई दाढ़ी थी, काली, प्रसन्न
आँख़ें – उसके सूखे और गंदे चेहरे पर आँख़ें जैसे पराई लग रही थीं; उसकी बगल
में,
ज़ाहिर
था कि उसकी बीबी थी, बड़े डील-डौल वाली, गर्भवती, मखमल का
काला ब्लाऊज़ पहने, गले में लम्बी सोने की चेन पहने ; उसका चेहरा
चौड़ा,
सहृदय
था,
आँख़ें
काली,
प्यार
भरी थीं. सोफ़े के कोने में ओवरकोट की जेबों में हाथ डाले, आँखें बंद
किए,
तीखी
नाक वाला आदमी सील मछली की खाल की टोपी में सिकुड़ कर बैठा था, वो कहीं से
भी दिलचस्प नहीं लग रहा था.
सम्गीन सोच
रहा था कि वह इन लोगों को पहली बार नहीं देख रहा है, कम्पार्टमेन्ट
में इनका होना वैसी ही आम बात है, जैसे कम्पार्टमेन्ट की खिड़की के बाहर दिखाई दे
रहे टेलिग्राफ़ के खम्भे, आसमान, जिस पर
तारों की लकीरें बन गई हैं, बर्फ में दुबकी धरती का घूमना, और बर्फ पर
मस्सों जैसी गाँवों की झोंपड़ियाँ. सब कुछ जाना पहचाना था, सब साधारण
था,
और, हमेशा की
तरह,
लोग
खूब सिगरेट पी रहे थे, कुछ न कुछ चबा रहे थे.
‘असल में ये
सोचने के कई कारण हैं, कि ये ही लोग – इतिहास की मूल सामग्री हैं, कच्चा माल
हैं,
जिससे
बाकी की हर मानवीय, सांस्कृतिक चीज़ निर्माण की जाती है. वे ही –
खेतिहर हैं. ये – प्रजातंत्र हैं, वास्तविक प्रजा – ग़ज़ब की सजीव, कभी ख़त्म न
होने वाली शक्ति. हर सामाजिक और प्राकृतिक आपदाओं को बर्दाश्त करती है और चुपचाप, बिना थके
ज़िंदगी का मकड़जाल बुनती रहती है. सोशलिस्ट प्रजातंत्र के महत्व का सही आकलन नहीं
करते हैं’.
ये नये
विचार बड़ी आसानी से और सहजता से आ गए, जैसे वह कब से इनका अनुभव कर रहा था. ललचाती
हुई आसानी से. मगर चारों ओर हो रहा आवाज़ों का शोर सोचने में रुकावट डाल रहा था.
सम्गीन की पीठ के पीछे, कम्पार्टमेन्ट के बगल वाले भाग में रास्ते में
होने वाली बातचीत शुरू हो चुकी थी, कई आवाज़ें एक साथ बोले जा रही थीं, - और हर कोई
जैसे उस कड़वाहट भरी मीठी, रोतली आवाज़ को काटने की कोशिश कर रहा था, जो
व्यात्का की बोली में जल्दी-जल्दी बोल रही थी:
“तो – और
क्या,
किस
बात की उम्मीद करें? सत्ता का विभाजन – क्या मतलब है? इसका मतलब
है – कई सत्ताएँ. ये क्या है: यहूदी एडवोकेट्स, हमारे भावी
शासक,
- वो
परंपरागत कुलीनों और व्यापारियों से ज़्यादा बुद्धिमान हैं, जो कल तक
फूस के जूतों में घूमते थे, मगर आज लाखों में खेलते हैं?”
दो मिनट तक
इस आवाज़ को कोई दबा न सका, वह बजती रही, बिल्कुल
घण्टी की तरह, फिर एक गहरी, नम नीची
आवाज़ ने उसे ढाँक दिया:
“सत्ता
वाकई में कमज़ोर हो गई है, और ये इसलिए, क्योंकि
पादरियों को उपदेश देने की स्वतंत्रता से वंचित कर दिया गया है. रेवरेण्ड बिशप
अन्तोनिन ने हिम्मत से, और सही कहा था: ‘उन्मत्त, विदेशी
भाषा के अराजकतापूर्ण अख़बारी शोर में ख़ुदा का शब्द सुनाई नहीं दे रहा है, और यही
सबसे बड़ी बुराई है’...”
“ये-ए ही
बात है! खूब बकवास कर ली, रूस को हिला-हिलाकर जर्जर कर दिया!”
“सही है!”
आँखें सिकोड़कर और सिर हिलाते हुए चेचकरू आदमी बेहद ख़ुशी से चहका, और फिर
उसने आँख़ें खोलीं और, उसी तरह प्रसन्नता से सम्गीन के चेहरे की ओर
देखते हुए कहा:
“ वैसे –
जनता काफ़ी बहादुर हो गई है, जो सोचती है, वो ही कह
देती है...”
औरत ने एक
हाथ से बगल के नीचे खुजाते हुए, दूसरे से अपनी जेब से चमकीले कागज़ में लिपटी
चॉकलेट निकाली और पति को दे दी.
“लो, चूसते रहो!
शायद,
सिगरेट
पीने का मन हो रहा है? देखो, कैसे धुँआ
छोड़ रहे हैं, बिल्कुल – ढाबा.”
“ढाबा नहीं, बल्कि –
छलनी,”
तीखी
नाक वाले ने उसके कान में कहा. “लोगों को छलनी में बिखेर दिया है, और उनकी
बेवकूफ़ी छन-छन कर गिर रही है.”
ये कहते
हुए,
उसने
भी सम्गीन की ओर देखा, और उसकी पड़ोसन ने भी, अपने गाल
के भीतर चॉकलेट घुसा कर, शांति से कहा:
“बेवकूफ़ी
के बगैर भी जी नहीं सकते...”
“इसी से
शुरू करते हैं,” उसके पति ने उसका समर्थन किया. पड़ोस वाले
हिस्से में आवाज़ें अधिकाधिक ऊँची, जल्दबाज़ होती जा रही थीं, जैसे रेल
की खड़खड़ाहट के सुर में सुर मिलाना चाह रही हों. तीखी नाक वाले ने सम्गीन का ध्यान
आकर्षित किया: पीला सा चेहरा पतली झुर्रियों से इस तरह ढँका था, जैसे उस पर
पतले धागों की जाली खींच दी हो, - बेहद भावपूर्ण चेहरा, कभी –
कड़वाहट और व्यंग्य प्रदर्शित करता, तो कभी गंभीर हो जाता. मुँह – टेढ़ा, सूखे होंठ
दाईं ओर कुछ खुले हुए, जैसे उनमें से अदृश्य सिगरेट झाँक रही हो.
काली भँवों के नीचे हड़ीले कोटरों से चमकतीं नीली सी, अमित्रतापूर्ण
आँखें.
‘ऐसे चेहरे
वाले आदमी को चुप ही रहना चाहिए था’, सम्गीन ने निर्णय कर लिया. मगर इस आदमी को या
तो चुप रहना आता नहीं था, या फिर वह ऐसा नहीं चाहता था. शोर गुल भरे
कम्पार्टमेन्ट में वह हर बात पर बिना पूछे और चुनौती सी देते हुए फ़ब्ती कस रहा था.
उसकी भावहीन, सूखी आवाज़, बगल वाले हिस्से से गूँज रही कटुतापूर्ण मीठी
आवाज़ और वो गहरी आवाज़ अन्य सभी आवाज़ों को दबा रही थीं. किसी ने कॉरीडोर में कहा:
“ज़िंदगी –
छोटी है, घर भी नहीं बना पाओगे, और ज़रूरत
पड़ जाएगी ताबूत की!”
तीखी नाक
वाला फ़ौरन चहका:
“आपको, व्यापारी
महाशय,
ताबूत
के बारे में नहीं, बल्कि – जर्मनी के साथ व्यापारिक संधि के बारे
में सोचना चाहिए, जो हमारे लिए अपमानजनक और नुक्सानदायक है, वो ही है
आपके लिए – ताबूत!”
सम्गीन की
पीठ के पीछे मोटी आवाज़ अपमान से भुनभुनाई:
“हमारे
दार्शनिक-विचारक – एक मालकिन की तरह हैं: पैदल जुलूस में किसी ने उसका पैर दबा
दिया,
तो
वह – चीख़ने चिल्लाने लगी: आह, कैसी बेहूदगी है! वैसे ही हमारा प्रसिद्ध लेखक
अंद्रेयेव, लिओनिद: रूसी जनता प्रशांत महासागर की ओर निकलना
चाहती है, और ये लेखक पूरी दुनिया से चिल्लाकर कहता है – आह, अफ़सर के
पैर टूट गए!...”
तीखी नाक
वाला उठा और सम्गीन के सिर के ऊपर से चीख़ा:
“ ‘लाल
मुस्कान’ के लिए काफ़ी पैसे देते हैं. अंद्रेयेव ने तो पादरी को
भी नास्तिक लिखा था...”
इंजिन ने
सीटी बजाई, लड़खड़ाया और डिब्बों को झकझोर कर, लोगों को
हिला कर, फुस्स की आवाज़ के साथ बर्फ के घने बादल में ठहर गया, तीखी नाक
वाले की आवाज़ भी ज़ोर से चरमरा गई. इस आदमी ने टोपी उतार कर, बगल में
दबा ली, हो सकता है, इसलिए कि बाएं हाथ को न हिलाए, और, दायाँ हाथ
हिलाते हुए वह शब्द बिखेरने लगा, जैसे लकड़ी के डिब्बे में कीलें गिर रही हों:
“वहाँ, राजधानियों
में,
लेखक, घुमक्कड़-आवारा, झुग्गी-झोपड़ियों
से निकले हुए लोग, शराबी, सिफ़लिस के
रोगी और आम तौर से हर तरह का...बु-द्धि-जीवी, कूड़ा-करकट, सड़ा-गला –
अपने लिए आज़ादी चाहता है, उसने कॉन्स्टीट्यूशन हासिल कर लिया है, वो हमारे
भाग्य का निर्णय करेगा, और हम, यहाँ
शब्दों से खेल रहे हैं, मुहावरे गढ़ रहे हैं, चाय-पे-चाय
पिए जा रहे हैं – हाँ-हाँ-हाँ! और बोलते कैसा हैं”, वह बिलौटों
वाली औरत से मुख़ातिब हुआ, “सुनना अच्छा लगता है, कि कैसी
बातें कर रहे हैं! हर चीज़ के बारे में बातें करते हैं, और – कर
कुछ भी नहीं सकते!”
बगल से
टोपी निकालकर, वक्ता ने उसे मुट्ठी पर पहन लिया और अपने सीने
पर मुट्ठी से वार करने लगा.
“मैं पूरा
रूस घूम चुका हूँ – उसका गोल चक्कर लगाया है, आड़े-तिरछे, सीधे, ऊपर से
नीचे,
और
दाँए से बाएँ – कई बार, विदेश भी गया हूँ, कई मुल्कों
में...”
इंजिन ने
फिर से सीटी बजाई, कम्पार्टमेन्ट को झटका दिया, उसे आगे
खींचा,
बर्फ
से होते हुए, मगर ट्रेन की खड़खड़ाहट जैसे कमज़ोर पड़ गई थी, खोखली हो
गई थी,
और
तीखी नाक वाला - जीत गया : लोग चुपचाप उसकी तरफ़ देख रहे थे – सीटों की पीठ से, कॉरीडोर
में खड़े होकर, सिगरेटों का धुँआ उड़ाते हुए. सम्गीन देख रहा
था कि झुर्रियों की जाली फ़ैलते और सिकुड़ते हुए कैसे उसकी तीखी नाक वाले चेहरे को
बदल रही है, कैसे छोटे से, गोल सिर पर
सफ़ेद,
कड़ा
ब्रश हिल रहा है, भौंहे हिल रही हैं. उसके चेहरे की त्वचा तो
लाल नहीं हुई थी, मगर माथा और कनपटियाँ पसीने से नहा गए थे, आदमी टोपी
से उसे पोंछ रहा था और बोले जा रहा था, बोले जा रहा था.
“हर चीज़ के
बारे में बतिया चुके, आहें भर चुके! लेखकों ने तो रूस को ऐसे पोत
दिया,
जैसे
गेट पर डामर पोतते हैं...”
“
ब-बद-नामी!” हकलाते हुए व्यंग्य-पत्रिका का पाठक चिल्लाया.
वक्ता ने
उसकी तरफ़ अपनी रोएँदार मुट्ठी हिलाई.
“विचारों
की स्वतंत्रता! तू, शैतान, सोच, मगर – चुप
रह,
बकवास
मत कर...”
“सही है!”
कॉरीडोर से लोग चिल्लाए, मगर कोई हँसने लगा, कोई सीटी
बजाने लगा, और छोटा, तोते जैसी नाक वाला, पत्रिका
में अपना मुँह छुपा कर उत्तेजना से बोल पड़ा:
“क्-क-क्या
ब-क-वास है!”
“ईमानदारी
से कह रहा है,” चेचकरू आदमी ने सम्गीन से कहा. “ऐसे बर्ताव
करो – जैसे समोवार होता है: भीतर से – उबलते रहो, मगर उबलता
पानी – बाहर न उछालो! और मैंने – उछाल दिया...”
“पागलखाने
में भेज दिया था, तीन महीनों के लिए,” उसकी बीबी
ने फ़ैली हुई हथेली पर और एक चॉकलेट रखते हुए प्यार से कहा, मगर वक्ता
बार-बार टोपी से अपना पसीने भरा, मगर लाल न हुआ चेहरा पोंछते हुए पूरे जोशोख़रोश
से कहता रहा:
“ जनता
आज़ादी की माँग नहीं करती है, हमारी जनता – अनपढ़-किसान है, उसे सिर्फ
एक ही तरह की आज़ादी चाहिए: बदन पर ऊन उगाने की...”
“क-कटवाने
के लि-ए?” व्यंग्य पत्रिकाओं के पाठक ने पूछा, - तब तीखी
नाक वाला, उसकी ओर झुककर, कर्ण कटु
स्वर में कठोरता से चिल्लाया:
“हाँ-हाँ, उसी के
लिए! आपसे, आप जैसों से, सरकार आख़िर
कितना काट सकती है? आप सिर्फ खाते हैं और पी जाते हैं उसे. आपको
पढ़ाने में कितना खर्च होता है? दस साल तक पढ़ते हो, सरकारी
पैसे पर विद्रोह करते हो, गवर्नरों को, मिनिस्टरों
को गोली मार देते हो...”
“मिल गया
कोई इसे अफ़सोस ज़ाहिर करने के लिए,” कॉरीडोर में किसी ने ज़ोर से कहा, और किसी ने
फिर से सीटी बजाई.
“मैं –
अफ़सोस ज़ाहिर नहीं कर रहा हूँ, मैं – निरर्थकता के बारे में कह रहा हूँ!
हमारे पास – काम है, हमें जापानी युद्ध से उत्पन्न शर्मिंदगी को
सुधारना है, मगर हम – क्या कर रहे हैं?”
सम्गीन इस
बारे में सोच रहा था, कि करीब दो साल पहले इन लोगों की इस तरह
खुल्लमखुल्ला और ऐसे विषयों पर बात करने की हिम्मत नहीं होती थी. उसने ग़ौर किया कि
वे काफ़ी ओछी बातें कह रहे हैं, मगर इसे यूँ समझाया जा सकता था कि तरीका चाहे
सही न हो, मगर मतलब सही है.
‘बेशक, मतलब
भी...भद्दा है, मगर यहाँ ये ज़रूरी है, कि लोगों
ने राजनीतिक तरीके से सोचना शुरू कर दिया है, ज़िंदगी के
प्रति दिलचस्पी का दायरा बढ़ गया है. वो, सही वक्त पे, गलतियाँ
सुधार देती है...’
इंजिन ने
फिर से और इस बार बदहवासी से सीटी बजाई और जैसे वाकई में किसी चीज़ से टकरा गया, - ब्रेक्स
चिंघाड़ने लगे, बफ़र्स की प्लेटें झनझनाने लगीं, खड़े हुए
लोग,
एक
दूसरे को पकड़े हुए हिलने लगे, औरत, दीवान पे उछलकर सम्गीन के घुटनों का सहारा
लेते हुए चिल्लाई:
“ओय, ये क्या हो
रहा है?”
“ड्राइवर -
नशे में है,” तीखी नाक वाले ने बर्थ से बास्केट उतारते हुए गंभीरता
से समझाया.
ऐसा लग रहा
था कि कोई अदृश्य जुलाहे खिड़की से बाहर मोटी, सफ़ेद चादर
बुन रहे थे, जिससे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर खड़ी सैनिकों की
श्रृंखला को छुपाना चाहते हों.
“शायद किसी
का स्वागत करने आए हैं,” तीखी नाक वाले ने कहा; कण्डक्टर
ने,
जो
उसके पीछे-पीछे चल रहा था, सुधारा:
“किसी का
स्वागत-वागत नहीं कर रहे हैं, बल्कि कैदियों को ट्रेन में ठूँसने वाले
हैं...”
औरत राहत
की साँस लेकर मुस्कुराई:
“ संगीनें
तो देखो, बिल्कुल कंघियों जैसी हैं! सैनिक लोग विद्रोही जुँओं
को कंघी कर-करके बाहर निकालते हैं, तेरी मेहेरबानी, ऐ ख़ुदा!
उसने सलीब का निशान बनाया और शौहर से कहा;
“चलो, यहाँ बुफ़े
है!”
बिलौटों वाली
ख़ामोश औरत ने भी गहरी साँस ली और उठकर चली गई.
“ख़त-तरनाक
लोग,”
हकला
फुसफुसाया: उसका भी, ज़ाहिर है, बोलने का
मन हो रहा था, वह बेचैनी से दीवान पर इधर-उधर कर रहा था और, पत्रिकाओं
को पाइप से उलट-पलट करके, उसे अपने सामने हिलाने लगा, - उसके होंठ
फूले हुए थे, नीली आँखें आहत भाव से चमक रही थीं.
“ऐसे लोगों
से तो मॉनेस्ट्री भाग जाने को जी चाहता है,” उसने
शिकायत की.
सम्गीन ने
उस कोशिश के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए, जिससे हकले ने ये शब्द कहे थे, सिर हिलाया, और वो, गुलाबी
होठों को लटका कर, मुस्कुराते हुए आगे बोला:
“या फिर, बिज्जू की
तरह किसी छेद में अकेले रहा जाए...”
दीवान की
पीठ के पीछे से एक मूँछों वाला, बिना हजामत वाला चेहरा प्रकट हुआ और उसने
मूँछों के बीच से कहा:
“बिज्जू के
साथ छेद में अक्सर लोमड़ी रहती है”
उसने
तिरस्कारपूर्वक कहा और – छुप गया, और हकला डर के मारे और भी सिकुड़ गया.
मुसाफ़िरों
को थकाते हुए ट्रेन काफ़ी देर तक खड़ी रही; चेचकरू और उसकी बीबी स्टेशन से वापस आ गए, - उसकी घड़ी
किसीने मार ली थी; ऊँगली से अपनी लाल हो गई आँखों से निकल आए
थोड़े से आँसू पोंछते हुए वह झुंझलाते हुए नाक से फुनफुना रही थी.
“घड़ी बेहद
पुरानी थी, उनकी कीमत तो ज़्यादा नहीं थी, मगर – मुझे
वह दादी ने दी थी, जब मेरी शादी भी नहीं हुई थी.”
इसके बाद
ये भी पता चला कि कम्पार्टमेन्ट के दूसरे छोर पे एक सूटकेस और खोल में बंद शहनाई
भी खो गई है; तब सम्गीन की पीठ के पीछे, मोटी आवाज़
समारोहपूर्वक गूँजी:
“मेरी बात
का यकीन कीजिए: वो बातूनी – साधारण चोर था और यहाँ उसके साथी भी थे; उसने हमें
बातों में उलझाए रखा, जबकि वो - अपना काम करते रहे.
“जाना-पहचाना
तरीका है,” चेचकरू आदमी ख़ुशी से सहमत हो गया और इससे मोटी आवाज़
वाले को तैश आ गया.
“ख़ुद ही
फ़ैसला कीजिए: ये आदमी, क्यों अचानक, बेबात के, खुल कर
अपने दिल की बात कहने लगा?”
“हाँ, साहब, आपने भी
यही कहा था!”
“मैं –
आध्यात्मिक व्यक्ति हूँ!”
कम्पार्टमेन्ट
के उस भाग में, जहाँ सम्गीन बैठा था, एक
भारी-भरकम आदमी मुश्किल से घुसा, एक हाथ में काली, भारी
सूटकेस थी और दूसरे में किताबों का बण्डल, सीने पर दो
बण्डल्स, जो गर्दन में डली रस्सियों में बंधे थे. गला साफ़ करते
हुए,
उसने
सूटकेस को जाली पे फ़ेंक दिया, वहीं दो बण्डल्स को भी रख दिया, मगर तीसरा
खुल गया, और जिल्दों वाली दो किताबें छोटे हकले के घुटनों पे
गिर पड़ीं.
“स-सावधानी
से!” किताबों को फर्श पे झटक कर, कोने में दुबकते हुए वह चीख़ा.
नए मुसाफ़िर
ने अपनी सफ़ेद कँटीली भौंहे ऊपर उठाकर, कुछ पल हकले की ओर देखा, और फिर
अजीब सी घनघनाती आवाज़ में, ‘ओ’ पर ज़ोर देते हुए पूछा:
“फ़र्श पे
क्यों फेंक रहे हो? चलो, उठाओ!”
“मैं
आ-आपका नौकर नहीं हूँ...”
“ ये सही
नहीं है: इन्सान हमेशा इन्सान का सेवक ही होता है, किसी न
किसी तरह से. उठाइए भी!”
हकला और भी
कस के कोने में दुबक गया, मगर किताबों के मालिक ने तीसरी बार, बेहद
इत्मीनान से कहा:
“उठाइए.”
और उसके कंधे पे हाथ रख दिया.
कम्पार्टमेन्ट
के अगल बगल के भागों में सब खड़े हो गए, किसी हंगामे की अपेक्षा से चुपचाप पीछे की तरफ़
देखते रहे.
“तुम्हारी
ज़बर्दस्ती के कारण बात मान लेता हूँ,” हकले ने कहा, उसका चेहरा
बदरंग हो गया, पलकें झपकाते हुए वह झुका और किताबें उठाकर
उन्हें सीट पर फेंक दिया.
“वा-व्वा,” सफ़ेद दाढ़ीवाले ने उसके पास बैठते हुए संतोष से
कहा. “क्या किताबों को पैरों तले रौंदना चाहिए? ऊपर से ये –
मिल्स की ‘सिस्टम ऑफ लॉजिक’ है, वोल्फ़ का
संस्करण, सन् पैंसठ का. पढ़ी नहीं है, शायद, और – पैरों
से कुचल रहे हो!”
सफ़ेद, छोटे-छोटे
बालों की दाढ़ी वाला उसका चेहरा गोल था, ठोढ़ी और गालों की अपेक्षा, ऊपरी होंठ
पर दाढ़ी लम्बी थी, होंठ मोटे और कान भी वैसे ही मोटे थे, जो उसकी
गर्म टोपी से निकले पड़ रहे थे. घनी भौंहो के नीचे – भूरी-मटमैली आँखें. उसने ग़ौर से
सम्गीन के चेहरे की ओर देखा, चेचकरू आदमी को देखा, उसकी बीबी
को देखा, मोटे ओवरकोट की जेब से कागज़ का पैकेट निकाला, उसे खोला, मुँह बनाते
हुए ऊँगलियों से ब्रेड-सैण्डविच को टटोला और कहा:
“बेवकूफ़!
मैंने कहा था – हैम लगाकर दो, और उसने सॉसेज वाला दे दिया!”
मोटी
ऊँगलियों से उसने कागज़ समेत ब्रेड को मसल दिया और गोला बनाकर जाली में फेंक
दिया.
उसे देखते हुए, लोग अभी तक चुप थे. सबसे पहले
इस ख़ामोशी से उकताया चेचकरू आदमी.
“क्या
किताबों का व्यापार करते हैं?”
“खरीदता
हूँ”
“पढ़ने के
लिए?”
“छत को
ढाँकने के लिए.”
चेचकरू लाल
होकर हँसने लगा.
“मगर, किताबें
बेचते भी हैं!”
“क्या वाकई
में?”
“लोग कितने
बदतमीज़ हो गए हैं,” गहरी साँस लेकर औरत ने कहा. “पहले तो कितने
प्यार से बात करते थे...”
उसकी ओर
देखे बिना, किताबों वाले ने जेब से एक लकड़ी की डिबिया निकाली और
सिगरेट की नली बनाने लगा. उकता रहे लोगों ने उसकी तरफ़ और भी गुस्से से देखा, और चेचकरू
ने तैश से कह दिया:
“यहाँ
तम्बाकू पीना मना है!”
“किसने मना
किया है?” किताबों वाले ने पूछा. “नर्म, मुलायम
तम्बाकू नहीं पी रहा हूँ, और धुँआ तो धुँआ ही है! तम्बाकू वाली सिगरेट –
ज़्यादा सेहतमंद होती है, उसमें निकोटिन कम होती है...तो...”
“आप कोई
डॉक्टर तो हैं नहीं,” चेचकरू अपनी बात पर अड़ा रहा. बीबी ने उसे
चॉकलेट दिया, बोली:
“छोड़ो भी, बहस मत
करो! लो, चूसो, जल्दी!”
लोगों के
चिढ़े हुए चेहरों से - सम्गीन को हंगामा होने का पूरा अंदेशा था. छोटा हकला कड़वाहट
से हँस रहा था, आँखें सिकोड़ रहा था और, खुल्लम
खुल्ला इस शाब्दिक युद्ध में कूद पड़ने की नीयत से अपने होंठ हिला रहा था. किताबों
वाले ने हरियाले धुँए से अपने चेहरे को ढाँक कर, चेचकरू को
जवाब दिया:
“सही है, मैं
इन्सानों का डॉक्टर नहीं हूँ, मैं – जानवरों का डॉक्टर हूँ, वेटर्नरी
डॉक्टर हूँ.”
“वो तो
ज़ाहिर है, कि जानवरों के हैं,” सम्गीन के
सिर के ऊपर गहरी आवाज़ गूँजी, और ख़ामोशी छा गई, मगर कुछ पल
बाद वेटर्नरी डॉक्टर ने ज़ोर से साँस लेकर कहा:
“आग की
झाडू फेर दी किसानों ने ज़िले पर...”
उसने ये
इतनी मीठी आवाज़ में, और यकीन से कहा था, जैसे उसे
पक्का मालूम था, कि ये सब लोग उससे किसानों से जुड़ी किसी ख़बर
का ही इंतज़ार कर रहे हैं.
“सोयमोनोवों
की इस्टेट में सिर्फ काले ठूँठ कोयले बचे हैं, और बची है
राख,
और
नष्ट हो चुकी भट्टियाँ, और – लाजवाब थी इस्टेट और खेती-बाड़ी, देखरेख –
बेहद सांस्कृतिक किस्म की थी.”
वह बिना
किसी कड़वाहट के, सोच में डूबे हुए बोल रहा था, और उसकी
मीठी आवाज़ खामोशी में भर गई थी.
“मगर इस
संस्कृति ने, जो किसान के पहुँच के बाहर थी, उसमें
सिर्फ कड़वाहट भर दी, हालाँकि वहाँ का किसान – अच्छा है, ज़हीन है, मैं उसे
आर-पार जानता हूँ, आठ सालों से यहाँ काम कर रहा हूँ. किसान, - ऐसा होता
है: जितना ज़्यादा अकलमंद होगा, उतना ज़्यादा दुष्ट होगा! ये उसकी ज़िंदगी का
नियम है.”
“कम मारते
होंगे,”
किसी
ने धीरे से कहा.”
“मारना उसे
नहीं,
बल्कि
– आपको चाहिए, नागरिक,” वेटर्नरी
ने शांति से जवाब दिया, उसकी ओर देखे बिना जिसने ये कहा था, और वह किसी
की भी ओर नहीं देख रहा था. “आमतौर से किसानों पर इतने क्रूर ज़ुल्म किए जाते हैं, कि अगर
हमारे यहाँ किसानों का युद्ध शुरू हो जाए तो अचरज न होगा, जैसा कि
जर्मनी में हुआ था.”
“नहीं, ये तो, ये क्या हो
रहा है!” चेचकरू आदमी फ़ौरन और तीखी आवाज़ में चीखा. “माफ़ कीजिए, लोगों को
चिढ़ाना - और परेशान करना – क्यों हो रहा है? और – सब
ग़लत है, क्योंकि – ये हो ही नहीं सकता! युद्ध के लिए ज़रूरत
पड़ती है बंदूकों की, और गाँव में बंदूकें – हैं ही नहीं!”
“पेट के बल
गिरेगा किसान, जैसे मीत्का – अलेक्सेइ टोल्स्टॉय के उपन्यास
में,”
वेटर्नरी
ने कहा, वह पूरा मुँह खोलकर हँस रहा था और बहस करने की
संभावना से ख़ुश नज़र आ रहा था.
“टोल्स्टॉय
की रचनाओं पर कोई यकीन नहीं करता, क्योंकि ये कोई ब्र्यूसोव का कैलेण्डर नहीं, बल्कि
उपन्यास हैं, हाँ-,” सीटी बजाते हुए चेचकरू आदमी ने जवाब दिया, और उसका
चेहरा छोटे-छोटे लाल धब्बों से ढँक गया.
“मैं ल्येव
टॉल्स्टॉय के बारे में नहीं...”
“हमारे लिए
सब एक ही है! और मुझे ये कहने की इजाज़त दीजिए, कि कोई
किसानों-विसानों का युद्ध जर्मनी में नहीं हुआ था, और हो भी
नहीं सकता, जर्मन्स – अच्छी तरह से प्रशिक्षित लोग हैं, हम उन्हें –
जानते हैं, और इस युद्ध की बस, आप ही
कल्पना कर रहे हैं, दिमागों को भटकाने के लिए, जिससे हमें, बिन-किताबी
लोगों को, डरा सकें...”
वह
उन्मादित व्यक्ति की तरह चीख़ने लगा था, मुट्ठियाँ सीने पर रख लीं और आगे की ओर झुके
जा रहा था, जैसे वेटेर्नरी डॉक्टर के पेट में सिर से मारने ही
वाला हो, मगर वो, सिर को पीछे करके, ब्रश जैसे
बालों वाला टेंटुआ बाहर निकाले, - ठहाके लगा रहा था, उसका गोल
मुँह स्वरों की, व्यंजनों की बौछार कर रहा था:
“ओ-हो-ओ-हो-ओ-ओ!”
“अरे, तुम बस भी
करो,
माय
गॉड!” औरत बेहद परेशानी से से मना रही थी, शौहर के
कंधे और बगल को मुट्ठियों से धकेल रही थी. “उससे दूर हटो, या ख़ुदा, ये तुम
चिढ़ा क्यों रहे हो!” वेटेर्नरी से मुख़ातिब होते हुए वह भी चिल्लाई, मगर वो था
कि ठहाके लगाए जा रहा था, और आँसू भरी आँख़ों को पोंछ रहा था.
सम्गीन
कॉरीडोर में निकल गया, औरत की शिकायत उसका पीछा कर रही थी:
“और आपने, शरीफ़ लोगों, मुर्गों को
भिड़ा दिया और मज़ा ले रहे हैं, - आपको शर्म भी नहीं आती!”
कॉरीडोर
में भी बहस चल रही थी, किसी ने कहा:
“हमारी
पीढ़ी विकास की अवधारणा में विश्वास करती थी...मगर भौतिकवादी उसे तोड़-मरोड़ कर
तकनीकी विकास की अवधारणा तक ले आए.”
सम्गीन कुछ
देर कम्पार्टमेन्ट से बाहर निकलते हुए चौकोर के दरवाज़े के पास खड़ा रहा, इस बारे
में भाषण सुनते हुए कि फ़ैक्टरियों ने कैसे गाँव के पारंपरिक जीवन को नष्ट कर दिया
है,
फिर
किसी की कड़वाहट भरी टिप्पणी गोगोल की त्रोयका के बारे में और वह बाहर चौकोर पे
निकल आया, ट्रेन की ठण्डी खड़खड़ाहट में. दूर बर्फ़ीले खालीपन में
नारंगी धुंधलका अप्रियता से दहक रहा था, और ट्रेन उसकी ओर मुड़ रही थी. कम्पार्टमेन्ट
में हो रही बातों ने उसे थका दिया था, मूड ख़राब कर दिया था, कुछ बिगाड़
दिया था. कुछ इस तरह का एहसास हो रहा था, कि ट्रेन उसे दूर, विगत में, बाप की, वराव्का की
और गंभीर मरिया रोमानोव्ना की बहसों की ओर वापस ले जा रही है.
‘मेरे दिमाग़
की नसें फ़टने वाली हैं...’
इसके बाद
उसने अकस्मात् सोचा, कि कम्पार्टमेंन्ट का, ट्रेन का, दुनिया का
हर आदमी पारिवारिक, असल में – प्राकृतिक हितों के पिंजरे में बंद
है;
हरेक
को पिंजरे की डंडियों से दुनिया करीने से लाइनें बनाई हुई दिखाई देती है, और, जब बाहर से
कोई ताकत डंडियों की लाइन को मोड़ती है, तो, - दुनिया विकृत प्रतीत होने लगती है. और यहाँ से
शुरू होता है नाटक. मगर ये किसी और का विचार था: ‘पिंजरों
में बंद सिस्किन’ – उसे मरीना के शब्द याद आए, बुरा लगा, कि पिंजरों
के बारे में उसने ख़ुद नहीं सोचा था.
शाम के
धुंधलके ने, जल्दी-जल्दी अपने रंग़ बदलते हुए, अब आसमान
को प्राचीन, सस्ती ओलियग्राफ़िक पेन्टिंग की तर्ज़ पर रंग दिया था, बर्फ, जैसे राख
से ढँक गई थी, और अब नहीं चमक रही थी.
‘मैं
आत्महत्या भी कर सकता हूँ’, अचानक क्लीम ने अंदाज़ लगाया, मगर ये भी, ऐसे ही लगा, जैसे किसी
और ने उससे कहा हो.
‘मरीना भी, बेशक, पिंजरे में
बंद है’, - उसने फ़ौरन सोचा. “वह भी सीमा के भीतर है. मगर मैं –
सीमा के भीतर नहीं हूँ, आज़ाद हूँ...’
मगर वो ये
नहीं समझ पा रहा था कि सवाल पूछ रहा है या इस बात की पुष्टि कर रहा है. बेहद ठण्ड
थी,
मगर
धुँए भरे कम्पार्टमेन्ट में , जहाँ सब लोग बहस कर रहे हैं, - जाने का मन
नहीं था. स्टेशन पर उसने कण्डक्टर से कहा कि पहले दर्जे में उसका इंतज़ाम कर दे.
वहाँ वो सोफ़े पर लेटा और, कुछ भी सोचने से बचने के लिए, रेल की
पटरियों पर पहियों की खड़खड़ाहट के ताल में कविता ढूँढ़ने लगा; उसे एकदम
तो कविता नहीं मिली, मगर फिर भी काफ़ी जल्दी मिल गई:
घोड़ेकोदौ-ड़मेंरो-केगा
जलती –ईझोपड़ीमें – घुसेगा...
‘ और हो सकती
है – आर्च्प्रीस्ट अव्वाकुम की बीबी’, सिगरेट पीते हुए उसने सोचा.
.
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