A. M. Gorky
Translated by A, Charumati Ramdas
मरीना के शहर ने भी पिघलती बर्फ वाले मौसम के गर्माहट भरे दिन से उसका स्वागत
किया, हवा में कोई पनीली, खट्टी चीज़ घुल गई थी,
छतों
से मोटी-मोटी बूँदें अलसाहट से गिर रही थीं; उनमें से
हर बूँद, जैसे टेलिग्राफ़ के गीले तार पे गिरना चाहती थी, और इससे
झल्लाहट हो रही थी, जैसे कोई कफ़लिंक या बटन, जो बंद
नहीं होना चाहता, झल्लाहट पैदा करता है. वह होटल के उसी गंदे
कमरे में खिड़की के पास बैठा था, देख रहा था कि कैसे मटमैली हवा से होकर काँच
की बूँदें नीचे गिर रही हैं, और मरीना से हुई मुलाकात को याद कर रहा था. इस
मुलाकात में कोई बेहद कामकाजी और अपमानजनक बात थी.
“वापस आ गए?” उसने जैसे
अचरज से पूछा और फ़ौरन कामकाज़ी अंदाज़ में बोली कि उसे फ़ौरन क्वार्टर ढूँढ़ना चाहिए
और उसे एक क्वार्टर के बारे में जानकारी है, जो शायद, उसके लिए
ठीक रहेगा.
“करीब दो बजे मैं
तुम्हें लेने आऊँगी, देख लेंगे, ठीक है?”
वह इतने कामकाजी
अंदाज़ में उससे मिली थी, जैसे मालकिन अपने नौकर से मिलती है, और दुकान
के पीछे वाले कमरे में उसे नहीं बुलाया.
अब ढाई बज चुके हैं, और उसका
पता नहीं है. मगर तभी नौकर ने दरवाज़ा थोड़ा सा खोलकर कहा:
“आपको मरीना
पेत्रोव्ना ज़ोतोवा गाड़ी में बुला रही हैं.”
सम्गीन ने ग़ौर किया
कि देर से आने के लिए उसने माफ़ी भी नहीं माँगी थी.
“मॉस्को से रिश्ता
पूरी तरह ख़त्म कर दिया?”
“हाँ.”
“ये बढ़िया है.”
कोहरे में
धीरे-धीरे और सावधानी से जा रहे थे, चार खिड़कियों और मुख्य द्वार वाले एक मंज़िला
मकान के पास रुके; नई लोहे की कैनोपी के नीचे, खिड़कियों
के बीच गोलाकार फ्रेम्स में प्लास्टर ऑफ पैरिस के अजीब तरह के पंछी लगे हुए थे, और पूरा
दर्शनीय भाग फूहड़, मिट्टी से बने फूलों के हारों से सजा था. आँगन
में आए, वहाँ घर से लगा हुआ लकड़ी का आऊट हाऊस था, तीन
खिड़कियों और एटिक वाला; आँगन के भीतर, जो बर्फ़ के
ढेरों से अटा पड़ा था, बगीचे के बर्फ़ के पेड़ खड़े थे.
कत्थई ड्रेस में, चश्मे
वाली एक छोटी सी बुढ़िया ने आऊट-हाऊस का दरवाज़ा खोला.
“नमस्ते, फ़ेलित्साता
नाज़ारोव्ना! देखो – पेइंग गेस्ट को लाई हूँ. वलेंतीन कहाँ है?” मरीना ज़ोर से
चिल्लाई; बुढ़िया ने चुपचाप और रहस्यमय तरीके से भूरी ऊँगली से
ऊपर की ओर इशारा कर दिया.
“बुलाओ. बहरी है,” सम्गीन को
एक छोटे, बेहद रोशनी भरे कमरे में ले जाते हुए, दबी आवाज़
में मरीना ने समझाया. ऐसे तीन कमरे थे, और मरीना ने कहा, कि उनमें
से एक ड्राइंग रूम है, दूसरा – स्टडी रूम, उसके पीछे
- बेड रूम.
“तुम देख रहे हो कि
खिड़कियाँ बाग में खुलती हैं. यहाँ एक डॉक्टर रहता था, अब रहेगा
एडवोकेट.”
‘पहले ही तय
कर लिया है’, सम्गीन ने सोचा. उसे घर का चेहरा ही पसंद नहीं आया, खूब ज़्यादा
रोशनी वाले कमरे पसंद नहीं आए, मरीना भी गुस्सा दिला रही थी. और उसे बेहद
बुरा लगा, जब साण्ड की तरह सिर झुकाए, चौड़ा बेल्ट
बांधे, गरम कोट
में, एक
भारी-भरकम आदमी भागता हुआ आया; उसने जूते पहने थे और सिर से पाँव तक परों और
घास-मिट्टी में सना था. उसने मरीना का हाथ पकड़ा, उसकी
हथेलियों में अपना झबरा सिर छुपा लिया और, उसकी
हथेलियों को चूमते हुए घुरघुराने लगा.
“बिज़बेदोव, वलेंतीन
वासिल्येविच,” मरीना ने ग़ज़ब के हौलेपन से उसे दूर हटाते हुए नाम
बताया.
बिज़बेदोव सीधा हो
गया,
और
सम्गीन ने अपने सामने एक चौड़े माथे वाला चेहरा देखा, अप्रियता
से खुले आँखों के सफ़ेद ढेले और छोटी-छोटी, बेहद नीले
बर्फ़ के टुकड़ों जैसी पुतलियाँ. मरीना ने प्रभावशाली ढंग से कहा, कि
बिज़बेदोव फ़र्नीचर दे सकता है, खाना भी उसीके यहाँ खाया जा सकता है, - वह ज़्यादा
नहीं लेगा.
“मुफ़त में!”
लेरिंजाइटिस से पीड़ित व्यक्ति जैसी आवाज़ में बिज़बेदोव ने कहा. मुफ़त में – चाहते
हैं?”
“किसलिए?” सम्गीन ने
रुखाई से पूछा, मगर उसने पुतलियाँ चमकाकर हाथ फ़ैलाए और जवाब
दिया:
“ठीक है. मौलिकता
की ख़ातिर.”
“बेवकूफ़ी मत करो, वलेंतीन,” मरीना ने
सख़्ती से हिदायत दी और कुछ मिनट बाद बिज़बेदोव से कहा:
“मैं कल मीशूत्का
को तुम्हारे पास भेजूँगी, और तुम उसके साथ सारा इंतज़ाम कर दो, - दो दिन
काफ़ी हैं?”
बिज़बेदोव ने फिर से
उसका हाथ पकड़ लिया, चूमा और भर्राया:
“कल शाम तक कर
दूँगा...”
सम्गीन का हाथ उसने
इतने कस के पकड़ा, कि दर्द के मारे क्लीम पैर पटकने लगा. मरीना
उसे अपने साथ दुकान ले गई, - वहाँ, हमेशा की
तरह,
समोवार
उबल रहा था और, हमेशा ही की तरह, आरामदेह था, जैसा
बिस्तर में होता है, गहरी, मगर हल्की
नींद से पहले.
“वलेंतीन के साथ -
तुम्हें अटपटापन महसूस हो रहा था?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा. “वो – कुछ सनकी है, मगर
तुम्हें तंग नहीं करेगा. उसकी एक कमज़ोरी है – कबूतर. कबूतरों के मारे उसने अपनी
बीबी को खो दिया, - पेइंग गेस्ट, डॉक्टर, के साथ भाग
गई. कुछ – अभागा है, कुछ नाटक करता है, - उसकी मंडली
में बीबियाँ बिरले ही शौहर को छोड़ती हैं, और स्कैण्डल इन्सान पर बेहद असर डालता है.”
कुछ देर चुप रहने
के बाद उसने क्लीम से कहा कि कल ही उसके एडवोकेट से केसेस ले ले, और इसके
बाद उसके बिल्कुल करीब आ गई, झुकी, उसके चेहरे
को अपनी गर्म हथेलियों में लिया और, उसकी आँखों में देखते हुए, हौले से, बड़े प्यार
से,
मगर
अधिकारपूर्वक पूछा:
“तो – फिर? मुँह क्यों बनाया है? दर्द हो
रहा है? चिल्लाओ, - आराम मिलेगा!”
उसकी मज़बूत
हथेलियों से चेहरा छुड़ाने को जी नहीं चाह रहा था, हालाँकि गर्दन
बाहर निकाले बैठने में असुविधा हो रही थी, और उसकी
आँखों की चमक असाधारण रूप से परेशान कर रही थी. आज तक किसी भी औरत ने उससे ऐसा
नहीं किया था, और उसे याद नहीं आया, कि कभी वारवरा
ने उसकी तरफ़ ऐसी उत्तेजक नज़र से देखा हो.
उसने उसके चेहरे से
हाथ हटा लिए, बगल में बैठ गई और, अपने बालों
को ठीक करके, दुहराया:
“अरे, बोलो भी!
आख़िर – अपने दिल की बात बताना चाहते हो, - ख़ामोश क्यों हो?”
अपने ‘दिल की बात’ बताने की
उसकी ज़रा सी भी इच्छा नहीं थी, बल्कि वह सोच भी रहा था, कि अगर
चाहे भी, तो भी इस तरह नहीं कह सकता, कि कोई औरत
वो सब समझ जाए, जो वह अभी तक नहीं समझ पाया था. और, अपनी
परेशानी को व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट से छुपाकर, उसने पूछा:
“क्या तुम ये चाहती
हो,
कि
मैं ‘कन्फ़ेस’ करूँ? अजीब
ख़्वाहिश है. तुम्हें क्या ज़रूरत है इसकी?”
उसने कंधे सिकोड़
लिए,
मगर
मरीना ने उसके कंधे पर हाथ रखकर, हौले से सांस लेकर कहा:
“नहीं चाहते – कोई
ज़रूरत नहीं. मगर हम, औरतें, कभी-कभी
कंधों से बोझ उतारने में मदद करती हैं...”
“जिससे कि नया बोझ
रख दें,” उसने पुश्ती जोड़ी, मगर मरीना
उसकी आँखों में देखते हुए, मुस्कुराकर चहकी:
“तुमसे शादी करने
का – मेरा कोई इरादा नहीं है, रखैल – नहीं बनना चाहती.”
उसकी नर्म, गहरी आवाज़
बड़ी आकर्षक थी, ख़ूबसूरत चेहरे की मुस्कुराहट बहुत प्यारी लग
रही थी, और सुनहरी आँखों में गर्माहट भरी चमक थी.
“अपने आप के बारे
में बताना – मुश्किल है,” सम्गीन ने आगाह किया.
“मगर – हम किस बारे
में बात करते हैं?” उसने पूछा. “क्योंकि मौसम के बारे में कहते
हुए – अपने ही बारे में बताते हैं.”
“तुम बेहद सरल
बनाकर देखती हो...”
“क्या वाकई?”
सम्गीन ने कनखियों
से उसके चेहरे को देखा और सावधानी से शुरूआत की:
“बात की जा सकती है
सिर्फ तथ्यों के, एपिसोड्स के बारे में, मगर वो –
फिर भी ‘मैं’ नहीं हैं,” उसने धीमी
आवाज़ में, सावधानी से शुरूआत की. “ज़िंदगी – एक अंतहीन श्रृंखला
है – बेवकूफ़ी भरे, ओछे, और फिर भी आम तौर से नाटकीय एपिसोड्स की, - वे
ज़बर्दस्ती घुस आते हैं, परेशान करते हैं, स्मृति पर
अनावश्यक बोझ डाल कर उसे बोझिल बना देते हैं, और इन्सान, उनके बोझ
तले दबा हुआ, अपने आप को, अपने अस्तित्व को महसूस करना बंद कर देता है, ज़िंदगी को
दर्द समझने लगता है...”
मरीना चुपचाप उसका कंधा
सहलाती रही, मगर अब वह कहते हुए उसकी तरफ़ देख ही नहीं रहा था:
“मैं सोचता हूँ, कि अधिकांश
बुद्धिजीवी ऐसा ही महसूस करते हैं, मैं, ज़ाहिर है, अपने आप को
टिपिकल बुद्धिजीवी मानता हूँ, मगर – अपने आप पर ज़बर्दस्ती करने योग्य नहीं
हूँ. मैं अपने आप को सोशलिज़्म की सुरक्षात्मक शक्ति में विश्वास करने के लिए मजबूर
नहीं कर सकता और ....वगैरह, वगैरह. महत्वाकांक्षी इन्सान न होते हुए, मैं अपनी
आंतरिक स्वतंत्रता का सम्मान करता हूँ...”
‘आंतरिक
स्वतंत्रता’ – इन शब्दों को तौलते हुए वह कुछ पल ख़ामोश रहा,फिर उठा और
कमरे के एक कोने से दूसरे कोने तक चक्कर लगाते हुए, जल्दी-जल्दी
आगे कहने लगा;
“इसलिए मैं – अजनबी
हूँ,
उन
लोगों के बीच जो अपने आप को किसी पार्टी या ग्रुप में शामिल कर लेते हैं, - मतलब - शामिल
हो जाते हैं, उसमें बंद हो जाते हैं...”
वह महसूस कर रहा था, कि असाधारण
और यहाँ तक कि अप्रिय सहजता से बोल रहा है, मानो किसी
ऐसी किताब को याद कर रहा हो, जिसे कई बार पढ़ चुका हो, और जिससे
अब दिल भर गया हो.
“अंत में – सब कुछ
वाक्य समूहों की किसी न किसी प्रणाली की ओर ही तो ले जाता है, मगर उनमें
से एक में भी तथ्यों का समावेश नहीं होता. और – अपने बारे में सिवाय इसके क्या कहा
जा सकता है: ‘मैंने ये देखा, वो देखा’?”
कमरे के बीच में
ठहरकर,
अपनी
सिगरेट के धुँए की ओर देखते हुए, उसने अपने सामने कई एपिसोड्स को गुज़रने दिया:
बोरिस वराव्का की मृत्यु, मकारोव की आत्महत्या करने की कोशिश, वो किसान
जो ‘पूरी
दुनिया’ के साथ घण्टा चढ़ा रहे थे, औरों को
देखा,
जिन्होंने
डबल रोटी की दुकान का ताला तोड़ दिया था, नौ जनवरी का दिन, मॉस्को की
बेरीकैड्स – सब कुछ जो वह जी चुका था, गवर्नर की हत्या तक. और अचानक उसने महसूस
किया: इसमें कोई दिलासा देने वाली बात तो है, कि
याददाश्त इन सभी तथ्यों को समय की अत्यंत छोटी इकाई में संजो लेती है, - दिलासा
देने वाली और जैसे व्यंग्यपूर्ण भी. अनचाहे ही उसने घड़ी निकाली, मगर, डायल की ओर
बिना देखे फ़ौरन छुपा दी. और, ये ग़ौर करके कि मरीना उसकी ओर अपेक्षा भरी नज़र
से देख रही है, वह यंत्रवत्, अनिच्छा से
अपनी बात कहता रहा:
“कुतूज़ोव जैसे
लोगों से मैं सम्मानपूर्वक पेश आता हूँ...जैसे कि, मिसाल के
तौर पर, सर्जनों से भी. मगर न तो मेरी हड्डियाँ टूटी हैं, ना ही कोई
ट्यूमर वगैरह है...”
वह फिर से मुलायम, गर्माहट
भरे धुँधलके में टहल रहा था और रात की भयावहता को याद करके, अपने अनुभव
को अपने ‘डुप्लिकेट्स’ में बाँटने
लगा,
- उन्होंने
जैसे फिर से उसे घेर लिया था. उनमें से एक देख रहा था कि कैसे घुड़सवार तलवार से
तूरोबोएव को मारने की कोशिश कर रहा है, मगर एकदम दूसरा आदमी निकानोवा का आशिक था; तीसरा, जो पहले
दोनों से बिल्कुल नहीं मिलता था, ग़ौर से और प्रसन्नता से इतिहासकार कज़्लोव के
भाषण सुन रहा था. और भी कई डुप्लिकेट्स थे, और वे सब, इस समय –
सम्गीन के लिए एक जैसे अजनबी थे. उन्हें बलात्कारी कहा जा सकता था.
“भयानक’, मरीना को
चश्मे के ऊपर से देखते हुए वह सोच रहा था. ‘मैं इससे
इतना खुलकर क्यों बोल रहा हूँ? मैं उसे नहीं समझ रहा हूँ, उसके बारे
में कुछ अप्रिय सा महसूस कर रहा हूँ. आख़िर किसलिए?’ वह ख़ामोश
हो गया, और मरीना ने अपनी ऊँची छाती पर सलीब का निशान बनाया
और धीरे से कहा:
“स्तेपान के बारे
में तुम्हारा अनुमान सही नहीं है, मैं उसे तुमसे बेहतर जानती हूँ. इसलिए नहीं, क्योंकि
उसके साथ रह चुकी हूँ, बल्कि...”
मगर उसने वाक्य
पूरा नहीं किया, हो सकता है, उसे सही
शब्द न मिले हों और नए अंदाज़ में बोली:
“और तुमने, शायद खूब
ज़्यादा पढ़ लिया है, ख़यालों के साँचों में ढल गए हो...”
“पढ़ता तो मैं
ज़्यादा नहीं हूँ.”
“एक ही जगह पर जम
गए हो. दूसरे कोने में जाना चाहिए...”
“कोने में
किसलिए?”
“सीधे-सादे लोगों
के साथ जीने के लिए.”
“ये तुम – मज़दूरों
के,
किसानों
के बारे में कह रही हो?”
उसके सवाल पर ध्यान
न देकर, उसने पूछा:
“बीबी के साथ –
पूरी तरह रिश्ता ख़तम कर लिया?”
“हाँ.”
“चलो, ये भी
अच्छा है! मतलब, फ़िलहाल, आज़ाद हो.
‘मुझसे ये
इस तरह बात कर रही है, जैसे...बड़ी बहन हो’.
होठों पर जीभ फ़ेरते
हुए,
आँखें
सिकोड़कर, मरीना छत की तरफ़ देख रही थी; वह उसकी ओर
झुका,
कुतूज़ोव
के बारे में पूछने के लिए, मगर वह सिहर गई, बोली:
“तो, चलो, कल से ही
काम शुरू कर देते हैं! मेरे सॉलिसिटर के पास जाओ, उससे बात
करो,
मैं
उससे कह चुकी हूँ...”
उसने ये नर्माई से
ही कहा था, मगर इस तरह, कि सम्गीन समझ गया: अब जाना चाहिए. और वह उसके
मज़बूत,
बेहद
गर्म हाथ से हाथ मिलाकर चुपचाप चला गया.
‘चालाक औरत
है. इसका पर्दाफ़ाश करना आसान नहीं है. मगर – क्या पर्दाफ़ाश करना चाहिए?’ उसने पूछा.
इस औरत के साथ संबंध
स्पष्ट नहीं हो पा रहा था. उसका अप्रिय आत्मविश्वास और हुकुमशाही गुस्सा दिला रहे
थे,
इस
बात से भी चिड़चिड़ाहट हो रही थी, कि उसने खुल पर अपने बारे में कहने पर मजबूर
किया था. ये आख़िरी बात ख़ास तौर से परेशान कर रही थी. सम्गीन जानता था, कि आज तक
उसने किसी से भी, कभी भी इस तरह बात नहीं की थी, जैसे इस
औरत से की थी.
दूसरे दिन, सुबह, वह बड़े, उजले कैबिन
में बैठा था, जिसे काले फ़र्नीचर से सजाया गया था; बड़ी-बड़ी
अलमारियों में किताबों की सुनहरी जिल्दें जगमगा रही थीं, क्लीम के
और कैबिन के मालिक के बीच में – बड़ी मेज़ थी - मोटी और फूली हुई टाँगों वाली, जैसे
पियानो की टाँगें होती हैं. मालिक – काली भँवों वाला, गंजा, उसका गोल, पीला चेहरा
फूला-फूला था, जैसे तैरना सीखने वाला गुब्बारा हो, चेहरा
समाप्त हो रहा था नुकीली, काली-आधी सफ़ेद दाढ़ी से, - आँखों के
निलाई लिए ढेलों में काली पुतलियाँ प्रखरता से चमक रही थीं. उसकी आवाज़ खनखनाती हुई, ज़िद्दी थी, शब्दों का
रूसी उच्चारण सही नहीं था और शब्द एक दूसरे से कस के जुड़े हुए थे.
“मेरी क्लाएंट,” वह
सम्मानपूर्वक कहता है, क्लाएंट का नाम लिए बिना. “ इसे ध्यान में
रखते हुए...इस तथ्य के आधार पर...ऊपर निर्दिष्ट के आधार पर...” वो जैसे जानबूझकर
किसी कानूनी अपील के वाक्यों का इस्तेमाल करता था, उसके इस
सम्मान में मोटे होठों की थरथराहट और पैनी आँखों की व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट भी
शामिल थी. दाएँ हाथ को थोड़ा सा हिलाकर, जैसे वह किसी चीज़ को अपने से दूर धकेल रहा था.
उसके चेहरे के हाव भावों ने सम्गीन को ये सोचने पर मजबूर कर दिया, कि ये
इन्सान मरीना द्वारा अपमानित किया गया है और, लगता है, कि ये उससे
नफ़रत करता है, मगर – डरता भी है. उससे अपने रिश्ते को वह उस
पर,
याने
सम्गीन पर भी थोप रहा था.
“सह-योगी,’ उसने कहा, जैसे इस
शब्द के बीच अर्धविराम लगा रहा हो.
“आगे: व्यापारी
पतापोव के रिश्तेदारों के दावे के बारे में. पतापोव को धार्मिक सम्प्रदाय ‘ख्लीस्त’ से संबंधित
होने के कारण निर्वासित कर दिया गया था. निर्वासित की जायदाद का कुछ भाग ज़ब्त करके
सरकारी ख़ज़ाने में डाल दिया गया. मेरी सम्माननीय क्लाएंट का उस पर अधिकार का दावा
पर्याप्त सबूतों पर आधारित नहीं है, मगर उसने एक और दस्तावेज़ प्रस्तुत करने का
वादा किया है. यहाँ, मुझे ऐसा लगता है, कि क्लाएंट
को जायदाद में उतनी दिलचस्पी नहीं है, बल्कि, उसे मानवीय
हितों में ज़्यादा दिलचस्पी है, और, अगर, मैं ग़लत नहीं हूँ, तो उसका
लक्ष्य – इस मामले पर पुनर्विचार का आदेश प्राप्त करना है. ख़ैर, आप ख़ुद ही
देखेंगे...”
मानवीय हितों के
प्रति मरीना की दिलचस्पी के बारे में उसने स्पष्ट अफ़सोस के साथ कहा था, और आम तौर
से, मरीना के
कानूनी मुकदमों की विशेषताओं के बारे में उसका वर्णन अधिकाधिक व्यंग्यात्मक होता
जा रहा था, और सम्गीन को महसूस हो गया था, कि सहयोगी
फ़ोल्त्स उसे मुकदमों की नहीं, बल्कि अपनी सम्माननीय क्लाएंट की जानकारी दे
रहा है. काले कैबिन में अप्रिय गंध थी, जिससे छींकने की इच्छा हो रही थी; खिड़कियों
के बाहर हवा शोर मचा रही थी, चिंघाड़ रही थी, बर्फ के
बादल लिए जा रही थी. करीब दो घण्टे बैठने के बाद, सम्गीन
लगभग प्रसन्नता से सड़क पर सफ़ेद तूफ़ान में डूब गया, - वो धक्के
खा रहा था, डगमगा रहा था, सफ़ेद
बवण्डर में से काले साये निकल कर उसकी ओर उछल रहे थे, उसके आगे
निकल रहे थे; वह चल रहा था और महसूस कर रहा था: हाँ, ज़िंदगी का
नया अध्याय शुरू हो रहा है. मरीना से सावधान रहना होगा. और अपने आप पर संयम रखना
ज़रूरी है. ‘अपने आप को स्थिर निष्कर्षों के केंद्र में रखो’, उसे
ब्रागिन का वाक्य याद आया और अपनी याददाश्त के कलुषित होने पर गुस्सा भी आया.
कुछ दिनों के बाद, वह बिज़बेदोव
के साथ अपने क्वार्टर के कमरों में घूम रहा था. कमरा पुराने, मज़बूत
फ़र्नीचर से सजाया गया था, जिसे शायद, किसी
जागीरदार की हवेली से ख़रीदा गया था. वलेंतीन बिज़बेदोव, क्लीम को
ये दौलत सौंपते हुए, हिकारत से भर्राया:
“ अगर – कम लगे, तो शेड में
चले जाइए, वहाँ हर तरह का कबाड़ पड़ा है! किताबों की शेल्फ है, कई सारे क्लवेसिन्स
हैं (पियानो की तरह का एक बाजा – अनु.). फूल चाहिए? मेरे
आऊट-हाउस में उनकी भरमार है, धरती की खुशबू आती है, जैसे
कब्रिस्तान में होती है.
वह चीनी मिट्टी का
जर्मन पाइप पी रहा था, धुँआ उसकी चौड़ी नाक के नथुनों से, मुँह से
निकल रहा था, पाइप सीने पर लटक रहा था, फ़ैशनेबुल
जैकेट की लेपल्स के बीच, और वहाँ से भी धुँआ आ रहा था. मगर बिज़बेदोव
जर्मन जैसा नहीं था, बल्कि किसी अचानक अमीर हो गए ठेला चलाने वाले
रूसी जैसा था, जिसे अभी तक फ़ैशनेबुल सूट पहनने की आदत नहीं
हुई है. झबरा, लाल फूले चेहरे वाला, वो क्लीम
की बगल में चल रहा था, आँखें फ़ाड़े, बिना किसी
लिहाज़ के सीधे उसके चेहरे की ओर देखते हुए, - उसके जूते
बुरी तरह से चरमरा रहे थे, वो खाँस रहा था, सूँ-सूँ कर
रहा था, धुँआ छोड़ रहा था, सम्गीन को
कोहनी से धक्का दे रहा था और उसने अचानक पूछा:
“चुटकुला पढ़ा है?”
“कौन सा?”
“त्सार के पास
इवानोवो-वज़्नेसेन्स्क से विश्वासपात्र मज़दूरों का एक डेप्युटेशन आया, उसने उनसे सीधे-सीधे
ये कहा:
‘मेरा
साम्राज्य वैसा ही रहेगा, जैसा वह प्राचीन समय में था’. उसकी अक्ल
क्या – घास चरने गई है?”
“हाँ, अजीब बात
है,”
सम्गीन
ने कहा. बिज़बेदोव ने कस के उसकी कोहनी पकड़ ली.
“अच्छा, आराम से
रहिए!”
और वह चला गया, धुँआ छोड़ते
हुए,
चरमराते
हुए,
मगर, दरवाज़ा बंद
करने के बाद, फ़ौरन उसे खोल दिया और चिचियाते हुए बोला;
“त्सार तो मॉस्को
जा रहा है!”
घने धुँए को हाथों
से भगाते हुए, सम्गीन ने अपने आप से पूछा:
“कहीं इस प्राणी को
भी तो राजनीति में दिलचस्पी नहीं है?’
सभी असाधारण लोगों
की तरह बिज़बेदोव में भी सम्गीन को दिलचस्पी हुई, - इस बार
किसी अपरिभाषित, मगर अप्रिय भावना ने इस दिलचस्पी को बढ़ा दिया
था. दोपहर का खाना सम्गीन ने बिज़बेदोव के आउट हाऊस के कमरे में खाया, जो अलग अलग
तरह के पौधों और विदेशी भाषाओं से अनुवादित किताबों की अलमारियों से खचाखच भरा था.:
पन्तेलेयेव के प्रकाशन वाली विदेशी लेखकों के अनुवादों की 144 किताबें, माइन-रीड, ब्रेम, गुस्ताफ़
एमार,
कूपेर, डिकन्स और ए.
रेक्ल्यू की ‘दुनिया का भूगोल’, - ज़्यादातर
किताबें बिना जिल्द की थीं, फ़टे हाल थीं, किसी तरह
से शेल्फ़ों में ठुँसी हुई थीं.
‘स्कूली
बच्चे की लाइब्रेरी’, सम्गीन ने मन ही मन कहा. बिज़बेदोव ने फ़ौरन
इसका समर्थन कर दिया.
“स्कूल के
ज़माने से इकट्ठा करता था,” उसने किताबों की तरफ़ गैरदोस्ताना ढंग से देखते
हुए कहा. “बकवास है सब. इन्हीं की वजह से मैं स्कूल भी ख़तम नहीं कर पाया.”
उसके चारों ओर की
हर चीज़ फ़ूहड़ और गंदी थी – उसी तरह की, जैसे वह ख़ुद था, बदन पर
हमेशा पंछियों की बीट, झबरे सिर पर और कपड़ों पर हमेशा पंख गिरे हुए.
खाता ख़ूब था, जल्दी-जल्दी खाता था, खाते समय
त्यौरियाँ चढ़ाए रहता, जैसे खाने में ख़ूब नमक पड़ा हो, या वो
खट्टा हो या तेज़ मिर्च वाला हो, हालाँकि बहरी फ़ेलित्साता बहुत लजीज़ खाना बनाती
थी. भरपेट खाने के बाद बिज़बेदोव सम्गीन के मुँह की तरफ़ देखता और अजीब-अजीब ख़बरें
सुनाता, - लगता था, कि उसने ख़ुद ही उन्हें सोचा है.
“पीटरबुर्ग के
पादरी सेर्गेइ ने लेफ़्टिनेन्ट स्मिथ के लिए मेमोरियल सर्विस की, थियोलॉजिकल
सोसाइटी के स्टूडेन्ट्स ने मजबूर किया: सर्विस करो! और – उसने की.”
“ये आपको कहाँ से
पता चला?”
“मूरोम्स्काया, लीदिया
तिमोफ़ेयेव्ना ने बताया. वह – जानती है, उसके पीटर्सबुर्ग में परिचित हैं.”
निचला होंठ दबाकर, वह सवालिया
अंदाज़ में, जैसे कोई उम्मीद कर रहा हो, कुछ देर
चुप रहा, बाद में इस तरह बोला जैसे उसने गुनाह किया हो:
“मैं उसके जंगलों
की देखभाल करता हूँ. आप उसे जानते हैं?”
“हाँ.”
“ बोरिंग है. आपको
बुरा तो नहीं ना लग रहा है, कि मैं इस तरह बात कर रहा हूँ?”
“प्लीज़, कहते
रहिए.”
“औरत नहीं, बल्कि –
सिटी कौन्सिल का अनिवार्य ऑर्डिनेन्स है. क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि लोग
दिन-पर-दिन बोरिंग होते जा रहे हैं?”
“इन्सान – आम तौर
से अप्रसन्न प्राणी है,” सम्गीन ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा, बिज़बेदोव
को लगा:
“ये सही है!”
उसके राजनैतिक
समाचारों और शहर की छोटी-मोटी अफ़वाहों से सम्गीन की भूख ख़त्म हो जाती. मगर उसे बड़ी
जल्दी यकीन हो गया, कि ये आदमी राजनीति के बारे में बस
शिष्टाचारवश बात करता है, ये मानकर कि मेहमान का दिल बहलाना उसका फ़र्ज़
है. एक बार डिनर के समय उसने कहा:
“मॉस्को में
क्रांतिकारियों ने बैंक पर हमला कर दिया, करीब दस लाख लूट लिए.” और, मुँह
फ़ुलाते हुए, चिड़चिड़ाते हुए, भर्राया:
“बिल्कुल जी भर गया
है! सब लोग राजनीति के बारे में इस तरह बात करते हैं, जैसे
कार्निवाल में पॅनकेक्स के बारे में बता रहे हों.”
सम्गीन ने अविश्वास
स उसकी ओर देखा और पाया कि वह अपमानित भाव से होंठ फुलाए, पाइप में
तम्बाकू ठूँस रहा है. इस तरह की दो-तीन शिकायतों के बाद सम्गीन ने फ़ैसला कर लिया
कि घर का मालिक – बेवकूफ़ है और ख़ुद भी इस बात को जानता है, मगर अपनी
बेवकूफ़ी पे ज़रा भी शर्मिन्दा नहीं है, बल्कि जैसे उस पर गर्व करता है.
‘मूर्ख –
रूसी में, ठीक-ठाक; बेवकूफ़ी में कुछ ढीठ, मगर बदमाश
नहीं,
बल्कि
नेक दिल है’, सम्गीन ने उसकी परिभाषा बना ली और लगभग हर रोज़ उसे
यकीन होता जाता, कि उसकी परिभाषा सही है.
एक बार डिनर में
बिज़बेदोव ने भरपेट स्वादिष्ट खाना खाया, जेनिपर बेरीज़ मिली वोद्का के कई गिलास पी गया, लाल हो गया, जर्मन पाइप
से धुँआ उड़ाने लगा और अचानक कटुता से चिल्लाया:
“क्या बकवास टाइम
है,
शैतान
ले जाए!” अपने कानों पर थप्पड़ जमाकर, उसने अपना झबरा सिर हिलाया. सम्गीन आराम से
राजनीतिक ख़बर का इंतज़ार करने लगा, मगर बिज़बेदोव गुस्से से कहने लगा:
“मार्च भी आ गया, और – क्या
हो रहा है, आँ?”
“आप किस बारे में
कह रहे हैं?”
“हाँ – मौसम के
बारे में! मेरे कबूतर मुटिया गए हैं,” छत की ओर गाजर के रंग की ऊँगली से इशारा करते
हुए वह अफ़सोस से भर्राया. “शहर का बेहतरीन शिकार है, दो बार
इनाम मिला है, मॉस्कोवालों की छुट्टी कर दी. यहाँ एक कमीना
है,
ब्लिनोव, ढाबा चलाता
है,
मेरा
दुश्मन है, उसने मेरे चिरूबिक को मार गिराया, पूरे रूस
का बेहतरीन कलाबाज़ था, - वो छर्रा, उसी
हत्यारे के, माथे पे लगेगा...”
सम्गीन ने देखा कि
मकान मालिक के चेहरे पे ख़ून उतर आया है, आँखों के ढेले बाहर निकलने को हो रहे हैं, लाल
ऊँगलियाँ तैश में नैपकिन को मसल रही हैं, और उसके दिल में ख़याल आया कि ये सब शराबी के
हंगामे से ख़त्म होगा, पैरेलिसिस भी हो सकता है. दिलचस्पी दिखाने का
नाटक करते हुए उसने पूछा:
“क्या ये बेहद
दिलचस्प शिकार है?”
कोई गाली देते-देते
बिज़बेदोव का दम घुटने लगा, थरथराते हाथ से उसने गिलास में क्वास (फ़लों
का पेय – अनु.) डाला, दो घूँट में गिलास खाली कर दिया और –लम्बी
डकार ली:
“आप समझ नहीं
पाएँगे – कित्ता!”
वो उछल कर मेज़ से
उठ गया, जैसे कहीं जाने वाला हो, फूलों वाली
खिड़की के पास रुका, नैपकिन से चेहरे का पसीना पोंछा, उसे फ़र्श
पे फेंक दिया और, हाथ नचाते हुए, भर्राया:
“अद्भुत!”
फैले हुए हाथों को
इस तरह हिलाते हुए, मानो वे पंख हों, आँखें बंद
करके,
सिर
घुमाते हुए, वह बुदबुदाया:
“समझ रहे हैं :
आसमान! गहराई, नीली-नीली एकदम साफ़, स्पष्टता!
और – सूरज! और ये रहा मैं – तो, क्या है ये ‘मैं’? क्षुद्र, बदमाश! और –
छोड़ता हूँ कबूतरों को. उड़ते हैं, गोल-गोल घेरों में, ऊपर, और ऊपर, नीले में
सफ़ेद. और मेरी दयनीय रूह उनके पीछे पीछे उड़ती है – समझ रहे हैं? रूह! और वे
– वहाँ, मुश्किल से उन्हें देखता हूँ. वहाँ – तनाव है...जैसे
बेहोशी छा रही हो. और – डर: और, अगर, अचानक वे वापस नहीं आए तो? मतलब – समझ
रहे हैं ना – जी चाहता है कि वापस न लौटें, समझ रहे
हैं?”
बिज़बेदोव का बड़ा, थुलथुल बदन
काँपने लगा, जैसे वह बिना आवाज़ किए हँस रहा हो, चेहरा लटक
गया,
पसीने
में नहा गया, और उसकी आधी-नशीली आँखों में सम्गीन को साफ़-साफ़ डर और
ख़ुशी दिखाई दिए. बिज़बेदोव के चेहरे पे हास्यास्पद और बेवकूफ़ी के भाव देखकर उसे उस
पर दया आई. हाथ हिलाते-हिलाते थक कर, गहरी सांस लेते हुए और भर्राते हुए, बिज़बेदोव
कुर्सी पे ढ़ह गया और, गिलास में क्वास उँडेलते हुए, बड़बड़ाया:
“महान पल! और -
ईमानदारी का काम, किसी को परेशानी नहीं होती, किसी पर
निर्भर नहीं करता, - शैतान ले जाए, सारी
बकवास! प्लीज़ – पिएँगे!”
उसके साथ जाम
टकराते हुए सम्गीन सोच रहा था:
‘ये वो घटना
है,
जब
बेवकूफ़ी कविता की ऊँचाई को छू लेती है’. बिज़बेदोव ने जाम की वोद्का को क्वास वाले
गिलास में डाला और बोलता रहा. वह और ज़्यादा बदहवास हो गया, उसने जैकेट
फेंक दिया, नीली, सैटिन की कमीज़ का कॉलर ढीला कर दिया, नैपकिन
हिलाता रहा, और उसके भूरे बालों की लटें उसके सिर पे मज़ेदार ढंग
से हिल रही थीं. अच्छा लग रहा था, कि बिज़बेदोव को इतनी आसानी से समझा जा सकता है, उसके प्रति
किसी सावधानी की ज़रूरत नहीं है, पूरा – खुली किताब जैसा है और किसी भी बारे
में पूछता नहीं है, जैसा उसकी बेहद दिलचस्प आण्टी करती है, जिसे, वह शायद, ज़्यादा
पसंद नहीं करता है. इस शाम को सम्गीन ने, जाते हुए, बिज़बेदोव
का हाथ कस कर हिलाया और ये भी सोचा कि उसने इस आदमी से ज़रूरत से ज़्यादा संतुलित
बर्ताव व्यवहार किया है. उससे कुछ कहना चाहिए था, सहानुभूति
दिखाना चाहिए थी. बेशक, उसकी बड़बड़ाहट को प्रोत्साहित करने के लिए
नहीं. अकेला और, ज़ाहिर है, अभागा
इन्सान. उसकी बड़बड़ाहट किसी भी चीज़ के लिए मजबूर नहीं करती है.मगर बिज़बेदोव को न तो
किसी सहानुभूति की, और न ही प्रोत्साहन की ज़रूरत थी, करीब-करीब
हर शाम को वह ख़ुशी-ख़ुशी, बिना थके शहर के बारे में, अपने बारे
में बताया करता. सम्गीन सुनता और इंतज़ार करता कि वह कब मरीना के बारे में बात
करेगा. कभी कभी सम्गीन को लगता कि उसकी बातें बेहद, फूहड़ तौर
पे साफ़-साफ़ होती थीं, और उसे बेहद अचरज होता कि हालाँकि बिज़बेदोव अपने आप पर ज़रा भी दया नहीं दिखाता था, फिर भी
उसके शब्दों में अफ़सोस की, असफ़ल जीवन की ज़रा सी भी झलक नहीं दिखाई देती
थी. बातें करते हुए वह कन्फ़ेस नहीं करता था, बल्कि अपने
बारे में ऐसे बात करता, जैसे किसी पड़ोसी के बारे में कह रहा हो, जिसने उसे
बहुत बेज़ार कर दिया हो, मगर, अपनी तमाम कमियों के बावजूद, - इन्सान
बुरा नहीं है. एक बार, एक उदास, तेज़ हवा और
बारिश वाली शाम को, बिज़बेदोव ने अपनी बीबी के बारे बताया.
“ कबूतरों की वजह
से उसे खो दिया,” मेज़ पर कोहनियाँ टिकाते हुए, बिखरे
बालों में ऊँगलियाँ घुसाकर उसने कहा, जिससे सिर भयानक बड़ा हो गया, और चेहरा –
और भी छोटा. “अच्छी औरत थी, कहना पड़ेगा, मगर, जानते हैं, उसका – ये
सामाजिक सरोकार, और बहुत कुछ. मगर मुझे उसमें मज़ा नहीं आता...”
‘सामाजिक
सरोकार’ उसने नकीली आवाज़ में कहा, नाक और
त्यौरियाँ चढ़ाए, फिर, हाथों को सिर पे नीचे सरका कर, गुस्से से
पूछा:
“मैं किस शैतान की
ख़ातिर इस बात की फ़िक्र करूँ कि बेवकूफ़ ज़्यादा अकलमंदी से रहें या फिर ज़्यादा अच्छी
तरह से रहें? अकलमंद तो मेरे बगैर भी जी लेंगे. आप, बेशक, कोई अलग
राय रखते होंगे, मगर मेरे हिसाब से – बेवकूफ़ों को तो वैसे भी
सब अच्छा ही लगता है. इसी बात पर मेरी उससे नहीं बनती थी. और फिर ये कबूतर भी.
मुर्गियों से तो वो, शायद, समझौता कर
लेती,
मगर
– कबूतर! उन पर वो ताव खा जाती थी. वैसे, आमतौर से, उसे लगता
था कि उसे धोखा दिया गया है. उसे, शायद, मैं अच्छा
नहीं लगता था, और मेरा नाम – वलेन्तीन; उसने, शायद ये
कल्पना की थी कि इस नाम के पीछे कोई असाधारण बात छिपी है. स्कूली बच्ची, खूब कविताएँ, उपन्यास पढ़
लिए,
–
किताबों की दीवानी और...ऐसा ही बहुत कुछ!”
सम्गीन सुन रहा था
और मुस्कुरा रहा था. उसे अच्छा लगा कि वलेन्तीन बिना अफ़सोस किए बता रहा था, जैसे बहुत
पुरानी बात याद कर रहा हो, हालाँकि बीबी उसे पिछले साल की शरद ऋतु में छोड़
गई थी.
“हो सकता है, वो जाती भी
नहीं,
अगर
मैं उसके लिए किसी और ज़िंदा चीज़ के प्रति दिलचस्पी पैदा करने की बात सोच पाता –
मुर्गियों, गायों, कुत्तों के प्रति!” बिज़बेदोव ने कहा, फिर जोश से
अपनी बात जारी रखते हुए बोला: “ जैसे, मुझे कबूतरों के शिकार में वो गीत मिला, जिसे गाना
मेरी नियती थी. ज़िंदगी का सार इसी गीत में है – और इसे तहे दिल से गाना चाहिए.
पूश्किन, चायकोव्स्की, मीक्लुखो-माक्लाय
– सब जीते रहे, इसलिए कि अपने पसंदीदा काम के लिए ख़ुद को
निछावर कर दें, - सही है ना?”
सम्गीन ने सहमति
में सिर हिलाया और भर्राए हुए शब्दों को ज़्यादा ध्यान से सुनने लगा, उसे
बिज़बेदोव की कहानी में नए सुर महसूस हो रहे थे.
“आपको वकालत
आकर्षित करती है, किसी और को – ताश का खेल, मुझे –
कबूतर! संभव है, मैं छत पर ही मरूँ, ख़ुशी से
मेरा दम घुट जाए और – धम् से छत से ज़मीन पर गिरूँ,” बिज़बेदोव
ने कहा और गीले, अप्रिय बुलबुले छोड़ते हुए हँसने लगा. “बचपन
में मुझमें कुछ योग्यताओं के लक्षण थे,” उसने पाइप से चाय के प्याले में राख झाड़ते हुए
कहा,
हालाँकि
मेज़ पर ऐश-ट्रे रखी थी. “सही कहूँ तो – कोई लक्षण-वक्षण मुझमें नहीं थे, बल्कि ये
माँ और गॉड-फ़ादर ने मेरे मन में भर दिया था: ‘वलेन्तीन, तुझमें
योग्यता है!” बेशक, मेरे लिए लाज़मी हो गया था कि कुछ अलग करके
दिखाऊँ. मुझसे किसी असाधारण चीज़ की उम्मीद कर रहे हैं, तो कुछ लिख
देता हूँ, कोई झूठ बोल देता हूँ, - करूँ तो
क्या करूँ? उनके विश्वास को सही जो साबित करना था.”
उसने सम्गीन को आँख
मारी और उसे सोचने पर मजबूर कर दिया:
‘मैंने कभी
कुछ नहीं लिखा’.
“झूठ बोलने की आदत अभी भी मुझमें है, किसी ऐसी
बात की कल्पना करता हूँ, जो बहुत कम विश्वसनीय हो और, किसी भेद
की तरह उसे कह देता हूँ; बस एक ही को बताना काफ़ी है, फिर तो झूठ
अपने आप चलने लगता है! जितना ज़्यादा अविश्वसनीय होगा, उतनी ही
आसानी से लोग यकीन कर लेते हैं.”
वह हँस पड़ा, आँखें कस
के बंद कर लीं, और कुछ देर ख़ामोश हो गया, थोड़ा सा
सोचा,
गहरी
साँस ली.
“हालाँकि आजकल
अविश्वसनीय आम होता जा रहा है. मैं झूठ इसलिए नहीं बोलता, कि अपना या
लोगों का दिल बहलाऊँ, बल्कि – शैतान ही जाने, क्यों!
बोरियत लगती है – धरती पर, जब सबसे बढ़िया एहसास तुम्हें छत पर ही होता
है. स्कूल में भी मुझे होनहार बच्चा समझते थे, - गॉड-फ़ादर
ने बढ़ाचढ़ाकर मेरे बारे में बताया था. उम्मीदों को सही साबित करने के लिए – मैं
गुण्डागर्दी करने लगा. पाँचवीं क्लास से – मुझे स्कूल से निकाल दिया गया. शानदार
कपड़े पहन कर घूमने लगा, बेवकूफ़ों जैसी टोपियाँ पहनता. औरतों को –
अच्छा लगता. ये कल्पना करता कि बेहतरीन बिलियार्ड खेल सकता हूँ, - पाँच-पाँच
घण्टे खेलता, ज़ाहिर है – औसत दर्जे का खेला. वैसे मैं – बिल्कुल
निकम्मा हूँ.”
ये अंतिम शब्द बड़ी
प्रसन्नता से कहकर, बिज़बेदोव ने आह भरी, और उसका
चेहरा तम्बाकू के धुँए के बादल में ग़ायब हो गया. सम्गीन भी सिगरेट पी रहा था और
ख़ामोश था, ये सोचते हुए, कि उसने, शायद, ये मानने
में जल्दी कर दी, कि इस आदमी में कुछ अच्छे गुण हैं.
‘काफ़ी संभव
है,
कि
ये सिर्फ भूमिका कर रहा है सीधे-सादे आदमी की, और मैं –
ग़लत था’.
ग़लती का एहसास अभी
ही हुआ, जब बिज़बेदोव ने गुणों और कारनामों के बारे में बताया.
आम तौर से बिज़बेदोव के शब्दों में चुपचाप कोई अप्रिय चीज़ नज़र आने लगी. सम्गीन को ख़ासतौर
से उस ख़याल ने परेशान कर दिया, जो उसने अपने बारे में सोचा था:
‘मैंने –
नहीं लिखा’.
इस आदमी से किसी भी
तरह की समानता की संभावना का ख़याल ही अपमानजनक था. सम्गीन ने संदेहपूर्वक चश्मे के
काँच के आरपार चीनी मिट्टी जैसे आँखों के ढेलों और नीले मोतियों जैसी पुतलियों
वाले चपटे, फूले-फूले चेहरे को देखा, लटके हुए, भारी निचले
होंठ और ऊपरी – चौड़ी नाक के नीचे वाले होंठ पर सफ़ेद से बालों को देखा. बेहद बेवकूफ़
चेहरा.
गुस्से से धुँआ
छोड़ते हुए बिज़बेदोव ने पूछा:
“और क्या – औरतों में आपको कोई दिलचस्पी नहीं है? यहाँ, पास ही में, दो बहनें
रहती हैं, बड़ी भली और ख़ुश मिजाज़ – नहीं चाहते?”
सम्गीन ने रूखेपन से
इनकार कर दिया, मगर सोचा, कि ये
देखना चाहिए था, कि ये मोटा औरतों के बीच कैसा है. बाद में, खट्टी लाल
शराब का घूँट लेते हुए उसने कहा:
“ज़ाहिर है, जब आप इस
बात पर ज़ोर देते हैं, कि आपके अंदर कोई गुण नहीं है, तो मैं
आपकी बात पर विश्वास नहीं करता...”
“पाक सच्चाई!”
हाथों को चेहरे तक उठाकर बिज़बेदोव चीख़ा, जैसे अपने आप को बचा रहा हो, किसी चीज़
को अपने से दूर धकेलने की कोशिश कर रहा हो. “मैं – ग़रीब आदमी हूँ, कमाई का –
कोई ज़रिया नहीं, किसी की भी किसी भी तरह से मदद नहीं कर सकता!”
ये शब्द उसने बेवकूफ़ों के अंदाज़ में, जोकर जैसे, किसी
कंजूस व्यापारी के दयनीय भाव चेहरे पर लाते हुए चिल्लाकर कहे थे.
सम्गीन अपनी बात पर
अड़ा रहा;
“मगर बेहद अजीब
लगता है ये सुनकर कि आप ये सब इस तरह कह रहे हैं, जैसे आपको
ख़ुशी हो रही हो...”
“हाँ – बेशक, ख़ुशी से ही
कह रहा हूँ!” फ़ूहड़ तरीके से हाथों को हिलाते हुए बिज़बेदोव चीख़ा. “ आपसे कैसे कहूँ? आह, शैतान...”
आँखें फ़ाड़कर, हथेली से
खुरदुरा माथा पोंछते हुए वह कुछ पल सम्गीन के चेहरे की तरफ़ देखता रहा, और सम्गीन
ने देखा कि कैसे उसके मोटे-मोटे होंठ, पसीने से नहाए गाल शानदार मुस्कुराहट में तैर
रहे हैं, पिघल रहे हैं.
“मैं – गूँगा-बहरा
हूँ!” उसने पूरे होश में और ज़ोर से कहा. “गूँगे-बहरों को उपदेश देने के लिए मजबूर
नहीं कर सकते! समझ रहे हैं?”
“आप अनुकरण
को स्वीकार करते हैं,” सम्गीन ने गुस्से से कहा.
“क्यों – अनुकरण? नहीं, ये – मेरा
विश्वास है. आप इस बात पर यकीन करते हैं कि कॉन्स्टीट्यूशन की, क्रांति की
और आम तौर से – उथल पुथल की ज़रूरत है, और मैं – इसमें से कुछ भी – नहीं चाहता! नहीं
चाहता! मगर उपदेश देना भी, इसलिए नहीं चाहता, - वो भी नहीं
करूँगा, नहीं चाहता! मैं इस बात को भी नहीं नकारूँगा कि
क्रांति फ़ायदेमंद है, बल्कि, क्या कि
मज़दूरों के लिए ज़रूरी है! ज़रूरी? चलो, छोड़ो, करो
क्रांति, मगर मुझे उसकी ज़रूरत नहीं है, मैं कबूतर
उड़ाता रहूँगा. गूँग़ा-बहरा!” और अपने चौड़े, माँसल
सीने पर ज़ोर से हाथ मारते हुए, वह विजयी अंदाज़ में भर्राए हुए, बुलबुलेदार
ठहाके लगाने लगा.
‘जानवर’, जल्दी से
और गुस्से से सम्गीन ने उन सभी आपत्तियों को याद करते हुए, जिनसे
बिज़बेदोव का मुकाबला किया जा सकता है, उसे मन ही मन गाली दी. मगर बिल्कुल साफ़ था, कि
आपत्तियों से कोई लाभ होने वाला नहीं है, उनमें से हरेक को : ‘नहीं चाहता’, कहकर
बिज़बेदोव खारिज कर देगा. हो सकता कि उसके पास ‘न चाहने’ की शक्ति
है. मगर फिर भी सम्गीन बड़बड़ाया:
“अराजकतावाद. ये –
पुरानी बात है.”
“जैसी कि दुनिया,” बिज़बेदोव
ने मुस्कुराते हुए सहमति जताई. “जैसी सभ्यता,” चीनी
मिट्टी जैसी आँख मारकर उसने आगे जोड़ा. “आख़िर सभ्यता ही तो अराजकतावादियों को जन्म
देती है. सभ्यता के नेता – या, क्या कहते हैं उन्हें? – लोगों की
ओर ऐसे देखते हैं, जैसे भेड़ों के झुण्ड को देखते हैं, और मैं –
अपने आप को भेड़ नहीं समझता और नहीं चाहता कि सभ्यता के लिए मुझे हलाल किया जाए, तल कर किसी
फ़िलॉसोफ़ी के सॉस के साथ पेश किया जाए.”
करीब दो मिनट तक
ऐसे जाने-पहचाने, पिचके हुए वाक्य सुनने के बाद, सम्गीन ने
अनिच्छा से वे शब्द कहे, जिन्हें ज़ोर से नहीं कहना चाहता था:
“सबसे प्रभावशाली, जो आप कह
सकते हैं, और कह चुके हैं, वो है –
नहीं चाहता!”
“बेशक,” बिज़बेदोव
ने अपनी मोटी, लाल हथेलियों को मलते हुए सहमति जताई. “हज़ारों
लोग – सोचते हैं, एक – बोलता है,” उसने दाँत
दिखाते हुए कहा, और फिर से औरतों के बारे में कुछ बुदबुदाया.
सम्गीन ने और एक मिनट उसकी बात सुनी और चला गया. उसे महसूस हो रहा था, कि उस पर
ज़हर चढ़ गया है.
अपने अध्ययन कक्ष
में उसने लैम्प जलाया, जूतियाँ पहनीं और काम करने के इरादे से मेज़ पे
बैठ गया, मगर, ‘एम. पी, ज़ोतोवा के
पोझोग गाँव के किसानों के साथ मुकदमों’ की नीली, मोटी फ़ाइल
को देखकर आँखें बंद कर लीं और बड़ी देर तक बैठा रहा, जैसे
अँधेरे में डूब रहा हो, उसमें बिखरे बालों और चीनी मिट्टी जैसी आँखों
वाला माँसल बदन देखते हुए, भर्राते,
बुलबुलेदार ठहाके सुनते हुए.
‘घिनौना
जानवर...’
फिर, सिगरेट
पीते हुए वह बगल वाले, अंधेरे कमरे में गया और, धुंधलके
में दो मटमैली खिड़कियों के पास से टहलते हुए, ख़यालों में
खो गया. इसमें कोई शक नहीं है कि बिज़बेदोव की बातों में मरीना की बातों का भी काफ़ी
कुछ है. वह – भी ‘उथल-पुथल’ से बाहर है
तब भी,
जब
भौतिक रूप से लोगों के बीच में होती है, जो इस ‘उथल-पुथल’ के बवण्डर
में खींच लिए गए हैं. सम्गीन ने अपनी स्मृति में ‘प्रवाह के
खोजी’
ग्रुप
की एक सभा का नज़ारा ताज़ा किया, जहाँ उसे लीदिया वराव्का ने आमंत्रित किया था.
‘फ़ैशन-शॉप’ के बोर्ड
वाली बिल्डिंग में सावधानी से और चुपचाप विभिन्न प्रकार के कपड़े पहने लोग जाते हैं, वे एक जैसे
शांति प्रिय हैं, वे अपना ऊपरी वस्त्र उतार देते हैं, उसे बेंचों
पर रख देते हैं, या ख़ाली शेल्फों में घुसा देते हैं; इसके बाद
वे,
‘एक
लाइन में’ एक के पीछे एक चार सीढ़ियाँ उतरकर एक बड़े, संकरे और
लम्बे कमरे में जाते हैं, जिसकी पिछली दीवार पर दो खिड़कियाँ हैं, दीवारें
ख़ाली हैं, प्रवेश के पास, कोने में, भट्टी और
चूल्हा है: ज़ाहिर है, ये कोई वर्कशॉप था. कमरे में – धुंधलापन है, दीवारों से
पेस्ट की और नमी की गंध आ रही है. काली और पीली बेंत की कुर्सियों पर चुपचाप, बिना हिले
डुले लोग बैठे हैं, करीब तीस-चालीस आदमी और औरतें, धुंधलके के
कारण उनके चेहरे नहीं दिखाई दे रहे हैं. कुछ लोग घुटनों पर कोहनियाँ रख कर झुके
हुए थे, और उनमें से एक तो आगे की तरफ़ इतना झुका हुआ था, कि समझ में
नहीं आ रहा था, कि ये गिर क्यों नहीं रहा है? लगता है, कि कई
लोगों के सिर ही नहीं हैं. सामने, दो खिड़कियों के बीच की दीवार के सामने, हरे
मोमजामे से ढँकी मेज़ के पीछे थी – लीदिया, दुबली-पतली, सपाट, सफ़ेद ड्रेस
में,
घुंघराले
सिर पर जाली लगाए और नीले चश्मे में. उसके सामने – सफ़ेद शेड वाला लैम्प, दो चर्बी
वाली मोमबत्तियाँ, पीली जिल्द वाली मोटी किताब; लीदिया का
चेहरा – हरियाली लिए हुए, उस पर मोमजामे का रंग परावर्तित हो रहा है; चश्मे के
काँचों में मोमबत्तियों की लौ थरथरा रही है; लीदिया, शायद, लोगों पर
काल्पनिक डर पैदा कर रही थी. उसके व्यक्तित्व में कोई नाटकीय, प्रतिकारक चीज़
थी. किताब में देखते हुए, सिर को झुकाते हुए, और झटका
देते हुए वह नकीली आवाज़ में पढ़ती है:
‘जो आत्मा
के भीतर कह रहा है – उसकी निंदा न करो, क्योंकि जिस्म उपदेश नहीं देता, बल्कि
आत्मा,
आत्मा
की निंदा करना – भयानक पाप है. हर पाप माफ़ किया जा सकता है, मगर इसे –
कभी नहीं’.
किताब से एक लम्बा
पन्ना निकाल कर, वह उसे लैम्प के पास लाती है और चुपचाप होंठ
हिलाती है. उससे कुछ दूरी पर, कोने में, सीने पर
हाथों का क्रॉस बनाए, सिर तिरछा किए मरीना बैठी है; दीवार की
राख जैसी भूरी पृष्ठभूमि उसके चमकदार चेहरे को प्रभावशाली ढंग से स्पष्ट दिखा रही
थी.
“शुरू करो, सिस्टर
सोफ़िया, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर,” लीदिया ने
कागज़ का बिगुल बनाते हुए कहा.
मरीना की बगल में
है – कर्मीलित्सिन, जो साम्प्रदायिकता से संबंधित प्रश्नों पर
लिखता था, उसके औरतों जैसे नरम चेहरे पर बड़ी, भूरी दाढ़ी
थी – उसका चेहरा हमेशा किसी अकेली, अभागी विधवा की उदासी को प्रकट करता था; उसकी उभरी
हुई छाती भी औरतों से उसकी समानता में वृद्धि कर रही थी.
मॉस्को में सम्गीन
अक्सर उससे मिला करता था, और किसी समय उससे ईर्ष्या भी करता था, ये जानते
हुए कि कर्मीलित्सिन ने उस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है, जो उसे, याने
सम्गीन को भी ललचा रहा था: लेखक के पास गैर कानूनी कविताओं का, पिक्चर-पोस्टकार्ड्स
का,
लेखों
का एक बड़ा संग्रह था, जो सेन्सर द्वारा प्रतिबंधित किए गए थे; वह इस बात
के लिए मशहूर था कि मिनिस्टरों के, बिशप्स के, गवर्नरों
के,
लेखकों
के जीवन के चुटकुले सबसे पहले उसे पता चलते थे और वह बड़ी शिद्दत से, किसी
कानूनी जासूस के समान हर वो चीज़ इकट्ठा करता था, जो लोगों
को बेवकूफ़, नीच, क्रूर, आपराधिक रूप
में दिखाती थी. उसके चुटकुले सुनते हुए सम्गीन को ये महसूस होता था, कि इस आदमी
को अपने ज्ञान पर गर्व है, जैसा किसी वैज्ञानिक-शोधकर्ता को होता, मगर सुनाता
वो हमेशा परेशानी से था, जैसे उसे श्रोताओं को सौंपकर वह स्वयम्
छुटकारा पाना चाहता है. लीदिया की मेज़ के पास काली ड्रेस पहने एक अधेड़ औरत आई, उसका सिर
छोटा था, चेहरा सतर्क था, उसने पीली बाइबल
को हाथ में उठाया और अचानक मोटी, डूबती हुई आवाज़ में कहने लगी:
“ पैग़म्बर यशायाह, अध्याय
चौबीस! भारी किताब खोलकर, उसने अपनी पैनी नाक उसमें घुसा दी; पन्नों की
सरसराहट होने लगी, “प्रवाह के खोजी” कुछ हिले, कुर्सियों
की चरमराहट, पैरों का घिसटना, सतर्क
खाँसी सुनाई दी, - औरत ने काले स्कार्फ़ वाला सिर हिलाया, गंभीर और प्रतिशोधात्मक
आवाज़ में पढ़ा:
‘सुनो, यहोवा
पृथ्वी को बिखेरने वाला है और निर्जन करने वाला है, वह उसको
उलटकर उसके रहने वालों को तितर-बितर करेगा’.
कोने में, चूल्हे के
पास कोई दबी आवाज़ में सिसकियाँ लेने लगा.
‘भ्रष्टाचार
से पृथ्वी सड़ जाएगी और लुटेरों द्वारा लूट ली जाएगी’, औरत बडी
ताकत से और प्रतिशोधात्मक तरीके से पढ़ रही थी.
‘पृथ्वी
विलाप करेगी’…
भट्टी के पास शोर
बढ़ता जा रहा था; मरीना ने लीदिया की तरफ़ झुकते हुए उससे कुछ
कहा,
तब
लीदिया मेज़ पर चाभी से ठकठक करते हुए, सख़्ती से चिल्लाई:
“ख़ामोश रहें!”
कुर्सियों की
कतारों के बीच एक आदमी चल रहा था और ज़ोर से और आक्रामकता से कह रहा था:
“मुझे कुछ भी समझ
में नहीं आ रहा है! पहले – बिखेरना, बाद में – उलटना...और ये सब, माफ़ कीजिए!
– सबको मालूम है; अर्थ व्यवस्था के संसाधनों के विनाश के कारण
पृथ्वी पहले ही विलाप कर रही है...”
ये आदमी छोटा, पतला था, उसने लम्बा
कुर्ता पहना था, जूते चकाचक, उसके संकरे
माथे पर काले, छोटे-छोटे कटे हुए बाल थे, गोल चिकने
चेहरे पर मूँछें थीं – उसके चेहरे के लिए बेहद बड़ी, वह खनखनाती
और ज़िद्दी आवाज़ में बोल रहा था.
“और ये तो समझ में
आ ही नहीं सकता, कि श्रम को लूटने की इजाज़त कौन देता है और
त्सार लोगों पे राज करने से इनकार क्यों कर रहा है...”
कृत्रिम रूप से
झुका हुआ आदमी सीधा हो गया, वह उठा और, अपना लम्बा
हाथ फ़ैलाकर उसने साँवले आदमी को कंधे से पकड़ लिया, - वह गुस्से
से चीख़ा:
“ये आप पकड़ क्यों
रहे हैं!”
“यहाँ लोग इकट्ठा
हुए हैं...”
“हाँ – मैं देख रहा
हूँ कि लोग...”
“उस बारे में बात
करने के लिए नहीं, जो तुम कह रहे हो, ब्रदर...”
“उस बारे में कैसे
नहीं?”
कोई हँसने लगा, लोग गुस्से
से बड़बड़ाने लगे. लीदिया ने धीमी आवाज़ वाली घण्टी हिलाई; उस आदमी ने, जिसने
साँवले को रोका था, कोने की तरफ़, मरीना की ओर
देखा,
- वह
वैसे ही निश्चल बैठी थी.
‘मूरत’, सम्गीन ने
सोचा.
सामने वाली पंक्ति
में एक औरत उठी और ख़ुशनुमा आवाज़ में चीखी:
“ये लूकिन है, पुलिस में
क्लर्क है, - नाटक कर रहा है, मूँछें तो
चिपकाई हुई हैं...”
“उसे बाहर निकालो,” लीदिया ने
उन्माद से चीखी. सम्गीन को लगा, कि मरीना की आँखें मुस्कुरा रही हैं. उसने ग़ौर
किया कि कई आदमी और औरतें उसकी तरफ़ एकटक, नम्रता से, और, जैसे
प्रशंसा से देखे जा रहे हैं. आदमियों को तो उसकी शाही ख़ूबसूरती ललचा सकती थी, मगर औरतों
को उसने कैसे आकर्षित किया है? कहीं ये यहाँ उपदेश तो नहीं देती? सम्गीन
बेचैनी से इंतज़ार कर रहा था. नमी की गंध अब गरमाहट से भर गई थी, गहरी हो गई
थी. वो, जो क्लर्क को बाहर ले गया था, वापस लौटा, मेज़ के पास
गया और उस पर झुक कर लीदिया से कुछ कहने लगा; उसने सहमति
में सिर हिलाया, और ऐसा लगा, जैसे उसके
चश्मे से नीली रोशनी फूट रही है...
“ठीक है, ब्रदर
ज़खारी,”
उसने
कहा. ज़खारी सीधा हो गया, वह लम्बा, सिकुड़े
कंधों वाला, कुछ झुका हुआ था, चेहरा
भावहीन, बेहद पीला – घनी, काली दाढ़ी
वाला.
“ब्रदर वसिली,” लीदिया ने
बुलाया.
अंधेरे से उछलकर एक
गंजा,
लाल
छितरी दाढ़ी वाला आदमी मेज़ की ओर भागा, - वह एक औरत को हाथ से घसीट रहा था, जिसने
चौखाने की स्कर्ट और लाल ब्लाऊज़ पहना था, कंधों पर चटखदार रूमाल था.
“चल, चल, - डरना
नहीं!” वह औरत को खींचते हुए कह रहा था, हालाँकि वह भी उसके ही जितनी तेज़ी से चल रही
थी. “तो, ब्रदर्स-सिस्टर्स, ये – है नई
मेम्बर!” उसने दाएँ-बाएँ धधकते, गर्म शब्द फेंके. “ जिस्मफ़रोशी की शिकार, ओह, कैसी पीड़ा!
तो – ये बताएगी हवस के बारे में, जिस्म, जो शैतान
के हाथ का खिलौना है, हमें किस हद तक ले जाता है...”
औरत को मेज़ तक लाकर
उसने ऊँगली से उसे धमकाया:
“तू – तईस्या, ईमानदारी
से सब बताना, कैसे, क्या हुआ था, शरमा नहीं, यहाँ लोग
ख़ुदा की ख़िदमत करना चाहते हैं, ख़ुदा के सामने – शरम नहीं होती!”
वह एक ओर को कूद गया, उसका चेहरा
परेशानी और ख़ुशी से काँप रहा था, वो हाथ हिला रहा था, पैर पटक
रहा था, जैसा बस अभी नाचने वाला हो, उसके कोट
के पल्ले कलहंस के पंखों की तरह फड़फड़ा रहे थे, और फ़ौरन एक
सूखी आवाज़ फूटी:
“अब, ब्रदर्स-सिस्टर्स, ऐसी बात
सामने आने वाली है...” और, सही शब्द न मिलने के कारण, वह
चिल्लाया:
“अरे, शुरू कर, बता, बोल –
तईस्या...”
औरत ने एक हाथ से
मेज़ का सहारा लिया था, दूसरे से अपनी ठोढ़ी, गला सहला
रही थी, छोटी सी मोटी चोटी खींच रही थी; उसका चेहरा
– साँवला, फ़ूला-फ़ूला, लड़कियों जैसा था, आँखें
गोल-गोल, बिल्ली जैसी; होंठ तीखे
थे. उसने लीदिया की तरफ़ पीठ की और, हाथों को पीठ के पीछे ले जाकर उनसे मेज़ के
किनारे को पकड़ लिया, - ऐसा लग रहा था, कि वह गिर
रही है; उसका सीना और पेट उद्दण्डता से खूब बाहर को निकले थे, और सम्गीन
ने गौर किया कि इस मुद्रा में कुछ अप्राकृतिक, असहज बात
है,
जैसे
वह जान बूझ कर इस तरह खड़ी है.
“मेरे पिता वोल्गा
पे पायलेट थे!” वह चीखी, और इस तेज़ चीख़ ने, शायद उसे
परेशान कर दिया, - उसने आँखें बंद कर लीं और जल्दी जल्दी, असंबद्ध सा
कुछ बोलने लगी.
“कुछ भी सुनाई नहीं
दे रहा है,” तीखी नाक वाली सिस्टर सोफ़िया ने कड़ाई से कहा, और चुलबुला
ब्रदर वसीली दुख से चीखा:
“ऐह, तईस्या, काम बिगाड़
रही हो! बिगाड़ रही हो!”
कर्मीलित्सिन उठा
और उसने सावधानी से तईस्या के सामने कुर्सी रखी, - उसने दोनों
हाथों से कुर्सी की पीठ पकड़ ली और सिर हिलाकर चोटी को कंधे के पीछे डाल दिया.
“बारहवें साल में
सौतेली माँ ने मुझे मॉनेस्ट्री में डाल दिया, हस्तकला और
लिखना-पढ़ना सीखने के लिए,” उसने धीरे-धीरे और ऊँची आवाज़ में कहा. “उस
शराबी ज़िंदगी के बाद मॉनेस्ट्री में मुझे अच्छा लग रहा था, और वहाँ
मैं पाँच साल रही.”
उसका साँवला चेहरा
भावहीन हो गया, सिर्फ ख़ूबसूरत मुँह के बच्चों जैसे फूले-फूले
होंठ हिल रहे थे. वह गुस्से से, टूटी-टूटी आवाज़ में बोल रही थी, बीच-बीच
में अचानक चीख़ भी रही थी. उसकी थरथराती हुई ऊँगलियाँ कुर्सी की पीठ की कमान पर
फ़िसल-फ़िसल जाती थीं, जिस्म सीधा हो गया था, जैसे वह
बड़ी हो गई हो.
“”दूल्हा एकदम
भद्दा था, लाल बालों वाला, बेवकूफ़
किस्म का थ....गंदा कुत्ता!” अचानक वह चीखी.
“ये-ए, ये बात!”
प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए, मीठी आवाज़ में ब्रदर वसीली चहका.
बाकी सब शांति से, चुपचाप
बैठे थे, - सम्गीन को महसूस होने लगा था कि उसके पड़ोसियों के
जिस्म से भी गीली चिपचिपी गंध निकल रही है. मगर चिड़चिड़ाहट भरी बोरियत, जो उसे
तईस्या की कहानी से पहले महसूस हो रही थी, ग़ायब हो
गई. उसे लगा कि इस औरत की कद-काठी दुन्याशा की याद दिला रही है: वैसी ही
हट्टी-कट्टी, सबसे अलग, वैसा ही छोटा सा, ख़ूबसूरत
मुँह. जब मरीना की ओर नज़र पड़ी, तो देखा कि लेखक फुसफुसाकर उससे कुछ कह रहा
है,
मगर
वो उसी तरह शान से बैठी है.
‘बिल्कुल
मूरत’,
उसने
इस बात से नाराज़ होते हुए फिर से सोचा, कि जो कुछ भी यहाँ हो रहा है, उससे मरीना
का क्या संबंध है.
“शादी के फ़ौरन बाद
उसने मुझे मनाना शुरू कर दिया:
‘अगर मालिक चाहे, तो उसे मना
न करना, मैं बुरा नहीं मानूँगा, मगर हमारी
ज़िंदगी को फ़ायदा ही होगा’, तईस्या कह रही थी, शिकायत के
नहीं,
बल्कि
जैसे,
मज़ाक
के सुर में. “और वो – दोनों मुझे तंग करते रहे – मालिक भी, और उसका
दामाद भी. तो, क्या करती?” सिर हिलाते
हुए वह चीख़ी, और उसकी बिल्ली जैसी आँख़ें तैश से चमक उठीं. “मालिक
के साथ तो मैं शौहर के हुक्म से सोती थी, और उसके दामाद के साथ – शौहर से बदला लेने के
लिए...”
“ओ---ह!” अंधेरे से
व्यंग्य भरी आवाज़ आई, लोग बुदबुदाने लगे, उनमें हलचल
होने लगी. लीदिया उठी, चाभी वाला हाथ हिलाया, काली दाढ़ी
वाला ज़खारी आवाज़ की दिशा में गया और फुसफुसाया; अब सम्गीन
को लगा कि मरीना मुस्कुरा रही है. मगर दबा-दबा शोर फ़ौरन तईस्या की चीख भरे और
उन्मादपूर्ण भाषण के तेज़ प्रवाह में फ़ौरन दब गया.
“उसीके, दामाद के, साथ ही तो
मुझे उसकी बीबी ने, मालिक की बेटी ने पकड़ा था, बगीचे में, गार्डन-हाऊस
में. उन शैतानों ने, ख़ुद ही, मुझसे
शरम-हया छीन ली थी, और ख़ुद ही फ़ैसला कर लिया कि मुझे सरेआम
बेइज़्ज़त करेंगे.”
वह साँस लेने के
लिए रुकी, कुछ देर ख़ामोश हो गई, कुर्सी
खिसकाते हुए, उसकी टाँगों की फ़र्श पर खटखट करते हुए, उसकी आँखें
फ़ोस्फ़ोरस जैसी चमक रही थीं, उसने दो-एक बार मुँह खोला, मगर, ज़ाहिर था, कि एक भी शब्द
कहने की शक्ति उसमें नहीं थी, सिर हिलाया, उसे इतना
ऊँचा उठाया, जैसे कोई अज्ञात शक्ति उसकी ठोढ़ी पर मुक्के मार रही
हो. फिर, अपने आप को संभालकर, उसने
भर्राई हुई, सीटी जैसी आवाज़ में, जैसे
दाँतों के बीच से बोल रही हो, अपनी बात जारी रखी:
“ल-ले गए जंगल में, पूरे कपड़े
उतार दिए, हाथ पैर बर्च ट्री से बाँध दिए, चींटियों
के ढेर के पास, पूरे जिस्म पर शीरा मल दिया, ख़ुद बैठ गए
– तीनों – शौहर और मालिक और दामाद, सामने, वोद्का पी
रहे हैं, तम्बाकू के कश लगा रहे हैं, मेरे
नंगेपन पे ताने कस रहे हैं, ओह, शैतान! और मुझे ततैया, मधुमक्खियाँ
डंक मार रही हैं, चीटियाँ, मक्खियाँ
मुझ पर रेंग रही हैं, मेरा खून पी रही हैं, आँसू पी
रही हैं. चीटियाँ तो – आप सोचिए! – वो मेरे नथुनों में और हर जगह रेंग रही हैं, और मैं
अपने पैर भी कस के चिपका नहीं सकती, पैर इस तरह बंधे हैं, कि उन्हें
एक दूसरे से चिपका भी नहीं सकते थे, - ऐसा था हाल!”
सम्गीन के पास किसी
ने दबी ज़ुबान में कहा:
“ओय, बेहया...”
सम्गीन देख रहा था, कि तईस्या
की ऊँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं, उनमें से ख़ून गायब हो गया, और चेहरा
अप्राकृतिक ढंग से खिंच गया. कमरे में बेहद शांति थी, जैसे सब सो
गए हों, और किसी की भी ओर देखने का मन नहीं हो रहा था, सिवाय उस
औरत के, हालाँकि उसकी कहानी सुनने में भी घिन आ रही थी, सिसकारते
हुए शब्द नफ़रत की भावना पैदा कर रहे थे.
“पहले तो मैं
चुपचाप रोती रही, उन दुष्टों को मैं ख़ुशी नहीं देना चाहती थी, मगर जब
चेहरे पर रेंग रहे उन कीड़ों का झुण्ड आँखों की तरफ़ रेंगने लगा...आँखों की ओर, तो दुख
होने लगा, मुझे अंधा बना देंगे, मैंने सोचा, हमेशा के
लिए अंधा बना देंगे! तब – मैं दिल को चीरने वाली आवाज़ में चीख़ने लगी, सब लोगों
पर,
ख़ुदा
पर और मेरे हिफ़ाज़ती फ़रिश्तों पर, - चिल्ला रही हूँ, मुझे काटा
जा रहा है, जिस्म के अंदरूनी हिस्सों में जलन हो रही है – खुजली हो
रही है, मेरे आँसू पिए जा रहे हैं... आँसू पिये जा रहे हैं.
दर्द से नहीं चीखी थी मैं, शरम से नहीं, - उनके सामने
कैसी शरम? वो ठहाके लगा रहे हैं. अपमान से चीख़ रही हूँ: किसी
इन्सान को इस तरह कैसे सता सकते हैं? ख़ुद ही ने मुझे उस रास्ते पर खदेड़ा, जहाँ नहीं
भेजना चाहिए था और सता रहे हैं...ऐसे चिल्ला रही थी, कि नहीं
जानती,
मैं
ज़िंदा कैसे बच गई. तो, तभी मेरा शौहर चिल्लाने लगा, मुझे खोलने
के लिए लपका, शराबी. और मैं – जैसे आग बरसाते बादल में थी...”
तईस्या लड़खड़ाई, काली दाढ़ी
वाले ने फ़ौरन उसे संभाल लिया, कुर्सी पर बिठाया. उसने अपनी चोटी से मुँह
पोंछा और, ज़ोर से, गहरी साँस लेकर, हाथ झटक कर
काली दाढ़ी वाले को दूर हटाया.
“उन्होंने उसे मारा,” गालों पर
हथेलियाँ फ़ेरकर वह बोली, और, हथेलियों की तरफ़ देखते हुए, थरथराहट से
मुस्कुराई. “सुबह उसने मुझसे कहा: ‘माफ़ कर दे, वो हरामी
हैं,
और
अगर माफ़ नहीं करेगी – तो उसी बर्च के पेड़ से लटक जाऊँगा’. ‘नहीं, मैंने कहा, उस पेड़ को
ज़लील मत करो, हिम्मत न करना, जूडा, उस पेड़ पे
मैंने पीड़ा झेली है. और अपने अपमान के लिए मैं किसी को भी – न तुझे, न किसी भी
आदमी को, न ही ख़ुदा को माफ़ नहीं करूँगी’. ओह, नहीं माफ़
करूँगी, बिल्कुल नहीं! सत्रह महीने उसने मुझे संभाला, मनाता रहा, पीने लगा, फिर –
सर्दी खा गया, जाडों में...”
और, इत्मीनान
से साँस लेकर, उसने ऊँची आवाज़ में, ज़ोर से
कहा:
“मर गया.”
लोग ज़रा भी नहीं
हिले,
ख़ामोश
ही रहे. ख़ामोशी, शायद, कुछ पलों
तक छाई रही, पल-पल ज़्यादा भारी, ज़्यादा
गहरी होती गई.
फिर ब्रदर वसीली
उछला और हाथ हिलाते हुए फटी आवाज़ में बोला:
“सुना आपने, ब्रदर्स-सिस्टर्स? इसने –
पश्चात्ताप नहीं किया, इसने – सबक सिखाया! यहाँ हम सब जिस्म की काली
आग में, शैतान की साँसों से झुलसे हुए हैं, सब बेहद
सताए हुए हैं...”
लीदिया खड़ी हो गई
और,
चाभी
से खटखट करते हुए, गुस्से से भौंहे सिकोड़ते हुए, तीखी आवाज़
में बोली:
“रुकिए, ब्रदर
वसीली! सिस्टर्स और ब्रदर्स, - ये अभागी औरत इत्तेफ़ाक से हमारे बीच आ गई है, ब्रदर
वसीली ने मुझे आगाह नहीं किया था कि ये किस बारे में बताने वाली है...”
तईस्या भी उठई, मगर लड़खड़ा
गई,
फिर
से कुर्सी पर बैठ गई, और वहाँ से हौले से फ़र्श पर गिर गई. दो-तीन
आवाज़ें धीरे से आह-ओह करने लगीं, कई ‘प्रवाह के खोजी’ कुर्सियों
से थोड़ा सा उठे, ज़खारी समकोण बनाते हुए झुक गया, हल्के से, जैसे किसी
तकिए को उठा रहा हो, उसने तईस्या को हाथों में उठाया, दरवाज़े की
तरफ़ ले गया; उसके पीछे से आवाज़ आई:
“रुला दिया औरत ने”, और तभी कोई
गंभीरता से बोला:
“मतलब – सिर पे न
चढ़ाओ,
शैतानों
के सामने सिर न झुकाओ!”
लीदिया के पास आदमी
और औरतें आए, झुक कर अभिवादन किया, उसका हाथ
चूमा;
वह
कंधों को सिकोड़ते हुए दबी आवाज़ में उनसे कुछ कह रही थी, उसके गाल
और कान खूब लाल हो गए थे. मरीना एक कोने में खड़ी होकर कर्मीलित्सिन की बात सुन रही
थी;
एक
पैर से दूसरे पैर पर खडा, वह सिगरेट केस से खेल रहा था; उनके करीब
जाते हुए सम्गीन ने उसके नर्म, सकुचाते शब्द सुने:
“कृषि संबंधी
अव्यवस्थाओं में सांप्रदायिकता लगभग हिस्सा नहीं लेती है.”
“ये मैं नहीं जानती,” मरीना ने
कहा. “सिगरेट पीना चाहते हैं? मेरा ख़याल है, कि अब –
पी सकते हैं. आप एक दूसरे को जानते हैं?”
“हम मिले थे,” सम्गीन ने
याद दिलाया. साहित्यकार ने उसके चेहरे की ओर देखा, फिर –
पैरों की ओर और सिर हिलाया:
“आह, हाँ, ऐसे कैसे!”
फिर दियासलाई से सिगरेट सुलगाते हुए और, ज़ाहिर है, इस डर से
कि कहीं अपनी दाढ़ी न जला बैठे, उसने कहा:
“ मैं ये समझता हूँ, कि ये – ‘ख्लीस्तों’ जैसा है.”
“ख्लीस्तों की
कल्पना पादरियों ने की थी, ऐसा कोई सम्प्रदाय है ही नहीं,” मरीना ने
उदासीनता से कहा और, प्यार से, सहानुभूति
से लीदिया से पूछा: “ आज कुछ ठीक नहीं रहा?”
“ये...तेरेन्त्येव!”
कोई शब्द निगलते हुए लीदिया गुस्से से फुसफुसाई. “और हमेशा, हमेशा वो
कोई अप्रत्याशित और गंदी चीज़ सोचता है.”
“ गुण्डा,” मरीना ने
हौले से कहा और वैसे ही हौले से, प्यार से आगे कहा:
“ बदमाश.”
“मगर – कैसी ख़तरनाक
औरत थी!”
“ अच्छी नहीं थी,” मरीना ने
सहमति दिखाई और सिगरेट के धुँए को हाथ हिलाकर हटाने लगी, - साहित्यकार
ने माफ़ी माँगी और सिगरेट को अपनी पीठ के पीछे छुपा लिया.
लीदिया ने गहरी
साँस लेकर कहा:
“बोल अच्छा रही
थी.”
“ख़ौफ़नाक चीज़ों के
बारे में हमेशा अच्छी तरह ही बताते हैं,” उसे कंधों से लिपटाकर दरवाज़े की ओर ले जाते
हुए मरीना ने सुस्ती से कहा.
“ये – बिल्कुल सही
है!” कर्मीलित्सिन ने सहमति दिखाई और अफ़सोस ज़ाहिर किया, कि साहित्य
सांप्रदायिक आंदोलन पर ध्यान नहीं देता है, उसे अनदेखा
करके निकल जाता है.
“बिल्कुल ही तो
अनदेखा नहीं करता, कुछ लोग – फ़िक्र करते हैं,” मरीना ने ‘फ़िक्र करते
हैं’
को
प्रत्यक्ष रूप से व्यंग्य से कहा, और सम्गीन ने सोचा कि हर बात, जो वो कह
रही है, उस पर उसने बारीकी से गौर किया है, नाप तौल कर
बोल रही है. कर्मीलित्सिन को वह ये दिखाना चाहती है, कि दयनीय
लोगों की मीटिंग में वह वैसी ही मेहमान है, जैसा कि वो
है. जब लेखक और लीदिया दुकान में अपने कोट पहन रहे थे, तो उसने
सम्गीन से कहा कि वह उसे घर तक छोड़ देगी, फिर उसने ज़खारी से फुसफुसाकर कुछ कहा, जो नम्रता
से उसके सामने झुक गया.
रास्ते पर उसने
गाड़ीवान से कहा:
“मेरे पीछे आओ.”
‘कहना चाहिए
था: हमारे पीछे’, सम्गीन ने ग़ौर किया.
पैदल ही चल पड़े, मरीना ने
कहा:
“मुझे ये लेखक पसंद
नहीं है. हर जगह घुस जाता है, सब जानता है, मगर –
बेवकूफ़ है. लेख लिखता है बेजान ज़ुबान में. मेरा शौहर हरेक पर भरोसा करता था, गर्म जोशी
के कारण पहचान कर ली हर तरह के...तो, ‘प्रवाह के खोजी’ के बारे
में तुम्हारी क्या राय है?”
सम्गीन ने कहा, कि उसे कुछ
भी समझ में नहीं आया.
“हाँ, सब कुछ
धुँधला था! पैगम्बरों को पढ़ते और सुनते हैं, जो भयानक
हैं. खरोंचते हैं. रूहों को तकलीफ़ पहुँचाते हैं. कई लोगों की रूह तो बगल में दबी
होती है.” और हँस कर, सम्गीन को कोहनी से धक्का देकर व्यंग्य से
बोली:
“और औरतों की –
काफ़ी नीचे होती है.”
उसने नाक भौंह
चढ़ाकर कहा, कि वह अधिकाधिक उसकी समझ से बाहर होती जा रही है.
“क्या लीदिया को
समझे?”
उसने
पूछा.
“ज़ाहिर है – नहीं.
समझना मुश्किल है कि कैसे, ये षड़यंत्रकारी और जिप्सी औरत की बेटी, पतित कुलीन
की बीबी, अंग्रेज़ी स्टाइल में भली बनने का नाटक कर सकती है?”
“कितने गुस्से से
कह रहे हो तुम,” मरीना ने ख़ुशनुमा आवाज़ में कहा. “ऐसी
तबदीलियाँ होती हैं, प्यारे दोस्त! जैसे ल्येव तिखोमीरोव ने कितनी
लगन से पादरी की हत्या में मदद की, और फिर बेटे के सामने पछतावा ज़ाहिर करते हुए
कहा कि जवानी की गलती की वजह से किया गया था, और बेटे ने
उसे सोने की दवात भेंट में दे दी, ये मुझे लीदिया ने बताया था.”
क्लीम को उसके क्वार्टर
तक छोड़कर, वह बिज़बेदोव के यहाँ चाय पीने के लिए गई. भतीजे ने
किसी नौकर की तरह उसका जोश और सम्मानपूर्वक स्वागत किया, जो अपनी
मालकिन से प्यार करता हो, और इस बात से ख़ुश है कि वह उसके घर आई है. इस
हड़बड़ाहट भरे जोश में सम्गीन को कुछ बनावटीपन नज़र आया, मगर मरीना
सहृदयता से भतीजे का मज़ाक उड़ा रही थी, और बड़ा अजीब लग रहा था, कि वह, इतनी
अकलमंद होकर भी, उसके झूठ को नहीं देख पा रही है.
ये देखने की चाहत
से कि सम्गीन ठीक तरह से बस तो गया है, उसने सारे कमरों का चक्कर लगा लिया और बोली:
“तो, क्या? सब – मौजूद
है,
सिर्फ
औरत की कमी है. वलेन्तीन - परेशान तो नहीं करता?”
“थोड़ा बहुत.”
“अच्छा-अच्छा.
अगर परेशान करे, तो बताना, मैं उसे
ठीक कर दूँगी. बोर होते हो?” इन चिंता और प्यार भरे सवालों ने उसके दिल को
छू लिया; उसने कहा, कि हालाँकि बोर तो नहीं होता है, मगर नई
परिस्थिति की अभी तक आदत नहीं हुई है.
“हाँ, बेशक,” मरीना ने
सिर हिलाकर कहा. “लम्बे समय तक एक जगह रहे, जहाँ हर
चीज़ की आदत हो गई और चीज़ों पर कभी ध्यान भी नहीं गया, मगर अब
सारी चीज़ें नज़रों के सामने हैं, आँखों में चुभती हैं, जैसे पूछना
चाहती हैं: हमारे बारे में क्या ख़याल है?”
“क्या इसे
प्रतीकात्मक रूप से समझा जाए?” उसने हँसते हुए पूछा.
“जैसा चाहो,” उसने भी
मुस्कुराते हुए जवाब दिया. उसके शांत चेहरे, विश्वासपूर्ण
बातों ने आसानी से उस सब को निचोड़ कर बाहर फेंक दिया, जो सम्गीन
ने घण्टे भर पहले देखा और सुना था.
“हर जगह, मेरे दोस्त, अंधेरा है
और दम घुटता है,” उसने गहरी साँस लेकर कहा, मगर फ़ौरन
आगे जोड़ दिया:
“सिर्फ अपने ख़ुद के
भीतर रोशनी और आज़ादी है.”
सम्गीन ने शिकायत
की: ज़िंदगी हादसों से भरी है, जैसे तईस्या की कहानी, उस बारे
में कि उसे कैसे सताया गया था; उनमें से हर हादसा रूह को, दिमाग़ को
चीर देता है, खड़ा कर देता है...”
“सवाल, जिनके लिए
हमारे पास कोई जवाब नहीं हैं, सिवाय उनके जो किताबों में दिए होते हैं,” - मरीना ने
धीरे से उसके वाक्य को समाप्त किया. “मगर तुम – सवालों से इनकार करो, सवालों पे
चुप्पी साध लो,” मुस्कुराते हुए, आँख़ें
सिकोड़कर उसने सलाह दी. “आपके भाई, बुद्धिजीवी को, आदत हो गई
है,
एक
दूसरे के सामने सवालों से सजने की सिर्फ फ्लर्ट की ख़ातिर, आप जटिलता
का खेल खेलते हैं: कौन किससे ज़्यादा जटिल है? और एक
दूसरे को उलझाते हैं. सवाल तो बुद्धि से नहीं, बल्कि
इच्छा शक्ति से हल होते हैं...जैसे फ़्रान्सीसी
सीख रहे हैं हवा में उड़ना, ये – अच्छा है! मगर इसका फ़ैसला – इच्छा शक्ति
करती है, बुद्धि तो सिर्फ मदद करती है. और धरती पे आज़ादी से
चलना भी सिर्फ इच्छा शक्ति ही सिखाती है.” उसने धीरे से मुस्कुराकर कहा: “ मैं तो
इस महान उत्पीड़ित औरत के बारे में सवाल को सीधे सादे ढंग से सुलझा देती: उसे लोगों
से दूर – मॉनेस्ट्री में भेज देती, जहाँ नियम कठोर हैं.”
“कठोर है, लेकिन यही
युक्तिसंगत है,” सम्गीन ने सहमति जताई और, सिस्टर
सोफ़िया की प्रतिशोधात्मक आवाज़ को याद करके पूछ लिया: वो कौन है?”
“कृत्रिम मिनरल
वाटर बनाने वाले कारखाने के मालिक की बेटी है. काले कारनामे की वजह से मुकदमे में
फँस गई: शक था, कि उसने अपने शौहर और ससुर को ज़हर दे दिया था.
करीब साल भर जेल में बंद रही, मगर – बेगुनाह साबित हो गई, - ज़हर देने
वाला उसके शौहर का भाई ही निकला, शराबी.”
सम्गीन की
स्टडी-टेबल पे बैठकर वह कोई और किस्सा सुनाने लगी – ये भी काला ही कारनामा था; सम्गीन
मुग्ध होकर उसकी ओर देखते हुए, बेध्यानी से सुन रहा था, और उसे
अप्रिय आश्चर्य हुआ, जब वह, उठते हुए, स्वामित्व
की भावना से बोली:
“ भुगतान की अवधि
जून में ख़त्म हो रही है, मतलब, तब तक तुम
इन कागज़ात को लीदिया मूरोम्स्काया के प्रतिनिधि से ख़रीद लो. ठीक है? तो, अब चलती
हूँ,
कल
मैं बाहर जा रही हूँ, करीब डेढ़ हफ़्ते के लिए.”
जब वह उसका हाथ
चूमने के लिए झुका, तो मरीना ने उसके माथे को चूमा, और फिर
उसके कंधे को थपथपा कर बोली, जैसे बीबी शौहर से कहती है:
“बोर मत होना!”
उसके होंठ प्यार की
विशेष गर्माहट लिए थे, और माथे की त्वचा काफ़ी देर तक उनके स्पर्श को
महसूस करती रही.
ये सब याद करते हुए, कमरे में
सम्गीम धीरे धीरे टहल रहा था और लगातार सिगरेट पिए जा रहा था. खिड़की से चमकता हुआ
चाँद दिखाई दे रहा था, बाहर बर्फ़ पिघल रही थी, टेलिग्राफ़
के तार पर एक दूसरे से समान दूरी पर बूँदें फ़िसल रही थीं, मोटी-मोटी
सुनहरी बूंदें और, किसी एक अनदेखे बिंदु पर पहुँच कर, उससे टूट
कर गिर रही थीं. सम्गीन बड़ी देर तक, बेवजह उनकी ओर देखता रहा, उसने
सैंतालीस बूँदें गिनीं और किसी को उलाहना देते हुए कहा:
‘सब उसी जगह
पे’.
वह शयन कक्ष में
गया,
कपड़े
उतारे,
लैम्प
बुझाना भूल कर लेट गया और, किसी बीमार की तरह अधलेटा, लगातार आग
की सुनहरी लौ की ओर देखते हुए सोचने लगा, कि जब मरीना दिमाग़ की उच्छृंखलता के बारे में बात
करती है – तो वह सही कहती है.
‘साहित्यकारों, पत्रकारों
द्वारा प्रशिक्षित, आलोचनात्मक रूप से विचार करने वाला व्यक्तित्व
अपनी
भूमिका निभा चुका है, ज़्यादा पक गया है, अप्रासंगिक
हो चुका है. उसका विचार हर चीज़ में खमीर ला देता है, उसे आलोचना
की एक जैसी, ज़ंग से ढँक देता है. पूरी तरह ठोस तथ्यों से वह सीधे
नहीं,
बल्कि
काल्पनिक निष्कर्ष निकालता है, जैसे परिकल्पना सामाजिक, मतलब – असल
में,
सामाजिक
क्रांति की, रूस में, आधे जंगली लोगों के देश में, जैसे, मिसाल के
तौर पर, ये ‘प्रवाह के खोजी’ हैं. मगर
लोगों को आधे जंगली कहने के बाद, उसने ख़ुद ही को उलाहना दिया:
‘मेरा लोगों
के प्रति रवैया काफ़ी अपेक्षापूर्ण और अनैतिहासिक है. तर्कों में ऐतिहासिकता की कमी
– बुद्धिजीवियों का सामान्य दोष है. वो इतिहास को महसूस किए बिना उसके बारे में
बोलते हैं और लिखते हैं’.
इसके बाद उसने सोचा, कि वह
दुन्याशा से ठीक बर्ताव नहीं करता है, उसकी सादगी का सही मूल्यांकन नहीं करता है. ये
बुरी बात है, कि औरत के साथ भी वह अपने आप को भूल नहीं सकता है, उसका और
अपना निरीक्षण करने की योग्यता को खो नहीं सकता है. किसी फ्रांसीसी लेखक ने पेशेवर
विश्लेषण की अधिकता पर कटु टिप्पणी की थी...किसने? और, लेखक का नाम
याद न करके सम्गीन सो गया.
मरीना करीब तीन
हफ़्तों तक नहीं लौटी, - दुकान का काम काली दाढ़ी वाला, ख़ामोश
तबियत ज़खारी देख रहा था, उसका चेहरा भावहीन, सुस्त-पीला
था,
उसकी
काली आँखें उदासी से देखती थीं, सवालों का जवाब वह हौले से, संक्षेप
में देता था; घने, भारी बाल जैसे समय से पहले सफ़ेद हो गए धागों
की रज़ाई से ढँके थे. सम्गीन को लगा कि ज़खारी किसी भेस बदले हुए पादरी की तरह है और
आशिक के रूप में मरीना की सेवा करने के लिए काफ़ी सुस्त और एनिमिक है.
‘यही बात है
– सेवा करने के लिए. शौहर भी, शायद, उसकी सेवा
करता था’.
अब उसके दिमाग़ में
ख़याल आया, कि, हो सकता है मरीना उसे भी मजबूर कर दे न केवल एटोर्नी
के रूप में उसकी सेवा करने के लिए, मगर मरीना के आशिक के रूप में स्वयम् की
कल्पना न करते हुए, उसने फ़ौरन इस विचार को दिमाग से निकाल दिया.
उसके भीतर एक मर्द की उत्सुकता को जगाते हुए, जो उम्र और
अनुभव के कारण काफ़ी ठण्डा पड़ गया है, मरीना ने उसकी यौन भावनाओं को जागृत नहीं किया
था. उसके बारे में तीव्र सहानुभूति की भावना भी महसूस नहीं होती थी, मगर
करीब-करीब हर मुलाकात के बाद वह गौर करता था, कि वह उसके
भीतर गहरी दिलचस्पी जगा रही है और उसके भीतर कोई अजीब शक्ति है; आकर्षित और
विकर्षित करते हुए, ये शक्ति उसके भीतर किसी साधारण खोज की
अस्पष्ट उम्मीदों को जगाती है.
मगर आख़िरकार वह इस
बात से ख़ुश था, कि इस औरत से मुलाकात हो गई और वह किसी हद तक
उसे अपने आप के बारे में चिंता करने से दूर हटाती है, ख़ुश था, कि काफ़ी
अच्छी तरह से, स्वतंत्र रूप से यहाँ बस गया है, और जो कुछ
भी अब तक भोगा है, उससे आराम पा सकता है. और, उसे अक्सर
महसूस होता कि ज़िंदगी के इस शांत दौर में वह अवश्य ही किसी महत्वपूर्ण आविष्कार की
देहलीज़ पर आ पहुँचा है, जो उसकी
आंतरिक उथल-पुथल को ठीक करके उसे किसी ठोस आधार पर मज़बूती से स्थिर होने में मदद
करेगा.
जब मरीना वापस लौटी
तो सम्गीन उससे ऐसी ख़ुशी से मिला, जिससे वह ख़ुद ही हैरान हो गया.
दिखाई दे रहा था, कि वह बहुत
थक गई है, आँखों के नीचे परछाईयाँ थीं, जिनसे
आँखें गहरी और ज़्यादा ख़ूबसूरत नज़र आ रही थीं. स्पष्ट था, कि उसे कोई
चीज़ परेशान कर रही है, - रसीली आवाज़ में एक तीखा सुर भी सुनाई दे रहा
था,
आँख़ें
ज़्यादा पैनेपन और व्यंग्य से मुस्कुरा रही थीं.
“क्या ख़बरें सुनाऊँ?” होठों पर
ज़ुबान फ़ेरते हुए उसने मुस्कुराकर कहा. “अख़बारों से तो तुम्हें पता चल ही गया है, कि कैडेट्स
आगे बढ़ रहे हैं, मतलब – ख़ुश हो जाओ और नाचो गाओ! स्टेट ड्यूमा
में तुम्हारे सहयोगी, एडवोकेट्स बैठने वाले हैं. त्वेर में भी
गवर्नर को मार डाला, - पढ़ा? सुना है कि ये आदेश निकला है: किसानों के
प्रतिनिधि मंडलों को त्सार के पास न जाने दिया जाए. दुर्नवो गवर्नरों को सुझाव दे
रहा है, कि ज़्यादा गोलीबारी न करें. और क्या? एक बिशप से
मिली थी, उसने हाल ही में त्सार से बात की थी, कहता है, कि त्सार –
रूस का सबसे ज़्यादा शांत आदमी है. बिशप ये बात आहें भरते हुए, दुख से कह
रहा था...”
एक मिनट के लिए वह
भौंहे चढ़ाकर ख़यालों में खो गई, फिर उसने पूछा;
“सिगरेट दो.”
और, कश लेने के
बाद,
मगर
रूमाल से धुँए को दूर भगाते हुए, आँखें बारीक करके, फिर से
कहने लगी:
“रूढ़िवादी हरकत में
आ गए हैं. ऐसा लगता है कि हमारे यहाँ दो तरह के चर्च होंगे: एक – जो भौंकता है, दूसरा – जो
गुर्राता है! जहाँ तक धार्मिक सोच का सवाल है, हम बिल्कुल
बेकार लोग हैं, और हमारा चर्च भी औसत दर्जे का है...”
सम्गीन ने बेहद
सावधानी से कहा:
“समझ में नहीं आता, कि तुम्हें
– जो इतनी बड़ी, ख़ूबसूरत है, इन सवालों
में क्यों दिलचस्पी है...”
“और तुम – क्या ये
सोचते हो, कि धर्म - तपेदिक के मरीज़ों का ही काम है? गलत सोचते
हो. असल में तंदुरुस्त जिस्म को ही पवित्रता की ज़रूरत है. ग्रीक लोग बड़ी अच्छी तरह
ये बात समझते थे.”
सिगरेट को हाथ धोने
के बाऊल में डुबाकर, उसने त्यौरी चढ़ाकर अपनी बात जारी रखी:
“मेरी नज़र में, धर्म –
औरतों का काम है. सभी धर्मों में ख़ुदा को जन्म देने वाली – औरत ही थी. हाँ. और फिर
न जाने कैसे ये हुआ, कि करीब-करीब सभी धर्मों ने औरत को गुनाह का स्त्रोत
मान लिया, उसे बदनाम किया, अपमानित
किया,
और
ऑर्थोडॉक्स चर्च तो बच्चे के जन्म को भी खर्चीला काम समझकर जच्चा को डेढ़ महीने में
ही चर्च से बाहर निकाल देते हैं. क्या तुमने कभी सोचा है, कि ऐसा
क्यों है?”
“नहीं,” सम्गीन ने
जवाब दिया और मकारोव के बारे में सुनाने लगा. मरीना ने मादैरा का घूँट भरा और बड़ी
देर तक उसे मुँह में घुमाती रही, फिर, शराब को हाथ धोने के प्याले में थूककर, माफ़ी
माँगने लगी:
“माफ़ करना, दो दिनों
से मुँह में न जाने कैसा कसैला स्वाद है.”
रूमाल से होंठ
पोंछे और सावधानी से उसे झटकते हुए बोली:
“फ़ेमिनिज़्म, औरतों का
मताधिकार – ये सब, प्यारे दोस्त, कमज़ोर दिल
वालों की कल्पनाएँ हैं.”
सम्गीन फिर से ख़ामोश हो गया, और वह अपने
कानूनी मामलों के बारे में, अपने पुराने एडवोकेट के बारे में बताने लगी:
“चपटा बेवकूफ़, और चाहता
है बदमाश बनना. लिबरल है, और – क्या
हासिल कर लेंग़े लिबरल्स? कन्सर्वेटिव्ज़ होना सही है. सोचते हैं, कि ये
उनमें नज़र नहीं आता है! मगर अपना मकसद हासिल कर लेंगे, - तुम क्या
सोचते हो?”
“हो सकता है.”
सम्गीन ने सहमति दिखाई.
मरीना हँस पड़ी. हर बार, उससे बातें
करते हुए, शब्दों के उसके नियंत्रण पर, विचारों को
गढ़ने की योग्यता पर सम्गीन को जलन होती थी, मगर बातचीत
के बाद उसे हमेशा महसूस होता, कि मरीना को ज़्यादा समझ नहीं पाया है, और उसका
मुख्य विचार अभी तक पकड़ में नहीं आया है.
धर्म के बारे में
उसकी बातों को उसने महत्व नहीं दिया, उसे लगा कि ये ‘वाक्यों की
प्रणाली’ है; इन वाक्यों से सजी हुई, मरीना उनकी
असाधारणता में कोई ज़्यादा महत्वपूर्ण बात, आत्मरक्षा
के उसके असली हथियार को छुपाती है; इस हथियार की बदौलत वह विश्वास करती है, और यही
विश्वास वास्तविकता के प्रति उसके शांत रवैये को, लोगों के
प्रति - अधिकारपूर्ण रवैये को समझाता है. मगर कैसा है ये हथियार?
उसके कानूनी मामलों
से उसने देखा, कि उसका शौहर अकलमंद और क्रूर दौलत हड़पने वाला
था;
वो
ज़मीनें, जंगल, घर ख़रीदता और बेचता, पैसों को जागीरों
को गिरवी रखने के लिए लगाता, उसके कई कारनामे सूदखोरों जैसे थे.
“भोगवादी!” मामले
को पढ़ते हुए सम्गीन मुस्कुराया.
मरीना को न सिर्फ
इन हरकतों से सकुचाहट नहीं होती थी, बल्कि वह सफ़लतापूर्वक उन्हें चलाती जा रही थी.
‘किस शैतान
की ख़ातिर उसे पैसों की ज़रूरत है?’ सम्गीन ने सोचा. “काफ़ी अमीर है – रहन-सहन भी
सादगी भरा है. परोपकार के कामों में भी कोई ज़्यादा खर्च नहीं करती है...’
उसके हाथों में
जिला प्रमुख की गिरवी रखी हुई जागीर की वसूली से संबंधित मामला था, इस प्रमुख
की जागीर को किसानों ने तोड़ फोड़ करके जला दिया था. मरीना ने कहा:
“पैसे देने के लिए –
उसके पास कुछ नहीं है, वो जुआरी, शराबी है; पीटर्सबुर्ग
में उसे थोड़ा सा मुआवजा मिला था, मगर उसे वह पहले ही उड़ा चुका है. ज़मीन मेरे ही
पास रहेगी, वे ही किसान उसे वापस ख़रीद लेंगे. सम्गीन के कंधे पर
ऊँगली से टकटक करते हुए, मरीना मुस्कुराई:
“देख रहे हो: किसान
मालिक से लड़ते हैं, और व्यापारिन जीत जाती है! और, हमेशा से
ऐसा ही होता रहा है.”
सम्गीन को उसके इन
शब्दों में व्यंग्य नज़र नहीं आया, और इससे उसे बहुत अचरज हुआ.
इस बारे में कि ‘व्यापारी
जीतता है’, वह अक्सर कहा करती थी, और हमेशा –
मज़ाक में, जैसे क्लीम को चिढ़ा रही हो.
“अगर वाकई में
ड्यूमा में व्यापारी और पादरी बैठ जाएँ, तो आप – बुद्धिजीवियों के लिए अच्छा नहीं
होगा.”
“मज़दूर भी हैं”, - उसने याद
दिलाया.
“हैं क्या? बैठेंगे.
मगर वो समय – दूर है!”
उसने ग़ौर किया कि यात्रा
से लौटने के बाद, मरीना उससे ज़्यादा प्यार से, ज़्यादा
दोस्ताना ढंग से पेश आने लगी थी, बिना उस व्यंग्य के, जो अक्सर
उसके आत्म सम्मान को चोट पहुँचाता था. और
इस नए बर्ताव ने उसकी अस्पष्ट आशाओं को, उसके प्रति दिलचस्पी को बढ़ावा दिया था.
कुछ दिनों के बाद किसी
जायदाद पर मरीना के अधिकार की पुष्टि करने के लिए, जिससे किसी
बूढ़ी अविवाहित महिला की वसीयत के मुताबिक उसे बेदखल कर दिया गया था, उसे वोल्गा
किनारे के किसी शहर में जाना था.
“वैसे, क्लीम
सम्गीन,” उसने कहा. “करीब दस साल पहले वहाँ पतापोव नाम के एक
व्यापारी को किसी संप्रदाय से संबंध रखने के जुर्म में सज़ा हुई थी. अदालत में
क्लाव्दिया ज़्व्यागिना के, - पेन्ज़ा में थी ऐसी एक औरत, जो इस
कार्रवाई से लगभग दो साल पहले मर गई थी, - पत्र पढ़े गए थे. और किसी याकोव तबोल्स्की की हस्तलिखित
पाण्डुलिपी भी पढ़ी गई थी. तो तुम - ‘सेवा की
ख़ातिर नहीं, बल्कि दोस्ती की ख़ातिर’ – मुझे वो
कागज़ात ला दो. वो, बेशक, सरकारी
रेकॉर्ड में हैं, और तुम्हें रजिस्ट्रार सेराफ़िम पनमारेव से
मिलना होगा, उसे धन्यवाद देना; पचास
रूबल्स दे देना, ज़्यादा भी दे सकते हो. इन डॉक्यूमेन्ट्स में
मुझे दिलचस्पी है, किसी तरह इकट्ठा करती रहती हूँ, तुम्हें
दिखाऊँगी. मेरे पास पत्र हैं व्लादीमिर सोलोव्येव के, ओप्तिना के
किसी पादरी, ज़्यूदेर्गेम के, ‘भगोड़ों के
बारे में’ भी कुछ है; ये मेरे शौहर ने उन्हें इकट्ठा करना शुरू किया
था. बेहद दिलचस्प है. तुम इस सेराफ़िम से कहना, कि
वैज्ञानिक शोध-कार्य के लिए इन डॉक्यूमेन्ट्स की ज़रूरत है”.
हमेशा की ही तरह, उसकी
सुरीली आवाज़ और अनजान आदमी के बारे में किए गए वर्णन ने सम्गीन को औरत के आकर्षण
के सामने झुकने पर मजबूर कर दिया, और उसने इस विनती के महत्व के बारे में नहीं
सोचा,
जो
एक ऐसे आदमी के लहज़े में व्यक्त की गई थी, जो किसी
मनोरंजक, अपनी किसी सनक के बारे में कह रहा हो. सिर्फ उस जगह
पे,
व्यापारियों
के एक अनजान और अप्रिय शहर में, अदालत में जाते हुए सम्गीन ने सोचा कि वह
डॉक्यूमेन्ट्स की चोरी में शामिल होने पर सहमत हो गया है. इससे वह परेशान हो गया. ‘ख़ैर, शैतान ले
जाए! कैसी गलती कर बैठा’. मगर, रजिस्ट्रार के गंदे, आधे अंधेरे
कमरे में आने पर उसने अपने सामने गुलाबी गालों वाले छोटे से बूढ़े को देखा, बूढ़ा
प्रसन्नता से मुस्कुराया, पंजों के बल चलकर उसके पास आया और मुलायम आवाज़
में बात करने लगा. सम्गीन समझा नहीं सकता था, कि बूढ़े की
स्थिरता की परीक्षा लेने के लिए उसे किस बात ने मजबूर किया था. मरीना की सलाह के
मुताबिक उसने बताया, कि वह सम्प्रदायों का अध्ययन कर रहा है. बूढ़ा
ज़रा भी ज़िद्दी नहीं निकला, - ग़ौर से काम के बारे में प्रस्ताव को सुनकर वह
प्यार से बोला:
“बेशक, संभव है, क्योंकि दस्तावेज़
मौद्रिक नहीं हैं. और अगर पादरियों ने उनका इस्तेमाल नहीं किया है, तो मैं
ढूँढ़ लूँगा. आम तौर से इस तरह के दस्तावेज़ परम पवित्र धर्म सभा को भेज दिए जाते
हैं,
उनकी
लाइब्रेरी में.”
और दो दिन बाद, सम्गीन को
चमड़े के कवर में ख़तों का पैकेट और एक नोटबुक दिखाते हुए, उसने
बेशर्मी से सम्गीन के चेहरे की ओर देखते हुए कहा:
“लेख का
शीर्षक कितना दिलकश है, देखिए तो: ‘इआकोव’ – सीधा-सादा
याकोव नहीं, बल्कि ‘इआकोव, देखिए! ‘इआकोव
तबोल्स्की के विचार – रूह, जिस्म और शाइतान के बारे में’ – शाइतान, न कि
शैतान! मज़ेदार होना चाहिए!”
और नोटबुक को मेज़
पर रखकर, उसे फूले-फूले गुलाबी हाथ से दबाते हुए, ढिठाई से मांग
की:
“पच्चीस और रखिए.”
सम्गीन ने रख दिए
और फ़ौरन सोच लिया कि मरीना के सामने छोटा सा हंगामा करेगा, कि भविष्य
में ऐसी ज़िम्मेदारियों से उसे दूर रखा जाए. मगर फिर उसने समझदारी से सोचा:
‘क्या इस
घटना से मुझे ये सोचने का हक मिल जाता है, कि ऐसी
ज़िम्मेदारियाँ बार-बार दी जा सकती हैं?’
रास्ते में, कम्पार्टमेन्ट
में,
उसने
नोटबुक निकाली और, उसके नीले पन्नों पर लाल भूरे, ज़ंग जैसे
अक्षर पढ़े:
‘ और ये
ग़लतफ़हमी, कि इन्सान को प्यार करने के बाद ख़ुदा ने उसके जनम को
और उसके जिस्म को भी प्यार किया, हमारा मालिक तो रूह है और वो जिस्मानी प्यार
में दखल नहीं देता, बल्कि जिस्म को नकार देता है. इसके लिए कौन से
सुबूत दे सकते हैं? पहला: हमारा जिस्म गंदा और गुनहगार है, बीमारियों, मौत और
विनाश का शिकार है...’
गोल, उकताहटभरे अक्षरों
में लिखे कुछ पन्ने पलटने के बाद उसकी आँखें एक वाक्य पर पड़ीं, जिन्हें
रेखांकित किया गया था: ‘मतलब: रूह को पहले स्थान पर रखना चाहिए, बाप और
बेटे से भी पहले, क्योंकि बाप और बेटा तो रूह से पैदा होते हैं, न कि रूह
बाप से’.
‘क्या बकवास
है,’
सम्गीन
ने सोचा और नोटबुक को बैग में छुपा दिया. ‘ये हो नहीं
सकता,
कि
मरीना को इसमें गंभीर किस्म की दिलचस्पी हो. और इस काम का कानूनी पहलू उसकी समझ से
बिल्कुल बाहर है’.
शहर में, बिज़बेदोव
के घर के पास जाते हुए, उसने सड़क के बीचोंबीच एक मज़ेदार ग्रुप देखा:
बगल में डाक-बुक दबाए
एक पुलिस वाला, चौख़ाने वाली स्कर्ट पहने, हाथों में लाठी
लिए एक बुढ़िया, दाढ़ी वाला पादरी, फ़टे पुराने
कपड़े पहने तीन लड़के और सफ़ेद कोट में एक टीचर – चुपचाप आऊट हाऊस की छत की ओर देख
रहे थे; वहाँ, पाइप के पास, हिलते हुए
बिज़बेदोव खड़ा था, बिना बेल्ट के ढीला-ढाला नीला कोट और धारियों
वाली पतलून पहने, - उसके नंगे पैरों की एडियाँ बंदरों के समान छत
के फट्टों को कस के पकड़े हुए थीं. गंदी चिंधियों की एक लम्बी लचीली झाडू लहराते
हुए,
वह
सीटी बजा रहा था, गरज रहा था, खाँस रहा
था,
और
उसके बिखरे बालों वाले सिर के ऊपर आसमानी, हल्की
मटमैली हवा में कबूतरों का झुण्ड उड़ रहा था, मानो बर्फ
जैसे सफ़ेद फूल छत पर गिरते हुए थरथरा रहे हों.
जब सम्गीन
कम्पाऊण्ड में घुसा तो बिज़बेदोव गरज रहा था : “आलसी हो गए थे, शैतान
जितने,
- मुटा
गये थे! ठीक है,- मैं उन्हें - ठीक कर दूँगा! मैं – ऊपर
उठाऊँगा! देखिए! मुस्कुराएँगे...”
सम्गीन ने उसकी ओर
देखकर टोपी हिलाई और सोचने लगा:
‘ठीक ही
कहते हैं: अजीब डरावना है’.
शाम की चाय से पहले
बिज़बेदोव नदी पे गया, नहाया और, गीले बाल
लेकर मेज़ पे बैठा, जैसे मुड़ी-तुड़ी पुरानी टोपी सिर पे रखी हो, खाँसते हुए, पसीना-पसीना
होते हुए, चाय वाले नैपकिन से चेहरा पोंछते हुए, बुदबुदाया:
“मूरोम्स्काया आई
थी. कहती है, कि त्सार लंदन भागने की तैयारी में है, कैडेट्स से
डर गया है, और कैडेट्स डरते हैं लेफ्टिस्ट्स से, और वैसे
...शैतान जाने क्या होने वाला है!”
वह ज़ोर-ज़ोर से आवाज़
करते हुए खाँसने लगा, खून के दबाव से उसका चेहरा और गर्दन फूल गए, आँखों के
ढेले,
लाल
होकर,
बाहर
निकलने को हो गए, बाहर निकले हुए कान थरथराने लगे. सम्गीन ने
इससे पहले उसे इतना भयानक उत्तेजित कभी नहीं देखा था.
“और नया मिनिस्टर, स्तलीपिन, कहता है, - डरपोक और
बेवकूफ़.”
बेध्यानी से सुनते
हुए,
सम्गीन
ने पूछा:
“किससे कहता है?”
“किसी से नहीं कहता,” बिज़बेदोव
ने गुस्से से कहा. “ये – वो नहीं कहता, बल्कि – मूरोम्स्काया. सनकी, शैतान
उसे...धूल उड़ रही है, कैसी हवा है.”
उसने खाँसना ख़तम
किया,
रूमाल
में थूका और उसे मेज़ पर रखा, मगर फ़ौरन सावधानी से, एक ऊँगली
से,
फ़र्श
पे फेंक दिया और, फिर से कँपकँपाकर नैपकिन से माथा, कनपटियाँ
पोंछते हुए, चिढ़कर बड़बड़ाया:
“चिल्लाती है: जंगल
बेच दो, विदेश जा रही हूँ! किस शैतान को मैं बेचूँ, जब कोई भी, कुछ भी
नहीं जानता, किसान जंगलों में आग लगा रहे हैं, सब लोग –
डरे हुए हैं...और मैं – ब्लीनोव से डरता हूँ, यहाँ वो
मेरे ख़िलाफ़ कोई ख़ुराफ़ात कर रहा है, हो सकता है, मेरा कबूतरों
का दड़बा जला देना चाहता हो? अभी परसों ही मैदान में ‘यूनियन ऑफ़
रशियन पीपल’ की मीटिंग हुई थी, वहाँ वह
दहाड़ रहा था: “बस!” बेवकूफ़ की नाक से खून भी निकल आया था...”
पाइप पीने
के बाद वह कुछ शांत हुआ और उसने अपने मज़बूत, असमान दाँत
दिखाए.
“चिल्लाया: ‘फ़िनलैण्ड
अलग होना चाहता है, स्वीडन हमारे ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर रहा है’, - मतलब:
खिचड़ी पक रही है!”
साफ़ था, कि उसे
अपने दिमाग़ से उन ख़बरों को बाहर निकालने की जल्दी हो रही थी, जो उसका दम
घोंट रही थीं. सम्गीन हँस पड़ा.
“हाँ, हँसने वाली
बात ही है,” बिज़बेदोव ने कहा. “त्सार ने ड्यूमा का उद्घाटन किया
शाही लिबास में, मुकुट पहनकर, मगर वहाँ
सब – फ्रॉक-कोट्स में थे. फ्रॉक-कोट में या कोट-जैकेट में – आप नहीं जानते?”
“नहीं जानता.”
“ हास्यास्पद!
शैतान,
क्या
दिन आ गए हैं, आँ? इंग्लैण्ड जैसा. वो – शाही लिबास में, और वे –
फ्रॉक-कोट्स में! फ्रॉक-कोट वाला आदमी अबाबील की याद दिलाता है. उन्हें बस किसी
गाऊन में सजा दो. अच्छे कपड़े पहना हुआ आदमी बेवकूफ़ जैसा कम लगता है.”
सम्गीन ने चश्मा
ठीक करके उसकी तरफ़ देखा; बिज़बेदोव के मुँह से ऐसी कहावतों ने इस आदमी
की बेवकूफ़ी में शक पैदा कर दिया और उसके प्रति अप्रियता को बढ़ा दिया. बिज़बेदोव के
समाचारों को वह यंत्रवत् सुन रहा था, मानो वे हवा का शोर हों, उनके बारे
में मन में विचार नहीं आ रहे थे, वैसे ही जैसे किसी एक ही आर्टिस्ट के चित्रों
के बारे में नहीं सोच सकते, जब चित्र बहुत सारे हों और रंगों तथा तकनीक की
एकरूपता से थका देते हों. ये कुछ अजीब बात थी, मगर फ़ौरन
उसने स्पष्टीकरण ढूँढ लिया:
‘बिज़बेदोव
कबूतरों के दड़बे की ऊँचाई से बोलता है, उस आदमी के लहज़े में, जिसे बकवास
चीज़ों के बारे में बोलने की मजबूरी हो, जिनमें उसे दिलचस्पी नहीं है. इन सवालों के
ऊपर हज़ारों लोग अपना जीवन और व्यवसाय बरबाद कर देते हैं, और ये, बदमाश...’
सम्गीन गुस्सा हो
गया और वहाँ से चला गया. मरीना शहर में नहीं थी, वह आठ
दिनों बाद आई, और सम्गीन को इस बात से हैरानी हुई, कि वह दिन
गिन रहा था. जब उसने ‘विचारों’ का पत्रों
वाला पैकेट और नोटबुक उसे दी, तो उसने लापरवाही से उन्हें दीवान पर फेंककर
काफ़ी उदासीनता से कहा:
“थैन्क्यू.”
इससे सम्गीन को
यकीन हो गया कि ये व्यापारिन वाकई में उस काम का वकालती अर्थ नहीं जानती, जो उसने
उसकी इच्छानुसार किया था. इस अर्थ को उसे वह समझा नहीं पाया, - गर्दन के
पीछे हाथ रखे, थकावट की मुद्रा में बैठी हुई मरीना ने भी
समाचार सुनाना शुरू कर दिया:
“तो, भाई, पीटरबुर्ग
पूरी तरह दंग रह गया है. लीदिया मुझे कई राजनीतिक बैठकों में ले गई थी...”
“आप वहाँ साथ-साथ
थे?”
“हाँ.”
सम्गीन ने गौर किया
कि बिज़बेदोव ने उसे इसके बारे में नहीं बताया था. वह, भौंहों से
खेलती हुई, आँखों में मुस्कुराहट लिए, बता रही थी, कि त्सार
शरारत कर रहा है: ड्यूमा के प्रेसिडेण्ट से मिलते हुए – बदतमीज़ी से पेश आया, ये जानकर
कि नाविकों ने किसी एडमिरल को मार डाला है – पैर पटकने लगा और चिल्लाने लगा, कि अगर
लिबरल्स हत्याओं को रोक नहीं सकते हैं, तो वे राजनीतिक कैदियों के लिए आम माफ़ी की
माँग नहीं कर सकते; कि केलेत्स्की के गवर्नर ने अपनी माशूका को
मार डाला और सही सलामत, बिना सज़ा पाए छूट गया. स्तलीपिन के लोग इसलिए
नाख़ुश हैं, कि वह ड्यूमा को बचाने का निर्णय नहीं ले रहा है, मीटिंग्स
में लेफ़्टिस्ट्स कैडेट्स को मारते हैं, - वे, अपमान के कारण, राइटिस्ट्स
की ओर मुड़ जाते हैं.
“उस मशहूर एडवोकेट
को देखा, उसे, जो कविताएँ लिखता है, उसकी –
स्तलीपिन के बारे में बहुत अच्छी राय है, उसे हमेशा बचाता है, कहता है, कि, स्तलीपिन
जानबूझकर कॉन्स्टिट्यूशनलिस्ट्स को लेफ्टिस्ट्स का ज़हर देता है, उन्हें
डराना चाहता है, राइटिस्ट्स की तरफ़ गहरे धकेलना चाहता है.
एडवोकेट – आदमी प्यारा है, भला है, हेयरड्रेसर
की तरह, सिर्फ उसे चोर-उचक्कों को बचाने की आदत पड़ गई है.”
वो वही सब कह रही
थी,
जो
उसका भतीजा कह रहा था. उसकी बातों का लहज़ा सम्गीन के मुताबिक, ऐसे आदमी
का लहज़ा था, जो अनजान देश जाकर आया हो, और
विदेशियों की जीवन शैली का मूल्यांकन भी किसी कबूतरों के दड़बे की ऊँचाई से कर रहा
हो.
“तुम तो बिल्कुल
ऐसे बता रही हो, जैसे बच्चों की शरारतों के बारे में कह रही हो,” उसने
टिप्पणी की; मरीना हँस पड़ी:
“क्या सच में? बुढ़िया
जैसी?
बूढ़ी
टीचर जैसी? क्या तुम्हारे क्रांतिकारी दिल को ठण्डा कर रही हूँ? सिगरेट
दो.”
उसे सिगरेटकेस थमाते
हुए,
सम्गीन
ने गौर किया, कि उसका हाथ काँप रहा है. उसके भीतर इस अजीब मास्क
पहनी औरत के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा था. अब वह उसे उन बकवास ‘विचारों’ और डॉक्यूमेन्ट्स
वाले काम के बारे में बताएगा. मगर मरीना ने बाज़ी मार ली. कश लेकर, धुँए की
लकीर को फूँक मारकर छत की ओर भगाते हुए, वह दबी आवाज़ में, धीरे-धीरे कहने लगी:
“क्लीम इवानोविच, तुम बेकार
ही में मेरे सामने साही बनने की कोशिश करते हो, - तुम्हारे
कांटे ख़तरनाक नहीं हैं, चुभते नहीं हैं. और बेकार में ही तुम अपने दिल
में तर्क की आग जलाते हो, - तुम्हारा दिल जलता नहीं है, बल्कि सूख
जाता है. तुमने अपनी धज्जियाँ उड़ा ली हैं – शायद विश्लेषणों से, या मालूम
नहीं किससे! मैं सिर्फ ये जानती हूँ: दिमित्री पीसारेव जैसे आलोचनात्मक विचारक के
दिन,
कब
के लद गए, उसका फ़ैशन नहीं है, - आलोचना का
पतन हो गया है बुद्धि के प्रति – और सिर्फ उसी जुनून से”.
इस तरह वह दो-तीन
मिनट तक बोलती रही. सम्गीन धीरज से सुन रहा था, उसके लगभग
सभी विचारों से वह पहले से परिचित था, मगर इस बार
वे पहले की अपेक्षा ज़्यादा समृद्ध और मुलायम, ज़्यादा
दोस्ताना लग रहे थे.
उसके भाषण के धीमे
प्रवाह में वह किन्हीं अतिरिक्त शब्दों को ढूँढ रहा था, बहुत चाहता
था कि वे मिल जाएँ, मगर नहीं मिले और उसने देखा कि वह अपने शब्दों
से उसीके कुछ विचार गढ़ रही है. उसने सोचा, कि वह ख़ुद
उन्हें इतनी सरलता और गंभीरता से व्यक्त नहीं कर सकता था.
‘सचमुच, - जब वह
बोलती है, तो अपनी उम्र से ज़्यादा प्रतीत होती है’, उसकी कत्थई आँख़ों की चमक का
निरीक्षण करते हुए उसने सोचा; आँखों को बरौनियों से ढाँके, मरीना अपनी दाईं हथेली
देख रही थी. सम्गीन को महसूस हुआ कि वह उसे निःशस्त्र करना चाहती है, मगर उसने
सीने पर हाथ रखकर, पैर लम्बे करके, ये कहते
हुए गहरी साँस ली:
“थक गई हूँ मैं और, शायद
बदतमीज़ी से, बेतरतीबी से बोल रही हूँ, मगर मैं ये
तुम्हारे प्रति अच्छी भावना से ही कह रही हूँ. तुम - इस तरह के पहले आदमी नहीं हो, जिससे मैं
मिली हूँ, बहुत सारे ऐसे लोगों से मिल चुकी हूँ. मेरा शौहर तो
उन लोगों के सामने बिछा जाता था, जो ज़िंदगी को बदलना चाहते हैं, मैं भी उनके
प्रति उदासीन नहीं हूँ. मैं – औरत, - याद है मैंने कहा था: सारे मज़हबों के ख़ुदा की
माँ हूँ? विश्वास करने वाले लोग मुझे अच्छे लगते हैं, अगर उनका
मज़हब बिन-ख़ुदा वाला हो.”
सम्गीन महसूस कर
रहा था, कि वह उथले विचारों के प्रवाह में फ़ँस गया है, वे बहे जा
रहे हैं, जैसे खुले दरवाज़ों और खिड़कियों वाले कमरे में धूल भरी
हवा बहती है. उसने सोचा कि मरीना का चेहरा निश्चल है, उसके
चमकीले होंठ हमेशा हिकारत और व्यंग्य से मुस्कुराते हैं; इस चेहरे
की ख़ास बात है – भँवों का खेल, वह उन्हें ऊपर उठाती और नीचे करती रहती है, कभी –
दोनों एक साथ, कभी – सिर्फ दाईं, और तब उसकी
बाईं आँख चालाकी से चमकती है. जो कुछ मरीना कह रही है, वो इतना
संक्रामक नहीं है, जितना उसका इरादा: वह ऐसा क्यों कह रही है?
“प्यारे दोस्त, - क्रांतिकारी
– दुनिया से नफ़रत करता है, मगर मनुष्यद्रोही नहीं है, लोगों से
वह प्यार करता है, उन्हींकी ख़ातिर जीता है,” सम्गीन ने
सुना.
“ये –
रोमॅन्टिसिज़्म है,” उसने कहा.
“क्या वाकई?”
“रोमॅन्टिसिज़्म. और
तुम उसके काबिल नहीं हो.”
उसने अचरज से पूछा:
“क्या मैंने अपने
आपको क्रांतिकारी कहा है?”
“मैंने भी तुमसे
नहीं कहा कि मैं क्रांतिकारी हूँ,” बगैर सोचे सम्गीन ने कहा और उसे महसूस हुआ कि
वह लाल हो रहा है.
“ सही है,” उसने सहमति
दिखाई. “नहीं कहा, मगर...तुम मुझ पर गुस्सा न होना: मेरे ख़याल से
ज़्यादातर बुद्धिवादी – अस्थाई रूप से समर्पित क्रांतिकारी हैं, - कॉन्स्टिट्यूशन
तक,
रिपब्लिक
तक. बुरा तो नहीं लगा?”
“नहीं,” सम्गीन ने
कहा,
ये
समझते हुए कि झूठ बोल रहा है, उसके ख़याल अपमानित हो गए थे, और उसके
शब्दों से दूर भाग रहे थे, मगर वह महसूस कर रहा था, कि उसके
प्रति चिड़चिड़ाहट ख़त्म होती जा रही है और उसके शब्दों का विरोध करने का – मन नहीं
है,
शायद, इसलिए, कि उसे
सुनना ज़्यादा दिलचस्प है, बजाय उससे बहस करने के. उसे याद आया, कि अस्थाई
रूप से समर्पित क्रांतिकारियों के बारे में वारवरा, और उसके बाद
मकारोव भी ज़ोतोवा के विचारों से मिलता-जुलता ही कुछ कहते थे. ये बात बुरी लग रही
थी,
ये
जैसे मरीना की बातों के महत्व को कम कर रही थी.
“तुम मुझसे इस विषय
पर क्यों बात कर रही हो और... कितनी अजीब तरह से कह रही हो? क्यों शक
कर रही हो कि मैं ईमानदार नहीं हूँ?” उसने पूछा.
“नहीं समझे,” उसने गहरी
साँस लेकर कहा. “मैं चाहती हूँ, कि तुम अपने दिमाग़ को फ़ाँद जाओ. क्लीम
इवानोविच, तुम्हें किसी दूसरे अलाव के सामने आग तापना चाहिए, बस इतना ही
कह रही हूँ.”
“मुझे आराम करना
चाहिए,”
उसने
कहा.
“यही तो मैं
भी कह रही हूँ. कौन सी चीज़ रोक रही है तुम्हें?” उसके सामने
खड़े होकर अपने बालों को ठीक करते हुए उसने पूछा, - जैसे चिकनी, लचीली, बड़ी मछली
हो.
सम्गीन ने अपने
आपको रोका, जिससे कह न बैठे:
‘तुम रोक
रही हो!’
वह ऐसी मनस्थिति
में बाहर चला गया, जिसे वह ख़ुद ही समझ नहीं पा रहा था: इस बातचीत
ने उसे मरीना के साथ हुई और बातों के मुकाबले ज़्यादा परेशान कर दिया; आज उसने
उसे ये अधिकार दे दिया कि ख़ुद को उसके द्वारा अपमानित समझे, मगर अपमान
महासूस ही नहीं हो रहा था.
‘अकलमंद है,” रास्ते के
छायादार हिस्से में चलते हुए और धूप वाले हिस्से की तरफ़ देखते हुए, जहाँ किन्हीं
सुखी घरों की खिड़कियों के काँच चमक रहे थे, और आँख़ें
सिकोड़ रहे थे, वह सोच रहा था. “अकलमंद और पैनी है. उससे बहस
करना?
बेकार
है. और किस बारे में? दिल – एक शारीरिक शब्द है, आम भाषा
में उसे कई तरह के गुण दिए जाते हैं – दुखद और काव्यात्मक स्वरूप के, - वह, शायद, इस लिहाज़
से बिना दिल वाली है’.
उसके सामने, पहाड़ के
पीछे से लीपा वृक्षों के कोमल हरे शिखर ऊपर उठ रहे थे, उनके बीच
महिला कॉन्वेन्ट के बेल-टॉवर का सुनहरा, मगर चिकना सिर असफ़ल रूप से छुप रहा था; आगे सब कुछ
नीले गढ़े में समा गया था, - उसके हरे पेंदे पे, शहर से दूर, अंधेरे
जंगलों की ओर, नीली सी नदी जा रही थी. सब कुछ बेहद नाज़ुक, ख़ामोश, शाम की
उदासी में लिपटा था.
‘असल में
उसने मुझे कोई अपमानजनक बात नहीं कही. और मैं भी बिल्कुल वैसा नहीं हूँ, जैसा वह
समझती है.’
इन विचारों ने
बातचीत के मुख्य प्रभाव को नहीं समेटा था; सम्गीन इस
प्रभाव को परिभाषित करने की जल्दी में भी नहीं था, - उसे ख़ुद ही
दृढ़ होने दो, ख़ुद-ब-ख़ुद बनने दो. ख़ूबसूरत एक मंज़िला घर के गार्डन
से एक मोटी, रोबदार महिला बाहर निकली, उसके पीछे –
एक ऊँचा नौजवान था, पूरी नई ड्रेस में, सिर की
पनामा हैट से लेकर भूरे अमेरिकन जूतों तक, बगल में
छड़ी दबाए और दाएँ हाथ पर पीला दस्ताना चढ़ाते हुए; वह कुछ
हास्यास्पद, मगर – ख़ुश लग रहा था और, ज़ाहिर था
कि इस ख़ुशी से कुछ बौखला गया था. सम्गीन ने स्वयम् को याद किया, जब उसने, स्कूली
लड़के का कोट उतार कर, नया हल्का भूरा सूट पहना था, - अटपटा, मगर अच्छा
लग रहा था.
‘मैं
काव्यात्मक होता जा रहा हूँ,’ उसने ग़ौर किया और मुस्कुरा दिया.
कम्पाऊण्ड में उसे
बिज़बेदोव मिला, हाथों में शिकार वाली दुनाली बंदूक पकड़े, हैरानी से
उसकी तरफ़ देखा और भर्राने लगा:
‘मुस्कुरा
रहे हैं? आपको तो – अच्छा है, मगर मुझे अभी
मूरोम्स्काया ने भगाया है मिखाइल अर्खांगेल की यूनियन में – रूस को बचाने के लिए, - शैतान ले
जाए! ये मिखाइल अर्खांगेल – पुलिस का संरक्षक है, - आपको पता
है?
और
मुझ पर तो पुलिस आए दिन बात-बात पर जुर्माना लगाती रहती है – कबूतरों के दड़बे की
वजह से, साफ़-सफ़ाई की वजह से और वगैरह, वगैरह.”
झाडू जैसे सिर को
हिलाते हुए, वह बंदूक के हत्थे से ड्योढ़ी की सीढ़ी पर खटखट कर रहा
था,
सम्गीन
को भीतर जाने से रोकते हुए, भर्राया:
“अगर आण्टी नहीं
होतीं – तो मैं इस शैतानी गुड़िया की हथेली पे, उसकी
राजनीति, उसकी यूनियन्स समेत, उसके
अर्खान्गेलों समेत थूक देता...”
वह वैसा ही था, हमेशा की
तरह,
मगर
सम्गीन के मन में उसने नफ़रत पैदा नहीं की.
“ये बंदूक किसके
लिए तैयार की है?”
“चूहे के लिए, हो सकता है
– बिलाव हो,” बिज़बेदोव ने कहा और वह अटारी की ओर गया.
कमरे में क्लीम का
स्वागत किया ठण्डक ने और ख़ामोशी ने, जो मानो उसका इंतज़ार कर रही थी. एक मक्खी तक
नहीं थी.
‘ये – इसलिए, कि मैं
यहाँ नहीं खाता हूँ,’ उसने सोचा. कुछ देर ड्राईंग रूम में खड़ा रहा, देखा कि
कैसे रोशनी का पट्टा उसके धूल भरे जूतों को चमका रहा है, और निश्चय
किया:
‘बिज़बेदोव
से मरीना के बारे में बात करनी चाहिए, अवश्य ही करनी चाहिए’.
सावधानी से, बिना
जल्दबाज़ी किए, सम्गीन ने सिगरेट केस निकाला, सिगरेट
निकाली, - माचिस की डिब्बी जेब में नहीं मिली, वो मेज़ पर
पड़ी थी. तब उसने सिगरेट केस छुपाकर सिगरेट को मेज़ पर फेंका और जेबों में हाथ डाल
लिए. कमरे के बीच में यूँ ही खड़े रहना बेवकूफ़ी थी, मगर हिलने
का मन नहीं कर रहा था, - वह खड़ा रहा और ग़ौर से उदास, मगर प्यारे-से
हल्केपन की अजीब भावना को महसूस करता रहा. ‘क्या मैंने
कभी इतना अजीब महसूस किया था? शायद – नहीं.’
फिर उसे याद आया, कि कुछ इसी
तरह का अनुभव उसे हुआ था, जब वह अपने सीनियर का सौंपा हुआ एक अप्रिय
कोर्ट-केस हार गया था. और कुछ तो इससे मिलता जुलता – मिला नहीं. वह मेज़ के पास आया, सिगरेट
उठाई और सोफ़े पर लेट गया, इस इंतज़ार में कि कब बुढ़िया फ़ेलित्साता उसे
शाम की चाय के लिए बुलाएगी.
करीब दो सप्ताह वह
प्यारी सी शांति की अजीब मनःस्थिति में रहा, और कभी कभी
उसे इससे न केवल आश्चर्य होता था, बल्कि एक परेशान ख़याल भी मन में उठने लगता था:
कहीं तो मुसीबतें इकट्ठा हो रही हैं. सुबह की चाय के समय दो स्थानीय अख़बारों पर
सरसरी नज़र डाली, - उनमें से एक हर रोज़ वहशत से विदेशियों के
वर्चस्व, लेफ़्टिस्ट पार्टियों के पागलपन के बारे में चिल्लाता
था,
और
रूस को ‘राष्ट्रीय सत्य की ओर वापस लौटने का आह्वान’ करता था, दूसरा पहले
अख़बार के लेख को आधार मानकर, ‘ड्यूमा - स्वतंत्र, तर्कपूर्ण
विचारों के मंदिर’ की रक्षा के लिए मनाता था, और ये
सिद्ध करता था, कि ‘लेफ़्टिस्ट्स’ ड्यूमा में
बकवास करते हैं. अंत में, दोनों अख़बार सम्गीन के ऊपर एक सा ही प्रभाव
डालते थे: राजधानी की प्रेस की बेहद धुँधली और उकताऊ प्रतिध्वनि; नकल करती ज़िंदगी
जीते हुए, दोनों ही शहर के स्थिर, समृद्ध
जीवन को परेशान नहीं करते हैं. और ऐसे शहर – बहुत सारे हैं, पचास से
ज़्यादा. इतवार को उदारवादी अख़बार में ‘प्रांतवासी के विचार’ छपते थे, जिन पर
इद्रोन के हस्ताक्षर होते थे. सम्गीन इवान द्रोनोव के अवलोकन पर यकीन करता था, और उसके
बिनधास्त व्यंग्य को उतने ही ध्यान से
पढ़ता था, जैसे अदालत में गवाहों की गवाहियाँ सुना करता था, जिन्हें
केस-वेस में कोई दिलचस्पी नहीं होती, बल्कि जिनकी सिर्फ ये ख़्वाहिश होती है, कि अपनी
अकलमंदी को, अपनी अवलोकन शक्ति को प्रदर्शित करें. द्रोनोव का
रवैया लेफ़्टिस्ट्स और राइटिस्ट्स के प्रति एक जैसा व्यंग्यात्मक था और वह
कॉन्स्टिट्यूशनलिस्ट्स-डेमॉक्रेट्स की राजनीति के ‘यथार्थवाद’ को
रेखांकित करता था.
‘ऐसा नहीं
हो सकता, कि द्रोनोव ये महसूस न करता हो, कि पॉवर किस
तरफ़ है’, उसने मुस्कुराते हुए सोचा.
आम तौर से, सम्गीन
अनजाने ही राजनीतिक जीवन के तथ्यों को बड़ी विचित्रता से ग्रहण कर रहा था: उसे ऐसा
महसूस होता, कि वो सब जिसके बारे में अख़बार इतने जोश से लिख रहे
हैं,
भूतकाल
में ही घटित हो चुका है. उसने अपने आप को समझाने की कोशिश नहीं की, कि ऐसा
क्यों हो रहा है? मरीना ने उसकी इस मनोदशा को झकझोर दिया. एक
बार काम के बारे में बातचीत ख़त्म करने के बाद उसने कहा:
“सुनो, तुम्हारी
एकांतप्रियता पर ग़ौर किया जा रहा है, और, प्लीज़, ये
तुम्हारे लिए हानिकारक है. समझते हैं कि तुम, वैसे, ख़ुफ़िया कार्यकर्ता
हो,
जो
– छुप नहीं रहा है, बल्कि – सही मौके का इंतज़ार कर रहा है. ये
अफ़वाह फ़ैल रही है, कि तुम कुछेक कारनामे कर चुके हो, जैसे तुमने
मॉस्को के विद्रोह का संचालन किया था और किसी और आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हो.”
ये अनपेक्षित और
अप्रिय था. सम्गीन ने मुस्कुराते हुए कहा:
“हीरो इसी तरह पैदा
होते हैं!”
मगर वो, दस्तानों
से खेलते हुए, अपनी बात कहती रही:
“तुम अपने इस मानव
द्वेष को किसी चीज़ से कम कर सकते हो, तिमोन अफ़ीन्स्की (यहाँ शेक्सपियर के नाटक तिमोन
अथेन्स्की से तात्पर्य है – अनु.)! देखो, - पुलिस वाले
आपके भूतकाल को अच्छी तरह याद रखते हैं, और – जड़ से उखाड़े बिना, वे शांति
किस तरह बनाए रखेंगे? तुम्हें अक्सर लोगों से मिलते-जुलते रहना
चाहिए.”
वह मज़ाकिया अंदाज़
में कह रही थी. सम्गीन ने पूछा:
“क्या इससे तुम्हें
परेशानी हो रही है? क्या मैं तुम्हें शर्मिंदा कर रहा हूँ?”
उसने अचरज से भौंहे
उठाईं:
“मुझे? क्या अपने एटोर्नी
के ‘मूड’ के लिए मैं
ज़िम्मेदार हूँ? मैं तुम्हारे ही फ़ायदे के लिए कह रही हूँ. हाँ
– और एक बात,” उसने बाएँ हाथ की ऊँगलियों पर दस्ताना खींचते हुए कहा, “तुम मीश्का
को अपने पास रख लो, वो तुम्हारे कमरों की सफ़ाई कर दिया करेगा और
किताबें भी सलीके से रखेगा, - अगर वलेन्तीन के साथ खाना खाना न चाहो, तो – खाना
भी देगा. तुम उससे कागज़ों की नकल भी करवा सकते हो, - उसकी लिखाई
– अच्छी है. और लड़का – बहुत नम्र है, सिर्फ सपने देखता है.”
वह बड़ी शान से कमरे
से बाहर तैर गई, और कम्पाऊण्ड में उसकी रसीली आवाज़ गूँजी:
“वलेन्तीन!
कम्पाऊण्ड में झाडू तो लगवा लेते, क्या बेहूदगी है! मूरोम्स्काया तुम्हारी
शिकायत करती है: कभी उसके पास नहीं जाते. क्या-आ? बताओ तो, प्लीज़!
नहीं,
तुम
भी,
प्लीज़
बिना नखरों के. हाँ, हाँ!...अपनी बुद्धि से? तुम? ओह, मज़ाक न
करो...”
गेट को धड़ाम् से
बंद करके चली गई.
‘भतीजे को -
पसंद नहीं करती,” सम्गीन ने गौर किया. “ख़ैर, वह उसके
शौहर का भतीजा है’. और, कुछ देर सोच कर सम्गीन ने अपने आप से कहा:
‘मगर किसी
ने भी,
कभी
भी, तुम्हारी
इतनी परवाह नहीं की, मेरे दोस्त, आँ?’
और उसने मरीना को
इस बात के लिए माफ कर दिया, कि उसने उसे बीते दिनों की याद दिला दी थी.
उसकी कोशिशों से उसकी प्रैक्टिस शुरू हो गई थी, उसके पास
कुछ सिविलियन-मुकदमे थे और आगज़नी के मामले में भुगतान-संरक्षण था. मगर कुछ दिनों
बाद भूतकाल ने फिर बेशर्मी से अपने बारे में याद दिला दी. देर शाम को उसके पास लोग
आए,
जिनका
उसने प्यार से स्वागत किया, ये मानते हुए, कि ये
क्लाएण्ट्स हैं: लम्बी, लाल गालों वाली औरत आई, कठोर चेहरे
पर काली आँख़ें, सीधे-सादे मगर ढंग के कपड़े पहने, और उसके
साथ – एक अधेड़, गंजा सा आदमी, नुकीली
खोपड़ी पे बचे-खुचे, कड़े घुंघराले बाल लिए,गंभीर, धुँधले
काँच वाला चश्मा पहने, कैनवास के मुड़े-तुड़े और गंदे कोट में. सम्गीन
ने तय कर लिया:
‘मालकिन और
नौकर. शायद – चोरी का मामला है’. मगर औरत ने, मेज़ के पास
बैठकर स्कर्ट की जेब से सिगरेट का डिब्बा निकाला और दबी आवाज़ में बोली:
“मेरा कुलनाम –
मुराव्योवा है, या – पाशा. तात्याना गोगिना ने मुझे सूचित
किया है, कि ज़रूरत पड़ने पर, मैं आपके
पास आ सकती हूँ.”
सम्गीन दियासलाई
जलाने ही वाला था, मगर नहीं जलाई, बल्कि, नाखून से
डिब्बे पर क्लिक करके ये पूछते हुए डिबिया औरत को दे दी:
“मैं क्या ख़िदमत कर
सकता हूँ?”
औरत की काली आँख़ें
उलाहने से उसकी ओर देख रही थीं, - उसका साथी धुँधलके में दीवार के पास स्टूल पर
बैठा था, और वहाँ से कुछ अस्पष्ट सा गुरगुराया.
‘लगता है, कि मैंने
उसे कभी देखा है’, सम्गीन ने सोचा.
मुराव्योवा ने
इत्मीनान से अपनी तीली से सिगरेट जलाई और बोली, कि अगले
इतवार को मेन्शेविक क्राफ़्ट्स कौन्सिल में वर्तमान परिस्थिति पर भाषण आयोजित कर
रहे हैं.
“उनके ख़िलाफ़ बोलने
के लिए हमारे पास कोई नहीं है; कॉम्रेड, जो इसे
पर्याप्त रूप से गंभीर बना सकता था, - बीमार हो गया है.”
वो ऊँची, फटी-फटी
आवाज़ में, आधिकारिक लहज़े में बात कर रही थी, उसकी सीधी
नज़र अप्रिय लग रही थी. सम्गीन ने कहा:
“जिस व्यक्ति का
आपने ज़िक्र किया है, उसने मुझे मुराव्योवा के बारे में कोई सूचना
नहीं दी है, और वैसे भी मैं इस व्यक्ति से मेरी कोई ख़तो-किताबत
नहीं होती है.”
“ताज्जुब है,” औरत ने
कंधे सिकोड़ते हुए कहा, और उसका साथी संजीदगी से बुदबुदाया:
“उस वाले के पास
जाएँगे.”
“मीटिंग्स
में मैं कभी भी नहीं बोला हूँ,” सम्गीन ने सच बोलने का आनंद उठाते हुए कहा.
“कोई ज़रूरत नहीं, उस वाले के
पास जाएँगे,” आदमी ने उठते हुए फिर से कहा. सम्गीन को फिर से ऐसा
लगा,
कि
उसने कहीं तो उसे देखा है, इस उदास, भारी आवाज़
को सुना है. औरत भी उठी और सिगरेट को एश-ट्रे में घुसाकर ज़ोर से बोली:
“चलो, वहाँ भी
कोशिश कर लेते हैं.”
उठते हुए उसने मेज़
को दबाया, लैम्प का शेड लड़खड़ा गया. सम्गीन ने हथेली से उसे थामा, और औरत ने
लापरवाही से कहा:
“माफ़ कीजिए,” और बिना
बिदा लिए चली गई.
‘वो माचिस
वाली बात ठीक नहीं रही,” सम्गीन ने सोचा. ‘इस आदमी से
मैं मिल चुका हूँ’.
गहरी साँस लेकर
उसने सिगरेट का टुकड़ा कागज़ों वाली रद्दी की टोकरी में फेंक दिया. दो दिन बाद ‘वह लोगों
में’
गया, उस क्लब के
हॉल में, जहाँ दुन्याशा ने गाना गाया था, बैठा हुआ स्थानीय
एडवोकेट दिकापलीतव का भाषण सुन रहा था, जो जो “हस्त-कला विकास ग्रुप” का प्रेसिडेन्ट
था. स्टेज पर, त्सार अलेक्सांद्र द्वितीय के लाल चित्र को
ढाँकते हुए चौड़े कंधों वाला, मगर सपाट आदमी अकेला खड़ा था, उसके हाथ
लम्बे थे, बाल सफ़ेद, मगर भँवें काली थीं, बाल उस्तरे
से छोटे-छोटे कटे हुए, तोते जैसी नाक के नीचे मोटी-मोटी मूँछें और
नुकीली फ्रेंच कट दाढ़ी थी. ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि वह किसी
प्रसिद्ध ऐतिहासिक पुरुष का वेष बनाकर आया है, और भँवों
को उसने जानबूझकर काले रंग में रंगा है, जिससे कि, लोग ये न
समझें कि जैसे उसे उस ऐतिहासिक पुरुष से अपनी समानता पर गर्व है. वह प्यारी, लचीली भारी
आवाज़ में बोल रहा था, कम रोशनी वाले हॉल में सुस्त, उकताऊ शब्द
उछाल रहा था:
“वर्तमान परिस्थिति
की माँग है, कि व्यक्ति सही-सही निश्चित कर ले कि वह क्या चाहता
है?”
“कि स्तलीपिन को
शैतान की ख़ाला के यहाँ भेज दिया जाए,” सम्गीन के सामने बैठे मोटे आदमी ने अपने पड़ोसी
से भुनभुनाकर कहा, - पड़ोसी ने उनींदी आवाज़ में जवाब दिया:
“ बस्ती का आइडिया –
काफ़ी चालाक है.”
हॉल में कुर्सियों
की सभी पंक्तियों पर बेमन से करीब साठ लोग बैठे थे.”
गर्मियों की बारिश
शोर मचाते हुए खिड़कियों के शीशों पर चाबुक बरसा रही थी, बादलों की
गड़गड़ाहट हो रही थी, शीशों पर पड़ी धूल भरी बारिश को आलोकित करते
हुए बिजली चमक रही थी; धूल में चीनी मिट्टी की चिमनियों वाली काली छत
उछल रही थी, - चिमनियाँ आसमान की तरफ़ उठे दो बिन-हड्डियों वाले
हाथों जैसी थीं. हॉल में अप्रिय, गरम उमस भर गई थी, सम्गीन की
पीठ के पीछे किसी के पेट में गुड़गुड़ाहट हुई, बाईं ओर
वाला पड़ोसी बादलों की हर कड़कड़ाहट के बाद सलीब का निशान बना लेता और सम्गीन को
कोहनी मारते हुए फ़ुसफ़ुसाता:
“पार्डन...”
“हमारे सामने कुछ
राजनीतिक पार्टियों के प्रोग्राम्स आए हैं,” वक्ता कह
रहा था.
सम्गीन बड़ी देर तक
सोचता रहा कि वक्ता किसके जैसा है? और किसी को भी न पाकर, उसने सोचा, कि अगर
दुन्याशा आ जाती, तो वह उससे ख़ुशी-ख़ुशी मिलता.
“एक ऐसी धारणा
विद्यमान है, कि राजनीति और नैतिकता – एक साथ नहीं रह सकते,” जेब से
रूमाल निकालकर और उसे हिलाकर वक्ता कह रहा था, “मगर ये
बिल्कुल सही नहीं है, ये – व्यंगकारों का मत है, राजनीति बनी
है उसूलों पर अधि...”
बादलों की गड़गड़ाहट
से वह लड़खड़ा गया, रूमाल से कनपटियाँ पोंछते हुए, आँखें
झपकाते हुए वह एक ओर को एक कदम हट गया, - हॉल शोर से, खिड़की के
शीशों की झनझनाहट से भर गया, और मरीना का एटोर्नी अपनी कुर्सी पर उछल पड़ा, काफ़ी
स्पष्ट रूप से बड़बड़ाया:
“ये – अपील की वजह
नहीं हो सकती...”
वक्ता फिर से बोलने
लगा,
मगर
अब वह काफ़ी जल्दी-जल्दी और जैसे किसी के ऊपर गुस्सा होते हुए बोल रहा था. सम्गीन
ने अजीब वाक्य पकड़ा:
“हर नौजवान, स्कूल ख़त्म
करने के बाद, विश्वविद्यालय नहीं जाता, अफ़्रीका
जाने वाले सभी यात्री उसके केंद्र की ओर नहीं जाते...”
“सही है,” सम्गीन के
पीछे से किसीने कहा और मुँह दबा कर हँसा.
सम्गीन वक्ता पर
अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा था, उसका भाषण कब से परिचित लग रहा था. और, वह बेहद
ख़ुश हो गया, जब दिकापलीतव ने आगे झुककर कहा:
“हम, बेशक, संभाव्य की
सीमाओं तक पहुँच चुके हैं और अब हमें रुकना चाहिए, ताकि, अपनी-अपनी
स्थितियों को मज़बूत करते हुए, जो संभव है, उसे मूर्त
रूप दे सकें, उसे वास्तविकता बना सकें, और इतिहास
बताता रहेगा, कि आगे हमें कहाँ और कैसे जाना है. मैं – ख़त्म करता
हूँ.”
पहली पंक्ति में
बड़े सिर वाला गंजा आदमी उठा और चिल्लाकर बोला:
“इंटरवल – पंद्रह
मिनट! बहस के इच्छुक लोग अपना अपना नाम लिखवा दें, प्लीज़.”
और उसी तरह
चिल्लाकर उसने किसी से कहा:
“क्या, दोस्त, मेज़ तो
तुमने स्टेज के सामने रख दी? उसे स्टेज पे रखना चाहिए था, स्टेज
पे...”
संगमरमर की सीढ़ियों
पर धीरे धीरे उतरते हुए, और ये सुनते हुए कि शहर के भारी-भरकम इज़्ज़तदार
लोग क्या कह रहे हैं, सम्गीन बुफे की ओर चल पड़ा.
“दिकापलीतव ने
गंभीरता से विश्लेषण किया...”
“हुम्! उनके ऊपर
किसान का ऐसा असर है, जैसा अमोनिया का पियक्कड पर.”
“ख़ुद ही ने
तो हिलाया था, और अब जब सबके सिर घूमने लगे हैं...”
“ओय, मम्मा!
बिल्ली को झोंपड़े से भगा, देख तो मुझे खरोच...”
परिचित एडवोकेट्स
सम्गीन का रूखेपन से झुककर अभिवादन कर रहे थे, ख़ामोशी से
और जल्दी से हाथ मिला रहे थे; मरीना का भूतपूर्व एटोर्नी, छोटे-छोटे
कदमों से धीरे-धीरे टहलते हुए, भाग कर उसके पास आया और पूछने लगा;
“तो – कैसे हैं? क्या कहते
हैं?”
मगर तभी उसने ख़ुद
ही ने कहा:
“कैसी बढ़िया बारिश
है!” और एक छोटे मुच्छड़ की तरफ़ गुस्से से कहते हुए लपका:
“सुनिए, अनुफ्रीएन्का
महाशय,
दो
हफ़्ते बीत चुके हैं...”
“तो, बीत गए, तो – क्या?”
भाषण पर होने वाली
बहस को सुनने का मन नहीं था, सम्गीन घर की ओर चल पड़ा. रास्ते पर बेहद अच्छा
लग रहा था, मीठी-मीठी ख़ुशबू, घने नीले
आसमान में चांदी जैसा चांद पिघल रहा था, फ़ुटपाथ पर पानी के डबरे चमक रहे थे, पेड़ों की गहरी
हरियाली से पानी की नीली बूँदें गिर रही थीं; घरों की
खिड़कियाँ खुल गई थीं. संकरी सड़क के दूसरी ओर दो लोग जा रहे थे, और उनमें
से एक ने कहा:
“पूरी तरह परेशान
हो गए बूढ़े...”
खुली खिड़की से सड़क
की ख़ामोशी में एक ख़ूबसूरत आवाज़ तैरती हुई आई:
चाहता था, एक लब्ज़
में
कहना, वो सब, जो है दिल
में...
“प्रतिक्रिया!”
दोनों में से एक ने खिड़की में चिल्लाकर कहा, और, हँसते हुए, फ़ौरन तेज़ी
से आगे बढ़ गए.
‘बेहद
प्रांतीय मज़ाक है’, सम्गीन ने ताज़ी हवा और फूलों की ख़ुशबू को प्रसन्नता
से सूँघते हुए सोचा.
कुछ दिनों के बाद
सरकार ने ड्यूमा को भंग कर दिया, और कैडेट्स ने घोषणा-पत्र जारी कर दिया, जिसमें किसानों
से कहा गया था, कि वे सेना के लिए रंगरूट न भेजें, टैक्स न
दें. बिज़बेदोव, अख़बार हिलाते हुए चिंघाड़ने लगा:
“ये क्या बकवास है? कॉन्स्टीट्यूशन, मतलब –
कॉन्स्टीट्यूशन, वर्ना तो ऐसा ही है, जैसे तीन
टाँगों वाली कुर्सी पर बिठा दिया हो. बेवकूफ़! अब – फिर से इंतज़ार करो आम हड़ताल
का...”
“और शहर की क्या
प्रतिक्रिया है?” सम्गीन ने पूछा.
“क्या – शहर? भेड़ें –
ज़्यादा हैं, और बकरियाँ – नहीं हैं, तो, भेड़ें
किसके पीछे जाएँ, कोई है ही नहीं.”
सम्गीन को यकीन था, कि
बिज़बेदोव जैसी मनस्थिति में लाखों लोग रहते हैं – इस कबूतरखाने वाले से ज़्यादा
अकलमंद, और जानबूझकर, उसके प्रति
तिरस्कार की भावना से, इस उद्देश्य से, कि और एक
बार उसकी बेवकूफ़ी का यकीन हो जाए, वह उससे पूछने लगा: वो – क्या सोचता है? मगर
बिज़बेदोव लाल हो गया, उसका चेहरा फूल कर कुप्पा हो गया, सफ़ेद आँखें
तैश में बाहर निकलने को हो गईं; सिर झटकते हुए, हथेली को
गले पर फ़ेरते हुए उसने पूछा:
“मेरा इम्तिहान ले
रहे हैं, क्या? मैं बिल्कुल ही बेवकूफ़ नहीं हूँ! ड्यूमा –
गर्दन पर सरसों के लेप जैसा है, जिसका काम है – ख़ून के प्रवाह को दिमाग़ में
जाने से रोकना, इसीलिए तो हमारी पटरी से उतर गई ज़िंदगी पर
उसका पलस्तर लगाया गया है! और कैडेट्स बगावत का खेल खेल रहे हैं. टैक्स नहीं देना!
मैं,
क्या, माचिस नहीं
ख़रीदूँ, आँखों की चिनगारियों से आग जलाऊँ क्या?”
मेज़ पर मुक्का मरकर, वह दहाड़ा:
“मैं टैक्स इसलिए
भरता हूँ, कि मुझे शांतिपूर्ण ज़िंदगी दी जाए, - है कि नहीं? क्या सरकार
का कर्तव्य नहीं है कि मेरी ज़िंदगी की हिफ़ाज़त करे?”
वह कुर्सी पर झूल
रहा था, मेज़ पर पड़े बर्तनों को हाथों से हटा रहा था, कुर्सी
चरमरा रही थी, बर्तन खनखना रहे थे. सम्गीन ने उसे पहली बार
इतने तैश में देखा था और उसे यकीन नहीं था, कि ये
गुस्सा सिर्फ ड्यूमा भंग किए जाने की वजह से पैदा हुआ है.
“बाएं हाथ से ज़ोर
का झापड़ नहीं पड़ता! मगर – आप जैसे भी चाहो – मगर झापड़ तो मारना ही पड़ेगा! मैं नहीं
चाहता कि कोई ऐरा-गैरा मोची मेरा पेट फ़ाड़े. और मेरा घर जलाएँ – ये मैं नहीं चाहता!
अभी कल ही बस्ती में मज़दूरों की यूनियन ने किसी सुरक्षा एजेन्ट को मार डाला और
उसका घर जला दिया. इसका ये मतलब नहीं है, कि मैं सैंकड़ों अनपढ़ लोगों का, निरंकुश
शासन का, और इस सारी बकवास का समर्थन करता हूँ. मगर यदि आप
सरकार चला रहे हैं, तो चलाइए, शैतान आपको
ले जाए! मुझे पूरा अधिकार है, कि मैं शांतिपूर्ण जीवन की माँग करूँ....”
भावनाओं के
विस्फ़ोटक प्रदर्शन की अयोग्यता को बुद्धिजीवियों का प्रमुख गुण मानते हुए, सम्गीन ने
फिर भी, ये महसूस किया, कि
बिज़बेदोव के प्रति उसका तिरस्कार उसके प्रति नफ़रत का रूप लेता जा रहा है, ऐसी तीव्र
इच्छा हो रही है, कि उसके लाल, पसीने से
लथपथ थोबड़े पर, तैश से बाहर निकली आँख़ों पर कोई चीज़ दे मारे, बिज़बेदोव
पर कठोर भाषा में चिल्लाए. मगर इस सब को रोका उस अचरज की भावना ने, कि ऐसी
कमीनी,
जंग़ली
इच्छा उसके भीतर पैदा हो सकती है. मगर बिज़बेदोव बिना थके, हाँफ़ते हुए
ऊधम मचा रहा था, भर्रा रहा था.
“और, मुझे
अराजकतावादी न बनाइए, - अराजकता का पोषण होता है, ख़ासकर, शासन की
नपुंसकता से, हाँ! सिर्फ स्कूली बच्चे ही यकीन करते हैं, कि वे
किन्हीं – विचारों का पालन-पोषण कर रहे हैं. बकवास! चर्च दो हज़ार सालों से दिमाग़
में ये बात भर रहा है: ‘एक दूसरे को प्यार करो’, ‘एक मन से
कन्फ़ेस करो’ – क्या गाते हैं वो? दो-दो
शैतान ले जाएँ – एकमत, जब मेरा घर – एक मंज़िल का हो, और पड़ोसी
का – तीन का!”- उसने अकस्मात् अपनी बात ख़त्म की.
“इस तरह
परेशान होना आपके लिए हानिकारक है,” सम्गीन ने मुश्किल से मुस्कुराते हुए कहा और
बगीचे में चला गया, एक कोने में, जहाँ पडोस
वाले घर की ईंटों वाली दीवार के कारण छाया थी. वहाँ, ज़मीन में
गड़ी मेज़ के पास एक अर्ध गोलाकार सीट थी, जो घास से ढँकी थी, - बगीचे का
पूरा कोना नम, दयनीय, अँधेरा था.
सिगरेट का कश लेते हुए सम्गीन ने ग़ौर किया कि उसके हाथ थरथरा रहे हैं.
‘किस हद तक
ये ईडियट विचार और भावना को भौंडा बना देता है’, उसने सोचा
और याद किया, कि इस किस्म के काफ़ी लोगों को वह देख चुका है. जैसे:
तगील्स्की, स्त्रातोनोव, र्याखिन.
मगर – किसी ने भी इतनी नफ़रत पैदा नहीं कि, जितनी इसने
की है.
आज बिज़बेदोव ने
ख़तरे की भावना, अवसाद की भावना भी पैदा कर दी. कुछ मिनटों बाद
सम्गीन ने अंदाज़ लगाया कि बिज़बेदोव के बारे में सोचना – ओछेपन का काम है. ये उसे
अजीब,
पूरी
तरह अप्राप्य ख़यालों की ओर ले जाता है. आत्म सम्मान की भावना इन विचारों का कड़ा विरोध
करती है.
मरीना ने कैडेट्स
की पार्टी की अपील को व्यंग्यात्मक रूप में लिया.
“वो अब किनारे तक
पहुँच चुके हैं,” बरौनियाँ और भँवें नचाते हुए उसने कहा. “ ये –
जोश में किया गया है. ‘अपनी खाली चम्मच दूसरों की पॉरिज में डालना’. ये तब करना
चाहिए था, जब त्सार ने घोषणा की थी, कि वह
ज़मींदारों की ज़मीनें नहीं छुएगा. तब, हो सकता है, किसान हाथ
झटक देते...”
और चेहरे पे अपने
लेस वाले रूमाल से हवा करते हुए उसने सोच में डूबकर कहा:
“लीदिया को तो
कैडेट्स ने इतना डरा दिया है, कि वह जंगल भी बेचना चाहती थी, और कल ही
उसने मुझसे सलाह की, कि क्या तुर्चानिनवों की ‘वेलकम’ इस्टेट
ख़रीदना ठीक रहेगा? वो लेडी बोर हो गई है. ‘वेलकम’ – अच्छी
इस्टेट है! मेरे पास गिरवी पड़ी है...बूढ़ा तुर्चानिनोव नीत्से में मर गया, उसका वारिस
कहीं खो गया...” उसने गहरी साँस ली और, कुछ देर चुप रहने के बाद होठों को इस तरह
दबाया,
जैसे
सीटी बजाने वाली हो. फिर, कुछ निश्चय करके बोली:
“ये बात है.”
मीशा सम्गीन की
ज़िंदगी में चुपचाप आ गया. वो एक्ज़ेक्यूटिव अर्दली निकला, कागज़ात की
नकल तेज़ी से नहीं करता था, मगर एकदम सही-सही, बिना किसी
गलती के, ख़ामोश तबियत था और सम्गीन के चेहरे की ओर लड़कियों
जैसी ख़ूबसूरत आँखों से नम्रता से, बल्कि श्रद्धा के भाव से देखता था. साफ़ –
सुथरा,
चिकने
बाल बनाए, वो ड्राइंग रूम के कोने में, कम्पाऊण्ड
की तरफ़ खुलती खिड़की के पास एक छोटी मेज़ के पीछे बैठता, और, दायाँ कंधा
थोड़ा सा उठाकर, कागज़ पर साफ़, गोलाई लिए
अक्षर बिखेर देता. किताबें पढ़ने की इजाज़त माँगता और, मिलने पर, हौले से
कहता:
“ तहे दिल से
शुक्रिया अदा करता हूँ!”
किताबों के कारण उस
पर और भी नज़र नहीं जाती थी. अपने काम के अलावा और किसी भी चीज़ के बारे में कभी
नहीं पूछता था, और कोने में व्यवस्थित होने के सिर्फ दूसरे या
तीसरे दिन उसने सकुचाहट से पूछा:
“क्लीम इवानोविच – प्लीज़, मुझे
बताएँ: क्या क्रांति ख़तम हो गई?”
सवाल इतना
अप्रत्याशित था, कि सम्गीन ने अचरज से नौजवान की तरफ़ देखकर
अंतिम शब्द दुहरा दिया:
“ख़तम हो गई.”
मगर उसके बाद पूछा:
“तुझे इसमें क्यों
दिलचस्पी है?”
“वो...बस, ऐसे ही,” मीशा ने
फ़ौरन जवाब नहीं दिया और सिर झुकाकर, हौले से, सफ़ाई देते
हुए आगे जोड़ा: “सभी को दिलचस्पी है.”
सम्गीन ने सोचा कि
छोकरा बेवकूफ़ है, और वह इस घटना के बारे में भूल गया, जो याद
रखने के लिए बेहद छोटी थी. वास्तविकता उन तथ्यों को भूल जाने की, भरसक आदत
डाल रही थी, जो अपेक्षाकृत ज़्यादा बडे थे. एक अंतहीन जंज़ीर की
कड़ियों के समान एक दूसरे के पीछे-पीछे, घटनाएँ वक्त को शिद्दत से आगे धकेल रही थीं, और वक्त, जैसे पहाड़
से लुढ़कता हुआ, फ़ौरन, चुपचाप
समाप्त हो जाता था.
अख़बार, करीब-करीब
हर रोज़ ज़ब्तियों के बारे में, गिरफ़्तारियों के बारे में, कोर्ट-मार्शल्स
के बारे में, सूली चढ़ाए गए हमलावरों के बारे में लिख रहे थे. सरकार
ने व्यंगात्मक पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद कर दिया था, अख़बार बंद
हो रहे थे; राजतंत्रवादियों के संगठन अधिकाधिक बिल्कुल
आतंकवादियों की तरह काम कर रहे थे; प्रतिक्रिया, बदले की
भावना का, अंधे जुंनून का रूप धारण करते हुए, एक
जुनूनियत से भरा, मगर स्पष्टतः कमज़ोर पड़ता हुआ प्रतिकार कर रही
थी. सम्गीन ये सब देख रहा था, समझ रहा था, और उस समय, जब वो इस
बारे में सुन रहा होता, पढ़ रहा होता – तो इससे
उसे निराशा होती. मगर उसने चुपचाप अपने आप को ये यकीन दिला दिया था, कि घटनाएँ
अपना क्रांतिकारी मतलब खो चुकी हैं, और जड़ता के कारण ही घटित हो रही हैं. वे ‘सूखे आंधी-तूफ़ान’ का रूप ले
चुकी हैं, - बिजली की चमक और बादलों की कड़क तो बहुत है, मगर बारिश –
बिल्कुल नहीं. साथ ही, शहर की ज़िंदगी का निरीक्षण करते हुए, उसे यकीन
हो रहा था, कि ‘शांति स्थापित करने की प्रक्रिया’, कोहरे के
समान,
नीचे
से,
ज़मीन
से उठ रही है, और ये, कि ये
कोहरा अधिकाधिक घना होता जा रहा है. मरीना से बातचीत के दौरान वास्तविकता का आसानी
से विस्मरण हो जाता था. जब उसने उससे पूछा कि ‘ ज़ब्ती’ के बारे
में उसका क्या ख़याल है? – तो उसने अपने नाखूनों की ओर देखते हुए जवाब
दिया:
“समझ नहीं पा रही
हूँ. हो सकता है, ये – लक्षण हो, कि ‘युद्ध
समाप्त हो चुका है’ और लुटेरों ने अपना काम शुरू कर दिया है, और हो सकता
है,
कि
क्रांति ने अभी तक अपनी सारी शक्तियाँ नहीं खोई हैं. तुम – बेहतर जानते हो,” उसने
मुस्कुराकर बात ख़त्म की.
“क्या तुम्हें, शायद, इस बात पर
अफ़सोस हो रहा है, कि युद्ध समाप्त हो चुका है?” सम्गीन ने
पूछा;
उसने
जवाब नहीं दिया, किसी और ही बारे में बात करने लगी:
“सुनो तो, नौजवान
तुर्चानिनव प्रकट हो गया है, ‘वेलकम’ इस्टेट पर उसके
वारिसाना अधिकार को सिद्ध करना होगा और जायदाद उसके हाथों में सौंपनी चाहिए, - क्या तुम
ऐसा सोचते हो? मैं भाग दौड़ कर रही हूँ, कि अदालत
जल्दी से हरकत में आ जाए. लीदिया ने, लगता है, इस्टेट
ख़रीदने का निश्चय कर लिया है.”
मुस्कुराते हुए, छोटी ऊँगली
के नेल-पॉलिश को खुरचते हुए, वह कुछ नकीली आवाज़ में बोलने लगी, लीदिया की
नकल करते हुए:
“उसके पास – एक नया
विचार है: ज़रूरी है, समझ रहे हो, सांस्कृतिक
अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया जाए, ज़रूरी है किसानों को बसाना, - स्तलीपिन
की नीति के अनुसार.”
माथे पर ऊँगली से
टकटक करते हुए, जैसे जब बिना शब्दों का इस्तेमाल किए कहना
चाहते हैं, कि कोई आदमी – बेवकूफ़ है, मरीना अपनी
रसीली और अलसाई आवाज़ में कहती रही:
“औरतों को, कहती है, देश की
ज़िंदगी में गृहिणी की भूमिका निभाना चाहिए, न कि क्रांतिकारिणी
की. रूसी औरतों को विशेष रूप से रूढ़िवादी होना चाहिए, क्योंकि
रूसी मर्द – दूरदर्शी, सपने बुनने वाला होता है.”
ये हो रहा था मरीना
के घर में, उसके छोटे से, आरामदेह
कमरे में. टैरेस पर खुलने वाला दरवाज़ा खुला था, गरमाहट भरी
हवा हौले-हौले बगीचे में पेड़ों के पत्तों को सहला रही थी; छितरे सफ़ेद
बादल चाँद को सहलाते हुए आसमान में टहल रहे थे; मेज़ पर रखे
समोवार का निकल नीला प्रतीत हो रहा था, भूरे पतंगे आग के ऊपर फड़फड़ाकर दम तोड़ रहे थे.
मरीना – खूब चौड़े सफ़ेद गाऊन में, - उसकी चौड़ी आस्तीनों में नंग़े, मज़बूत हाथ
चमक रहे हैं. जब वह आया – उसने माफ़ी माँगी:
“माफ़ करना, कि मैं इस
तरह,
घर
की पोषाक में, - गर्मी लग रही है मुझे! कुछ मोटी हूँ...” उसने
अपने सीने पर, नितम्बों पर हाथ फेरे, और इस
हावभाव ने, जो प्रकट में चुलबुला, घमण्डी था, सम्गीन को
खीझी हुई प्रशंसा से कहने पर मजबूर कर दिया:
“किस कदर ख़ूबसूरत
हो तुम!”
“क्या वाकई? देखो, प्यार न
करने लगना!”
“और – क्या इजाज़त
नहीं है?”
“कर सकते हो, मगर –
ज़रूरत नहीं है,” उसने ऐसी आश्चर्यजनक सरलता से कहा और इससे
सम्गीन के रोमॅन्टिक मूड को जगा दिया, - इसी मनोदशा में वह उसे सुनता रहा.
“कुछ दिन पहले
मैंने उससे कहा: ‘ये तू, लीदिया, सूख क्यों
रही है? शादी कर लेती, इस –
सम्गीन से ही कर लेती’. ‘मैं, बोली, शादी सिर्फ
कुलीन व्यक्ति से ही करूँगी, और अभी कोई उचित व्यक्ति – नहीं है’. उचित –
मतलब वैसा, समझ रहे हो, जो कुलीनों के ऐतिहासिक योगदान के बारे में
भूला न हो और इन तीन बातों के प्रति वफ़ादार हो – ऑर्थोडोक्सी, तानाशाही
और राष्ट्रीयता. तो, मैंने उससे कहा: ‘प्यारी, ऐसा इन्सान
तो करीब सौ साल का होगा!” गुस्सा हो गई.”
सम्गीन उससे बहुत
कुछ पूछना चाहता था, मगर उसने पूछ लिया:
“बिज़बेदोव क्या चीज़
है?”
बाउल से बिस्कुट
चुनते हुए, उसने उसकी ओर देखा, आँखें
सिकोड़ीं, और धीरे-धीरे, अनिच्छा से
जवाब दिया:
“ख़ुद ही देखते हो:
समाज की सेवा करना – नहीं चाहता, अपनी – नहीं जानता.” और फ़ौरन आगे कहने लगी, मगर अब
जल्दी-जल्दी बता रही थी, जैसे इन शब्दों पर लीपा पोती करना चाह रही हो:
“ अजीब है. सोच
लिया,
कि
उसके कबूतर – शहर में सबसे अच्छे हैं; झूठ कहता है कि उनके लिए फलाँ-फलाँ इनाम मिले
हैं,
और
इनाम तो ट्रैक्टर ड्राइवर ब्लीनव को मिले थे. पुराने शिकारी बतलाते हैं, कि वो बुरा
कबूतरबाज़ है और पंछियों को सिर्फ बर्बाद करता है. अपने आप को आज़ाद इन्सान समझता
है. वैसा, इत्तेफ़ाक से, है भी, अगर आज़ादी
का मतलब उद्देश्यहीनता हो तो. आम तौर से वो – बेवकूफ़ है. मगर मेरा ख़याल है, कि उसका
अंत बुरा होगा...”
उसका धारा प्रवाह
भाषण सुनकर, सम्गीन को आदत के मुताबिक जलन महसूस हुई, - अच्छा
बोलती है – सरल शब्दों में, स्पष्ट. उसके अपने शब्द – एक जैसे, बेचैन, लैम्प के
ऊपर उड़ते हुए इन पतंगों की तरह. और वो फिर से लीदिया के बारे में बोल रही थी, मगर, अब
छोटी-छोटी चीज़ों के बारे में, मीन मेख निकालते हुए – ये कि लीदिया कपड़े
कितने फूहड़ तरीके से पहनती है, पढ़ी हुई किताबों को अच्छी तरह समझ नहीं पाती
है,
अयोग्य
तरीके से ‘प्रवाह के खोजी’ ग्रुप का
संचालन करती है. और अचानक बोली:
“बुद्धिजीवी तबके
के लोगों को दो किस्मों में बांटा जा सकता है: पहली किस्म के – हिलते रहते हैं, पेण्डुलम
की तरह, दूसरी किस्म के – गोल-गोल घूमते रहते हैं, जैसे घड़ी
के डायल पर घूमती सुइयाँ, जैसे दिखा रहे हों सुबह, दोपहर, शाम और आधी
रात. मगर समय तो उनके अधिकार में नहीं है! अपनी कल्पना शक्ति से दुनिया के बारे
में विचार को तो बदला जा सकता है, मगर उसके सार को तो – नहीं बदल सकते.”
इन शब्दों के और जो
उसने लीदिया के बारे में कहा क्या संबंध है, यह सम्गीन
नहीं पकड़ पाया, मगर इन शब्दों ने उसे एक दरवाज़े के सामने खड़ा
कर दिया, जिसे खोलना वह नहीं जानता था, और – अब वो
ख़ुद-ब-ख़ुद खुल रहा है. वह ख़ामोश रहा, इस उम्मीद में कि मरीना अब अपने बारे में, अपने
विश्वास के बारे में, अपने दृष्टिकोण के बारे में बात करेगी.
“मज़दूर फ़ैक्टरियाँ
लेना चाहते हैं, किसान – ज़मीन, बुद्धिजीवियों
को चाहिए सत्ता”, ऊँगलियों से सीने पर पड़ी लेस से खेलते हुए वह
कह रही थी. “ये सब, बेशक, ज़रूरी भी
है और वो होगा भी, मगर उन्हें, जैसे तुम
हो,
क्या
ये संतुष्ट करेगा?’
पुराने क्रिस्टल के
गिलास में पड़ी वाइन की चमक को देखते हुए समगीन बड़ी देर तक ख़ामोश रहा, - वाइन
सुनहरी थी, उसकी आँखों जैसी. मरीना के सवाल में उसे अपने लिए कोई
ख़तरनाक बात महसूस हुई, वह सोच में पड़ गया: क्या? और अचानक
समझ गया, कि अगर आज वह यहाँ अपने बारे में बात करता है, तो वह कुछ
ऐसी बात कह देगा जिसे उसने बिज़बेदोव से जोड़ा था. वह बुरी तरह चौंक गया, और वाइन की
चुस्कियाँ लेते हुए, उसने अपने आप से दुहराया: ‘समाज की
सेवा करना – नहीं चाहता, अपनी – नहीं जानता’, ‘आज़ादी –
उद्देश्यहीनता है’. चश्मे को ठीक करके उसने ग़ौर से, अविश्वास
से उसकी तरफ़ देखा, मगर वह अपनी लेस से ही खेल रही थी, और उसका
चेहरा भी शांत था, ख़यालों में खोई हुई आँखें पतंगों का उड़ना देख
रही थीं, - फिर उसने चाय वाले नैपकिन से उन्हें भगाना शुरू किया.
“कितने आ गए हैं
उड़कर,
मगर
यदि दरवाज़ा बंद करें – तो ऊमस महसूस होगी!”
सम्गीन का
रोमॅन्टिक मूड ख़त्म हो गया. इंतज़ार – किसी चीज़ का नहीं है, अपने बारे
में ये औरत कुछ भी नहीं कहेगी. वह उठ गया. जब उसने बिदा लेते हुए उसकी तरफ़ हाथ
बढाया,
तो
गाऊन सीने पर खुल गया, रेशमी गुलाबी पारदर्शी अंतर्वस्त्र की झलक
दिखाई दी और अजीब तरह से तनी हुई छातियाँ भी.
“ओय,” गाऊन को
ढाँकते हुए उसने कहा, - अब सम्गीन ने घुटने तक उसका पैर देखा, सफ़ेद मोज़े
में. ये दिमाग़ में रह गया, और इसने बिना परेशान किए, अप्रियता
से सोचने पर भी मजबूर कर दिया:
‘बिल्कुल
पत्थर की मूरत. शायद, जिस्म के बारे में भी वैसी ही कंजूस है, जैसी पैसों
के बारे में है’.
मगर जहाँ तक उसका
सवाल है, उसने पैसों के बारे में कंजूसी नहीं दिखाई. एक बार
उसके यहाँ बैठे हुए और किताबों के बण्डल देखते हुए, जो डाकखाने
से लाए गए थे, उसने कहा:
“तुम किताबों के
ऊपर काफ़ी खर्च करते हो!” और दोस्ताना अंदाज़ में पूछा: “क्या तुम्हारी तनख़्वाह बढ़ा
दूँ?”
सम्गीन
ने इनकार किया, मगर उसने फिर भी तनख़्वाह दुगुनी बढ़ा दी. अब उस
बात को याद करके, उसे याद आया, कि उसके
संकोच ने इनकार करने पर मजबूर किया था, जो बड़े आदमी के योग्य नहीं था: वह ज़्यादातर
रूसी उपन्यास और विदेशी भाषाओं से अनुवाद मंगवाता और पढ़ता था; न जाने
क्यों नहीं चाहता था, कि मरीना को इस बारे में पता चले. मगर गंभीर
किस्म की किताबें उसे थका देती थीं, प्रचुरता से उपलब्ध राजनैतिक साहित्य और प्रेस
से उसे चिढ़ थी. उदारवादी प्रेस के बारे में मरीना ने कहा था:
“ऐसे चिल्लाती है, जैसे
हिस्टीरिया की मरीज़ हो, जिसका प्रेमी भाग गया हो, मगर प्रेमी
ने तो उसे कब से बेज़ार कर दिया था!”
दो दिन बाद सम्गीन
बगीचे में बैठा था, बिज़बेदोव की विनती पर नए कबूतरों को देखने पर
राज़ी हो गया था. बिज़बेदोव छत पर अटका था, एक हाथ से पाइप पकड़े, दूसरे हाथ
में झाडू लेकर संतुलन बना रहा था; बिना बेल्ट की ढीली-ढाली कमीज़ और चौड़ी पतलून
में उसका बेढ़ब शरीर किसी बोतल जैसा लग रहा था, जिसे सिर
के आकार के गोल ढक्कन से बंद किया गया हो. धुंधली, गरम हवा
में कम ऊँचाई पर, अलसाहट से करीब दस कबूतर उड़ रहे थे. बिज़बेदोव
गरज रहा था और सीटी बजा रहा था. अब वह नीचे को झुका, जैसे छत से
कूदना चाहता हो, निराशा से पूछा: “मुझे?” और चीख़ा: “क्लीम इवानोविच, आपके पास
कोई आया है!”
मरीना आई थी और
उसके साथ – एक मझोले कद का, मगर गोल कंधों वाला आदमी था – सफ़ेद सूट पहने
जिसकी बाईं आस्तीन पर एक चौड़ा काला रिबन था, बगल में
छड़ी दबाए, भूरे दस्ताने, सिर पर
पीछे को सरकाई हुई पनामा हैट पहने. चेहरा – साँवला, उसके
नाक-नक्श छोटे, मगर प्यारे थे; मुड़ी हुई
नाक,
उजली, नुकीली
छोटी सी दाढ़ी और मुड़ी हुई मूँछें सम्गीन को ‘थ्री
मस्केटीर्स’ में से एक की याद दिला गईं.
“मिलिए,” मरीना ने
कहा. “तुर्चानिनव – सम्गीन.”
तुर्चानिनव ने
अनमनेपन से अपना लम्बा ठण्डा हाथ सम्गीन के हाथ में घुसा दिया, हल्की नीली
आँख़ों से एक नज़र उस पर डाली और दबी ज़ुबान में, अचरज से
पूछा:
“ये आदमी छत पर
क्या कर रहा है?”
मरीना ने बिज़बेदोव
के काम के बारे में समझाया और चिल्लाई:
“वलेन्तीन, चाय देने
के लिए कहो!”
सम्गीन के ड्राइंग
रूम में मरीना ने स्पष्ट किया कि ये व्सेवोलद पाव्लोविच उत्तराधिकार के अधिकार के
अनुमोदन के लिए अदालत जाना चाहता है.
“हाँ, प्लीज़, मैं आपसे
विनती करता हूँ,” तुर्चानिनव ने काफ़ी ज़ोर से कहा, और खोपडी
से चिपके हुए उसके छोटे-छोटे कान लाल हो गए. “मैं जगह का सही अंदाज़ खो चुका हूँ,” मरीना से
मुख़ातिब होते हुए उसने परेशानी से कहा. “यहाँ हर चीज़ खूब दूर नज़र आती है, और ज़ोर से
बोलने को जी करता है. मैं आठ साल से यहाँ से दूर रहा हूँ.
फ़लालैन की पतलून
खींच कर उसने पैरों को कुर्सी के नीचे छुपा लिया, और प्यारी
सी मुस्कुराहट से बोला:
“मैं ख़ुशनसीब हूँ, कि फिर से
यहाँ हूँ.”
मरीना ने कहा:
“कुछ दिनों के लिए
पैरिस में रहना अच्छा होता!”
“ये – बिल्कुल आसान
है,’
तुर्चानिनव
ने बताया. “ये वाकई में दुनिया का बेहतरीन शहर है, और फ़्रान्स
ही – पैरिस है.”
हर बात, जो
तुर्चानिनव कह रहा था, पूरी संजीदगी से, बड़े प्यार
से और ऐसे लहज़े में कह रहा था, जिसमें पहली बार बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों
से बातचीत करते समय जवान टीचर्स बोलते हैं. बातों बातों में उसने बताया, कि पैरिस
में सबसे बढ़िया दर्ज़ी और सबसे मज़ेदार थियेटर्स हैं.
“मैंने बर्लिन में
स्तानिस्लाव्स्की थियेटर देखा था. एकदम मौलिक! मगर, पता है, थियेटर के
लिए बहुत गंभीर बात है और अब वैसा नहीं होता – थियेटर, जैसे...”
कंधे उचकाकर, उसने हाथ घुमाए और – सही शब्द ढूँढ़ा:
“संरक्षक सेना’ है. पता है:
जनरल बूट्स और कुँआरी बूढ़ियाँ प्रार्थनाएं गाती हैं, पापों का
प्रायश्चित्त करने को कहती हैं... मैं कहता हूँ – क्या ऐसा नहीं है?” वह फिर से
मरीना से मुख़ातिब हुआ; उसने ज़िंदादिली और भलमनसाहत से जवाब दिया:
“ओह, नहीं, नहीं! ये
बहुत दिलचस्प है.”
सम्गीन ने मरीना की
भलमनसाहत और उत्साहजनक प्यारी मुस्कान पर यकीन नहीं किया, और
तुर्चानिनव अपनी बात कहता रहा, अधिकाधिक रौ में बहते हुए, और जैसे कमज़ोर, सुस्त लहज़े
में शिकायत कर रहा हो:
“और – ये घुमक्कड, आवारा!
बेशक,
मैं
- डेमॉक्रेट हूँ, - फ़्रान्स में सभी डेमॉक्रेट्स हैं, - मगर यहाँ
मैं अपने आपको जनवादी महसूस करता हूँ, हालाँकि मेरी माँ फ़्रान्सीसी है. मगर – आवारा
क्यों?
मैं
सोचता हूँ, कि ये ख़तरनाक भी है. कला को होना चाहिए...सौंदर्यबोध
से प्रेरित. स्तानिस्लाव्स्की गंदे चीथड़ों में है, कोई अजीब
सा अंकल वान्या प्रोफेसर की पीठ पे गोली चलाता है – किसलिए? ये समझ में
नहीं आयेगा! और – दो कदम से चूक जाता है! बेचारा शराबी बेरान्झे का गीत गाने लगता
है,
ये
– भयानक प्राचीन है, बेरान्झे! फ़्रान्स में लोग उसे भूल चुके हैं.
फ़्रान्सीसी तो इस बात को कभी भी नहीं समझ पाएँगे. वो जानते हैं, कि सब कुछ
कह दिया गया है, और बात सिर्फ इतनी है कि जानी-पहचानी चीज़ को
ख़ूबसूरती से दुहराया जाए. फॉर्म!” हाथ उठाकर ऊँगली से छत की तरफ़ इशारा करते हुए और
मरीना का चेहरा देखते हुए वह चहका. “विचारों में – माफ़ कीजिए! - औरतों की
तरह,
विविधता
नहीं होती, और उनके आकर्षण का रहस्य इस बात में है, कि
उन्होंने किस प्रकार के वस्त्र पहने हैं...”
आराम से साँस लेकर
वह ख़ामोश हो गया, ऐसा लग रहा था, कि उसने वह
सब कह दिया है, जो उसे बेचैन कर रहा था.
मीशा ने चाय पीने
के लिए बुलाया, मरीना और पैरिसवाला चले गए, सम्गीन रुक
गया और पैरिसवाले की हल्की-फ़ुल्की बातों को खंगालते हुए कुछ मिनट कमरे में चहल
कदमी करता रहा. जब वह बिज़बेदोव के यहाँ आया, तो मरीना
प्यालों में चाय डाल रही थी, और तुर्चानिनव वलेन्तीन से कह रहा था:
“मॉस्को और पैरिस
का संगठन – दुनिया के लिए अलेक्सांद्र तृतीय का सबसे बड़ा योगदान है, यहाँ के
मुकाबले फ़्रान्स में इसे अच्छी तरह समझते हैं.”
“हमारे पास समझने
के लिए वक्त ही नहीं है, हम बस क्रांति ही किए जा रहे हैं,” बिज़बेदोव
सिर हिलाते हुए चहका; उसकी सफ़ेद आँख़ें तेल जैसी चमक रही थीं, बाल चमक
रहे थे, उन पर कुछ लगाया था, उसने नरम
कॉलर वाली कमीज़ पहनी थी, ठोढ़ी से चौखाने वाली टाई पर पसीना टपक रहा
था.”क्रांति – फ़्रांसीसियों का महान भूतकाल है,” तुर्चानिनव
ने कहा और अपने हल्के गुलाबी होठों पर जीभ
फेरी जो किसी एनिमिक लड़की के होंठों जैसे थे.
मरीना ने सम्गीन को
बताया,
कि
परसों सुबह ‘वेलकम इस्टेट’ जाने का
प्रोग्राम है, - वो, लीदिया, व्सेवोलद पाव्लोविच
जा रहे हैं, उसे भी आमंत्रित कर रहे हैं. सम्गीन ने चुपचाप सिर
झुका अभिवादन कर दिया. वह उठ गई, तुर्चानिनव भी जाना चाहता था, मगर
वलेन्तीन अचानक गर्मजोशी से उसे मनाने लगा:
“शहर – ख़ाली है, देखने के
लिए उसमें कुछ भी नहीं है, बल्कि आप मुझे पैरिस के बारे में बताते – रुक
जाइए! वाइन पिएँगे...”
तुर्चानिनव ने
मरीना का हाथ चूमा और रुक गया, और उसने ड्योढ़ी में निकलते हुए, सम्गीन से
कहा,
जो
उसे छोड़ने आया था:
“कितना दिलचस्प
बच्चा है! तुम सुनना कि वो वलेन्तीन से क्या कहता है, बाद में
मुझे बताना, हँसेंगे. तो, फिर
मिलेंगे, नकचढ़े इन्सान! फु,फु, कैसी गर्मी
है!...”
वह चली गई. सम्गीन
कुछ देर ड्योढ़ी में खड़ा रहा, सुनता रहा; खुली हुई
खिड़की से मेहमान की ऊँची आवाज़ आ रही थी, वह तेज़ी से बोल रहा था, शब्द साफ़
नहीं सुनाई दे रहे थे. बिज़बेदोव के पास जाने का मन नहीं था, न जाना –
बदतमीज़ी होती, उसने सिगरेट ख़तम की और भीतर गया. उसकी तरफ़
किसी ने ध्यान नहीं दिया. तुर्चानिनव दरवाज़े की तरफ़ पीठ किए बैठा था, बिज़बेदोव-
तिरछे. मेज़ पर कुहनियाँ टिकाए, एक हाथ की ऊँगलियाँ अपने झबरे अयाल में घुसाए, दूसरे से
वह वाइन-बेरीज़ को मुँह में डाल रहा था, उन्हें धीरे-धीरे चबा रहा था, घूँट-घूट
वाइन पी रहा था, और तुर्चानिनव की ओर लाल चेहरे पर फिसलती
मुस्कुराहट लिए देख रहा था, और वो, हाथ में
गिलास पकड़े, उसकी तरफ़ झुककर कह रहा था:
“काफ़िराना सादगी!
मैं रेस्टॉरेन्ट में बैठा हूँ, हाथों में अख़बार लिए, मेरे सामने
दूसरी मेज़ पर – बेहद प्यारी लड़की बैठी है. अचानक वह मुझसे कहने लगी: ‘आप, शायद, उतना पढ़
नहीं रहे हैं, जितना मेरे अंतर्वस्त्र निहार रहे हैं’, वो बैठी थी, पैर पर पैर
रखे...”
“शैतान,” बिज़बेदोव
बुदबुदाया. “इसे कहते हैं : सीधा मुद्दे पर आना!”
“ओह, नहीं, आप – ग़लत
समझ रहे हैं!” तुर्चानिनव प्रसन्नता से चहका. “ये कोई दिल बहलाने वाली लड़की नहीं
थी,
बल्कि
सोर्बोन विश्वविद्यालय की स्टूडेण्ट थी, एक बहुत ही सम्माननीय बुर्झुआ की बेटी, - बाद में
मेरी उसके भाई से मुलाकात हुई, जो ऑफ़िसर था.”
बिज़बेदोव ने हौले
से और अचरज से सीटी बजाई. वह कुर्सी पर डोल रहा था, मुँह बना
रहा था, भर्रा रहा था और पसीना-पसीना हो रहा था. साफ़ ज़ाहिर था, कि बातचीत
को आगे बढ़ाने में उसे मुश्किल हो रही थी, कि उसके पास ‘कोई सवाल
नहीं हैं’, बेहद परेशान हो गया है और बेरीज़ इसलिए खा रहा है, ताकि उसे
बोलना न पड़े. मगर तुर्चानिनव तो मस्ती में कहे जा रहा था:
“रास्ते पर जा रहे
हैं एक आदमी और औरत, आदमी यूरिनल में घुसता है, मगर औरत को
इससे कोई झेंप नहीं महसूस होती, वह खड़ी रहती है, और इंतज़ार
करती है.”
बिज़बेदोव खिखियाया.
“हाँ, रूसी में –
ये अजीब लगता है और थोड़ा बहुत – सुअरपन भी, मगर उनके
यहाँ – सिर्फ स्वाभाविक है. आम तौर से फ्रान्सीसी बिल्कुल दिखावा नहीं करते हैं.”
कम्पाऊण्ड से खिड़की
में डूबते हुए सूरज की किरणें पड़ रही थीं, और मेज़ पर
पड़ी हर चीज़ लाल सी धूल से जैसे ढंक गई थी, जबकि जाली
में रखे हरे पौधे बुरी तरह से काले पड़ गए थे. क्रिस्टल के बाऊल में घर के बने
बिस्कुटों पर मक्खियाँ रेंग रही थीं.
“ह-हाँ, जीते हैं
लोग,”
बिज़बेदोव
ने भर्राते हुए गहरी साँस ली. “और यहाँ तो कभी – युद्ध, तो कभी –
क्रांति.”
“ये भयानक है!”
पैरिसवाला सहानुभूति से चहका. “और इसलिए, क्यों कि पैसे काफ़ी नहीं हैं. मगर मैडम
मूरोम्स्काया कहती हैं, कि लिबरल्स – फ़्रान्स में उधारी के ख़िलाफ़ हैं.
मगर,
सुनिए, क्या ये
वाकई में राजनीति है? लोग ग़रीब बने रहना चाहते हैं...फ्रान्स में
क्रांति की थी अमीर बुर्जुआ ने, कुलीनों के ख़िलाफ़, जो पहले ही
कंगाल हो चुके थे, मगर जिन्होंने सम्राट को अपनी मुट्ठी में रखा
था,
जबकि
आपके यहाँ, मतलब, हमारे यहाँ, ये समझना
बड़ा मुश्किल है कि क्रान्ति कौन कर रहा है?”
बिज़बेदोव ने सिर
हिलाया और घुटनों पर हथेलियाँ मारते हुए, भर्राते हुए, ठहाके
लगाने लगा:
“यही - बस यही तो –
कौन?”
तुर्चानिनव ने कुछ
देर इंतज़ार किया, ताकि बिज़बेदोव हँसना ख़तम कर ले, और फिर इस
तरह बोला जैसे अपमानित हो गया हो:
“मेरा ख़याल है:
क्रांतियाँ हमेशा अमीरों द्वारा की जाती हैं...”
“समझ गया!”
बिज़बेदोव चीखा.
सम्गीन कटुता से
सोचते हुए, चुपचाप कमरे से बाहर खिसक लिया:
“ये चर्बी वाला
सुअर – नौटंकी कर रहा है! वह साफ़ देख रहा है, कि नौजवान
को उसे सिखाना अच्छा लग रहा है. ये न सिर्फ ख़ुद कार्टून है, बल्कि उसे
भी कार्टून बना देता है, जो उसके पास मौजूद हो’.
मरीना ने बिज़बेदोव
के बारे में जो कहा था, सम्गीन को महसूस हुआ कि बिज़बेदोव के प्रति
उसकी नफ़रत तेज़ होती जा रही है, मगर वो इस कबूतर वाले से उसे दूर नहीं धकेल
रही थी, बल्कि जैसे उसकी तरफ़ आकर्षित कर रही थी. ये अप्रिय भी
था,
और
समझ से बाहर भी.
एक दिन बाद वह बेंत
से बुनी हुई गाड़ी में ‘वेलकम’ इस्टेट की
ओर जा रहा था. घास पर अभी तक ओस की बूँदें चमक रही थीं, मगर ऊमस हो
गई थी;
मोटे, चितकबरे
घोड़ों की जोड़ी के पैरों के नीचे से गरम, चुभती हुई धूल उड़ रही थी, घोड़े के
पसीने की तेज़ गंध फूस की नशीली ख़ुशबू से मिल कर गहरी ऊँघ ला रही थी. गाँव के
रास्ते के दोनों ओर, खेतों में, बागों में
मर्दों और औरतों की झलक दिखाई दे जाती थी; दूर, धुंधलके
में मॉनेस्ट्री के वन का मासूम फ़ीता हिल रहा था. गाड़ी बहुत तकलीफ़देह थी, कड़े
स्प्रिंग़्स के ऊपर सम्गीन बुरी तरह हिचकोले खा रहा था, उसकी नींद
पूरी नहीं हुई थी और वो इस बात से भी नाख़ुश था, कि उसे
अकेले को इस गाड़ी में जाना पड़ रहा था, - मरीना की गाड़ी वाली उसकी जगह बिज़बेदोव ने
हथिया ली थी. गाडीवान के बदले बक्से पे मरीना का मुच्छड़, डरावना
चौकीदार बैठा था और वो लगातार घोड़ों से बातें कर रहा था, - उसकी आवाज़
बिल्कुल गले के भीतर से निकल रही थी, शब्दों में शरद ऋतु की ठण्ड़ी, सूखी सीटी
जैसी कोई बात गूँज रही थी. और ऊपर से – अनैसर्गिक रूप से लाल चेहरा, जैसे माथे
से,
गालों
से चमड़ी खींच ली गई हो. घनी, काली दाढ़ी चिपकाई हुई लग रही थी. शहर में ही, गाड़ी में
बैठते हुए, सम्गीन ने सोचा था: ‘कितना
बिफ़रा हुआ चेहरा है’.
और शहर से बाहर
निकलने के बाद – पूछा:
“तुम कहाँ के हो?”
“गूरेवो का.
उराल-नदी पे इस नाम का गाँव है. पहले उसका नाम था – याइत्स्क.”
“कज़ाक?”
“कज़ाक. मगर फ़ौज कब
से छोड़ दी है.”
“क्यों?”
“हाँ...बस, ऐसे ही, पसंद नहीं
आया.”
किसी और चीज़ के
बारे में पूछने का सम्गीन का मन नहीं था, और कज़ाक, कुछ देर
ख़ामोश रहने के बाद बड़बड़ाया:
“वो, बेशक, ये बात
नहीं कि पसंद नहीं – सब ऊँगलियों के बीच से रेत की तरह फिसल गया. पकड़ नहीं
सका.”
‘ये मैंने
कहीं सुना है या पढ़ा है’, सम्गीन ने सोचा, और उसे
बोरियत ने घेर लिया: ये दिन, गरम हवा, खेत, रास्ता, घोड़े, गाड़ीवान और
हर चीज़, चारों ओर की हर चीज़ वह कई-कई बार देख चुका था, साहित्यकार, चित्रकार
इस सब का सैंकड़ों बार वर्णन कर चुके हैं. रास्ते के एक ओर फूस के ढेर से धुँआ निकल
रहा था, उसमें से भूरी राख गिर रही थी, सुनहरे-लाल
कीड़े पल भर को भभकते, थरथराकर ऐंठते, काले-भूरे
टीले से सब तरफ़ से धुँए के घुंघराले, नीले गुच्छे निकल रहे थे, और ढेर के
ऊपर धुँआ सफ़ेद बादल की तरह ठहरा हुआ था.
“जला दिया?” सम्गीन ने
पूछा.
“बेशक, जला दिया.”
“क्या पिछले
साल यहाँ बहुत विद्रोह हुआ था?”
कज़ाक ने फ़ौरन जवाब
नहीं दिया:
“यहाँ का किसान
अमीर है, विद्रोह करने वाला कोई है ही नहीं.”
तुर्चानिनव के
शब्दों को याद करके सम्गीन हँस पड़ा:
‘सब कुछ –
था,
सब
कुछ – कह दिया गया है’, और धरती पर हमेशा कोई ऐसा आदमी ज़िंदा रहेगा, जिसे एक ही
एक बात की अंतहीन पुनरावृत्तियों के बीच सब कुछ बोझिल, उकताहटभरा
लगता है. इस आदमी की दुखद परिस्थिति के बारे में विचार में शोक के साथ-साथ गर्व भी
निहित था. और सम्गीन ने सोचा, कि शायद मरीना इस गर्व से परिचित है. दोपहर हो
चुकी थी, गर्मी ज़्यादा तेज़ हो गई थी, धूल –
ज़्यादा गर्म, पूरब की तरफ़ काले बादल मंडरा रहे थे, जो फूस के
जलते हुए ढेर की याद दिला रहे थे.
“ये दिखाई दे रही
है ‘वेलकम’ इस्टेट”, गाड़ीवान ने
छोटे से चाबुक से दूर, पहाड़ी की तरफ़ इशारा करते हुए कहा: वहाँ बर्च
के पेड़ों की बगिया से सटा हुआ स्तम्भों वाला एक पीला घर खड़ा था, - ऐसे कम से
कम दसियों घर सम्गीन मॉस्को के आसपास देख चुका था, दसियों के
बारे में पढ़ भी चुका था.
पंद्रह मिनट बाद
पसीने से लथपथ घोड़े टीले पर बने, बारिश से धुले रास्ते पर चढ़े, दोनों तरफ़
लगे बर्च वृक्षों की गर्माहट भरी छाया तले चलकर नए-से, नक्काशी
किए हुए लकड़ी के एक मंज़िला घर की ड्योढ़ी के सामने रुके. ड्योढ़ी के ऊपर आर्क की शक्ल
में एक ख़ूबसूरत बैनर लगा था, - सफ़ेद पृष्ठभूमि पर लाल और नीले रंगों से दिखाए
गए थे : एक किसान अजीब सी मुद्रा में – वो एक पाँव पे खड़ा था, दूसरा पाँव
और हाथ फैले थे हल के ऊपर, हल के बाद – दो कड़ियाँ ; उनके बाद –
बड़ा सा हथौड़ा; आगे – कुछ समझ में न आने जैसी चीज़ और – एक
लड़की नौजवान के साथ; एक दूसरे का हाथ पकड़े, वे एक
दूसरे को चूम रहे थे. इन आकृतियों के नीचे छोटे-छोटे अक्षर कह रहे थे:
‘ऑफ़िस’ (रूसी में
इसे लिखते हैं - «Контора», - अनु.), और सम्गीन ने अंदाज़ लगाया कि
आकृतियाँ भी इन्हीं अक्षरों को प्रदर्शित कर रही हैं.
ऑफ़िस की खिड़की से ज़खारी का फ़ीका, काली दाढ़ी वाला चेहरा
झाँका और ग़ायब हो गया; कोने से चार आदमी निकल
कर बाहर आए, उनमें से दो ने धीरे से अपनी
टोपियाँ उतारीं, तीसरे – ऊँचे, मुच्छड़ ने सिर्फ ऊँगली से फूस की हैट को छुआ, जो चेहरे पर खिसक आई थी, और चौथे – गंजे, दढ़ियल ने ख़ुशी से मुस्कुराते हुए खनखनाती आवाज़ में कहा;
“स्वागत है!”
‘ये भी था’, सम्गीन ने
किसानों के सामने झुकते हुए और बूट उतारते हुए यंत्रवत् सोचा.
सफ़ेद कमीज़ का
कमरबंद कसते हुए, और किसानों से उलाहनापूर्वक कहते हुए ज़खारी
ड्योढ़ी से भाग कर आया:
“तुम लोग भी क्या –
एकदम?
आदमी
को ज़रा साँस तो लेने दो!” उसने सम्गीन की कोहनी पकड़ी.
“आइए, घर के भीतर
आइए,
खाना
तैयार है...” और कज़ाक के पास से गुज़रते हुए, उससे दबी
आवाज़ में बोला: “देखते रहना, दानिलो, मैं अभ्भी
वास्या को भेजता हूँ.” और बेहद नीची आवाज़ में अपने इस निर्देश का समर्थन किया: “लोग, यहाँ के –
ख़तरनाक हैं, क्लीम इवानोविच, शरारती लोग
हैं!”
किचन से होते हुए
घर के भीतर गए, - चूल्हे के पास साँवले चेहरे पर चंचल, बेहद
चमकदार आँखों वाली एक छोटी-सी, मोटी बुढ़िया व्यस्त थी; हॉल में आए, जो नम और
अंधेरा था, हाँलाकि उसमें दो बड़ी-बड़ी खिड़कियों और दरवाज़े से
रोशनी आ रही थी, दरवाज़ा टैरेस की ओर खुला था. बड़ी ओवल डाइनिंग
टेबल क्रॉकरी से, बोतलों से, फूलों से अटी
थी,
भूरे
खोल की कुर्सियों से घिरी थी; कोने में एक पियानो खड़ा था, उसके ऊपर –
भूसा भरा उकाब और गिटार का खोल था; दूसरे कोने में – दो चौड़े-चौड़े सोफ़े और उनके
ऊपर सुनहरी फ्रेम्स में काली तस्वीरें थीं. एक दुबली-पतली, मोटी चोटी
वाली, सुघड़ लड़की
दूध भरी काँच की सुराही लाई और जल्दी से ग़ायब हो गई – ज़खारी भी ये कहकर चला गया:
“थोड़ा आराम कर
लीजिए. मुँह हाथ धोने के लिए – किचन से होकर जाइए. सम्गीन ने आनंद से गिलास भर
गाढ़ा,
ठण्डा
दूध पिया, किचन में गया, गीले तौलिए
से मुँह और गर्दन पोंछी, टेरैस पे गया और सिगरेट पीने के बाद, अपने भीतर
की आवाज़ों को सुनते हुए, वहीं चहल-कदमी करने लगा, किसी भी
तरह के विचार सुनाई नहीं दे रहे थे, मगर कुछ ऐसा एहसास ज़रूर हो रहा था, कि यहाँ
कुछ ऐसा होने वाला है, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था. पैरों के नीचे
फ़र्श की लकड़ी की पट्टियाँ चरमरा रही थीं, उनके बीच की दरारों से नम धरती की ख़ुशबू उठ
रही थी; बेहद ख़ामोशी थी. टेरैस की सीढ़ी एक अर्धगोल आँगन में
उतर रही थी, जिस पर घनी घास फैली हुई थी, उस पर
पुराने लिन्डेन और बर्ड-चेरीज़ के वृक्षों की छायाएँ पड़ रही थीं; तनों के
बीच-बीच में कटी हुई झाडियों के ठूँठ झाँक रहे थे, लोहे की
टूटी हुई बेंच पड़ी थी. एक सँकरी पगडण्डी पार्क के भीतर जा रही थी. सम्गीन सीढ़ी की
ऊपरी पायदान पर बैठ गया.
घर के कोने के पीछे
से एक के पीछे मर्द निकल कर आए; गंजा सम्गीन से एक सीढ़ी नीचे बैठा, मुस्कुराया
और खनखनाती आवाज़ में बोला:
“शहर का आदमी का
तम्बाकू से भी पता चल जाता है.”
वो – मध्यम ऊँचाई
का था,
मगर
उसके कंधे इतने चौड़े थे, कि छोटे कद का जान पड़ता था. अजीब से रंग के
फ़टे हुए जैकेट के नीचे – गंदी, कैनवास की कमीज़, पैरों में –
पैबंद लगी, भूरी, चौखाने वाली पतलून और मुड़े-तुड़े रबड के गालोश
थे. चौड़ा, उभरी हुई हड्डियों वाला चेहरा, छोटी-छोटी
पैनी आँख़ें और बिखरी हुई दाढ़ी लेव टॉल्स्टॉय के चित्रों से उसकी समानता प्रदर्शित
कर रहे थे.
सम्गीन ने उसे
सिगरेट पेश की.
“अज़ ने
पीशेम” – उसने कहा और चौड़ी, ख़ुशनुमा मुस्कुराहट से उसकी आँख़ें इतनी
पारदर्शी हो गईं, जैसे किसी बच्चे की आँखें हों.
ये देखकर, कि मालिक
उसकी ओर सवालिया नज़र से देख रहा है, उसने, मुस्कुराहट
रोके बिना पूछा: “समझे नहीं? ये – बल्गारियन भाषा है, जिप्सियों
की. बल्गार लोग ‘मैं’ नहीं कहते – ‘अज़’ कहते हैं.
और सिगरेट पीना उनकी भाषा में होता है- ‘पीखात्’.
ऊँचे, मुच्छड़
मर्द ने, जिसका चेहरा हजामत किया हुआ था, ये कहते
हुए हाथ फ़ैलाया:
“मुझे दीजिए, मैं – पीता
हूँ!”
सम्गीन ने पूछा:
“आप – क्या
बल्गारिया गए थे?”
“किसलिए? पराए मुल्क
में जाने की हमें ज़रूरत ही नहीं है; अपनी ही धरती पर मुश्किल से रेंगते हैं...”
“जापानियों के यहाँ
घुस गए थे, उन्होंने हमारा थोबड़ा ऐसा फोड़ा,” मुच्छड़ ने
उदासी से कहा.
“नहीं, ये भाषा
मुझे जिप्सी ने सिखाई थी, घोड़ों का डॉक्टर था.”
बाकी के दोनों भी
सीढ़ी पर बैठ गए, उनमें से एक – भूरी दाढ़ी वाला, मोटा, ढंग के
कपड़े पहने हुए था, उसका चेहरा – चौड़ा, मामूली और
पीला था, नाक – लम्बी, सफ़ेद; दूसरा –
छोटा,
हड़ीला, फ़र का छोटा
कोट पहने, नंगे मज़बूत पैर, टोपी आँखों
पर इतनी खिंची हुई थी, कि सिर्फ उसकी लाल, चपटी नाक
ही दिखाई दे रही थी, छितरी मूँछें, मोटा कटा-फटा
होंठ और छोटी सी लाल दाढ़ी थी. वे चारों सम्गीन को इस तरह एकटक देख रहे थे, कि उसे
अटपटा लगने लगा, वहाँ से जाने को जी चाहने लगा. मगर मुच्छड़ ने, सिगरेट की
राख को फूँक मारकर सख़्ती से पूछा:
“ बताइए, महाशय, क्या ये सच
है,
कि
हमसे टैक्स नहीं लेने का, हमारे भाई-बंधु को लड़ाई पे न भेजने का फ़ैसला
किया गया है? और ये भी, कि युद्ध सिर्फ कज़ाक करेंगे, हमारा काम
सिर्फ एक है – अनाज बोना?”
मज़बूत पैरों वाला
आदमी ऊँगली से सड़ी हुई सीढ़ी को खुरचते हुए बुदबुदाया:
“तुम्हें ऐसा ही
बताएँगे!”
सम्गीन ने संक्षेप
में कैडेट्स –पार्टी की अपील के बारे में बताया; मर्दों ने
ख़ामोशी से उसकी बात सुनी, और गंजा संतोषपूर्वक चिल्लाया:
“मैंने तो कहा ही
था – घोषणा हुई है!”
“मतलब, धोखा,” दाढ़ी वाले ने गहरी साँस ली, और मुच्छड़
ने उसकी ओर देखा और दाँतों के बीच से दूर थूक दिया.
“हमारे नसीब में
ख़ुशी नहीं है, महाशय,” गंजे ने
खनखनाती हुई आवाज़ में शिकायत की, “ बोझ डालते हैं हम पर, यहाँ के
पापियों पर, टैक्सों का! पैसे की बर्बादी - चाहे जित्ती, मगर बचत –
ज़रा भी मुमकिन नहीं है. ज़रा पंद्रह का सिक्का बचाया, फ़ौरन जेब
में हाथ डाल देंगे – इधर दो! और – अलबिदा सिक्का. सिक्का भी और पतलून भी. ये रही
आपके लिए ज़िला-परिषद, ये रहा और बस...”
वह मज़े लेकर और चालाकी
से बोल रहा था, जैसे “शिक्षा के
फ़ल”
में
उस आदमी की भूमिका करने वाला कोई ठीक-ठाक एक्टर बोलता है, जो शिकायत
करता है: “मुर्गियों को भी, मतलब, भगाने के
लिए कोई जगह नहीं है”. जब सम्गीन ने इस बात पर गौर किया, तो उसे ऐसा
लगा,
कि
दूसरे मर्द भी थियेटर वालों जैसे ही हैं, जो अपमानित और शोषित लोगों की भूमिका निभाने
को तैयार हैं.
उसे अचरज में डालते
हुए मुच्छड़ आदमी ने इस धारणा को सही साबित कर दिया: बाएँ हाथ के अंगूठे के नाखून
पर थूक से सिगरेट के ठूँठ को चिपका कर, उसकी ओर देखते हुए वह बोला:
“आप, साहिबान, उस पे यकीन
न कीजिए, वो – अमीर है, उसके पास
पाँच-पाँच घोड़े हैं, तीन-तीन गाएँ, बीसेक
भेडें हैं, बगीचा बढ़िया है. वे, तीनों, अमीर हैं, किसान को
उसकी ज़मीन देने से बच रहे हैं, इस ज़मीन को ख़रीदना चाहते हैं.”
उसने चुटकी से
सिगरेट के ठूँठ को गिरा दिया, उस पर थूका और उसे पैर से ज़मीन पर मसल दिया, मगर गंजे
ने चेहरा सिकोड़कर, आँख़ें छुपा लीं, ज़ोर से सिर
हिलाया और आसमान की ओर देखते हुए मंद –मंद मुस्कुराने लगा.
“अरे, ये क्या कह
रहा है, साहेबान, कह क्या रहा है! अमीर, आँ? प्या-आ-रे
प्योत्र वासिल्येव, क्या अमीर लोग कभी गाँवों में रहते हैं? ए-एख़ – ऐसा
तो कभी देखा नहीं, कि अमीर इन्सान गाँव में बड़ा हुआ हो, वो तो शहर
में,
आराम
की रोटी पे...”
मुच्छड़ प्योत्र ने
उसकी तरफ़ भँवें नचाते हुए देखा, उसके गालों पर सूजन आ गई.
इस डर से कि बहस
छिड़ जाएगी, सम्गीन ने पूछा, कि क्या
उनके इलाके में विद्रोह हुए थे.
“ये तो हमें नहीं
पता,”
सफ़ेद
नाक वाले आदमी ने कहा, और मुच्छड़ ने बताया:
“यहाँ, आसपास, इत्ते
चेर्केसों को पकड़ा है, - बगावत कर ही नहीं सकते!”
“बगावतों से –
हमारा कोई लेना-देना नहीं है, महाशय!” गंजे ने जल्दी-जल्दी कहा. “बेशक, बगावत करने
की वजह तो है, हमारे पास, मगर – कोई मतलब
नहीं है!”
जोश में आकर, जल्दी-जल्दी
एक शब्द को दूसरे में पिरोते हुए, हाथों को हिलाते हुए, वह बड़ी देर
तक और अटपटेपन से ‘मतलब’ और ‘वजह’ के बीच
फ़रक समझाता रहा, - दयनीयता और गुस्से से चमकती हुई, उसकी पैनी
आँखों के भाव प्यार और चालाकी से, बेहद तेज़ी से बदल रहे थे. भूरी दाढ़ी वाला, अपनी नाक
को सिकोड़ते हुए, कुछ कहने के इरादे से अपना मुँह खोल रहा था और
बंद कर रहा था, मगर एक ततैया उसे परेशान कर रही थी, जो उसके
चौड़े चेहरे के सामने उड़ रही थी. तीसरे आदमी ने सीढ़ी से ज़ंग का एक बड़ा टुकड़ा तोड़
दिया था, ग़ौर से उसे देखे जा रहा था.
“मतलब – ‘वजह’ होगी आलस
और बगावत करती है – वो! मगर ‘मतलब’ किसी और
चीज़ की माँग करता है! जैसे – जूँ को हल में नहीं जोत सकते, और ये होगा
‘मतलब’....”
“कैसे पंछी को मार
रहे हो तुम, चचा मीत्री,” मुच्छड़ प्योत्र ने कहा और सम्गीन से मुख़ातिब
हुआ:
“ये सब वो इसलिए कह
रहा है, कि कुछ भी न कहे. आप इसकी बात मत सुनिए, गंदी ड्रेस
की तरफ़ – ध्यान न दीजिए, वो जानबूझकर गरीब जैसे कपड़े पहनकर आया है...”
“ऐख, प्योत्र, बेकार ही
तू,”
भूरी
दाढ़ी वाले ने अलसाहट से कहा, “ आए हम किसी काम से हैं, और तू...”
गंजे ने उसकी बात काटी:
“पेत्रूख, तुझे हम जानते
हैं! हम तुझे बड़ी अच्छी तरह जानते हैं! तू अपनी बीन न बजा...”
“और मैं भी जानता
हूँ कि तुम लोग अपना गाना ख़त्म कर चुके हो! तो, अब – रोओगे,” उसने माँ
की गालियाँ दीं, उठ गया और जेबों में हाथ डालकर चला गया. मज़बूत
पैरों वाले आदमी ने सड़ा हुआ ज़ंग का टुकड़ा फेंक दिया और फुफकारा:
“फ़ौजी, फूहड़, गुण्डागर्दी
करने वालों में ख़ास है, कुतिया का पिल्ला! उनका यहाँ – अड्डा है! वे –
न तो ख़ुदा को मानते हैं, न – शैतान को, सब कुछ सिर्फ
अपने ही लिए करते हैं. उन्हींकी वजह से चेर्केसों को हमारे ऊपर भेज दिया था.
“और चेर्केस – वो
तो ये नहीं ना देखता है, कि किसका क्या कुसूर है,” गंजे ने
आगे कहा और हाथों को घुटनों पर लगे पैबंदों पर मारते हुए ज़ोर से चिल्लाया:
“हमारे यहाँ
कोई कानून बबस्था नहीं है और – बिल्कुल नहीं है!”
भूरे ने आसमान की
ओर देखा, जो बिल्कुल सफ़ेद-गर्म हो रहा था, और बोला:
“तूफ़ान आने वाला है,” और फिर
सम्गीन से पूछा:
“आप कौन हैं:
एडवोकेट या सिर्फ - मेहमान?”
इससे गंजे को हँसी
आ गई:
“मज़े की बात पूछी, ओय, ख़ुदा!”
सम्गीन उठ गया और
ये सोचते हुए पगडंडी पे पार्क की गहराई की ओर चल पड़ा, कि ऐसे
लोगों की ख़ातिर आदर्शवादी, छायावादी कई कई सालों तक जेलों में बंद रहे, निर्वासन
पे गए,
यातना-शिविरों
में भेजे गए, मौत को गले लगाने चल पड़े...मगर इस बारे में उसने
सरसरी तौर पर सोचा, दिल से नहीं, - उसे
परेशानी इस बात की हो रही थी, कि मरीना क्यों नहीं आ रही है? गर्मी इतनी
थी,
जैसे
हम्माम में होती है, एक बोझिल, अप्रिय
अलसाहट जिस्म को कमज़ोर किए दे रही थी. रास्ते के अंत में, झाड़ियों
में,
एक
छपरी दिखाई दी; उसकी सीढ़ियों पे फ्रांसीसी एडी वाला रबड़ का
जूता पड़ा था और किसी किताब की जिल्द; छपरी के भीतर दो बेंत की कुर्सियाँ थीं, फ़र्श पर
टूटी हुई शतरंज की मेज़ थी. पहाड़ी से, झाड़ियों के बीच से, खेत दिखाई
दे रहा था, पारे जैसी नदी चमक रही थी, क्षितिज पर
नीला बादल फूल रहा था, अदृश्य रास्ते से धूल उड़ रही थी. और फिर, हर चीज़
इतनी जानी-पहचानी, इतनी सीमित, आम तौर से –
सब कुछ बोरियत भरा है, बोरियत भरा. अचानक सम्गीन को याद आया, कि
सर्दियों में उसके दिल में आत्महत्या करने का ख़याल आया था. अपमानजनक ख़याल.
दूर से उठ रही धूल
घनी होती जा रही थी, - शायद, मरीना आ
रही है.
सम्गीन सोचने लगा:
मरीना किसके जैसी है? जितने भी उपन्यास उसने पढ़े थे, उनकी
नायिकाओं में से एक भी इसके जैसी नहीं मिली. पीठ के पीछे सीढ़ियाँ चरमराईं, ये मुच्छड़
फ़ौजी प्योत्र आया था. वह लापरवाही से कुर्सी में बैठ गया और, चाकू से
अख़रोट की डण्डी की छाल निकालते हुए, हौले से मगर सख़्ती से पूछने लगा:
“ मतलब, त्सार को
ख़ुद तो राज करना आता नहीं, और दूसरों को – करने नहीं देता? हम किस बात
की उम्मीद करें?”
“जनवरी में फिर से
ड्यूमा बनेगी,” सम्गीन ने कनखियों से उसकी ओर देखते हुए कहा.
“ऐसा. आप – कौनसी
पार्टी के हैं?”
सिगरेट के कश लेते हुए, सम्गीन ने
जवाब नहीं दिया, और फ़ौजी ने भी जवाब का इंतज़ार नहीं किया, स्क्रू की
तरह डण्डी से खाल छीलते हुए, और, सम्गीन की ओर न देखते हुए, चिंता से
बोला:
“आपका क्या ख़याल
है: ज़मीन ख़रीद कर, अलग हो जाएँ, या –
इंतज़ार करें? अगर – इंतज़ार करें, तो खून
चूसने वाले सब हड़प कर जाएँगे. यहाँ तो – आदमी जा रहा है, मना रहा
है: मालिक को ज़मीन से भगा दो, बरबाद कर दो उन्हें! मैं, कहता है, अराजकतावादी
हूँ. बर्बाद करना – आसान है. मयदान में चेर्कासोवों के यहाँ – इस्टेट जला दी, मवेशी काट
दिए,
मतलब
– एकदम साफ़! पैदल फ़ौज आई, करीब चालीस फ़ौजी रिज़र्व बटालियन के, तीन
किसानों को गोली मार दी, चौदह को पीटा, लुगाइयों
को भी. इसमें कोई मतलब – नहीं है.”
फ़ौजी अपने आप से
बातें कर रहा था, और क्लीम उस आदमी की अजीब स्थिति के बारे में
सोच रहा था, जिसे न जाने क्यों सारे सवालों के जवाब देने पड़ते
हैं.
“आप, टीले पर, घर में, चाय पी रहे
होते हैं, और ईंटों की फ़ैक्ट्री के पीछे, गढ़ों में
मीटिंग हो रही होती है, आया हुआ आदमी भाषण दे रहा है. किसान को चिढ़ा
रहे थे और सभी चिढ़ा रहे हैं. बबस्था लम्बे समय तक नहीं रहेगी,” प्योत्र ने
प्रकट में प्रसन्नता से कहा और शिक्षा देने के अंदाज़ में अपनी बात जारी रखी:
“आप ये कोशिश कीजिए, कि ये
इस्टेट हम लोगों के बेची जाए. किसान अपने आप से अच्छाई नहीं देख सकेगा. और अगर
नहीं बेचेंगे – तो हम बहुत गड़बड़ करेंगे, ये मैं बिना किसी डर के आपको बता देता हूँ.
गंजा और वो फूस की हैट वाला – तबाकोव भाई हैं, वो चालाक
हैं! वो ऊँगली भी नहीं हिलाएँगे, और -
काम कर डालेंगे! गाँवों के गवर्नर्स हैं. पादरी – मरहम लगाने वाले.”
“तूफ़ान आ रहा है,” सम्गीन ने
छपरी से बाहर निकलते हुए कहा, - फ़ौजी चहका:
“आने दो,” और उसने
सीटी बजाते हुए डण्डी हवा में चलाई. “बहस करना नहीं चाहते? कोई बात
नहीं,”
वह
बुरा माने बिना बुदबुदाया.
घर लौट कर सम्गीन
ने कुछ खाया, वोद्का के दो जाम पिए, दीवान पर
लेटा और फ़ौरन उसकी आँख़ लग गई. कानों को बहरा कर देने वाली बिजली की कड़कड़ाहट से
उसकी नींद टूटी, - पार्क में लगातार बिजली चमक रही थी, कमरे में, मेज़ पर सब
कुछ काँप कर अंधेरे में छुप जाता, घनी बारिश शीशों पर कोड़े बरसा रही थी, मेज़ की
क्रॉकरी नीली चमक बिखेर रही थी, हवा चिंघाड़ रही थी और न जाने कहाँ से ज़खारी की
कर्कश आवाज़ आई:
“ओल्गा, दूध ले जा, खट्टा हो
जाएगा! अब नहीं आएँगे. आह, मेरे ख़ुदा...”
इसके बाद शीशों पर
ओले टकराने लगे. सम्गीन ने दीवार की तरफ़ मुँह फेर लिया, फिर से
सोने की कोशिश करने लगा, मगर जल्दी ही कहीं से मरीना की गुस्से भरी चीख
सुनाई दी:
“कोई है? जल्दी से
चाय दो. ओल्गा से पूछो – औरतों के कपड़े हैं? अच्छा, कोई
गाऊन-वाऊन...”
सम्गीन उसके पास
ठीक उसी पल पहुँचा, जब बिजली कड़की, उसने छोटे
से कमरे में धुँधला प्रकाश भर दिया और मरीना कस कर रेशम में लिपटी दिखाई दी.
“अच्छी हूँ?” उसने पूछा.
“और सब लीदिया की सनक के कारण, - मॉनेस्ट्री में जाना पड़ा, आह...चल, जा यहाँ से, कपड़े
उतारूँगी!”
उसका मज़बूत बदन
हिलने लगा, और जैसे वो ही धुँधलके को झकझोर रहा था. सम्गीन हॉल
में लौट आया, उसे याद आया कि निकानोवा के साथ उसका ख़ामोश प्यार ऐसी
ही बरसात की शाम को शुरू हुआ था; इस याद ने फ़ौरन उसके दिल को एक गंभीर उदासी से
भर दिया. छोटे वाले कमरे में फर्श पर गीले कपड़े फ़िंक रहे थे, फिर एक तैश
भरी आवाज़ सुनाई दी:
“धीरे, ओल्गा, तूने मुझे
पिन चुभो दी...”
भूरा गाऊन, जिसे
अंग्रेज़ी पिनों से यहाँ वहाँ टाँका गया था, पहने मरीना
भीतर आई, गर्दन में तौलिया पड़ा था, और बाल पीठ
पर बिखरे थे, वो फ़्लावीत्स्की के चित्र की राजकुमारी तरकानोवा जैसी, और किसी
महिला कैदी जैसी लग रही थी; वह मखमली जूतों वाले पैर फ़ैलाकर मेज़ के पास
बैठ गई, और सम्गीन से बोली:
“तो, मेज़बान बनो, आवभगत
करो!”
ज़खारी, मुस्कुराते
हुए और कुछ सकुचाहट से बड़ा समोवार लाया, मेज़ के पास कुछ देर डोलता रहा और ग़ायब हो गया.
पोर्टवाइन का बड़ा जाम पीकर, होठों पर जीभ फेरकर, वह बोली:
“इस घर में एक बूढ़ा
रहता था, बेहद ज़हीन, बदचलन और परले दर्जे का कंजूस. निहायत कंजूस
था,
मगर
साल में तीन बार एक-एक हज़ार रूबल्स फ़्रान्स भेजा करता था, ब्रेटन के
एक शहर में – किसी नोटरी की बेवा और उसकी बेटी को. कभी-कभी मनीऑर्डर भेजने का काम
मुझसे करवाता था. मैंने पूछा: ‘इश्क?’ – ‘नहीं, बोला, सिर्फ
सहानुभूति’. हो सकता है, कि झूठ नहीं बोल रहा था.
तौलिए से गीले बाल
पोंछते हुए उसने आगे कहा:
“फिलॉसफ़ी बघारता था, ‘इतिहास और
किस्मत’ नाम का लेख भी लिखा था, - बहुत अटपटा
और उदासीभरा लिखता था. पिछली गर्मियों में रहता था, वो...कोई
मुर्गी खाने वाला, तमीलिन, सिर्फ चिकन
और सब्ज़ियाँ खाता था. ऐसा मोटा, दुष्ट, सिर्फ ख़ुद
से प्यार करने वाला जानवर. लड़की पर ज़बर्दस्ती करने की कोशिश की, रसोइन की
लड़की थी वो – होशियार लड़की थी, वैसे, ये लगता था, कि वो इस, तुर्चानिनव
की ही बेटी थी. बूढ़े ने हंगामा करके तमीलिन को निकाल दिया. तमीलिन भी फ़िलॉसफ़ी करता
था.
“मैं उसे जानता हूँ, वो मेरा
ट्यूटर था,” सम्गीन ने बताया.
“”सच में?”
मरीना ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ़ देखा, कुछ कहना
चाहती थी, मगर बिज़बेदोव और तुर्चानिनव आ गए; बिज़बेदव ने
कुलीनों वाला युनिफॉर्म और पतलून पहनी थी, नंगे पैरों
पर जूते थे, - अपने झबरे बालों पर उसने अच्छी तरह कंघी कर ली थी, और वह कम
फूहड़ लग रहा था – रोबदार और गंभीर नज़र आ रहा था; तुर्चानिनव, लम्बे कोट
और रबड़ के जूतों में और भी छोटा, पतला लग रहा था, उसका चेहरा
दुखी था. रबड़ के जूतों को घिसटते हुए, उसने कम आत्म विश्वास से कहा:
“इन्सान को
अपने सामने महान उद्देश्य रखना चाहिए...”
“बिल्कुल ठीक,” मरीना
चहकी. “मगर किस तरह के?”
उसके पास बैठकर वह
कहने लगा:
“आम तौर से –
किसी झण्डे के नीचे रहना...जैसे धर्मयोद्धा, अल्केमिस्ट.”
बिज़बेदोव खड़े-खड़े
गिलास में वाइन डाल रहा था और बड़बड़ा रहा था:
“पुराने झण्डे
हमारे किसी काम के नहीं हैं, हम – स्वनिर्मित लोग हैं.”
“इसका क्या मतलब है?” तुर्चानिनव
ने पूछा, ज़ाहिर था कि उसे इस शब्द में वाकई में दिलचस्पी महसूस
हो रही थी.
“ओह, - कैसे बताऊँ?” गिलास को देखते
हुए बिज़बेदोव बुदबुदाया. “बुद्धिजीवी...स्वनिर्मित है. हमें ज़रूरत है: ज़ीन की, लगाम की और
आँखों के सामने घास की पूली की, जिससे हमारा घोड़ा आगे चले, - बेहद ज़रूरी
है!”
तुर्चानिनव ने
चुपचाप सवालिया नज़र से उसकी ओर देखा – और पूछ लिया:
“घास की पूली?”
“हूँ, हाँ,” बदतमीज़ी से
बिज़बेदोव ने कहा, “झण्डे के बदले”.
“छोड़ो भी वलेन्तीन,” मरीना ने सलाह दी.
बारिश अब कम हो गई
थी,
शीशों
पर रुक-रुक कर, जल्दी से
मार कर रही थी, जैसे उसकी ताकत ख़तम हो गई हो, और उसका
रुक जाने का इरादा है. हवा साँय-साँय कर रही थी, पेड़ों की हल्की-हल्की
सरसराहट हो रही थी.
दरवाज़े में लड़की
प्रकट हुई और न जाने क्यों चिड़चिड़ाहट से बोली:
“लीदिया
तिमोफ़ेयेव्ना यहाँ नहीं आएँगी, कहा है कि उनके लिए चाय और किसी भी वाइन का एक
गिलास ले जाऊँ.”
“मूषक-सुंदरी,” जब वह चाय
ले जा रही थी, तो पीछे से उसकी तरफ़ देखते हुए बिज़बेदोव ने
कहा. “चूहे जैसा थोबड़ा है.”
तुर्चानिनव सिहर
गया,
उसने
भँवें चढ़ा लीं और गिलास में वाइन डालते हुए जल्दी से गरम चाय पी ली. सम्गीन
मेज़बानी कर रहा था, वह इन लोगों के बीच स्वयम् को अदृश्य महसूस कर
रहा था. अपने सामने वो सिर्फ मरीना को देख रहा था; वह चाय के
चम्मच से खेल रही थी, उसे हथेलियों में संतुलित कर रही थी, एक हथेली
से दूसरी में रख रही थी, - ख़यालों में खोई हुई उसकी आँख़ें सिकुड़ी हुई
थीं.
चम्मच गिर गई, सम्गीन उसे
उठाने के लिए झुका और उसे मेज़ के नीचे घुटनों तक अनावृत मरीना के पैर दिखाई दिए. बिज़बेदोव
पियानो की तरफ़ गया, गिटार का खोल उतारा और घोषणा की:
“खाली है. वैसे, मुझे गिटार
बजाना आता ही नहीं है.”
“जाती हूँ, देखती हूँ, कि उसे
क्या हुआ है,” मरीना ने उठते हुए कहा.
“गिटार को?”
तुर्चानिनव ने अचरज
से उसकी तरफ़ देखा और फिर से वाइन के साथ चाय पीने लगा, और
बिज़बेदोव, लकड़ी के चरमराते फ़र्श पर घूमते हुए, कर्कश आवाज़
में,
भर्राते
हुए,
सुनाने
लगा:
“मैं –
वो ही हूँ ख़ान नमीक,
आदत है
जिसे यहाँ राज करने की!
छोटे से
बड़े तक सब,
जानते हैं
भयानकता नमीक की!
फिर वो रुक गया, थोड़ी देर
के लिए ख़ामोश हो गया और फिर स्वीकार कर लिया;
“ भूल गया कि आगे
क्या है.”
सम्गीन फ़ौरन समझ
गया,
कि
बिज़बेदोव को चढ़ गई है, और वह सतर्क हो गया. छत की तरफ़ देखते हुए
बिज़बेदोव हौले-हौले याद कर रहा था;
घिरा हूँ
ख़ूबसूरती से,
अपनी...एक
सौ चालीस बीबियों से!
पर – समझ
गया पहले कुछ दिन,
कि ये भी
है कम.”
“बहुत दिलचस्प है,” तुर्चानिनव
ने सम्गीन की तरफ़ सवालिया नज़र से देखते हुए कहा. सम्गीन हँस पड़ा और बिज़बेदोव मेज़
के पास गया और, सम्गीन की पीठ के पीछे खड़े-खड़े , उसने अपना
भर्राना जारी रखा:
ज़रा कहीं
रोया कोई,
लटका देता
हूँ सूली पे,
और देखो तो, लोग मेरे
जीते हैं
गाते-गाते!”
“ फिर से भूल गया,” सम्गीन की
कुर्सी की पीठ पकड़ते हुए उसने कहा; तुर्चानिनव ने दुहराया कि कविता दिलचस्प है, और चारों
ओर देखते हुए, कस के अपना माथा पोंछा, और
बिज़बेदोव ने कुर्सी हिला कर पूछा:
“और आप को – अच्छी
लगती हैं?”
“लाजवाब,” सम्गीन ने
कहा.
बिज़बेदोव फिर से
कमरे में चक्कर लगाने लगा, खाँसते हुए उसने कहा:
“इसे लिखा था –
साव्वा मामन्तोव, करोड़पति, रेल्वे का
निर्माण किया, कलाकारों को खिलाया, कॉमेडी
वाले ऑपेरा लिखता था. क्या ऐसे फ़्रान्सीसी हैं? नहीं हैं
ऐसे फ़्रान्सीसी. हो ही नहीं सकते,” उसने गुस्से से आगे जोड़ा. “ये सिर्फ हमारे
यहाँ होता है. हमारे यहाँ, ब्रदर व्सेवोलद, हर कोई भेस
बनाए फिरता है... जो उसके अपने ओहदे से मेल नहीं खाता. और – योग्यताओं से भी. सब
पराई हैट में घूमते हैं. और, इसलिए नहीं, कि पराई –
ज़्यादा ख़ूबसूरत है, बल्कि...शैतान ही जाने क्यों! अचानक –
क्रांतिकारी, और – किसलिए?” वो मेज़ के
पास आया, बोतल उठाई और, गिलास में
वाइन डालते हुए बुदबुदाया:
“पियो, सम्गीन, ...” कमरा
अचानक नीली रोशनी से भर गया, संक्षिप्त सी सूखी बिजली कड़की. बिज़बेदोव
कुर्सी पे बैठ गया, और हाथ हिलाते हुए बोला:
“त-तो, चलो...”
एक मिनट के लिए सब
ख़ामोश रहे, फिर तुर्चानिनव उठा, दीवान की
तरफ़ वाले कोने में गया और वहाँ से बोला:
“आप बढ़िया बोलते
हैं...”
“मैं? मैं –
बेवकूफ़ों की तरह बोलता हूँ. क्योंकि दिल में कुछ भी नहीं रहता है...जैसे बिना हवा
के क्षेत्र में. जो भी दिमाग़ में आता है, सब बक देता हूँ, अपने ही
सामने जोकर का खेल खेलने लगता हूँ,” बिज़बेदोव चिड़चिड़ाहट से भर्राने लगा; उसके बाल, सूखने के
बाद खड़े हो गए थे, - सम्गीन से जाम टकराना भूलकर उसने वाइन पी ली, और हाथ में
ख़ाली गिलास पकड़े, उसकी ओर देखकर बोला: “और डरता हूँ, कि अभ्भी –
कहीं से, कोई डर जानवर की तरह मुझ पर झपट पड़ेगा.”
“ये – मानसिक तनाव
है,
ये
– तूफ़ान के कारण है,” तुर्चानिनव ने दीवान पर लेटते हुए शांति से
समझाया.
बिज़बेदोव सम्गीन के
सामने झुका और पूछने लगा:
“आप – क्या सोचते
हैं?”
सम्गीन बिज़बेदोव की
बातों से चिढ़ चुका था और ये देखते हुए, कि वह नशे में अधिकाधिक धुत् होता जा रहा है, वह हंगामे
से डर रहा था, मगर, अपनी चिड़चिड़ाहट पर काबू न कर सकने के कारण
उसने रुखाई से जवाब दिया:
“मेरा एक दोस्त ये
पंक्तियाँ गाता था:
‘हाँ – ख़ाली
रूह के लिए
ज़रूरी है
विश्वास का बोझ...’
“थक चुका
नमिक – ज़िंदगी से,
मरने चला
अपनी मर्ज़ी से.”
बिज़बेदोव ने कुर्सी हिलाते हुए भर्राई आवाज़
में कहा.
मरीना भीतर आई, वह बाल
सँवार चुकी थी, चोटी को पगड़ी की तरह सिर पर बांधा था, - इससे उसकी
ऊँचाई कुछ ज़्यादा हो गई थी.
“व्सेवोलद
पाव्लोविच, - आपके लिए कमरा तैयार है, वलेन्तीन –
ले जाओ! बिचले तल्ले पे. तुम्हारे लिए, क्लीम इवानोविच, यहीं
बिस्तर लगा देंगे.”
वो तुर्चानिनव से
प्यार से बात कर रही थी, बिज़बेदोव को – सख़्ती से हुक्म दे रही थी, सम्गीन को
अपने प्रति उसकी बात में बेहद प्यार के सुर सुनाई दिए.
“लीदिया को, लगता है, ज़ुकाम हो
गया है,” मुँह बनाते हुए, और ये
देखते हुए, कि बिज़बेदोव कैसे दनदनाते हुए घूम रहा है, उसने कहा. “रात कितनी
डरावनी है! अभी से सोना तो बहुत जल्दी हो जाएगा, मगर – क्या
किया जाए? इस्टेट को देखते हुए, कल मुझे
काफ़ी घूमना पड़ेगा. गुड नाइट...”
सम्गीन उठा, उसे दरवाज़े
तक छोड़ने गया, अदृश्य सीढ़ी पर ऊपर जाते उसके कदमों की आवाज़
सुनता रहा, हॉल में वापस आया, और टेरैस
वाले दरवाज़े के पास खड़ा होकर शीशे पर ऊँगलियाँ बजाने लगा.
हवा पेड़ों के सिरों
को झुला रही थी; उनके ऊपर छाया गहनतम अँधेरा न जाने कहाँ को
तैर रहा था, अब एक बड़ा तारा उसमें चुभ गया है, - हवा ने
तारे को बुझा दिया. कमरे में ख़ामोशी थी, मगर ऐसा लग रहा था, कि ख़ामोशी
उसी तरह से हिल रही है, जैसे खिड़की के बाहर अँधेरा हिल रहा है. सम्गीन
की पीठ के पीछे सावधानी से नंगे पैरों की आहट सुनाई दी, पोषाक
सरसराई, किसी ने ज़ोर-ज़ोर से तकियों को झटका, मेज़ पर रखी
क्रॉकरी खनखनाने लगी. सम्गीन ने देखा कि कैसे अँधेरे को चीरते हुए टेरैस पर बारिश
की उजली बूँदें गिर रही हैं, और उसे मोपासाँ के उपन्यास ‘हमारा दिल’ की याद आई –
वह दृश्य, जब मैडम द’ब्यूर्न उदार मन से रात को मरिओल के कमरे में
आई. चेखव की रचना के पेन्टर का पसंदीदा वाक्य भी याद आया: ‘सब कुछ हो
सकता है...’ दूसरों के शब्दों से सोचना बड़ा आसान है, अगर वे ग़लत
भी साबित हों, तो भी उनके लिए आप ज़िम्मेदार नहीं होते.
‘मैडम द’ब्यूर्न –
भावुक किस्म की औरत नहीं थी और – फिर भी... उसने अपने जिस्म की किसी बेहद पोषाक की
तरह हिफ़ाज़त की थी. ये – बेवकूफ़ी है. मरीना – कम बुर्जुआ है. असल में तो उसे
मुश्किल से ही बुर्जुआ समझ सकते हैं. लालची? हाँ, बेशक. मगर ये
उसका मुख्य...’
ये महसूस करके कि उसे
हल्का सा चक्कर आ रहा है, सम्गीन ने माथे को काँच से सटा लिया.
‘मैंने
ज़्यादा पी ली. वो मुझसे ज़्यादा पीती है...ये – व्याकरण की किताब से लिए गए वाक्य
हैं’.
इसके बाद उसने सोचा, कि चारों
ओर इन्सान के लिए ज़रा ज़्यादा ही घुप सन्नाटा है. कम से कम
घड़ी का पेण्डुलम तो बजता, कठफ़ोड़ा ही हरकत करता, ज़िंदगी की ‘रैट-रेस’ (घोर
प्रतियोगिता) का ही एहसास होता. कानों को सतर्क करते हुए, उसने पार्क
में पत्तियों की सरसराहट सुनी और उसे याद आया कि किसी लेखक ने धरती की अंतरिक्ष
में गति को इस सरसराहट के लिए ज़िम्मेदार बताया है.
‘बेवकूफ़ी
है. मगर याद करना – कल्पना करना नहीं है. किताब – वास्तविकता है, उससे मक्खी
को मार सकते हैं, उसे लेखक के सिर पे मारा जा सकता है. वो आपको
सुरूर दे सकती है, जैसे वाइन और औरत’.
वो खड़े-खड़े थक गया
और कमरे में लौट आया, - कमरे में अँधेरा था; दीवान के
पास,
कोने
में नाइट-लैम्प जल रहा था, एक दीवान पर बिस्तर खाली थी, मगर दूसरे
बिस्तर के सफ़ेद तकिए पर ज़खारी की काली दाढ़ी निकली पड़ रही थी. सम्गीन को
अपमानित महसूस हुआ, - क्या उसके
लिए एक अलग कमरे का इंतज़ाम नहीं किया जा सकता था? दरवाज़े का
हैण्डल पकड़कर, उसने ज़ोर से टेरैस वाला दरवाज़ा खोल दिया, - वहाँ, अँधेरे में, गुरगुराते
हुए कोई हिला.
“कौन है?”
गाड़ीवान की जानी
पहचानी आवाज़ ने – कुछ रुककर – जवाब दिया:
“पहरा दे रहे हैं.”
कोई – बहुत ऊँचा
आदमी धीरे-धीरे सीधा हुआ.
“मैं और वास्या,” गाड़ीवान ने
जोड़ा. “ये ऐसा है, वास्या!”
सम्गीन ने माचिस की
तीली जलाई, - एक भला, चौड़ा, बिन दाढ़ी
का चेहरा अंधेरे से उसकी ओर देखते हुए मुस्कुराया. कुछ देर खड़े रहकर, नम ठण्डी
हवा में साँस लेकर, सम्गीन ने दरवाज़ा खुला ही छोड़ दिया, बिस्तर के
पास गया, - यूँ ही देख लिया, कि ज़ख़ारी
सो नहीं रहा है, - कपड़े उतारे, लेट गया और
नाइट लैम्प बुझा कर, सोचा:
“शायद, अब ये भी
बोलने लगेगा’.
मगर ज़खारी ख़ामोश
रहा,
वह
हिल-डुल भी नहीं रहा था, जैसे वह वहाँ था ही नहीं. सम्गीन ने सोचा:
‘बोलने की
हिम्मत नहीं है. मगर कान लगाकर अच्छी तरह सुन लेता है’.
दो-तीन मिनट इंतज़ार
करने के बाद सम्गीन ने दबी आवाज़ में पूछा:
“ज़ोतोवा के यहाँ
काफ़ी अर्से से काम कर रहे हो?”
“आठवाँ साल है,” ज़खारी ने
हौले से जवाब दिया.
“पहले क्या करते थे?”
ज़खारी ने फ़ौरन जवाब
नहीं दिया, और ये बदतमीज़ी थी.
“मैं एक मॉन्क हूँ, मॉनेस्ट्री
में रहता था. नौ साल. वहीं से मरीना पेत्रोव्ना का शौहर मुझे लाया था...”
‘लाया. जैसे
कोई चीज़ हो; सम्गीन ने ग़ौर किया; वो एक और
मिनट लेटा रहा और, सिगरेट जलाते हुए, दियासलाई
की रोशनी में देखा कि कंधों को कम्बल में छुपाए ज़खारी बैठा है. “नींद नहीं आ रही
है?”
“मैं बहुत कम सोता
हूँ,”
हिचकिचाते
हुए ज़खारी फ़ुसफुसाया. “मेरा दिल बैठने लगता है, जब मैं
लेटता हूँ, रुक जाता है. जैसे कहीं गिर रहे हो. इसलिए रातों को
मैं ज़्यादातर बैठा ही रहता हूँ.”
“क्या मॉनेस्ट्री
में ज़िंदगी मुश्किल थी?”
कुछ कहने से पहले
ज़खारी ने कम्बल में दबी-दबी खाँसी ली:
“जो यकीन करते हैं, कि दुनिया
से सुरक्षित रहा जा सकता है...तो, उन्हें – कुछ नहीं होता, आसान लगता
है! जो मनन नहीं करते. मुझे भी पहले आसान लगता था, मगर बाद
में – मैं भी...”
“किसके बाद?”
“जी भर के देख लिया.
मॉन्क्स भी – इन्सान ही हैं. भटक जाते हैं. कुछ लोग – जिस्मानी चाहत से बच नहीं
सकते,
कुछ
– ख़्वाहिशों के कारण दुख उठाते हैं. और, ज़्यादा सोच-विचार करने के कारण भी...”
किसी अदृश्य आदमी
की दबी-दबी फ़ुसफ़ुसाहट को सुनना बड़ा अजीब लग रहा था; वो
धीरे-धीरे बोल रहा था, जैसे अँधेरे में शब्दों को टटोल रहा हो और
उन्हें एक दूसरे के साथ ग़लत ढंग से रख रहा हो. सम्गीन ने पूछा:
“आप क्या अपनी
मर्ज़ी से मॉन्क बने थे?”
“मुझे जेल के
प्रीस्ट ने सलाह दी. मैं कैदी होने के कारण, जेल के
चर्च में उसकी सेवा करता था, उसे पसंद आ गया, उसीने कहा:
‘अगर – तू
बेकसूर साबित हो जाए, तो मॉन्क बन जाना’. बेकसूर
साबित हो गया. उसीने भाग-दौड़ की. मॉनेस्ट्री का एबट – उसका सगा चाचा है. पियक्कड़
आदमी है, मगर – इन्साफ़ पसंद. उसे दुनियावी किताबें पढ़ना पसंद
था – शहरज़ादे की कहानियाँ, ‘गिल्स ब्लाज़ के कारनामे’. ‘देकामेरोन’. मैं सत्रह
महीने उसके कमरे में सेवक था.
सम्गीन ने ग़ौर किया
कि मरीना का चौकीदार कज़ाक, भगोड़े अपराधी जैसा था, और ये, क्लर्क, जेल में
बैठ कर आया है, - ग़ौर किया और ख़यालों में मुस्कुराया:
‘भेद गहराते
जा रहे हैं’.
“आपको, शायद
उत्सुकता हो रही होगी, कि मुझे जेल में क्यों रखा गया?” उसने
ख़यालों में डूबी धीमी फुसफुसाहट सुनी. “देखिए, मैं – अनाथ
हूँ,
ग्यारह
साल की उम्र से अपने गॉड-फ़ादर के यहाँ रहता था – चमड़े की फ़ैक्ट्री में. पहले – घर
में नौकर की तरह काम करता रहा, फिर – ऑफ़िस में बैठने लगा, लिखा-पढ़ी
करता;
फ़िर
गॉड-फादर मुझसे नाराज़ हो गया, मुझे मज़दूरों के काम पर लगा दिया, तीन साल से
ज़्यादा मैं उसके यहाँ चमड़ा साफ़ करता रहा. और, उसने दूसरी
शादी की थी, उसने इसे धीरे-धीरे आर्सेनिक वाला ज़हर दिया, उसका एक
यार था, सर्वेयर. गॉड-फ़ादर मर गया, उसकी बेटी, एव्गेन्या
ने अदालत में केस कर दिया, मुझे भी अपराध में शामिल समझा गया, जैसे कि
मुझे सब कुछ मालूम था, मगर – मैंने बताया नहीं. एव्गेन्या – ख़ूबसूरत
थी और ग़ज़ब की होशियार थी, उसने पता लगा लिया कि मैं सर्वेयर को उसकी
सौतेली माँ के ख़त दिया करता था. और उसके सौतेली माँ को. तो, ये बात थी.
हम तीनों ही को गिरफ़्तार कर लिया गया, मैं आठ महीने जेल में रहा. सर्वेयर को –
बेगुनाह घोषित किया गया और मुझे भी, मगर वासिलीसा अलेक्सान्द्रोव्ना को चर्च में
प्रायश्चित्त करने की सज़ा सुनाई गई: उसने मान लिया था, कि उससे
गलती हो गई. उस समय मेरी उम्र सत्रह साल की थी.”
‘तेरी तो
अभी भी उससे ज़्यादा नहीं है’, उससे मरीना के बारे में पूछने की तैयारी करते
हुए सम्गीन ने सोचा. मगर ज़खारी ने ख़ुद ही पूछ लिया:
“माफ़ कीजिए, क्लीम
इवानोविच, क्या आपने ‘जीवन, मृत्यु और
अमरत्व के बारे में एडवर्ड यंग का विलाप’ किताब पढ़ी है?”
“नहीं पढ़ी.”
“आह, बेहद अफ़सोस
है,”
ज़खारी
ने गहरी साँस ली.
“मेरे लिए?” सम्गीन ने
पूछा.
“नहीं, मैं अपने
बारे में कह रहा हूँ. दहला देने वाले विचारों की है ये किताब,” ज़खारी ने
फिर से ज़्यादा गहरी साँस ली. “पागल कर देती है. उसमें लिखा है, कि समय
ख़ुदा है और वो हमारे लिए या हमारे ख़िलाफ़ चमत्कार गढ़ता है. ख़ुदा कौन है, ये मैं
नहीं समझता और, शायद, कभी भी ना
समझ पाऊँ,मगर ये – कैसे, ये समय –
ख़ुदा है और, हो सकता है, किन्हीं चमत्कारों को हमारे ख़िलाफ़ गढ़ता है? इसका मतलब
ये निकला, कि ख़ुदा – हमारे ख़िलाफ़ है, - आख़िर
किसलिए?”
‘कैसी बकवास
है,’
सम्गीन
ने ज़खारी का चेहरा देखते हुए सोचा, अँधेरे में उसे ये चेहरा, एक छोटे से, बिना आकार
के,
धुँधले
धब्बे जैसा नज़र आया, और ये कल्पना की, कि ये
चेहरा डर के मारे विकृत हो रहा होगा. डर ही के मारे,” सम्गीन ने
सोचा कि कुछ और हो ही नहीं सकता. मगर अँधेरे में बहके-बहके शब्द थरथराकर गिरते जा
रहे थे:
“वहाँ लिखा है, कि मनुष्य
के निर्माण में मृत्यु के बीज छिपे होते हैं और जीवन अपने ही हत्यारे को ख़ुराक
प्रदान करता है, - ऐसा क्यों होता है, अगर हम ये
समझते हैं, कि जीवन अमर आत्मा से बना है?”
‘ये वो, शायद, मरीना के
ख़िलाफ़ कह रहा है’, सम्गीन ने कल्पना की.
“मृत्यु चोट
पहुँचाती है, जिससे इलाज कर सके, और कोई
आदमी धरती पर भी अमरत्व से ख़ुश होता. यहाँ, क्लीम
इवानोविच, ये निष्कर्ष निकला, कि जीवन, जैसे किसी
की गलती है और इसलिए वह अपूर्ण है, मगर उसका निर्माण किया है एक पूर्ण आत्मा ने, तो फिर
पूर्णत्व से अपूर्ण कैसे बना?”
सिगरेट के ठूँठ को
अपने से दूर उछलकर, ये देखने के बाद कि कैसे अँधेरे में लाल रोशनी
उड़ी और, फ़र्श से टकराकर, चिंगारियों
में बिखर गई, सम्गीन ने कहा:
“आप इस बारे में
मरीना पेत्रोव्ना से पूछिए”.
“पूछा था. उसे
इन्सान के सारे विचारों के बारे में पता है, मगर ‘विलाप’ वाली किताब
को वो खारिज कर देती है, उसका मज़ाक भी उड़ाती है, उसे बकवास
तक कह जाती है. और ख़ुद मैं, सोच सकता हूँ, मगर विचार
नहीं कर सकता. आप, प्लीज़ उससे ये न कहिये कि मैं ‘विलाप’ के बारे
में पूछ रहा था.”
“अच्छी बात है,” सम्गीन ने
वादा किया. “वो...क्या बेहद अक्लमंद है?” ज़खारी ने हौले से आह भरी.
“ओह!”
और जल्दी-जल्दी
फुसफुसाते हुए बोला:
“ग़ज़ब की अक्लमंद
है. रूह को चकाचौंध कर देती है. ऐसी निडर कि कोई हरा नहीं सकता...”
उसने अचानक बीच ही
में अपनी बात रोक दी, बेचैनी से चुलबुलाने लगा, तकिए को
झटकने लगा और, बड़बड़ाकर: ‘माफ़ कीजिए, मैं आपकी
नींद ख़राब कर रहा हूँ’, - ख़ामोश हो गया. सम्गीन ने सोचा कि वह पूरी तरह
कम्बल में दुबक गया है. ख़ामोशी गहराती गई, और बड़ी देर
तक कोई भी आवाज़ सुनाई नहीं दी, - फिर पार्क में कोई डबरे में छप-छप करने लगा.
ध्यान से सुनते हुए, सम्गीन को धर्मगुरू जेकब की याद आई, तीन
ऊँगलियों की कहानी वाले आदमी -‘ पत्थर-
मूर्ख,
पेड़
– मूर्ख’ की याद आई. दिओमीदव की, डीकन की, ‘प्रवाह के
खोजियों’ की याद आई. साम्प्रदायी – लाखों हैं, सोशलिस्ट्स
– हज़ारों. हो सकता है, कि मरीना सही हो, कि
बुद्धिवादी जनता की असली आध्यात्मिक ज़िंदगी को नहीं जानते. वो जनता
में सिर्फ अपने भौतिकवादी मान्यताओं के प्रतिबिम्बों को ढूँढ़ते हैं. मरीना, बेशक, साम्प्रदायिक
नहीं हो सकती...
कहीं दूर, बहुत दूर, एक कुत्ता
भेड़िए जैसा रो रहा था, शायद भूख से या डर से. ऐसी रात यूरोप के
सांस्कृतिक शहरों से मुश्किल से ही हो सकती है, - ऐसी रात, जब इन्सान, शहर से
चालीस मील दूर हो, अपने आप को रेगिस्तान के बीचोंबीच महसूस करे.
सुबह-सुबह उसकी आँख
लगी,
- उसे
जगाया ओल्गा और ज़खारी ने, जो डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगा रहे थे. ज़खारी
वैसा ही था, जैसा हमेशा रहता था, ख़ामोश, आज्ञाकारी, और उसका
सफ़ेद चेहरा, हमेशा की तरह भावहीन था, जैसे कोई
मास्क हो. तीखी नाक वाली, फ़ुर्तीली ओल्गा उससे लापरवाही से और बदतमीज़ी
से बात कर रही थी.
सबसे पहले नाश्ते
के लिए आई मरीना, उसकी बुरी तरह इस्त्री की हुई पोषाक पर
सिलवटें पड़ी हुई थीं, चोटी में गूँथे हुए बालों का भारी मुकुट सिर
पर लगाए; प्यार से सम्गीन की ओर सिर झुकाकर उसने पूछा:
“चूहे तो नहीं खा
गए तुम्हें? भयानक, कितने चूहे हैं!” और उसने ज़खारी से सख़्ती से
कहा:
“यहाँ का सारा
सामान चोरी हो गया है.”
“वास्या!” उसने
अपराधी भाव से हाथों को हिलाते हुए जवाब दिया. “जो भी उससे कुछ माँगता है, वो सब दे
देता है. परसों लीपा वृक्षों की छाल को छीलने की इजाज़त दे दी, - मगर ये समय
तो छाल उतारने का नहीं है, मगर किसान – देखते ही नहीं हैं...”
“अच्छा चौकीदार है,” मरीना हँस
पड़ी. “तुम, क्लीम इवानोविच, वास्या से
ज़रूर मिलो, - यहाँ है एक ऊँचा, हट्टा-कट्टा
इन्सान. किसान उसे आधा पागल समझते हैं. लावारिस है, शायद –
मालिक का कारनामा, हो सकता है, पैरिस वाले
का रिश्तेदार हो.”
लीदिया आई, वह भी
सिलवटों वाली पोषाक में थी, बुरा सा मुँह बनाए, चिड़चिड़ाहट
से होंठ फुलाए; मरीना उससे और भी ज़्यादा प्यार से मिली, और ये
लीदिया के दिल को सचमुच में छू गया; मरीना के कंधों का आलिंगन करके, उसके सिर
को चूमते हुए, उसने कहा:
“तुम्हारे साथ, हर जगह
अच्छा ही लगता है!”
“ऐसे ही हैं हम,” उसे अपने
पास बिठाते हुए मरीना चहकी, और कहने लगी: “ मैं घर और पार्क देख आई हूँ; ठीक ठाक है
– घर अच्छी हालत में है, पार्क में हर तरह का झाड़-झंखाड़ उग आया है, मगर –
अच्छा है!”
घुँघराले, काले बालों
की टोपी में, दुबली-पतली, साँवले
चेहरे वाली लीदिया, मरीना की बगल में हमेशा से कहीं ज़्यादा रूसी
लग रही थी. पार्क में पंछी चहचहा रहे थे, जंगली कबूतर गुटर-गूँ कर रहा था, दूर से
किसी की गहरी आवाज़ आ रही थी, और लीदिया टिनटिनाते हुए कह रही थी:
“वो – बहुत मासूम
है. विज्ञान इस बात से बिल्कुल इनकार नहीं करता, कि हर चीज़
जो दृश्य है अदृश्य से बनी है. द’मेस्त्र युसुफ़ ने कितनी विद्वत्तापूर्ण बात
कही है: ‘इन्सान के गुनाहों में से सबसे प्यारा गुनाह है –
जवानी’.
बिज़बेदोव आया, पूरा सफ़ेद –
जैसे कोई स्वास्थ्य कर्मचारी हो, नंगे पैरों में सैण्डल्स पहने; वह मेज़ के
अंत में बैठा, जिससे, कि समोवार
की वजह से मरीना उसे न देख सके. मगर उसने सब देखा.
“वलेन्तीन, तुम्हें
अपने थोबड़े की हजामत करनी चाहिए, उस पर कुछ-कुछ ऊग रहा है, - और बेरहमी
से आगे बोली: “फंगस जैसा.”
और, मुस्कुरा
कर तुर्चानिनव का स्वागत करते हुए उसने उस पर तारीफ़ों की बौछार कर दी. उसने जवाब
दिया,
कि
बड़ी अच्छी तरह सोया और हर चीज़ आमतौर से ख़ुशगवार है, मगर उसका
नाटक सही नहीं रहा, ज़ाहिर था, कि वह झूठ
बोल रहा है. सम्गीन चुपचाप चाय पी रहा था और, मरीना का
निरीक्षण करते हुए, उसने लोगों के प्रति उसके सहज लचीले व्यवहार
को महसूस किया, हालाँकि वह इससे ख़ुश नहीं था. बिज़बेदोव के
मरियल मूड में उसे दिलचस्पी हो रही थी.
‘इसमें भी
कुछ आपराधिक-सा है’, अप्रत्याशित रूप से उसने सोचा.
खूब उकताहट से देर
तक नाश्ता करते रहे, फिर इस्टेट देखने निकल पड़े.
मरीना और लीदिया
आगे-आगे चल रही थीं, उनके साथ था बिज़बेदोव, और सम्गीन
को लगा कि कोई अंग्रेज़ी चित्र पुनर्जीवित हो उठा है: मध्ययुगीन नॉर्मेन्डी के महल
से, पतली
टाँगों वाले शिकारी कुत्ते और मोटे विदूषक के साथ, उसकी
मालकिन शान से बाहर निकल रही है.
सुबह रंगबिरंगी थी, गीली धरती
के ऊपर, पेड़ों को झकझोरते हुए, गर्माहट
भरी हवा टहल रही थी, पूरब से छितरे-छितरे, भूरे, बिल्कुल
भेड़ की खाल जैसे बादल तैर रहे थे; हल्के नीले आसमान की खिड़कियों से शरद ऋतु की
देहलीज़ पे खड़ा सूरज आँखें मिचकाकर जैसे पिघल रहा था; बर्च के
पेड़ से पीला पत्ता गिर रहा था; चीड़ के नुकीले पत्ते रूखेपन से सरसरा रहे थे, और कल से
भी ज़्यादा उकताहट हो रही थी.
तुर्चानिनव घर में
ही रुक गया था, मगर करीब पाँच ही मिनट बाद उसने सम्गीन को पकड़
लिया, छड़ी
हिलाते हुए, इधर-उधर देखते हुए, उसकी बगल
में चलने लगा, और शिकायत भरे सुर में कहने लगा:
“नहीं, आप जो
चाहें , मगर मैं तो यहाँ नहीं रह सकता!” उसने नीचे, जोते गए, नंगे खेत
के काले पट्टों में छड़ी घुसाई, गंदली नदी के किनारे बनी, झाड़ियों से
घिरी झोंपड़ी की ओर इशारा किया.
“मैं करीब दो घण्टे
खिड़की के पास बैठा रहा, वहाँ, ऊपर, - मुझे ऐसा
लगा,
कि
ये सब बड़ी बुरी तरह शुरू किया गया है और ये कभी भी ख़त्म नहीं होगा, मनचाहा रूप
नहीं लेगा.”
सम्गीन ने ईमानदारी
से पूछा:
“बोरियत हो रही है?”
“बोरियत से भी
ज़्यादा! इस ख़ालीपन में नाउम्मीदी जैसे कोई चीज़ है. ज़मीन की कमी के बारे में
किसानों की शिकायतें बिल्कुल समझ में नहीं आतीं; मैंने
फ़्रान्स में, जर्मनी में इतनी खाली ज़मीनें नहीं देखीं.”
कुछ देर चुप रहने
के बाद उसने सम्गीन को सिगरेट पेश की, बड़ी देर तक और फ़ूहड़पन से उसे हवा में जलाता रहा, और जलाने
के बाद गहरी साँस लेते हुए बोला:
“मेरा पड़ोसी
खर्राटे ले रहा था...भयानक! वो – बीमार है?”
“लगता है – हाँ.”
“अजीब चीज़ है!
इतना...जंगली. और उदासी भरा गुस्सा है उसमें. गुस्सा भी हँसी भरा होना चाहिए.
फ़्रान्सीसी हंसते-हँसते गुस्सा करना जानते हैं. माफ़ कीजिए, कि मैं हर
चीज़ के बारे में इस तरह से कह रहा हूँ...मैं बहुत प्रभावित हो जाता हूँ. मगर –
उसकी आण्टी शानदार है! क्या फ़िगर है, क्या चाल है! और वो सुनहरी आँखें! वल्कीरिया
ब्रून्गील्दा...”
प्यारी आण्टी ने
रुक कर उसे बुलाया, वह जल्दी से आगे भागा, और सम्गीन
स्वयम् को बेकार समझते हुए, रास्ते की बगल वाली गली में मुड़ गया, - रास्ता चीड़
के जवान, कोमल पेड़ों के बीच से होते हुए कहीं ऊपर को जा रहा
था. सम्गीन धीरे-धीरे चल रहा था, अपने पैरों की तरफ़ देख रहा था, और सोच रहा
था कि कैसे अजीब-अजीब लोग मरीना को घेरे रहते हैं: ये गाड़ीवान, ज़खारी, बिज़बेदोव...
“घूम रहे हो?”
सम्गीन सिहर गया, - चीड़ों के
बीच में एक बहुत ऊँचा, चौड़े कंधों वाला लड़का, बिना टोपी
के खड़ा था, उसके बाल डीकन के बालों जैसे लम्बे थे, - उसके गोल, बिना दाढ़ी
वाले चेहरे को सम्गीन रात में देख चुका था. अब ये चेहरा दिल खोलकर मुस्कुरा रहा था, ख़ूबसूरत, काली आँखें
भलमनसाहत से चमक रही थीं, मज़बूत नाक के नथुने थरथरा रहे थे, भरे-भरे
होंठ काँप रहे थे: अब ये हँसेगा.
‘वास्या’, सम्गीन ने
अंदाज़ लगाया.
“कोई बात नहीं, - घूमो,” वास्या ने
प्यारी, नर्म नीची आवाज़ में कहा. उसके चौड़े कंधों पर – कत्थई
कोट था, जिस पर बेल्ट के बदले रस्सी बंधी थी, गर्दन पे
नीला स्कार्फ़ था, पैरों में – फ़ौजियों वाले लाल जूते थे; वह दोनों
हाथों को मोटे गंठीले डंडे पर झुकाए खड़ा था और सम्गीन को ऊपर से नीचे तक देखते हुए
बोला:
“मैं तुम्हें –
जानता हूँ, रात में देखा था. तू – कोई बात नहीं, घूम, डरने की
ज़रूरत नहीं!”
“क्या आप – चौकीदार
हैं?”
सम्गीन
ने पूछा.
“मैं? इंतज़ार कर
रहा हूँ.”
“वे सब उस तरफ़ गए
हैं,
नीचे,” सम्गीन ने
उसे दिखाया.
“मैं – जानता हूँ. मैं सब
देखता हूँ: कौन, किधर.”
अब वास्या गर्व से
मुस्कुराया, और इस मुस्कुराहट से उसका चेहरा धृष्ठ नज़र आने लगा, तन गया, आँखें और
प्रखरता से चमकने लगीं.
“वहाँ रहता हूँ, ऊपर.
झोंपड़ी है. ठण्ड हो जाती है, तो नीचे किचन में आ जाता हूँ. जा, घूम. गाने
गा.”
ऐह, सफ़ेद कबूतर
नीचे उतरा
पवित्र
एर्दान नदी पर...
वो गाने लगा और, डण्डे को
बगल में घुसाकर, खाली हाथ से कोमल चीड़ के तने को झकझोर दिया.
“अलाव जला, सिर्फ – देखना कि आग भड़क न जाए. सूखे पेड़ जल जाएँगे –
राख बनेगी, हवा चलेगी – राख ग़ायब! सब – भरम. हर जगह. भरम में
चलो...”
उसने सिर हिलाया और
आगे बढ़ गया, एक ओर को, और सम्गीन ने अपने आप से कहा: ‘मंदबुद्धि
है’,
और
इस मुलाकात में कुछ अवास्तविक सा महसूस करते हुए, और फिर से सोच
कर,
कि
मरीना को अजीब-अजीब लोग घेरे रहते हैं, घर की ओर मुड़ गया. नीचे, ऑफ़िस के
पास,
उसे
कल वाले किसान मिले, मगर गंजा और मज़बूत पैरों वाला, दोनों ने बढ़िया
जैकेट्स पहने थे, दोनों – जूतों में थे...
गंजे ने नई कत्थई
टोपी उतार कर आदरपूर्वक सम्गीन का अभिवादन किया:
“नमस्ते!”
और पूछा:
“वारिस – क्या आप
हैं?”
खिड़की से ज़खारी का
बदरंग चेहरा झाँका, वो बदहवासी से चीख़ा:
“अरे नहीं! मैंने
तो तुम लोगों से कहा था...”
फ़ौजी ने तिनके को
थूककर,
जिसे
वह चबा रहा था, उसकी चीख़ को अपनी चीख़ से दबा दिया:
“तूने कहा था, मगर हमने –
यकीन नहीं किया! और – अपना थोबड़ा छुपा ले!”
ज़खारी छुप गया.
किसानों ने ख़ामोशी से सम्गीन का स्पष्टीकरण सुना, वे आपस में
फ़ुसफ़ुसाए, फिर गंजे ने गहरी साँस लेकर कहा:
“तो ये बात है. ख़ैर, आपकी बात
का यकीन तो करना पड़ेगा, वर्ना तो यहाँ...” उसने नाउम्मीदी से हाथ हिला
दिया.
फ़ौजी ने जेब से
पाउच निकालकर उसे हिलाया, छुपा लिया और सम्गीन से मुख़ातिब हुआ:
“क्या सिगरेट देंगे?”
और सिगरेट मिलने पर
क्लीम को कड़ी नज़र से देखते हुए कहा:
“आप लोगों को, सारे
मालिकों को, तीन सालों के लिए किसानों के हवाले कर देना चाहिए, जैसे हमारे
भाई-बंधु को फ़ौज में भेजते हैं. जहाँ जी चाहे, वहाँ अपनी
पढ़ाई पूरी कर लो, और – गाँव में जाकर, वहाँ
किसानों के पास दिहाड़ी पे काम करो, उनकी ज़िंदगी की छोटी से छोटी बात को महसूस
करो”.
“ऊल-जुलूल बक रहा
है,”
गंजे
ने अपनी नाक घुसेड़ी, “ बिल्कुल बेवकूफ़ी भरी बातें! गाँव में तो
मालिकों की मर्ज़ी के बिना किसी बाहरी आदमी को रख ही नहीं सकते, और मालिकों
को – गाँव में आज़ादी – नहीं है! ये ही तो मुसीबत है...”
“देखिए – आ रहे
हैं!” सफ़ेद दाढ़ी वाले ने हौले से कहा; फ़ौजी ने हथेली के नीचे से देखा और, उसने भी
हल्के से सीटी बजाई, फिर मुँह बनाकर बड़बड़ाया:
“ज़ोतोवा है यहाँ, ओहो!”
किसान सम्गीन की ओर
सिर करके खड़े हो गए, - वह ऑफ़िस के कोने के पीछे गया, वहाँ एक
बेन्च पर बैठा और सोचने लगा, कि किसान भी अवास्तविक हैं, समझ के
बाहर हैं: कल आर्टिस्ट्स जैसे लग रहे थे, और आज – ज़रा भी उन लोगों जैसे नहीं प्रतीत हो
रहे हैं, जो इस्टेट्स जला सकते हैं, मवेशियों
को बर्बाद कर सकते हैं. सिर्फ फ़ौजी, काफ़ी गुस्से में नज़र आ रहा है. वैसे ये –
अनजान लोग हैं, और उनके साथ काफ़ी अटपटापन महसूस हो रहा है; मुश्किल लग
रहा है. कोने के पीछे से बिज़बेदोव की भर्राई हुई आवाज़ सुनाई दी:
“और – तुम्हें और
किस शैतान की ज़रूरत है? कह दिया – नहीं बेचना है, तो?”
सम्गीन बिज़बेदोव से
मिलना नहीं चाह रहा था, वह पार्क में चला गया, और कुछ
मिनट बाद, घर के टेरैस की ओर आते हुए, उसने
तुर्चानिनव के अचरज भरे शब्द सुने:
“विद्रोह करते हैं –
और ज़मीन भी ख़रीदते हैं! मतलब – उनके पास पैसे हैं? फिर वो
विद्रोह क्यों करते हैं?”
“जा रहे हैं!”
मरीना टेरैस पर आकर हुए चिल्लाई.
सम्गीन तुर्चानिनव
की बगल में कोच में बैठा था; बिज़बेदोव गंभीरता से नाक सुड़कते हुए, लीदिया के
सामने खड़ा था – वह उससे कह रही थी:
“आप देखना, कि फ़ौजियों
का इंतज़ाम ठीक –ठाक हो जाए. अलबिदा! चलो, जाएँगे, पावेल.”
ख़ूबसूरत, मुच्छड़, बूढ़े
कोचवान ने, जो किसी सिविलियन ड्रेस वाले जनरल जैसा था, लगामा
खींची,
- मज़बूत
घोड़े कोच को बारिश से धुले रास्ते पर, सावधानी से नीचे उतारने लगे; रास्ते के
अंत में वे किसानों से आगे निकल गए, - वे एक के पीछे एक चल रहे थे, और उनमें
से किसी ने भी अपनी टोपी नहीं उतारी, और फ़ौजी रुककर, पाउच खोल कर, गुस्से भरी
नज़रों से, कनखियों से कोच को देखता रहा. मरीना आँखें बारीक करके, होठों को
काटते हुए, रास्ते के दोनों तरफ़ नज़र डालकर खेतों को देख रही थी; उसकी
दाहिनी भौंह बाईं भौंह से ऊपर उठी हुई थी, ऐसा लग रहा
था,
कि
आँखें भी अलग अलग तरह से देख रही हैं.
एक अबूझ अपमान और
दयनीयता से सम्गीन सोच रहा था कि उसकी निर्विवाद बुद्धिमत्ता – पूरी तरह उसके
शब्दों में है, और विनम्रता से लाभ कमाने के उसके ख़तरनाक
ध्येय के आधीन है.
तुर्चानिनव ने, हथेलियों
से छड़ी को घुटनों पे गोल-गोल घुमाते हुए महिलाओं से कहा:
“पैरिस में ख़ास तौर
से ये महसूस होता है, कि आदमी औरत के कारण बर्बाद होता है...”
मगर लीदिया ने
शिक्षाप्रद ढंग से उसे समझाया, कि मैडोना के पंथ में स्पष्टतः बुतपरस्त तत्व
हैं,
कैथोलिज़्म
भावप्रद ढंग से, सौंदर्यबोध...
“उसमें सर्वोच्च
शक्ति के सम्मुख स्वयम् को बचाने का भय नहीं है...”
सम्गीन को भय के
बारे में बिज़बेदोव के शब्द याद आए, और उसने फ़ैसला कर लिया, कि
क्वार्टर बदल देना चाहिए, - इस आदमी का साथ पूरी तरह बर्दाश्त से बाहर है.
दस्ताने से उसके
घुटने को मारते हुए मरीना ने कहा:
“कितना थका हुआ और
गुस्सैल चेहरा है तुम्हारा. तुम्हें हफ़्ते-दो हफ़्ते ’वेलकम’ इस्टेट में
रहना चाहिए, आराम करना चाहिए...”
“किसानों के साथ
राजनीति के बारे में, आज़ाद ज़मीनों के बारे में बातें करते हुए,” सम्गीन ने
नाक-भौंह चढ़ाकर आगे जोड़ा.
वह हँस पड़ी:
“किसलिए? बातें करने
का मन नहीं है - मत करो, अपनी
होशियारी अपने लिए बचाकर रखो. बुरा मान गए हैं किसान! फ़ौजियों को मुक्त करते हुए
लीदिया बहुत दूरदर्शिता से काम कर रही है.”
“ये – तेरी ही सलाह
है,”
लीदिया
ने याद दिलाया, मगर ज़ोतोवा ने इन्कार करते हुए कहा:
“अरे, तू भी ना, तेरे पास –
अपनी बुद्धि है, तू बच्ची नहीं है!”
घोड़े तेज़ी से भाग
रहे थे, मगर सम्गीन को शहर तक का रास्ता खूब लम्बा और थकाने
वाला लगा.
दूसरे ही दिन उसने
तुर्चानिनव के उत्तराधिकार की पुष्टि के केस पर काम शुरू कर दिया; कोई
रहस्यमय ताकतें इसमें उसकी सहायता कर रही थीं, - उसने इस
काम को बड़ी जल्दी पूरा कर दिया और इसमें उसकी काफ़ी कमाई भी हो गई. पहले, पैसों के
प्रति लगभग उदासीन सम्गीन ने अब इन नोटों को बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार किया, - वे उससे
आज़ादी का वादा कर रही थीं, विदेश जाने की उसकी इच्छा को तीव्र कर रही
थीं. वह ज़्यादा शांत, ज़्यादा शक्तिशाली हो गया था. अब बिज़बेदोव से
उसे इतनी चिड़चिड़ाहट नहीं होती थी, और क्वार्टर बदलने का इरादा गायब हो गया. मगर तभी
उसकी ज़िंदगी में तूफ़ान की तरह दो घटनाएँ हुईं.
एक उदास सुबह को वह
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से आ रहा था; उल्टी-सीधी हवा चल रही थी और गुस्से से सड़क पर
गोल-गोल चक्कर लगा रही थी, जैसे कोई जगह ढूँढ़ रही हो – जहाँ छुप सके. वो
चेहरे पर, कान में, सिर पे मार कर रही थी, पेड़ों से
बचेखुचे पत्ते उड़ाकर ले जा रही थी, ठण्डी धूल के साथ उन्हें खदेड़ रही थी, गेट के
नीचे छुपा रही थी. ये बेमतलब का खेल दिमाग़ में कुछ अप्रिय तुलनाएँ जगा रहा था, और सम्गीन
सिर झुका कर तेज़ी से चल रहा था.
शहरवासियों ने
खिड़कियों में सर्दियों वाली चौखटें फिट कर दी थीं, और, इससे, हमेशा की
तरह,
शहर
का सन्नाटा ज़्यादा घना, ज़्यादा लापरवाह हो गया था. सम्गीन सब से छोटी
गली में मुड़ा, जो दो रास्तों को जोड़ती थी, - उसके चेहरे
पर बारिश की फ़ुहार पड़ रही थी, महीन, बिल्कुल
धूल जैसी, जिसने उसे रुकने पर, टोपी
सरकाने पर, कोट की कॉलर उठाने पर मजबूर कर दिया. तभी नुक्कड़ के
पास से कर्कश चीख सुनाई दी:
“संतरी...”
वहाँ हल्की गाड़ी की
खड़खड़ाहट सुनाई दे रही थी; नुक्कड़ के पीछे से, हिलते हुए, घोड़े का
सिर प्रकट हुआ, उसके सामने वाले पैर डान्स कर रहे थे; कर्कश चीख
और दो बार सुनाई दी, भूरा कोट पहने, दढ़ियल
चेहरे पर खींची हुई नुकीली टोपी वाला एक आदमी बाहर की ओर भागा, - उसके एक
हाथ में धातु की कोई चीज़ चमक रही थी, दूसरे में जूट की थैली डोल रही थी; ये आदमी,
अविश्वसनीय तेज़ी से सम्गीन के पास आया, उसे धक्का दिया और फुटपाथ से निचले तल्ले
वाली बिल्डिंग में घुस गया, जिस पर नया-नया बोर्ड लगा था:
‘सिलाई मशीनों और
बाइसिकल्स की मरम्मत की जाती है’.
‘इनोकोव’, सम्गीन
ने सोचा, जब टोपी के नीचे से उस पर काफ़ी जानी-पहचानी आँख़ें चमकीं. ‘ये इनोकोव
है. रिवॉल्वर के साथ. किसी को लूट कर जा रहा है’.
नुक्कड़ के पीछे –
शोर हो रहा था, और, हालाँकि शोर तेज़ नहीं था, मगर उससे
सिर घूमने लगा. बारिश घनी होती जा रही थी, और कोने के
पीछे से निकलता हुआ घोड़े का सिर, दयनीयता से हिल रहा था.
सम्गीन इस उलझन में
था,
कि
आगे जाए या पीछे मुड़ जाए? मगर तभी सिलाई मशीनों की मरम्मत वाली वर्कशॉप
से आराम से गंभीर चेहरे वाला एक ऊँचा, गंजा-सा आदमी निकला, उसने गंदी, नीली-सी
कमीज़ पर एप्रन पहनी थी; दायाँ हाथ जेब में था, बाएँ से
उसने दरवाज़ा कस के बंद किया और ताला लगा दिया, बिल्कुल
ऐसे जैसे चाभी से गोली चला रहा हो. सम्गीन ने उसे भी पहचान लिया, - ये उसके
पास आया था, उस लड़की – मुराव्येवा के साथ.
“नहीं पहचाना?” सम्गीन के
कोट की बाँह पकड़ कर उसे रोकते हुए धीरे से, मगर बहुत
ज़ोर देकर उस आदमी ने पूछा. “और स्टूडेण्ट मराकूएव की याद है? दुनाएव की? मैं –
वराक्सिन हूँ.”
“आह, हाँ, क्यों नहीं,” वराक्सिन
के दाएँ हाथ के पीछे चलते हुए सम्गीन बुदबुदाया, और उसने
सम्गीन से पूछा:
“आप – क्या? बीमार हैं?”
“वहाँ कुछ हुआ है,” सामने की
ओर इशारा करते हुए सम्गीन ने कहा, - वराक्सिन ने शांति से कहा:
“चलते हैं, देखेंगे.”
फुटपाथ की ईंटों पर
भारीपन से पैरों को घिसटते हुए वह सम्गीन के पीछे-पीछे चल रहा था, जबकि
सम्गीन हल्के कदमों से, मायूसी से चल रहा था, उसे यकीन
था कि वराक्सिन शैतान जाने क्या सोच बैठेगा और उस पर गोली चला देगा.
कंधे के ऊपर से
वराक्सिन की ओर देखते हुए उसने कहा:
“आप बहुत बदल गए
हैं,
पहचान
में नहीं आ रहे हैं...”
“मगर आप – ज़्यादा
नहीं,”
उसने
उदासीन आवाज़ सुनी.
नुक्कड़ के पीछे, पत्थर पे, कीचड़ में
सना कोट पहने, लाल दाढ़ी वाला, एक छोटा-सा, मोटा, बूढ़ा बैठा
था,
उसका
पूरा जिस्म थरथरा रहा था, वह झूल रहा था और सुबक रहा था; बूढ़े को
दोनों तरफ़ से दो लोगों ने पकड़ा था: एक ड्यूटी वाले पुलिस के सिपाही ने और गोल टोपी
पहने दूसरे आदमी ने, जिसकी टोपी सिर पर पीछे की ओर खिसकी हुई थी; इस आदमी का
चेहरा फूला हुआ था, आँखें अचरज से बाहर निकल रही थीं, वह गीली, सलवटों
वाली टोपी बूढ़े के सिर पर फेर रहा था और फुफकार रहा था, चिंघाड़ रहा
था:
“ब-बयालीस हज़ार, आह तू! दिन
दहाड़े! भीड़-भाड़ वाले रास्ते पे-ए!”
करीब पंद्रह-बीस
लोग – आदमी और औरतें - जमा हो गए थे; घरों के फ़ाटकों और दरवाज़ों से वहाँ के निवासी
उछल कर और सावधानी से आ रहे थे. गाड़ी की पायदान पर उजले बालों वाला जवान गाड़ीवान
बैठा था और शिकायत भरे ऊँचे सुर में रुक-रुककर बता रहा था:
“उसने, मतलब, घोड़े की
लगाम पकड़ ली और उसे गली में मोड़ने लगा...”
“अरे, तू झूठ बोल
रहा है!” सिर पर कुर्सी उठाए एक आदमी भीड़ में से चिल्लाया.
“या-ख़ुदा –
झूठ नहीं कह रहा हूँ! मैं उसे चाबुक से मारना चाहता था, मगर वो
रिवॉल्वर दिखाने लगा...”
किसी ने उसका
समर्थन करते हुए कहा:
“अच्छा टाइम चुना, लंच टाइम!”
पब्लिक ने शोर
मचाते हुए पूछा:
“कितने आदमी थे? किस तरफ़
भागे थे?”
और सम्गीन की बगल
में किसी ने दबी ज़ुबान में अंदाज़ लगाया:
“लगता है, कि गाड़ीवान
नाटक कर रहा है.”
बारिश घनी होती जा रही
थी,
जगह
सिकुड़ रही थी, लोगों का शोर कम हो रहा था, नालियों
में पानी की रोतली छप-छप सुनाई दे रही थी, मगर सिर पे
कुर्सी वाले आदमी की गूँजती, गरजदार कहानी ने सारे शोर को दबा दिया; उसके चेहरे
का आधा हिस्सा, जो भार से ढँका था, दिखाई नहीं
दे रहा था, सिर्फ नाक और ठोढ़ी ही दिखाई दे रही थी, जिस पर
काली,
घुँघराली
दाढ़ी थरथरा रही थी.
“मैं – ये ऐसे जा
रहा था, और वो, दो, - सामने से, एक – टोपी
में,
दूसरा
– हैट में, दोनों – ओवरकोट में. तो, एक गाड़ी की
ओर लपका, ब्रीफ़केस छीनी...”
“ बैग, बूढ़े ने
बताया था...”
“वो – एक ही है!
छीनी और गली में भागा, दूसरे ने – घोड़े को पकड़ा, और गाड़ीवान
उछला और लगा भागने.”
“मैं? घोड़े से
दूर?...”
“वही तो – मैं! डर
गया,
ठस
दिमाग़...”
“गली में भागा, कह रहे हो?” अचानक खूब
ज़ोर से वराक्सिन ने पूछा. “मगर, मैं तो गली में खड़ा था, और ये
महाशय गली से होते हुए यहाँ आ रहे थे, मगर हम दोनों ने तो किसी को भी नहीं देखा, - ऐसा कैसे
हो सकता है? बेकार ही तुम, चचा, बंडल मार
रहे हो. ये – कुली कह रहा है – बैग, और तू – ब्रीफ़केस! बारिश तेरे फ़र्नीचर को ख़राब
कर रही है...”
वराक्सिन ने शुरूआत
तो शानदार ढंग से की थी, मगर ख़तम की – मज़ाहिया ढंग से. उसका चेहरा
हड़ीला,
थका
हुआ था, घनी भँवों के नीचे से काली आँख़ें गंभीरता से देख रही
थीं. उसकी बात लोग ध्यान से सुन रहे थे, और एक अधेड़ महिला ने फ़ौरन कहा:
“देखो, कैसे बकवास
करते हैं और बेगुनाह को निशाना बनाते हैं.”
सम्गीन दीवार के पास
खड़ा था, देख रहा था, सुन रहा था और कई बार उसने वहाँ से खिसकने की
कोशिश की, मगर वराक्सिन रुकावट डाल रहा था, कभी उसके
सामने किनारे से खड़ा हो जाता, तो कभी पीठ फ़ेरकर, - और दो-एक
बार उसके चेहरे की ओर गंभीरता से देखा भी.
मगर जब सम्गीन ने
ज़्यादा निर्णयात्मक हलचल की, तो उसने ज़ोर से कहा:
“आप, महाशय, जाइए नहीं, - आप गवाह
हैं,”
और
वह शांति से गाड़ीवान से पूछने लगा:
“आख़िर कितने लोग थे
वे?”
“दो. एक ने - फ़ौरन बूढ़े की बैग छीनी, और दूसरा –
उसने घोड़े को पकड़ लिया.”
सम्गीन को अपनी
भावनाएँ समझ में नहीं आ रही थीं: उसे वराक्सिन की ज़बर्दस्ती पर गुस्सा होना चाहिए
था,
मगर
– वह गुस्सा नहीं हो रहा था. विगत ने फिर से अपने चिपचिपे, ख़तरनाक हाथ
से उसे निर्ममता से जकड़ लिया, मगर इससे भी परेशानी नहीं हो रही थी.
वराक्सिन ने जेब से
हाथ निकालकर दोनों हाथों से सीने पर क्रॉस बना लिया, - उसके एप्रन
के नीचे से टोपी का किनारा बाहर झाँक रहा था.
आदत के मुताबिक
सम्गीन ने गौर किया कि दर्शक तीन गुटों में बँटे हैं: एक गुट के लोग तैश में हैं
और डरे हुए हैं, दूसरे किसी चीज़ से संतुष्ट हैं, किसी की
दुर्दशा पर ख़ुश हो रहे हैं, ज़्यादातर लोग सतर्कतापूर्वक ख़ामोश हैं और कई
लोग तो फ़ौरन वहाँ से निकल भी रहे हैं, - पुलिस आई: तीखी नाक और पीले, बीमार
चेहरे पर काली मूँछों वाला छोटा सा बैलिफ़, दो पुलिस
कॉन्टेबल्स, सिविलियन ऑफ़िसर – मोटा, गोल चश्मे
वाला,
गेंद
जैसी टोपी पहने हुए; घुड़सवार पुलिस के चार सिपाही आए, और दो गाड़ियाँ
भी आईं, और बैलिफ़ दर्शकों को दूर धकेलते हुए चिल्लाने भी लगा:
“ प्रत्यक्षदर्शी
कौन है? ये? रोको.”
और सिविलियन ऑफ़िसर
ने फ़ौरन कुर्सी वाले आदमी से पूछना शुरू कर दिया:
“गली में? कपड़े कैसे
पहने थे?”
देखने में बहुत
बुरा लग रहा था, कि वराक्सिन ने फिर से, आराम से
जेबों में हाथ डाल लिए.
“मगर लोगों ने तो
गली में किसी को भी नहीं देखा,” किसी ने कहा.
“किन लोगों ने?”
“मैंने,” वरास्किन
ने गीले बालों को झटकते हुए कहा, “और इन महाशय ने.”
और, दाएँ हाथ
से सम्गीन की तरफ़ इशारा करते हुए, उसने बाएँ हाथ से अपनी भूरी-सी दाढ़ी सहलाई, जिससे
बारिश की बूँदें टपक रही थीं.
‘कितना शांत
रहता है ये,’ सम्गीन ने सोचा और, जब बैलिफ़
और सिविलियन उससे पूछताछ करने लगे, तब भी उसने शांति से कहा, कि उसने
नुक्कड़ के पीछे घोड़े का सिर देखा था, वर्कशॉप के कारीगर को देखा, जो वर्कशॉप
का दरवाज़ा बंद कर रहा था, और इसके अलावा कोई और गली में नहीं था. बैलिफ़
ने उसका अभिवादन किया, और सिविलियन ने वराक्सिन का नाम, कुलनाम
पूछा.
“निकोलाय एरेमेयेव,” वरास्किन
ने ज़ोर से जवाब दिया और, एप्रन के नीचे से टोपी निकालकर, आराम से
उसे गीले सिर पर पहन लिया.
“ जाइए, जाइए,” कॉन्स्टेबल
चिल्लाया. सम्गीन ने वरास्किन के गंभीर चेहरे की ओर देखा और अपनी मुस्कुराहट नहीं
रोक पाया, - उसे ऐसा लगा कि ठठेरे की आँखों के गहरे कोटरों से
जवाबी मुस्कुराहट चमक गई.
‘गोली चला
सकता था,’ रुक-रुक कर हो रही हल्की, अलसाई
बारिश में घर की तरफ़ जाते हुए सम्गीन सोच रहा था. ‘इससे वह
स्वयम् को बचा नहीं सकता था, मगर ...चला सकता था!’
वह अपने आप से ख़ुश
था और साथ ही कुछ उलझन भी महसूस कर रहा था.
‘अप्रत्यक्ष
रूप से इस लूट-पाट के केस में भाग लेना पड़ा,’ ख़यालों में
मुस्कुराते हुए उसने सोचा. ‘मगर – इनोकोव! बेशक, ये उसीने
वराक्सिन को मेरे पीछे भेजा था...और ये...कारनामा, इनोकोव के
स्वभाव के मुताबिक ही था’.
हर उस आदमी की तरह, जो ख़तरे से
बच निकला हो, सम्गीन बहुत अच्छा महसूस कर रहा था और घर में, बिज़बेदोव
को इस हमले के बारे में बताते हुए, उसने अपनी कहानी में मज़ाकिया बातें भी जोड़ दीं, प्रत्यक्षदर्शियों
की गवाहियों की अविश्वसनीयता पर टिप्पणी की और ख़ुद ही बड़ी दिलचस्पी से अपनी ही
कहानी सुनी.
“अराजकतावादी,” नैपकिन को मरोड़ते
हुए,
बिना
किसी दिलचस्पी के बिज़बेदोव ने कहा, मगर सम्गीन ने उसे समझाया:
“प्रत्यक्षदर्शियों
की गवाहियों की संदिग्धता का काफ़ी पहले कानूनी प्रैक्टिस में ज़िक्र किया गया है, और, यह ज़िंदगी
की सभी घटनाओं के बारे में हमारे कानूनी फ़ैसलों की आत्मीयता को बड़ी अच्छी तरह से
उजागर करती है...”
“खैर, उन्हें, गवाहों को, शैतान ले
जाए,”
बिज़बेदोव
ने गुस्से से कहा. “उस कमीने ब्लिनोव ने मेरे दो जोड़ी कबूतरों को
पार कर लिया, - बढ़िया हवाबाज़ थे. मैं पैसे दे रहा हूँ – नहीं
लेता...”
दूसरे दिन सुबह
सम्गीन ने स्थानीय अख़बार में पढ़ा:
‘इस बात का
पर्याप्त आधार है, कि हमला संयोगवश था, न कि पूर्वनियोजित, कि ये
सिर्फ लूट-पाट की घटना थी’. राजतंत्रवादी अख़बार ज़ोर देकर कह रहा था, कि ये – ‘ राजनीतिक
गुण्डागर्दी का काम है;, और दोनों कह रहे थे, कि
हमलावरों की संख्या के बारे में प्रत्यक्षदर्शियों की गवाहियाँ एक दूसरे से
बिल्कुल भिन्न हैं: कुछ कहते हैं – दो लोगों ने हमला किया, दूसरों ने
सिर्फ एक ही को देखा, और एक गवाह है, जो इस बात
की पुष्टि करता है, कि गाड़ीवान – लूट में शामिल था. गाड़ीवान के
अलावा और दो लोगों को गिरफ़्तार किया गया है: कुली को, जिसे लूटा
गया है, और बढ़ई को – जो हमले के गवाहों में से एक है. अख़बारों
की इन टिप्पणियों से सम्गीन के मन में कोई नए विचार नहीं उठे. अख़बारों में अक्सर
लूट-पाट के बारे में समाचार दिए जाते थे, और सम्गीन को मरीना के शब्द अच्छी तरह याद थे:
‘लुटेरे काम
कर रहे हैं’. वैसे ये घटना सम्गीन के लिए उतनी सनसनीख़ेज़ नहीं रही
और जल्दी ही उसके दिमाग़ से निकल भी गई, क्यों कि एक दूसरी घटना ने उसकी जगह ले ली थी.
एक बार शाम को
सम्गीन चाय की मेज़ पर किसी मैगज़ीन के पन्ने पलटते हुए बैठा था. प्रवेश कक्ष का
दरवाज़ा धड़ाम् से बन्द हुआ, भारी कदमों से बिज़बेदोव अंदर आया, धम् से मेज़
के पास बैठ गया और भर्राई हुई आवाज़ में खाँसने लगा; उसका गोल, सूजा हुआ
चेहरा बड़े विकृत ढंग से हिल रहा था, जैसे चमड़ी के नीचे चर्बी पिघल रही हो, और खदखदा
रही हो, - आँखें चुँधियाते हुए झपक रही थीं, हाथ काँप
रहे थे, जैसे वो उनसे माथे और गालों के मकड़ जाले निकाल रहा
हो.
सम्गीन ने चुपचाप
चश्मे से उसकी ओर देखा और – इंतज़ार करता रहा.
“त-तो, मतलब,” बिज़बेदोव ने
हाथ नीचे करके, हथेलियों को घुटनों पर रख कर डोलते हुए कहना
शुरू किया. “आपको अदालत में मेरा बचाव करना होगा. हत्या की कोशिश के, चोट
पहुँचाने के आरोप में...आम तौर से – शैतान जाने किस आरोप में! लाइए, कुछ पीने
के लिए दीजिए...”
सम्गीन आराम से
शयन-कक्ष में गया, पानी की सुराही लाया, लापरवाही
से उसे बिज़बेदोव के सामने रख दिया; ये सब करते हुए वो अपनी उदासीनता दिखा रहा था
और उदासीनता से ही उसने पूछा:
“हुआ क्या है?”
“ एक गोली जड़ दी
ब्लिनोव के थोबड़े पे, और क्या!” बिज़बेदोव ने कहा, और सिर
हिलाते हुए मेज़ से सुराही लेकर उसे अपने घुटनों पे रखा, सीटी जैसी
आवाज़ में बोलता रहा: “ मेरा मज़ाक उड़ा रहा था, कमीना! ‘छोड़’, कहता है,’कबूतरों के
बारे में तुझे कुछ भी पता नहीं है’. मैं? मैंने – मेंज़्बीर को पढ़ा है! और वो, ईडियट, मुझे
सिखाता है: ‘तूने’, बोला, ‘प्यार की
ख़ातिर कबूतर नहीं पाले हैं, बल्कि जलन के मारे पाले हैं, मुझसे
मुकाबला करने के लिए, मगर मुकाबला तुझे अपने आलसीपन से करना होगा, न कि
मुझसे...’
वह बोल रहा था, असल में
प्रलाप कर रहा था, भर्राते हुए, शब्दों को
सीटी की तरह बाहर फेंकते हुए, उसने सुराही को गर्दन से पकड़ा था, और उसे
घुटने से हिलाते हुए सुन रहा था कि पानी कैसे उछल रहा है.
उसकी भारी साँसों
और उसका दम घोंटते हुए शब्दों को सुनना बड़ा भयानक था. दाएँ हाथ से वह अपना गाल
मरोड़ रहा था, लाल ऊँगलियाँ बालों को खींच रही थीं, चेहरा फूल
रहा था, गिर रहा था, नीली पुतलियाँ जैसे आँखों के ढेलों के दूध में
पिघल रही थीं. वह दयनीय था, घृणित था, मगर – इससे
भी कहीं ज़्यादा – भयानक था.
सम्गीन को जल्दी ये
जानने का मौका नहीं मिला, कि आख़िर हुआ क्या था और कैसे हुआ था?
बिज़बेदोव उसके
सवालों के जवाब नहीं दे रहा था, सम्गीन को कई मिनटों तक उसके बदलते हुए भावों
को बर्दाश्त करना ही पड़ा: पहले तो बिज़बेदोव को भयभीत और दयनीय हालत में देखना
अच्छा लगा, फिर ऐसा लगा, कि इस आदमी
को इस बात का अफ़सोस नहीं है कि गोली चलाई, बल्कि इस
दुख इस बात का है, कि मार क्यों नहीं डाला, और अब
सम्गीन ने सोचा, कि इस हालत में बिज़बेदोव पागलपन भरी कोई और भी
हरकत कर सकता है. अपने आप को ख़तरे में महसूस करके, वह कठोरता
से,
कामकाजी
भाव से उसे शांत करने लगा.
“अगर आप चाहते हैं, कि मैं
आपको बचाऊँ, - तो आपको सब कुछ सिलसिलेवार तरीके से बताना होगा...”
बिज़बेदोव ने सुराही
मेज़ पर रख दी, इधर-उधर देखते हुए कुछ देर ख़ामोश रहा, और बोला:
“अच्छा...हम शहर से
बाहर मिले थे. वो नई बंदूक पर प्रैक्टिस करने जा रहा था. हम एक साथ गए. मैंने
पूछा: कबूतरों के बदले पैसे क्यों नहीं लेता? वो मुझे
सिखाने लगा और कान पे झापड़ खाया, - अब शैतान ने ही उसे बंदूक से मुझ पर हमला करने
के लिए उकसाया, मगर मैंने बंदूक छीन ली, और मुझे –
हत्थे से उसे मारना चाहिए था...”
वह ख़ामोश हो गया, उसने हाथ
भी ऊपर उठाया, जैसे अपना मुँह बंद करना चाहता हो, और इस
थरथराते हुए मासूम हाव-भाव ने सम्गीन को स्पष्ट रूप से कहने का अधिकार दे दिया:
“आप जानते थे, कि बंदूक
भरी हुई है.”
“हाँ. उसने बताया
था,
जब
वो मेरे हाथों में थी...जब मैंने उसे देखा,” बिज़बेदोव
ने अफ़सोस से स्वीकार कर लिया और भर्राते हुए, अपने हाथों
से बिखरे बालों वाले सिर को पकड़ लिया:
“आण्टी – बस, यही बात
है! अगर वो अदालत में जाता है, तो वो...और वो – जाएगा ही! आपके उसके साथ
भावुक...”
“बेवकूफ़ी भरी बातें
मत करो,” सम्गीन ने चेतावनी दी और एक व्यावसायिक प्रश्न पूछा:
“गवाह – थे?”
“नहीं – कोई भी
नहीं,”
बिज़बेदोव
ने कहा और गाल इतने कस कर फुला लिए, कि उसके कान और गर्दन लाल हो गए, और इसके
बाद,
तेज़ी
से हवा बाहर निकाल कर, उसने ज़िद्दीपन से और बदतमीज़ी से पूछा:
“आपके पास वाइन है?”
वह उठा और झूलते
हुए,
बूढ़े
आदमी की तरह पैरों को घिसटते हुए, चला गया. उसके वाइन की बोतल लेकर लौटने से
पहले सम्गीन ने अपने आप को यकीन दिलाया कि अब वह मरीना के बारे में अपने लिए अति
महत्वपूर्ण बात सुनने वाला है. बिज़बेदोव ने चाय के गिलास में वाइन डाली, आधी पी गया
और नाउम्मीदी से, नाराज़गी से दुहराया:
“जाएगा, ईडियट!
पहले – आण्टी से डर भी जाता, मगर अब, जब सभी
दादागिरी पे उतर आए हैं और हर रोज़ लोगों को सूली पर चढ़ाया जा रहा है, - ज़रूर
देगा...”
उसे न केवल शांत
करने की ज़रूरत थी, बल्कि अपने पक्ष में करना और फिर मरीना के
बारे में कुछ सवाल पूछना भी ज़रूरी था. ये भाँप कर, सम्गीन ने
वकील के अंदाज़ में, इस बारे में बताना शुरू किया कि अपना बचाव
कैसे करना होगा:
“आपने, ज़ाहिर है, मन की
विक्षिप्त अवस्था में ये काम किया है, - कानून इसे मानसिक उथल-पुथल और चिड़चिड़ाहट की
स्थिति के रूप में परिभाषित करता है. ऐसी स्थिति बगैर किसी कारण के उत्पन्न नहीं
होती,
वह
अपमान के कारण पैदा होती है, या फिर – किसी हल्की-सी, अस्वाभाविक
उत्तेजना का परिणाम होती है, जो कर्ता के स्वभाव में निहित है. इस अंतिम
स्थिति के लिए मेडिकल राय की ज़रूरत पड़ती है. गवाह – नहीं हैं. पीड़ित की गवाही? गोली उसी की
बंदूक से चलाई गई थी. ये संयोगवश भी हो सकता था, बंदूक का
निरीक्षण करते समय, हो सकता है, आपको मालूम
न हो कि वह भरी हुई है. आख़िरी बात, अगर आपको पक्का याद है, कि पीड़ित
ने वाकई में आप पर हमला करने के लिए बंदूक घुमाई थी, - तो आप
बंदूक के कारण उससे झगड़ा कर सकते थे, और गोली भी संयोगवश ही चली होगी. आत्म-रक्षा
के उद्देश्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता. वैसे – बचाव का आधार काफ़ी पुख़्ता
है...”
एडवोकेट के इस
कानूनी भाषण को बिज़बेदोव ने उसकी तरफ़ खड़े-खड़े, आधे मुड़ कर, सिर को
कंधे पे झुकाकर और वाइन का गिलास अपनी ठोढ़ी के पास पकड़े हुए सुना.
“ होशियार हो,” उसने हौले
से तारीफ़ की और, ज़ाहिर था कि वह बेहद ख़ुश था. “बहुत बढ़िया!” और
सिर झटक कर, मुँह में वाइन डाली और घुरघुराया.
“मगर फिर भी मैं ये
अदालत का चक्कर नहीं चाहता, आप ये सब बगैर शोर-शरावे के निपटाने में मेरी
मदद कीजिए. मैंने आपके मीश्का को भेजा है टोह लेने के लिए – वो क्या कहते हैं? और
अगर...कोई बड़ी बात नहीं हो रही होगी, तो कल ख़ुद ही ब्लिनोव के पास जाऊँगा, शैतान उठा
ले उसे! और आप – आण्टी को शांत कीजिए, उससे कुछ भी कह दीजिए...ऐसा-ऐसा,” उसने
सम्गीन के पास आते हुए, बिना किसी लाग-लपेट के और जोश से कहा, और अपनी
भारी,
लाल
हथेली से उसके कंधे को हौले से छू भी लिया. इससे सम्गीन को कुछ अटपटापन महसूस हुआ, - मुस्कुराते
हुए उसने कहा:
“आप मरीना
पेत्रोव्ना से बहुत डरते हैं!”
“डरता हूँ,” एक कदम
पीछे हटकर बिज़बेदोव ने कहा, और, पीठ के पीछे हाथ छुपाकर, ग़ौर से, गुस्से से
सम्गीन के चेहरे पर सफ़ेद आँखें गड़ा दीं, याद दिला दी मॉस्को की, हरे घर की, ल्युबाशा
सोमोवा की, गुण्ड़ों के टूट पड़ने के दृश्य की. “ क्या मज़ाक लग रहा
है?”
बिज़बेदोव
ने पूछा.
“मज़ाक नहीं, बल्कि –
अजीब लग रहा है,” सम्गीन ने कंधे सिकोड़कर, चष्मा ठीक
करते हुए कहा.
अपनी नीली आँखें एक
तरफ़ से दूसरी तरफ़ घुमाते हुए, बिज़बेदोव नज़र चुरा रहा था, उसका चेहरा
विकृत हो गया, नीचे तैर गया; साफ़ नज़र आ
रहा था, कि वह कुछ कहना चाहता है, मगर –
फ़ैसला नहीं कर पा रहा है. सम्गीन ने उसकी मदद करने की कोशिश की:
“लगता है, कि वह बहुत
तानाशाह किस्म की इन्सान है...”
“इन्सान?” बिज़बेदोव
ने बेमतलब ही दुहरा दिया. “ हाँ, ये – सही है...ख़ैर, थैन्क्यू!”
उसने अनपेक्षित रूप से कहा और दरवाज़े की ओर चला गया, और सम्गीन
गुस्से भरी निगाह से उसे जाते हुए देख कर सोचने लगा:
‘बिल्कुल
गुनहगार टाइप का नमूना है. मरीना से वह न सिर्फ डरता है, बल्कि, लगता है, उससे नफ़रत
करता है. क्यों?’
मगर दूसरे ही दिन
बिज़बेदोव ने सम्गीन के मन में अजीब सा शक पैदा कर दिया: गोली चलने वाला ये सारा
किस्सा, जैसे, उसने सिर्फ इसलिए सुनाया था, कि अपने
प्रति दिलचस्पी पैदा कर सके; अपनी सफ़लता को उसने ख़ूब बढ़ाचढ़ा कर बताया, - गोली उसने
कबूतर वाले के मुँह पर नहीं, बल्कि पेट पे चलाई थी, और एक भी
गोली मोटे ओवरकोट के पार नहीं घुसी. अपनी हजामत की हुई ठोढ़ी और गालों को आराम से
सहलाते हुए उसने कहा:
“समझौता कर लिया; उसे दो
जोड़ी कबूतर और बीस रूबल्स दिए, - शैतान उठा ले!”
सम्गीन को लगा भी, कि ये भी –
झूठ है और गोली चली ही नहीं थी, सब कुछ उसकी कल्पना थी. मगर वह बिज़बेदोव से
कहना नहीं चाहता था, कि उस पर यकीन नहीं कर रहा है, बल्कि उसने
सिर्फ व्यंग्य से टिप्पणी की:
“आज तो हजामत बनाई
है.”
“बड़ों की बात सुनता
हूँ,”
बिज़बेदोव
ने जवाब दिया, और उसके फूले हुए चेहरे पर झुर्रियाँ दौड़ गईं, जिससे कुछ
पलों के लिए उसका मोटा, फूला हुआ चेहरा बूढ़ों जैसा पिलपिला हो गया. इस
फूहड़ घटना ने बिज़बेदोव के प्रति सम्गीन की घृणा को और मज़बूत कर दिया, उसका
विश्वास नहीं डगमगाया कि वलेन्तीन आण्टी से डरता है, और उसकी
दिलचस्पी को और बढ़ा दिया, - कि धन-संग्रह की हवस के अलावा, और किस
आधार पर वह जीती है? इस हवस को वह किसी भी तरह नहीं छुपाती
थी.
करीब दो दिन बाद वह
सम्गीन से दुकान में मिली, उसके शब्दों में वह न तो सहानुभूति, ना ही
कटुता का अनुभव कर सका:
“जला दिया ‘वेलकम
इस्टेट’ को! जला दिया, सैनिकों के
होने के बाद भी. ज़खारी को थोड़ा-बहुत मारा, मुश्किल से
भागा. घर का बायाँ हिस्सा पूरा जल गया और ऑफ़िस, गोदाम, अस्तबल भी
जल गए. ये तो अच्छा रहा कि मैं गेंहूँ बेच चुकी थी.
वह कृत्रिम ढंग से
बोल रही थी, दाँत दिखाते हुए, दाहिना हाथ
इस तरह से हिलाते हुए, जैसे सम्गीन को मारने वाली हो.
“लीदिया को घर पसंद
नहीं आया, वह उसे फिर से बनवाना चाहती थी. मेरा – कोई नुक्सान
नहीं हुआ, गिरवी के पैसे मुझे मिल गए. मगर फिर भी लीदिया को
सांत्वना देना होगा, तुम उसके पास जाओ, - कैसी है वो? मैं – गई
थी,
मगर
वो थी नहीं, - वह ड्यूमा के चुनावों में लगी हुई है, अपने इस ‘रूसी जनता
संघ’
में...
तुम कुछ करो!”
सम्गीन चल पड़ा और
रास्ते में सोचता रहा कि वह उत्तराधिकार के अधिकार की पुष्टि नौजवान, भोले
विदेशी तुर्चानिनव के लिए नहीं, बल्कि पहली गिल्ड के व्यापारी की विधवा मरीना
पेत्रोव्ना ज़ोतोवा के लिए कर रहा है.
‘नरभक्षी,’ उसने सोचा.
“अधिकाधिक खुलती जा रही है, चिड़चिड़ी भी होती जा रही है’.
मगर उसकी इस क्रूर
हवस पर उसने ठण्डेपन से ही सोचा – दिमाग़ से, उसे यकीन
था,
कि
ये हवस अभी समूची मरीना को परिभाषित नहीं करती है. और उसे सरल बनाना भी उसे अटपटा
लगा,
- उसे
महसूस हुआ, कि, ज़ोतोवा को सरल बनाने की कोशिश में वह स्वयम्
को उसके बेहूदे उद्देश्यों के आज्ञाकारी सेवक के स्तर तक गिरा रहा है. मगर उसका
दिमाग़ सिर्फ इन्हीं उद्देश्यों तक सीमित नहीं हो सकता. वो पैसे जमा करती है, शायद, न सिर्फ
पैसों की ख़ातिर, बल्कि – किसी और चीज़ की ख़ातिर. आख़िर किसलिए? वह समझा
नहीं सकता था, कि उसके भीतर यह धारणा कैसे उत्पन्न हो गई, मगर धारणा
पक्की हो गई थी. आख़िर उसे अपने आप को समझाना था: किस उद्देश्य के लिए वह काम कर
रहा है?
लीदिया उसे
अध्ययन-कक्ष में बुलाया, मेज़ पे. धुँधले काँच वाला चश्मा पहने, वह काले
ड्रैगन्स की एम्ब्रॉयडरी वाले, पीले रंग के चीनी गाऊन में थी, घुंघराले
काले बालों पर हमेशा की तरह जाली बंधी थी, वह कैंची
से अख़बार काट रही थी. उसका साँवला चेहरा खिंचा हुआ और कटु नज़र आ रहा था.
“आह, पता है, पता है!”
उसने हाथ झटक कर कहा. “पुराना, सड़ा हुआ घर जल गया, तो – क्या?” इसके लिए
सज़ा दी जायेगी. मुझे फ़ोन करके बताया गया, कि किसी सैनिक को और रसोइन की बेटी को
गिरफ़्तार किया गया है, - शायद ये, वो ही है –
तीखी नाक वाली, मुँहज़ोर.”
और, दोनों
हाथों को अख़बारों की गड्डी पर मारते हुए, वह जल्दी-जल्दी, उत्तेजना
से,
उन्मादपूर्वक
चीखते हुए कहती रही:
“मगर – रूस क्या
करेगा,
जो
ढह रहा है, क्या – बताओ? मुझे लिखते
हैं कि त्सार हर चीज़ के प्रति उदासीन है, और दूसरा आदमी, जो ऊँचे
तबकों के करीब है, बताता है; त्सार उससे
नफ़रत करता है, जो स्वयम् उसने ही दिया है, - इस ड्यूमा
से,
कॉन्स्टीट्यूशन
से और हर चीज़ से. डिक्टेटरशिप के बारे में कहते हैं, तुम सोचो!
तानाशाही के अंतर्गत डिक्टेटरशिप के बारे में! क्या ऐसा कभी हुआ था?” सिर झुका
कर,
उसने
कनखियों से सम्गीन की ओर देखा, उसका चश्मा नाक के सिरे तक फिसल गया, और ऐसा लगा
कि उसके चेहरे पर अलग-अलग रंगों की दो जोड़ी आँखें हैं. “सारी जानकारी के अनुसार, ड्यूमा में
फिर से और काफ़ी संख्या में लेफ्टिस्ट्स जाएँगे. ये होगा साहसी स्तलीपिन की बदौलत, जो समुदाय
को नष्ट करने पर तुला है, गाँवों से हट्टे-कट्टे किसानों को निकालकर छोटी-छोटी
बस्तियों में भेज रहा है...”
सम्गीन ने कहा:
“तुम्हें, लगता है, इस सुधार के
प्रति सहानुभूति थी?”
“नहीं,” उसने तैश
से कहा. “मतलब – हाँ, सहानुभूति थी, जब उसके
क्रांतिकारी पक्ष को नहीं देखा था. अमीरों को गाँव से बाहर भेज देना – इसका मतलब
गाँव को निर्बल बनाना और किसानों को भी उतना ही असुरक्षित रखना, जितना
ज़मींदारों को.” वह कुर्सी की पीठ से टिक गई और, चश्मा
निकालकर, फूली हुई पलकों के घेरों में कैद काली आँखों से
सम्गीन की ओर देखते हुए उलाहने से सिर हिलाने लगी.
“ हालाँकि – ये
सब मैं बेकार ही में कह रही हूँ, मैं जानती हूँ: तुम हर उस चीज़ के प्रति उदासीन
हो,
जो
विनाश नहीं है. मरीना ने तुम्हारे बारे में कहा था: ‘अनैच्छिक
दर्शक...’”
“वो कैसे?” दुखभरे
अचरज से सम्गीन ने पूछा. “और – इसका मतलब क्या है?”
“ये – भयानक है, क्लीम!”
सिर के ऊपर वाली जाली को ठीक करते हुए वो चहकी, और गाऊन की
बाँहों के काले ड्रैगन्स उसके कंधों पर, गर्दन पर रंग गए. “सोचो: तुम्हारा देश मर रहा
है,
और
हम सब को उसे बचाना चाहिए, जिससे अपने आप को बचा सकें. स्तलीपिन –
महत्वाकांक्षी और बेवकूफ़ है. मैंने इस आदमी को देखा है, - नहीं, वो – लीडर
नहीं है! और देखो, बेवकूफ़ इन्सान त्सार को सिखा रहा है! त्सार
को...”
सम्गीन उसकी चीख़ें
सुन रहा था, मगर चौड़े, ख़ूबसूरत गाऊन वाली इस औरत का उसके लिए इस कमरे
में कोई अस्तित्व नहीं था, और उसकी आवाज़ कहीं दूर से आ रही थी, जैसे वो
टेलिफ़ोन पे बात कर रही हो.
वह कल्पना कर रहा
था:
‘तो ऐसा
सोचती है मरीना मेरे बारे में...’
उसने सुना:
“आतंकवादियों ने पीटर्सबुर्ग में मॉस्को के विद्रोह को दबाने वाले जनरल मिन को मार
डाला,
इंतरलाकेन
में किसी जर्मन को मिनिस्टर दुर्नोवो समझ कर, उस पर गोली
चला दी, कोर्ट-मार्शल्स से अराजकतावादियों के क्रांतिकारी
प्रदर्शनों की संख्या को कम नहीं करते हैं”, - पीले गाऊन
वाली लड़की बेतहाशा चिल्ला रही थी, - मगर वो सब जिसके बारे में वो चीख रही थी, भूतकाल में
हो चुका था, दूसरे सम्गीन के सामने. वो, शायद इन सब
तथ्यों के बारे में किसी दूसरी तरह की प्रतिक्रिया देता, मगर ये, किसी भी
बात के बारे में स्पष्ट रूप से सोच नहीं पा रहा था, सिवाय अपने
और मरीना के बारे में.
‘अनैच्छिक
दर्शक?
ये
– सही है, मैंने ख़ुद ही अपने आप से ये कहा था’.
एक मिनट के लिए
उसने त्सार को, एक छोटे से आदमी की टीन जैसी भूरी आकृति को याद
किया,
जिसकी
आँखें नीली थीं और चेहरे पर हल्की सी प्यारी मुस्कान थी.
‘उदासीन और
नफ़रत करता है... असंबद्ध हैं. ज़्यादा ठीक रहेगा – तिरस्कार करता है. और मैं – नफ़रत
करता हूँ, या तिरस्कार करता हूँ?’
वह अनचाहे ही
मुस्कुरा दिया और इससे लीदिया भड़क उठी.
“क्या तुम्हें ये
सब सिर्फ मज़ाक लगता है? मगर – सोचो! देश में सबसे ऊपर होना, सबसे ऊपर!”
अपनी बीमार आँखों को घबराहट से चौड़ा करके वह चिल्लाई. “दो मुँह वाला उकाब, ये तो –
अमानवीय शासन का पवित्र प्रतीक है...”
सम्गीन ने ग़ौर ही
नहीं किया कि उसने कब और क्यों फिर से त्सार के बारे में कहना शुरू कर दिया.
“हम सब – दो मुँह
वाले हैं,” उसने उठते हुए कहा. “ज़ोतोवा, तुम, मैं...”
“तुम क्या कहना
चाहते हो?” लीदिया ने पूछा और वह भी खड़ी हो गई.
अपने ही शब्दों में
मगन,
उसने
लीदिया को अपमानित करने की उम्मीद से कहा:
“त्सार, शायद, इस भागदौड़
से थक गया है और सबका तिरस्कार करता है...”
“वो? ईश्वर
द्वारा अभिषिक्त और – लोगों का तिरस्कार करता है?” लीदिया
आवेश से चिल्लाई. “होश में आओ! ऐसा सिर्फ नास्तिक, अराजकतावादी
ही कह सकता है! वैसे – स्वभाव से तुम वैसे ही हो.”
उसने निराशा से सिर
हिलाया, फिर, जब सम्गीन ने उससे हाथ मिलाया, तो पूछा:
“यहाँ सबके हाथों
में ग़ज़ब का पसीना आता है, - तुमने ग़ौर किया?
‘बेवकूफ़.
अंजीर का बांझ पेड़,’ सम्गीन ने उदासीनता से सोचा, जैसे
टिप्पणियाँ लिख रहा हो. ‘इससे कहीं ज़्यादा तो मरीना अकलमंद और दिलचस्प
है...’
और मरीना की बगल
में त्सार की नीली-भूरी आकृति की कल्पना करके वह हँस पड़ा.
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