शुक्रवार, 26 मई 2023

Klim Samgin - 3.4

 

A.M.Gorky  Translated by A, Charumati Ramdas

पूरा शहर ड्यूमा के चुनावों की तैयारी में व्यस्त था, रास्तों पर परेशान लोग पैदल और गाड़ियों में भाग दौड़ कर रहे थे, फ़ेन्सिंग्स पर पार्टियों की अपीलें चमक रही थीं, ‘रूसी जनता के संघके सदस्य उन्हें फ़ाड़ देते और अपनी अपीलें चिपका देते.

ये सब सम्गीन की नज़रों के सामने ही हो रहा था, मगर एक किनारे पे खड़े रहना असहज और अटपटा लग रहा था, और दो-तीन बार वह स्थानीय नेताओं की मीटिंग्स में गया. जो कुछ भी उसने सुना, सभी नेताओं के भाषणों से वह परिचित था; उसने ग़ौर किया, कि लेफ्टिस्ट्स ज़ोर से बोलते हैं, मगर उनके शब्दों में दम नहीं था, और ऐसा महसूस हो रहा था, कि वक्ता काफ़ी तनाव में बोल रहे हैं, जैसे बची-खुची ताकत समेट कर अपनी बात कह रहे हैं. उसने इस बात को स्वीकार किया कि सबसे बढ़िया भाषण नगर-ड्यूमा में आयोजित कैडेट्स-पार्टी की मीटिंग में, स्थानीय कमिटी-मेम्बर – मरीना के भूतपूर्व एटोर्नी ने दिया था.

पेट को हरे कपड़े से ढँकी मेज़ के किनारे से टिकाए, घडी की नाज़ुक सोने की चेन से खेलते हुए, और दूसरे हाथ की ऊँगलियों से जैसे हवा में नमक छिड़कते हुए, पीले चेहरे वाला आदमी खनखनाती आवाज़ में कृत्रिम रूप से गढ़े गए वाक्यों को दनादन उछाल रहा था; उसकी आँखों के नीले से ढेलों में काली पुतलियाँ अंगारों जैसी चमक रही थीं, और दूर से ऐसा लग रहा था, कि उसका गोल चेहरा तमतमा रहा है. उसका भाष्न ध्यान से, ख़ामोशी से सुन रहे थे, और ऐसा लग रहा था कि इस ख़ामोशी में आदर के साथ ऐसी उकताहट शामिल थी, जैसी किसी अत्यंत आदरणीय सामाजिक कार्यकर्ता की दसवीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित समारोहों में होती है.

वक्ता इस बारे में बता रहा था, कि युद्ध ने रूस के अंतर्राष्ट्रीय महत्व को हिलाकर रख दिया है, उसे शांति की नुक्सानदायक, शर्मनाक शर्तों पर हस्ताक्षर करने के लिए, और जर्मनी के साथ गेंहूँ के निर्यात के लिए कठोर समझौता करने पर मजबूर कर दिया. क्रांति ने देश की अर्थव्यवस्था को बेहद नुक्सान पहुँचाया है, मगर यह बड़ी कीमत चुकाकर उसने निरंकुश शासन को सीमित कर दिया है. स्टेट-ड्यूमा की गतिविधियों को धीरे-धीरे जनता द्वारा हासिल किए गए अधिकारों को विस्तृत करना चाहिए, रूस का यूरोपीकरण और प्रजातंत्रीकरण करना चाहिए.

वह चुप हो गया, पानी का गिलास उठाकर होंठों के पास लाया, मगर, दाएँ हाथ को ऐसा घुमाया, जैसे पानी में ऊँगली डालना चाहता हो,- गिलास को वापिस जगह पर रखा और कुछ अधिक तनाव से. बल्कि गुस्से से भी, मगर नाउम्मीदी से भी आगे कहने लगा:

“मेन्शेविक्स, सोशलिस्ट- रिअलिस्ट्स, समझ गए हैं कि क्रांति अपने आप से तो निर्माण करने में समर्थ नहीं है, वह सिर्फ अत्यावश्यक सामाजिक सुधारों के मार्ग की बाधाओं का विनाश करती है, उन्हें तहस-नहस कर देती है. वे समझ गए हैं कि वर्गों के सहयोग के बिना संस्कृति संभव नहीं है. सोशलिस्ट-यूटोपियन्स श्रमिक वर्ग की शक्ति में अपने रहस्यमय विश्वास समेत – कुचल दिए गए हैं, इतिहास के मंच से लुप्त हो गए हैं. सब समझते हैं, कि देश को राजनीति और संस्कृति के क्षेत्र में एक शांत, नियमित काम की ज़रूरत है. अंत में – सबको उस तूफ़ान के क्रूर झटकों से कुछ राहत की ज़रूरत है, जिसे अभी-अभी हमने झेला है. हमारे सामने – महान चुनौती है: लाखों किसानों को अपने पैरों पर खड़ा करने की. और – एक बार फिर – वर्गों के सहयोग के बिना विकास संभव नहीं है, - इस सत्य की पुष्टि यूरोप के सांस्कृतिक विकास का समूचा इतिहास करता है, और इसे सिर्फ वे ही लोग नकार सकते हैं, जिनके मन इतिहास के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का लेश-मात्र भी नहीं है...”  

इन विचारों से सहमत होने के लिए सम्गीन को कोई ख़ास कोशिश नहीं करनी पड़ी. ये विचार काफ़ी पहले उसके मन में आए थे और शब्दों द्वारा प्रकट किए जाने की माँग न करते हुए वहीं मौजूद थे. सम्गीन को वक्ता ने गुस्सा दिला दिया – उसने फूहड़पन से इन विचारों को अनावृत और बदरंग कर दिया था, ‘जिन्हें ऐतिहासिक तर्कने विकसित किया था.

सम्गीन को ऐतिहासिक तर्क के प्रमाणों को ताज़ा करने की, उनमें गहरे पैंठ जाने की आवश्यकता का अनुभव हुआ, वह उन्हें अपने तर्कों से, अपने, व्यक्तिगत अनुभवों की सामग्री से मज़बूत करना चाहता था. उसने काफ़ी कुछ सहा था, और हालाँकि उसकी तार्किक बुद्धि तथ्यों को दर्ज करने से’, ‘वाक्यांशों की प्रणालीसे थक गई थी, मगर इस यांत्रिक, दुखदाई, निरर्थक आदत को खोया नहीं था. अनुभव के संचय की निरर्थकता ने उसे थका दिया था और परेशान कर दिया था. वह ये स्वीकार करना नहीं चाहता था, कि उसने तर्क के प्रति मरीना के अविश्वासयुक्त रवैये को अपना लिया है, मगर वह महसूस ज़रूर कर रहा था, कि मरीना की बातें उस पर किताबों से ज़्यादा असर कर रही हैं. और, आख़िर में, ऐसे पल थे तो सही, जब सम्गीन ने अप्रिय स्पष्टता से महसूस किया था, कि हालाँकि गुज़रते हुए पलका चेहरा सांत्वना देते शब्दों की धूल से गहरे ढँका है और निरंतर ढँक रहा है, मगर मरीना के चौकीदार के लाल और गुस्सैल चेहरे की तरह ये चेहरा उसके सामने खड़ा हो जाता था.

उसे भाई की याद आई: हाल ही में किसी मोटी पत्रिका में उत्तरी क्षेत्र के नृजातिविज्ञान पर लिखी द्मित्री की पुस्तक के बारे में बेहद प्रशंसात्मक लेख छपा था.

मुझे भी अपने अवलोकनों से निष्कर्ष निकालने चाहिएउसने फ़ैसला किया और ख़ाली समय में अपने पुराने नोट्स को फिर से पढ़ने लगा. ख़ाली समय पर्याप्त था, हालाँकि मरीना के केसेस की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी, और अक्सर ये बड़े अजीब, एक ही जैसे मामले होते थे: मरीना को अपनी, अक्सर भारी-भरकम, सम्पत्ति देने से इनकार करते हुए कहीं कोई विधवाएँ, बूढ़ी कुमारियाँ, नि:संतान व्यापारी मरते जा रहे थे.

“मेरे शौहर के दूर के रिश्तेदार,” वह समझाती.

क्लाएन्ट्स की संख्या बढ़ती जा रही थी, सम्गीन के पास काऊन्टीज़ से और पड़ोसी प्रांतों से भी दाढ़ीवाले, सम्माननीय व्यापारी आने लगे थे.

“ज़ोतिखा, मरीना पेत्रोव्ना ने आपका पता दिया है”, वे कहते, और ऐसा महसूस होता कि इन लोगों के लिए मरीना – महत्वपूर्ण व्यक्ति है. इसको वह इस तरह समझाता कि, प्रांतीय, अध-जंगली लोग उसकी व्यावसायिक बुद्धि की, ज़िंदगी की उसकी समझ की सराहना करते हैं.

सर्दियों की शामों को, कमरे की गर्माहट भरी ख़ामोशी में, वह, सिगरेट के कश लेते हुए, लिखने की मेज़ पे बैठता और बिना जल्दबाज़ी किए अपनी आप बीती और अपने पढ़े हुए को कागज़ पर उतारता रहता – ये उसकी भावी किताब की सामग्री थी.  पहले तो उसने शीर्षक रखा: रूसी जीवन और इतिहास तार्किक बुद्धि के परिप्रेक्ष्य में’, मगर ये शीर्षक उसे बहुत क्लिष्ट लगा, उसने उसे दूसरे शीर्षक से बदल दिया:

कला और बौद्धिकता’; फिर ये महसूस करके कि ये काफ़ी विस्तृत विषय है, ‘बौद्धिकताके साथ रूसीशब्द जोड लगा दिया और, अंत में, विषय को भी ज़्यादा सीमित कर दिया: गोगल, दस्तयेव्स्की, टॉल्स्टॉय तार्किक बुद्धि के परिप्रेक्ष्य में’. इसके बाद हाथ में पेन्सिल लेकर उसने इन तीनों लेखकों को फिर से पढ़ना शुरू किया, और ये बहुत अच्छा लग रहा था, बड़ी शांति दे रहा था और जैसे वर्तमान गतिविधियों से उसे ऊपर उठा रहा था.

गोगल और दस्तयेव्स्की ने काफ़ी सारे तथ्य प्रस्तुत किए, जो सम्गीन के स्वभाव की मूल विशेषताओं के काफ़ी अनुकूल थे, - ये उसने अच्छी तरह महसूस किया, और इससे अच्छा भी लग रहा था. जीवन की कुरूपता और मानसिकता की सनकी उच्छृंखलता ने सम्गीन को वास्तविकता से उसके अपने संघर्ष को समझाया,  और दस्तयेव्स्की के नायकों द्वारा अडिग सत्य और आंतरिक स्वतंत्रता की खोजों ने, उसे फिर से उठाकर, साधारण लोगों की भीड़ से अलग करके, दस्तयेव्स्की के अशांत नायकों के निकट खड़ा कर दिया.              

मगर कई बार वह अपने आप से पूछते हुए मेज़ पर पेन्सिल फेंक देता:

मैं – वैसा नहीं हूँ, जैसे ये लोग हैं, उनसे ज़्यादा स्वस्थ्य हूँ, ज़िंदगी के प्रति मेरा रवैया ज़्यादा शांतिपूर्ण है’.

मगर वास्तविकता, अमूमन उन सिद्धांतों के अधीन नहीं होती, जिन्होंने उसकी सतह पर शब्द रूपी धूल की मोटी परतों के रूप में जमा होकर उसे शांत करने की कोशिश की थी, - वास्तविकता उसे धकेलती और परेशान करती रही.

सर्दियों के अंत में वह मॉस्को गया, अपील-कोर्ट में केस जीत गया, ख़ुश होकर हॉटेल में लंच के लिए गया और, वहाँ बैठे हुए, उसे याद आया, कि अभी दो साल भी नहीं बीते थे, जब वह इसी हॉल में ल्यूतोव और अलीना के साथ बैठा था, शाल्यापिन को दूबिनूश्कागाते हुए सुन रहा था. और एक बार फिर ये अविश्वसनीय लगा, कि इस दौरान इतनी सारी घटनाएँ और इतने सारे अनुभव समा गए हैं – इतने कम समय में.

और समय की असीमित थैली में धरती का गोला निरंतर घूम रहा है’, उसे हाल ही में पढ़ा हुआ वाक्य याद आया और उसने सोचा, कि लिओनिद अन्द्रेयेव को, सोलोगूब को भी दस्तयेव्स्की और गोगल के साथ जोड़ना होगा. और उसके बाद मेन्यू-कार्ड पर नज़र डालते हुए, आवाज़ों के शोर को सुनते हुए, इस बारे में सोचने लगा, कि, शायद, लोग कहीं भी इतनी ख़ुशी से और इतना शोर मचाते हुए नहीं चलते, जितना मॉस्को में चलते हैं. उसके बाईं ओर, दीवार के पास वाली बड़ी मेज़ पर बेहद ज़्यादा शोर हो रहा था, - वहाँ सात लोग बैठे थे, और उनमें से एक, ऊँचे, दुबले-पतले, छोटे सिर, लाल चेहरे पर छितरी मूँछों वाले ने, ऊँची, पतली आवाज़ में इस शोरगुल को चीरते हुए व्यंग्यात्मक फ़िकरा कसा:

“यूरोप में उद्योजक मंत्रियों को मार्गदर्शक विचारों की प्रेरणा देते हैं, मगर हमारे यहाँ – इसका उलटा होता है: हमारे यहाँ उत्पादकों के संगठन की आवश्यकता पर मिनिस्टर ककोव्त्सोव ने पिछले ही साल इशारा किया है!”

सम्गीन के पीछे, चीड़ के नीचे, चिड़चिड़ी आवाज़ में दो लोग बात कर रहे थे, और उनमें से एक शराबी आवाज़ जानी-पहचानी थी.

“बकवास! सैनिक क्रांति नहीं करते.”

“धीरे!”

“गोली चलाना, नीग्रो लोगों को....”

“तुम- सोचो: फ़ौजी टुकड़ी, प्रेअब्राझेन्स्की रेजिमेन्ट की...”

“ऊपर से: गोली चलाओ! किसी बकवास देहात मिद्वेद् में निर्वासित करने का क्या मतलब है? ऐसे नष्ट करना, जैसे अंग्रेज़ों ने सिपाहियों को किया था...”

“ये तुम गैर-संजीदगी से कह रहे हो.”

“मैं तुमसे ज़्यादा जानता हूँ,” नशीली आवाज़ में गुस्से से पागल व्यक्ति चिल्लाया, और सम्गीन को फ़ौरन याद आया:

ये – तगील्स्की है. अगर उसने मुझे पहचान लिया, तो अच्छा नहीं लगेगा’.

वह थोड़ा सा उठकर इधर-उधर नज़र दौड़ाने लगा, कि कहीं कोई ख़ाली जगह तो नहीं है?

कोई मेज़ खाली नहीं थी, और छोटे सिर वाले ने मेज़ पर हथेली मारी और उसकी चिरचिरी आवाज़ चीखी:

“क-भी–नहीं! मूल्य-निर्धारण में मज़दूरों को तभी शामिल किया जा सकता है, जब वे उद्योग के नुक्सान की ज़िम्मेदारी भी अपने ऊपर लें!”

वह उठा और जल्दी से, अपने साथ मेज़ पर बैठे हर व्यक्ति के सामने एक ही तरह से अपना चिकना सिर हिलाते हुए उनसे हाथ मिलाने लगा, फिर सिर को ऊँचा उठाकर, एक हाथ पीठ के पीछे रखकर, दूसरे में घड़ी पकड़े, उसके डायल पर नज़र डालते हुए, लम्बे-लम्बे पैरों के चौड़े-चौड़े कदमों से दरवाज़े की तरफ़ गया, उस आदमी की तरह, जिसे पूरा विश्वास है, कि लोग समझ जाएँगे कि वह कहाँ जा रहा है, और उसे रास्ता देने की कोशिश करेंगे.      

अख़बारों से सम्गीन को पता चला था, कि पीटरबुर्ग में कारखानेदारों और उत्पादकों के समाजका संगठन किया गया है और मॉस्को के उद्योगपति इसी के बारे में दौड़-धूप कर रहे हैं, - शायद ये लम्बू – ऐसा ही एक संगठनकर्ता है. तगील्स्की स्पष्टता से भुनभुनाया:

“सिम्योनोव्स्क रेजिमेन्नट में एक पंछी ने बक दिया, कि मॉस्को में रेजिमेन्ट ने उन लोगों को नहीं मारा, - समझ रहे हो? उन लोगों को नहीं! सैनिकों ने फ़ौरन उसकी चुगली कर दी...”

सम्गीन के दाईं ओर, बेतहाशा खाते हुए, तीन लोग बैठे थे: चर्बी की पर्तें चढ़ी, छोटी गर्दन और चौड़े कंधों वाल महिला, बढ़िया बाल बनाए, मुड़ी हुई मूँछों वाला, चश्मे वाला स्टूडेन्ट, जो भेस बदले हुए नाई जैसा लग रहा था, और नीली-सी थैलियों में बड़ी-बड़ी आँखें रखे, सीने पर तमगा लटकाए, गोल चेहरे वाला शरीफ़ आदमी; वह धीरे-धीरे और अपमानित सुर में कह रहा था:

“मैं ख़ुद ही गवाह था, मैं बम्पार की बगल में जा रहा था. और ये वाकई में मज़दूर थे. तुम धृष्ठता को समझ रहे हो? फ्रान्स के राजदूत की गाड़ी को रोकना और उसके मुँह पे चिल्लाकर कहना: हमारे त्सार

को पैसे क्यों देते हो, क्या इसलिए कि वो हमें मारे? इसके लिए उसके अपने ही काफ़ी हैं’.

  “भयानक,” महिला ने फूले-फूले तीतरों को प्लेटों में रखते हुए, मोटी आवाज़ में शांति से कहा, और पूछा: “और क्या ये सच है, कि लाऊनित्स को इसलिए मार डाला, क्योंकि वह वित्ते को गिरफ़्तार करना चाहता था?”     

मगर मम्मा,” स्टूडेन्ट ने माथे पर बल डालकर कहा, “ये साबित हो गया है, कि लाऊनित्स को सोशलिस्ट-क्रांतिकारियों ने मारा है.”

महिला ने उसी तरह भारी आवाज़ में, शांति से कहा:

“मैं ये नहीं पूछ रही हूँ, - किसने, मैं पूछ रही हूँ – किसलिए? और मुझे उम्मीद है, बरीस, कि तुम्हें मालूम नहीं है, कि क्रांतिकारी, सोशलिस्ट्स कौन हैं और वे किसके लिए काम करते हैं. और क्रेनबेरीज़ लो, मत्वेय!”

तमगे वाले आदमी ने क्रेनबेरीज़ लीं, और बड़ी मुश्किल से गहरी साँस लेकर, सूचित किया:

“बूढ़ा सुवोरिन इस बात की पुष्टि करता है कि, जैसे, गरिमीकिन ने उससे कहा था: वो इस्टेट्स जला देते हैं, ये बुरी बात नहीं है, कुलीन वर्ग को सबक सिखाना होगा कि वो क्रांति के लिए काम न करें’. मगर, या ख़ुदा, हमने कब क्रांति के लिए काम किया है?”

“”भयानक,” महिला ने गिलासों में वाइन डालते हुए कहा. “और ऊपर से गरिमीकिन – गद्दारी करेगा. स्टूडेन्ट ने हँसते हुए कहा:

“अंकल, तुम दिसम्बरवादियों के बारे में भूल गए...”

ये – कॉमेडी वाले लोग हैं,’ सम्गीन ने सोचा. जब मैं इनके बारे में बताऊँगा, तो मरीना हँसेगी’.

इस तिगड़ी ने उसका काफ़ी दिल बहलाया. उसने सोचा, कि शाम थियेटर में गुज़ारेगा, - ट्रेन आधी रात के करीब छूटने वाली थी. मगर अचानक उसके सामने ल्यूतोव का तिरछी आँख़ वाला चेहरा झुका, - सम्गीन की इस आदमी से मिलने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी. मगर ल्यूतोव बोलने भी लगा:

“वाह – आकस्मिक घटना! बकवास; जैसे घटना के बारे पूर्वानुमान लगाया जा सकता है! मगर – ऐसा कहते हैं! मुझे बताया गया था, कि तुम तीन साल के लिए वोलोग्दा भेजे गए हो, - क्या ये गलत है?”

उसने मोटे, चमकीले, रोंएदार कपड़े का असाधारण रूप से चटकदार सूट पहना था, बौना नज़र आ रहा था, मगर जैसे और ज़्यादा उन्मुक्त लग रहा था.

“हालाँकि – वोलोग्दा में भी पीते हैं. क्या तुमने अभी शुरूआत नहीं की? मज़ेदार बात है, तुम्हारे ये कैसे पर निकल आए हैं?”

वह दबी आवाज़ में बोल रहा था, मगर फिर भी बड़ा बुरा लग रहा था, कि वह उजले बालों और तीखी आँखों वाले वेटर के सामने इस लहजे में बोल रहा था. अब वह उसके कंधे को ऊँगलियों से धकेल रहा है; “ कैबिन मिल सकता है, वास्या?”

“जी. स्नैक्स?”

“ज़रूर.”

“और फिर?”

“ख़ुद ही सोच ले, फ़रिश्ते.”

मॉस्को का पुराने फ़ैशन का डेमोक्रेटिज़्म दिखा रहा है’, समगीन ने चश्मे के नीचे से लोगों की ओर देखते हुए ग़ौर किया, - कोई-कोई व्यंग्य से ल्यूतोव की तरफ़ देख रहा था. फिर भी, सम्गीन को महसूस हुआ, कि ल्यूतोव को सचमुच में उसे देखकर ख़ुशी हुई है. कैबिन की ओर जाते हुए, कॉरीडोर में, सम्गीन ने पूछा: अलीना कहाँ है?                

“अलीना?” बेवजह ही ल्यूतोव ने पूछ लिया, “अलीना फ़्रान्स की राजधानी ल्युतेसिया में रहती है और वहाँ से मुझे लम्बे, गुस्से भरे ख़त लिखती है, - फ़्रान्सीसी लोग उसे अच्छे नहीं लगते. उसके साथ कोस्त्या मकारोव गया था, दुन्याशा भी जाने वाली है...” सम्गीन को कैबिन के दरवाज़े में धकेल कर, उसने उसे सोफ़े पर बिठाया, ख़ुद उसके सामने कुर्सी पर बैठा, झुका और बोला:

“तो, बताओ, - क्या हाल है?”

उसकी अजीब सी आँखें जैसे शांत हो गई थीं, अब इतना छुपना नहीं चाहती थीं, जैसा पहले होता था. फूले हुए चेहरे पर लाल नसों का जाल फ़ैला था, - जो लिवर की बीमारी को दर्शाता था.

“कुछ मुटा गए हो,” सम्गीन का निरीक्षण करते हुए उसने कहा. “तो, तुम आख़िर क्या सोचते हो, आँ?”

“किस बारे में?” सम्गीन ने पूछा.

“जैसे – पादरियों के बारे में? किसानों ने पार्लियामेन्ट में इतने सारे पादरियों को क्यों भेज दिया? क्या वो अच्छे मालिक हैं? क्या सोशलिस्ट-क्रांतिकारी होने का नाटक किया? या – कोई और बात है?”

“बोलते हुए, वह जैसे अपने ही शब्दों से झुलस रहा था, कभी फूँक मारता, कभी उन्हें चूसता.

नाटक शुरू हो रहा है’, सम्गीन ने गौर किया, मगर ल्यूतोव जल्दी-जल्दी बोले जा रहा ता:

“किसान को पादरी अच्छे नहीं लगते, वो उन पर यकीन नहीं करता, पादरी – पैरासाइट हैं, और – अचानक?”

“मेरा ख़याल है, कि ड्यूमा में पादरियों की संख्या उतनी ज़्यादा नहीं है. और वैसे भी, मैं ठीक से समझ  नहीं पा रहा हूँ – कि तुझे क्या परेशानी है?” सम्गीन ने पूछा.

ल्यूतोव ने आँखें सिकोड़कर उसकी तरफ़ देखा, ऊँगलियाँ चटकाईं.

“मुझे यकीन नहीं है, - समझते हो! पादरी के ऊपर होता है बिशप, बिशप के ऊपर – धर्म-सभा, फिर होता है कुलपिता, वो कोई, पता है इसिडोर, पोप में निष्ठा रखने वाला-उनिआत. हमारा चर्च रोमन-कैथोलिक आधार पर बना है, वो किसान का गला पकड़ लेता है, जैसे कि स्पेन में, इटली में होता है, - आँ?”

“कैसी अजीब फ़ैन्टेसी है,” सम्गीन ने कंधे सिकोड़ते हुए कहा.

“फ़ैन्टेसी?” ल्यूतोव ने सवालिया लहज़े में दुहराया और – सहमत हो गया: “अच्छा – ठीक है, मान लेते हैं!” अच्छा, अगर ऐसा है: पादरी – सबसे शुद्ध रूसी खून वाला हो, तो इस लिहाज़ से पादरी लोग कुलीनों से ज़्यादा शुद्ध हुए – सही है ना? तुम कल्पना नहीं कर रहे हो, कि पादरी कोई अत्यंत रूसी, अप्रत्याशित आविष्कार कर सकता है?”

“ क्या न्यायिक जाँच, कहना चाहते हो?” सम्गीन ने गुस्से से पूछा. ल्यूतोव ने गंभीरता से कहा:

“न्यायिक जाँच – ये तो अपने आप ही होगी, मगर इसके अलावा कोई बेहद दुखद – सर्व-रूसी किसानों के प्रतिनिधि के रूप में?”

“किसान की तरफ़ से तुम...हम कुछ भी नहीं सुनेंगे, सिवाय इसके, कि: मुझे ज़मीन वापस दो,’ सम्गीन ने अनिच्छा से, और गुरगुराते हुए कहा.

अपने धब्बेदार चेहरे को सिकोड़कर, हिलते हुए, सिर को झटकते हुए, ल्यूतोव उस आदमी जैसा लग रहा था, जो दाँतों के डॉक्टर की कैबिन में बैठे हुए, दांत के दर्द से हैरान हो रहा हो.

“तो,” उसने कहा. “बिल्कुल आसान है. मगर मैं, भाई, किसी असाधारण बात की उम्मीद कर रहा हूँ...”

अभी तक असाधारण बात से बेज़ार नहीं हुए हो?’- सम्गीन पूछना चाहता था, मगर उजले बालों वाला  वेटर अंदर आया और उसके साथ एक छोकरा भी था, - वो ट्रे में स्नैक्स लाए थे; ल्यूतोव ने पूछा:

“क्या, वास्या, मालिक लोग तुम्हारी यूनियन को नहीं मानते हैं?”

“नहीं चाहते,” वास्या ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.

“अब क्या करने का इरादा है?”

वेटर ने नैपकिन को गोल-गोल मरोड़ा, उसे अपनी हथेली पे मारा और गहरी साँस लेकर कहा:

“मालूम नहीं. हड़ताल से – कोई फ़ायदा नहीं होगा, सब लोग भूख से परेशान हो गए हैं, थक गए हैं. पीटर्स के मज़दूर कारखानों के गोदामों से सामान बाहर ले जाने में रुकावट डाल रहे हैं, मगर हमें – क्या करना है? बर्तन तोड़ें? प्लीज़ खाइए,” उसने कहा और निकल गया.

सम्गीन ने फिर से उसके बर्ताव को दिखावे के डेमोक्रेटिज़्मके रूप में परिभाषित किया.

वेटर उसे अच्छा नहीं लगा, - वह लापरवाही से बोल रहा था, ब्रश जैसी उसकी उजली मूँछें बुरी तरह से खड़ी थीं, और ऊपर वाला छोटा सा होंठ, थोड़ा सा ऊपर उठते हुए छोटे-छोटे, तीक्ष्ण दाँतों को अनावृत कर रहा था.

“छोकरा बेवकूफ़ नहीं है,” जाते हुए वासिली की ओर देखकर सिर हिलाते हुए और जामों में वोद्का डालते हुए ल्यूतोव ने कहा. कम्युनिस्ट मेनिफ़ेस्टोज़ुबानी याद कर लिया है और वैसे भी – पढ़ता रहता है! तुम, बेशक, जानते हो कि मेनिफेस्टो वाला पर्चा कितने लाखों में बँट चुका है? ये – विस्फ़ोट होने वाला है! पिएँगे...”

सम्गीन ने जाम टकराते हुए पूछा:

“क्या तुझे ख़ुशी है, कि विस्फ़ोट होगा?”

“चालाकी से पूछा है!” ल्यूतोव प्रसन्नता से चिल्लाया. “कोई मतलब नहीं, जैसे किसी पराए काम के बारे में पूछा हो! अभी भी उदासीन, बेरिकैड वाले मास्टर का ही खेल खेल रहे हो? मुझसे तो साज़िश वाला खेल नहीं खेलना चाहिए था.”

सम्गीन ने ठण्डी ऑरेंज वोद्का का बड़ा जाम गटक लिया और, सेलमन मछली खाते हुए, अविश्वास से ल्यूतोव की ओर कनखियों से देखा, - वो नैपकिन को गर्दन में बाँध रहा था और शब्दों से झुलसते हुए कह रहा था:

“मैं - व्यापारी हूँ, मगर मेरे पास आँखों की जगह पे सिक्के नहीं चिपके हैं. मैं, भाई, अपने वर्ग में – सफ़ेद कौआ हूँ, और मैं तुझसे साफ़-साफ़ कहता हूँ: अपने वातावरण से किसी भी आंतरिक संबंध को महसूस न करते हुए, मुझे कभी-कभी दुख होता है...बल्कि इससे मैं बीमार भी हो जाता हूँ...बात ऐसी है! कभी-कभी सोचते हो: कि बेहतर है सूली पर चढ़ा दिया जाना, बजाय इसके कि शून्य में ऊँचाई पर लटकने के. मगर अपने वातावरण में - घुल-मिल नहीं सकता, हो सकता है, इसलिए, कि शक्ति नहीं है, कम ताकतवर हूँ. अभी कुछ दिन पहले चित्वेरिकव कह रहा था, कि मज़दूरों की यूनियन्स में आतंकवादी, अराजकतावादी और हर तरह के अजूबे छुपे हुए हैं और ये कि मालिकों को यूनियन्स को भंग करने के सारे उपाय करने चाहिए. ज़ाहिर है, वह – मालिक है और उसका काम मजबूर करता है, कि वह मज़दूरों के ख़िलाफ़ संघर्ष करे, मगर – तुमने देखा होता, कि जब वह ये कह रहा था, तो उसका थोबड़ा कितना घृणित लग रहा था! और, आम तौर से, भाई, वे इस तरह के बने होते हैं, कि अगर अगर अपने हाथों में सत्ता ले लेंगे...”

व्लादीमिर ल्यूतोव का चेहरा लाल हो गया, आँखें, ठहरने की कोशिश में, थरथराने लगीं, फिसली हुई चैरी को पकड़ते हुए वह अंधे की तरह प्लेट में चम्मच घुसा रहा था और सम्गीन के दिल में अटपटेपन का एहसास पैदा कर रहा था. सम्गीन ने इससे पहले कभी भी देखा नहीं था, महसूस नहीं किया था, कि इस आदमी ने इतनी गंभीरता से बात की हो, बिना कृत्रिमता के, बिना अप्रिय लटके-झटकों के. सम्गीन ने चुपचाप जामों में और वोद्का डाली, और ल्यूतोव नैपकिन को गर्दन से खींचकर कहता रहा:

“तुझे मेरा...मिजाज़ मुश्किल से समझ में आता है, तू अपने आदर्श से, साज़िश वाले काम से घिरा हुआ , सुरक्षित है, रहता है, मतलब, ऊँचाई पर, एक बुर्ज़ में, पहुँच से बाहर. मगर मुझे तो कब से अपने बारे में सोचने की आदत हो गई है, कि एक इन्नसान के रूप में मैं – किसी काबिल नहीं हूँ. क्रांति ने मुझे इस बात का पक्का विश्वास दिला दिया है. अलीना, मकारोव और उन जैसे हज़ारों – सब ऐसे ही लोग हैं – कहीं भी, किसी भी काबिल नहीं – अजीब जमात है: बुरी नहीं, मगर – अनावश्यक. बिना जड़ वाले लोग. ऐसे भी क्रांतिकारी हैं, मिसाल के तौर पर, जैसे इनोकोव, - तुम उसे जानते हो. वो घर को, चर्च को नष्ट तो कर सकता है, मगर एक मुर्गी का दड़बा भी बना नहीं सकता. और नष्ट करने का अधिकार सिर्फ उसे है, जो जानता हो, कि निर्माण कैसे करना चाहिए, और निर्माण करना जानता हो.”

सम्गीन ने महसूस किया कि ये अप्रत्याशित बातें उसे उत्तेजित कर रही हैं, - उसने एक जाम और पिया और कहा:

“इस तरह की बातें सत्तर के दशक में, निक्रासोव के नेतृत्व में, पश्चात्ताप करने वाले कुलीन करते थे. निक्रासव ने ही उन्हें ये शिकायतें बताई थीं, और वो, असल में उसीकी कविताओं गद्यात्मक प्रस्तुतिकरण था.”

वेटर फिर से अंदर आया, और, ये देखकर कि वास्या की तीखी नज़र उसी पर लगी है, सम्गीन का कुछ चुभती हुई बात कहने का मन हुआ; उसने कहा:

“इतिहास इसलिए नहीं गढ़ना चाहिए, कि तुम कुछ और नहीं कर सकते.”

“ये हुई न बात,” ल्यूतोव ने सहमति दिखाई, मगर सम्गीन समझ गया कि उसने वो नहीं कहा है, कि उसने स्तेपान कुतूज़ोव के शब्दों को ही दुहरा दिया है. मगर फिर भी वह कहता रहा:

“हमारे यहाँ कई लोग सिर्फ बोरियत के कारण कुछ न कुछ करते रहते हैं, करने के लिए कुछ न होने के कारण.”

“टॉल्स्टॉय का विचार,” डबल रोटी का गोला घुमाते हुए, सहमति से सिर हिलाते हुए ल्यूतोव ने टिप्पणी की.

सम्गीन चुप हो गया, इस इंतज़ार में कि वेटर कब जाएगा, फिर ल्यूतोव के और अपने स्वयम् के प्रति कड़वाहट की भावना से, अपनी आदत के विपरीत, गुर्राते हुए, मुश्किल से बोलने लगा:

“आम तौर से बुद्धिजीवी वर्ग क्रांति नहीं करता, तब भी जब मानसिक तौर पर उन्हें अवर्गीकृत कर दिया गया हो. बुद्धिजीवी – क्रांतिकारी नहीं है, बल्कि विज्ञान, कला, धर्म के क्षेत्र में सुधारक है. और बेशक, राजनीति के क्षेत्र में. अपने आप को ज़बर्दस्ती किसी हीरोकी तरह प्रस्तुत करने में कोई तुक और कोई फ़ायदा नहीं है...” 

“समझ नहीं पा रहा हूँ,” ल्यूतोव ने सूप की प्लेट की ओर देखते हुए कहा. सम्गीन भी बिल्कुल स्पष्ट रूप से समझ नहीं रहा था – वो ये सब किस मकसद से कह रहा है? मगर बोलता रहा:

“तुम क्रांति की तरफ़ इस तरह देखते हो, जैसे ये तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है, - एक बुद्धिजीवी का मामला...”

“मैं?” ल्यूतोव को अचरज हुआ. “ये निष्कर्ष तुमने कैसे निकाला?”

“जो कुछ तुमने कहा, उसीसे.”

“मुझे लगता है, कि तुम मुझे नहीं, बल्कि अपने आप को किसी बात का यकीन दिला रहे हो,” हौले से और सोचते हुए ल्यूतोव ने कहा और पूछा:

“ तुम – बोल्शेविक हो या...?

“आह, बस करो,” सम्गीन गुस्से से चहका. करीब दो मिनट दोनों ख़ामोश रहे, एक दूसरे के सामने निश्चल बैठे रहे. सम्गीन खिड़की से बाहर देखते हुए सिगरेट पी रहा था, वहाँ रेशम जैसा आसमान चमक रहा था, चाँद सफ़ेद संगमरमरी छतों को आलोकित कर रहा था, - बेहद जानी-पहचानी तस्वीर.

वह – सही है,’ सम्गीन सोच रहा था, ‘वाकई में मैं अपने आप को ही यकीन दिला रहा था’.       

“प्रतिक्रिया,” ल्यूतोव बुदबुदाया. “लेनिन ही, लगता है, अकेला ऐसा इन्सान है, जिसे वह परेशान नहीं करती...”

वह सिकुड़ गया, भूरा हो गया, काफ़ी कम स्वयम् के जैसा हो गया और अचानक – खुल गया, ऐसे इन्सान में बदल गया जो पुराना और अच्छा परिचित हो; वाइन के छोटे-छोटे घूँट गटकते हुए, जोश से कहने लगा:

“मैंने सुना था, कि मक्खियों की नज़र बड़ी पैनी होती है, मगर देखो, वो हवा में और काँच में फ़रक नहीं कर सकतीं!”

“ये तुझे सर्दियों में मख्खियों की याद कैसे आ गई?” सम्गीन ने संदेह से उसकी तरफ़ देखकर पूछा.

“पता नहीं. और लगता है, कि हम कुछ खाना नहीं चाहते. ठीक है, तब पिएँगे!”

पी ली. सिर झटक कर, हाथ से कनपटी सहलाते हुए, ल्यूतोव ने गहरी साँस ली, मुस्कुराया.

“हमारी बातचीत जमी नहीं, सम्गीन! और मैं तो किसी बात की उम्मीद कर रहा था. मैं, भाई, हमेशा किसी न किसी बात का इंतज़ार करता रहता हूँ. जैसे, मिसाल के तौर पर, पादरी, - मैं संजीदगी से इंतज़ार कर रहा हूँ, कि पादरी कुछ तो कहेंगे. हो सकता है, वो कहेंगे: हाँ – और बुरा होगा, मगर – इस तरह नहीं!ये जमात – प्रतिभाशाली है! कितने मशहूर लोग वहाँ से निकले हैं विज्ञान में, साहित्य में, - बेलिन्स्की लोग, चेर्निशेव्स्की लोग, सेचेनोव लोग...”

मगर ल्यूतोव का उत्साह बुझ गया, वो चुप हो गया, झुक गया और फिर से ब्रेड के गोले को प्लेट में घुमाने लगा. सम्गीन ने पूछा: स्त्रेश्नेवा कहाँ है?”

“दुन्याशा?” कहीं वोल्गा पे है, गाती है. अब दुन्याशा को ही लो...वह भी ठीक-ठाक नहीं है, जैसा कि योद्धाओं के बारे में कहते हैं. एक पेट्रोलियम के व्यापारी ने उसे क्वार्टर, हर महीने तीन सौ रूबल्स देने का प्रस्ताव रखा – ठुकरा दिया! हाँ – अपने होश में नहीं है वो औरत. उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता. गाने का पेशा, कहती है, - पागलपन है’. ऑपेरा में बुलाया था – नहीं गई.”

और खिड़की से बाहर देखते हुए उसने गहरी साँस ली.

“मुझे डर है – किसी सूली-वूली के लफ़ड़े में फँस जाएगी. उसकी मुलाकात हुई, इस इनोकोव से, जब वह ज़ख़्मी, बीमार हमारे यहाँ पड़ा था. आदमी – ठीक-ठाक है, दिलचस्प है, कुछ लठमार किस्म का है. फिर एक और आया, - याद है वो लड़का, जो बहुत हीरोपंथी कर रहा था, जब तुरोबोएव को दफ़ना रहे थे? रीबाकोव...”

“सुदाकोव,” सम्गीन ने सुधारा.

“अच्छी याददाश्त है तेरी...हुम्...मगर बात ये है कि, वे उसके दोस्त हैं. वह उन्हें पैसे देती है, और वे उसे तैयार कर रहे हैं. अराजकतावादी हैं दोनों.

ल्यूतोव ने घड़ी निकाली और, उसे मेज़ के नीचे पकड़कर, खट् से ढक्कन खोला; सम्गीन ने भी अपनी घड़ी देखी, और साथ ही सोचा, कि ल्यूतोव से टाइम पूछना ज़्यादा शिष्ठाचारपूर्ण होता.

ल्यूतोव ने बड़ी सादगी से, शायद, दुख से भी, जटिल शब्दों का इस्तेमाल किए बिना बिदा ली.

मुरझा गया है,’ होटल से चौराहे की नीली-सी ठण्ड में निकलते हुए सम्गीन ने सोचा. ठेठ आलसी रूसी है. पादरियों के बारे में – जानबूझकर, मेरे लिए सोचा था. अपने भीतर के ख़ालीपन पर सनकीपन का नकाब लगाए फिरता है. मरीना कहती: बांझ दिमाग़ का आदमी’.             

पेट भरने से और वोद्का से सिर में प्यारे से चक्कर आ रहे थे, स्वादिष्ट बर्फीली हवा गहरी-गहरी साँस की माँग कर रही थी और, अपने फ़ेफ़ड़ों को तीखी ताज़गी से भरते हुए, खुशी का एहसास पैदा कर रही थी. दिमाग़ में बेवकूफ़ी भरे गाने की पंक्ति गूँज रही थी:

त्सार, मूत्सी की तरह...

दुन्याशा भी! ठुकरा दिया. क्यों?’

 

सम्गीन ने गाड़ी ली और ऑपेरा देखने गया. वहाँ कैशियर ने कहा कि सारे टिकट बिक गए हैं, मगर दो बॉक्स खाली हैं और जगह मिल सकती है.           

दूसरे तल की ऊँचाई से उस छोटे से थियेटर का हॉल समतल पेंदे वाले गढ़े की तरह दिखाई दे रहा था, और फिर वह किसी फलों की दुकान की आड़ी शो-केस जैसा हो गया: छोटे-छोटे फ़ेन के टुकड़ों में संतरे, सेब, नींबू कतार से पड़े थे. सम्गीन को याद आया कि कैसे बलवा-पुलिस के सामने तुरोबोएव ने अराजकतावादी रवाशोल का बचाव किया था, और उसने अपने आप से पूछा:

क्या मैं बम फेंक सकता था? किसी हालत में नहीं. और ल्यूतोव भी इस लायक नहीं है. मैंने उस पर शक किया था किसी बात से...किसी ख़ास वजह से. कुछ भी नहीं है...लगता है – मुझे किसी बात का ख़तरा भी महसूस हो रहा था इस... फ़ूहड़ में’. और, ये महसूस करके कि वह ज़ोर से हँस सकता है, सम्गीन ने कुबूल कर लिया: मैंने – नियत मात्रा से ज़रा ज़्यादा ही पी ली थी’.

अपने छोटे-छोटे हाथों और फ्रॉक-कोट की पूँछ को हिलाते हुए साँवला, बड़े सिर वाला, गंजा म्यूज़िक कण्डक्टर ऑर्केस्ट्रा के ऊपर बदहवासी से झुका जा रहा था, रैम्प (ढलवाँ रास्ते) पर नाच रहे थे दो त्सार और दुबला-पतला, टेढ़े पैरों वाला पादरी कल्हास, जो पबेदानोस्त्सेव जैसा लग रहा था.

‘ ‘इलियाडकी प्रस्तावना को कॉमेडी में परिवर्तित करने वाला अफ़िनबाख वाकई में बेहद ज़हीन था. सांस्कृतिक इतिहास की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को हल्की-फुल्की कॉमेडीज़ की श्रृंखला में प्रस्तुत करना चाहिए था, जिससे कि लोग अपने भूतकाल की ओर चापलूसी से पेश आना बंद करें - जैसे हिज़ एक्सेलेन्सी से पेश आते हैं...

वह बड़ी आसानी और तेज़ी से सोच रहा था, मगर सिर और ज़्यादा चकराने लगा, शायद इसलिए, कि बॉक्स की गर्म हवा में इत्र की ख़ुशबू घुली हुई थी. पब्लिक ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजा रही थी, दोनों त्सार और पादरी, दाँत दिखाते हुए धन्यवाद स्वरूप हॉल के अंधेरे में भीड़ के विशाल शरीर का अभिवादन कर रहे थे, वह भारीपन से सरसरा रही थी और चिंघाड़ रही थी:

ब्रेवो, ब्रेवो!”

ये ख़ुशनुमा नहीं था, मज़ाहिया नहीं था, और सम्गीन ने किसी की कविता याद करके त्यौरियाँ चढ़ा लीं:

खाई, जहाँ ख़त्म होती है, हर ज़िंदा चीज़.

ये कहाँ से?’

सोचने के बाद याद आया: जर्मन डेमोक्रेट जोहानस शेर की किताब से. इसी प्रोफ़ेसर ने ये सलाह दी थी, कि  विश्व-इतिहास को कॉमेडी की तरह देखना चाहिए, मगर साथ ही वह ग्योटे से भी सहमत था, कि :

इन्सान होने का मतलब है – योद्धा होना.

जिससे कि कॉमेडी को ड्रामे का रंग दिया जा सके, हाँ? नशा चढ़ रहा है’, सम्गीन ने हथेली से माथ पोंछते हुए सोचा. बहुत दिल चाह रहा था, कि कुछ मौलिक बात सोचे और ख़ुद ही मुस्कुराए, मगर स्टेज वाले कलाकार बाधा डाल रहे थे. रैम्प के पास चौड़े कंधों और भरे-भरे बदन वाली त्सार प्रिआम की बेटी, अपनी जांघ तक खुली टाँग को हिलाते हुए खड़ी थी; आश्चर्यजनक रूप से हल्का, जैसे ख़ाली हो, कल्हास नाच रहा था; वे गा रहे थे:

देखिए

विट्ट को,

पोर्ट्समाउथ के अर्ल को,

मनपसंद खेल जिसका – परेशानी को...

ये – बेवकूफ़ी है’, सम्गीन ने दो बार तालियाँ बजाकर फ़ैसला कर लिया.

“ब्रेवो!” हॉल की गहराई से लोग चिल्लाए.

“माफ़ कीजिए,” किसी ने सम्गीन की बगल में बैठते हुए कहा, और फ़ौरन ही धीमी आवाज़ में चिल्लाया:

“माय गॉड- आप? कितनी ख़ुशी हो रही है मुझे!”

ये – ब्रागिन था, ऐसी पोषाक में, जैसे शादी करने जा रहा हो, - फ्रॉक कोट पहने, सफ़ेद टाइ लगाए; चिकने बाल बनाया हुआ छोटा सा सिर, कनपटी के ऊपर से नाक के पुल की तरफ़ बड़ी अदा से – पहले के मुकाबले ज़्यादा अदा से आ रही बालों की लट उसके माथे के घूमड़ को ढाँक रही थी, बालों पर कुछ बड़ी तेज़ सुगंधित क्रीम लगाई थी, चेहरा ख़ुशी से चमक रहा था. उसने इस मुलाकात के अप्रत्याशित बताते हुए, एक ही मिनट में सम्गीन को बता दिया, कि वह इस कम्पनी का एक सदस्य है.

“क्या आपने ग़ौर किया, कि हम पुरानी स्क्रिप्ट में वर्तमान समय से भी कुछ जोड़ रहे हैं? पब्लिक को ये बहुत अच्छा लगता है. मैं भी थोड़ा बहुत लिखने की शुरूआत कर रहा हूँ, कल्हास की पंक्तियाँ – मेरी हैं.” वह खड़े-खड़े बोल रहा था, दस्ताने को सीने से चिपका रहा था और आदरपूर्वक दूसरे बॉक्स में किसी का अभिवादन कर रहा था. “आम तौर से – हम पब्लिक को एक ख़ुशी देना चाहते हैं, मगर – उसका ध्यान वर्तमान की कड़वाहट से हटाये बिना. जैसे – विट्ट की और औरों का मज़ाक उड़ा रहे हैं, ये, मेरा ख़याल है, बम से ज़्यादा फ़ायदेमन्द है,” उसने धीरे से कहा.

“हाँ,” सम्गीन ने सहमति दिखाई, “सब...मुस्कुराते रहें! इन्सान अपने आप मुस्कुराता रहे.”

 “बहुत बढ़िया कहा!” ब्रागिन प्रसन्नता से फुसफुसाया. “यही – अपने आप!”

“मुस्कुराने दो!”  सम्गीन ने कठोरता से दुहराया.

“मैं ड्यूमा को भी – ऐसी पंक्तियों से! आप ड्यूमा गए थे?”

“नहीं. ड्यूमा में – नहीं...”

“ये – मीटिंग होती है और उसमें कुछ भी सरकारी नहीं होता! आप देख लेना – उसे फिर से बंद कर देंगे.”

“इसकी ज़रूरत नहीं है, - बोलने दो,” सम्गीन ने कहा.

“हाँ, ज़ाहिर है, - छत के नीचे, कहीं बेहतर है, सड़कों के बजाय! मगर – अख़बार! वो सब कुछ सड़क पर ले आते हैं.”

“मगर वो – होशियार है! वह हँसती है,” सम्गीन ने कहा और बचे-खुचे होश में समझ गया, कि वह बुरी तरह नशे में है, और बेवकूफ़ी भरी बातें कह रहा है. कुर्सी की पीठ से टिककर उसने आँख़ें बंद कर लीं, दाँत भींच लिए और एक दो मिनट बैण्ड की गरज, डबलबस की गूँज, वायलिन की प्यारी कराह सुनता रहा. और जब उसने पलकें उटःआईं – ब्रागिन जा चुका था, उसके सामने वेटर खड़ा था, ठण्डा सोडा वाटर पेश करते हुए, दोस्ताना आवाज़ में पूछ रहा था:

“क्या छोटा सा  पैग लाऊँ?”

इंटरवल में सम्गीन बॉक्स में ही बैठा रहा, और जव बत्तियाँ बुझा दी गईं – तो हौले से बाहर निकलकर अपना सामान लाने होटल चला गया. नशा उतर गया था, उसकी जगह अपने प्रति दया की भावना ने ले ली थी.

असल में, बात छोटी सी है, मगर वजह ये थी, कि मैं बेहद पी गया था’, वह ख़ुद को शांत कर रहा था, मगर कर नहीं पाया.

दूसरे दिन शाम को वह गुस्से से मरीना से कह रहा था:

“मॉस्को ने मेरे भीतर कमीनेपन अश्लीलता और कटुता की भावना भर दी. कुछ लोग इत्मीनान से और अश्लीशता से ख़ुश होते हैं, दूसरे – उन परेशानियों का बदला चुकाने के लिए तैयार हैं जो वे भोग चुके हैं...”

“तैयार हैं!” मरीना चहकी. “ हो भी गई है – शुरुआत,  तभी तो स्तलीपिन को लोगों को सूली पर लटकाने की जल्दी हो रही है.”  

केस जीतने के कारण वह बेहद प्रसन्न थी और ख़ुशी से बोल रही थी. सम्गीन को लगा, कि स्तलीपिन के काम के बारे में ख़ुशी से बोलना – असभ्यता है, और उसने व्यंग्य से पूछा:

“और, क्या तुम्हारे ख़याल में सूली पर बिना जल्दी मचाए लटकाना चाहिए?”

मुस्कुराते हुए, होठों पर जीभ फेरकर, मरीना ने अँधेरे कोने की तरफ़ देखा.

मैक्सिमलिस्ट्स (अधिकतमवादियों) को? उसकी जगह पर अगर मैं होती, तो भी लटका देती. देखा ना, कैसे उन्होंने फ़नार्नी स्ट्रीट पे पैसे छीन लिए. और ख़ुद स्तलीपिन भी उनके हाथों नुक्सान उठा चुका है, -  उसकी बेटी को घायल कर दिया, समर कॉटेज को विस्फ़ोट से उड़ा दिया.”

“भयानक...इन सब दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को तुम बड़े हल्के-फ़ुल्के ले रही हो,” सम्गीन ने कहा और ग़ौर किया वह अचरज से बोल रहा है, जबकि नफ़रत से कहना चाहता था.

“मैं कोई मिनिस्टर नहीं हूँ, और इन पारिवारिक मामलों में उलझने का मुझे ज़रा भी शौक नहीं है,” मरीना ने कहा.

सम्गीन को याद आया कि वो आतंक को ये दूसरी बार पारिवारिक मामलाकह रही है; ऐसा ही उसने ओडेसा में जनरल कौलबार्स पर तमारा प्रिन्स द्वारा हमला किए जाने पर भी कहा था. सम्गीन ने उसे अख़बार दिया था, जहाँ हत्या की कोशिश के बारे में टिप्पणी छपी थी.

“हाँ, जानती हूँ,” मरीना ने कहा था. “लीदिया को ये विस्तार से मालूम है.” अख़बार झटक कर, जैसे उस पर धूल जम गई हो, वह धीरे-धीरे, परेशानी से कहने लगी:

“कैसा बचपना है! जनरल के पास जनरल की बेटी आई और – रोने लगी, बेवकूफ़: आह, मुझे आप पर गोली चलानी पड़ेगी, मगर – नहीं चला सकती, आप – मेरे पिता के दोस्त हैं! वो तात्याना लिओन्तेवा, जिसने मिनिस्टर दुर्नोवो के बदले किसी जर्मन ट्रेवलिंग-सेल्समैन पर गोली चला दी थी, वो भी शायद जनरल की ही बेटी थी? ये सब कोई पारिवारिक मामले हैं...”

वास्तविकता के प्रति उसके इस निरंतर शांत रवैये ने सम्गीन को गुस्सा दिला दिया, मगर वह ख़ामोश रहा, ये समझते हुए, कि वह न सिर्फ अकल के कारण, बल्कि जलन के भी कारण गुस्सा हो रहा है. घटनाएँ उसके ऊपर से बादलों की तरह गुज़रतीं, और, बादलों की परछाइयों की तरह उसे छूकर, उसे उदास नहीं बना देतीं; हौले से ये सूचित करके: लीदिया कहती है, कि जैसे स्टेट कौन्सिल को उड़ा देने वाले थे. कामयाब नहीं हुए’, - उसने ख़यालों में डूबे-डूबे पूछा:

“ये, कभी-कभी वे कामयाब क्यों नहीं होते?”

सम्गीन हँस पड़ा, ये सोचकर कि अगर वह आतंकवादी होती तो उसे, शायद, स्टेट कौन्सिल को भी उड़ाने में कामयाबी मिलती.

उसके लिए – सब पराया है,’ उसने सोचा. जैसे विदेशी है. या ऐसी इन्सान, जिसे दृढ़ विश्वास है, कि इस सर्वोत्तम देश में सब कुछ अच्छे के लिए ही हो रहा है. कहाँ से आया इसके पास ये...आशावाद...जानवरों जैसा?’

इस सर्वोत्तम देश मेंकोई एक क्लीम सम्गीन बेकार ही में दुख उठा रहा है. हालाँकि वह पहले जैसी तीव्रता से अपनी तलाशों की, परेशानियों की और चिंताओं की निरर्थकता को महसूस नहीं करता, मगर फिर भी कभी-कभी ऐसा लगता, कि वास्तविकता उसके प्रति अधिकाधिक शत्रुतापूर्ण होती जा रही है, और उसे दूर धकेल कर, दबोच कर एक तरफ़ कर रही है, ज़िंदगी से हटा रही है. बुद्धिजीवियों के ख़िलाफ़ तमीलिन की ओर से किए गए अप्रत्याशित और तीखे हमले ने उसे ख़ास तौर से चौंका दिया. स्थानीय उदारतावादी अख़बार में उस भाषण के बारे में विस्तार से रिपोर्ट छपी थी, जिसे तमीलिन ने सम्गीन की मातृभूमि में पढ़ा था. भाषण का शीर्षक था बुद्धि और भाग्य’, - उसमें प्रमाणित किया गया था, कि बुद्धि भाग्य के निर्धार को प्रकट करती है, और ख़ुद भाग्य कुछ और नहीं, बल्कि शैतान – प्रोमिथियस का नकाब है’; ‘ प्रोमेथियस – ये वो है, जिसने पहले अज्ञान के स्वर्ग में स्थित इन्सान को ज्ञान की प्रेरणा दी, और तब से ईश्वर समान इनसान की अनछुई, विश्वास की प्यासी आत्मा प्रोमेथियस की आग में जल रही है; भौतिकवाद – उसकी भूरी राख है’. तमीलिन ने निर्ममता से, ज़हरीले वाग्बाणों से नफ़ासत से बनाए गए व्यक्तित्व, क्रिस्टल, का मज़ाक उड़ाया, जो, हालाँकि, जीवन के सभी रंगों को परावर्तित करने में सक्षम है और जिसमें रहस्यमय शब्द – ख़ुदा में निहित दुनिया के सर्वाधिक सरल और एकमेव ज्ञान में विश्वास के रंग का पूर्णतः अभाव है.                

रिपोर्ट इस आशा के साथ समाप्त हो रही थी, कि हमारे आदरणीय सहयोगी, बहादुर और मौलिक विचारक, हमारे शहर ज़रूर आएँगे और इस गंभीर उत्तेजक भाषण को प्रस्तुत करेंगे. मौलिक विचारों की ऊँचाई तक पहुँचना हमारे लिए लाभदायक होगा, ताकि वहाँ से हम अपनी दुखद गलतियों पर नज़र डाल सकें’.

 तमीलिन के परिचित विचारों के ऐसे पलटी खाने से (यू-टर्न से) सम्गीन सिर्फ इसलिए परेशान नहीं हुआ, कि ये एकदम अप्रत्याशित यू-टर्न था, बल्कि इसलिए भी कि तमीलिन ने कुछ ऐसे, अब तक पूरी तरह स्पष्ट न हुए विचारों के बारे में दो टूक  अपनी राय प्रकट की थी, जिन पर सम्गीन मन के बारे में अपनी पुस्तक लिखना चाह रहा था. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था, कि सम्गीन के सतर्क विचार उसके कहने से पहले ही प्रकट हो जाते और उन्हें चेतावनी भी मिल जाती. उसे महसूस हुआ कि इस लाल बालों वाले दार्शनिक ने उसे लूट लिया है.

मरीना को, शायद, तमीलिन की फिलॉसफ़ी पसंद है’, उसने सोचा और शाम को, दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठे हुए, पूछा: क्या तुमने भाषण की रिपोर्ट पढ़ी?”

“बदमाश,” उसने मुरब्बा खाते हुए उसने कहा. “ये मैं दार्शनिक के बारे में नहीं, बल्कि उसके बारे में कह रही हूँ, जिसने रिपोर्ट लिखी है. याद है: दुन्याशा की कॉन्सर्ट में एक छैला भाषण दे रहा था, कुलीनों के काऊन्टी लीडर का बेटा? ये – वही है. ऑक्टोब्रिस्ट के रंग में रंग लिया है अपने आप को. अख़बार ख़रीद रहे हैं, लगता है, खरीद लिया है. उदारवादियों के पास पैसे नहीं हैं. अब स्तलीपिन की फिलॉसफ़ी का प्रचार करेंगे: पहले – शांति, बाद में – सुधार’.”

उसके अलसाए शब्दों से सम्गीन आहत हो गया; ऐसे समस्याओं के बारे में बातें करते हुए, मुरब्बा नहीं चबाना चाहिए था. वह बर्दाश्त नहीं कर सका और पूछ बैठा:

“तुम्हें, ज़ाहिर है, ‘दुखद गलतियाँ परेशान नहीं करतीं?”

चाय वाले नैप्किन से ऊँगलियाँ पोंछते हुए उसने कहा:

“परेशान होना मुझे अच्छा नहीं लगता. आहऔर ऊहकरने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान मैं नहीं हूँ. और, हो सकता है, पूरी तरह से – औरत भी नहीं हूँ.”

सम्गीन अकलमंदी से चुप रहा, ये समझते हुए, कि वह ये भी कह सकती थी:

और तुम भी तो हर रोज़ ये पढ़कर परेशान नहीं होते, कि कैसे मिनिस्टर गांजे की नेकटाईयोंसे लोगों का गला दबाते हैं.”

इन शब्दों का विरोध करने की उसके पास कोई वजह ही नहीं थी. वह मृत्यु-दण्ड़ों के ख़िलाफ़ बिना गुस्से के पढ़ता था, मृत्यु-दण्ड इतने आम हो गए थे, शहर के इतिहास की इतनी मामूली घटनाएँ बन गए थे या जैसे, अपने ज़माने में यहूदियों के नर संहार की घटनाएँ आम हो गई थीं: पहले मृत्यु-दण्ड ने बेहद उद्विग्न कर दिया था, मगर उसके बाद उद्विग्न होने की ताकत ही नहीं बची. लगातार स्वयम् का निरीक्षण करते हुए, वह अपने आप से पूछता: मृत्यु दण्डों से उसे गुस्सा क्यों नहीं आता? हत्या के प्रति घृणा की भावना निष्क्रिय हो गई थी. इसकी सफ़ाई वह इस तरह देता था, कि कई बार अनेक हत्याओं का प्रत्यक्षदर्शी रह चुका है, और उसे एक सांत्वना देने वाली कहावत याद आ गई: कुश्ती में बालों पर रहम नहीं करते’. सिरों पर भी दया नहीं करते.

मरीना चाय की चुस्कियाँ लेते हुए शांति से बता रही थी:

“इस मेंढ़क के बच्चे, तमीलिन ने, दो साल पहले यहाँ भी भाषण दिया था, मैंने उसे सुना था. तब वह इस तरह से तर्क नहीं प्रस्तुत करता था, मगर तब भी अनुमान लगाया जा सकता था, कि इस सीमा तक पहुँच ही जाएगा. अब उसे ऑर्थोडॉक्सी का महिमा मण्डन करना होगा. बुद्धिजीवियों में जो हमारी धार्मिक विचारक हैं वे सरकारी चर्च के द्वार पर माथा ज़रूर टेकते हैं, - सीधे सादे, गँवार लोग ज़्यादा आत्मनिर्भर, ज़्यादा मौलिक होते हैं.” और आँखें सिकोड़कर, मुस्कुराते हुए उसने कहा: “ साक्षरता भी – हरेक के लिए लाभदायक नहीं होती.”

सम्गीन सिगरेट पी रहा था, सुन रहा था और, हमेशा की तरह, इस औरत के प्रति अपने दृष्टिकोण को तौल रहा था, जो उसके मन में अपने प्रति अविश्वास और आदर की परस्पर विरोधी भावनाओं को, उसके लिए अब तक अस्पष्ट संदेहों और धुँधली आशाओं को खोजने की, कुछ समझने की, किसी अनजान ज्ञान को समझने की भावना जगा रही थी.                     

ज्ञान के बारे में सोचते हुए, वह संदेह से हँसा, मगर फिर भी सोचता रहा. मरीना के आत्मविश्वास के बारे में अधिकाधिक तीव्र ईर्ष्या का अनुभव करता रहा.

ये ज़िंदगी को कहाँ से देखती है?’ उसने पूछा. कभी कभी वह उसके साथ धार्मिक विषयों पर बात करती, - उसी तरह शांति और आत्मविश्वास से बोलती, जैसे और चीज़ों के बारे में बोलती थी. उसे मालूम था, कि ऑर्थोडॉक्सी के प्रति उसका नास्तिक रवैया उसके चर्च जाने में बाधा नहीं डालता, और इसको वह इस तरह समझाता, कि चर्च से संबंधित सामग्री का व्यापार करने के कारण यह संभव ही नहीं है कि वो चर्च न जाए. धर्म के प्रति उसकी दिलचस्पी सम्गीन को साहित्य में उसकी रुचि जितनी ही प्रतीत होती थी, न कम न ज़्यादा, जिस पर वह ध्यान से नज़र रखती थी.

धर्म के बारे में उसकी बातें शुरू होती थीं वैसे’, अचानक: किसी साधारण, रोज़मर्रा की चीज़ के बारे में बात कर रही है और अचानक:

“पता है, मुझे लगता है कि सुन्नतऔर बधियाके संस्कारों में कोई सम्बंध है; शायद, इस संस्कार ने बधियाकी जगह ले ली, उसी तरह जैसे बलि के बकरेकी जगह ख़ुदा को ज़िंदा बलि ने.”

“इस बारे में मैंने कभी सोचा नहीं और मुझे समझ में नहीं आता: इसमें दिलचस्पी क्यों है?” सम्गीन ने कहा, मगर उसने, हँसते हुए, स्पष्ट और अपमानजनक सहानुभूति से गहरी साँस ली:

“एह, तू...

एक बार वह बड़ी देर तक और अस्पष्टता से ईसिस, ओसिरिस और सेत के बारे में बताती रही. सम्गीन ने सोचा कि उसे, शायद, धर्म में काम से संबंधित विवरणों में ख़ास दिलचस्पी है और ये, शायद, एक स्वस्थ्य औरत की शारीरिक इच्छा होती है कि इस संवेदनाशील विषय पर बतियाए. मोटे तौर से उसे पता चला, कि धर्म के बारे में मरीना के विचार उसे सुंदरता प्रदान नहीं करते, बल्कि उसके व्यक्तित्व की सम्पूर्णता को बिगाड़ते हैं.

साहित्य के बारे में उसके विचार सम्गीन को काफ़ी दिलचस्प लगे.

“जहाँ तक यथार्थवाद क्रांतिकारी था – वह अपनी भूमिका निभा चुका,” उसने कहा. “ये भूमिका थी शाब्दिक छीलन की: अलाव भड़का और – बुझ गया! तूफ़ानी पितरैल और इस तरह के अन्य पक्षियों की ज़रूरत नहीं है. देखो, कि लेखक इस बात को समझ रहे हैं : नई सांस्कृतिक शक्तियों को धीरे-धीरे इकट्ठा करने का और उनका विकास करने का समय आ गया है. आहत और अपमानित लोगों के बारे में लिखने की परंपरा – समाप्त हो चुकी है, अपमानितों ने स्वयम् को बहुत सुंदरता से प्रदर्शित नहीं किया, बल्कि – वे भयानक ही प्रतीत हुए! और – कौन जानता है? अचानक वो फिर से जीवन को हिलाकर रख दें? लेखक की परिस्थिति – कटःइन है: नए नायकों का निर्माण करना चाहिए, ज़्यादा सादगी से, ज़्यादा प्रभावशाली तरीके से, और ये – ऐसे समय में बिल्कुल आसान नहीं है, जब पुराने नायकों को अब तक निर्वासित नहीं किया गया हो, सूली पर न चढ़ाया गया हो.”

सम्गीन सुन रहा था और कल्पना कर रहा था: ये सनकीपन है या व्यंग्य?

एक और बार किसी पत्रिका पर ऊँगलियों से खट्खट् करते हुए उसने कहा:

“आर्त्सिबाशेव ने सही समय पर नौजवानों की अप्रयुक्त ऊर्जा को निकालने का मार्ग सुझाया. एकदम ईमानदार लेखक है! उसका सानिन’, ज़ाहिर है, एक आदर्श होगा.”

ये तो खुल्लमखुल्ला व्यंग्य था, मगर आगे उसने अपने हमेशा वाले लहज़े में कहा:

पैगम्बर – और हमेशा के लिए! – दो लोग होंगे: लिओनिद अंद्रेयेव और सलोगूब, और उनका अनुसरण और लोग करेंगे, देख लेना! अंद्रेयेव – ऐसा लेखक है, जिसके समान हिम्मत वाला हमारे यहाँ आज तक नहीं हुआ, और ये, कि वो बदतमीज़ है – इससे कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा! इसके कारण वह सबको और ज़्यादा समझ में आ जाता है. तुम क्लीम इवानोविच, बेकार ही में त्यौरियाँ चढ़ा रहे हो, - अंद्रेयेव बेहद मौलिक और सशक्त है. ज़ाहिर है, विचारों में दस्तयेव्स्की से ज़्यादा सरल है, मगर, हो सकता है, ये इसलिए हो कि वह – अधिक सम्पूर्ण है. उसे पढ़ते समय हमेशा उत्सुकता बनी रहती है, हालाँकि आप पहले से जानते हो, कि वो और एक बात कहेगा – नहीं!” उसने हँसते हुए आँख मारी:

“फिर भी, तुम ये मान लो, कि ईसा से सच्चा प्यार करने वाले बारह क्रांतिकारियों में से जूडा का ही अकेले सच्चे क्रांतिकारी के रूप में चित्रण करना, - ये बेहद तीखा मज़ाक है! और, फ़रमाइए, कि उसमें सच्चाई का कुछ पुट तो है: गद्दार तो वाकई में हीरो बन जाता है. ऐसी अफ़वाह फ़ैल रही है कि सोशलिस्ट रिअलिस्टों के पास कोई प्रभावशाली उकसाने वाला काम कर रहा है.”

उसके विचारों की अपेक्षा, उसके लहज़े ने सम्गीन की एकाग्रता को ज़्यादा परेशान कर दिया.

अब वह सवालिया लहज़े में बात कर रही थी, स्पष्ट रूप से आपत्तियों को न्यौता दे रही थी. उसने, सिगरेट पीते हुए, सावधानी से विस्मयवाचक और प्रश्नात्मक रूप से प्रतिक्रिया दर्शाई; उसे लगा, कि इस बार मरीना ने उससे स्वीकार करवाने की, उगलवाने की, अंत तक परखने की ठान ली है, मगर वह जानता था, कि अंत – एक बिंदु है, जिसमें सारे विचार विश्वास की एक पक्की गांठ में बंधे हैं. इसी बिंदु को वह, लगता है, उसमें ढूँढ़ रही है. मगर उसके प्रति अविश्वास की भावना ने अपने बारे में उससे खुल कर बात करने की उसकी इच्छा को कब का बुझा दिया था, और अपने बारे में बताने की उसकी कोशिशें भी नाकामयाब हो गई थीं.     

वह महसूस कर रहा था, कि मरीना उसकी ज़िंदगी में पहले स्थान पर है, कि उसके बारे में दिलचस्पी बढ़ती जा रही है, ज़्यादा स्थाई, ज़्यादा गहरी होती जा रही है, मगर वह – कम से कम समझ में आ रही है. साहित्य के बारे में उसका रवैया भी समझ में नहीं आ रहा था. वो अंद्रेयेव को इतना अधिक महत्व क्यों देती है? इस साहित्यकार से सम्गीन को बड़ी अप्रिय झल्लाहट होती थी – उसकी भाषा की अप्रिय नीरसता, पाठक को एक ही रंग के शब्दों से सम्मोहित करने का स्पष्ट इरादा वह बर्दाश्त नहीं कर पाता था; ऐसा लगता था, कि उसकी कहानियाँ ज़रा ज़्यादा ही गहरी काली स्याही से और इतने बड़े बड़े अक्षरों में लिखी गई हैं, जैसे वह कमज़ोर नज़र वाले लोगों के लिए लिख रहा हो. उसकी कहानी -अँधेरा– का उन्मादयुक्त और संदिग्ध निराशावाद सम्गीन को पसंद नहीं आया था; ‘अँधेरेके नायक का सुझाव  - पीना इसलिए चाहिए , ताकि हर तरह की आग बुझ जाए’, बड़ा भयानक था, और सम्गीन को और भी ज़्यादा अपमानजनक लगी उसकी चीख़: शरम आती है अच्छा होने में! मोटे तौर पर इस कहानी को साहित्यिक मानवतावाद पर व्यंग्य के रूप में देखा जा सकता था. कभी कभी सम्गीन को ऐसा लगता, कि लिओनिद अंद्रेयेव उसके कुछ विचारों को पूरा कहेगा, उन्हें फूहड़ बनाते हुए, सरल बनाते हुए, और ये कि यह लेखक व्यंग्यात्मक रूप से, प्रतिशोध की भावना से फूहड़पन पे उतर आता है. उसकी कहानी विचारपढ़कर सम्गीन को बेहद गुस्सा दिला गई. इस कहानी में उसे तर्क-बुद्धि के प्रति लेखक का शत्रुतापूर्ण रवैया साफ़ नज़र आ रहा था और उसने अफ़सोस के साथ सोचा, कि ये अंद्रेयेव भी, बिल्कुल तमीलिन की तरह, उससे आगे निकल गया है. मगर – न सिर्फ आगे निकल गया है, बल्कि उसके मन में भय से मिलता जुलता, अजीब सा एहसास जगा गया है. इस एहसास के साथ, उसे छुपाते हुए, सम्गीन ने मरीना से पूछा, कि विचारनामक कहानी के बारे में वह क्या सोचती है?

“हुम्-सोचना क्या है?” उसने चमकीले होंठों को काटते हुए, मुस्कुराकर कहा. “हमेशा की तरह – वह कुल्हाड़ी लेकर काम करता है, मगर मैंने तो तुमसे कहा था, कि मेरी राय में – ये कोई गुनाह नहीं है. उसे तो बिशप होना चाहिए  था, - बहुत बढ़िया रचनाएँ लिखता शैतान के ख़िलाफ़!”

“तुम हर बात का मज़ाक बनाती हो,” नाक चढ़ाकर सम्गीन ने उसे ताना दिया. उसे अचरज हुआ, उसने भौंहे ऊपर उठाईं.
“मैं पूरी संजीदगी के साथ ऐसा सोचती हूँ! वो – उपदेशक है
, जैसे हमारे अधिकांश साहित्यकार हैं, मगर वो – कईयों से ज़्यादा मुकम्मिल (परिपूर्ण) है, क्योंकि दिमाग़ से नहीं, बल्कि स्वभाव से उपदेशक है. और – क्रांतिकारी है, महसूस करता है, कि दुनिया को नष्ट करना है, उसकी नींव से, परंपराओं से, सिद्धांतों से, मानदण्डों से आरंभ करके.”

आँखें सिकोड़कर, सम्गीन के चेहरे को देखते हुए, वह हौले से मुस्कुराई, फिर सिर हिलाते हुए बोली:

“तुम मुझ पर यकीन नहीं करते! और ये भूल गए कि चाहे जो भी हो – मैं स्तेपान कुतूज़ोव की शागिर्द हूँ और – इस दुनिया की गुलाम नहीं हूँ.”

“ये तो बिल्कुल ही समझ में नहीं आया,” सम्गीन ने कंधे सिकोड़कर चिड़चिड़ाते हुए कहा.

अरे, मैं क्या करूँ, अगर तुम समझ नहीं रहे हो?” उसने भी जैसे कुछ खीझते हुए प्रतिसाद दिया. “और मुझे लगता है कि सब कुछ एकदम आसान है: बुद्धिजीवी महाशयों ने महसूस किया, कि उनकी कुछ पसंदीदा परंपराएँ असुविधाजनक, दुखदाई हैं और सरकार को नकारते हुए जीना संभव नहीं है, मगर सरकार तो चर्च के बिना अस्थिर हो जाएगी, और चर्च की ख़ुदा के बगैर कल्पना ही नहीं की जा सकती, मगर तर्क और विश्वास का मेल नहीं हो सकता. तो, कभी-कभी, मरम्मत की जल्दबाज़ी  की गड़बड़ी में, कोई छोटी सी, विरोधाभासी बेहूदगी हो जाती है.”

उसने सोफ़े से किताब उठाई, उसे खोला:

तुच्छ शैतानपढ़ी?”

“अभी नहीं.”

“अच्छा, ये, देखो, कितनी कठोर वास्तविकता से प्रतीकवादी कहता है:

लोगों को अच्छा लगता है, कि उन्हें प्यार करें,’ उसने प्रसन्नता से पढ़ना शुरू किया. उन्हें अच्छा लगता है, कि आत्मा के उदात्त और महान पक्ष का चित्रण किया जाए. उन्हें यकीन नहीं होता, जब उनके सामने विश्वसनीय, सटीक, उदास, बुरा (तथ्य – अनु.) खड़ा हो जाता है. कहने का मन होता है: ये वह अपने बारे में’. नहीं, मेरे प्यारे समकालीनों, तुच्छ शैतान और उसकी भयानक तुनकमिजाज़ी के बारे में मेरा ये उपन्यास मैंने आपके बारे में लिखा है. आपके बारे में’.

किताब को घुटने पर मार कर उसने कहा:

“इस पर विचार करना होगा! यहाँ ये मसला नहीं है, कि सोलोगूब के शैतान दस्तयेव्स्की के शैतानों की अपेक्षा कहीं ज़्यादा विकृत और क्षुद्र हैं, बल्कि – तुम क्या सोचते हो: किस लिहाज़ से? आह, हाँ, तुमने तो नहीं पढ़ी है! लो, दिलचस्प है.”

सम्गीन ने किताब ले ली और, मरीना की ओर देखे बिना, पन्ने पलटते हुए, बुदबुदाया:

“फिर भी, ये तो पता ही नहीं चला, कि तुम क्या कहना चाह रही थीं.”

मरीना ने जवाब नहीं दिया. उसने उसकी तरफ़ देखा – वह गर्दन के पीछे हाथ रखे बैठी थी; सूरज, उसके सिर को प्रकाशित करते हुए, बालों के तारों को, गुलाबी कान को, लाल गाल को सुनहरा कर रहा था; मरीना की आँख़ें पलकों से ढँकी थीं, होंठ कस कर भिंचे थे. सम्गीन ने अनायास ही उसके चेहरे को, उसकी आकृति को देखा. और एक बार फिर विस्मय से, लगभग कड़वाहट से सोचा: फिर भी, ये रहती कैसे है?’

उसे अधिकाधिक स्पष्टता से महसूस हो रहा था, कि मरीना की ज़िंदगी में कुछ तो रहस्यमय या, कम से कम विचित्र ज़रूर है. विचित्रता न केवल उसके राजनीतिक और धार्मिक विचारों की उसके कामकाजी जीवन के परस्पर विरोध में नज़र आती थी, - ये विरोध सम्गीन को परेशान नहीं करता था, बल्कि वाक्यांशों की प्रणालियोंके प्रति उसके संदेहास्पद रवैये को पुष्ट ही करता था. मगर उसके कोर्ट केसेस में भी कुछ काला था.

सर्दियों में सम्गीन कोर्ट में लेन-देन करने वालेऔर साहूकार कोप्तेव के रिश्तेदारों के ख़िलाफ़ मुकदमा जीत गया; ये आदमी मर गया था, और उसने अपनी वसीयत के अनुसार मरीना को पैंतीस हज़ार रूबल्स, और घर तथा बाकी की जायदाद – अपनी रसोइन और उसके अपंग बेटे को देने से इनकार कर दिया था. कोप्तेव विधुर था, संतानहीन था, मगर कहीं से दूर के रिश्तेदार निकल आए और अदालत में मुकदमा ठोंक दिया कि उत्तराधिक अपंग है, सामान्य बुद्धि का नहीं है; उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि कोप्तेव के पास उस औरत को पैसे देने के लिए कोई आधार नहीं था, जिससे, उनकी जानकारी के मुताबिक, वह सिर्फ दो बार मिला था, और उन्होंने रसोइन पर जायदाद को छुपानेका आरोप लगाया. मरीना ने कहा, कि कोप्तेव उसके शौहर का नज़दीकी दोस्त था और मुद्दई झूठ बोल रहे हैं, कि वसीयत करने वाला उससे सिर्फ दो बार मिला था.

“क्या बकवास है!” उसने नफ़रत से कहा. “क्या वो औरतों से उसकी मुलाकातों पर नज़र रखते थे?”

इन शब्दों में सम्गीन को कुटिलता का आभास हुआ. कानून के लिहाज़ से वसीयत एकदम सही थी, उस पर सम्माननीय गवाहों के दस्तख़त थे, और ये मुकदमा बिल्कुल फ़ालतू था, फिर भी सम्गीन के मन में इस प्रक्रिया ने कोई असाधारण छाप छोड़ी. कुछ दिन पहले मरीना ने उसे एक गिफ्ट-डीडथमाई, जो उसके नाम थी: अविवाहित महिला आन्ना अबईमोवा ने उसे पड़ोस के प्रांतीय शहर में एक घर भेंट में दिया था. दस्तावेज देते हुए उसने उस अलसाई आवाज़ में कहा, जो सम्गीन को ख़ास तौर से पसंद थी:

“लगता है, इस घर में कोई कॉलेज या प्रिपेरेटरी कॉलेज है, तुम पता करो, क्या शहर उसे ख़रीदना चाहेगा, सस्ते में दूँगी!”

“ये क्या बात हुई – सब लोग तुम्हें या तो गिफ़्ट देते हैं, तुम्हारे नाम पे वसीयत करते हैं?” उसने मज़ाक में पूछा. उसने लापरवाही से जवाब दिया:

“मतलब – प्यार करते हैं.” कुछ सोचकर उसने कहा: “नहीं, बेचने के झंझट में तुम न पड़ना, मैं ज़खार को भेज दूँगी.”

अविवाहित आन्ना अबईमोवा एक छोटी, मोटी औरत थी, पीले चेहरे वाली और, दिखाई दे रहा था, कि वह किसी चीज़ से मंत्रमुग्ध है: उसकी बेरंग आँखों में जैसे हमेशा के लिए एक मुलायम, प्रसन्न मुस्कुराहट जम गई थी, लटकते हुए होंठ निरंतर कमान की तरह फैल रहे थे और सिकुड़ रहे थे, - वह हर चीज़ के बारे में दबी आवाज़ में बात करती थी, जैसे किसी रहस्यमय और प्रिय चीज़ के बारे में कह रही हो; मीठी मुस्कान उसके चेहरे से तब भी गायब नहीं हुई, जब उसने सम्गीन को बताया:

“और, मेरा भाई और शिष्य, साशा, जा रहा था, पता है, वालन्टियर के रूप में युद्ध पर गया, मगर रास्ते में कम्पार्टमेन्ट से गिर गया, मर गया.”

उसकी उम्र, शायद पचासेक साल की थी; चूहे के रंग के ऊन के कोट में लिपटी, चिकने बाल बनाए, नरम जूते पहने, वह सावधानी से, बिना आवाज़ किए चल-फिर रही थी और सम्गीन के मन में पक्की धारणा बैठ गई – बेवकूफ़ है.

उसके इर्द गिर्द कबूतर की तरह गुटूरगूँ करते हुए, मखमल की जैकेट पहने एक दुबला पतला, गंजा आदमी डोल रहा था, ये भी स्नेहभरा, शांत, प्यारे चेहरे वाला था, बच्चों जैसी आँख़ें और काली करीने से कटी छोटी सी दाढ़ी थी.

“और ये – मेरा भतीजा है,” उस औरत ने कहा.

“दनात यास्त्रेबव, आर्टिस्ट, भूतपूर्व ड्राइंग़-टीचर, और फ़िलहाल – निकम्मा, वार्षिक आय से गुज़ारा करने वाला, मगर मुझे शरम नहीं आती!” भतीजे ने प्रसन्नता से कहा; वह आण्टी से कुछ ही छोटा लग रहा था, उसके हाथ में एक मोटी और, ज़ाहिर तौर पर भारी छड़ी थी जिसके सिरे पर रबड़ की टोपी लगी हुई थी, मगर वह आसानी से चल-फिर रहा था. सम्गीन ऐसे लोगों से अब तक नहीं मिला था, उनके साथ अटपटापन महसूस हो रहा था, और यकीन नहीं हो रहा था, कि वे वैसे ही हैं, जैसे नज़र आते हैं. वे मरीना के स्वास्थ्य में बहुत दिलचस्पी दिखा रहे थे, उसके बारे में प्यार से और रहस्यमय ढंग से पूछ रहे थे और सम्गीन की ओर ऐसे लोगों की नज़र से देख रहे थे, जो समझते हैं, कि वह सब जानता है और समझता है. वे मालाया द्वरान्स्काया स्ट्रीट पर, जो बेहद ख़ाली सड़क थी, एक आलीशान घर में रहते थे. घर घने बाग के पीछे छुपा था, - बड़ा कमरा, जहाँ वे सम्गीन से मिले, फ़र्नीचर से ठसाठस भरा था, जैसे कबाड़ी की दुकान हो.

ज़खारी आया – परेशान, पसीने से लथपथ. जल्दी से पूछते हुए यास्त्रेबव उसकी तरफ़ भागा:

“तो, क्या, क्या हुआ?”

“रिश्वत देनी पड़ेगी,” ज़खारी ने थकावट से कहा.

“रिश्वत, - सुन रही हो, आन्नूश्का? रिश्वत माँग रहे हैं,” यास्त्रेबव ख़ुशी से चहका. “मतलब, सब ठीक हो गया!” और चुटकी बजाकर वह असमंजस से, कुछ चिरचिराहट से मुस्कुराया. ज़खारी ने उसका हाथ पकड़ा और उसे दरवाज़े से बाहर कहीं ले गया, और कुँआरी अबईमोवा ने, अपरिवर्तित मुस्कान से सिर हिलाते हुए सम्गीन से कहा:

“सब इतने लालची हैं, कि अपनी प्रॉपर्टी होना भी शरम की बात लगती है...”

सम्गीन उसके पास गया, ताकि मरीना का ख़त और पार्सल दे सके. ख़त लेकर, कुँआरी महिला ने उसे चूमा और जब तक सम्गीन वहाँ बैठा था, तब तक हथेली से दिल के पास दबाकर उसे सीने पे लगाए रखा.

किन्हीं बेवकूफ़ लोगों की तरफ़ से इन तोहफ़ों का क्या मतलब है?’ सम्गीन विचार कर रहा था.

अपनी व्यावसायिक योग्यता और सूक्ष्मदृष्टि के प्रति वह आश्वस्त नहीं था, और अविवाहित महिला अबईमोवा से मुलाकात के बाद उसे ख़तरा महसूस हुआ, कि मरीना किसी काले कारनामे में उलझाकर उसे बदनाम कर सकती है. वह गौर कर रहा था, कि उससे अधिकाधिक मित्रता का बर्ताव करते हुए, वह धीरे धीरे एक नौकर के स्तर पर रख रही है, कोर्ट के मामलों के बारे में उससे सलाह भी कभी-कभार ही लेती है. आख़िरकार उसने फ़ैसला कर लिया कि हर चीज़ के बारे में, जो उसे परेशान कर रही है, उससे बात करेगा.

अपने लिए अप्रिय इस काम की शुरूआत उसने मरीना के घर में, उसके छोटे से, आरामदेह कमरे में की. शरद ऋतु की शाम सड़क की ओर वाली खिड़कियों और टैरेस पे खुलने वाले दरवाज़े से उदासी से झाँक रही थी; बाग़ में, लाली लिए आसमान के नीचे, निश्चलता से पेड़ खड़े थे, जिन्हें सुबह के पाले ने पहले ही रंग दिया था. मेज़ पर, हमेशा की तरह, समोवार उबल रहा था, - मरीना, लेस वाले गाऊन में, चाय बनाते हुए, कह रही थी, हमेशा ही की तरह – शांटि से, मखौल उड़ाते हुए:

“अगर स्तलीपिन के सुधारों को सन् इकसठ में लागू किया जाता, हूँ, तब, बेशक, हम उस जगह से काफ़ी दूर चले गए होते, जहाँ खड़े हैं, मगर अब – क्या होगा? अमीर मालिक के हाथ तो खुल गए हैं, वह कम्युनिटी से एक किनारे हट जाएगा और वहाँ से बड़े आराम से गाँव को चूसना शुरू कर देगा, और गाँव – निर्धन होता जाएगा, गुण्डागर्दी करने लगेगा. मतलब, मेरे दोस्त, लाखों सस्ते हाथों को ध्यान में रखते हुए फ़ैक्टरियों की क्षमता बढ़ानी होगी. यही तो क्रांति सिखाती है! मेरा एक अंग्रेज़ से पत्र-व्यवहार चल रहा है, - कनाडा में रहता है, मेरे शौहर के दोस्त का बेटा, - वह बड़ी अच्छी तरह देख सकता है, कि हमारे यहाँ किस चीज़ की ज़रूरत है...”

“दूरदर्शी है,” सम्गीन ने कहा.

चाय का गिलास उसकी ओर बढ़ाकर मरीना ने मीठी मुस्कान बिखेरी:

“लीदिया – अजीब है! पहले तो स्तलीपिन को गालियाँ देती थी, मगर अब – दुआएँ देती है. कहती है: अंग्रेज़ी तरीके से पुनर्निमाण करेंगे; केंद्र में – बड़े ज़मींदार का कृषि-उद्योग, और चारों ओर – किसानों का की घेरा.लाजवाब! इंग्लैण्ड – कभी गई नहीं, उपन्यासों के आधार पर, चित्रों के आधार पर तर्क करती है.”

सम्गीन को वास्तविकता की उसकी सूझ-बूझ पर विश्वास करने की आदत हो गई थी, राजनीति के बारे में उसकी राय को हमेशा ध्यान से सुनता था, मगर इस समय राजनीति उसे परेशान कर रही थी.

“माफ़ करना, मैं तुम्हारी बात काट रहा हूँ,” उसने कहा.

“तकल्लुफ़ कैसा?”

“ये बुढ़िया अबईमोवा क्या चीज़ है?”

मरीना ने भौंही ऊपर उठाईं, उसकी आँखें मुस्कुरा रही थीं.

“उसमें तुम्हें दिलचस्पी क्यों होने लगी?”

“नहीं – गंभीरता से!” सम्गीन ने कहा. “वो और उसका ये...”

“यास्त्रेबव?”

“मुझे कमज़ोर दिमाग़ वाले लगे...”

“ओह, ये – ज़रा ज़्यादा ही हो गया!” मरीना ने आँखें बंद करके आपत्ति जताई. “ वो – भावुक, बूढ़ी कुँआरी है, बेहद अभागी, मुझसे प्यार करती है, और वह – छोटी चीज़ है, आलसी. और झूठा – सोच लिया, कि वह आर्टिस्ट है, टीचर है और अमीर है, मगर था चुंगी-अधिकारी, रिश्वत के कारण नौकरी से निकाल दिया गया, मुकदमा भी चला था. पेन्टिंग्स वह बनाता है, ये सही है.”

वह अचानक ख़ामोश हो गई और, सिर उठाकर, आँखों में चमक लाकर सम्गीन के चेहरे की ओर उलाहने से देखते हुए बोली:

“ख़ैर, मुझे महसूस हो रहा है, कि तुम परेशान हो, और, शायद, समझ रही हूँ, कि किस बात से परेशान हो.” 

उसकी पलकें थरथराईं और ऐसा लगा जैसे पुतलियाँ चमक रही हैं, उसकी आवाज़ और नीची, प्रभावशाली हो गई; चम्मच से चाय हिलाते हुए, वह लापरवाही और अप्रियता से मुस्कुराई:

“तो, क्या है? ज़ाहिर है – रहस्यों और पहेलियों से परदा उठाने का समय आ गया है.”

कुछ देर चुप रहने के बाद, सम्गीन के सिर के ऊपर से देखते हुए, उसने पूछा:

“तुमने याकोव तबोल्स्की के विचार’, या फिर - युरालेत्स के नहीं पढ़े? याद करो, - वो पाण्डुलिपि जो तुमने समारा में ख़रीदी थी. नहीं पढ़ी? अच्छा – बेशक. लो, पढ़ो! उरालेत्स ख़ुद तो अपने विचार अच्छी तरह से प्रस्तुत नहीं करता, मगर उसने ततारिनोवा के सिद्धांत का वर्णन किया है. ततारिनोवा – एक मन्तान्का थी, कुपिदोन सम्प्रदाय की संस्थापक...” (क्रिश्चन धर्म के प्रादुर्भाव से पहले, दूसरी शताब्दी में मन्तानिज़्म प्रचलित था – उसका संस्थापक था मॉन्टेनस. रूसी में – उसे मन्तान कहा जाता है, महिला संस्थापक को कहते हैं – मन्तान्का – अनु.)  

“समझ नहीं पा रहा हूँ, कि इसका मेरे सवाल से क्या ताल्लुक है,” सम्गीन ने गुस्से से शुरूआत की, मगर मरीना ने कहा:

“अभी समझ जाओगे.”

“क्या?”

“कि मैं भी – मन्तान्का हूँ.”

सम्गीन बड़ी देर तक, सावधानी से सिगरेट चुनता रहा और, उसे सुलगाते हुए, तय करता रहा, - उस भावना को क्या नाम दे, जिसका अनुभव वह कर रहा है? मगर मरीना उसी तरह लापरवाही और अनिच्छा से कहती रही:

“मोन्ताने (बहु.- अनु.)  - ये एकदम सही नहीं है, यहाँ मन्तानसे कोई ताल्लुक नहीं है; मेरी विचारधारा के लोग अपने आप को कहते हैं – अध्यात्मिक...”

सेक्टेरियन? (संप्रदाय की सदस्या? – अनु.)सम्गीन ने अनुमान लगाया. ये कुछ सच लगता है. मुझे इससे कुछ इसी तरह की अपेक्षा थी’. मगर वह समझ गया कि मन में चिड़चिड़ाहट की, निराशा की भावना का अनुभव कर रहा था और ये भी कि उसे मरीना से इस बात की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी. उसे प्रयत्नपूर्वक कुछ हिम्मत जुटानी पड़ी, कि पूछ सके:

“मतलब, तुम किसी संप्रदायिक संस्था की सदस्य हो?”

“मैं – जहाज़ की (यहाँ सम्प्रदाय से तात्पर्य है – अनु.) कप्तान (प्रमुख, जिसे सम्प्रदाय में क्राइस्ट कहते थे, और हर क्राइस्ट के लिए एक वर्जिन मदरहोती थी) हूँ.”

उसने ये बड़ी सरलता से, और जैसे अपने पद का अभिमान न प्रदर्शित करते हुए कहा, इसके बाद – आहत उदासीनता से आगे कहा:

“पादरी, अपने अज्ञान के कारण, कप्तानों को – क्राइस्ट कहते हैं, और पालनकर्ता महिलाओं को – वर्जिन मदर’. और संस्था, - जैसा तुमने कहा, - है चर्च, और छोटा नहीं है, करीब चार दर्जन प्रांतों में बिखरा हुआ है, - अब तक, आज तक...”

एक हाथ से सम्गीन की ओर जैम की बोतल सरकाते हुए, और दूसरे हाथ से गाऊन की कॉलर पकडे हुए, उसने चौड़ी मुस्कुराहट बिखेरी:

“ओय, तुम कितने अजीब तरह से आँखें झपका रहे हो! और चेहरा भी लम्बा हो गया है. अचरज हुआ? मगर – प्यारे दोस्त, तुम मेरे बारे में क्या सोचते थे?”

उसका दायाँ हाथ कोहनी तक खुल गया था, बायाँ – करीब-करीब कंधे तक. गाऊन जैसे उसके बदन से फ़िसल रहा था. सम्गीन ने सिगरेट के धुँए की तरफ़ देखते हुए, अपनी सहानुभूति को छुपाए बिना कहा:

“मान लो, कि ये – मेरे लिए अप्रत्याशित है. और वैसे – अति विचित्र है!”

हूँ, ज़ाहिर है!” वह चहकी. “ज़्यादा आसान होता, अगर ये पता चलता, कि मुलाकातों के लिए मेरा एक गुप्त घर है...”

“इससे मैं तुम्हें कुछ ज़्यादा समझ नहीं पाया,” सम्गीन ने क्रोध से, और साथ ही दुख से कहा. “ इतनी अकलमंद, ख़ूबसूरत. इतनी ख़ूबसूरत कि सामने वाले को कुचल देती हो...”

ये कहते हुए, वह उसकी तरफ़ नहीं देख रहा था, मगर उसे मालूम था कि मरीना की आँख़ें व्यंग्य से चमक रही हैं.

“ अच्छा – कुचल भी देती हूँ?” उसने पूछा. “वो कैसे?...” और प्रभावशाली ढंग से कहा:

सुकरात, ज़ेनोन और डायोजनीज़ लोग बदसूरत हो सकते हैं, मगर सम्प्रदाय के सेवकों में सौंदर्य और महानता अवश्य होती है’, जानते हो, ये किसने कहा था?”

“नहीं,” सम्गीन ने आस पास नज़र दौड़ाते हुए जवाब दिया, - चारों तरफ़ की हर चीज़ जैसे बदल गई थी, उस पर कालिमा छा गई थी, सिमट गई थी, मगर मरीना – ऊँची हो गई थी. वह उससे इस तरह पूछ रही थी, जैसे किसी शिष्य से पूछ रही हो, कि उसने रहस्यमय सम्प्रदायों के इतिहास के बारे में, चर्च के इतिहास के बारे मे क्या पढ़ा है? उसके नकारात्मक जवाबों से उसे हँसी आ गई.

“हो सकता है, कम से कम मेल्निकोव का उपन्यास पहाड़ों परही पढ़ा हो?”

जंगलों में’ – पढ़ा है.”

“ठीक है, ये अच्छा ही है, कि लोग पहाड़ों परनहीं पढ़ते हैं; उसमें लेखक ने इस बारे में लिखा है, जो उसने नहीं देखा, और बकवास लिखी है. फिर भी – पढ़ो.”

“बकवास?” सम्गीन ने पूछा.

“जानना सब कुछ चाहिए, तभी, हो सकता है, कुछ पहचानोगे,” उसने मुस्कुराते हुए कहा.

ये हँसी ने, जो वैसे – बेबात की थी, सम्गीन के भीतर उसकी आत्मसम्मान की भावना को कुचल दिया, उससे बहस करने की इच्छा जगा दी, तीखी बहस करने की, मगर प्रतिकार की इच्छा को उदास विचारों ने दबा दिया:

ये बेहद आज़ादी से अपने आप को मेरे सामने खोल देती है. मैं – इससे अपने बारे में कुछ भी न कह सका, क्योंकि मैं किसी भी बात को दृढ़ता से नहीं कहता. वह – कुछ तो दृढ़ता से कहती है. बकवास की भी – पुष्टि करती है. हो सकता है, कि वह जानबूझकर अपने आपको धोखा दे रही हो, इसलिए कि बेवकूफ़ी न देखे. क्षुद्र शैतान के ख़िलाफ़ आत्म रक्षा के लिए...

उसके बाल खुल गए थे, बालों की लट कंधे पर और सीने पर आ गई, - मरीना दबी आवाज़ में कह रही थी:

“तब ख़ुदा, दुख और निराशा से, रूह के सामने खड़ा हो गया और, अपनी नज़र पापपूर्ण पदार्थ पर डालकर, उसमें अपनी बुरी लालसा भेज दी, जिससे कि साँप के रूप में पुत्र पैदा हुआ. ये है – बुद्धि, वो ही है – झूठ और क्राइस्ट, उसीसे – दुनिया की सारी बुराई और मौत का प्रादुर्भाव हुआ. वे ऐसी शिक्षा देते थे...”

ये, बेशक, रहस्यमय बकवास है,’ चश्मे की ओट से मरीना की ओर कनखियों से देखते हुए सम्गीन ने सोचा. ‘ऐसा हो ही नहीं सकता, कि ये इस सब में विश्वास करती हो’.

“और प्रसन्नता – आत्मा के जोश को – बुद्धि ने मार डाला...”

“जोश?” सम्गीन ने पूछा. “ये – लगता है, कुछ कुछ एथेन्स की रातेंया काले लोगों जैसा है?”

“पादरियों की गंदी कल्पना,” मरीना ने शांति से उत्तर दिया, मगर फ़ौरन ही कुछ तिरस्कार से, तीखेपन से बोली:

“ जहाँ तक जनता की आत्मा का सवाल है, तुम बुद्धिजीवी कितने नावाकिफ़ और भोले हो! और कितना चर्च वाला ज़हर भरा है तुम्हारे भीतर...और – तुम, क्लीम इवानोविच! ख़ुद ही शिकायत करते थे, कि पराए विचारों में जीते हो, उनसे पीड़ित हो...”

भौंहे चढ़ाते हुए सम्गीन ने कहा:

“याद नहीं है...मुझे इस बात पे शक है, कि मैंने शिकायत की थी! मगर यदि ऐसा है भी, तो तुम भी नहीं कह सकतीं, कि अपने कःउद के विचारों से जीती हो...”

“क्यों – नहीं कह सकती? तुम्हें तो मालूम है, कि मैंने क्या पढ़ा है, क्या सोचा है? और इसके अलावा: पढ़ने का मतलब - विश्वास करना और स्वीकार करना नहीं है...”

उसने कुछ आक्रामक ढंग से सिर को झटका दिया, बालों को कंधे के पीछे फेंका और बड़े निर्णयात्मक ढंग से कहा:

“चलो, - काफ़ी है! मैंने तुम्हारे सामने अपनी कुबूल किया, स्वीकार किया, अब तुम जानते हो, कि मैं कौन हूँ. मुझे बस एक विनती करने की इजाज़त दो, कि ये सब – हमारे बीच ही रहेगा. तुम्हारी विनम्रता में, सावधानी में, ज़ाहिर है, मुझे विश्वास है, जानती हूँ, कि तुम – षड़यंत्रकारी हो, अपने तथा औरों के बारे में चुप रहना जानते हो. मगर – इत्तेफ़ाक से वलेन्तीन के, लीदिया के सामने न बोल जाना.”

कुछ पल आँख़ें बंद किए, वह चुप रही, - सम्गीन बुदबुदाया:

“इस चेतावनी की कोई ज़रूरत नहीं है...”

“मौके-बे-मौके ज़रूरत पड़ सकती है,” उसने रुखाई से कहा. “अब – कोप्तेव के और अबईमोवा के केसेज़ के बारे में. पहले से बता देती हूँ: इस तरह के केसेज़ आते रहेंगे. हमारे समुदाय के हर सदस्य को, मृत्यु के बाद, या जीवन काल में, - ये उसकी मर्ज़ी है, - अपनी सम्पत्ति समुदाय को देनी पड़ती है. अबईमोवा का भाई हमारे समुदाय का सदस्य था, वो – दूसरे समुदाय की है, मगर, हाल ही में उसका जहाज़ मेरे जहाज़ से जुड़ गया. बस, यही बात है...”

सम्गीन ने कुछ देर सोचकर कहा:

“तुमने जो विश्वास मुझ पर दिखाया, उसके लिए तुम्हारा शुक्रिया अदा करना है.” और स्वयम् के भी लिए अप्रत्याशित रूप से आगे कहा: “ मेरे दिल में वाकई में कई धुँधले विचार थे!”

“अगर वे लुप्त हो गए हैं, तो – अच्छी बात है,” मरीना ने कहा.

“हाँ, लुप्त हो गए,” उसने पुष्टि की और, चूँकि चाय की चुस्कियाँ लेते हुए वह ख़ामोश थी, झिझकते हुए कहा: “तुम बुरा न मानना, अगर मैं कहूँ, कि... दुहराऊँ, कि फिर भी, ये समझना मुश्किल है, कि तुम, इतनी अकलमंद, कैसे...”

मरीना ने उसे बात पूरी नहीं करने दी, - कप को तश्तरी में रखकर, उसने हाथ की ऊँगलियों को कस कर मुट्ठी में बंद किया, उसका चेहरे पे घनी लालिमा छा गई, और, मुट्ठी को हिलाते हुए, उसने भारी आवाज़ में कहा:

“ मुझे पादरियों की ऑर्थोडॉक्सी (कट्टरपंथी) से नफ़रत है, मेरा दिमाग हमारे सारे समुदायों के – और उनसे जुड़े समुदायों के एकीकरण की दिशा में लगा हुआ है. मुझे ईसाइयत (क्रिश्चनिटी) पसंद नहीं है – यही बात है! काश, तुम्हारी...जाति के लोग, समझ सक्ते, कि क्रिश्चनिटी क्या है, इच्छा शक्ति के ऊपर उसके प्रभाव को समझ सकते...”

सम्गीन उसके शब्दों को सुने बगैर उसके चेहरे की ओर देखे जा रहा थ, - उसकी ख़ूबसूरती कम नहीं हुई थी, मगर उसपे कुछ अपरिचित सा और लगभग डरावना सा भाव छा गया था: आँखों की चमक अंधा किए दे रही थी, होंठ थरथरा रहे थे, दबे-घुटे शब्दों को फ़ेंकते हुए, और हाथ सफ़ेद होकर थरथरा रहे थे. ये कुछ पल चला. मरीना मुट्ठियाँ खोलकर मुस्कुरा रही थी, हालाँकि होंठ अभी तक थरथरा रहे थे.            

“देखा, कैसे तुमने मेरी दुखती रग पे हाथ रख दिया!” सीने पर पडे गाऊन की लेसों को ठीक करते हुए उसने कहा.

ये समझ न पाते हुए कि क्या कहे, सम्गीन सहानुभूति से मुस्कुराया, और कुछ मिनट बाद, उससे बिदा लेते हुए, उसे मरीना का हाथ चूमने की इच्छा हुई, जो उसने कभी नहीं किया था. वह कल्पना ही नहीं कर सका, कि ये औरत, जो वास्तविकता के प्रति उदासीन है, किसी चीज़ से नफ़रत कर सकती है.

तो, ऐसा है?’ अंधेरे, कम रोशनी वाले रास्ते से घर जाते हुए वह सुन्न होकर सोच रहा था. मगर यदि वह नफ़रत करती है, तो इसका मतलब है, कि – विश्वास करती है, और शब्दों से खिलवाड़ न करते हुए, अपने आपको जानबूझकर धोखा नहीं देती. क्या मैंने उसमें कोई कृत्रिमता देखी है?’ उसने अपने आप से पूछा और जवाब नामें दिया. 

जो कुछ भी उसने सुना था, वह उसकी तुलना में बिल्कुल महत्वहीन था, जो उसने देखा था. शब्दों का मूल्य वह जानता था और उसके शब्दों को औरों के शब्दों से ऊँचे नहीं आँक सकता था, मगर दिमाग़ में उसका डरावना चेहरा और सुनहरी आँखों की जुनूनभरी चमक गहरी खुद गई थी.

हाँ, उसने अपने आप को स्पष्ट कर दिया, मगर – ज़्यादा समझ में नहीं आई, नहीं! उसने अपने बर्ताव को तो स्पष्ट किया, मगर अपनी बुद्धि और... विश्वासों के बीच के विरोधाभास को नहीं’.

करीब दो हफ़्ते वह इस अप्रत्याशित खोज के प्रभाव में रहा. ऐसा लग रहा था, कि मरीना उससे ज़्यादा रूखेपन से, ज़्यादा संयम से पेश आ रही है, मगर साथ ही पहले से ज़्यादा उसकी फ़िक्र कर रही है. चिड़चिड़ाहट से नहीं, बल्कि यूँ ही पूछ लिया कि क्या वह मीशा के काम से ख़ुश है, उसे एक बढ़िया बुक शेल्फ भेंट में दिया, फिर से पूछा: बिज़बेदोव उसे परेशान तो नहीं करता?

नहीं, बिज़बेदोव परेशान नहीं करता था, वह न जाने क्यों उदास रहने लगा, ज़्यादा ख़ामोश हो गया, कभी-कभार ही आँखों के सामने पड़ता था, और कबूतरों को भी बार-बार नहीं उड़ाता था. ब्लीनोव ने फिर से उसके पंछियों की दो जोड़ियाँ पकड़ लीं, और हाल ही में, अँधेरी रात में कबूतर चुराने के इरादे से कोई गार्डन से छत पे घुस गया और उसने कबूतरखाने का ताला तोड़ दिया. इससे बिज़बेदोव उदासीभरे तैश की अवस्था में आ गया; सुबह, ठण्ड के बावजूद, वह रात के अंतर्वस्त्रों में ही कम्पाऊण्ड में दौड़ रहा था, चौकीदार लगातार डाँट रहा था, नौकरानी को भगा दिया, और इसके बाद कॉफ़ी पीने के लिए सम्गीन के पास आया, कड़वाहट से चेहरा पीला पड़ गया था, उसने घोषणा की:

आऊट हाउस को आग लगा दूँगा, - शैतान ले जाए सब कुछ!”

“मुझे एक दिन पहले इसके बारे में बता देना, जिससे मैं क्वार्टर से बाहर निकल सकूँ,” गंभीरता से और बिना उसकी तरफ़ देखे सम्गीन ने कहा, - कबूतरवाला कुछ देर चुप हो गया और उतनी ही संजीदगी से भर्राया:

“ठीक है.”

इसके बाद वह जैसे फ़ट पड़ा:

“र-रूस, उसे शैतान ले जाए!” वह गहरी साँस लेकर भर्राया. “चारों ओर – चोर और क्लर्क्स! सेवक. किसकी सेवा करते हैं? क्या शैतान की? शैतान भी – क्लर्क है.”

सम्गीन अख़बार पढ़ते हुए कॉफ़ी पी रहा था, वह अप्रिय मेहमान की बेवकूफ़ियों पर ध्यान नहीं दे रहा था, मगर वह अचानक नीची आवाज़ में और जैसे ज़्यादा अकलमंदी से कहने लगा:

“इस पैरिस वाले दोस्त, तुर्चानीनव ने सही कहा था: इन्सान को ध्यान बंटाने के लिए किसी चीज़ की ज़रूरत होती है’. चाहे वो ख़ुदा हो, या म्यूज़िक, या ताश का खेल...”

अख़बार के ऊपर से उसकी तरफ़ देखते हुए सम्गीन ने कहा:

“और - कबूतर?”

“और कबूतरों की – गर्दन मरोड देनी चाहिए. फ्राय करना चाहिए. नहीं, - सच में,” बिज़बेदोव निराशा से कहता रहा. “इन्सान ख़ुदकुशी कर लेगा. आप जा रहे हैं जंगल से होकर या – सब एक ही है – खेत से, रात है, अंधेरा है, धरती पर, पैरों के नीचे, बस गोखरू ही गोखरू. चारों तरफ़ – नरक ही नरक: क्रांतियाँ, ज़ब्ती, फ़ाँसी के फ़ंदे, और... छुपने की कोई जगह नहीं! ज़रूरी है, कि आपके सामने कुछ चमके. चाहे ना भी चमके, बल्कि सिर्फ: मौजूद रहे. हाँ – शैतान ले जाए – चाहे मौजूद भी ना रहे, बल्कि काल्पनिक ही हो, जैसे – शैतानों की कल्पना की गई, और यकीन करते हैं, कि उनका अस्तित्व है.”

वह शोर मचाते हुए उठा और चला गया. उसकी बड़बड़ाहट का सम्गीन की स्मृति में नामो निशान भी नहीं बचा.

मगर मीशा के प्रति उसके दिल में अप्रियता की भावना धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी. ख़ामोश तबियत, नम्र नौजवान इस अप्रियता के लिए कोई साफ़ मौका नहीं देता था, वह जल्दी-जल्दी और अच्छी तरह से कमरों की सफ़ाई करता, किसी अनुभवी और साफ़ सुथरी नौकरनी की तरह डस्टिंग करता, लगभग बिना कोई गलती किए दस्तावेज़ों की नकल करता, अदालत भागता, दुकानों, पोस्ट ऑफ़िस भागता, सवालों के जवाब बड़ी सटीकता से देता. ख़ाली समय में प्रवेश कक्ष में खिड़की के पास, किताब पर झुके हुए कुर्सी पर बैठा करता.

“क्या पढ़ रहे हो?” सम्गीन पूछता.

“मैगज़ीन मॉडर्न वर्ल्डअर्त्सिबाशेव के उपन्यास सानिनका तीसरा भाग. सम्गीन ने ताकीद दी:

“जवाब देते समय, मेरे सामने उठने की ज़रूरत नहीं है: तुम – फ़ौजी नहीं हो, ना ही मैं – अफ़सर हूँ.”

“ठीक है,” मीशा ने कहा और फिर कभी खड़ा नहीं हुआ, इससे उसने सम्गीन से उसे डाँटने का इकलौता बहाना भी छीन लिया, मगर डाँटने का दिल तो चाहता था, और – अक्सर चाहता था.

सम्गीन समझता था, कि इस इच्छा का कोई आधार नहीं था, मगर इससे इच्छा की तीव्रता कम नहीं हुई. वह अपने आप से पूछता;

“इस बच्चे में ऐसा क्या है, जो मुझे अच्छा नहीं लगता?’ और उसने पाया, कि मीशा की काली, मगर खाली-सी स्वच्छ आँखों की सीधी, एकटक नज़र उसे अच्छी नहीं लगती, ये नज़र – जैसे कि कुछ पूछना चाहती थी, हालाँकि आदरपूर्वक ही सही, फिर भी – उसमें हठीलापन था. अक्सर ऐसा होता, कि, जब मीशा प्रवेश कक्ष के कोने में बैठा हुआ दस्तावेज़ों की नकल करता होता, तो सम्गीन को लगता, कि साफ़, पारदर्शक आँख़ें उस पर नज़र रखे हुए हैं.

“मेरे अध्ययन कक्ष का दरवाज़ा बंद कर ले,” वह आज्ञा देता.

और ज़्यादा अप्रिय था इस बात का यकीन होना, कि मीशा के प्रति उसका रवैया, बिज़बेदोव के रवैये से मिलता जुलता है, जो नौजवान की तरफ़ जंगलीपन से आँखें फ़ाड़-फ़ाड़ कर देखता, अपनी गुस्से को छुपाए बिना, हमेशा नफ़रत से, गुर्राते हुए बात करता था.

इस पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है’, उसने अपने आप को समझाया. इन विचारों से और आम तौर पर सभी छोटे-छोटे विचारों से उसका ध्यान मरीना के ख़यालों से हट रहा था. उसने परिभाषित करने की कोशिश की: इस औरत के प्रति उसका रवैया ज़्यादा आसान या ज़्यादा क्लिष्ट हो गया है? वो जो उसे मरीना का सामान्य ज्ञान प्रतीत होता था, - उसकी क्षमता, शहर में उसका स्वतंत्र और प्रभावशाली स्थान, उसकी विद्वत्ता, - ये सब उसे इस बात को भूलने के लिए मजबूर कर रहे थे, कि मरीना – किसी धार्मिक सम्प्रदाय की सदस्य है, कोई कप्तान’, ‘वर्जिन मदरहै. उसने फ़ैसला किया, कि ये, शायद, सत्ता की इच्छा का खेल हो, किसी पर नियंत्रण रखने की चाहत हो, हो सकता है, कोई विकृत लालसा, - ख़ूबसूरत जिस्म का खेल हो.

बुत’, उसने स्वयम् को याद दिलाया.

मगर इसका विरोध कर रहा था क्रोध का वह विस्फ़ोट, जिससे उसने स्तंभित कर दिया था.

वह दृढ़ और स्थिर है, जैसे नदी के प्रवाह में स्थित एक पत्थर; जीवन की परेशानियाँ उसके आस-पास से निकल जाती हैं, बिना उसे विचलित किए, मगर – वह आख़िर किस बात से नफ़रत करती है? क्रिश्चियानिटी से, उसने कहा था.

उसे अक्सर ऐसा लगता था, कि मरीना से परिचय का उसके जीवन में बहुत गहरा, निर्णायक महत्व है, मगर वह ये नहीं समझ सका या उसने समझने का फ़ैसला नहीं किया, कि आख़िर कैसा महत्व है?

मैं उसके बारे में ज़रा ज़्यादा ही सोचता हूँ और, लगता है, उसे ज़्यादा ही महत्व दे रहा हूँ, ज़्यादा ही बढ़ाचढ़ाकर देख रहा हूँ’, - वह अपने आपको रोकता, मगर सफ़ल नहीं होता.

एक दिन मरीना ने उससे कहा:

“ज़िंदगी थोड़ी शांत हो जाए, - विदेश चली जाऊँगी, देखूँगी – कैसा क्या है? इंग्लैण्ड जाऊँगी.”

इस बात की कल्पना करना बहुत मुश्किल था, कि वह शहर में नहीं है.

शाम के समय वह अपनी लिखने की मेज़ पे बैठा हुआ एक कठिन केस के बारे में अपील लिखने जा रहा था, और, कलम से कागज़ पर औरत के जिस्म का आकार बनाते हुए सोचने लगा:

अगर मैं उपन्यासकार होता...

उसने मरीना का छोटा चित्र बनाना शुरू किया, मगर धीरे-धीरे, अनजाने ही बड़ा करता गया, उसे चौड़ा बनाता गया और, जब पूरा पन्ना बरबाद कर दिया, - तो अपने सामने उसे औरतों के जिस्मों की कतार दिखाई दी, जैसे उन्हें एक के भीतर एक रखा गया हो और उन्हें राक्षस जैसी भयंकर आकृति में कैद कर दिया हो.

हाँ, अगर मैं लेखक होता, तो मैं उसका नई बुर्झुआ टाइप की औरत के रूप में वर्णन करता.

बरबाद हो चुके पन्ने को पलटकर, उसने फिर से मरीना का चित्र बनाया, जैसी उसकी कल्पना करता था, उसके हाथ में मरक्युरी की छड़ी दी, पैरों पे पंख बनाए और अचानक उसे ध्यान बँटाने वाली चीज़के बारे में बिज़बेदोव के शब्द याद आ गए. कलम फ़ेंक कर, उसने चश्मा उतारा, कमरे का चक्कर लगाया, सिगरेट पी, सोफ़े पर लेट गया. हाँ, मरीना उसके परेशान विचारों को स्वयम् पर केंद्रित करती है, वह – उसके जीवन में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, और अगर पहले वह कहीं जा रहा था, तो अब उसके सामने या उसकी बगल में रुक गया है.

सम्गीन को इस बात की खोज न करना अच्छा लगता, मगर, जब कर ली, तो उसने स्वीकार किया, कि – ये सच है: ज़िंदगी के प्रति उसका रवैया ज़्यादा शांत और ज़्यादा सरल हो गया, अपने आप के प्रति ज़्यादा सहनशील हो गया. निःसंदेह – ये उसीका प्रभाव है. सम्गीन ने गहरी साँस ली, सिर के नीचे का तकिया ठीक किया. दीवार के पास, कुर्सी पर, धुँधली पड़ चुकी सुनहरी फ़्रेम में एक छोटा सा, अंडे के आकार का आईना था – ये मरीना की भेंट थी, बेहद सादी और ख़ूबसूरत चीज़; मीशा अभी तक आईने को बेडरूम में टाँग नहीं पाया था. शाम के धुँधलके में सम्गीन ने आईने में आऊटहाउस की छत देखी, जिस पर पाइप के पास, कबूतरों के लिए, शेल्फ़्स थीं, छत के पीछे – पेड़ों की नंगी टहनियाँ देखीं.

      आईने में चश्मा पहने एक लम्बा, नुकीली दाढ़ी वाला चेहरा भी परावर्तित हो रहा था, और उसके ऊपर – सिगरेट के धुँए की नीली-नीली लकीरें; वे बड़े मज़ेदार ढंग से छत पर रेंग रही हैं, पेड़ की टहनियों में उलझ रही हैं.

उसे क्रिश्चियनिटी क्यों परेशान करती है?’ सम्गीन मरीना के बारे में सोचता रहा. नहीं, ये उसने अकल से नहीं कहा था, - बल्कि किसी बात पे गुस्सा हो गई थी, हो सकता है, मुझ पर ही...अगले साल मैं भी विदेश जाऊँगा...

आईने में धुँआ ज़्यादा गहरा हो गया, उसका रंग भूरा हो गया, और समझ में नहीं आ रहा था – क्यों? सिगरेट तो वहाँ मुश्किल से ही कोई पी रहा था. धुँआ लाल हो गया, और उसके बाद एक शेल्फ के नीचे तेज़, लाल आग भड़क उठी, - ये सूरज की किरणों का प्रतिबिम्ब हो सकता था.

मगर सम्गीन को मालूम था: आग शुरू हो रही है, - रोशनी के पट्टे निरंतर तेज़ी से शेल्फ को अपनी लपेट में ले चुके थे और अपनी संख्या को बढ़ाते हुए, आकार को बड़ा करते हुए छत के शिखर की ओर भाग रहे थे; पीले, लाल, नुकीले सिरों वाले, वे, छत को भेदते हुए, रिज के साथ-साथ आगे बढ़ रहे थे, और उल्हास पूर्वक दोनों तरफ झुक रहे थे. सम्गीन देख रहा था, कि आईने वाले चेहरे के नाक-भौंह चढ़े हुए थे, हाथ सिर के ऊपर वाले टेलिफ़ोन की ओर उठा, मगर चोंगे को न पकड़कर, सीने पर गिर गया.

आग,’ उसने सख़्ती से स्वयम् से कहा. इस बदमाश ने – जला दिया’.

आग के खेल से आँख हटाए बिना, सम्गीन को इस घटना में कोई वास्तविक ख़तरा महसूस नहीं हुआ; इससे उसे अचरज हुआ और इसका स्पष्टीकरण ज़रूरी था.

पहली बार देख रहा हूँ, कि आग कैसे पैदा होती है,’ उसने समझाया. फ़ोन करना चाहिए’.

मगर – वह हिला नहीं. ये महसूस करना अच्छा लग रहा था, कि उसे फ़ायर-ब्रिगेड को फ़ोन करना चाहिए, भागकर कम्पाऊण्ड में, रास्ते पर जाना चाहिए, चिल्लाना चाहिए, - करना तो चाहिए, मगर वो ये सब नहीं भी कर सकता है.

कर सकता हूँ,’ उसने अपने आप से कहा और आईने के प्रतिबिम्ब की ओर देखकर मुस्कुरा दिया. काम-काज के कागज़ात और किताबें समय आने पर खिड़की से बाहर फ़ेंक दूँगा’.

मगर फिर भी उसने फ़ोन कर दिया; फ़ायर ब्रिगेड से उसे गुस्से भरा, संक्षिप्त जवाब मिला:

“जानते हैं.”

आईना, गहरा लाल होकर, जैसे पिघल रहा था, - छत का करीब आधा हिस्सा लपटों से रंग गया था, उनसे लाल-लाल टुकड़े छिटक रहे थे और हवा में ग़ायब हो रहे थे.

जब सम्गीन कम्पाऊण्ड में भागा, तो वहाँ लोगों की भीड़ लगी थी, - चौकीदार पन्फ़ील और पुलिस वाला भारी सीढ़ी को खींच रहे थे, छत के ऊपर, पाइप के पास, बिज़बेदोव बैठा था और तख़्ते काट रहा था. वह सिर्फ मोज़ों में था, काली पतलून, सीने पर कलफ़ की हुई कमीज़ और कफ़्स के बटन खुले थे; कफ़्स उसे तंग कर रहे थे, हाथों की कलाइयों से कुहनियों तक घिसट रहे थे; वह छत में कुल्हाड़ी घुसेड़ रहा था और, कफ़्स को फ़ाड़ते हुए गरजा:

“पानी-ई!”

डर गया है, ईडियट!’ – सम्गीन ने सोचा. या दया आ रही है?’

बिज़बेदोव के पास लाल स्वेटर पहना एक लम्बा, दुबला पतला आदमी पहुँचा, उसने किसी तरह अप्राकृतिक ढंग से छत को कसकर पकड़ा और, हाथों से तख़्ते उखाड़-उखाड़ कर कर्कश आवाज़ में चीखते हुए, उन्हें नीचे फ़ेंकने लगा:

“सं-भालो!, संभ-लना-आ!” 

और सम्गीन की बगल में हाथों में लोहे का क्रो-बार पकड़े, घुंघराले बालों वाला एक नौजवान खड़ा था, और – छींक रहा था; छींकता, सम्गीन की तरफ़ देखकर मुस्कुराता और, आँख़ें झपकाते हुए, फ़र्श के पत्थर पर क्रो-बार से ठक-ठक करते हुए अगली छींक का इंतज़ार करता. कम्पाऊण्ड में, ताँबे के फ़न वाले एक लम्बे साँप को अपने पीछे खींचते हुए, आग बुझाने वाले धुँए की नीली जाली के भीतर भाग रहे थे. कुल्हाड़ियों की खट्-खट् हो रही थी, तख़्ते चरमरा रहे थे, धुँआ छोड़ते हुए और सुनहरी चिंगारियाँ बिखेरते हुए ज़मीन पर गिर रहे थे; पुलिस कॉन्स्टेबल एग्गे दर्शकों से कह रहा था;

“दूर हटिए, महाशयों!”

चाँदी जैसी पानी की धार ने मखमली धुँए के सबसे ज़्यादा घने बादलों छत के नीचे से बाहर खदेड़ा, सब कुछ असाधारण रूप से ज़िंदादिली से भरपूर, ख़ुशगवार था, और सम्गीन को बहुत अच्छा महसूस हो रहा था. जब सिर से पाँव तक पानी से लथपथ, कमर तक नंगा, बिज़बेदोव उसके पास आया, तो उसने उससे पूछा:

“कबूतर – मर गए?”

बिज़बेदोव ने हाथ झटका.

“शैतान ले जाए! और मुझे तो बाहर जाना था, जन्मदिन के लिए, कपड़े पहन रहा था और – ये...सब का दम घुट गया, एक भी बाहर नहीं उड़ा.”

उसका चेहरा गीला था, जैसे उसकी पूरी त्वचा से गंदे आँसू बह रहे थे, अपना मुँह पूरा खोलकर, सोने की टोपियों वाले दाँत दिखाते हुए, वह भारी-भारी साँस ले रहा था.

“ये कैसे हुआ?” सम्गीन ने स्वयम् के लिए भी अप्रत्याशित कड़ी आवाज़ में पूछा.

छत पर चढ़ते हुए बिज़बेदोव बुदबुदाया:

“पता नहीं. आग – चोर है”

और थूक कर दुहराया:

“चोर.”

ऐसा महसूस हो रहा था, कि बिज़बेदोव को सचमुच में दुख हुआ है, और वह दिखावा नहीं कर रहा है. आधे घण्टे बाद आग बुझा दी गई, कम्पाऊण्ड खाली हो गया, चौकीदार ने गेट बंद कर दिया; इस असफ़ल आग की याद दिलाते हुए धुँए की कड़वी गंध, पानी के डबरे, जले हुए तख़्ते और, कम्पाऊण्ड के कोने में, बिज़बेदोव की कमीज़ का सफ़ेद कफ़ – बस यही रह गया.  और आधे घण्टे बाद बिज़बेदोव, नहाया-धोया, गीला सिर और सूजा, उदास चेहरा लिए सम्गीन के पास बैठकर लालच से बियर पी रहा था और, खिड़की से काले आसमान में पहले तारों को देखते हुए बड़बड़ाया:

“आप देख लेना, कल ब्लिनोव मुझे चिढ़ाने के लिए सुबह से ही कबूतर उड़ाना शुरू करेगा...”             

सम्गीन ने काफ़ी दिनों से उससे बातचीत नहीं की थी, और इस आदमी के प्रति नफ़रत उसके प्रति कुछ उदासीनता में बदल गई थी. इस शाम को बिज़बेदोव लज़ाहिया और दयनीय लग रहा था, उसमें कुछ बच्चों जैसी बात भी थी. मोटा, खुली कॉलर वाली ढीली ढाली नीली कमीज़ पहने, खुली सफ़ेद फूली-फूली गर्दन, बिना दाढ़ी वाला चेहरा, वह किसी बुरे एक्टर द्वारा किए जा रहे बौनी बुद्धिके पात्र की याद दिला रहा था. उसकी आलसी गुरगुराहट में सनकीपन का पुट भी सुनाई दे रहा था.

नहीं, इसने आग नहीं लगाई, इस लायक नहीं है’, सम्गीन ने उसकी बात सुनते हुए फ़ैसला कर लिया.

“मुझे आपसे जलन होती है, - आपकी हर बात सोची समझी, पहले से तय की हुई होती है, और आप जीज़स की जेब में (अतिसुरक्षित – अनु.) रहते हैं. मगर मैं – मेरे दिल में तूफ़ान हैं...”

सम्गीन मुस्कुरा रहा था, इस बात का ख़्याल रखते हुए कि मुस्कुराहट अपमानजनक न हो जाए. बिज़बेदोव ने गहरी साँस ली.

इस बियर के साथ - झींगा मछली होती...हाँ, तूफ़ान! धुँआ और धूल. यहाँ – आप लोगों को बचाते हैं, अख़बार में आपके भाषण की तारीफ़ छपी थी. और मैं लोगों से – प्यार नहीं करता. सब के सब – कचरा हैं, और कोई भी बचाने लायक नहीं है.”

“ओह, बस भी करो!” सम्गीन ने कहा, “आप इतने वहशी तो नहीं हैं...”

“इतने!” खिड़की की चौखट पे हथेली मारते हुए बिज़बेदोव ने प्रतिवाद किया, उसने माथे पर बल डाले और हवा में हथेली घुमाने लगा, जिससे उसे ठण्डा कर सके. “मुझे, पता है, आतंकवादी, अराजकतावादी होना चाहिए था, मगर मैं आलसी हूँ, ऐसी बात है! और उनके यहाँ अनुशासन, बैरेक्स...”

उसके गिलास में मरने में देर कर चुकी मक्खी गिरी,- छोटी ऊँगली से उसे फ़ेन से बाहर निकाल कर फ़ेंका और वह उत्तेजना से अपनी बात कहता रहा:

“अच्छे आदमियों को मैंने देखा ही नहीं. मुझे उम्मीद भी नहीं है, नहीं देखना चाहता. यकीन नहीं करता कि वैसे लोग होते हैं. अच्छे आदमी – मौत के बाद बनाते हैं. धोखा देने के लिए.”

कबूतरों की हानि से तुम परेशान हो गए हो, इसीलिए तुम भुनभुना रहे हो,” सम्गीन ने ये महसूस करते हुए कहा, कि ये जंगली अब उसे हैरान करने वाला है, मगर बिज़बेदोव बियर ख़तम करके, खाली गिलास को देखते हुए ज़िद्दीपन से बोला:

“मार्कोविच, जौहरी, सूदखोर ने – शो-केस में कई सारे छोटे छोटे सस्ते स्टोन्स बिखेर दिये, कई रंगों के, और उनके बीच पाँच बड़े स्टोन्स भी मिला दिए. बड़े वाले पत्थर – नकली थे, मुझे मालूम है, मुझे उसके बेटे, लेव्का ने ही बताया था. तो, ये हैं आपके अच्छे लोग! उनकी सिर्फ कल्पना करते हैं शिक्षा प्रदान करने के लिए, मेरे लिए:

शरम करो, वलेन्तीन बिज़बेदोव!मगर मुझे – ज़रा भी शरम नहीं आती.”

सिर झटक कर और सम्गीन की ओर उलाहने से देखते हुए, वह चेतावनी के अंदाज़ में भर्राया:

“नहीं है शरम.

ओह, अगर शरम नहीं आती, तो आप – इस विषय पर बात ही न करते,” सम्गीन ने कहा. और शिक्षाप्रद अंदाज़ में जोड़ा: “ इन्सान परेशान इसलिए होता है, क्योंकि वह अपने आप को खोजता है. अपने आप बना रहना चाहता है, हर पल अपने आप के प्रति वफ़ादार रहना चाहता है. आंतरिक हार्मनी (सामंजस्य) को पाना चाहता है.

“हार्मनी – हार्मोनियम है, मगर उसे बजाता कौन है?” बिज़बेदोव ने विकृत ढंग से ठहाका लगाते हुए पूछा. सम्गीन ने ये कहते हुए त्यौरियाँ चढ़ा लीं:

बुरा श्लेष है.”

“और अगर मैं अपना आप नहीं बनना चाहता तो?” बिज़बेदोव ने पूछा और जवाब में दो रूखे शब्द पाए:

“आपकी मर्ज़ी.”

अपने साथी को देखते हुए बिज़बेदोव कुछ पल ख़ामोश रहा, उसकी नीली, काँच जैसी पुतलियाँ जैसे कुछ छोटी, प्रखर हो गईं; अपने मोटे-मोटे होठों को धीरे धीरे अलग करके मुस्कुराया, उसने कहा:

“तो – आपको धोखा नहीं दिया जा सकता! सही है, मुझे – शरम आती है, मैं, जानवरों की तरह जीता हूँ. सोचिए, - क्या मैं नहीं जानता, कि कबूतर – बकवास हैं? और लड़कियाँ – वो भी बकवास हैं. सिवाय एक के, मगर वह भी, शायद – धोखा देने के लिए ही है! क्योंकि – अच्छी है! और मुझे सीधा कर सकती है. बीबी भी अच्छी थी और – अकलमंद थी, मगर – आण्टी को अकलमंद लोग अच्छे नहीं लगते...”

उसने अपनी बात होठों को इस तरह फ़ट् से बंद करके काट दी, जैसे बोतल का कॉर्क खोला हो, जल्दी से क्लीम की ओर देखा और, गिलास में बियर डालते हुए, बुदबुदाया:

“उनका झगड़ा हो गया. आण्टी और बीबी का...

नशा चढ़ रहा है’, सम्गीन ने गौर किया और वह सतर्क हो गया, इस उम्मीद में कि बिज़बेदोव मरीना के बारे में बोलना शुरू करेगा. मगर उसने फ़ौरन बियर पी डाली, और होठों से झाग उड़ाते हुए कहने लगा:

“और, हो सकता है, कि मैं बेकार ही शरम के बारे में कह रहा हूँ, शालीनता के लिए. अर्त्सिबाशेव को – पढ़ते हैं? ये है ईमानदार लेखक, अब तक इतना ईमानदार हुआ नहीं था! उसने, मेरे ख़याल से, ‘भूमिगत आदमी को, - दस्तयेव्स्की के इन्सान को – आख़िरकार आज़ाद कर ही दिया. वो साफ़ साफ़ कहता है: आदमी को हरामी बनने का अधिकार है, ये – उसका स्वाभाविक लक्ष्य है. जीवन का उद्देश्य है – सारी इच्छाएँ पूरी करना, चाहे वे – बुरी, औरों के लिए हानिकारक क्यों न हों, औरों पे थूको! मार-पीट, झगड़ा होगा? कोई बात नहीं – लडेंगे! और सच्चा आदमी, ताकतवर आदमी – हमेशा हरामी होता है, सतही दृष्टि से. इस सतह की कल्पना की थी आत्म रक्षण के लिए कमज़ोर बेवकूफ़ों ने की थी. ऐसा कहता है वो!”

ये सब उसने इतनी जल्दी-जल्दी कहा, जैसे वह नहीं कहता था, और सम्गीन ने अनुमान लगाया, कि बिज़बेदोव, शायद, मरीना के बारे में कहे गए शब्दों से डर गया है.

“मैंने सानिननहीं पढ़ी है,” उसने कठोरता से बिज़बेदोव की ओर देखते हुए कहा. “आपके वर्णन के अनुसार – उसका उपन्यास – फूहड़ व्यंग्य है, नीत्शे के व्यक्तिवाद पर कटाक्ष है...”

“हूँ, - शैतान जाने, हो सकता है, व्यंग्य भी हो!” बिज़बेदोव ने सहमति जताई, मगर फ़ौरन कहा:

पतापेन्का का एक उपन्यास है प्यार’, उसमें औरत भी इस हरामी को ही महत्व देती है इन...ईमानदार कार्यकर्ताओं के मुकाबले में. औरत, मेरे ख़याल में, ज़िंदगी की लज़्ज़त को आदमी के मुकाबले में ज़्यादा अच्छी तरह समझती है. ज़िंदगी का सच, कह सकते हैं...”

अब – मरीना के बारे में’, सम्गीन ने अपने आप को आगाह किया, ये महसूस करते हुए, कि बिज़बेदोव की शराबी बकवास उसके दिल में इस आदमी के प्रति नफ़रत पैदा कर रही है. मगर उसे बर्दाश्त करना मुश्किल था, और मरीना के बारे में कुछ सुनने की उम्मीद का लालच भी था.

वह उठा, कमरे का चक्कर लगाया और, किताबों की शेल्फ़ के सामने खड़े होकर, सिगरेट सुलगाई. कुर्सी पर झूलते हुए बिज़बेदोव बड़बड़ा रहा था:

“व्यंग्य, व्यंग्यचित्र...हुम्? अच्छा – चलो, ठीक है, बात ये नहीं है, बात बल्कि ये है, कि ये मैं अपने आप को समझ नहीं पाता हूँ. समझना – मतलब पकड़ना.” वह भर्राहट से हँसा. “ मुझे आदत हो गई है अपने आप को – कभी-ये, तो – कभी वो, समझने की, मगर – असल में – मैं कौन हूँ? शायद – एक क्षुद्र इनसान, मगर – इसका भी यकीन करना चाहिए. चाहे अपमानजनक ही लगे, मगर अपने आप को दृढ़ता से कहना होगा: तू – क्षुद्र चीज़ है और – चुपचाप बैठ जा!”

सम्गीन ने अनचाहे ही सिगरेट का सिरा ज़ोर से चबा लिया, कनखियों से बिज़बेदोव की कार्टून जैसी आकृति की ओर देखा और, ऊँगलियों से शेल्फ के काँच पर टक्-टक् करते हुए ख़यालों में गाली दी:

जानवर’.

“अपराध करने को भी जी चाहता है, बस, सिर्फ किसी एक जगह रुक तो जाऊँ, - कसम से!”

“तो ऐसी बात है.” सम्गीन ने अस्पष्टता से और धीरे से कहा. वह महसूस कर रहा था, कि इस आदमी को अब और ज़्यादा बर्दाश्त नहीं कर सकता है.

“आपको यकीन दिलाता हूँ,” बिज़बेदोव चहका. “मुझे बेहद मुश्किल लग रहा है, ख़ासकर इस समय...”

“इस समय क्यो?”

“वजह है. मैं शहर से बाहर रहता हूँ, किसी बंद गली में. लोगों से – डर लगता है, बाहर खींचकर कुछ भी करने पर मजबूर कर देंगे...कोई ज़िम्मेदारी का काम. मगर मैं विश्वास नहीं करता, नहीं चाहता, वो – कर रहे हैं, हज़ारों सालों से करते आ रहे हैं. तो, - इससे क्या? इसके लिए फाँसी पे चढ़ा देंगे, बस, अपने आप ही उधम मचा लेता हूँ.”

सम्गीन खाँसा और शेल्फ से बिना हटे बोला:

“ मेरा सिर दुखने लगा...”

“धुँए से,” बिज़बेदोव ने सिर हिलाकर समझाया.

“जाऊँ, थोड़ा टहलूँगा.”

“चलो, जाओ,” बिज़बेदोव ने इजाज़त दी और, कुर्सी से उठते हुए लड़खड़ा गया. “अच्छा – मैं भी जा रहा हूँ. वहाँ – मेरे यहाँ पानी टपक रहा है...लड़कियों के यहाँ रात बिताऊँगा, कोई बात नहीं...”

वह दरवाज़े की ओर गया, मगर फ़ौरन मुड़ा, सम्गीन की तरफ़ आते हुए बेहद नीची, भर्राहट भरी फ़ुसफ़ुसाहट से बोला:

“आप, क्लीम इवानोविच के दोस्त हैं, और मेरे दिल में आपके लिए...है...कोई एहसास... नज़दीकी का.”

वह बिल्कुल पास आ गया और, सम्गीन के ऊपर गिरते हुए, उसे शेल्फ से चिपकाते हुए, बाँहों में लेने की कोशिश करते हुए, और भी नीची आवाज़ में, जैसे दाँतों के बीच से, कहता रहा:

“वह – सबके साथ दोस्ती करती है, वह – सबसे चालाक एक्ट्रेस है, शैतान उसे...वह आदमी को निचोड़ देती है और – अलबिदा! वह आपको भी...”

“मेरी उसके बारे में कुछ और ही राय है,” सम्गीन ने शराबी से दूर हटते हुए जल्दी से और ज़ोर से कहा, मगर उसने हाथ नीचे करके, अचरज से और गंभीरता से पूछा:

“आप चिल्ला क्यों रहे हैं? मैं डरता नहीं हूँ. कुछ और राय है? अच्छा – ठीक है...”

और वह आगे बढ़ा, मगर, दरवाज़े का हैण्डल पकड़कर, रुक गया और बायाँ हाथ हिलाते हुए बोला:

“और ये ख़ूबसूरत मीश्का – जासूस है! उसे मुझ पर नज़र रखने के लिए भेजा गया है. और आप पर भी. बात – ये है...”

सम्गीन ने उसे नज़रों से बिदा किया, और सन्न होकर कुर्सी में बैठ गया.

कैसा...कमीनापन है!

शब्द कमीनापनवह फ़ौरन ढूँढ़ नहीं पाया, और इस शब्द से भी घटित हुए दृश्य का पूरा मतलब नहीं निकल पा रहा था. बिज़बेदोव की आकस्मिक, शराबी स्वीकारोक्ति में कोई गोलमोल, संदिग्ध बात थी, जो संदेहास्पद ढंग से पैरोडी से मिलती जुलती थी, और ये संदिग्धता ख़ास तौर से गुस्सा दिला रही थी, ख़तरे का संकेत दे रही थी. वह जल्दी से प्रवेश कक्ष में आया, गरम कपड़े पहने, करीब-करीब भागकर कम्पाऊण्ड में गया और, अंधेरे में, पानी के डबरे, जले हुए तख़्तों के बीच घूमते हुए, निर्णायक ढंग से अपने आप से कहा:

क्वार्टर बदलना चाहिए’.

मगर कुछ ही मिनट बाद अचानक समझ गया, कि शराबी की बातों से गुस्सा होना, असल में, अपमानजनक है.

मुझे किस बात पे गुस्सा आया? क्या उससे जो उसने मरीना के बारे में कही? ये – बेवकूफ़ी भरा झूठ है. मरीना – एक्ट्रेस तो बिल्कुल नहीं है’.

उसने अनचाहे ही अपनी चाल धीमी कर दी, - बिज़बेदोव के शब्दों में कुछ तो था, उससे मिलता-जुलता, जो उसने, सम्गीन ने, अपने बारे में मरीना से कहा था.

“मगर ऐसा नहीं हो सकता, कि उसने इस बारे में इसे बताया हो!

उसने जल्दी-जल्दी, मगर बेहद ध्यान से मरीना के उसके प्रति, बिज़बेदोव के प्रति बर्ताव पर नज़र डाली.

हो सकता है, बहुत संभव है, कि वह लोगों के प्रति निर्मम और चालाकी भरा बर्ताव करती हो. वह – अस्पष्ट ध्येय वाली इन्सान है. उसके पास बहाना है: उसकी साम्प्रदायिकता, किसी नए चर्च का निर्माण करने की इच्छा. मगर ऐसा कुछ भी नहीं है, जो इस बात की ओर इशारा करे, कि मेरे प्रति उसका बर्ताव बेईमानी भरा है. वह मुझसे बदतमीज़ी से बात करती है, मगर वैसे वो है ही बदतमीज़’.

उसने महसूस किया कि मरीना को संदेहों से बरी करना चाहिए, और महसूस किया, कि ये जल्दी ही करना चाहिए. आज की रात घूमने के लिए ठीक नहीं थी, कोनों के पीछे से ठण्डी, नम हवा धक्के दे रही थी, काले बादल आसमान से तारों को मिटा दे रहे थे, हवा शरद ऋतु के दयनीय शोर से लबालब थी. आखिरकार सम्गीन ने फ़ैसला किया कि मरीना से बिज़बेदोव के बारे में बात करेगा और बिज़बेदोव द्वारा मीशा के बारे में कहे गए शब्दों पर गौर करते हुए वह वापस घर लौटा,        

इस फ़ैसले में कोई सुकून भरी बात थी, और वो ज़रूरी थी. ज़ाहिर है, मरीना को किसी जासूस की ज़रूरत नहीं हो सकती, मगर – कोई सरकारी विभाग तो है, जिसे जासूसों की सेवाओं की ज़रूरत पड़ती है. मीशा ज़रूरत से ज़्यादा ही दिलचस्पी दिखाता है. कागज़ का पन्ना, जिस पर सम्गीन ने मरीना का चित्र बनाया था और, फ़ाड़कर डस्टबिन में फेंक दिया था, ड्राफ़्ट्स के बीच में, मीशा की मेज़ पर नज़र आया.

“तुमने ये क्यों लिया?” सम्गीन ने पूछा.

“मुझे अच्छा लगा,” मीशा ने जवाब दिया.

“इसमें क्या अच्छा लगा?”

“मरक्युरी. आपने उसे औरत के रूप में चित्रित किया,” मीशा ने सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा.

ईमानदार नज़र’, सम्गीन ने ग़ौर किया और आगे पूछा: “ और, तुम मरक्युरी के बारे में कैसे जानते हो?”

“मैंने ग्रीक- माइथॉलोजी पढ़ी है.”

“अहा,” सम्गीन ने कहा और इसके बाद, अपने आप ही नौजवान से आपकहकर बात करने लगा. हालाँकि माइथॉलोजी में, बेशक, नौजवान को दिलचस्पी हो सकती है, मगर फिर भी नौजवान अप्रिय ही लगता रहा, और नए क्वार्टर में नए क्लर्क को लेना पड़ेगा. बिज़बेदोव ने मरीना के बारे में जो कहा था, सम्गीन उसे याद नहीं करना चाहता था, मगर – याद आ ही गया. वह उससे और अधिक सतर्कता से पेश आने लगा, उसकी शांत, व्यंगपूर्ण बातों को अविश्वास से सुनने लगा, उनका गहराई से मूल्यांकन करने लगा और वर्तमान परिस्थिति के बारे में उसकी व्यंग्यात्मक टिप्पणियों को कम सहानुभूति से ग्रहण करता; वैसे उसकी टिप्पणियाँ हमेशा उसके दिल में सहानुभूति पैदा नहीं करती थीं, अक्सर वे उसे चकित ही करतीं. ऐसा लगता था, कि मरीना किसी बात के प्रति अधिकाधिक आश्वस्त होती जा रही है, अपने आप को विजयी महसूस कर रही है, ज़्यादा प्रसन्न लग रही है.

वास्तविकता सम्गीन को कभी-कभी अप्रसन्नता से अपनी याद दिला देती थी: फ़ाँसी पर लटकाए गई नई लिस्ट में उसने सुदाकोव का नाम पढ़ा, और अराकतावादियों के शहर में गिरफ़्तार किए गए लोगों की लिस्ट में वराक्सीन का नाम देखा, ‘ जो लोसेव और एफ्रेमोव कुलनामों से रहता था’. हाँ, ये पढ़ना बहुत बुरा लग रहा था, मगर, औरों के मुकाबले में, ये छोटे-मोटे तथ्य थे, और वे दिमाग़ में ज़्यादा देर तक नहीं रहे. मरीना ने इन मृत्युदण्डों के बारे में कहा:

“काश उन्हें, बेवकूफ़ों क, कोई संकेत ही दे देता, कि वे प्रतिशोधियों को पाल पोस रहे हैं.”

“ड्यूमा उन्हें अक्सर ये प्रेरणा देती है,” सम्गीन ने कहा.

मरीना ने तीखा जवाब दिया:

“संकेत देने से मेरा मतलब शब्दों से नहीं है...” और उसकी आँख़ें गुस्से से भड़क उठीं. उसका यही तीखापन और भड़क जाना, जो अचानक हो जाता था, मरीना के बारे में उसकी कल्पना से मेल नहीं खाते थे, इनसे सम्गीन को विशेष आश्चर्य होता था.

उसके पास मिस्टर लिओनेल क्रेटन प्रकट हुआ, उसकी उम्र का अंदाज़ लगाना मुश्किल था, मगर जैसे वह चालीस से ज़्यादा का नहीं था, हट्टा कट्टा, गठीला बदन, लाल गालों वाला; भूरे रंग के ऊँचे माथे पर घने, लहरिएदार बाल – जैसे हाइड्रोजन परॉक्सॉइड से उनका रंग उड़ाया गया हो, आँख़ें भी भूरे थीं और वे इतने तनाव से देखती थीं, जैसे कमज़ोर नज़र वाले लोग बिना चश्मा पहने देखते हैं.  आँखें – कोमल थीं, वह दिल खोलकर, प्रसन्नता से मुस्कुराता था, अपने पीले से दाँतों को दिखाते हुए, - इस दंतुल मुस्कान से उसका हजामत किया हुआ, प्यारा चेहरा और ज़्यादा प्रसन्न लगने लगता था. क्लीम का उससे परिचय कराते हुए मरीना ने कहा:

इंजीनियर, जिओलॉजिस्ट, कॅनाडा में रह चुके हैं, हमारे दुखोबोरोंसे मिल चुके हैं.”

“ओ, हाँ”      

क्रेटन ने पुष्टि की. “वे लोग बेहद – क्या है?- कृषिदास हैं?”

“बिन्दास?” सम्गीन ने सुझाया.

“हाँ, थैन्क्यू! मगर जवान हैं – पूरे अमेरिकन बन चुके हैं.

रूसी में वह बिना जल्दबाज़ी मचाए बोल रहा था, किन्हीं मात्राओं को खा जा रहा था, किन्हीं को सुर में गा रहा था, - महसूस हो रहा था, कि वह ईमानदारी से सही बोलने की कोशिश कर रहा है. लगभग सभी वाक्यों को वह सवालिया जामा पहना रहा था:

“इतने सारे चर्च, ये सब ऑर्थॉडोक्स चर्च हैं? और सभी ने ल्येव टॉल्स्टॉय को निष्कासित कर दिया? यूराल्स में एमेराल्ड्स (पन्ना) सिर्फ फ़्रांसीसी निकालते हैं?

मगर पूछ वह बहुत कम रहा था, मरीना की तरफ़ ख़ास आदरयुक्त भावना से देखते हुए उसकी बातें ज़्यादा सुन रहा था. काले रोएँदार ओवरकोट की जेबों में हाथ डाले, रास्तों पर फ़ौजियों जैसी नपी-तुली, हल्की चाल से चलता था, ऊदबिलाव की खाल की कैप पहनता, और उसकी आँख़ें कैप के सिरे से सीधे, बिना पलकें झपकाए, निश्चल देखती थीं. अक्सर चर्च की सर्विस में जाता और, गीतों से प्रसन्न होकर, गहरी आवाज़ में कहता:

ओय! पैगनिज़्म अच्छा है, - है ना?”

उसे बर्फ भी उत्तेजित करती थी:

“ये मुझे ऐसा बनाती है,” वह कस कर बंद की हुई अपनी मुट्ठी दिखाते हुए कहता.

उसमें एक निरंतर बोरियत, ज़िद्दीपन था. हर बार, जब भी वह मरीना के यहाँ जाता, सम्गीन उससे वहाँ मिलता, और इससे बहुत अच्छा नहीं लगता था, ऊपर से सम्गीन ने इस बात पर भी गौर किया, कि अंग्रेज़ उससे इस तरह सवाल पूछता है, जैसे डॉक्टर – मरीज़ से. शहर में तीन हफ़्ते रहने के बाद क्रेटन ग़ायब हो गया.

सम्गीन क्रेटन के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब देते हुए मरीना ने अनिच्छा से और अमित्रतापूर्ण ढंग से कहा:

“मुझे उसके बारे में क्या मालूम है? पहली बार मिली हूँ, और वह – हकला है. उसके पिता - क्वाकेर थे, मेरे शौहर के दोस्त, दुखोबोरों को कनाडा में बसाने में मदद करते थे. लिओनेल – ये नाम तो फूल से मिलता जुलता है, - इसकी भी दिलचस्पी असंतुष्टों में, साम्प्रदायिकों में है, किताब लिखना चाहता है. मुझे इस तरह के निरीक्षण करने वाले, जासूस पसंद नहीं हैं. हाँ, और ये भी स्पष्ट नहीं है: कि उसकी दिलचस्पी ज़्यादा किसमें है – साम्प्रदायिकता में या सोने में? अब ये साइबेरिया गया है. स्वभाव की अपेक्षा खतों में वह ज़्यादा दिलचस्प है.”

बिज़बेदोव के बारे में सम्गीन उससे बात नहीं कर पाया, हालाँकि हर बार वह उसके बारे में बात करने की कोशिश करता. हाँ, और ख़ुद बिज़बेदोव भी दिखाई नहीं देता था, सुबह से देर रात तक अक्सर ग़ायब हो जाता. एक बार शाम को टहलते हुए सम्गीन मरीना के पास दुकान में गया और उसे मेज़ पर पाया – सामने बिलों का ढेर था, और घुटनों पर मोटा हिसाब-किताब वाला रजिस्टर.

“पैसे – पसंद करती हूँ, मगर गिनना – पसंद नहीं करती, बल्कि चिढ़ होती है,” उसने चिड़चिड़ाहट से कहा. मेरा ज़खारी भी इस काम में उस्ताद नहीं है. किसी कारिंदे को, बूढ़े को रखना पड़ेगा.”

“बूढ़े को - क्यों?” सम्गीन ने मज़ाक से पूछा.

“ज़्यादा शांत होते हैं,” कागज़ों की सरसराहट करते हुए उसने जवाब दिया. “चोरी नहीं करेगा. मार नहीं डालेगा.”

“और ज़खारी किस काम में उस्ताद है?”

ज़खारी? हाँ – किसी भी काम में नहीं. साधारण सपने देखने वाला और मुश्किल जगहों पर जाने वाला आवारा, - धरती पर मुश्किल जगहों पे नहीं, बल्कि – किताबों में.”

लापरवाही से बिलों को सोफ़े पर फेंक कर, उसने मेज़ पर कुहनियाँ टिकाईं और, हथेलियों के बीच चेहरा दबाकर, मुस्कुराते हुए कहा:

“ज़खारी को तुम पर गुस्सा आया है, शिकायत कर रहा था, कि तुम – घमण्डी हो, ‘हैपी रिसोर्टमें उसे कुछ समझाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई और किसानों से भी गर्व से ही पेश आए.”

सम्गीन ने कंधे सिकोड़कर जवाब दिया:

“मैं भी – समझाने की कला में उस्ताद नहीं हूँ. खुद को ही काफ़ी कुछ स्पष्ट नहीं है. और किसानों से बात करना तो मुझे वैसे भी नहीं आता.”

मरीना ने उसकी बात काटते हुए पूछा:

“ और, क्या वलेन्तीन ने मेरे बारे में शिकायत की थी?”

कुछ संदेह-सा महसूस करके, कि वह उसे चेतावनी दे रही थी, सम्गीन काँप भी गया.

उसकी आँखों में जानी पहचानी, मगर हमेशा से ज़्यादा तीखी मुस्कुराहट थी, और मुस्कुराहट की तल्खी ने उसे पादरियों पर मरीना के क्रोध को याद करने पर मजबूर कर दिया. वह सावधानीपूर्वक कहने लगा:

“उसे अपने बारे में शिकायत करना अच्छा लगता है. आम तौर से वह बातूनी है.”

“गप्पी,” मरीना ने जोड़ा. “मगर मुझे भी गालियाँ देता है, हाँ?”

“नहीं. वैसे – तुम्हें चालाक कहा था.”

“बस?”

वह हौले से और अप्रियता से सम्गीन की ओर इस तरह देखते हुए हँसी, कि वह समझ गया: उस पर विश्वास नहीं कर रही है.

तब, स्वयम् के लिए भी अप्रत्याशित रूप से, रूमाल से चश्मा पोंछते हुए, उसने दबी ज़ुबान में कहा:

“रात को, अग्निकाण्ड के बाद, वह ...अजीब तरह से बात कर रहा था! वो, जैसे मुझे ये यकीन दिलाने की कोशिश कर रहा था, कि तुमने मुझे जानबूझ कर उसकी बगल में रखा है, हमारे स्वभावों में कुछ समानता के आधार पर और इस उद्देश्य से हम एक दूसरे को की देखभाल कर सकें...”

इतना कहकर सम्गीन सकुचा गया, उसे महसूस हुआ, कि खून उसके चेहरे की ओर दौड़ रहा है.

ये विचार पहले कभी भी उसके दिमाग़ में नहीं आया था, और वह इस बात से चौंक गया, कि ये विचार आया. उसने देखा कि मरीना भी लाल हो गई है. धीरे-धीरे मेज़ से हाथ हटाकर, वह सोफ़े की पीठ से टिक गई और, भँवे नचात्कर, कठोरता से बोली:

“ओह, ये तुम्हारे ही दिमाग की उपज है!”

“वह नशे में धुत् था,” सम्गीन बुदबुदाया, चश्मा कालीन पे गिर गया, और जब वह उसे उठाने के लिए झुका, तो अपने सिर के ऊपर सुना:

“क्या तुम ये याद दिलाना चाहते हो: ‘जो होश वाले के – दिमाग़ में होता है, शराबी की – ज़ुबान पे आ जाता है’? नहीं, वलेन्तीन सपनों की दुनिया में जीता है, मगर ये उसके लिए बेहद ऊँची चीज़ है. ये – तुम्हारे दिमाग की उपज है, क्लीम इवानोविच. और – तुम्हारे चेहरे से ही ज़ाहिर है – तुम्हारे!”

सीने पर हाथों का क्रॉस बनाकर, आँखों पर पलकों का परदा डालकर, वह कहती रही:

“पता नहीं – मेरी चालाकी के बारे में इतनी ऊँची राय रखने के लिए तुम्हें धन्यवाद दूँ या – डाँटू, जिससे तुम शर्मिंदा हो जाओ? मगर, लगता है, तुम्हें शरम आ ही रही है.”

सम्गीन को अपने आप पर घृणा महसूस हुई.

मैं इसके साथ बेवकूफ़ी से पेश आता हूँ, छोकरे की तरह,’ उसने सोचा.

मरीना ख़ामोश थी, वह होठों को काटते हुए प्रकट रूप से इंतज़ार कर रही थी: वह क्या कहेगा?”

उसने कहा;

“देखो – उसकी बातों में कुछ इस तरह की बात थी, जो मैंने अपने बारे में तुम्हें बताई थी...”

“ये और भी बढ़िया है!” हाथों को नचाते हुए वह चिल्लाई, और, ठहाका मारकर, हिलते हुए, हँसते हुए उसने पूछा: “अरे – तुम कह क्या रहे हो, ज़रा सोचो! मैं उसके साथ – ऐसे आदमी के साथ – तुम्हारे बारे में बात करूँगी! तुम अपने आप को किस स्तर पे रख रहे हो? ये सब तुम्हारा मानव-द्वेष है. ओह – हैरान कर दिया! समझ लो, ये – बुरी बात है!”

कुछ संभलकर सम्गीन ने कहना शुरू किया:

“मैं किसी, मतलब, उपहासात्मक संयोग की अनदेखी नहीं कर सका...”

“छोड़ो,” उसकी तरफ़ हाथ हिलाकर मरीना ने कहा. “छोड़ो – और भूल जाओ इस बात को.” इसके बाद सिर हिलाते हुए हौले से, खोए-खोए अंदाज़ में वह कहती रही:

“किस हद तक - अजीब इन्सान हो तुम! और तुमने अपने आपसे ऐसा कौन सा गुनाह किया है, अपने आप को क्यों सज़ा देते हो?”

ये बड़ी अच्छी तरह, गर्मजोशी से, वास्तविक आश्चर्य से कहा गया था. उसी अंदाज़ में उसने कुछ और भी कहा, और सम्गीन ने कृतज्ञतापूर्वक गौर किया:

इस तरह से मुझसे किसी ने भी बात नहीं की थी.दिमाग में दुन्याशा का शोख़ चेहरा, उसकी चंचल आँखें कौंध गईं, - मगर दुन्याशा को इस औरत के बराबर नहीं रखना चाहिए! उसने महसूस किया कि मरीना से कुछ विशेष, सच्चे शब्द कहना उसका कर्तव्य है, मगर सही शब्द मिले ही नहीं. और वह, फिर से कुहनियों को मेज़ पर रखकर, ठोढ़ी को ख़ूबसूरत पंजों पर टिकाए, कामकाजी अंदाज़ में, हालाँकि नर्मी से कहने लगी:

“मैंने तुमसे वलेन्तीन के बारे में इस वजह से पूछा था: उसने बीबी से तलाक ले लिया, उसका – एक लड़की से इश्क चल रहा है, और वो गर्भवती हो गई है. क्या उसीसे, ये – सवाल है. वो – दुबली-पतली चीज़ है, और ये सारा किस्सा उस बेवकूफ़ को ध्यान में रखकर शुरू किया गया है. वो – एक ज़मींदार की बेटी है, - था एक बदमाश, रादोमिस्लोव: शिकारी, जुआरी, प्लेबॉय किस्म का; पूरी तरह निर्धन हो गया, ख़ुदकुशी कर ली. दो लड़कियाँ छोड़ गया, ऐसी, जानते हो, ‘हाफ़-वर्जिन्स’, मार्सेल प्रेवोस्त के मुताबिक, या उससे भी बदतर: ख़ुशी देने वाली लड़कियाँ’, - गाती हैं, खेलती हैं, वगैरह, वगैरह.”

थोड़ा रुककर, हल्की-सी उबासी को छुपाते हुए, वह उसी हल्के-फ़ुल्के अंदाज़ में बोलती रही:

“वलेन्तीन के पास कुछ तो है और – वह कम नहीं है, मगर – वह ट्रस्ट की देखरेख में है. शायद, आपकी कानूनी भाषा में इसे कहते हैं, - अगर मैं ग़लत नहीं हूँ, - अक्षम है. पिता की वसीयत के मुताबिक ये ट्रस्ट बनाई गई है, फ़िज़ूलखर्ची की वजह से, ट्रस्टी है – उसका ग़ॉड-फ़ादर लगीनोव, काँच की फ़ैक्ट्री वाला, आदमी – बूढ़ा है, बीमार है, - असल में ट्रस्ट मेरे ही हाथों में है. तीन साल पहले, जब वलेन्तीन बाईस साल का हुआ, तो उसने, मुझसे छुपाकर, हिज़ मैजेस्टी के पास अपील दायर की, कि इस ट्रस्ट को रद्द कर दिया जाए, उन्होंने इनकार कर दिया. उसकी पहली शादी पूरी तरह टूटी नहीं है, मगर बीबी होशियार निकली और ईमानदार इन्सान निकली...ख़ैर, ये – महत्वपूर्ण नहीं है.”

थकावट भरी साँस लेकर मरीना ने चारों ओर नज़र दौड़ाई, आवाज़ नीची की.

“अब वलेन्तीन ने एक नया शौक पाला है, - रदोमिस्लोव की बेटियाँ और उनके ग्रुप के छिछोरे लोग उसे नचाते हैं. उनका मकसद – साफ है: बदमाश को लूटना, ये मैं पहले ही कह चुकी हूँ. तो ये है सारा किस्सा. क्या उसने तुम्हें बताया?”

“कभी नहीं, एक भी लब्ज़ नहीं,” सम्गीन ने कहा, उसे बहुत ख़ुशी हो रही थी, कि वह इतने निर्णायक ढंग से कह सकता है.

नाक को छोटी ऊँगली से खुजाते हुए उसने पूछा:

“क्या आऊट हाउस उसने ख़ुद जलाया था?”

“मेरा ख़याल है, कि नहीं जलाया.”

“धमकी दे रहा था, कि जला देगा.”

“धमकी दे रहा था? किसे?”

“मुझे. और – तुमने ये क्यों पूछा?”

“मैंने भी उसके मुँह से यही सुना था,” सम्गीन ने स्वीकार किया.

मरीना ने गहरी साँस ली:

“देखो, देख रहे हो! मगर ये, बेशक, शरारत है. उसके पीछे पड़े रहने से मैं तंग आ चुकी हूँ, मगर – तीस साल तक उसकी ट्रस्टीशिप से नहीं हटूँगी, वादा किया है! तुम्हें शायद इस केस को देखना होगा...”

सम्गीन ने सिर झुकाया, - वह थकावट से, मुस्कुराहट के साथ, कहती रही:

“सोच लिया कि बिलियर्ड का खिलाड़ी हूँ, पाँच सौ रूबल्स तक की रकम हारता रहा, रेस खेली, मुर्गों की लड़ाई में हिस्सा लिया, मतलब – कोशिश करता रहा कि निर्धन हो जाए. ख़ैर, तुम कःउद ही देख रहे हो, कि कैसा है वो...”

“हाँ,” सम्गीन ने कहा.

वह मरीना के यहाँ से ये महसूस करते हुए निकला कि मरीना के प्रति उसका रवैया कुछ ज़्यादा स्पष्ट हो रहा है.

“कितने अजीब ढंग से मैं बर्ताव करता हू’, उसने लगभग शर्म से सोचा, इसके बाद अपने आप से पूछा: क्या उसने किसी पर इतना विश्वास किया है, जितना इस औरत पे करता है? इस सवाल का जवाब उसे नहीं मिला और वह उस बात पर विचार करने लगा, जिसने उसे पहले भी परेशान किया था: वह वाक्यों की अलग-अलग प्रणालियाँ जानता है, मगर उनके बीच एक भी ऐसी नहीं है, जो आंतरिक रूप से उससे मिलती-जुलती हो. मरीना के वाक्यों की प्रणाली भी उसके दिल को नहीं छूती, दिलचस्प नहीं लगती, विशेष रूप से पराई लगती है. मगर मरीना चाहे किसी भी बारे में क्यों न बात करे, उसका मज़बूत इरादों वाला अंदाज़, किसी अप्राप्य चीज़ में उसका विश्वास, - उस पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं, - ये उसे स्वीकार करना चाहिए. और सिर्फ इसी एक बात से उसके आकर्षण को समझाया नहीं जा सकता. वह इस औरत पर ज़रा भी निर्भर नहीं था – उसका ख़ूबसूरत जिस्म उसके मन में मर्दों वाली ख़्वाहिश नहीं जगाएगा, इस बात को तो वह अपने सामने गर्व से कह सकता है. मगर फिर भी: उसकी सम्गीन पर सत्ता किस बात में छुपी है? इस सवाल का जवाब उसने नहीं ढूँढ़ा, क्योंकि, पहली बार उसकी सत्ता को स्वीकार करने के बाद, वह सकुचा गया था. अभी अभी महसूस किए हुए दृश्य ने उसे मुलायम बना दिया था, ख़ासकर: ‘किसलिए अपने आप को सज़ा देते हो?’ – हौले से कहे गए शब्दों ने तो उसे प्यार से शांत कर दिया था.

बेज़बेदोव वाली कहानी ने और ट्रस्ट वाले अप्रिय मामले में उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की ज़रूरत ने इस प्रभाव को कुछ हद तक धुँधला कर दिया था.

ये - अजीब मामला है’, सम्गीन ने सोचा और उसे किसी की कविता की दो पंक्तियाँ याद आ गईं:

ज़िंदगी में अपनी कभी न पी सका

एक बूंद भी खुशी की, ज़हर न हो जिसमें डला!

मगर इस नए, काव्यात्मक मूड की सुरक्षा में करीब दस दिन बाद बिताने के बाद, सुबह मरीना प्रकट हुई:

“मीशा, - जा, गाड़ीवान से कह दे, कि – लीदिया तिमोफ़ेयेव्ना के घर जाए और वहीं मेरा इंतज़ार करे.”

और जब नौजवान चला गया, तो वह ज़िंदादिली से चहकी:

“क्या तुम सोच भी सकते हो - वलेन्तीन ने क्या किया है? पीटरबुर्ग भाग गया. एक हज़ार रूबल्स का प्रॉमिसरी नोट दिया, जिसके लिए उसे सात सौ चालीस मिले और मुझे ख़त भेजा: अपनी गलतियों पर पश्चात्ताप करता है, प्यार को खारिज करता है, जहाज़ पर नाविक बनना चाहता है और समंदरों की सैर करना चाहता है. सब – झूठ बोलता है, बेशक, ट्रस्टीशिप ख़त्म करने की कोशिश में गया है, रदोमिस्लोवों ने सिखाया है.

“तुम्हारा क्या करने का इरादा है?” सम्गीन ने पूछा.

“आs, कुछ नहीं!” उसने कहा. “तो – प्रॉमिसरी नोट मैं ख़रीद लूँगी, ज़खारी को देखभाल के लिए इस घर में रख दूँगी. – भाग गया, कमीना!” वह ख़ुशी से चहकी और पूछा: “क्या तुमने ग़ौर नहीं किया, कि वो नहीं है?”

“हम कभी-कभार ही एक दूसरे से मिलते हैं,” सम्गीन ने कहा.

वह आऊट हाउस में गई, सम्गीन को इस बात से ख़ुश करके कि ट्रस्ट वाला मामला अनिश्चित समय के लिए टल गया है. ऐसा ही हुआ, - दो महीने गुज़र गए – मरीना ने एक भी शब्द से भतीजे की याद नहीं दिलाई.                      

बसंत से पहले मीशा ग़ायब हो गया, उन्हीं दिनों, जब उसके लिए काफ़ी काम इकट्ठा हो गया था, और उसके बाद, जब सम्गीन ने उसकी उपस्थिति से पूरी तरह समझौता कर लिया था. सम्गीन ने ग़ुस्से में फ़ैसला कर लिया, कि उसे नौजवान को काम से निकालने का पर्याप्त बहाना मिल गया है. मगर चौथे दिन सुबह शहर के अस्पताल के डॉक्टर ने फ़ोन करके उसे सूचित किया, कि पेशन्ट मिखाइल लोक्तेव सम्गीन से विनती करता है, कि उससे मिले. सम्गीन पूछ भी नहीं पाया था, कि मीशा को क्या हुआ है, - डॉक्टर ने चोंगा लटका दिया; मगर अस्पताल आने के बाद, क्लीम पहले डॉक्टर के पास गया.

बड़े, भारी बदन वाले आदमी ने, जो सफ़ेद एप्रन पहने था, गंजा था, लाल चेहरे पर गोल-गोल आँखें थीं, कहा:    

“खूब मारा है, मगर – ख़तरे की कोई बात नहीं है, हड्डियाँ – सलामत हैं. छुपा रहा है, कि किसने और कहाँ उसे मारा, - शायद, तवायफ़ों के पास. दो दिन तक बताया ही नहीं – वह कौन है, मगर कल मैंने उसे धमकी दी, कि पुलिस में रिपोर्ट करूँगा, मेरा कर्तव्य ही है! नौजवान आया, जिसे बेहोश होने तक मारा गया है, और फिर...समय ऐसा...समय की माँग है... हर चीज़ स्पष्ट होना चाहिए!”

और ज़्यादा बुरे मूड में सम्गीन बड़े, सफ़ेद बक्से में घुसा, जिसमें एक जैसे पलंगों पर – एक जैसी, पीले गाऊन पहनी आकृतियाँ बैठी और लेटी थीं; उनमें से एक सम्गीन की तरफ़ बढ़ी और, पास आकर, जानी-पहचानी, नपी-तुली आवाज़ में बेहद धीरे कहने लगी:

“माफ़ कीजिए, कि आपको परेशान कर रहा हूँ, क्लीम इवानोविच, मगर डॉक्टर मुझे छुट्टी देना नहीं चाहता और धमका रहा है, कि पुलिस में रिपोर्ट कर देगा, और इसकी – ज़रूरत नहीं है!”

उसके सिर और आधे चेहरे पर पट्टियाँ बंधी थीं, वह सम्गीन की तरफ़ एक – दाईं आँख़ से देख रहा था, जो माथे के नीचे गहरी धँस गई थी, बेरंग गाल थरथरा रहा था, फूले हुए होंठ भी थरथरा रहे थे.               

मुझसे डरता है,’ सम्गीन ने कल्पना की.

“मैंने कोई भी बेवकूफ़ीभरी बात नहीं की, यकीन कीजिए, इसकी पुष्टि मेरे टीचर करेंगे...”

“टीचर?” सम्गीन ने पूछा.

“दाँ, वसीली निकोलाएविच समइलव, मुझे मैट्रिक के लिए तैयार कर रहे हैं. मैं अच्छी तरह से काम कर सकता हूँ...”

उनकी बातों पर कान देते हुए, पेशन्ट्स लोग चुपके-चुपके उनके पास सरक रहे थे, दवाइयों की गंध दम घोंट रही थी, कोई इतनी अलग-अलग आवाज़ों में और इतनी सावधानी से कराहा, जैसे ऐसा करने की प्रैक्टिस कर रहा हो; मीशा की आँख सीधे और अपेक्षा से उसकी ओर देख रही थी.

“क्या तुम छुट्टी चाहते हो? अच्छा,” सम्गीन ने कहा. मीशा सावधानी से एक कदम किनारे की ओर हट गया.

पढ़ रहा है. युनिवर्सिटी में घूमता है, - और कहीं जाकर लफ़ड़ा करके आया है’, डॉक्टर से बात करके, अस्पताल के बाग से गेट की ओर चलते हुए सम्गीन ने सोचा. गेट में उससे एक आदमी टकराया, जिसने मौसम से मेल न खाता हुआ हल्का कोट और कानों को ढाँकती हुई लम्बी पट्टियों वाली टोपी पहनी थी.

“लगता है, आप सम्गीन महाशय हैं?” उसने पूछा और, पुष्टि का इंतज़ार न करते हुए कहा:

“मुझे पाँच मिनट दीजिए.”

सम्गीन ने उसके बेरंग, फूले-फूले चेहरे पर सफ़ेद अस्तव्यस्त दाढ़ी पर नज़र डाली और कहा कि – उसके पास समय नहीं है, वह विनती करता है, कि मुलाकात के समय पे आए. उस आदमी ने अपनी टोपी पर ऊँगली गड़ाई और अस्पताल के दरवाज़े की ओर चला गया, और सम्गीन – घर की ओर चल दिया, ये निश्चय करके कि शायद इस आदमी का कोई छोटा-मोटा क्रिमिनल केस होगा. वह आदमी ठीक चार बजे सम्गीन के पास आया, सम्गीन सोचने पर मजबूर हो गया:

आलसी आदमी की पाबंदी’.

वह बड़ी देर तक और सावधानीपूर्वक अपने चौड़े कंधों से पुराना कोट उतारता रहा, सीने पर जेब वाले मुड़े-तुड़े कोट और कपड़े का चौड़ा बेल्ट बाँधे नज़र आया, उसने नाक छिनकी, दाढ़ी को ठीक से सहलाया, विरल बालों पर ऊँगलियों से कंघी की, आख़िरकार बिना जल्दी किए विज़िटर्स रूम में आया, मेज़ के पास बैठा और – काम की बात करने लगा.

“मैं – समैलव. आपका नकलनवीस, लोक्तेव – मेरा शिष्य है और – मेरे ग्रुप का सदस्य है. मैं – पार्टी का सदस्य नहीं हूँ, बल्कि तथाकथित कल्चरलहूँ; पूरी ज़िंदगी नौजवानों के साथ काम करता रहा, मगर अब, जब क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों को गिन-गिनकर नष्ट किया जा रहा है, मुझे ये बेहद ज़रूरी प्रतीत होता है, कि नुक्सान की भरपाई की जाए. ये, ज़ाहिर है, पूरी तरह नैसर्गिक है और इसका श्रेय मुझे नहीं दिया जाना चाहिए.

सम्गीन ने उसकी परिभाषा लंगड़े चक्कीवाले के शब्दों से कर दी:

समझाने वाले महाशय’.

समैलव थकी हुई आवाज़ में और आसानी से, बिना किसी जल्दी के बोल रहा था, उस आदमी के समान जिसे काफ़ी बोलने की आदत होती है. उसकी आँखें काली, दुखभरी थीं, और उनके नीचे – नीली-नीली थैलियाँ. उसकी बात सुनते हुए स्मगीन ऊँगलियों से मेज़ बजाए जा रहा था, जैसे उसे इशारा कर रहा हो, कि जल्दी-जल्दी कहना चाहिए. बजा रहा था और सोच रहा था:

हाँ, ये समझाने वाला महाशयही है, उन लोगों में से एक जो सामाजिक ज़िम्मेदारियों की रूपरेखा बनाते हैं.उसे इस आदमी से किसी हास्यास्पद बात की उम्मीद थी और, अगले ही पल – उसे पता चल गया:

“आप, ज़ाहिर है, जानते हैं, कि लोक्तेव – एक बहुत काबिल इन्सान है और उसकी रूह – बेहद पाक-साफ़ है, जैसी मुश्किल से मिलती है. मगर ज्ञान की प्यास ने उसे स्कूली विद्यार्थियों और विद्यार्थिनियों के ग्रुप की ओर आकर्षित कर लिया – अमीर परिवारों के; वहाँ वे, आधुनिक साहित्य के अध्ययन की आद्‌अ में...ये भी साहित्य है, मैं आपसे कहता हूँ! – नफ़रत से त्यौरियाँ चढ़ाकर, करीब-करीब चीखते हुए उसने कहा. – “असल में ये गुण्डे और बेवकूफ़ बच्चे हैं, जिनमें लैंगिक आकर्षण उम्र से पहले जागृत हो गया है, - वहाँ वे...” समैलव ने जल्दी से अपने सिर के ऊपर हाथ घुमाया. “आम तौर से वहाँ, कपड़े उतार देते हैं, एक दूसरे को छूते हैं और...शैतान जाने क्या –क्या करते हैं!”

उसने हाथ नचाए, आँखों के नीचे की नीली थैलियाँ अचानक गीली हो गईं; पतलून की जेब से रूमाल निकालकर और भूरे आँसू पोंछते हुए, वह थरथराती आवाज़ में बोला और इस तरह, जैसे लब्ज़ उसके गले को खरोंच रहे हैं:

“क्या ऐसी बात की उम्मीद थी, आँ? नहीं, आप कहिए: क्या ऐसी बात की उम्मीद थी? कल – बेरिकैड्स और आज – ऐसा घिनौनापन, आँ? और ये सारे कवि...बकरी के साथ, वहाँ...और होना चाहता हूँ बहादुर’, ऐसे कैसे? - ‘खींचना चाहता हूँ, तन से तेरे कपड़े’. सिर्फ – हस्तमैथुन और सुअरपन!”

वह गालियाँ भी नर्मी से दे रहा था और, ज़ाहिर था, कि इस बात से दुखी था कि गालियाँ देना पड़ रहा है. सम्गीन ने मुँह बनाया और ख़ामोश रहा, इंतज़ार करते हुए: आगे क्या होगा? समैलव ने कोट की जेब से करेलियन-बर्च के पेड की डिब्बी, सिगरेट वाले कागज़ की पुस्तिका, चैरी का चुरूट, कोई माचिस की डिबिया निकाली, ये सब मेज़ के किनारे पे रख दिया और, किसी शराबी की तरह थरथराती ऊँगलियों से सिगरेट लपेट कर आगे कहने लगा:

“तो, संक्षेप में: लोक्तेव वहाँ दो बार गया था और पहली बार वह सिर्फ परेशान हो गया, और दूसरी बार – उसने विरोध किया, जो उसके लिए स्वाभाविक था. ये...नंग-धडंग उसके ऊपर गुस्सा हो गए और, रात को जब वह मेरे यहाँ से एक लड़की कितायेवा के साथ जा रहा था – लड़की भी विद्यार्थिनी है, - तो उन्होंने उसे मार मार के बेदम कर दिया. कितायेवा भाग गई, ये सोचकर कि उसे मार डाला है और – ये भी बेवकूफ़ी थी! – इस सबके बारे में मुझे सिर्फ कल शाम को ही बताया. तो- ये बात है. यहाँ, डर और ख़तरा है, कि उसे स्कूल से निकाल देंगे, मगर...ये अच्छी बात नहीं है, नहीं!”

एक छोटे से सिगार के आकार की सिगरेट लपेट कर, उसने ज़हरीली गंध वाला खूब सारा गाढ़ा, नीला धुँआ छोड़ा; ऐसा लग रहा था, कि धुँआ न सिर्फ उसके मुँह से, नाक से आ रहा है, बल्कि कानों से भी निकल रहा है. सम्गीन कनखियों से उस पर नज़र रखे हुए बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था. इस आदमी ने उसे बहुत पहले के भूतकाल की याद दिला दी, अंकल क्रिसान्फ़ की, ल्युबाशा सोमवा के छोटे से अंकल मीशाकी और, और भी कई ओल्ड टेस्टामेन्टवाले लोगों की. मगर उसे स्वीकार करना पड़ा कि समैलव की आँख़ें – अच्छी हैं, उनमें वो एकाग्रता का भाव है, जो सिर्फ उसी इन्सान के पास होता है, जिसने किसी एक आदर्श के लिए स्वयम् को समर्पित कर दिया गया हो.

“स्वाभाविक है, आप समझते हैं, कि इस तरह के ग्रुप को बने रहने की इजाज़त नहीं होनी चाहिए, ये – संक्रमण का स्त्रोत है. बात ये नहीं है, कि मिखाइल लोक्तेव को मारा गया. मैं आपके पास इसलिए आया हूँ, कि मीशा ने एक सभ्य, संस्कृत व्यक्ति के रूप में आप के बारे में जो विचार ज़ाहिर किए हैं...चलो, और – आम तौर से नैतिक रूप से, बौद्धिक रूप से आप उसे बहुत प्रभावित करते हैं...आजकल सब लोग छुटपुटा राजनीति में मशग़ूल हैं, - ये ड्यूमा, - मगर, ख़ैर, बात ये नहीं है!” उसने गुरगुराकर, अलग से, प्रभावशाली ढंग से कहा:

“इस बात की इजाज़त नहीं देनी चाहिए, कि अख़बार इस लफ़ड़ेबाज़ संस्था का भण्डाफ़ोड़ करें, वो रोज़मर्रा की गॉसिप का मसाला बने, कि नौजवानों को स्कूल से निष्कासित किया जाए और...वगैरह, वगैरह. क्या करना चाहिए? ये है मेरा सवाल.”

“सबसे पहले – ये साबित करना होगा कि लोक्तेव की कहानी में कितना सच है,” सम्गीन ने प्रभावशाली ढंग से कहा, मगर समैलव ने कनखियों से उसकी तरफ़ देख कर पूछा:

“उसने आपको क्या बताया?”

“उसने – आपको बताया, न कि मुझे,” सम्गीन ने गुस्से से कहा.

बड़े अचरज से उसकी तरफ़ देखते हुए, समैलव ने कहा:

“”मुझे किताएवा ने बताया, न कि उसने, उसने – इनकार कर दिया, - सिर दुख रहा है. मगर बात ये नहीं है. मैं ऐसा सोचता हूँ : आपको उसके इतिहास में जाना होगा, मूल कारण की ओर: मिखाइल आपके यहाँ काम करता है, आप – एडवोकेट हैं, अप इस ग्रुप के दो-तीन सदस्यों को अपने यहाँ बुलाइए और उन्हें, उन बदमाशों को, समझाइए, कि उनके इस बेवकूफ़ शौक के क्या-क्या सामाजिक और शारीरिक परिणाम हो सकते हैं. ऐसा! मैं – ये नहीं कर सकता, उनके लिए मैं कोई रसूख़दार आदमी नहीं हूँ, और मुझ पर – पुलिस की नज़र है; अगर वे मेरे पास आए – तो ये उनके लिए नुक्सानदायक होगा. वैसे भी मैं नौजवानों को अपने यहाँ नहीं बुलाता.”

थोंप दी ज़िम्मेदारी’, ख़यालों में मुस्कुराते हुए सम्गीन ने सोचा; गुस्सा बढ़ता जा रहा था, समैलोव और ज़्यादा मासूम, ज़्यादा हास्यास्पद होता जा रहा था, और उसे इस बात का यकीन दिलाने को बेहद जी चाह रहा था, मगर ख़तरे के एहसास ने रोक लिया: ये मुझे इस स्कैण्डल में खींच लेगा, इसे शैतान ले जाए!

सम्गीन ज़रा भी कल्पना नहीं कर पा रहा था: ये कैसे होगा? कोई बदमाश, गुण्डे आयेंगे, और उसे उनको शिष्ठाचार के नियम सिखाने होंगे. किसी लिहाज़ से ये दिलचस्प हो सकता है, मज़ाहिया भी हो सकता है, मगर – उतना नहीं, कि अपने आप को लैंगिक-नैतिकता के उपदेशक के हास्यास्पद स्थान पे रखा जाए.

“इस पर विचार करना होगा,” उसने दृढ़ता से कहा. “मुझे समय दीजिए. मुझे लोक्तेव से पूछ-ताछ करनी होगी. वो ही आपको मेरे निर्णय के बारे में बताएगा.”

“अच्छा,” उठकर, अपने सिगरेट वाले सामान को कोट की जेब में रखते हुए समैलव मान गया; हालाँकि उसने एक ही सिगरेट पी थी, मगर धुँआ इतना कर दिया था, जैसे पाँच लोग सिगरेट पी रहे थे. “मतलब, मैं – इंतज़ार करूँगा. मुझे याद रखिएगा!”

हौले से सम्गीन से हाथ मिलाकर, वह बेहद थकी हुई चाल से वह हॉल में गया, सावधानी से ओवरकोट पहना, टोपी को ध्यान से देखा और, उसे पहन कर, दबी-घुटी आवाज़ में कहा:

“समय तो कैसा ख़तरनाक है, आँ? साहित्य की खोज-ख़बर रखते हैं? कैसा है? सदियों की परंपराओं का विनाश...”

और उसने सम्गीन की ओर अपनी चौड़ी, झुकी हुई पीठ मोड़ी, ऐसे आदमी की पीठ, जो किताबों के ऊपर झुककर जीता है. खिड़की और भट्टी का हवादान खोलते हुए सम्गीन ने उसके बारे में यही सोचा.

चुँधियाया हुआ पुस्तक प्रेमी. दिखावटी नहीं, बल्कि बेहद मासूम पुस्तक प्रेमी. मैं क्या करने वाला हूँ?’

सम्गीन को यकीन था, कि यह लफ़ड़ा अख़बारों की नज़र से नहीं छूटेगा. अगर उसका नाम भी घसीट लिया जाता है, तो बेहद अप्रिय होगा. और ये मीशा – बेहद अटपटाहट भरा प्राणी है. इस बात की कल्पना करके, कि शायद मीशा घर आ गया हो, उसने चौकीदार को उसे बुलाने के लिए भेजा. नौजवान फ़ौरन आया और दरवाज़े के पास रुक गया, पट्टी बंधे सिर को ख़ास तौर से स्थिर, लकड़ी के समान रखा था. उसकी आँख की अविचल, सीधी नज़र आज ख़ास तौर से बुरी लग रही थी.

“आइए. बैठिए,” सम्गीन ने कोई ख़ास प्यार से नहीं कहा. “तो-ओ, मेरे पास समैलव आया था और उसने मुझे आपके एडवन्चर्स के बारे में...आपके कारनामों के बारे में बताया... मगर मुझे विस्तार से जानना है, कि इस ग्रुप में क्या-क्या होता था. ये लड़के कौन हैं?”

मीशा सावधानी से खाँसा, उसने त्यौरियाँ चढ़ाईं और बिना किसी उत्तेजना के कहने लगा, जैसे कोई डॉक्युमेन्ट पढ़ रहा हो:

“वे लोग जौहरी मार्कोविच के घर में इकट्ठे होते थे, उसके बेटे, ल्येव के पास, - ख़ुद मार्कोविच विदेश में है. बत्ती बुझा देते और अँधेरे में पढ़ते...बेशर्म किस्म की कविताएँ, रोशनी में उन्हें पढ़ा ही नहीं जा सकता था. चौड़े दीवान पर और सोफ़े पर जोड़े बनाकर बैठ जाते, एक दूसरे को चूमते. फिर, जब लैम्प जलता, - तो पता चलता, कि कई सारी लड़कियों के बदन पर कपड़े हैं ही नहीं. सब तो  - बच्चे नहीं हैं, मार्कोविच – करीब बीस साल का, पेर्मिकोव भी – करीब उतनी ही...”

“पेर्मिकोव – सुपर-मार्केट के मालिक का बेटा?” सम्गीन ने पूछा.

“हाँ,” मीशा ने कहा, वह कुलनाम गिनाता रहा.

ये जानकर बहुत बुरा लगा कि इस लफ़ड़े में उसके क्लाएण्ट का बेटा भी लिप्त है.

सम्गीन ने घबराहट से सिगरेट जलाई और सोचने लगा:

अगर इस नौजवान को कभी गिरफ़्तार किया गया, तो वह भी पुलिस वाले को उतनी ही सटीकता से जवाब देगा’.

“आप वहाँ कितनी बार गए थे?”

“तीन.”

“आप इन मनोरंजनों की ओर आकर्षित नहीं हुए?”

 “नहीं.”

“करीब-करीब?”

“नहीं. मैं सच बोल रहा हूँ.”

सम्गीन, दिल में बहुत बुरा महसूस करते हुए, सहमत हो गया: हाँ, झूठ नहीं बोल रहा है’. और उसने पूछा:

“मगर ये – ग्रुप तो गुप्त है ना? तो फिर आपका एकदम सभी से, नामों सहित, परिचय करवा दिया गया?”

“पेर्मिकोव और मार्कोविच  को मैं दुकानों के कारण जानता था, तभी से, जब मरीना पेत्रोव्ना के पास काम करता था; स्कूली लड़कियाँ किताएवा और वरोनवा मुझे पढ़ाती थीं, एक – बीजगणित, दूसरी – इतिहास: वे मेरे ही साथ ग्रुप में शामिल हुईं, उन्हींने मुझे बुलाया था, क्योंकि, डरती थीं. वे वहाँ दो बार गई थीं और उन्होंने कपड़े नहीं उतारे थे, किताएवा ने तो मार्कोविच के मुँह पे थप्पड़ मारा था और सीने पर लात मारी थी, जब वह उसके सामने घुटनों पर खड़ा था.”

नपी-तुली आवाज़, दृढ़तापूर्ण अंदाज़ और ये अविचल सीधी नज़र सम्गीन के भीतर चिड़चिड़ाहट पैदा कर रही थी, - उससे और बर्दाश्त नहीं हुआ, और उसने कहा;

“आप मुझे इस तरह जवाब दे रहे हैं, जैसे...जाँच मेजिस्ट्रेट को. सीधे-सीधे जवाब दो!”

“मैं हमेशा इसी तरह बात करता हूँ,” मीशा ने अचरज से जवाब दिया.                  

वो - सही है’, सम्गीन सहमत हो गया, मगर चिड़चिड़ाहट बढ़ती गई, दाँत भी दर्द करने लगे.

इस लड़के के साथ बात करना बहुत असहज लग रहा था. उससे कुछ पूछने का भी मन नहीं हो रहा था. मगर फिर भी सम्गीन ने पूछा:

“आपको किसने मारा था?”

पेर्मिकोव और दो दूसरे बड़े लड़कों ने, उन्हें मैं नहीं जानता,वो ग्रुप में नहीं हैं. पेर्मिकोव सबसे ज़्यादा बदतमीज़ और ...घिनौना है. उसने उनसे कहा: मारो, मार डालो, साले को!’ “

“ख़ैर, मेरा ख़याल है, कि आप बढ़ाचढ़ाकर कह रहे हैं,” सम्गीन ने सिगरेट जलाते हुए कहा. मीशा ने दृढ़ता से जवाब दिया:

“नहीं, किताएवा ने भी सुना, - ये उस घर के गेट पर ही हुआ था, जहाँ वह रहती है, वह गेट के पीछे खड़ी थी. बहुत डर गई थी...”

“आपने ये सब अपने टीचर को क्यों नहीं बताया?” सम्गीन को याद आया.

“नहीं बता पाया.”

मीशा ने फ़ौरन जवाब नहीं दिया, और उसका गाल थोड़ा लाल हो गया, - सम्गीन ने सोचा:

लगता है – झूठ बोल रहा है.

मगर मीशा ने फ़ौरन आगे कहा:

“वसीली निकोलाएविच हर बात बहुत...कड़ाई से समझते हैं...”

ऐसी बात है?’ सम्गीन ने सोचा, उसे नौजवान के शब्दों में कुछ नई बात महसूस हुई. “आप क्या – पेर्मिकोव को अदालत में घसीटना चाहते हैं, हाँ?”

“नहीं!” फ़ौरन और उत्तेजित होकर मीशा चिल्लाया,. “मैं आपसे सिर्फ़ इतना कहना चा रहा था, कि आप कुछ और न समझ बैठें... कोई और ही बात. मैं आपसे विनती करता हूँ< कि कृपया इस बारे में किसी को न बताएँ! पेर्मिकोव से मैं ख़ुद ही...” उसकी आँख़ लाल हो गई और अजीब तरह से गोल हो गई, बाहर निकलने को हो गई, - शीघ्रता से और आक्रामक तरीके से वह कहता रहा: “अगर ये बात फ़ैल गई – तो किताएवा और वरोनोवा को स्कूल से निकाल देंगे, और वो दोनों – बेहद ग़रीब हैं, वरोनोवा – पम्पिंग स्टेशन के मेकैनिक की बेटी है, और कताएवा – दर्जिन की, बहुत अच्छी औरत की! दोनों – सातवीं क्लास में हैं. और वहाँ एक वास्तववादी (रिअलिस्ट) भी है, यहूदी, वो भी संयोगवश वहाँ आ गया था. क्लीम इवानोविच, - मैं आपसे बहुत-बहुत विनती करता हूँ...”

“समझ रहा हूँ,” सम्गीन ने राहत से साँस लेते हुए कहा. “आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं, और...इससे आपका सम्मान बढ़ता है, हाँ! लड़कियों को शर्मिंदा नहीं करना चाहिए, उनका करियर नहीं बिगाड़ना चाहिए. आपने तकलीफ़ उटःआई, मगर...”

ये समझ न पाते हुए कि वाक्य को कैसे समाप्त करे, सम्गीन ने कंधे उचका दिए, मुस्कुराया और उठ गया:

“ठीक है, जाइए, आराम कीजिए, ठीक हो जाइए. आपको, शायद, पैसों की ज़रूरत होगी? एक-दो महीने की तनख़्वाह एडवान्स में दे सकता हूँ.”

“धन्यवाद,- एक महीने की काफ़ी है,” मीशा ने सतर्कता से सिर झुकाते हुए कहा.

सम्गीन ने पहली बार उससे हाथ मिलाया, - हाथ गरम और कड़ा था.

उसे बिदा करके, सम्गीन हॉल के दरवाज़े के पास कुछ देर खड़ा रहा, इस अनुभव को समझने की कोशिश करते हुए. वह इस बात से बेहद ख़ुश था कि ये कमीना किस्सा इतनी आसानी से सुलझ गया.

नौजवान...बेवकूफ़ नहीं निकला! सतर्क है. प्यारी भूल. उसकी मदद करनी चाहिए, उसे पढ़ने देना चाहिए. नम्र, कार्यकारी अधिकारी, या टीचर या इसी तरह का कुछ और बनेगा. तीस-पैंतीस की उम्र में शादी करेगा, सोच-समझ कर बच्चे पैदा करेगा, त्रोयका से बड़ी गाड़ी नहीं होगी. और अंतिम साँस तक आज्ञाकारिता से नौकरी करता रहेगा, अन्फ़ीमेव्ना की तरह...

सीटी पर लक्मेकी एक धुन बजाते हुए, वह मेज़ के पास बैठा, ‘उगाही के केसकी फ़ाइल खोली, मगर, आँखें बंद करके, अपने रंगबिरंगे विगत की यादों में खो गया.

यादों का दायरा फ़ैलता गया, जैसे इन शब्दों से प्रवाहित हो रहा हो, 'अपने आप के प्रति मैंने कौन सा गुनाह किया है, किसलिए अपने आप को सज़ा दे रहा हूँ.

थोड़ा सा अफ़सोस हो रहा था, और फिर से अपने प्रति उस स्नेहपूर्ण व्यवहार का अनुभव हुआ, जो उसने मरीना के साथ बिज़बेदोव के बारे में बातचीत करने के बाद महसूस किया था.

एक दिन बाद, मरीना के यहाँ बैठे हुए उसने उसे मीशा के बारे में बताया. वह किसी बात से चिंतित नज़र आ रही थी, मगर जब उसने बताया कि नौजवान मैट्रिक के इम्तिहान की तैयारी कर रहा है, तो वह अचरज से और देर तक चीखती रही:

“आह, छुपा रुस्तम! चालाक शैतान! और मुझे उसके बारे में किसी और ही बात का शक हो रहा था. समैलव पढ़ाता है? वसिली निकोलाएविच – ग़ज़ब का इन्सान है!” उसने गर्मजोशी से कहा. “ सारी ज़िंदगी – जेलों में, निर्वासन कैम्पों में, पुलिस के निरीक्षण में, वैसे – फ़कीर है. मेरा शौहर उसकी बहुत इज़्ज़त करता था और मज़ाक में उसे क्रांतिकारियों का निर्माता कहता था. मुझे वह पसंद नहीं करता था और शौहर की मौत के बाद उसने मुझसे मिलना बंद कर दिया. चीफ़-प्रीस्ट का बेटा, उसका चाचा – उपधर्माध्यक्ष...”

क्रांतिकारियों के निर्माता से इसे इतनी सहानुभूति क्यों है?’ सम्गीन ने अपने आप से पूछा, मगर प्रकट में मुस्कुराते हुए बोला:

“वस्तुनिष्ठ होना तुम ख़ूब जानती हो.”

मरीना ख़ामोश हो गई, वह छोटी सी नोटबुक में पेन्सिल से कुछ लिख रही थी. पेर्मिकोव के ग्रुप के बारे में सम्गीन की कहानी में उसने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, - सुनकर, उसने उदासीनता से कहा:

“इसी तरह का कुछ पीटरबुर्ग में भी था, सन् ’93 में, शायद. हाँ, और इस, यहाँ वाले ग्रुप के बारे में भी मैंने लीदिया से कुछ सुना था.”

और हल्के से मुस्कुराकर बोली:

“उसे ऐसे मनोरंजनों से निपटना चाहिए, वर्ना तो बेकार ही में शहर के खोजियों से जूझती है: वे सब गुण्डे और कमीने हैं. एक सिस्टर तो वेश्याघर की हाउसकीपर थी और वह मीटिंग में इसलिए आई थी, कि लड़कियों से पहचान कर सके. तो, फिर मिलेंग़े, अब मैं दुकान बंद कर रही हूँ!”

पेर्मिकोव के ग्रुप के बारे में उसकी उदासीनता से प्रसन्न, सम्गीन वहाँ से चला गया. इन छोटी-मोटी समस्याओं ने उसे ज़्यादा देर तक और ज़्यादा गहराई से परेशान नहीं किया; वो धारा, जिसमें वह तैर रहा था, निरंतर संकरी, मगर – शांत होती जा रही थी, घटनाएँ अधिकाधिक नीरस होती जा रही थीं, वास्तविकता आश्चर्यों से चौंकाते-चौंकाते थक गई थी, कम दुखद होती जा रही थी, ज़िंदगी इतनी शांति से गुज़र रही थी, जैसे उसे कभी भी, किसी भी बात ने परेशान न किया हो.

बसंत में लिओनेल क्रेटन फिर से प्रकट हो गया; पता चला कि वह साइबेरिया में नहीं, बल्कि ट्रान्सकाकेशिया में था.

“बहुत समृद्ध प्रदेश है, मगर – उसका कोई मालिक नहीं है,” बड़े आत्म विश्वास से उसने क्लीम के इस सवाल का जवाब दिया, कि क्या उसे ट्रान्सकाकेशिया पसंद आया? और पूछा: आप – गए थे वहाँ?”

“नहीं,” सम्गीन ने कहा.

“मेरा ख़याल है, ये – बेहद रूसी है,” क्रेटन दाँत दिखाते हुए हँसा. “हम, ब्रिटिश, अच्छी तरह जानते हैं कि कहाँ रहते हैं और क्या चाहते हैं. ये हमें सभी यूरोपियन्स से अलग करता है. इसीलिए हमारे यहाँ क्रॉमवेल तो संभव है, मगर नेपोलियन, आपका त्सार पीटर और आम तौर से ऐसे लोग, जो देश को गर्दन से पकड़ते हैं और उसे चिल्लाचोट भरी बेवकूफ़ियाँ करने पर मजबूर करते हैं -  हमारे यहाँ कभी नहीं हुए और न ही होंगे.

मरीना ने कैंची से मोट पैकेट खोलते हुए पूछा:

बेवकूफ़ियाँ – इंडिया पर हमला?”

“और – ये,” क्रेटन सहमत हो गया. “मगर – सिर्फ यही नहीं.”

सम्गीन ने ग़ौर किया, कि अंग्रेज़ ज़्यादा बेतकल्लुफ़ हो गया है, बोलता है – ज़्यादा आराम से, मगर – लापरवाही से भी, बिना किसी हिचक के शब्दों का खून भी करता है. जब वह चला गया, तो सम्गीन ने अपने अनुभव के बारे में मरीना से कहा.

“हाँ, जैसे ज़्यादा बदमाश हो गया है,” पैकेट से निकाले हुए डॉक्यूमेन्ट्स को मेज़ पर सीधा करते हुए उसने सहमति दर्शाई. कुछ देर ख़ामोश रहने के बाद उसने कहा: “शिकायत कर रहा था, कि हमारे यहाँ कोई भी कुछ नहीं जानता, और अच्छे टूरिस्ट-गाइड्सहैं ही नहीं. बात ये है, क्लीम इवानोविच, कि वह हर हाल में यूराल जा रहा है, और उसे रूसी साथी की ज़रूरत है, - मैंने,बेशक, तुम्हारा नाम सुझाया. क्यों – तुम पूछोगे. मगर – मुझे ये जानने की बहुत उत्सुकता है, कि वह वहाँ क्या करेगा. कहता है, कि ये सफ़र तीन हफ़्तों का होगा, किराया, रहने-खाने का खर्चा और – हर सप्ताह सौ रूबल्स देगा. तुम क्या कहते हो?”

“बोरियत होती है उसके साथ,” सम्गीन ने कहा.

“ये – इनकार है?”

“नहीं, सोचना पड़ेगा.”

“तुम – सोचो मत, बल्कि बोरहोने का फ़ैसला कर लो.”

उसे ख़ुशी देने के ख़िलाफ़ सम्गीन था ही नहीं, बल्कि इसे अपना कर्तव्य समझता था.

और दो दिन बाद वह फ़र्स्ट क्लास के कुपे में क्रेटन के सामने बैठा उसकी धीमी गति वाली बातें सुन रहा था.

“अगर दोस्तों के नज़दीक रहते हैं, तो उनसे भी – झगड़ा करते हैं. जर्मनी – आपका दोस्त नहीं है, बल्कि बेहद ईर्ष्यालु पड़ोसी है, और आप उससे लड़ाई करते रहेंगे. हम, अंग्रेज़ों के प्रति आपका रवैया सही नहीं है. पर्शिया में, तुर्की में आप हमारे साथ अच्छी तरह रह सकते थे.”

सम्गीन उसकी रूखी भारी आवाज़ सुन रहा था और उसे अफ़सोस हो रहा था, कि अंग्रेज़ को प्राकृतिक दृश्यों में कोई दिलचस्पी नहीं है. मगर,वैसे प्राकृतिक दृश्य भी उकताऊ ही थे – समान, बसंत की तरह कोमल हरी समारा की स्तेपी, जुती हुई ज़मीन के काले पट्टे, तैरती हुई ज़मीन पर छोटे-छोटे आदमी और घोड़े धीरे-धीरे गोल-गोल घूम रहे हैं, नई झोपड़ियों के पीले धब्बों वाले भूरे गाँव चल रहे हैं.

“अलेक्सांद्रेत्ता, भूमध्य सागर में जाने का रास्ता है,” ट्रेन की एक जैसी खड़खड़ाहट के बीच सम्गीन ने सुना. क्रेटन की लम्बी ऊँगली मेज़ पर विश्वास से सीधी और वक्र रेखाएँ बना रही थी, उसकी आवाज़ भी आत्मविश्वास से गूँज रही थी.

उसे पूरा यकीन है, कि मुझे उसके वाक्यों की प्रणाली को जानने की ज़रूरत है. इस तरह के तर्क शायद इसके जैसे लाखों लोग देते होंगे. इसने बढ़िया कपड़े पहने हैं, जूते बढ़िया हैं, उसकी सूटकेसेस ग़ज़ब की अच्छी हैं, और आम तौर से वह धरती पर अपने आपको पूरी तरह सहज महसूस करता है’, सम्गीन ने लापरवाही और निराशा की मिली जुली भावना से सोच रहा था.

“ आप काल्पनिक वस्तुओं को काफ़ी ज़्यादा ऊर्जा और समय देते हैं,” क्रेटन ने नाज़ुक ब्रश से अपने नाखून साफ़ करते हुए कहा. “ सब किछ, जो हम जानते हैं, उस बात पर आधारित है, जिसे हम कभी नहीं जान पाएँगे. किसी एक ही कल्पना पर ठहरना चाहिए. मान लो, कि ये – ख़ुदा है, और काली, जंगली जातियों को उसके कमोबेश मासूम विवरण पर अपनी कल्पना शक्ति बर्बाद करने दीजिए, कि उसका रूप कैसा है, उसमें कौन-कौनसे गुण हैं, उसके उद्देश्य क्या हैं. हमें इस विचार की आदत डालने का वकत आ गया है, कि हम – क्रिश्चन्स हैं, और हम वाकई में क्रिश्चन्स हैं, जब नास्तिक हों, तब भी.”

ये मरीना को पसंद नहीं आ सकता’, सम्गीन ने संतोषपूर्वक सोचा और पूछा: मरीना पेत्रोव्ना ने मुझे बताया था, कि आपके पिता – क्वाकेर हैं.

“हाँ,” क्रेटन ने सिर हिलाकर जवाब दिया. “वो – मर गए. मगर सबसे पहले – वो फ़ैक्ट्री वाले थे...ये: रस्सियों की, मोटी, पतली?” अब मेरा बड़ा भाई ये काम करता है.”

और अपने ख़ुशनुमा दाँत दिखाकर, क्रेटन ने मज़ाक से ये कहते हुए ऊँगलियों से हवा में एक गाँठ बनाई: “ ये – बहुत उपयोगी है, रस्सियाँ!”

आख़िरकार एक सुखी आदमी – सीमित ज़रूरतों वाला आदमी होता है’, सम्गीन ने उदारता से फ़ैसला कर लिया, और क्रेटन ने प्यार से उससे पूछा:

“ क्या मैं आपको थका रहा हूँ?”

“ओह, नहीं, ये आप क्या कह रहे हैं!” सम्गीन ने विरोध किया. “मैं कुप इसलिए हूँ< क्योंकि ध्यान से सुन रहा हूँ...”

“आप – कम रूसी हैं, आपके यहाँ लोग शौक से और खूब बोलते हैं.”

तुमसे ज़्यादा नहीं,’ सम्गीन ने सोचा. वह अंग्रेज़ से पहले लेट गया, जबकि सोना का मन नहीं था. पलकों के बीच से उसने देखा कि वह कैसे सलीके से कपड़े उतारता है, सूट टाँगता है, - अब उसने पतलून की जेब से रिवॉळ्वर निकाली, उसे ध्यान से देखा, तकिए के नीचे छुपा दिया.

सम्गीन ख़यालों में मुस्कुराया और उसने अपने आप को याद दिलाया, कि उसकी रिवॉळ्वर – ओवर कोट की जेब में है.                  

रात में उसकी नींद खुल गई, वह टॉयलेट की तरफ़ जाने लगा. मगर, जब कुपे से बाहर कॉरीडोर में निकला, तो किसीने उसे ज़ोर से धक्का दिया और हौले से कहा:

“वापस जा, बेवकूफ़!”

सम्गीन का कंधा दरवाज़े के किनारे से टकराया, वह चिल्लाया:

“क्या बात है?” जवाब में दुहराया गया:

“दूर हट, बेवकूफ़!”

कॉरीडोर की बिजली बुझा दी गई थी. अँधेरे में सम्गीन देख तो नहीं सका, मगर उसने रिवॉल्वर पकड़े एक हाथ को महसूस किया. इससे पहले कि वह कुछ करता, थोड़े खुले परदे में से, उसकी आँखों को चकाचौंध करते हुए रोशनी का पट्टा भीतर घुस आया, और एक अचरजभरी फुसफुसाहट सुनाई दी:

“ओह, शैतान, फिर से आप!”

“मैं आपको नहीं जानता,” सम्गीन ने जो दिमाग़ में आया, काफ़ी ज़ोर से कहा, हालाँकि वह समझ रहा था, कि इनोकोव से कह रहा है.

“दफ़ा हो जाइए” इनोकोव फ़ुसफ़ुसाया और, उसे कुपे में धकेल कर, दरवाज़ा बंद कर दिया.

सम्गीन ने ओवरकोट टटोला, जेब ढूँढ़ने लगा, रिवॉळ्वर बाहर निकाला, मगर तभी ट्रेन को ज़ोर से झटका लगा, ब्रेक्स कर्कश आवाज़ कर उठे, भाप तैश से फुसफुसाई,- सम्गीन लड़खड़ा गया और क्रेटन के पैरों पर बैठ गया, वो जाग गया और, पैरों को खींचते हुए, उन्हें पटकते हुए, अंग्रेज़ी में बड़बड़ाया,फिर तैश में चीख़ा:

 

“कौन है?”

“धीरे,” भारीपन से अपनी सीट पर लुढ़कते हुए सम्गीन ने कहा, “सुन रहे हैं?”

सामने, इंजिन के पास गोलियाँ चल रही थी, सम्गीन ने यंत्रवत् जानी-पहचानी क्लिक्स की आवाज़ें गिनीं: दो, एक, तीन, दो, एक, एक. पहली ही आवाज़ में क्रेटन ने दियासलाई जलाई, सम्गीन पर रोशनी डाली और, फ़ौरन आग बुझाकर, दबी आवाज़ में कहा:

“रिवॉल्वर की नली नीचे रखिए, आपके हाथ काँप रहे हैं.”

सम्गीन ने हाथ नीचे गिराया, उसे रिवॉल्वर समेत घुटनों के बीच दबा लिया.

“डाकू?” क्रेटन ने अनुमान लगाया और, बुदबुदाया:

ये है – अमेरिका!फिर कठोरता से कहा: “ जब दरवाज़ा खोलेंगे – तो एक साथ फ़ायर करेंगे, - ठीक है?”

“हाँ, हाँ,” सम्गीन ने कम्पार्टमेन्ट के कॉरीडोर में हो रहे शोर को और खिड़की से बाहर कमांड देती हुई आवाज़ को ध्यान से सुनते हुए कहा:

“कण्डक्टर, लैम्प बुझाओ! किससे कह रहा हूँ, बेवकूफ़? गोली चला दूँगा,‌ लैम्प मत हिलाओ.”

इनोकोव...ये – इनोकोव है. दूसरी बार!सम्गीन ने चौंककर सोचा.

“ऐ, बेवकूफ़!”

गोली चली, शीशा झनझनाया, मलबे पर कोई धातु की चीज़ गिरी, और भर्राई हुई चीख़ निकली:

“ऐ, तुम लोग! अपनी खोपड़ियाँ खिड़कियों से बाहर मत निकालो, कम्पार्टमेन्ट्स से बाहर मत निकलो!”

सुनने में बड़ा अजीब लग रहा था, कि आवाज़ जैसे गुस्से से नहीं, बल्कि नफ़रत से गूँज रही है. कम्पार्टमेन्ट में तालों की सिटकनियाँ खिट्-खिट् कर रही थीं, किसी ने कुपे का दरवाज़ा खटखटाया.

“खोलना नहीं!” क्रेटन ने सख़्ती से कहा.

“ट्रेन पर हमला कर दिया है!” कॉरीडोर में कोई उन्मादयुक्त आवाज़ चीख़ी. सम्गीन को लग रहा था, कि गोलियाँ अभी तक चल रही हैं. उसे यकीन नहीं था, मगर उसकी स्मरणशक्ति लगातार गोलियों की आवाज़ को पैदा कर रही थी, जो तालों की खिट्-खिट् के समान थीं.

समय असाधारण रूप से लम्बा खिंच रहा था, हाँलाकि कम्पार्टमेन्ट में हलचल ज़्यादा तेज़, ज़्यादा शोर गुल भरी हो गई थी. खिड़की के बाहर कोई भागा, रेत को करकराते हुए, ज़ोर से चिल्लाया:

“जल्दी!”

सम्गीन ने रिवॉल्वर को घुटनों के बीच इतना कसकर दबाया था, कि उसका हाथ दर्द करने लगा; उसने हथियार को अपनी जाँघ के घुसा दिया और बर्थ की लुगदी में कस के दबा दिया.

“अजीब बात है,” क्रेटन ने कहा. “इन्हें कोई जल्दी ही नहीं है, आपके इन डाकुओं को.”

कम्पार्टमेन्ट के नीचे भाप थरथराहट से साँस ले रही थी और फुसफुसा रही थी,- कुछ ख़ास तौर से लम्बे पल ऐसे भी थे, जब सम्गीन को इस फुसफुसाहट के अलावा कोई और आवाज़ नहीं सुनाई दी, मगर बाद में, कम्पार्टमेन्ट के पास, कुछ आवाज़ें सुनाई दीं, और उनमें से एक ने ख़ास तौर से ज़ोर से कहा:

“यहाँ, इस वाले में!”

“किसी को बाहर मत छोड़ना!”

कम्पार्टमेन्ट सावधानी से हिली, क्लचेज़ झनझनाए, क्रेटन ने खिड़की का परदा थोड़ा सा उठाया; खिड़की से बाहर पेड़ हिल रहे थे, जैसे शीशों से अँधेरे को पोंछ रहे हों, पेड़ों के बीच का रास्ता धुँधलेपन से तैर रहा था, जैसे रोशनी की तरफ़ ले जा रहा हो.

“क्या हुआ- क्या हमें बंदी बनाया गया है?” क्रेटन ने गुस्ताख़ी से पूछा. “हम – जा रहे हैं!”

हाँ, ट्रेन लगभग अपने हमेशा के वेग से चल रही थी, और कॉरीडोर में कई लोगों के पैरों की धम्-धम् हो रही थी. सम्गीन ने परदा उठाया, और क्रेटन ने रिवॉल्वर वाला हाथ पीठ के पीछे छुपाकर, ये पूछते हुए जल्दी से कुपे का दरवाज़ा खोल दिया:

“क्या हो रहा है?”

दरवाज़े के सामने हाथ में चर्बी की मोमबत्ती लिए कण्डक्टर, एक ऊँचा और मोटा, सफ़ेद मूँछों वाला आदमी खड़ा था, हाथों में संगीनें लिए दो सैनिक और कुछ और आदमी भी खड़े थे, जो अँधेरे में दिखाई नहीं दे रहे थे.

“ डाक वाले कम्पार्टमेन्ट को लूट लिया,” कण्डक्टर ने मोमबत्ती को अपने चेहरे तक लाकर मुस्कुराकर कहा. “ये यहाँ से ट्रेन के ब्रेक लगा दिए, ये देखिए – ब्रेक के पास सील टूटी हुई है...”

“कितने लोग थे?” मोटे आदमी ने भारी, मोटी आवाज़ में पूछा.

“कहते हैं – चार थे.”

“कौन कहता है?”

“कॉम्रेड.”

“कौन सा – कॉम्रेड, किसका?”

“हमारा, ब्रिगेड का कॉम्रेड.”

“हर जगह – कॉम्रेड्स!”

एक जनानी आवाज़ तनाव से चीख़ी:

“कितने हैं, कितने मारे गए हैं?”

उसे गुस्से से जवाब दिया गया:

कोई नहीं मरा!”

“आप छुपा रहे हैं! वे गोलियाँ चला रहे थे.”

“सुरक्षा-गार्ड को हाथ पे गोली मारी, बस इतना ही,” कण्डक्टर ने कहा. वह मुस्कुराए जा रहा था, उसका चिकना फ़ौजी चेहरा जैसे मोमबत्ती के प्रकाश में पिघला जा रहा था. “मैंने एक को देखा था, - ट्रेन रुकी थी, मैं पटरियों पर कूदा, और वह जा रहा था, हैट पहने. क्या हुआ? और वह चिल्ला रहा था: लैम्प बुझा, गोली मार दूँगा’, और – लैम्प पर ठाँय! तो, फिर मैं गिर गया...”

“चार?” क्रेटन सम्गीन के कान के ऊपर बुदबुदाया. “बहादुर बच्चे हैं.”

और सम्गीन सोच रहा था:

लोगों के लिए उनके दिल में कितनी नफ़रत होनी चाहिए, कि चारों ने मिलकर पूरी ट्रेन पर हमला बोल दिया’.

वो पूरे समय इनोकोव को याद करता रहा, उसके बारे में सोच नहीं रहा था, बल्कि सिर्फ उसे देखता रहा ल्युबाशा की बगल में, अपने साथ, खेत में, जब बैरेक्स नष्ट हो गई थीं, एलिज़ाबेत स्पिवाक की बगल में.

कविताएँ लिखता था’.

उसने सुना कि कोई फुसफुसा रहा है:

“ध्यान दीजिए: चष्मे वाले महाशय के पास – रिवॉल्वर है.”

सम्गीन ने अनचाही फुर्ती से, रिवॉल्वर को बर्थ पर फेंक दिया, और इस फुसफुसाहट को ज़ोरदार जवाब दिया गया:

“तो, बात क्या है? रिवॉल्वर तो मेरे पास भी है, हाँ, शायद काफ़ी लोगों के पास है. मगर, ये कि कोई मरा नहीं है, ये शक की बात है! ये, पता है...”

“हाँ, अजीब...”

“फ़ौजियों की उपस्थिति में...”

“फ़ौजी – उल्लू नहीं है, रात को वो भी सोता है. और उनके पास – बम होते हैं. हाथ ऊपर, और – कोई नहीं बचता है.” उनींदेपन से एक फ़ौजी ने कहा.

“फिर भी फ़ायरिंग़ तो करनी ही चाहिए थी!”

“हाथ ऊपर उठाकर? छोड़िए, महाशय. हम अपने अधिकारियों को जवाब देंगे, और आप हमारे लिए – अनजान व्यक्ति हैं.”                  

 “ये सही कह रहा है,” क्रेटन ने कहा.

अँधेरे में अदृश्य इन लोगों की आवाज़ें सम्गीन पर एक बुरे सपने की तरह असर कर रही थीं.

इनोकोव को, बेशक, गिरफ़्तार कर लेंगे...

वह अपने आप से अप्रसन्न था, उसे लगा कि उसने पर्याप्त बहादुरी का परिचय नहीं दिया और ये, कि क्रेटन ने इसे भाँप लिया है.

इनोकोव मुझे कोई नुक्सान नहीं पहुँचा सकता था’, उसने स्वयँ की भर्त्सना की. मगर तभी मन में सवाल उठा: मगर मैं कर भी क्या सकता था?’

और सम्गीन ये फ़ैसला करके कुपे में घुसा कि इस विषय पर नहीं सोचेगा, उसके कान कॉरीडोर में हो रही जोशपूर्ण बातचीत की तरफ़ लगे थे.

“दस मिनट में काम पूरा कर लिया!”

“सात में.”

“आपने गिना था?”

“फ़ौजी बदतमीज़ी से बोल रहा था, - फ़ौजी को ये शोभा नहीं देता. मैं ख़ुद भी – फ़ौज में रह चुका हूँ.”

“कण्डक्टर, - रोशनी क्यों नहीं है?”

“तार तोड़ दिए हैं, युअर हाइनेस.”

क्रेटन भीतर आया, बर्थ पर बैठा और सिर हिलाते हुए बोला:

“आपके देशवासी – दैववादी हैं.”

अपना बिस्तर ठीक करते हुए, सम्गीन ख़ामोश रहा, - कॉरीडोर में ऊँचे आदमी की गहरी आवाज़ शांति से बोली:

“ तो, महाशयों: ख़ुदा का शुक्रिया अदा करें कि ज़िंदा बच गए, तंदुरुस्त...”

“जल्दी ही ऊफ़ा आने वाला है.”

क्रेटन ने उबासी लेकर कहा;

“आप बेकार ही में रिवॉल्वर इस तरह फ़ेंक देते हैं. ऑटोमैटिक रिवॉल्वर्स के प्रति सावधान रहना चाहिए.”

“मैंने नरम सीट पर फेंका था,” सम्गीन ने चिढ़कर जवाब दिया, लेट गया और कुछ लोगों की, बाकी सभी के प्रति तिरस्कार की भावना के बारे में सोचने लगा. जैसे – इनोकोव. उसके लिए क्या महत्व है अधिकार का, नैतिकता का और हर उस चीज़ का, जो सरकार की तरफ़ से, संस्कृति की तरफ़ से इन्सान को दी जाती है? ‘वर्गीय-सरकार (यहाँ मज़दूर वर्ग की सरकार से तात्पर्य है – अनु.) सड़े हुए पेड़ से पुराने घर की मरम्मत करेगी’, उसे अचानक स्तेपान कुतूज़ोव के शब्द याद आए. इसे याद करना उसी तरह अप्रिय लगा, जैसे किसी सिविल-केस में विरोधी का सफ़ल वाक्य प्रतीत होता है. कॉरीडोर में लोग अभी तक बातें कर रहे थे, गहरी आवाज़ प्रभावशाली ढंग से सिद्ध कर रही थी:

“आप तो देख ही रहे हैं: ड्यूमा देश को शांत करने की स्थिति में नहीं है. हमें तानाशाही की ज़रूरत है, इस बात की ज़रूरत है, कि महान राजकुमारों में से कोई एक...”

“आप हमें छोटे ही लोग दीजिए, मगर हों वे बुद्धिमान!”

“महाशयों! सब लोग इतने उत्तेजित हो गए, मगर हम लोगों की नींद में बाधा डाल रहे हैं.”

“बहुत बढ़िया बात कही है,” क्रेटन बुदबुदाया और उसने कुपे का दरवाज़ा बंद कर दिया.

सम्गीन की आँख़ लगी ही थी, कि उसे क्रेटन की वहशी चीख़ों ने जगा दिया:

“आपको मुझे इस तरह रोक कर रखने का कोई अधिकार नहीं है,” वह चीख़ रहा था, न केवल भाषा के सही इस्तेमाल को अनदेखा कर रहा था, बल्कि जैसे जानबूझ कर शब्दों को बिगाड़ रहा था; कुपे के दरवाज़े में नौजवान सिपाही बुत की तरह खड़ा था और कह रहा था:

“इजाज़त नहीं है.”

“मगर मुझे कुछ टेलिग्राम्स भेजने होंगे – समझ रहे हैं?”

“किसी को भी बाहर छोड़ने की इजाज़त नहीं है,” और वह सम्गीन से मुख़ातिब हुआ: “इन्हें समझाइए: ट्रेन को  सिग्नल से पहले रोक दिया गया है, स्टेशन – दूर है.”

“आप सुन रहे हैं? टेलिग्राम्स भेजने की इजाज़त नहीं है! मैं – भागा, उछला, हो सकता है, अपना पैर भी तोड़ बैठा, उन्होंने मुझे पकड़ लिया, खींचते हुए यहाँ तक लाए – दरवाज़ा इससे बंद किया!”

“हैट हिलाते हुए, उसने हैट से पुलिस वाले की तरफ़ इशारा किया; उसका चेहरा भूरा हो गया था, कनपटियों पर पसीना छलक रहा था, जबड़ा थरथरा रहा था और आँखों में खून उतर आया था, वे गुस्से से चमक रही थीं. वह अटपटी अवस्था में बिस्तर पे बैठा था, एक पैर बाहर ताने, दूसरे को फ़र्श पर टिकाए, और दहाड़ रहा था;

“जब आप किसीको गिरफ़्टार करते हैं, तो आपको पता होना चाहिए! ये – जंगलीपन है! मैं – कम्प्लेन्ट करूँगा! मैं पीटरबुर्ग में अपने राजदूत से विरोध प्रकट करूँगा!”

“शांत हो जाइए!” सम्गीन ने सलाह दी. “अभी पता कर लेते हैं – कि बात क्या है?”

पैर सहलाते हुए, क्रेटन ख़ामोश हो गया, और तब कम्पार्टमेन्ट में संदेहास्पद ख़ामोशी छा गई. सम्गीन ने सिपाही के हाथ के नीचे से कॉरीडोर में नज़र डाली: सभी कुपे के दरवाज़े बंद थे, सिर्फ एक कुपे से एक उद्दाम, खड़े बालों, सफ़ेद मूँछों वाला सिर बाहर झाँका; सम्गीन की ओर शत्रुतापूर्ण ढंग से देखकर, सिर ग़ायब हो गया.

क्या शैतानियत है...सम्गीन ने सोचा और सिपाही से पूछा: क्या बात है.

“कागज़ात की जाँच,” आदर से और हौले से सिपाही ने जवाब दिया. “ट्रेन को इस कम्पार्टमेन्ट से ऑटोमेटिक ब्रेक द्वारा रोका गया था. आपके पड़ोसी ने समझा कि स्टेशन आ गया है, और कूद पड़े, पैर में चोट आ गई और – गुस्सा कर रहे हैं.”

“मेरा पैर टूटा है!” क्रेटन फिर से चिल्लाया. “इस बात का भी मैं विरोध करूँगा. साल भर पहले उसमें थोड़ी सी चोट आई थी, मगर – वो कुछ ख़ास नहीं था!”

सिपाही एक ओर को हट गया, उसकी जगह काली दाढ़ी वाले अफ़सर और तोते जैसी नाक पर नाक पकड़ चष्मा पहने, हडीले, व्यंग्यात्मक चेहरे वाले एक मेजिस्ट्रेट ने ले ली. अफ़सर ने डॉक्यूमेन्ट्स माँगे. क्रेटन ने जैकेट की बगल वाली जेब से एक वैलेट निकाला, घुरघुराया, दाँत किटकिटाए और डॉक्यूमेन्ट को सम्गीन के घुटनों पे फेंक दिया. सम्गीन ने अपने कागज़ात के साथ उसे अफ़सर को थमा दिया और उसने पढ़कर कंधे के पीछे से मेजिस्ट्रेट को दे दिया. ये सब चुपचाप हो रहा था, सिर्फ क्रेटन, रूमाल से चेहरे का पसीना पोंछते हुए, मुँह ही मुँह में गरम-गरम फुफ़कार जैसे अंग्रेज़ी शब्द बुदबुदा रहा था. सम्गीन को एहसास हो गया, कि इस ख़ामोशी में उसके लिए कई गंभीर अप्रियताएँ सुलग रही हैं, उसने गहरी साँस ली और सिगरेट जला ली. मेजिस्ट्रेट ने डॉक्यूमेन्ट्स को पढ़कर, भौंहे चढ़ा लीं, अफ़सर के कान में कुछ फ़ुसफुसाकर कहा और फिर कहा:

“आपको जो परेशानी हुई, महाशयों, उसके लिए हम तहे दिल से माफ़ी माँगते हैं...”

क्रेटन ने उसकी ओर हैट हिलाई और दाँत भींचकर गरजा:

ओह, नहीं! मुझे इससे...तसल्ली नहीं होगी. मेरा - पैर टूटा है. ये मेरी भौत्क हानि हुई है, हाँ! मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा. मैं डॉक्टर की माँग करता हूँ...” अफ़सर उसके पास सरका और उसे दिलासा देने लगा, और मेजिस्ट्रेट ने सम्गीन से पूछा, कि कहीं उसने कम्पार्टमेन्ट में किसी ऐसे आदमी को तो नहीं देखा, जो पहले दर्जे के मुसाफ़िर से अलग लग रहा था?

“नहीं,” सम्गीन ने कहा.

“और रात को, जब ट्रेन स्टेशन्स के बीच में रुकी थी, क्या आपने अपने दरवाज़े के पास कोई शोर सुना था?”

“मैं – उठा, जब ट्रेन खड़ी हो चुकी थी,” सम्गीन ने जवाब दिया, और क्रेटन चीख़ा:

मैं भी सो रहा था, हाँ! मैं तंदुरुस्त आदमी था और गहरी नींद में था. अब आपने ऐसा कर दिया है, कि मुझे अच्छी नींद आएगी ही नहीं. मैं डॉक्टर की माँग करता हूँ.”  

अफ़सर ने बड़े प्यार से उससे कहा, कि अभी ट्रेन स्टेशन तक पहुँचेगी.

“और रेल्वे–डॉक्टर आपकी ख़िदमत में हाज़िर हो जाएगा.”

“ओह, थन्क्यू! मगर मैं चाहूँगा कि उसकी सेवाओं की ज़रूरत आपको पड़े, यहाँ हमारा कौंसुल है? आपको नहीं पता? मगर आप, उम्मीद है, ये तो जानते होंगे, कि अंग्रेज़ हर जगह हैं. मैं चाहता हूँ, कि अंग्रेज़ को बुलाया जाए. मैं वहाँ नहीं जाऊँगा.”

मेजिस्ट्रेट सम्गीन से कुछ निरर्थक सवाल पूछ रहा था, फिर उसने हल्के से उससे कहा:

“आप अपने पड़ोसी को शांत कीजिए, वर्ना अपनी चिल्ला चोट से जनता का ध्यान आकर्षित करेगा, जो उसके लिए और आपके भी लिए ठीक नहीं होगा.”

सम्गीन कहना चाहता था, कि उसकी फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है, मगर – उसने ख़ामोशी से सिर हिला दिया.

मेजिस्ट्रेट और अफ़सर दूसरे कुपे में चले गए, और इससे क्रेटन ज़रा भी शांत नहीं हुआ, उसने लम्बी तान दी, आँख़ें बंद कर लीं और, शायद, कस कर दाँत भींच लिए, - गालों की नसें फूल गईं, जिससे उसका चेहरा बुरा दिखने लगा.

कुछ मिनट बाद ट्रेन स्टेशन पहुँची, एक बूढ़ा डॉक्टर आया, उसने क्रेटन का जूता काटा, पता चला कि हड्डी में कॉम्प्लेक्स फ्रैक्चर हो गया है और ये कहते हुए उसे ढाढ़स बंधाया, कि वह शहर में दो अंग्रेज़ों को जानता है: एक इंजिनियर है और एक ऊन खरीदने वाला. क्रेटन ने अपनी नोटबुक निकाली, दो नोट्स लिखे और विनती की, कि उसके देशवासियों को फ़ौरन पहुँचा दिए जाएँ. अस्पताल के कर्मचारी आए, उसे रेल्वे के वेटिंग हॉल में लाए, और वहाँ वो, नफ़रत से चारों ओर देखते हुए, हिकारत से अजीब सी गर्माहट भरी, घनी हवा को सूँघते हुए सम्गीन से बोला:

“हमारी प्यारी यात्रा बीच में ही ख़तम हो गई, मुझे इसके बारे में बहुत अफ़सोस हो रहा है. आप घर चले जाइए, हाँ? आप ये सब मरीना पेत्रोव्ना से कहिए, उसे भी हँस लेने दो. ये सब माज़ाहिया ही है!”

और गहरी साँस लेकर दार्शनिक अंदाज़ में अपनी बात ख़त्म की:

ज़िंदगी में इस तरह से काफ़ी कुछ ख़तम हो जाता है. लिवरपूल में एक आदमी ने अपनी मंगेतर का आलिंगन किया और पिन से अपनी आँख़ बाहर निकाल दी, - इससे वो बहुत दुखी नहीं हुआ. एक आँख मुझे अच्छी तरह खिलाती है’, उसने कहा, क्योंकि वह घड़ीसाज़ था. मगर मंगेतर ने देखा, कि एक आँख से वो सिर्फ उसके आधे जिस्म की ही तारीफ़ कर सकता है, और उसने शादी करने से इनकार कर दिया.” उसने एक और आह भरी और ज़ुबान चटकाई: “रूसी में ये – ठीक है, मगर, शायद, दिलचस्प नहीं है...”

सम्गीन ने डॉक्टर के आने तक इंतज़ार किया, फ़लालैन का सूट पहने एक छोटा सा, दुबला-पतला, चंचल आँखों वाला आदमी आया, और क्रेटन से बात करने लगा, वे इस तरह मुस्कुरा रहे थे, जैसे पुराने परिचित हों. बिदा लेकर सम्गीन बुफ़े में गया, ख़ुशी से नाश्ता किया, कॉफ़ी पी और ये सोचते हुए घूमने के लिए निकल पड़ा, कि पिछले कुछ दिनों से उसकी ज़िंदगी में हो रही घटनाएँ बड़ी जल्दी और आसानी से सुलझ रही हैं.

मन में एक निडर ख़याल भी आया: इनोकोव से और एक बार मिलना दिलचस्प रहेगा, मगर, बेशक, तभी जब व्यायसायिक रूप से उसे कुछ फ़ुर्सत होगी.

मैंने दो बार उसे फाँसी से बचाया, - इस बारे में वह क्या सोचता है?...और क्रेटन – बेहद टिपिकल है. कुलीन जाति का आदमी है. सभी लोगों से श्रेष्ठ होने का विश्वास उसमें कूट-कूट कर भरा है’.

शहर कुछ नीचा-नीचा सा था, ज़मीन पर, जैसे वह खड़ा नहीं था, बल्कि बैठा था. स्तेपी से चौड़ी-चौड़ी लहरों की तरह हवा के थपेड़े हमला कर रहे थे, और रास्तों पर काली, गरम धूल के पारदर्शक बादल उड़ा रहे थे. चर्च के गुम्बदों के बीच उसे दो मीनारें दिखाई दीं, और सिर्फ इसके बाद ही उसे रास्तों पर मंगोलों जैसे चेहरों वाले लोग दिखाई देने लगे. बेलाया नदी गंदली पीली थी, और ऊफ़ा नदी – ज़्यादा नीली सी और ज़्यादा पारदर्शक. गंदे किनारों पर काफ़ी सारी बजरे पड़े थे, सूरज से काले पड़ चुके, चीथड़ों में करीब-करीब उतने ही बश्किर भी लेटे थे. मतलब, एक निश्चलता, निरंतर उकताऊपन था, और ये ख़याल आया, कि ये सारे इनोकोव, कुतूज़ोव और इसी किस्म के अन्य लोग भी अपनी आज़ादी और ज़िंदगी को दाँव पर लगाते हैं – ये बेकार है, इस गर्म, धूल भरी उकताहट को वो नहीं जीत सकते, नहीं नष्ट कर सकते. अवसाद उसे इतना परेशान नहीं कर रहा था, जितना सुकून दे रहा था. शैली की कविता ओज़िमेनडिअसयाद आ गई:

मृत है रेगिस्तान और ऊपर आसमान.

दो दिन बाद, शाम को, मरीना उसके यहाँ बैठी थी, चाँदी के हल्के रंग की पोषाक पहने. क्रेटन ने सही सोचा था: ट्रेन पर हुए हमले की, अंग्रेज़ की दुर्गति की, उसके तैश में आने की कहानी सुनते हुए वह हँस रही थी.

नहीं, तुम जो चाहो कहो. मगर – फिर भी – शाबाश! ये – ग़ज़ब की फ़ुर्ती थी!”

क्या इसे इनोकोव के बारे में बताऊँ?’ सम्गीन ने अपने आप से पूछा.

“आह, लिओनेल, पागल!” हँसते-हँसते उसकी आँख़ों में आँसू आ गए और उसने अचानक गंभीरता से, अपनी ख़ुशी को छुपाए बिना कहा: “उसके साथ ऐसा ही होना चाहिए! कर ले पता कि रूसी ज़िंदगी कैसी होती है. पता है, वो यहाँ ये सूँघने आया है, कि कहाँ क्या बेचा जाता है. वो ख़ुद, बेशक, इस बारे में कुछ नहीं कहता. मगर मैं तो महसूस कर रही हूँ!”

और कुछ देर चुप रहकर, होठों पर जीभ फेरकर, एक भौंह ऊपर उठाकर, वो हँसते हुए कहती रही:

“फ़िलहाल – सौदागर का राज है, मगर माल – उसके पास ज़्यादा नहीं है, इसलिए वो विदेशियों को बुलाएगा: रूस को खरीद लो!’”

“मज़ाक करती हो तुम, बस, मज़ाक,” कुछ कहने की ख़ातिर सम्गीन ने कह दिया; उसने जवाब दिया:

“देख रही हूँ, कि तुम बोरहो रहे हो, इसीलिए मज़ाक कर रही हूँ. हाँ, और – मुझे क्या करना है? मैंने अच्छा खाया-पिया है, तंदुरुस्त...”

उसने मेज़ से एक किताब उठाई, लापरवाही से उसके पन्ने पलटते हुए और त्यौरियाँ चढ़ाए, वह ख़ामोश हो गई, जैसे कोई निर्णय ले रही हो. सम्गीन ने उसकी बात का इंतज़ार किया और इनोकोव के बारे में बताने लगा, उससे हुई दो पिछली मुलाकातों के बारे में बताया और सोचने लगा: क्या प्रतिक्रिया होगी इसकी? किताब को घुटने पर रख कर, सम्गीन के कंधे के पार, खिड़की से बाहर देखते हुए, वह चुपचाप सुनती रही, और जब उसने बात ख़त्म की तो दबी आवाज़ में कहा:

“दिलचस्प इन्सान है! बेशक, फाँसी ही चढ़ेगा. बरबाद हो जाएगा...तुम्हें, शायद, ये सुनना भयानक लगेगा, मगर मुझे – ऐसे लोगों के प्रति सहानुभूति है.”

“तुम्हें मालूम है, कि मैं तुम्हारे भीतर की बहुत सारी बातें समझ नहीं पाता,” सम्गीन ने कहा.

“जानती हूँ,” उसने स्वीकार किया; उसका ये शब्द इतनी सादगी से गूँजा.

“मगर, मैं जानना चाहूँगा,” सम्गीन ने आगे जोड़ा. “तुम्हारे बारे में मेरी ऐसी राय बन गई है, जो...स्पष्टता की माँग करती है...”

उसने मुस्कुराते हुए पूछा:

“ कहीं मुझे लुभाना तो नहीं चाहते?”

मगर फिर फ़ौरन बोली:

“ये भी मैं मज़ाक में कह रही हूँ. समझती हूँ, कि मुझे लुभाने का तुम्हारा इरादा नहीं है. और अपने बारे में तुम्हें बताना – संभव नहीं है, बताया था, मगर, तुम - विश्वास नहीं करते.” वह उठी, मेज़ से उसकी ओर हाथ बढ़ाया और नीची आवाज़ में कहा:

“बात ये है, कि कुछ दिनों बाद मेरे जहाज़ पर आत्मा का आनंदोत्सवहोगा, - अगर चाहते हो, तो मैं ज़खारी से कह दूँगी, कि तुम्हें ये उत्सव दिखा दे? झिरी से,” उसने जोड़ा और हँस पड़ी.

उसके प्रस्ताव ने सम्गीन को न तो चकित किया, नहीं वो ख़ुश हुआ, मगर इस अप्रत्याशितता पर, जिसका अर्थ – समझ में नहीं आ रहा था, उसे अटपटापन ज़रूर महसूस हुआ. उसने देखा कि मरीना की आँखें असाधारण रूप से मुस्कुरा रही हैं, जैसे अपनी इच्छा के विरुद्ध उसने कोई बेसोची-समझी, ख़तरे वाली बात कह दी हो, और इससे वो अप्रसन्न है, चिड़चिडा रही है.

“मैं बेहद शुक्रगुज़ार रहूँग़ा,” उसने जल्दी से कहा, और मरीना ने दुहराया:

“झिरी से, दूर से. तो, - तंदुरुस्त रहो!”

उसे बिदा करने के बाद, सम्गीन फ़ौरन भागकर कमरे में आया, खिड़की के पास रुका और उसने देखा, कि कितनी आसानी और दृढ़ता से ये औरत अपने जिस्म को रास्ते के धूप वाले हिस्से से ले जा रही है; उसके सिर पे – बैंगनी रंग का छाता है, पोषाक किसी धातु की तरह चमक रही है और फूटपाथ के पत्थर ताँबे के रंग के जूतों को ख़ूबसूरती से छू रहे हैं.    

मूरत. सुनहरी आँखों वाली मूरत’, प्रशंसा के एहसास से उसने सोचा, मगर ये एहसास फ़ौरन ग़ायब हो गया, और सम्गीन को अफ़सोस हुआ – अपने लिए या उसके लिए? ये बात उसे समझ में नहीं आ रही थी. जैसे जैसे वह दूर होती जा रही थी, एक अस्पष्ट चिंता उस पर हावी होने लगी. वह कभी-कभार ही इस बात को याद करता था, कि मरीना - किसी सम्प्रदाय की सदस्य है. इस समय इस बात को याद करना, और उसके बारे में सोचना न जाने क्यों विशेष रूप से अप्रिय लग रहा था.

चलो, आख़िरकार, रहस्य के दरवाज़े खुलने जा रहे हैं’, उसने अपने आप से कहा और ऊँगलियों से घुटने पर ताल देते हुए, दाढ़ी को मरोड़ते हुए कुर्सी पर बैठ गया. मज़ाक वह कर नहीं पाया.

किसी तरह के नुक्सान का ख़तरा उत्पन्न हो रहा था. वह जल्दी-जल्दी मरीना से अपने रिश्ते की समीक्षा करने लगा. सब कुछ, जो वह उसके बारे में जानता था, वो किसी धार्मिक व्यक्ति की उसकी कल्पना से मेल नहीं खाता था, हालाँकि वह ये नहीं कह सकता था, कि ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में उसके मन में कोई ठोस कल्पना है; हर परिस्थिति में ये – व्यक्ति, जो रहस्य से, तत्वमीमाँसा में सीमित रहता है.

विश्वास करने के लिए, ये बहुत ज़्यादा बुद्धिमान है. मगर बिना ख़ुदा या शैतान में विश्वास के कोई सम्प्रदाय हो ही नहीं सकता!वह तर्क कर रहा था.

जो कुछ भी उसने तर्क बुद्धि के बारे में कहा था, वो निश्चित रूप से उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के ढर्रे के बिल्कुल विरुद्ध था. रूह के बारे में उसके विचार और आम तौर से मज़हब के बारे में, चर्च के बारे में जो कुछ भी उसने अलग-अलग समय पर कहा था – समझ में नहीं आया था, दिलचस्प नहीं था और उसकी याददाश्त में नहीं ठहर पाया था. उसे सिर्फ पादरियों के बारे में उसके क्रोध के विस्फ़ोट की याद रही, मगर इससे भी वह कुछ समझ नहीं पाया, उसने ये भी सोचा: यहाँ, या तो मैं किसी बात को अतिरंजित कर रहा हूँ, या कोई बात समझ नहीं पाया हूँ. इस विषय पर मैंने उससे कभी बहस नहीं की, बहस नहीं कर सकता, नहीं करना चाहता, मगर – मुझे उससे बहस करने में, डर-सा क्यों लगता है?’

चिंता की भावना बढ़ती जा रही थी. आख़िर में उसे पता चल ही गया, कि वह बहस से नहीं, बल्कि किसी बेवकूफ़ी और नीचता भरी बात से डर रहा है, जो इस औरत के साथ स्थापित हो रहे संबंध को ख़त्म कर सकती है. ये बड़ी दुखद बात होगी, और असल में ये ही उसकी चिंता का कारण है.

'ठीक है, असल में ये सवाल बड़ी आसानी से हल हो सकता है : नहीं जाऊँगा', उसने सोचा.

मगर ये फ़ैसला नहीं था. 'होली-ट्रिनिटी' ('पेंटेकोस्ट') उत्सव के दूसरे दिन – 'होली स्पिरिट्स डे' वाले दिन – सम्गीन उसी तरह खिड़की के पास, फूलों के पीछे से रास्ते की ओर देखते हुए बैठा था. खिड़की से बाहर धार्मिक जुलूस धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था: शहर के निवासी, सभी चर्चों के पादरियों के नेतृत्व में शहर से बाहर, खेत की ओर जा रहे थे - 'होली-मदर' के आइकन को दूर की मॉनेस्ट्री में बिदा करने, जहाँ उसका वास्तव्य रहता था, और जहाँ से उसे हर साल ईस्टर-शनिवार को बारी-बारी शहर के हर चर्च में अतिथी के रूप में लाया जाता था, और चर्चों से, फ़ौरन और थोड़े से 'सम्मान के साथ' मुहल्ले के हर घर में ले जाकर वहाँ के निवासियों से मॉनेस्ट्री की देखभाल के लिए दान के रूप में हज़ारों वसूल किए जाते थे.

सम्गीन ने त्यौहारों के कपड़े पहने शहरवासियों की भारी भीड़ को देखा, - उसने छोटे-छोटे बर्च वृक्षों से सजाए गए रास्ते को उसी तरह ठूँस-ठूँस कर, घनेपन से भर दिया था, जैसे मॉस्को में, लाल झंडों के साथ, फीतों और फूलों से दबे बाउमन के ताबूत के पीछे जाते हुए भर दिया था. उसी तरह, जैसे तब, फुटपाथ के पत्थरों को रौंदते हुए हज़ारों जूतों के तलवे घिसट रहे थे. पैरों की सूखी सरसराहट पत्थरों को पीस रही थी, खुले सिरों के ऊपर धूल का भूरा बादल उड़ा रही थी, और धूल में सैंकडों बैनर्स के सुनहरे अक्षर धुँधलेपन से चमक रहे थे. हवा बैनर्स को झकझोर रही थी, लोगों के बालों को सहला रही थी, हवा सफ़ेद बादलों को खदेड़ रही थी, लोगों के ऊपर छायाएँ पड़ रही थीं, जैसे लाल गंजे सिरों से धूल और पसीना पोंछ रही हो. आसमान में लगातार घंटों की घनी आवाज़ गूँज रही थी, जिससे कई सारे कोरस गाने वालों की आवाज़ें दब गई थीं. तैश से, चकाचौंध करते, भीड़ के आगे-आगे, ऊँचाई पर उठी हुई आइकन की सुनहरी फ़्रेम थी, जिसमें दो काले धब्बे थे, एक – कुछ बड़ा, दूसरा – कुछ छोटा. पीछे की तरफ़ झुकाया गया, गर्व से झूलते हुए, आइकन लम्बे-लम्बे खम्भों पर खड़ा था, खम्भे लोगों के कंधों पर थे, जो कस कर एक दूसरे से चिपके हुए थे, - सम्गीन ने देखा, कि वे अपने भारी बोझ को बड़ी आसानी से ले जा रहे हैं.

आइकन के पीछे-पीछे, पादरियों की भारी, सुनहरी और बेपैरों की आकृतियाँ गुज़र रही थीं, उनके सामने – भूरी दाढ़ी वाला, ग्रेट बिशप था, उसके सिर पे – एक सुनहरा गुब्बारा, जो स्वयंप्रकाशित पत्थरों की चकाचौंध करती किरणों से सजाया गया था, हाथ में – लम्बी छड़ी थी, ये भी सोने की थी. ऐसा लग रहा था, कि बिशप और दसियों चोगे पहनी अटपटी आकृतियाँ जितनी ज़्यादा दूर जा रही हैं, - सोने का ये ज़िंदा सैलाब उतना ही ज़्यादा घना होता जा रहा है, जैसे अपने पीछे सूरज की सारी ऊर्जा को, उसकी किरणों की सारी चमक को खींचकर ले जा रहा हो. भीड़ का सैलाब ज़बर्दस्त था और हर चीज़ अपने आप में अपनी ही तरह से ख़ूबसूरत थी,- सम्गीन इसे महसूस कर रहा था.

मगर वह भूरा दिन, ज़्यादा तेज़ हवा, ज़्यादा धूल, बारिश, ओले – कम चमक और तांबे की खनखनाहट, कम उत्सव ही पसंद करता. उसने धार्मिक जुलूस पहली बार तो नहीं देखा था और हमेशा धार्मिक जुलूसों के प्रति उतना ही उदासीन रहता, जितना फ़ौजी परेडों के प्रति रहता था. और इस बार तो वह पूरी सामर्थ्य से इस चलती हुई अंतहीन भीड़ में कोई हास्यास्पद, बेवकूफ़ी भरी, ओछी बात ढूँढ़ने की कोशिश्स कर रहा था. उसे याद आया, कि अपने उपन्यास 'पुनरुत्थान' में ल्येव टॉल्स्टॉय ने पादरी के चोगे को सुनहरी चटाई कहा था, - इसके बारे में ओछे साहित्यकार यासिन्स्की ने अपनी समीक्षा में लिखा था, कि टॉल्स्टॉय – स्कूली बच्चा है. बहुत बुरा लगा था, कि एक भारी बक्से में रखे गए आइकन को लोग इतनी आसानी से ले जाते हैं.

'मरीना ज़्यादा भारी नहीं होती, मगर ज़्यादा ख़ूबसूरत, ज़्यादा शानदार होती...'

सुबह उसने अख़बार में चर्च में कल हुई शानदार सर्विस के बारे में रिपोर्ट पढ़ी, उसने आर्कप्रीस्ट द्वारा कहे गए शब्दों को पढ़ा: आनंद और उल्लास से अपनी रक्षक को बिदा कर रहे हैं’, ये सरासर बेवकूफ़ी है: लोगों को उस समय ख़ुशी क्यों महसूस होनी चाहिए, जब वो उन्हें छोड़ कर जा रहा हो, जो – उनके विश्वास के अनुसार चमत्कार करने की सामर्थ्य रखता है? इसके बाद उसे याद आया, कि बाउमन के जनाज़े में कैसे एक मोटी औरत ने पूछा था:

किसे दफ़ना रहे हैं?’

क्रांति को, आण्टी’, उसे जवाब मिला.

इससे उसके विचारों में कुछ जोश आ गया, - वह गुस्से से सोच रहा था:

इस झुण्ड की ख़ातिर, उसके इब्राहिमों को भरपेट खाना मिले, इसलिए राजनेता इसहाकों की बलि चढ़ाते हैं: कुछ समोयलोव छोकरों से क्रांतिकारियों का निर्माण करते हैं...

यहाँ उसे याद आया:

हो सकता है, कि लड़का था ही नहीं?...’

उसने इस बात को अपने आप से छुपाया नहीं, कि उसके भीतर का गुस्सा कृत्रिमता से बढ़ रहा है, और उसे इसकी ज़रूरत इसलिए है, कि आज वो जो देखेगा, वो उससे ज़्यादा बेवकूफ़ीभरा न हो, जो वह देख रहा है.

बचपना,’ उसने अपने आप को उलाहना दिया, और ये सोचकर हँस पड़ा: ज़ाहिर है, मेरे लिए वह बहुत मायने रखती है, अगर मैं उसे किसी पागलपन की स्थिति में देखने से इस तरह से डर रहा हूँ.

भीड़ गुज़र गई, मगर रास्ते पे और ज़्यादा शोर होने लगा, - गाड़ियाँ दौड़ रही थीं, घोड़ों की टापें पत्थरों से घिस रही थीं, फुटपाथ पर काले-से बूढ़ों और बूढ़ियों की छड़ियाँ घिसट रही थीं, और खट्-खट् कर रही थीं, बच्चे भाग रहे थे. मगर जल्दी ही ये भी ग़ायब हो गया, - तब घर के गेट के नीचे से काला कुत्ता रेंग कर बाहर आया और, अपना लाल जबड़ा खोलकर, लम्बी उबासी लेकर, छाँव में लेट गया. और लगभग उसी समय खिड़की के पास से बुनी हुई गाड़ी से जुता, रंगबिरंगा, तंदुरुस्त घोड़ा जोश से भागता हुआ गुज़रा, - गाड़ीवान की सीट पर भूरा पतला कोट पहने ज़खारी बैठा था.

मतलब – दूर जाना है’, सम्गीन ने अनुमान लगाया, जल्दी से कपड़े पहने और गेट पे आया.

ज़खारी ने चुपचाप सिर हिलाकर उसका अभिवादन किया और गाड़ी में उसके बैठने के बाद फ़ौरन उछल कर कोचवान के बॉक्स पर बैठ गया, जैसे लकड़ी का बना हो, और जल्दी से घोड़े को भगाया. शहर खाली था, और उसमें शोर इस तरह गूँज रहा था, जैसे ड्रम के भीतर आवाज़ हो रही हो. बहुत दूर नहीं जाना पड़ा; शहर के बाहर, बगीचों में, बागड़ों के बीच, ज़खारी एक पतली गली में एक दुमंज़िला मकान की तरफ़ मुड़ा; निचली मंज़िल की कुछ खिड़कियाँ ईंटों से, और कुछ लकड़ी के फ़ट्टों से बंद की गई थीं, ऊपरी मंज़िल की खिड़कियों का एक भी काँच सलामत नहीं था, गेट के ऊपर ज़ंग लगा कमानीदार बोर्ड झुक गया था, मगर अभी भी उस पर लिखे शब्द सही-सलामत थे: आर्टिफ़िशियल मिनरल वाटर प्लान्ट’.  

सम्गीन ने गहरी साँस ली और चष्मा ठीक किया. वे एक लम्बे-चौड़े कम्पाऊण्ड में आए; कम्पाऊण्ड में खूब झाड़-झंखाड़ ऊग आया था, झाड़-झंखाड़ के बीच से जले हुए ठूँठ बाहर निकल रहे थे, आधी ढ‌ह चुकी भट्टी दिखाई दे रही थी, चारों ओर फ़ैली जंगली घास में बोतलों के काँच चमक रहे थे. सम्गीन को याद आया कि कैसे दादी ने उसे, आधा नष्ट हुआ घर और इसी तरह का कम्पाऊण्ड दिखाया था, जो टूटी हुई बोतलों से अटा पड़ा था, - उसने ये सब याद किया और सोचा:

बचपन में वापस लौट रहा हूँ’.

घोड़ा सावधानी से एक बड़ी सराय के खुले दरवाज़े में घुसा, - वहाँ, धुँधलके में, किसी ने उसकी लगाम पकड़ी, और ज़खारी, फर्श के उछलते हुए तख़्तों से सराय की पिछली दीवार की तरफ़ भागा, उसका दरवाज़ा खोला, हौले से बुलाया:

“स्वागत है!”

सम्गीन, पलकें झपकाते हुए, एक घने, खूब झाड़ियों वाले बाग में आया; घनी झाड़ियों के बीच, लीपा वृक्षों के नीचे, एक लम्बा एक मंज़िला मकान दिखाई दे रहा था, जिसमें दर्शनीय भाग में तीन स्तम्भ थे, तीन खिड़कियों वाली अटारी थी, जो छोटे-छोटे खम्भों से घिरी हुई थीं – ये खम्भे उसे किनारों से सहारा दे रहे थे, ऊपर छत तक जा रहे थे. इस घर में कोई रहता था – अटारी की खिड़कियों की सिल पर फूल रखे थे. कोने से पीछे की ओर गए, और पता चला, कि घर तो पहाड़ी पर बना है और उसका पिछला हिस्सा – दोमंज़िला है. ज़खारी ने छोटा सा दरवाज़ा खोला और सलाह दी:

“सावधानी से.”

अंधेरे में पैरों के नीचे सीढ़ियाँ चरमरा रही थीं, एक और दरवाज़ा खुला, और सम्गीन को सूरज की प्रखर किरण ने जैसे अंधा कर दिया.

“एक मिनट रुकिए, मैं – अभी आया!” ज़खारी ने हौले से कहा और दरवाज़ा बंद करके ग़ायब हो गया. 

सम्गीन ने हैट उतारी, चष्मा ठीक किया, चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई: सूरज से तप रही खिड़की के पास एक चमड़े का सोफ़ा पड़ा था, उसके सामने – फ़र्श पर, - सफ़ेद भालू की पुरानी, रौंदी हुई खाल पड़ी थी, कोने में – पूरे दरवाज़े पे शीशा जड़ी कपड़ों की अलमारी; दीवार के पास – दो चमड़े की कुर्सियाँ और एक छोटी-सी गोल मेज़ थी. उस पर पानी की सुराही और गिलास था. कमरे में ऊमस थी, उसकी नंगी दीवारों पर नीला रंग लगाया गया था, और उसकी हर चीज़ पर जैसे कोई अदृश्य, मगर तीखी गंध वाली धूल छिड़क दी गई हो. सम्गीन कुर्सी पर बैठ गया, उसने सिगरेट सुलगाई, गिलास में पानी डाला,मगर पिया नहीं: पानी गरम था, बासा था. वह ध्यान से सुनने लगा, - घर में असहज रूप से ख़ामोशी थी, और इस ख़ामोशी में, उसी तरह, जैसे उसके चारों ओर की हर चीज़ में, उसे कोई अपमानजनक बात महसूस हो रही थी. बिना आवाज़ किए दरवाज़ा खुला, ज़खारी भीतर आया, - आँख़ों ये बात फ़ौरन चुभ गई, कि उसके सिर पे बाल हमेशा से दुगुने हैं, और वे – घुंघराले हो गए हैं, जैसे उसने उन्हें धोया हो, और घुंग़्हराले बनाया हो.           

“आइए,” उसने फ़ुसफुसाहट से कहा. “ सिर्फ – सिगरेट फेंक दीजिए और वहाँ सिगरेट न पीजिए, माचिस की तीली न जलाएँ! खाँसी और छींक भी रोकें, विनती करता हूँ! और अगर बिल्कुल ही संभव न हो, तो - रूमाल मुँह पर रखें.”

उसने सम्गीन का हाथ पकड़ा, उसे छह सीढियाँ नीचे लाया, सावधानी से किसी नरम चीज़ पर उसे धकेला और फ़ुसफ़ुसाया:

“ये, यहाँ बैठिए, यहाँ से सब दिखाई देगा. बस, कृपया, शांति से! दीवार में एक चीथड़ा घुसा हुआ है, उसे ढूँढ़ लीजिए...”

अंधेरे में सम्गीन किसी फर्नीचर की पीठ से टकराया, उसने एक खुरदुरी सीट टटोली, सावधानी से बैठ गया. यहाँ ऊपर वाले कमरे की अपेक्षा कुछ ठण्ड़क थी, मगर धूल की तीव्र गंध यहाँ भी थी.

देखते हैं, कि आर्टिफ़िशियल मिनरल वाटर प्लान्ट में मज़हब किस तरह बनाते हैं! मगर – मैं देखूँगा कैसे?’ उसने पैर को हल्के से फ़र्श पर फ़ैला कर दीवार से टिका दिया, और दीवार को हाथ से टटोलते हुए, उसे चीथड़ा मिल गया, उसे निकाला, और उसकी आँख़ों के सामने ऊँगली की चौड़ाई जितनी, प्रकाश की एक लम्बी पट्टी दिखाई दी.

चष्मे को पकड़ते हुए, सम्गीन ने झिरी में देखा और उसे महसूस हुआ, जैसे वह किसी असीमित धुँधलके में गिरता जा रहा है, जहाँ मटमैले प्रकाश का समतल, एकदम गोल धब्बा रखा है. वह फ़ौरन समझ नहीं पाया, कि प्रकाश पानी की सतह से परावर्तित हो रहा है, जो एक टब में डाला गया है, - पानी उसकी सतह तक भरा था, प्रकाश उस पानी पर चौड़ी अँगूठी के समान पड़ा था; दूसरी, कुछ संकरी, कम चमकदार अँगूठी धरती जैसे काले फ़र्श पर पड़ी थी. पानी पर पड़ी अँगूठी के केंद्र में, - किसी गढ़े के समान, - एक बिन-आकार की परछाईं थी, और ये भी समझना मुश्किल था, कि वह आई कहाँ से?

कोई ट्रिक होगी’.

आँखों पर ज़ोर देते हुए, उसने छत के नीचे काफ़ी ऊँचाई पर एक लैम्प को देखा, जो काली टोपी में बंद था, - उसके नीचे, कुछ अनजान चीज़ लटक रही थी, जो किसी पंख फ़ैलाए हुए पंछी की तरह थी, ये उसीकी परछाई थी, जो पानी पर पड़ी थी.                                

कोई बहुत बड़ी अकलमंदी का काम नहीं है’, ज़ोर से साँस लेते हुए और आँखें बंद करके उसने सोचा. बैठना – तकलीफ़देह था, ख़ामोशी – अप्रिय लग रही थी, और ये ख़याल आ गया, कि इन सारे बचकाने रहस्यों को जानबूझकर, सिर्फ उसे चौंकाने के उद्देश्य से बनाया गया है.

फ़र्श के नीचे, उस जगह, जहाँ वह बैठा था, एक हल्का सा खटका हुआ, धुँधलके में कुछ हलचल होने लगी, वो प्रकाशित हो गया, और, उसे दूर हटाते हुए, लम्बे, बड़े कमरे की दीवारों को प्रकट करते हुए, लोग भीतर आने लगे – नंगे पैर, हाथों में जलती हुई मोमबत्तियाँ लिए, सफ़ेद, एड़ियों तक लम्बी कमीज़ें पहने, उन पर कोई पट्टा बंधा था, जो समझ में नहीं  आ रहा था. वे जोड़ियों में आ रहे थे, आदमी और औरत, एक दूसरे का हाथ पकड़े, मोमबत्तियाँ सिर्फ औरतों ने पकड़ी थीं; ग्यारह जोड़े गिनने के बाद, सम्गीन ने गिनना बंद कर दिया. आख़िरी दो जोडों में उसने मरीना के लाल मुँह वाले, भयानक चौकीदार को और अध-पगले चौकीदार वास्या को पहचाना, जिसे उसने हैपी इस्टेटमें देखा था. लम्बी कमीज़ में वास्या भारी-भरकम लग रहा था, और हालाँकि मर्दों में ज़्यादातर बड़े ही थे, - वास्या उन सबसे ऊँचा नज़र आ रहा था. लोग टब के सामने अर्धगोल बनाते हुए खड़े हो गए, उनके सिर सम्गीन की ओर थे; मगर वास्या जिस शान से कदम बढ़ा रहा था, उससे सम्गीन ने सोचा, कि शायद, वह अपनी घमण्डी, बेवकूफ़ी भरी मुस्कान बिखेर रहा है.

मोमबत्तियों की रोशनी ने कमरे को चौड़ा कर दिया था, - वह बहुत बड़ा था और, शायद, कभी गोदाम के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, - खिड़कियाँ उसमें थी नहीं, न ही कोई फ़र्नीचर था, सिर्फ कोने में एक टब था और उसके किनारे पे बाल्टी लटकी हुई थी. वहाँ, आगे, एक छोटा सा, करीब एक वर्ग साझेन (साझेन- प्राचीन रूस में लम्बाई का पैमाना. एक साझेन=लगभग 2.13 मीटर्स – अनु. ) के  के आकार का स्टेज था, जिसे काले कालीन से ढाँका गया था, - कालीन इतना चौड़ा था, कि उसके सिरे, फ़र्श तक पहुँच रहे थे, और एक साझेन आगे तक बिछ गए थे. स्टेज के बीच में – काले कपड़े से लिपटी कुर्सी या आरामकुर्सी थी. उसका सिंहासन,’ - सम्गीन ने अनुमान लगाया, निरंतर ये महसूस करते हुए कि उसे धोखा दिया जा रहा है.

उसनी मोमबत्तियों की संख्या गिनी: सत्ताईस. चार मर्द – गंजे थे, सात आदमी सफ़ेद बालों वाले. लगता था, कि उनमें से अधिकांश, औरतों ही की तरह, सभी बड़ी उम्र के थे. सब – ख़ामोश थे, आपस में फ़ुसफुसा भी नहीं रहे थे. उसे पता ही नहीं चला कि ज़खारी कहाँ से प्रकट हुआ और स्टेज के पास खड़ा हो गया; औरों ही की तरह उसने भी टखनों तक लम्बी कमीज़ पहनी थी, नंगे पाँव, मर्दों में सिर्फ वही एक था, जिसने हाथ में मोटी मोमबत्ती पकड़ी थी; स्टेज के दूसरे कोने तक – बच्ची जैसी, छोटे-छोटे, आधे सफ़ेद बालों वाली एक छोटी सी औरत हल्के से भागती हुई आई, उसके हाथ में भी मोटी मोमबत्ती थी.

अब प्रकट होगी वो, सारी तैयारी कर ली गई है,’ सम्गीन ने फ़ैसला कर लिया.

मरीना बहुत प्रभावशाली ढंग से नहीं निकली: पहले दीवार पर, कुर्सी के पीछे, काला परदा फेंकते हुए, उसके हाथ की झलक दिखाई दी, फिर पूरी आकृति प्रकट हुई, मगर – एक पार्श्व से; उसके बाल किसी चीज़ में अटक गए, और उसने इतनी तेज़ी से उसे खींचा, कि दरवाज़े का कोना खोलते हुए वह उखड़ ही गई. इसके बाद एक कदम आगे बढ़कर, उसने ये कहते हुए झुककर अभिवादन किया:

“नमस्ते, रूहानी भाइयों और बहनों!”

करीब पचास लोगों ने अलग-अलग आवाज़ों में जवाब दिया, आवाज़ें घुटी-घुटी आ रही थीं, जैसे गोदाम से आ रही हों, उतनी ही घुटी-घुटी मरीना का अभिवादन भाषण गूँजा; जवाबी शोर में सम्गीन ने कई बार दुहराए हुए शब्दों को पहचान लिया:

“माँ, जन्मदात्री, आध्यात्मिक गुरू...”

उनमें से हर एक मरीना के सामने झुककर, बाकी सभी भाइयों के सामने झुकता, और फिर से – उसके सामने झुकता. उसकी कमीज़, शायद, रेशमी थी, वो – ज़्यादा गोरी, ज़्यादा तेजस्वी नज़र आ रही थी. सम्गीन को वह भी, वास्या ही के समान, औरों से ऊँची नज़र आई. ज़खारी ने मोमबत्ती ऊपर उठाई और उसे नीचे लाकर बुझा दिया, - ऐसा ही छोटी औरत ने और अन्य लोगों ने भी किया. अधगोल को न तोड़ते हुए, उन्होंने मोमबत्तियाँ अपनी पीठ के पीछे, कोने में फेंक दीं. मरीना ने ज़ोर से और गंभीरत से कहा:

“इस तरह लुप्त होता है मायावी प्रकाश! दृश्य जगत के अदृश्य निर्माता – महान आत्मा की स्तुति करें!

धुँधलके में लोगों का भूरा अर्धगोल सरसराया, एक गोल में सिमट गया. बेसुरा गाने लगे, अलग-अलग आवाज़ों में, बल्कि निराशा से भी:

पवित्रतम आरंभ को

हर उत्पत्ति के जनक को.

एक ही अस्तित्व को,

तत्सम नहीं कोई

सदियों तक होगा नहीं.

नमन करते हैं आत्मा से!

कोई प्रार्थना नहीं,

कुछ माँगते नहीं,

माँगे बस रोशनी रूह की

अँधेरे से घिरी ज़मीनी रूह की ख़ातिर...” 

                                           

सम्गीन ने मरीना की आकृति देखी, आँखों पर ज़ोर देकर उसका चेहरा देखने की कोशिश करने लगा, मगर वो धुँधलके में छुपा था.

'शायद ये उसीने बनाई है', उसने सोचा.

लोगों का घेरा धीरे धीरे बाएँ से दाएँ चल रहा था, पूरा का पूरा और बिना कोई आवाज़ किए बढ़ रहा था, लकड़ी के फ़र्श पर पैरों के तलवों की सरसराहट मुश्किल से सुनाई पड़ रही थी. जब गाना ख़त्म हुआ - तो मरीना बोलने लगी:

“रूहानी आग जलाएँ!”

पानी वाले टब के पास ज़खारी खड़ा हो गया, उसके ऊपर अपने चौड़ी आस्तीनों वाले हाथ फ़ैलाए और अपनी, सामान्य आवाज़ में नहीं, बल्कि कृत्रिम रूप से ऊँची, थरथराती आवाज़ में कहने लगा:

“भाइयों और बहनों, - चौथी बार हम पवित्र रूह के आनंदोत्सव के लिए इकट्ठा हुए हैं, हाँ पवित्र रूह शुद्ध प्रकाश के रूप में अवतरित होगी! अंधकार और गंदगी में रहते हैं और सभी शक्तियों के संगम से बनी महान शक्ति के प्यासे हैं!”

गोल जल्दी जल्दी घूमने लगा, पैरों की सरसराहट स्पष्ट सुनाई देने लगी और उसने ज़खारी की आवाज़ को दबा दिया.

“ धरती के सुखों को त्याग देंगे और पवित्र हो जाएँगे,'' वह चीख रहा था. “एक दूसरे के प्रति प्यार से दिलों को प्रदीप्त करेंगे!”

लोगों का घना, भूरा घेरा, घूमते हुए, जैसे धुँधलके को धकेल रहा था, चौड़ा कर रहा था. सम्गीन ने ज़्यादा स्पष्टता से मरीना को देखा, - वह सीने पर हाथों को रखे, सिर ऊँचा उठाए बैठी थी. सम्गीन को लगा, कि वह उसका चेहरा देख रहा है – कठोर, निश्चल.

'आँखों को आदत हो गई है. वो वाकई में किसी आइडल की मूर्ति जैसी है'.

“जिस्म जल जाएगा – शैतान की जंज़ीरें – और हमारी रूह को उसके प्रलोभनों से मुक्त करेगा.” ज़खारी चीख़ रहा था, - उसे पकड़ा, कोरस में शामिल किया, मगर वो चीखे ही जा रहा था, मगर किसी औरत की पतली, उन्मादपूर्ण आवाज़ उसे दुहराती जा रही थी:

“ओय- रूह! ओय – पवित्र...”

“अभी जल्दी है!” कानों को बहरा कर देने वाली आवाज़ में एक मोटी आवाज़ भौंकी. “कहाँ घुसा जा रहा है? बेवकूफ़!”

ज़खारी की जगह पे एक गंजा दाढ़ी वाला आदमी खड़ा हो गया और गुँजाती हुई आवाज़ में कहने लगा:

“यहाँ बहनें और भाई हैं, जो पहली बार हमारे साथ आत्मा की प्रसन्नता में शामिल हो रहे हैं. और एक आदमी को शक हुआ: क्या क्राइस्ट को नकारना सही है! हो सकता है, उसके साथ और भी हों. तो मुझे इजाज़त दें, हमारी बुद्धिमान पालनहार, मैं बताऊँगा.”

मरीना हिली नहीं, और गोल घेरा धीरे-धीरे चलने लगा, मगर गंजा, हाथों को झटककर कहने लगा:

“चलिए, चलिए, अपनी मर्ज़ी से! मेरी आवाज़ दूर तक सुनाई देती है!”

वह ज़ोर से खाँसा और ज़ोर से आगे बोला:

“हम – ख़ुदा को क्राइस्ट में नकारते हैं, मगर इन्सान को – मानते हैं! और था वो, क्राइस्ट, आध्यात्मिक इन्सान, फिर भी – शैतान ने उसे फ़ुसला लिया, और उसने अपने आप को ख़ुदा का बेटा और सत्य का राजा कहना शुरू कर दिया. मगर हमारे लिए – रूह के अलावा कोई और ख़ुदा नहीं है! हम – ज्ञानी नहीं हैं, हम सीधे-सादे हैं. हम ऐसा सोचते हैं, कि सचमुच में ज्ञानी वो है, जिसे लोग बेवकूफ़ कहते हैं, जो रूह में विश्वास के अलावा, और सभी विश्वासों को दूर फेंक देता है. सिर्फ रूह – स्वयंसिद्धा से है, बाकी सारे ख़ुदा – तर्क से, उसकी चालों से हैं, और क्राइस्ट के नाम के पीछे तर्क छुपा है, - चर्च और और शासन का तर्क.”

कुछ इसी तरह की बात सम्गीन ने मरीना से सुनी थी, और बूढ़े के शब्द आसानी से दिमाग़ में रह गए, मगर बूढ़ा खूब देर तक गंभीर कटुता से बोलता रहा, और उसे सुनना 'बोरिंग' लग रहा था.

'शायद – कोई दुकानदार, कोई कसाई होगा', सम्गीन ने उसे परिभाषित कर दिया, जब गंजा वक्ता गोले की श्रृंखला में घुस कर भोंपू जैसी आवाज़ में चिल्लाया:

“ तेज़ी से! ओय – रूह, ओय – पवित्र!”

“ओय पवित्र, ओय रूह,'' दसियों आवाज़ों ने उससे अलग और कुछ कम ज़ोर से दुहराया, औरतों की आवाज़ें चीत्कार जैसी, थरथराती हुई लग रही थीं. जब गंजा श्रृंखला में घुस गया, तो वो जैसे झूल रहा था, उसने फ़र्श से लोगों को उठाया और गोले की गति को इतनी तेज़ी दी, कि अलग-अलग आकृतियों को पहचानना मुश्किल हो गया, एक बेआकार, बिना हाथों का जिस्म बन गया, - उसके ऊपर, उसकी सूँड पे बालों वाले सिर उछल रहे थे, झूल रहे थे; नंगे पैरों की हल्की धम्-धम् का शोर बढ़ता गया; औरतें और ज़्यादा जंगलीपन से चिल्ला रही थीं, ये अलग-अलग चीखें अधिकाधिक तालबद्ध होती गईं, उन्होंने शोर को कराहों से ढाँक दिया:

“ओय – रूह, आय – रूह!”

“ऊह, ऊह,” मर्दों की घुटी-घुटी आहें गंभीरता से गूँज रही थीं. सम्गीन ने, पलकें झपकाते हुए इस विशाल, उत्तेजित जिस्म से, कोरस नृत्य के इस बवण्डर से मरीना की आकृति की तरफ़ देखा और इंतज़ार करता रहा कि वह कब और कैसे भाषण देगी. 

असल में वह नहीं चाहता था, कि वह कुछ बोले. इस तरह से, लोगों की वहशत भरे चक्करों से, जो लगातार एक तंग, भारी घेरा बनाते हुए परेशानीभरी वहशियत से गोल-गोल घूमते जा रहे थे, उनसे हट कर – वह अपनी जगह पर है. उसे ऐसा भी लगा, कि लोगों की गति बढ़ने और चीखों की ताकत बढ‌ने के साथ-साथ, वह उनसे ऊपर उठती जा रही है, बादल की तरह, प्रकाश के धब्बे की तरह, - बढ़ती जा रही है और धुँधलके को निगलती जा रही है. ये थकावट की हद तक लम्बा चलता रहा. सम्गीन ने चष्मा उतारकर रूमाल से आँखें पोंछीं, - बिना चष्मे के तो नीचे का सब कुछ और भी आकृतिविहीन, तैशभरा और तूफ़ानी लग रहा था. उसे महसूस हुआ कि ये गूँजता हुआ बवण्डर उसे अपने भीतर समेट रहा है, कि उसका जिस्म अपने आप ही गतिमान हो रहा है, पैर काँप रहे हैं, कंधे फ़ड़फ़ड़ा रहे हैं, वह एक किनारे से दूसरे किनारे की तरफ़ झूल रहा है, और उसके ऊपर आरामकुर्सी की स्प्रिंग चरमरा रही है.

'कल्पना कर रहा हूँ,' उसने अपने आप से कहा, और ऐसा लगा कि वह अपने आप से ही, कहीं बहुत दूर से बात कर रहा है. – बेवकूफ़ी!'

झिरी में, उसकी आँखों पर हवा वार किए जा रही थी – गरम-घिनौनी, पसीने और धूल की गंध से सराबोर, सम्गीन के सिर के ऊपर वॉलपेपर में सरसराहट हो रही थी. उसकी आँखें टब में पानी के प्रकाशित गोल पर जम गई थीं, - पानी तरंगों से ढँक गया था, प्रकाश का गोला, जिसे वह प्रकाशित कर रही थीं, थरथरा रहा था, और केंद्र वाला काला धब्बा निश्चल नज़र आ रहा था, और अब गहरा नहीं, बल्कि फूला हुआ लग रहा था. सम्गीन ने इस धब्बे की ओर देखा, कुछ इंतज़ार किया और कल्पना की:

'पानी हवा की गति के कारण विचलित हुआ है, काला धब्बा – लैम्प के टैंक की छाया है',

ये आख़िरी बात थी, जो उसने महसूस की थी, - उसे अचानक ऐसा लगा, कि काला धब्बा फूल गया है और उसने टब के भीतर एक बवण्डर पैदा कर दिया है. ये सिर्फ कुछ ही देर नज़र आया, दो, तीन सेकण्ड्स, और इसके साथ ही पैरों की धम्-धम् ज़्यादा धमाकेदार हो गई, भिन्न-भिन्न आवाज़ों वाली चीख़ें तेज़ हो गईं, भारी-भारी कराहों से अचानक एक ख़ुशी की और भयमिश्रित चीख उत्पन्न हुई:

“और लु-ढ़-अ-का-आ, और लु-ढ़-अ-का-आ...”

कोई भालू जैसी आवाज़ में गरजा:

“ऊह, ऊह!”

गोलाकार, भूरी लुगदी और ज़्यादा तैश से उफ़न रही थी; लोग पूरी तरह अपनी मानवीय आकृतियाँ खो चुके थे, इस बादलों जैसे घेरे में उनके सिर भी स्पष्ट नज़र नहीं आ रहे थे, और ऐसा लग रहा था, कि बवण्डर की गति कभी उन्हें हवा में ऊँचे उठा रही है, धुँधले प्रकाश की ओर, तो कभी लोगों के पैरों के नीचे काले पदार्थ की ओर चिपका रही है. लम्बी-लम्बी पोषाकों के नीचे उनके पैर भी अदृश्य थे, वो, जो उनके नीचे था, जैसे लहर की तरह फूल रहा है और सपाट हो रहा है, जैसे जहाज़ का डेक. टब में पानी की तरंगें अधिकाधिक सजीव और स्पष्ट होती जा रही थीं, उसके ऊपर प्रकाश का धब्बा – ज़्यादा प्रखर, वह बिखर गया; अपने आप को ये यकीन दिलाने की कोशिश न करते हुए, कि वह सिर्फ कल्पना कर रहा है, देख नहीं रहा है, सम्गीन ने फिर से पानी के ऊपर काले घेरे के केंद्र में बवण्डर को देखा. उसने महसूस किया कि वह वहाँ, नीचे, भौतिक रूप से बेसिर और बेहाथों वाले अस्तित्व से जुड़ गया है; उसे महसूस हुआ कि लोगों का वहशी बवण्डर धुँधले, सीमित दायरे में एक दमघोंटू पीड़ा का ज़हर उसके भीतर भर रहा है, मगर वह देखता रहा और आँख़ें बंद न कर सका.

“तेज़, और तेज़, भाइयों-बहनों, और तेज़!” किसी औरत की विलाप सी करती आवाज़ गूँजी, और दूसरी उससे भी ज़्यादा चुभती हुई जनानी आवाज़ ने एक अनजान शब्द को दो बार चिल्लाकर कहा:

“धर्म! धर्म!”

लोगों के घेरे में भगदड़ होने लगी, वह भटक गया, टूट गया, कुछ आकृतियाँ उससे दूर छिटक गईं, दो-तीन फ़र्श पर गिर पड़ीं; टब के पास अपनी कमीज़ की चौड़ी आस्तीनों को पंखों के समान हिलाते हुए, छोटे बालों वाली, छोटी सी औरत उछल कर आई, उसने अविश्वसनीय तेज़ी से टब का चक्कर लगाया, समुद्री-चिड़िया (गंगा चिल्ली) जैसी आवाज़ में चीखी:

“ओ, अयोध्या!

ओ अविजित!”

ज़खारी ने लोगों के हाथ पकड़-पकड़ कर, घेरे को फिर से बना दिया, फिर से उनके घुमाव को वहशियत भरी गति दी, लोग धीमे-धीमे कराहने लगे, विलाप करने लगे; छोटी सी, आधे सफ़ेद बालों वाली औरत हाथों को हिलाते हुए उछल रही थी, झुक रही थी, मानो पानी में छलांग लगाने जा रही हो, और, फिर से उछलते हुए, चीत्कार करने लगी:

धर्म! धर्म!

, चूडामणि,

सूर्य पक्षी.,

चिरंतन अग्नि...”

लोग कंपकंपाते हुए ऐंठ रहे थे, जैसे अपने हाथों की जंज़ीर तोड़ना चाहते हों; ऐसा लग रहा था, कि हर पल उनकी गति बढ़ती जा रही थी और इस गति की कोई सीमा नहीं है; वे फिर से पागलपन से चिल्लाए, बादलों का बवण्डर बनाते हुए, वो चौड़ा हो रहा था, सिकुड़ रहा था, धुँधलके को ज़्यादा प्रकाशमान और ज़्यादा अंधेरा बना रहा था – कुछ आकृतियाँ विलाप करते हुए और गरजते हुए, पीछे की ओर उछलीं, जैसे चेहरा ऊपर किए फ़र्श पर गिरना चाहती हों, मगर घेरे की बवण्डर जैसी गति ने उन्हें खींचा, सीधा किया, - तब वे फिर से भूरे जिस्म में समा गए, और ऐसा लगा कि वो, चक्रवात की तरह, ऊपर-ऊपर उठता जा रहा है. एक तीखी चीख़ ने खर्राटों को, गरज को, विलाप को और चीत्कार को भेदकर उसे फ़ाड़ दिया:

“धर्मा-ई-ई-या...”

घेरा बार-बार टूट रहा था, लोग गिर रहे थे, फ़र्श पर घिसट रहे थे, भूरे पदार्थ के की लय से वे छिटक रहे थे, रेंग कर एक किनारे, धुँधलके में जा रहे थे; घेरा छोटा होता जा रहा था, - कुछ लोग हाथों में टब का उफ़नता पानी ले लेकर उसे एक दूसरे के चेहरे पर छिड़क रहे थे और, पैरों की टूटन के कारण गिर रहे थे. वो छोटी सी, ग़ज़ब की हल्की बुढ़िया भी गिर गई, - किसी ने उसे हाथों में उठाया, घेरे से बाहर ले गया और अँधेरे में फेंक दिया, जैसे पानी में फेंक रहा हो.

सम्गीन अब किसी चीज़ के बारे में नहीं सोच रहा था, जैसे उसे कुछ महसूस ही नहीं हो रहा था, मगर उसे ये एहसास हो रहा था, कि वह एक खाई की कगार पे बैटःआ है और उसका दिल नीचे कूदने को चाह रहा है. मरीना की तरफ़ वह नहीं देख रहा था, आँख की याददाश्त से, उसे याद था, कि वह निश्चल और सबसे ऊपर बैठी है. उसकी आँखें धुँधलके में देखने की आदी हो चुकी थीं, वह उन लोगों के चेहरे भी पहचान सकता था, जो घेरे से छिटक गए थे, गिर गए थे और पानी से भरे टब की तरफ़ झुक कर बैठे हैं. उसने देखा, कि ज़खारी ने वास्या को पकड़ा और घेरे से बाहर धकेला; ये बड़ा आदमी ज़ोर-ज़ोर से हाथ हिलाने लगा, जैसे किसी से मिलकर उसे गले लगाना चाहता हो, जब वह घेरे में घूम रहा था, तो उसका – उसका बेहद ख़ूबसूरत और गर्वीला चेहरा मुस्कुरा रहा था, दमक रहा था. हौले से हाथों को हिलाते हुए, बिखरे-बिखरे शब्दों में और ज़ोर से, भयानक शोर को दबाते हुए और भूले-बिसरे शब्दों को सही-सही याद करते हुए वह कहने लगा:

“रूह उड़ रही है...सफ़ेद पंखों वाला उकाब मंडरा रहा है. आग का पंछी. गा रहा है – सुन रहे हो? गा रहा है : जला दूँगा! हाँ राख बन जाएगी...सूरज उबलने लगेगा. आसमानी उकाब. ख़ुशी मनाओ! उखाड़ फेंकेगा. नरक का स्वामी कौन है? इन्सान.”

दो आवाज़ें इसी के अनुरूप गाने लगीं:

“शक्तियों की शक्ति से हों सुसज्जित,

ज्वालामय रूह के चक्र में हों घिरें,

धरती पर तैरें जहाज़ की तरह.

आसमान हो उसका पाल...

घेरा धीरे-धीरे चलने लगा, शोर कम हो गया, मगर अब लोग बार-बार फ़र्श पर गिरने लगे, सिर्फ दस-बारह लोग ही अपने पैरों पर खड़े थे; सफ़ेद बालों वाला ऊँचा आदमी, लड़खड़ाते हुए, घुटनों पर खड़ा हो गया, उसने अपने झबरे सिर को हिलाया और तैश भरी, जंगली आवाज़ में चिल्लाने लगा:

“ऐ, ख़ुदाओं की ख़ुदा – सुनो, ध्यान दो – समय आ गया है! मानव जाति मर रही है. और - मर जाएगी! तुम तो हो...धीरज दो – तुम ही रक्षक हो! आओ...”

चिल्लाते हुए उसने हाथों में भरभरकर पानी निकाला, उसे मरीना की दिशा में, अपने चेहरे पर और सफ़ेद सिर पर छिड़का. लोग एक दूसरे को हाथों का सहारा देते हुए, बगल से पकड़कर फ़र्श से उठाने लगे, फिर से घेरे में खड़े हो गए, ज़खारी जल्दी-जल्दी उन्हें धकेल रहा था, सही कर रहा था, कुछ चिल्ला रहा था और अचानक, चेहरे को हथेलियों से ढाँप कर, उसने अपने आप को फ़र्श पर फेंक दिया, - घेरे में मरीना आई, और लोग फिर से जंगलीपन से, चीत्कार करते हुए, विलाप करते हुए, कराहते हुए, घूमने लगे, कूदने लगे, जैसे फ़र्श से छिटक जाना चाहते हों.         

सम्गिन ने देखा कि कैसे मरीना ने टब के पास ठहर कर सीने से अपनी कमीज़ हटाई और, हाथों से पानी निकाल-निकाल कर पहले एक और फिर दूसरी छाती को धो दिया.

ज़खारी उछला और, ऊँचे, सफ़ेद बालों वाले आदमी के साथ मिलकर बेहद हौले से उसे उठाया, टब में डाल दिया, - किनारों से होते हुए पानी उछला और उसने जैसे लोगों के पैर झुलसा दिए, - वे विलाप कर उठे, और  वहशत से घूमने लगे, फिर से गिरने लगे, चीत्कार करते हुए फ़र्श पर घिसटने लगे, - मरीना पानी में निश्चल खड़ी थी, उसका चेहरा भी निश्चल था, पत्थर जैसा था. सम्गीन को लगा, कि वह उसकी ताँबे की आँख़ें, कसकर भिंचे हुए होंठ देख रहा है, - पानी उसके घुटनों तक पहुँच रहा था, अपने वह सिर के ऊपर हाथ ले गई, और वे थरथरा नहीं रहे थे. अब वो कुछ कह रही है, मगर भगदड़ और लोगों के शोर में उसकी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी, और घेरा फिर से टूट गया, लोग एक किनारे को छिटकते हुए, तकियों के समान हल्की सी आवाज़ से फ़र्श पर गिर रहे थे, और निश्चल पड़े थे; कुछ लोग उछल कर, अकेले और जोडों में घूम रहे थे, मगर एक के बाद एक करके सभी गिर रहे थे या, अंधों के समान हाथ फैलाकर, लड़खड़ा रहे थे, एक किनारे को हट रहे थे और वहाँ भी निर्बलता से गिर रहे थे, जैसे उनके पैर काट दिए हों. खुले बालों वाली एक औरत टब के चारों ओर चिल्लाते हुए उछल रही थी:

“जय हो. जय हो!”

सम्गीन को महसूस हुआ कि वह अपने होश खो रहा है, हाथों से दीवार का सहारा लेकर वह उठा, कदम बढ़ाए, किसी खोखली चीज़, जैसे खाली अलमारी से टकरा गया. आँखों के सामने सफ़ेद बादल डोल रहे थे, और आँख़ों में दर्द हो रहा था, जैसे उनमें काफ़ी गर्म धूल भर गई हो. उसने माचिस की तीली जलाई, दरवाज़ा देखा, आग बुझा दी और अपने आप को दरवाज़े से बाहर धकेल कर, मुश्किल से पैरों पर खड़ा रहा, - चारों ओर की हर चीज़ घूम रही थी, शोर मचा रही थी और पैर ऐसे नर्म हो गए थे, जैसे शराबी के पैर हों,

एक दुःस्वप्न’, हाथ से दीवार का सहारा लेते हुए, पैरों से सीढ़ियाँ टटोलते हुए उसने सोचा.

फिर से माचिस की तीली जलानी पड़ी. गिरने की जोखिम उठाते हुए, वह सीढ़ियों से नीचे भागा, उस कमरे में आया, जहाँ ज़खारी उसे पहले लाया था, मेज़ के पास गया और गिलास भर घिनौना गरम पानी पी गया.

उसने मुझे ये क्यों दिखाया? कहीं वो ये तो नहीं समझ रही है, कि मैं भी झूमने लगूँगा, उछलने लगूँगा?’ वह समझ रहा था, कि वैसे ही यंत्रवत् सोच रहा है, जैसे बुरे सपने के बाद अपने इन्सान होने के एहसास का अनुभव कर रहा है.

कहीं नीचे अभी भी लोग पैर पटक रहे थे, चिल्ला रहे थे, कमरे में दम घुट रहा था, खिड़की के बाहर, नीले (आसमान) में लाल बादल जल रहे थे और पिघल रहे थे. सम्गीन ने बाग में जाने का, वहाँ छुपने का, शाम की हवा में साँस लेने का फ़ैसला किया; वह सीढ़ी से नीचे उतरा, मगर बाग का दरवाज़ा बंद था, वह उसके सामने कुछ पल खड़ा रहा और फिर से ऊपर कमरे में आया, - वहाँ आईने के सामने एक हाथ में मोमबत्ती लिए मरीना खड़ी थी, दूसरे से वह कंधे अपनी कमीज़ उतार रही थी. उसने आईने में उसके लाल चेहरे का प्रतिबिम्ब देखा, विस्फ़ारित आँखें, दाँतों में दबा हुआ होंठ देखा, - मरीना झूम रही थी, लड़खड़ा रही थी. सम्गीन उसकी तरफ़ बढ़ा, - अपने सीने को ढाँकते हुए उसने हाथ झटका, रेशमी कमीज़ उसके पैरों पे गिर पड़ी, उसने मोमबत्ती फ़र्श पर फेंक दी और हौले से कराही:

“ओय, - तुम क्या कर रहे हो? जाओ...”

सम्गीन और आगे बढ़ा, गर्म मोमबत्ती पर पैर रखा और उसने आईने में औरत के छरहरे, गोरे बदन की बगल में भूरे रंग के सूट में, चष्मा पहने, नुकीली दाढ़ी वाले, पीले, खिंचे हुए चेहरे पर भय के लक्षणों सहित – खुले मुँह वाले आदमी को देखा.

 “जाओ,” मरीना ने दुहराया और हाथ हिलाते हुए एक किनारे मुड़ गई. जाने की शक्ति ही नहीं थी, और गोल कंधे से, तनी हुई छातियों से, भूरे बालों से ढँकी पीठ से, और शीशे की आँखों वाली भूरी सपाट आकृति से नज़र हटाना संभव नहीं था. उसने देखा, कि मरीना भी इस आकृति की तरफ़ देख रही है, - उसके हाथ चेहरे की ओर उठे; हथेलियों से चेहरा ढाँककर, उसने अजीब तरह से सिर हिलाया, स्वयम् को सोफ़े पर फ़ेंक दिया और नंगे पैर पटकते हुए, शराबी आवाज़ में चीख़ी:

“ओह, अरे चलो, क्या है!...”

तब सम्गीन, पीछे हटते हुए, उस पर से, उसके धमधमाते पैरों से आँख न हटाते हुए, दरवाज़े से बाहर निकला, उसे बंद किया, उससे पीठ टिका दी और बड़ी देर तक अँधेरे में खड़ा रहा, आँखें बंद थीं, मगर उसे औरत का ताकतवर जिस्म, तनी हुई, जैसे आहत, छातियाँ, चौड़े, गुलाबी नितम्ब स्पष्टता और प्रखरता से नज़र आ रहे थे, और उसकी बगल में – स्वयँ को देख रहा था - उलझे बाल, खुला मुँह, भूरा पसीने से लथपथ चेहरा.

कंधे पर किसी की थपथपाहट और फुसफुसाहट से वह होश में आया:

“मालिक, - कौन है ये? ऐसा कैसे? ज़खारी, ज़खारी!...”

कंकाल जैसे चेहरे वाली इस औरत को सम्गीन पहचान गया, वो मरीना की नौकरानी थी, - वह लैम्प का प्रकाश उस पर डाल रही थी, उसका हाथ कांप रहा था, और काले घेरों के बीच आँख़ें भी डर से कंप रही थीं. ज़खारी भाग कर आया, उसे दूर धेलकर गहरी साँस लेते हुए गुस्से में बुदबुदाया:

“ये आप क्या...घूम रहे हैं? इजाज़त नहीं है! और मैं आपको ढूँढ़ रहा हूँ, डर गया था! क्या स्तब्ध रह गए?”

उसने सम्गीन का हाथ पकड़ा, जल्दी से उसे सीढ़ियों से नीचे ले गया, करीब-करीब भागते हुए ही अपने पीछे करीब तीस कदम घसीट कर ले गया और, बाग में पेडों के ढेर पे बैठाकर, उसके चेहरे पर जैकेट के अस्तर के काले फ्लैप से हवा करते हुए, कमीज़ और अपने नंगे पैर खोलते हुए उसके सामने खड़ा हो गया. वो ज़्यादा पतला, ज़्यादा लम्बा हो गया था, शराबी, धुँधली आँखों को खोलते हुए, उसका सफ़ेद चेहरा खिंच गया था, - ऐसा लग रहा था कि उसकी दाढ़ी भी ज़्यादा लम्बी हो गई है. गीला चेहरा चमक रहा था और टेढ़ा हो रहा था, मुस्कुराते हुए, दाँत दिखाते हुए, - वह कुछ कह रहा था, और सम्गीन, जैसे अपने आपको उससे बचाते हुए ख़ुद को यकीन दिला रहा था:

शराबखाने का नर्तक’,

बहुत बुरा लग रहा था, कि ये ख़ामोश तबियत, शांत आदमी इतना ज़्यादा बोलता है.

“आत्मा के आनंदोत्सव में सभी उत्तेजित हो गए. आनंदोत्सव तो असल में ख़ुशी...”

“मैं जाऊँगा,” सम्गीन ने उठते हुए कहा; उसका हाथ पकड़कर ज़खारी उसे बाग के भीतर ले गया, हौले से बोला;

“अच्छा, जाइए! घोड़ा नहीं मिल सकता, घोड़ा – उसके लिए है.”

बागड़ में एक टूटी हुई जगह पर लाकर, लम्बा हाथ हिलाकर बोला:

“बाईं ओर बगीचों से लगे-लगे जाइए, चौकी तक, और वहाँ नज़र आ जाएगा.”

सम्गीन चल पड़ा, वह बगीचों के बिल्कुल पास से चल रहा था, उसे अफ़सोस हो रहा था, कि उसके पास छड़ी नहीं है. वह लड़खड़ा रहा था, सिर अभी भी घूम रहा था, मुँह में सूखी कड़वाहट थी और आँख़ों में तेज़ दर्द.

बगीचों वाले घर एक दूसरे से दूर दूर थे, कच्ची सड़क पर कोई नहीं था, हवा उसकी धूल को सहला रही थी, हल्के भूरे बादल उड़ाते हुए, पेड़ शोर मचा रहे थे, बगीचों में कुत्ते भौंक रहे थे और विलाप कर रहे थे. शहर के दूसरे कोने में, वहाँ, जहाँ आइडल ले गए थे, ख़ाली आसमान में, चाँद की सुनहरी तश्तरी के पास, अलसाहट से रॉकेट्स ऊपर जा रहे थे, आतिशबाजी के विस्फ़ोट गहरी गहरी साँसों की तरह मुश्किल से सुनाई दे रहे थे, सुनहरी, रंग़बिरंगी चिंगारियाँ बिखर रही थीं.                   

वहाँ मेला लगा है’, सम्गीन ने ख़ुद की परछाईं पर नज़र डाले, सुस्ती से चलते हुए, अपने आप को याद दिलाया, - परछाईं फिसल रही थी, कच्चे रास्ते पर टूट-टूट जा रही थी, जैसे धूल में छुप जाना चाहती हो, और आसानी से किसी आदमी की भूरी आकृति में परिवर्तित हो जाती थी, जो अचरज के बोझ से दब गया हो, दयनीय हो. सम्गीन की तबियत बिगड़ती जा रही थी. उसके जीवन में ऐसे भी क्षण आए थे, जब वास्तविकता ने उसे नीचा दिखाया था, कुचलने की कोशिश की थी, उसे याद आई पीटरबुर्ग की अंधेरी सड़कों पर 9 जनवरी की रात, मॉस्को के विद्रोह के आरंभिक दिन, वो शाम जब उसे और ल्युबाशा को पीटा गया था, - इन सब घटनाओं में भय उस पर हावी हो गया था, जिसने उसके भीतर आत्म संरक्षण की स्वाभाविक भावना का विस्फोट कर दिया था, मगर आज, आज भी उसे कुचला गया है, बेशक, जैविक भावना से, मगर – सिर्फ उसीसे नहीं. आज वह डर भी गया है, मगर – किस बात से? ये समझ में नहीं आ रहा था.

उसे लग रहा था, कि वह पूरा धूल में सन गया है, किसी चिपचिपे मकड़जाले से गंदा हो गया है; अपने आप को झटकते हुए, उसने अपने सूट को छुआ, उस पर पड़े धूल के कुछ अदृश्य कण पकड़ते हुए, फिर उसे याद आया कि प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु से पहले इस तरह लोग स्वयम् को साफ़ करते थे’, उसने पतलून की जेबों में हाथ काफ़ी गहरे घुसा दिए, - इससे चलने में मुश्किल होने लगी, जैसे उसने स्वयम् को बांध दिया हो. और कोई दूर से देखे तो उसे लगेगा, जैसे कोई अजीब आदमी, जो सुनसान सड़क पर अकेले चला जा रहा है – जा रहा है जेबों में हाथ डाले, अपनी परछाईं की थरथराहट देखते हुए, छोटा सा, सपाट, भूरा – चश्मा पहने.

उसने चष्मा उतारा, उसे जेब में रखा और घड़ी निकाल कर, उसके डायल की ओर देखकर, सोचा;

ये...ये दुःस्वप्न दो घण्टे से भी ज़्यादा चला’.           

सोचने की यंत्रवत् आदत ने और जो भी देखा हो, उसे नकारने की, धुँधला कर देने की इच्छा ने उससए कहा:                                      

इसे जीवन का अर्थ समझने का प्रतीकात्मक प्रयास समझना चाहिए. थोथे घमण्डियों की व्यर्थता. जंगलियों का तत्वज्ञान. हो सकता है, कि सिर्फ – खाए-पिए लोगों की बोरियत’.

तैश भरी बुढ़िया और उसके विचित्र शब्द याद आ गए.

हो सकता है – बूढ़ी कुँआरी, वैसी ही अधपगली हो, जैसे ये ईडियट, वास्या है’.

मगर उसे मालूम था कि वह अपने आप को इन लोगों के बारे में सोचने पर इसलिए मजबूर कर रहा है, ताकि मरीना के बारे में न सोचे. इस सारे पागलपन में उसका सहभाग – बिल्कुल समझ में नहीं आता.

अगर वो टब में उसके अटपटे स्नान से पूरा नहीं होता, अगर वह इन जंगलियों के नाच के दौरान दो घण्टे आइकन के समान निश्चल बैठी रहती – तो बेहतर होता. हाँ, तब ज़्यादा समझ में आता. शायद – ज़्यादा समझ में आता.

वह अब भीड़-भाड़ वाली सड़क पर चल रहा था, सामने से सजे-धजे लोग आ रहे थे, शराबी चीख रहे थे, हवा को शोर और चरमराहट से भरते गाड़ीवान जा रहे थे. इस सबसे थोड़ी राहत महसूस हुई. मगर जब घर में, उसने स्नान किया, कपड़े बदले और दाँतों में सिगरेट दबाए चाय की मेज़ पे बैठा, - उसके ऊपर जैसे कोई बादल उतर आया, जिसने उसे भारी, परेशान उदासी से घेर लिया और विचारों को शब्दों का जामा भी पहनाने नहीं दिया. उसके सामने वे दोनों खड़े थे: वह ख़ुद और नग्न, भव्य औरत. अकलमंद औरत, इस बारे में – कोई बहस ही नहीं. होशियार और सत्ता वाली.

इस उत्तेजना में उसने कुछ दिन गुज़ारे, ये महसूस करते हुए, कि वह कुंद होता जा रहा है, अवसाद को सपर्पित होता जा रहा है और – मरीना से मिलने से डर रहा है. वह  न तो उसके पास आई, और ना ही उसे अपने यहाँ बुलाया, - वह ख़ुद भी उसके पास नहीं गया. वह ठीक तरह से सो नहीं पा रहा था, उसकी भूख मर गई थी और वह लगातार चिपचिपी यादों के धीमे प्रवाह को सुनता रहता,  एक ही तरह के विचारों और भावनाओं के असंबद्ध परिवर्तन को महसूस करता रहता.

उसके मन में अप्रत्याशित रूप से एक विचार कौंधा – बल्कि, जैसे दिमाग़ के किसी अंधेरे कोने से चुपके से रेंग गया – मरीना क्या चाहती थी, जब उसने चिल्लाकर कहा: “ओह, अरे चलो, क्या है!” क्या वह चाहती थी, कि वो चला जाए, या – उसके साथ रुक जाए? इस सवाल का सीधा जवाब उसने नहीं ढूँढ़ा, ये समझते हुए, कि अगर मरीना चाहे, - तो उसका आशिक होने पर मजबूर कर सकती है. कल ही ज़बर्दस्ती करेगी. और उसने फिर से अपमानजनक भाव से आईने में अपने आपको उसकी बगल में खड़े देखा.

एक हफ़्ते से ज़्यादा गुज़र गया, जब ज़खारी ने उसे फ़ोन करके उसे दुकान में आने की दावत दी. सम्गीन ने नया फ़लालैन का सूट पहना और मरीना के पास गया, उसने अपनी मनोदशा को इस तरह तैयार किया था, जैसे अदालत में किसी उलझी हुई केस के सिलसिले में जा रहा हो. दुकान में ज़खारी उलझन और दोस्ताना ढंग से मुस्कुराया, सम्गीन को किसी अप्रिय संदेह का एहसास हुआ:

ये बेवकूफ़, शायद, मुझे भी पागल समझने पर उतारू है’.

मरीना उससे हमेशा की तरह शांति और भलमनसाहत से मिली. वह मेज़ के पीछे बैठकर कुछ लिख रही थी, उसके सामने काँच की सुराही थी, जिसमें धुँधला पीले रंग का कोई द्रव भरा था और बर्फ के टुकड़े थे. सादी, सफ़ेद मलमल की पोषाक में वह उतनी ऊँची और रसीली नहीं लग रही थी.

“पियो,” उसने कहा. “ये संतरे का रस है, पानी और थोड़ी सी सफ़ेद वाइन के साथ. बेहद ताज़गी देता है.”

पहले अदालती मामलों के बारे में बातें करते रहे, और फिर उसने अपनी छोटी ऊँगली के नाखून की ओर देखते हुए पूछा:

“तो, आनंदोत्सव के बारे में क्या कहोगे?”

“मैं – चकित हूँ,” सम्गीन ने सावधानी से जवाब दिया.

ज़खारी ने मुझे बताया कि तुम पर इस सबने बेहद भारी असर किया?”

“हाँ, पता है...”

“अचरज आख़िर किस बात का है?”

“असल में ये – पागलपन है,” उसने फ़ौरन नहीं कहा.

“ये – विश्वास है!”     

 अब मरीना ने सिर उठाकर उसकी ओर एकटक, कड़ाई से देखा, और उसकी आँखों में सम्गीन को कुछ अनजाना–सा, ठण्डा, उलाहना सा देता महसूस हुआ.

“ये – ज़्यादा बड़ा, ज़्यादा गहरा विश्वास है, हर चीज़ से बढ़कर, जिसे सोने की पर्त चढ़े, नाटकीय, सरकारी चर्च अपने समूह गानों, ओर्गन्स, युहरिस्ट संस्कार (ईसा के अंतिम भोज का स्मारक रात्रि भोज) और अपनी सभी चालों से प्रदर्शित करते हैं. प्राचीन, लोक, वैश्विक विश्वास है जीवन की आत्मा में...”    

“मेरे लिए ये अजीब बात है,” सम्गीन ने इस बात का ध्यान रखते हुए कहा कि उसके शब्दों में अपराधीपन न झलके.

“और ये – दुर्भाग्य है तुम्हारा और तुम जैसे और लोगों का,” टूटे हुए नाखून को काटते हुए उसने शांति से कहा. उसकी ऊँगलियों की हलचल पर नज़र रखते हुए सम्गीन ने धीरे से कहा:

“मैं बिल्कुल समझ में नहीं आ रहा है, कि तुम कैसे...”

मगर उसने उसे बात पूरी नहीं करने दी, फिर से उसकी तरफ़ बेहद कठोरता से देखने लगी.

“तुम मुझसे कुछ भी न पूछो, और जो जानना तुम्हारे लिए ज़रूरी है मैं कःउद ही तुम्हें बताऊँगी. बुरा न मानो. तुम सोच सकते हो, कि मैं खेल रही हूँ...बोरियत के कारण, या कुछ और भी सोच सकते हो. इसका – तुम्हें अधिकार है.”

मलमल से कसकर बंधे उसके वक्षस्थल की ओर देखते हुए वह चुप हो गया; फिर, गहरी साँस लेकर उसने स्वीकार किया:

“मुझे अफ़सोस है, कि...तुम्हें वहाँ देखा...”

वह इस बारे में नहीं कह रहा था, कि उसे नग्नावस्था में देखा था, मगर मरीना ने शायद उसका ये ही मतलब निकाला.

“ये बकवास है,” उसने लापरवाही से कहा. “मगर तुमने ये देखा कि प्राचीन काल से लाखों सीधे-सादे लोग किस बल पर जीते हैं.”

अपनी पोषाक को झटक कर वह उठी, कोने में गई, और सम्गीन ने वहाँ से उसका सवाल सुना:

“सेराफ़िमा नेखाएवा को पहचाना?”

“नेखाएवा?’ सम्गीन ने कब के भूले-बिसरे नाम को दुहराया. “वहाँ?

“अरे, हाँ! तैश में आ गई थी, सफ़ेद बालों वाली, तीखी नाक, कौए की तरह काँव-काँव कर रही थी: धर्मा, धर्मा!और शायद ज़रा भी नहीं जानती है कि धर्म क्या है, अयोध्या क्या है.”

ये बात...अजीब है,” सम्गीन ने कहा, और वह मेज़ के पास आते हुए लापरवाही से कहती रही:

“जैसा हर जगह होता है, हमारे यहाँ भी आकस्मिक और फ़ालतू लोग होते हैं. वो – ट्रान्सकाकेशस के प्रिगुनों (एक सम्प्रदाय – अनु.) में से है, और हमारे काम की नहीं है. पगली है. योग के बारे में किताब लिख रही है, ओरियन्टल रोज़ेनक्रेत्सेरों को शायद जानती है. अमीर है. शौहर – अमेरिकन, उसके जहाज़ हैं. हाँ – ये थी तुम्हारी फ़ीमोच्का! मर रही थी, मर रही थी और अचानक – अमीर हो गई...”

उसकी बात सुनते हुए, सम्गीन संतोष से सोच रहा था:

नहीं, कृत्रिम मिनरल वाटर के प्लान्ट में हो रहे नाच के प्रति ये संजीदा नहीं हो सकती! नहीं हो सकती!

और उसके प्रति एहसान की भावना जैसा कुछ महसूस करते हुए, सम्गीन मुस्कुराया, और सुराही से चम्मच द्वारा बर्फ का टुकड़ा बाहर निकालने की कोशिश करते हुए, सम्गीन को कनखियों से देखते हुए उसने पूछा:

“क्यों मुस्कुरा रहे हो?”

वह चुप हो गया, इस बात को दुहराने का फ़ैसला न करने के कारण, कि उस पर विश्वास नहीं करता है, और – ख़ुश है कि विश्वास नहीं करता.

“तुम इलाज से परे वाले अकलमंद हो, क्लीम सम्गीन, मेरे दोस्त!” उसने सोच में डूब कर, गिलास से जूस की चुस्की लेते हुए कहा. “तुम जैसे लोगों से – दुनिया बीमार है!”

गिलास को मेज़ पर रखकर, उसने हल्के से सम्गीन के माथे को हथेली से धक्का दिया; गर्म हथेली माथे की चमड़ी को प्यारी सी गर्माहट दे रही थी, सम्गीन ने हाथ पकड़ा और, पहचान होने के बाद से पहली बार उसे चूम लिया.

“लाइलाज हो,” हाथ को नीचे डालते हुए उसने दुहराया. “ विश्वास के पीछे दुखी हो, मगर – विश्वास करने से डरते हो.”

सम्गीन को ऐसा लगा, कि वह उसके घुटनों पे बैठना चाहती है, - वह कुर्सी में कसमसाया, तन कर बैठ गया, मगर तभी दुकान में घण्टी बजी. मरीना कमरे से बाहर गई और एक मिनट बाद हाथों में कई सारे ख़त लिए वापस लौट आई; उनमें से एक को, जो काफ़ी मोटा था, उसने हथेली में तौला और, लापरवाही से दीवान पर फेंककर बोली:

“क्रेटन रूसी में शुद्धलेखन की प्रैक्टिस कर रहा है. पैर तुड़वा बैठा, और सिर में चोट आई है. मुझे पटाने की कोशिश कर रहा है.”

“वो – क्या? पटा रहा है?” सम्गीन ने अचरज से पूछा और, फ़ौरन ये सोचकर, कि अचरज दिखाना – सही नहीं है, बोला:

“मुझे अचरज नहीं हुआ.”

“हाँ,” मरीना ने बिना आहट किए कालीन पर घूमते हुए कहा. “पटाते हैं. वो अकेला नहीं है. वे – पटाते हैं, और मैं – छुपती हूँ,” उसने उकताहट से कहा, ठहरते गई, और दबी ज़ुबान में पूछा:

“मुझे नग्नावस्था में तो देखा था ना?”

सम्गीन जवाब नहीं दे पाया, - सीना उभार कर, हाथों को नितम्बों पर फेरते हुए, वह हौले से, मगर गंभीरता से बोली:

“कैसे मर्द की ज़रूरत है मुझे, जिससे मैं उसके बच्चे पैदा करूँ? बस- इतना ही!”

इसके बाद, सिर को झटक कर, गहरी आवाज़ में, आवाज़ में हल्की से भर्राहट से बोली:

“अपने शौहर की, मैं मरते दम तक इसलिए शुक्रगुज़ार रहूँगी, कि उसने मुझसे प्यार भी किया, और दुलार किया, मुझे थपथपाया, मगर मेरी ख़ूबसूरती की - हिफ़ाज़त की.”

सम्गीन को लगा कि उसकी आँख़ें नम हैं, - उसने ये सोचकर सिर नीचे झुकाया:

बातें, गाँव की औरत की तरह करती है...और इसके बाद उसने महसूस किया, कि उसे चले जाना चाहिए, फ़ौरन, इसी समय, - अंतिम शब्दों से उसने उसके भीतर से सारे विचारों को सभी इच्छाओं को निचोड़ लिया था. एक मिनट बाद उसने जल्दी से बिदा ली, ये कहकर कि भूल गया था: उसके पास एक अर्जेन्ट केस है.

सनकीपन और आँसू’, गर्मी से तपी हुई सड़क पर जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए उसने सोचा.

कुछ विकृत सा, रहस्यमय.. मुझे उससे दूर रहना चाहिए...

कुछ दिनों के बाद उसे स्पष्ट रूप से पता चल गया: वह उससे दूर छिटक रहा है, क्योंकि ये औरत अधिकाधिक ज़ोर से उसे अपनी तरफ़ खींच रही है, और उसे उससे दूर चले जाना चाहिए, हो सकता है, शहर से बाहर चले जाना चाहिए.

और गर्मियों के मध्य में वह विदेश चला गया.               

                                                       

 

           

                              

 

          

   

                 

        

                 

     

           

         

     

                             

                     

         

                                

 

        

         

    

                                  

                    

                 

                                          

 

                                                        

 

         

                            

                                              

                                                                

                  

 

      

 

 

  

                             

                                                

  

                        

                                            

                           

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